Thursday, September 4, 2025

पतन दर पतन

राजनीति के मैदान में चुनावी योद्धा एक दूसरे को नीचा दिखाते-दिखाते नीचता की हर हद को लांघ रहे हैं। देश में जब भी कहीं चुनाव होने होते हैं, तो विपक्षी दल और नेता सत्तासीन होने के सपने देखने लगते हैं। सपने देखना गलत नहीं। वर्षों से यही होता आया है। चुनाव प्रचार के दौरान पक्ष और विपक्ष के नेताओं से शालीनता और मर्यादा के पालन की उम्मीद की जाती है, लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं रही। तब विरोध में भी शिष्टाचार समाहित रहता था। उम्र और पद की गरिमा का पूरा-पूरा ध्यान रखते हुए अपनी जुबान पर नियंत्रण रखा जाता था, लेकिन अब कई नेता घटिया से घटिया भाषा का इस्तेमाल कर अपने घोर पतित और चरित्रहीन होने के भी सबूत पेश कर रहे हैं। उनकी यह गिरावट उनकी पार्टी को भी कठघरे में खड़ा कर रही है। सत्ता की चाहत के लिए ऐसे पतन की यकीनन कल्पना नहीं की गई थी। सत्ताधीशों की कार्यप्रणाली से नाखुश होने पर उनके खिलाफ जनजागरण करने की बजाय गालीगलौच करने की प्रवृत्ति अक्षम्य होने के साथ-साथ खुद के लिए मौत का कुआं खोदने वाली बेवकूफी है।

जब से नरेंद्र मोदी भारत वर्ष के प्रधानमंत्री बने हैं, तब से कुछ नेता, पत्रकार, संपादक, उम्रदराज वकील तथा खास किस्म के बुद्धिजीवी पानी से बाहर फेंक दी गई मछली की तरह छटपटा और फड़फड़ा रहे हैं। मोदी की हर अच्छी बात में खोट निकालने की जिद में जोकर बने नज़र आ रहे हैं। साफ-साफ दिखाई दे रहा है कि नरेंद्र मोदी पर वोटों की हेराफेरी कर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने के आरोप वो ‘मंडली’ लगा रही है, जो वर्षों से येन-केन प्रकारेण सत्ता हथियाने के लिए बौखलायी और पगलायी है। यह मंडली जब कहीं से चुनाव जीतती है तो जोर-शोर से अपनी पीठ थपथपाती है, लेकिन शर्मनाक पराजय होने पर ईवीएम यानी इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में हुई वोटों की हेराफेरी के राग अलापने लगती है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को पीएम बनने की बहुत जल्दी है। जिस तरह से राहुल धैर्य खोकर आक्रामक हो गये हैं, उससे भाजपा ही नहीं सजग देशवासी भी हैरान हैं। राजनीति में एक दूसरे पर बयानों की तोप चलाना, खामियां गिनाना भी कोई नई बात नहीं। ये तो सतर्कता की पहचान है, लेकिन ओछेपन पर उतर आना तो अज्ञानी और नालायक होने की निशानी है। कुछ वर्ष पहले तक भाजपा के कुछ नेताओं ने राहुल गांधी का खूब मजाक उड़ाया। उन्हें शहजादे कहकर प्रधानमंत्री ने भी उन पर तंज कसे। उन्हें नासमझ ‘पप्पू’ साबित करने का भरपूर अभियान भी भाजपा वालों ने चलाया। अब राहुल खुद को परिपक्व दिखाने के चक्कर में बार-बार आपा खोते नज़र आते है। उनके कार्यकर्ता और नेता भी अपने नायक का अनुसरण कर रहे हैं। उनकी वोट अधिकार यात्रा के दौरान दरभंगा के मंच से एक कांग्रेसी ने विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के प्रधानमंत्री को मां की गाली देकर अपने मुंह पर कालिख पोत ली। राहुल गांधी को लोकसभा चुनावों में आंशिक सफलता क्या मिली कि उनके तेवर ही बदल गये। उनकी देखा-देखी कांग्रेस के अदने से कार्यकर्ता और नेता भी तू-तड़ाक करते हुए बेहूदगी और निर्लज्जता के काले परचम लहराने लगे। दरभंगा में जिस मंच पर माननीय प्रधानमंत्री और उनकी आदरणीय माताजी के लिए अपमानजनक शब्द उगले गये, वहां हालांकि स्वयं राहुल गांधी मौजूद नहीं थे, लेकिन उनका अनुसरण कर जहर उगलने वालों का हौसला बुलंद था। लगता है अब राहुल गांधी एंड कंपनी के पास और कोई रास्ता नहीं बचा है। पिछले एक दशक से कांग्रेस को  देश और प्रदेशों में लगातार चुनावी हार झेलनी पड़ रही है। आज केवल हिमाचल, तेलंगाना और कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। साउथ और नॉर्थ मेें भी कांग्रेस अकेले दम पर सरकार बनाने की हैसियत में नहीं है। जाहिर है कि ऐसे में निराशा और हताशा स्वाभाविक है, लेकिन एटम बम और हाइड्रोजन बम फोड़ने की धमकी देने के क्या मायने हैं? आपको सच्चाई बताने से कौन रोक रहा है, लेकिन बम और बारूद की भाषा तो मत बोलिए। लगता है कि जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए कांग्रेस के नायक को खलनायक बनने में संकोच नहीं हो रहा है तथा उनकी पार्टी के छोटे-मोटे नेताओं को अपमानजनक और आक्रामक भाषा के जरिए विषैले तीर चलाने की आदत पड़ती जा रही है। कांग्रेस के अधिकांश प्रवक्ता भी हर उस शख्स को अपना शत्रु मानने लगे हैं, जो भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी के प्रति श्रद्धा तथा सॉफ्ट कार्नर रखता है। यह लाइलाज बीमारी तो कुछ चुनिंदा पत्रकारों को भी अपनी गिरफ्त में ले चुकी है। उन्होंने भाजपा और मोदी की बुराई करने की शपथ ले रखी है। ऐसा तो नहीं है कि मोदी सरकार ने जनहित के कोई कार्य ही न किए हों, लेकिन इन्होंने तो अपनी आंख पर पट्टी और मुंह पर ताले लगा रखे हैं। इन्होंने कसम खा रखी है कि ये ताले तभी खुलेंगे, जब कांग्रेस सत्ता पायेगी और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे। 

हाल ही में इंडिया टुडे ग्रुप की ओर से मूड ऑफ नेशन सर्वे कराया गया है। इस सर्वे का मकसद यह जानना है अगर आज लोकसभा चुनाव हो जाएं तो क्या नतीजे बदलेंगे या वही रहेंगे। यह सर्वे कहता है कि अभी चुनाव होने पर सरकार तो एनडीए की ही बनेगी! सीटों की संख्या में भी मामूली बदलाव हो सकते हैं। 2024 में 293 सीटें जीतने वाली एनडीए 324 सीटें जीत सकती है, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन की सीटें 234 से घटकर 208 में सिमट जाने का अनुमान है। यानी विपक्ष अभी इस लायक नहीं कि अपनी छाती तान सके। आम जनता की सोच एक पक्षीय सोच वाले मीडिया जैसी नहीं है। वह यह भी जानती है कि नरेंद्र मोदी का विकल्प देश में अभी तो दूर-दूर तक दिखायी नहीं दे रहा है। अब बात करते हैं नरेंद्र मोदी के अपनी उम्र के 75 साल पूर्ण करने के पश्चात रिटायर होने की। वैसे तो अनुमान तो संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के रिटायर होने के भी लगाये जा रहे थे। 11 सितंबर को 75 साल के होने जा रहे मोहन भागवत ने स्पष्ट कर दिया है कि, उनका रिटायर होने का कोई इरादा नहीं। एक कार्यक्रम के मंच पर उन्होंने स्पष्ट किया कि, मैंने यह नहीं कहा था कि मैं रिटायर हो जाऊंगा या किसी और को 75 साल के होने पर रिटायर हो जाना चाहिए। मैं 80 की उम्र तक शाखा लगाऊंगा। तय है कि विरोधी कितना भी सिर पटक लें, आरोपों के हाइड्रोजन बम फेंक लें, लेकिन 17 सितंबर को 75 साल के होने जा रहे नरेंद्र मोदी भी गद्दी नहीं छोड़ने वाले। उनमें कम अज़ कम 85 साल की उम्र तक देश की सेवा करने का पूरा दमखम है। विरोधी उनके रिटायर होने के दिन-रात सपने देखने और धड़ाधड़ गालियां देने के लिए स्वतंत्र हैं।

Monday, September 1, 2025

कितनी लाचार और नादान हैं बेचारी!

कोई दिन ऐसा नहीं जिस दिन ऐसी खबर नहीं। गंगा जमुना रेड एरिया में पुलिस का छापा। आठ लड़कियों को मुक्त कराया। इनमें पांच हैं नाबालिग। देह मंडी से पुलिस चौकी लगी हुई है। खाकी वर्दी वालों ने जानकारी होने के बावजूद आंखें मूंदे रखीं। बस जेब भरते रहे। संतरा नगरी में एक कुख्यात गैंगस्टर की छत्रछाया में चल रहे कॉपर सैलून में पुलिसिया छापे के दौरान सैक्स रैकेट का भंडाफोड़। पांच पीड़िताओंको पुलिस ने अपने कब्जे में लिया। इनमें दो छात्राओं का भी समावेश है। पिस्तौल की नोंक पर गैंगस्टर ने पहले इनसे बलात्कार किया, फिर देह के धंधे में झोंक दिया।

क्राइम ब्रांच के सामाजिक सुरक्षा दस्ते ने हुडकेश्वर इलाके में चल रहे देह व्यापार के अड्डे से छत्तीसगढ़ की रहने वाली एक महिला को मुक्त कराया। सुनीता और उसका बेटा यश इस अड्डे के संचालक हैं। दोनों ही लड़कियों को अच्छी कमायी का लालच देकर फांसते थे और बेखौफ होकर जिस्म फरोशी करवाते थे। छत्तीसगढ़ से रोजी-रोटी की तलाश में आई महिला को भी मां-बेटे ने मिलकर अपने जाल में फंसाया था। इसी तरह से रईसों के इलाके वाठोड़ा में स्थित एक होटल में गुप्त कमरे में चल रहे देह व्यापार में लिप्त दो पीड़ित महिलाओं को छुड़ाया गया। यह दोनों महिलाएं पहले भी कई बार ग्राहकों के जिस्म की भूख मिटाती पकड़ी जा चुकी हैं। शहर में बीयर बार की आड़ में चोरी-छिपे डांस बार की खबर लगने पर पुलिस ने जब छापा मारा तो पुलिस ने देखा कि तीन युवतियां आधे-अधूरे वस्त्रों में अश्लील नृत्य कर रही थीं। रात के डेढ़ बजे लगभग पचास से ज्यादा शौकीन बेशर्मी से सराबोर डांस का शराब पीते हुए मज़ा ले रहे थे। उनके द्वारा नशे में झूमती बालाओं पर धड़ाधड़ नोट भी बरसाये जा रहे थे। ‘शिव शक्ति’ नामक इस बार में अलग से एक कमरा भी था, जहां पर खासमखास ग्राहक मदहोशी की हालत में लोटपोट हो रहे थे। कुछ तो अपनी पसंद की युवतियों को अपनी गोद में बिठा  कर अश्लील हरकतें कर रहे थे। 

मायानगरी मुंबई की तर्ज पर नागपुर में भी ऐसे कई बार हैं, जहां पर आर्केस्ट्रा का लाइसेंस लेकर नये किस्म की वेश्यावृत्ति करवायी जाती है। नियमित आने वाले रईसों, अपराधियों को विशेष छूट देने का भी प्रावधान है। बार गर्ल पर नोटों की बरसात करने की जिसकी जितनी क्षमता होती है, उसकी उसी के अनुसार पूछ परख और इज्ज़त होती हैं। शहर में कुछ करोड़पति मतवाले ऐसे भी हैं जिनका इन महफिलों में पहुंचना रोज का काम है। उन्हें करारे नोट उड़ाने के अलावा बार गर्ल को नोटों के हार पहनाने में अलौकिक आनंद आता है। मुंबई की तर्ज पर नागपुर में भी ऐसे उद्योगपतियों, नेताओं और माफियाओं की भरमार है जिनके अधिकांश खाकी वर्दीधारियों से मधुर संबंध हैं और इन्हीं की बिरादरी के अधिकांश लोग ऐसे अय्याशी के अड्डों की जान, शान हैं। पुलिस कभी-कभार छापा मारने का नाटक कर अपने होने के निशानी छोड़ती रहती है। फिर गहरी नींद में लीन हो जाती है। जागरूक जनता लाख जगाने की कसरत करती रहे, लेकिन उसकी हर मेहनत धरी की धरी रह जाती है। एक सच जिस पर बहुत कम गौर किया जाता है, वो ये भी है कि ब्यूटी पार्लरों, मसाज के विभिन्न चमकते-दमकते ठिकानों, यूनी सेक्स सैलूनों, फार्म हाऊसों में अपना जिस्म बेचती जिन लड़कियों, औरतों की पकड़ा-धकड़ी की नौटंकी की जाती है उन्हें बड़े सम्मान और सहानुभूति के साथ पीड़िता दर्शाया जाता है। जबकि इनमें से अधिकांश बार-बार पकड़ में आती रहती हैं। फिर भी बेचारी, भोली-भाली और नादान पंछी घोषित कर आजाद उड़ने के लिए छोड़ दी जाती हैं। सच तो यह है कि हमारे यहां अपराध कर्म में पुुरुषों से प्रतिस्पर्धा करती महिलाओं को कुछ ज्यादा ही छूट दी जा रही है। कल तक स्त्रियां दहशत में थीं, आज पुरुष डरे-सहमे हैं। कभी किसी पति का शव नीले ड्रम में मिलता है तो कभी किसी अंधी गहरी खाई में उसका शव पाया जाता है। हर नारी अपना जीवनसाथी चुनने के लिए स्वतंत्र है। माता-पिता के चयन पर आपत्ति दर्शाने का हर युवती को पूरा-पूरा हक है। लेकिन गलत फैसले और नकाबपोशी उन्हें कलंकित करते हुए कठघरे में खड़ा कर देती है। अभी हाल ही में रेलगाड़ी से इंदौर से कटनी के लिए निकली एक 29 वर्षीय युवती अपनी मर्जी से बड़े शातिर अंदाज से अपने मित्र के साथ गायब हो गई। इस गुमशुदा युवती को खोजने के लिए पचासों पुलिस वाले जमीन-आसमान एक करते रहे लेकिन वह हाथ नहीं लगी। उसके गुम होने को लेकर कई तरह की शंकाएं जन्मती रहीं। कहीं चलती टे्रन से गिर तो नहीं पड़ी। किसी बदमाश ने अपहरण तो नहीं कर लिया। लोग युवती के प्रति सहानुभूति तो पुलिस को कोसते हुए उसे नालायक ठहराते रहे। पुलिस को गुमराह करने के लिए शातिर लड़की ने जंगल में अपना मोबाइल फेंक दिया था। अपना सामान तक ट्रेन में लावारिस छोड़ चलती बनी थी। यह युवती वकील है। जज बनने का सपना देख रही थी। घरवाले उसकी शादी के लिए योग्य साथी तलाश कर रहे थे लेकिन वह तो अपने यार के साथ जिन्दगी गुजारने की ठाने थी, इसलिए उसके साथ बीच रास्ते में उतरी और अपहरण का नाटक रचते हुए जा पहुंची नेपाल। पुलिस उसे तलाशने के लिए जहां-तहां नाचती रही। यह तो अच्छा हुआ कि गुमराह करने में माहिर शातिर वकीलन को तेरह दिन बाद काठमांडु से बरामद कर लिया। यदि नहीं मिलती तो हंगामा मचा रहता कि इस देश में औरतें बिल्कुल सुरक्षित नहीं हैं। चलती रेल गाड़ियों से उन्हें गायब करवा दिया जाता है। इसे आप नारी के आधुनिक और प्रगतिशील होने का प्रमाण कहेंगे या कुछ और? मैंने तो जब यह खबर पढ़ी तो सन्न रह गया। रामपुर जिले के एक गांव की महिला, जो शादीशुदा होने के बावजूद दस बार अपने पुराने आशिक के साथ भाग चुकी है। अपनी इस भगौड़ी पत्नी से परेशान पति ने अंतत: पंचायत की शरण ली। महिला  ने पंचों के सामने स्पष्ट कहा कि मैं पंद्रह दिन अपने प्रेमी के साथ तो पंद्रह दिन पति के साथ रहूंगी। यदि पति को मंजूर है तो ठीक नहीं तो मेरे लिए तो प्रेमी के घर के दरवाजे खुले हैं। जहां मैं मौज मजे के साथ रहने में देरी नहीं लगाऊंगी।

Thursday, August 21, 2025

ऐसे छिन रहा बच्चों का बचपन

मोबाइल की चाहत और उसकी लत कई खौफनाक मंजर दिखा रही है। ऐसी कभी कल्पना नहीं की गई थी कि मोबाइल की वजह से आत्महत्याएं होने लगेंगी। बीते दिनों एक सोलह साल के किशोर ने अपनी मां से मोबाइल की मांग की। मां ने असमर्थता प्रकट कर दी तो वह बहुत निराश और आहत हो गया। जैसे उसकी दुनिया ही लुट गई हो। वह मां के सामने ही ऊंची पहाड़ी से कूद गया। अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही उसकी मौत हो गई। दो अन्य और पंद्रह वर्षीय किशारों ने भी यही रास्ता चुना। गरीब किसान पिता के पास बेटे को मोबाइल दिलाने के पैसे नहीं थे। बेटे ने खेत में जाकर पेड़ से लटक कर फांसी लगा ली। इसी तरह से अपने जन्मदिन पर पुत्र ने उपहार में मां से मोबाइल मांगा तो उसने कुछ दिन इंतजार करने को कहा, लेकिन उसे मोबाइल से ज्यादा अपनी जान ज्यादा सस्ती और गैर जरूरी लगी। वह कीटनाशक पीकर इस दुनिया से ही चल बसा। 

सोचो तो बड़े कमाल की चीज़ है यह मोबाइल। छोटों के साथ-साथ बड़े भी इसके चक्रव्यूह में छटपटा रहे हैं। इसकी वजह से तनाव व अनिद्रा के चंगुल में फंस रहे हैं।  कई घरों की मां-बहनें अपने तीन-चार साल के बच्चों को मोबाइल ऐसे पकड़ा रही हैं जैसे वो बच्चे-बच्ची के मन बहलाने का कोई बेहतरीन खिलौना हो। रोते लाडले-लाडली को मोबाइल से बहलाने, चुप कराने और हंसाने वाले पालकों की जब मोबाइल की वजह से ही रोने की नौबत आती है तब उन्हें अपनी गलती का अहसास तो होता है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती। है।

मासूम और नादान से लगने वाले बच्चों की मोबाइल की जिद्दी चाहत जब उन्हें खुदकुशी के लिए उकसाती है तो वह अंतत: दिल दहलाने वाली खबर भी बन जाती है। जिसे पढ़ने और सुनने के बाद लोग भूलने में भी देरी नहीं लगाते। लेकिन जिन पर बिजली गिरती है उनके जख्म कभी भी भर ही नहीं पाते। आज के आपाधापी के मायावी दौर ने माता-पिता को बहुत व्यस्त कर दिया है। उनके पास अपने बच्चों की देखरेख के लिए पर्याप्त वक्त नहीं। एक खबर जो मैंने पढ़ी, हो सकता है, आपकी आंखों के सामने से नहीं गुजरी हो, उससे मैं आपको अवगत कराये देता हूं। खबर पंजाब के लुधियाना शहर की है लेकिन ऐसे हालात देश में अब हर कहीं हैं। कोई भी शहर इससे अछूता नहीं। गांव भी इसकी चपेट में हैं। धन-दौलत के चक्कर में रिश्तों की अहमियत को ताक पर रख चुके कामकाजी पालकों के पास अपने बच्चों के लिए भी समय नहीं। अपनी औलादों की देखभाल के लिए उन्हें नौकरानी, आया नर्स आदि रखनी पड़ रही हैं। वही उन्हें नहलाती, सुलाती और खिलाती हैं। बच्चे उनसे जो मांगते हैं, देने की पूरी कोशिश करती हैं। अपना मोबाइल भी मालिकों के बच्चे-बच्ची को खुशी-खुशी पकड़ा कर अपने दूसरे कामों में व्यस्त हो जाती हैं। लुधियाना के एक बड़े नामी-गिरामी उद्योगपति बहुत व्यस्त रहते थे। उनकी पत्नी के पास भी ढेरों समाजसेवा के काम थे, इसलिए वह भी अपने सात साल के बेटे की देखरेख के लिए समय नहीं निकाल पाती थीं। सुबह से रात तक नौकरानी ही बच्चे के साथ रहती। वही उसे नहलाती, खिलाती और तैयार करती। कभी-कभार वह बच्चे के साथ रात को सो भी जाती। किसी छुट्टी के दिन पति-पत्नी को जब लगा कि उनका बच्चा नौकरानी से अत्याधिक जुड़ाव महसूस करने लगा है तो उन्होंने नई नौकरानी रखने को लेकर आपस में बातचीत की। बच्चे ने जब उनकी यह बात सुनी तो उसने झट से कहा कि यही मेरी मां है। अगर यह जाएगी तो मैं भी इसके साथ जाऊंगा। आपके साथ नहीं रहूंगा। इसी तरह से शहर के एक डॉक्टर दंपति का छह साल का बेटा छुट्टी के दिन भी अपनी मां की गोद में जाने के बजाय आया के पास बैठा रहता। इसी दौरान  रात को एक बार जब बच्चे को पिता के पास सोने को कहा गया तो भावनात्मक तौर पर मां-बाप से पूरी तरह दूर और कट चुके बच्चे ने साफ मना कर दिया। उसने आया के साथ सोकर अपनी जिद पूरी की तो डॉक्टर दंपति को यह बात बहुत खटकी। लेकिन अब उनके पास और कोई चारा नहीं। एक छह साल की बच्ची ने जब मोबाइल नहीं दिये जाने पर मां से यह कहा कि आया दीदी बहुत अच्छी हैं, आप बहुत बुरी हैं। जब देखो तब आप मुझे बस डांटती रहती हैं। मेरी कोई बात नहीं मानतीं। दीदी तो अपना मोबाइल झट से मेरे हाथ में पकड़ा देती है। जब एक उच्च पद पर कार्यरत महिला अफसर ने देखा कि उनका छह साल का बेटा आया की बोली, लहजे और शब्दों में बात करने लगा है। बात-बात पर चीखने-चिल्लाने और गालियां भी देने लगता है तो उनकी तो नींद ही उड़ गई। दरअसल, उनकी आया दूसरे राज्य की बोली में बात करती थी और भद्दी-भद्दी गालियां देने में भी संकोच नहीं करती थी। अफसर  जब चाइल्ड एक्सपर्ट के पास पहुंची तो उन्होंने बताया कि छोटे बच्चे वहीं भाषा अपनाते हैं जो वे सबसे ज्यादा सुनते हैं। अब अफसर मां समय निकालकर रोज आधा घंटा बच्चे को प्रेरक कहानी और सही शब्दों का अभ्यास कराती हैं। मनोचिकित्सकों का कहना है कि बच्चों की परवरिश में मां-बाप की अहम भूमिका होती है, अगर वे व्यस्त हैं तो भी रोज कम से कम एक-दो घंटे बच्चों के साथ जरूर बिताएं, ताकि बच्चे खुद को मां-बाप से जुड़ा महसूस करते रहें। बच्चा रोज जिसके साथ होता है, वही उसकी भाषा, व्यवहार और इमोशन तय करता है। अगर वह दिनभर आया के साथ है तो उसके लिए मां की अहमियत कम होती चली जाती है। शुरुआती छह साल बच्चों के व्यवहार और सोच को आकार देते हैं। अगर इन सालों में मां-बाप दूरी बना लें तो बाद में बच्चे का उनसे जुड़ना मुश्किल हो जाता है। मां-बाप की अनदेखी और कमजोर परवरिश उन्हें इस कदर गुस्सैल बना देती है कि वे उनसे नफरत तक करने लगते हैं। अकेलेपन और माता-पिता के सौतेलेपन के शिकार बच्चे अपराध की दुनिया से भी आसानी से जुड़ जाते हैं। इसकी गवाह हैं, शहरों में कुछ सालों में नाबालिगों के अपराध करने की घटनाओं में लगातार बढ़ती संख्या। हाल ही के वर्षों में चोरी, लूटपाट, मारपीट, बलात्कार और हत्या जैसे संगीन अपराधों में नाबालिगों केलिप्त होने की खबरों ने विचारकों को चिंताग्रस्त कर दिया है। अत्यंत दुखद पहलू तो यह भी है कि किशोरों को शराब, गांजा, चरस और हुक्का पीने का शौक उन्हें नशेड़ी बना रहा है। इस कुचक्र में बालक ही नहीं बालिकाएं भी फंसती चली जा रही हैं। बीते हफ्ते नागपुर में रहने वाली दो बालिकाओं ने मिलकर छत्तीसगढ़ में अपनी ही दादी की हत्या कर दी। गांजा, एमडी जैसे मादक पदार्थों की डिलिवरी में जब नाबालिग पकड़े जाते हैं तो पुलिस का माथा भी चकरा जाता है। खबरें बताती हैं कि किशोर उम्र के बच्चे नशे के लिए पैसे चुकाने के लिए चोरी, ठगी और अपहरण जैसे अपराधों में अपनी भागीदारी दर्शा रहे हैं। कई नाबालिगों ने तो अपहरण, धोखाधड़ी और बलात्कार जैसे संगीन अपराधों को अंजाम देकर अपने भविष्य को पूरी तरह से अंधकारमय कर लिया है...।

Monday, August 18, 2025

ऐसे कैसे खोता मनोबल?

संतरानगरी नागपुर में स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में एमबीबीएस अंतिम वर्ष के छात्र संकेत दाभाड़े ने होस्टल में शाल की मदद से फांसी लगा ली। संकेत एक होनहार छात्र था। उसके डॉक्टर बनने में मात्र एक वर्ष ही बाकी था। माता-पिता बहुत खुश थे। उनका सपना जो साकार होने जा रहा था। संकेत के पिता शिक्षक हैं। मां संस्कारी, परिश्रमी गृहिणी हैं। कॉलेज के पहले दस अत्यंत होशियार विद्यार्थियों में गिने जानेवाले संकेत ने खुदकुशी क्यों की, इसका भी जवाब नहीं मिल पाया। उसके रहन-सहन और बर्ताव से कभी भी ऐसा नहीं लगा कि वह किसी परेशानी में है। वह नियमित डायरी लिखा करता था। देश की राजधानी दिल्ली के पॉश इलाके बंगाली मार्केट के एक गेस्ट हाऊस में ठहरे धीरज नामक चार्टेड अकाउंटेंट (सीए) ने भी खुदकुशी की, लेकिन उसकी खुदकुशी का तरीका स्तब्ध करने वाला है। आर्थिक तौर पर अच्छे-भले धीरज ने आत्महत्या की पूरी तैयारी के साथ गेस्ट हाऊस में प्रथम मंजिल पर 28 से 30 जुलाई तक के लिए एक बीएचके बुक कराया था। चेक आउट का समय आने पर जब कर्मचारियों ने दरवाजा खटखटाया तो उन्हें कोई प्रतिक्रिया और हलचल नहीं दिखायी दी। उलटे उन्हें अंदर से आ रही असहनीय बदबू की वजह से नाक पर रूमाल रखना पड़ा। खबर पुलिस तक पहुंचायी गयी। दरवाजे को तोड़ने पर धीरज का शव बिस्तर पर पड़ा मिला। मृतक ने एक मास्क पहना हुआ था, जो पतली नीली पाइप के माध्यम से एक वाल्व और मीटर वाले सिलेंडर से जुड़ा हुआ था। उसके चेहरे पर एक पतली पारदर्शी प्लास्टिक लिपटी हुई थी और गर्दन पर सील थी। घातक तरीके से मुंह में पाइप डालकर शरीर के अंदर हीलियम गैस को प्रवेश करा कर खुदकुशी करने वाला धीरज बिना तड़पे मौत का आलिंगन करना चाहता था। पाइप से शरीर में हीलियम गैस डालकर आत्महत्या करने का यह पहला मामला है। धीरज ने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि, मैं जा रहा हूं। इसके लिए किसी को कसूरवार न ठहराया जाए। मौत मेरे लिए जीवन का ही एक खूबसूरत हिस्सा है। मेरी नज़र में खुदकुशी करना गलत नहीं है। वैसे भी यहां मेरा अपना कोई नहीं। फिर मेरा भी किसी से कोई जुड़ाव नहीं रहा। धीरज के पिता की 2003 में मृत्यु हो गई थी और मां ने उनकी मौत होते ही किसी और से शादी कर ली थी। 

भारत के महानगर विशाखापटनम में कलेक्टर के पद पर आसीन चालीस वर्षीय आनंदम ने रेल की पटरी पर सिर रख कर अपनी जान दे दी। इन युवा महत्वाकांक्षी कलेक्टर महोदय को बेहतरीन प्रशासन और मिलनसार स्वभाव का धनी माना जाता था। उनसे जो भी एक बार मिल लेता, हमेशा-हमेशा उनको याद रखता। महिलाओं में खासे लोकप्रिय रहे आनंदम की दिल दहलाने वाली खुदकुशी की वजह हैं उनकी अर्धांगिनी, जिन्हें वो जी-जान से चाहते थे। उनकी एक पांच साल की प्यारी-प्यारी बिटियां भी है। पत्नी भी रेलवे में उच्च पद पर कार्यरत है। ऐसी जोड़ियों को हमारे यहां बहुत खुश नसीब माना जाता है, लेकिन यहां एक गड़बड़ थी। वैसे ऐसी परेशानियां अधिकांश घर-परिवारों में आम हैं। कलेक्टर की पत्नी की अपनी सास से नहीं निभ रही थी। जब देखो तब घर में कलह-क्लेश मचा रहता था। कलेक्टर साहब अपनी बीवी के साथ-साथ मां को भी समझाते-समझाते थक गये थे। इस घरेलू जंग की वजह से मां और बीवी दोनों उन्हें ही कोसते रहते। तमाम बाहरी समस्याओं का चुटकी से हल निकालने वाले कलेक्टर को एक दिन लगा कि वे घर के मोर्चे की जंग पर अंकुश लगाने में सक्षम नहीं हैं। उनकी जिन्दगी नर्क बनती चली जा रही है। जीवन भी बोझ हो चला है। जब उनकी पत्नी और मां को उनकी खुदकुशी की खबर मिली तो उनका रो-रोकर बुरा हाल था। उन्हें अपनी गलती पर पछतावा भी था, लेकिन उन्हीं की वजह से निराश और हताश होकर जाने वाला अब वापस तो नहीं आने वाला था। 

नारंगी नगर के ही एक डॉक्टर को बीमारी, परेशानी और अकेलेपन ने अपने जबड़ों में ऐसा जकड़ा कि उन्होंने जहर खा लिया। मौत के मुंह में समाने के लिए उन्होंने पत्नी को भी राज़ी कर ज़हर का सेवन कराया। डॉक्टर तो चल बसे, लेकिन पत्नी अस्पताल में जिन्दगी और मौत के बीच झूल रही है। दूसरों की जान बचाने वाले डॉक्टर ने खुदकुशी करने से पहले जो सुसाइड नोट लिख कर छोड़ा, उसमें इसके लिए किसी को दोषी नहीं ठहराया। डॉक्टर गंगाधर पिछले काफी समय से पेट के अल्सर और दांतों की गंभीर बीमारी से लड़ रहे थे। लगातार इलाज के बाद भी जब स्थिति नहीं सुधरी तो खुदकुशी को ही अंतिम इलाज मान लिया। ऐसा भी कतई नहीं था कि गंगाधर की प्रैक्टिस नहीं चलती थी। जानने-पहचानने वाले सभी लोग उन्हें सफल और सुलझा हुआ डॉक्टर मानते थे। उनके क्लिनिक में पहुंचने वाले मरीजों को उनके इलाज पर भी भरोसा था। पति-पत्नी दोनों घर में अकेले रहते थे। उनकी बेटी एक निजी स्कूल में शिक्षिका हैं और बेटा उत्तराखंड में एक स्टील प्लांट में अकाउंटेंट है। 

पुलिस को घटनास्थल की जांच के दौरान तीन सुसाइड नोट के साथ-साथ दो कीटनाशक की बोतलें भी मिलीं। यह आत्महत्या करने वाले सभी चेहरे उन खास लोगों में शामिल हैं, जिनसे समाज को अनंत अपेक्षाएं रहती हैं। लोगों को खुश और संतुष्ट रखने की जिम्मेदारी इनके कंधों पर होती है। इनके ही इस तरह से मर जाने पर लोग आसानी से यकीन नहीं कर पाते। बस हतप्रभ रह सोचते रह जाते हैं कि क्या इनके पास कोई और विकल्प नहीं था? जब खुद पर आती है, तो अच्छा भला मनुष्य इतना असहाय, निर्बल और दिशाहीन क्यों हो जाता है? जिन्दगी तो विधाता का सौंपा गया एक अनमोल उपहार है, उसे सहेज और संवार कर रखने की बजाय यूं ही गंवा देना सवाल तो खड़े करता ही है। जहां लोग अपनी लंबी उम्र के लिए तरह-तरह के जतन करते हों, वहीं पर ऐसे लोगों की मौजूदगी सहानुभूति और मान-सम्मान की हकदार भी नहीं लगती। कोरोना की महामारी ने इंसानों को जीवन का मोल समझा दिया था। वैसे भी बीते कुछ वर्षों से भारतीयों में स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहने की भावना बलवती हुई है। सेहतमंद बने रहने के लिए बेहतर खान-पान, मार्निंग वॉक, योग, मेडिटेशन और जिम जाने के चलन में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई है। पहले जहां पचपन-साठ साल की उम्र में अधिकांश लोग बिस्तर पकड़ लेते थे, अब सत्तर-अस्सी की उम्र में भी कई स्त्री-पुरुष भागते-दौड़ते दिखायी देते हैं। सतत ऊर्जावान, सेहतमंद और लंबी आयु जीने के मामले में पूरे विश्व में जापानियों को प्रेरणा स्त्रोत माना जाता है। जापान में 70-80 साल की महिलाएं टैक्सी चलाती देखी जा सकती हैं। 100 साल की उम्र के बुजुर्ग खुद अपने लिए खाना बनाते हैं। बागवानी करते हैं। अच्छी तरह से देख और सुन सकते हैं। सकारात्मक सोच, पौष्टिक भोजन, नियमित मॉर्निंग और इवंनिंग वॉक तथा चिन्तामुक्त भरपूर नींद जापानियों की लंबी उम्र का जबरदस्त टॉनिक है। अभी हाल ही में जापान की 114 वर्षीय सेवानिवृत्त चिकित्सक शिगेको कागावा चल बसीं। कागावा ने द्वितीय विश्व युद्ध से पहले मेडिकल स्कूल से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। युद्ध के दौरान ओसाका के अस्पताल में अपनी सेवाएं देने के प्रश्चात प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में अपने परिवार के क्लिनिक का संचालन किया। वह 86 वर्ष की आयु में जब सेवा निवृत्त हुईं तब भी उनकी चुस्ती-फुर्ती में कोई फर्क नहीं आया था। उनसे जब उनकी बेहतरीन सेहत और लंबी उम्र का राज पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘मेरे पास कोई रहस्य नहीं है। मैं बस रोज अपने मनपसंद गेम खेलती हूं। सकारात्मक सोचती हूं। मेरी ऊर्जा ही मेरी सबसे बड़ी पूंजी है। मैं जहां चाहती हूं, वहां तुरंत चली जाती हूं। जो चाहती हूं, वही खाती हूं और जो चाहती हूं, वही करती हूं। एकदम स्वतंत्र होने का यही एहसास मेरा हमेशा मनोबल बढ़ाता है।’

Thursday, August 7, 2025

नई पहल की साहसी दस्तक

 सदियों से इंसानों के जीने के तरीकों का जो रंग-ढंग और सांचा बना हुआ है, उसी में ही अधिकांश लोग ढल और रच बसकर जीना पसंद करते हैं। उनके जीवन में सब कुछ पहले से ही निर्धारित होता है। कब खुशी मनानी है और कब गम इसके लिए किसी को बताना नहीं पड़ता। मिलने पर खुशी और बिछुड़ने पर दुखी होना अदना-सा बच्चा भी जानता है। जन्म पर जश्न और मौत पर गमगीन होने की जगजाहिर परिपाटी से यकीनन सभी वाकिफ हैं, लेकिन कुछ लोग इस परंपरा के विपरीत चलते हुए एक नई राह और नई सोच के प्रबल पक्षधर के रूप में सामने आ रहे हैं। उनसे प्रभावित होकर उनका अनुसरण करने वाले बड़ी तेजी से तो नहीं, लेकिन धीरे-धीरे सामने आकर परंपरावादियों को चौंका रहे हैं। यह भी सच है कि हजारों वर्षों से चली आ रही परंपराओं में एकाएक बदलाव लाना बिलकुल आसान नहीं। खासतौर पर वो आदतें और परंपराएं जो करीबी रिश्तों की सुकोमल, नितांत आत्मिक भावनाओं की नींव पर बड़ी मजबूती से टिकी हों और जिन्हें हिलाने की कोशिश करने वालों को एकजुट होकर लताड़ और दुत्कार लगाने में देरी नहीं की जाती हो। क्रांतिकारी चिंतक, वक्ता ओशो ने वर्षों पूर्व जब अपने सभी शिष्यों को मौत पर गम नहीं, जश्न मनाने का संदेश दिया था तब उन्हें पागल करार देते हुए अनेकों परंपरावादियों ने पूछा था कि किसी प्रियजन की मौत तो हमेशा दुखदायी ही होती है। कोई अपने माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी, चाचा-मामा और जान से प्यारे मित्र के गुजर जाने पर खुश कैसे हो सकता हैं? यह तो निष्ठुरता की इंतिहा है। पवित्र रिश्तों का सरासर अपमान है। ओशो तो ओशो थे। जो कह दिया बस पत्थर की लकीर। प्रत्युत्तर में ओशो बोले थे मृत्यु से डरने की बजाय, इसे जीवन की निरंतरता के रूप में स्वीकार करना चाहिए। मृत्यु शरीर का अंत है, आत्मा का नहीं। आत्मा अमर है और मृत्यु के बाद भी उसका अस्तित्व बना रहता है। इसलिए मृत्यु को जीवन के एक नए चरण की शुरुआत के रूप में देखना चाहिए, न कि उसे अंत मानना चाहिए। मृत्यु का उत्सव मनाना जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण दर्शाता है। साथ ही यह भी दर्शाता है कि हम जीवन के हर पहलू को सहजता से स्वीकार करते हैं, चाहे वह सुखद हो या दुखद। ओशो अपने शिष्यों को अंत तक कहते रहे कि मृत्यु को रहस्य के रूप में नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक प्रक्रिया के तौर पर देखें। मृत्यु को उत्सव मनाने का मतलब जीवन के हर पल को समग्रता से जीने और किसी भी चीज से मोह न रखना भी है। जब हम मृत्यु से नहीं डरते तो हम जीवन के हर पल को और अधिक तीव्रता से जी पाते हैं। ओशो के शिष्यों ने 1990 में ओशो रजनीश की हार्ट अटैक की वजह से मृत्यु होने के पश्चात उनकी सीख का पालन करते हुए उनकी मृत्यु को एक जश्न... उत्सव के रूप में मनाया। उनके शव को सभागृह में रखकर धड़ाधड़ तस्वीरें उतारीं तथा रंग-बिरंगे कपड़ों में नृत्य और संगीत का आनंद लेते उनका अंतिम संस्कार किया था। 

फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने भी ओशो का अनुसरण करते हुए अपने पिता की मृत्यु होने पर प्रचलित तरीकों से गमगीम होकर आंसू बहाने की बजाय उन्हें खुशी-खुशी अंतिम विदाई दी। अभिनेता अपने खुशमिजाज पिता को बहुत चाहते थे। उनसे अत्यंत प्रभावित भी थे। अनुपम ने पिता को हमेशा बेफिक्री के साथ हंसते-मुस्कुराते देखा था। वे दूसरों को भी सदा खुश रहने की सीख देते थे। अनुपम के प्रिय पिता जब चल बसे, तभी उन्होंने निश्चय किया कि पिता जैसे आनंद के साथ जीते रहे वैसे ही उनकी मृत्यु को खुशी-खुशी उत्सव के रूप में मना कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। उन्होंने अंतिम संस्कार में पिता की मौत को रंगीन बनाने के लिए अपने दोस्तों को काले या सफेद लिबास में आने की बजाय रंगारंग कपड़ों में आने को कहा। जश्न में किसी भी तरह की कमी न रहे इसके लिए अनुपम ने विशेष तौर पर रॉक बैंड को आमंत्रित कर रंगीन माहौल बनाते हुए पिता के जीवन के तमाम खुशनुमा, सकारात्मक पहलुओं को साझा किया। भारत में इन दिनों इस तरह के बदलाव की बयार चल रही है। पहले लोग सकुचाते थे-लोग क्या सोचेंगे, क्या कहेंगे? लेकिन अब जो उन्हें सुहाता है उसे कर गुजरने में नहीं हिचकिचाते। हरियाणा के शहर रेवाड़ी में पत्नी की मौत की खबर सुनते ही पति ने कुर्सी पर बैठे-बैठे प्राण त्याग दिए। पति 93 साल के तो पत्नी 90 साल की थी। उम्रदराज माता-पिता के अपार अपनत्व को देखते हुए बच्चों ने उनकी अर्थी को रंग-बिरंगे गुब्बारों से सजाकर धूमधाम से निकाला। दोनों का एक ही चिता में अंतिम संस्कार किया गया। धार्मिक नगरी उज्जैन में कुछ महीने पूर्व मनोरमा नामक 65 वर्षीय महिला का निधन हो गया। इत्तेफाक से उसी दिन उनका जन्म दिन भी था। परिजनों ने उनके जन्म दिन को धूमधाम से मनाने की तैयारी कर रखी थी। उस दिन 14 फरवरी होने के कारण पूरी दुनिया वैलेंटाइन-डे मना रही थी। इस उत्सवी दिन को प्यार का दिन भी कहा जाता है। मनोरमा धार्मिक होने के साथ-साथ समाज सेवा से भी जुड़ी थीं। उन्होंने अपने घरवालों की सहमति से वर्षों पूर्व देहदान का संकल्प लिया था। वह चाहती थी कि मृत्यु होने पर उनका शरीर जरूरतमंदों के काम आए। मनोरमा के अंतिम दर्शन कर श्रद्धा सुमन अर्पित करने पहुंचे अनेकों लोग तब हैरत में पड़ गए जब उन्होंने परिवार वालों को ‘हैप्पी बर्ड डे’ का गीत बड़ी प्रसन्न मुद्रा में गाते देखा। मृत्यु के दुखद अवसर पर तो उन्होंने कभी किसी को ऐसी प्रसन्न हालत में नहीं देखा था। परिजनों की देखादेखी सभी लोगों ने मृतका को शुभकामनाएं देकर श्रद्धा सुमन अर्पित किए। देहदान की प्रक्रिया को पूर्ण करने के बाद जब उनके शरीर को फूलों से सजी एम्बूलेंस में विदा किया गया तो वहां पर मौजूद सभी लोग श्रद्धा से नतमस्तक हो गए। उनके लिए अपने आंसू रोकना काफी मुश्किल था, लेकिन फिर भी उन्होंने खुद को संभाले रखा। 

मध्यप्रदेश के जावरिया गांव में चार कंधों पर जब एक अर्थी निकल रही थी, तभी एकाएक बैंड बाजे की आवाज गूंजने लगी।  एक शख्स अर्थी के आगे आकर झूम-झूम कर नाचने लगा। शवयात्रा में शामिल मृतक के रिश्तेदारों ने उसे यह कहकर मना किया कि यह कोई खुशी का मौका नहीं, जो तुम बैंड बाजे के साथ नाच रहे हो। मातम की घड़ी में कभी कोई ऐसे जश्न मनाता है? लेकिन वह अपनी धुन में जोर-जोर से थिरकता रहा। उसने किसी की एक भी नहीं सुनी। दरअसल, वह मृतक सोहनलाल जैन का खास मित्र था, जो उनकी इच्छा का पालन कर दोस्ती का फर्ज निभा रहा था। वह और सोहनलाल पिछले दस वर्षों से हर सुबह 5 बजे एक साथ प्रभात फेरी पर निकलते थे। इसी दौरान सोहनलाल ने अपने इस मित्र को कहा था कि मैं जब नहीं रहूं तो मेरी अंतिम यात्रा में शामिल होकर मेरी अर्थी के आगे बैंड बाजे के साथ नाचते हुए मुझे विदा करना। एक सच्चे दोस्त ने अपने प्रिय साथी की अंतिम इच्छा को पूर्ण करने वो हिम्मत दिखायी, जो जगहंसाई के डर से लोग दिखा ही नहीं पाते हैं। उसकी इस साहसी पहल ने अंतत: गांव वालों को प्रशंसा भाव के साथ-साथ आंखें नम करने को विवश कर दिया।

Thursday, July 31, 2025

असमंजस में इंसाफ

 11 जुलाई 2006 को मुंबई में हुए सिलसिलेवार ट्रेन विस्फोटों में मुंबई के सावंत परिवार ने अपने 24 वर्ष के जवान बेटे को खो दिया। उनका महत्वकांक्षी पुत्र अमरेश सावंत एक कंपनी में नौकरी करता था। अमरेश हर रोज लोअर परेल से आकर शाम पांच बजकर पचपन मिनट की लोकल ट्रेन पकड़कर अंधेरी आता था। 11 जुलाई 2006 की शाम को अमरेश ने पांच मिनट पहले की लोकल ट्रेन पकड़ी थी। यह सफर उसकी जिन्दगी का आखिरी सफर बनकर रह गया। ट्रेन में वह जिस फर्स्ट क्लास कंपार्टमेंट में बड़े इत्मीनान से बैठा था, उसी में आतंकियों ने बम रखा था, ये बम दादर से दस मिनट की दूरी पर खार रेलवे स्टेशन से थोड़ी दूर पटरी पर जब ट्रेन चल रही थी, तब ब्लास्ट हुआ था। इस जोरदार धमाके से एक पल में कई जिंदगियां मौत का निवाला बन अपने घर-परिवार से सदा-सदा के लिए दूर बहुत दूर चली गईं थी। इस कातिल हादसे ने अमरेश के परिवार को जो जख्म दिए वो अभी तक भर ही नहीं पाये। 44 वर्षीय हरीश पवार को वो खून ही खून से सना दिन जब भी याद आता है तो कंपकपी छूटने लगती है। 11 जुलाई 2006 के उस दिन हरीश जब विरार जाने के लिए लोकल ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में सवार थे तभी धमाका हुआ और खून से लथपथ होकर वहीं गिर पड़े थे। लेकिन उनका मस्तिष्क तेजी से दौड़ रहा था। डरी-डरी हतप्रभ आंखें भी खुली थीं। डिब्बे के अंदर शव पड़े थे। फर्श और दीवारों पर खून छिटका था। दर्द से तड़पते लोगों की चीखें सीना चीर रही थीं। भयंकर बारूदी विस्फोट से किसी के शरीर से अलग होकर डिब्बे में उड़कर आया सिर उनकी धड़कनों को बेकाबू किए जा रहा था। उन धमाकों में चिराग चौहान मरते-मरते बच तो गए लेकिन हमेशा-हमेशा के लिए अपनी टांगों से चलने में लाचार हो गये और उन्हें व्हीलचेयर को अपना उम्र भर का साथी बनाना पड़ा। चिराग चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं। इस बम कांड ने उनके कई सपनों की हत्या कर अरमानों को रौंद कर रख दिया। महेंद्र पिताले को ब्लास्ट में अपना एक हाथ गंवाना पड़ा। दहिसर निवासी एक शख्स जो अब 74 वर्ष के हो चुके हैं, ब्लास्ट के धमाके ने उनके कान के पर्दे पूरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिए। अब भी वे सुनने से लाचार हैं। 

पराग सावंत उस दिन बहुत खुश था। प्रमोशन की खुशी में मन ही मन दोस्तों के साथ जश्न मनाने की सोच रहा था। ट्रेन की खिड़कियों से आते हवा के मस्त-मस्त झोंके उसके सपनों में नये-नये रंग भर रहे थे। उसने मां और पत्नी को कहीं बाहर चलने के लिए तैयार रहने को कह दिया था। आज बहुत दिन बाद परिवार के साथ किसी अच्छे होटल में एक साथ बैठकर मनपसंद खाना खाने के आनंद की कल्पना में डूबा पराग सोच रहा था कि उसे तो घर जाने की जल्दी है लेकिन यह ट्रेन बहुत धीमी क्यों चल रही है? दरअसल, ट्रेन तो हमेशा की तरह अपनी निर्धारित गति से चल रही थी लेकिन पराग पर उमंगों-तरंगों से भरी शीघ्रता सवार थी। लेकिन तभी ट्रेन में जोरदार धमाका हुआ। खून से लथपथ मृतकों और घायलों के बीच दर्द से कराहते पराग की सांसों की डोर अभी टूटी नहीं थी। मां, पत्नी राह देखती रहीं लेकिन पराग घर नहीं पहुंचा। उसे पता ही नहीं चला कि कब उसे हिंदूजा अस्पताल पहुंचा दिया गया। कोमा की गिरफ्त में जा चुका 35 वर्ष का युवा पराग अब जिन्दा होकर भी जिन्दा नहीं था। उसकी मां, पत्नी और मासूम बिटिया उसके होश में आने के इंतजार में दिन-रात उसके बिस्तर के इर्द-गिर्द बैठे रहते। उसने दो साल बाद हल्की सी आंख खोली और मां को पुकारते हुए बड़े धीमे से मुस्कुराया। मां को लगा बेटा होश में आ गया है। गमगीन पत्नी के चेहरे पर भी रौनक आयी। लेकिन उसके बाद पराग ने एक शब्द भी नहीं कहा। हर बार की तरह मां ने बहू को दिलासा दिया कि चिंता मत करो। मेरे ईश्वर मेरे दुलारे को शीघ्र ठीक कर देंगे। उन्होंने मुझसे वादा किया है कि तुम्हारा बेटा फिर से हंसने-खेलने और चलने-फिरने लगेगा। पराग का मस्तिष्क अनेकों चोटों का शिकार हुआ था। डॉक्टर सर्जरी पर सर्जरी करते रहे। पूरे नौ साल तक पराग बिस्तर पर पड़ा-पड़ा सांस लेता रहा। मां हर सुबह बेटे से मिलने आती रहीं। पत्नी भी एक दिन नहीं चूकी। नन्हीं बिटिया पापा की गोद में जाने के लिए तरसती रही। जब भी उसकी मम्मी अस्पताल जाने लगती तो पापा की जान से प्यारी बिटिया साथ चलने की जिद पकड़ लेती। पराग ने कभी-कभार बीच-बीच में पानी, हां, नहीं जैसे शब्द बोलकर आस बंधाये रखी। लेकिन मौत अब और मोहलत देने को तैयार नहीं थी। उसने भी तो पूरे नौ साल तक इंतजार कर उसके भले-चंगे होने की राह देखी थी। 

मुंबई के उपनगर वसई में रहने वाले यशवंत भालेराव ने इस विस्फोट में अपने 23 वर्षीय बेटे को खो दिया। मुंबई के ही रमेश विट्ठल की 27 साल की बेटी ब्लास्ट में मारी गई। मात्र 11 मिनट में मुंबई की लोकल ट्रेनों में सात ब्लास्ट कर 189 बेकसूरों की जान लेने और आठ सौ से ज्यादा लोगों को घायल करने वाले इन बम धमाकों में प्रेशर कूकर का इस्तेमाल किया गया था। जिन-जिन कोच में ब्लास्ट हुआ, उनके परखच्चे उड़ गये थे, तो ऐसे में जिन्दा इंसानों के जिस्म के क्या हाल हुए होंगे इसकी कल्पना कर आज भी दिल घबराने लगता है। मायानगरी मुंबई की लाइफलाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेनों में 11 जुलाई 2006 के दिन भी हमेशा की तरह काफी भीड़भाड़ थी। इनमें ज्यादातर ऑफिस से घर जाने वाले यात्री थे जिनका कोई न कोई अपना बेसब्री से इंतजार कर रहा था। यात्रियों के चेहरों पर भी दिन भर की थकावट के बावजूद घर लौटने की सुकून भरी चाह थी। लेकिन बम धमाकों ने क्या से क्या कर दिया। सभी को वर्षों से इंसाफ का इंतजार था। परंतु 19 साल बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने सीरियल बम धमाकों के सभी आरोपियों की सजा यह कहते हुए रद्द कर दी कि अभियोजन पक्ष उन सबके अपराध को उचित संदेह से परे साबित करने में बुरी तरह से नाकाम रहा है। गौरतलब है कि पहले भी कई ऐसे आतंकी मामलों में इसी तरह से आरोपियों को बरी कर पीड़ितों को अथाह ठेस पहुंचायी जाती रही है। 2002 में अक्षरधाम मंदिर पर हमले के मामले में, जिसमें 33 लोग मारे गये थे। छह लोगों को सज़ा सुनाई गई थी। उनमें से तीन को सजाए-मौत सुनाई गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में इन सबको इस आधार पर बरी कर दिया था कि अभियोजन पक्ष ने कमजोर और बनावटी सबूतों का सहारा लिया था। 2005 में दिवाली से पहले दिल्ली में सीरियल बम धमाकों में 67 लोग मारे गए थे। इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था और उन पर एक दशक से ज्यादा समय तक मुकदमा चला। लेकिन आखिरकार उनमें से दो को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया और तीसरे को दिल्ली की एक अदालत ने 2017 में सजा सुनाई थी, परंतु पुलिस जांच में कई गंभीर खामियां बताई थी। महाराष्ट्र के संवेदनशील शहर मालेगांव में 2006 में हुए विस्फोट मामले में भी पुख्ता सबूत नहीं मिलने से साध्वी प्रज्ञासिंह सहित सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया है। 17 साल बाद आये इस फैसले से भी कहीं खुशी तो कहीं गम है। सवाल अभी जिन्दा है कि, मृतकों का हत्यारा कौन? इस सवाल का जवाब शायद ही मिले। बिल्कुल वैसे ही जैसे मुंबई बम धमाकों के फैसले से कई प्रश्न अनुत्तरित हैं। ये फैसले हमारी दंड विधान व्यवस्था की खामियों को कहीं न कहीं उजागर करते हैं। मुंबई धमाकों के फैसले को सुनते ही सभी पीड़ितों के मुंह से यही शब्द निकले, यह फैसला तो घावों पर नमक छिड़कने वाला है। हजारों परिवारों को हुई अपूरणीय क्षति और जिन्दगी भर के लिए मिले जानलेवा जख्मों के लिए किसी को सज़ा न मिलना न्याय के ही कत्ल होने जाने जैसा है...।

Thursday, July 24, 2025

परवरिश

चित्र : 1 इंसान तो इंसान है। देशी हो या विदेशी। उसे जहां प्यार मिलता है वहीं का हो जाता है। जैसी परवरिश मिलती है उसी में ढल जाता है। बच्चों पर यह हकीकत काफी ज्यादा लागू होती है जैसा देखते हैं वैसा ही करते हैं। जिस तरह से मां-बाप अपने बच्चों के लिए सब कुछ न्योछावर करने को तत्पर रहते हैं। वैसे ही संस्कारित, संवेदनशील संतानें भी अपने जन्मदाताओं के प्रति समर्पित होने में आगा-पीछा नहीं देखतीं। लापरवाह माता-पिता का अंधापन कभी-कभी उनके बच्चों के वर्तमान और भविष्य का किस तरह से सत्यानाश कर देता है उसका सटीक प्रमाण है ये खबर : शराब पीकर नशे में टुन्न रहने वाली उस औरत ने बेटे को जन्म तो दिया, लेकिन उसकी परवरिश से कन्नी काट ली। उस लापरवाह मां ने मेहनत-मजदूरी से धन कमाकर बच्चे की देखरेख करने की बजाय उसे लावारिस हालत में उसी गंदी बदबूदार झोपड़पट्टी में छोड़ दिया, जहां पर कीचड़ में मुंह मारते सुअरों और कुत्तों का जमावड़ा लगा रहता था। शहर के गली कूचों में दिन-भर भटक-भटक कर वह निर्दयी, स्वार्थी मां भीख मांगती और अंधेरा घिरते ही शराब गटककर बेसुध हो फुटपाथ पर ही सो जाती। मां की देखरेख और ममता से वंचित मासूम बच्चे ने कुत्तों के बीच रहते-रहते जानवरों को ही अपना सबकुछ मान लिया। कुत्ते जो खाते, वही वह खाता और रात को उन्हीं के साथ सो जाता। संगत का असर पड़ना ही था। वह भी कुत्तों की तरह लड़ने-झगड़ने और भौंकने लगा। आसपास के मोहल्लों में रहने वाले लोगों ने अपने बच्चों को उसके निकट जाने पर यह सोचकर पाबंदी लगा दी कि वे भी कहीं भौंकने न लगें और पागल कुत्तों की तरह काटने पर उतारू न हो जाएं। बच्चे के कुत्ते की तरह व्यवहार करने की खबर जब प्रशासन तक पहुंची तो पुलिस और अधिकारियों का दल नशेड़ी महिला की झोपड़ी में पहुंचा। झोपड़ी में बच्चा कुत्तों के झुंड के साथ खेल रहा था। वह उन्हें देखकर जोर-जोर से भौंकने लगा। अधिकारी असली कुत्तों के भौंकने और बच्चे के भौंकने में फर्क तलाशते रहे, लेकिन काफी माथापच्ची के बाद भी तय नहीं कर पाये कि दोनों में क्या फर्क है। बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी एक महिला कार्यकर्ता को देखकर जब बच्चा भौंकते हुए उसे काटने को दौड़ा तो उसका शरीर कांपने लगा। वह वहां से ऐसे भागी जैसे बच्चा उसकी जान ही ले लेगा। कुछ दूर जाने के पश्चात उसने खुद को भयमुक्त कर पानी पिया और यह निर्णय भी लिया कि वह इस बच्चे को नई जिन्दगी देगी। मां के साथ-साथ समाज ने इसके साथ जो अन्याय किया है उसका दंड वह किसी और को नहीं खुद को ही देगी।

चित्र 2 : दो हजार पच्चीस की 9 जुलाई की दोपहर कर्नाटक के दक्षिणी तट पर स्थित रामतीर्थ पहाड़ियों में पुलिस जब नियमित गश्त पर निकली थी तब उसने जंगल की एक गुफा में हलचल और इंसानी आवाज़े सुनीं। गुफा के बाहर कपड़े भी लटके नज़र आए। सतर्क पुलिस वालों का माथा ठनका तो उन्होंने गुफा के भीतर झांका। वहां का नजारा देखकर तो वे स्तब्ध के स्तब्ध रह गये। पैरों तले की जमीन गायब होती सी लगी। गुफा के भीतर एक विदेशी महिला अपने दो मासूम बच्चों के साथ बड़े आराम से हंसती-खेलती बैठी थी। महिला को तुरंत बाहर आने को कहा गया। महिला बिना किसी ना नुकुर के झुकते-झुकते-झुकाते बड़ी सावधानी से बच्चों के साथ गुफा से बाहर निकल आई। पुलिस को पता चला कि नीना कुटिना नाम की यह चालीस वर्षीय रूसी महिला बिना पासपोर्ट और विजा के पिछले आठ वर्षों से भारत में अवैध रूप में बड़ी बेफिक्री के साथ रह रही थी। नीना और उसकी बेटियों को बेंगलुरु में आश्रयगृह में लाया गया तो वह खुद को बहुत असहज महसूस करने लगी। जंगल से निकलने के बाद उसने तुरंत अपना फोन रिचार्ज कर सबसे पहले अपने करीबी रिश्तेदार को रशियन भाषा में एक मेल किया। उसमें उसने लिखा कि हमारी गुफा वाली शांतिपूर्ण जिन्दगी खत्म हो गई है। हमारा गुफा वाला आनंददायक ठिकाना उजड़ गया है। सालों से खुले आसमान के नीचे हम प्रकृति के साथ जीते आ रहे थे, लेकिन अब पता नहीं क्या होगा? जंगल से बाहर निकलने के लिए भी नीना बहुत मुश्किल से मानी। पुलिस ने उसे जंगल के खूखांर जानवरों, जीव, जंतुओं और ज़हरीले सांपों का भय भी दिखाया। नीना ने बड़ी बेबाकी से यह कहकर उनका मुंह बंद कर दिया, उसे कभी भी जंगल के जानवरों से डर नहीं लगा। उसे न कभी सांप ने काटा और न ही किसी जानवर ने उस पर या बच्चों पर हमला किया। उसे तो बस इंसानों से डर लगता है। इसलिए वह शहर छोड़ जंगल में रहने चली आई। जितने भी दिन यहां कटे, बहुत मज़े से कटे। जब मन करता सोती और जागती। झरने के नीचे नहाने का आनंद लेती। यहीं की लकड़ियों से खाना बनाती। बच्चों को खिलाती और खुद भी मज़े से खाती थी। 

उसका जंगल में मंगल चल ही रहा था कि पुलिस की उस पर नज़र पड़ गई। वर्ना कौन जाने कब तक वह गुफावासी बनी रहती। शहर के भीड़-भाड़ वाले वातावरण में स्थित आश्रयस्थल तो उसे जेल से भी बदतर लग रहा था। यहां से उसे न जंगल जैसा खुला-खुला आसमान दिख रहा था और न ही दूर-दूर तक मन को लुभाती हरियाली और ताजी-ताजी हवा के सुकून का अता-पता था। उसे गुफा की उबड़-खाबड़ जमीन पर जो नींद आती थी वो भी यहां नदारद थी। पुलिस जब उसे और उसकी छह और चार साल की बेटियों को चेकअप के लिए हॉस्पिटल लेकर गई तो तीनों को पूरी तरह से ठीक-ठाक पाया गया। नीना ने यह भी बताया कि उन्हें जंगल में कभी भी बीमारी ने नहीं घेरा। यहां तक कि उन्हें कभी सर्दी और जुकाम भी नहीं हुआ। जहांं वह रह रही थीं वहां से गांव ज्यादा दूर नहीं था। गुफा की खिड़की से समुद्र का नजारा भी साफ-साफ दिखता था। लोग भी वहां से यदाकदा गुजरते दिखायी देते थे। 

गुफा में ही बगैर किसी डॉक्टर या नर्स की मदद से एक बेटी को जन्म देने वाली नीना का पति इजरायली कारोबारी है। कई देशों का भ्रमण कर चुकी यह रूसी महिला 2017 में पर्यटक वीजा पर भारत में आने के बाद सबसे पहले गोवा में रही। उसने यह खुलासा कर भी पुलिस को चौंका दिया कि मैं रूस से 15 साल से बाहर हूं। मैंने अपना ज्यादातर समय कोस्टा रिका, मलेशिया,  बाली नेपाल और यूक्रेन में गुजारा है। मेरी बड़ी बेटी का जन्म भी यूक्रेन में हुआ। गोवा में रूसी भाषा की ट्यूटर के तौर पर काम कर चुकी नीना कभी भी स्थायी रूप से गोकर्ण की गुफा में नहीं रही। उसका जब-जब मन करता वह यहां रहने चली आती। भारत में इतने ज्यादा समय तक रहने की उसने वजह बतायी कि यहां की प्रकृति अत्यंत सुहावनी है। तन और मन सेहतमंद और शांत रहता है। लोग भी अपने काम से काम रखते हैं। अब तो वह और उसके बच्चे यहां रहने के अभ्यस्त हो गये हैं। कहीं दूसरी जगह हमारा मन भी नहीं लगेगा। जंगल में रहने के दौरान वॉटरफॉल में नहाने, मिट्टी के बर्तन बनाने और पेंटिंग करने तथा मिट्टी के चूल्हे पर रोटियां बनाने का मनचाहा सुख और कहीं मिल भी नहीं सकता। नीना जिस गुफा में रहती मिली उसके अंदर खाने-पीने का अच्छा-खासा सामान मिला। उसने यह भी बताया कि वह आर्ट और म्यूजिक वीडियो बनाकर पैसा कमाती थी। उसके पिता और भाई भी पर्याप्त पैसे भेज देते थे। पति भी जब मिलने के लिए आते थे तो थोड़ी बहुत सहायता कर देते थे। हालांकि उनसे ज्यादा नहीं बनती है।

चित्र 3 : बाप और बेटे का रिश्ता भी बड़ा खट्टा-मीठा होता है। बेटे पिता को भले ही देरी से समझें, उससे दूरियां बनाये रखें लेकिन पिता की उन्हीं में जान अटकी रहती है। उनके अच्छे भविष्य के लिए अपनी जीवनभर की कमायी को दांव पर लगाने से नहीं हिचकते। कुछ पिता तो अपनी औलाद के भले के लिए अपराध करने से भी नहीं चूकते। राजस्थान में बीते दिनों एक ट्रेनी थानेदार और उसके पिता को गिरफ्तार किया गया। आदित्य को सब इंस्पेक्टर बनने का मौका उसकी मेहनत और काबिलियत से नहीं, पेपर माफिया की बदौलत मिला था। इसमें उसके पिता बुद्धि सागर की प्रमुख भूमिका सामने आयी। किसी भी हालत में अपने बेटे को खाकी वर्दी में देखने का सपना संजोये बुद्धि सागर ने जब देखा कि बेटा अपनी योग्यता के दम पर झंडा नहीं गाड़ सकता तो उसने नकल माफिया से संपर्क पर 10 लाख रुपये में परीक्षा का पेपर खरीदा। आदित्य ने नकल के दम पर एसआई परीक्षा में न केवल सफलता हासिल की बल्कि प्रदेश भर में 19वीं रेंक हासिल कर सभी को चौंका दिया। लेकिन गलत राह अपनाने की जानबूझकर की गई गलती ने बाप-बेटे दोनों को जेल भी पहुंचा दिया।