Thursday, July 28, 2011

धोखेबाजों की गिरफ्त में छटपटाता देश

राष्ट्रमंडल खेलों में अरबों-खरबों के वारे-न्यारे करने के आरोपी सुरेश कलमाडी के बारे में एक अजब-गजब जानकारी आयी है कि उन्हें भूल जाने की बीमारी है। वैसे अभी तक नेताओं को लपेटे में लेने वाली कई तरह की बीमारियों के बारे में सुना और जाना जाता था पर स्मृतिलोप नामक यह नयी बीमारी अचंभित कर देने वाली है। यह बीमारी इंसान को भुलक्कड बना देती है। कलमाडी के परिजनों का कहना है कि यह उनकी पुरानी बीमारी है।अभी तक तो हम यही सुनते आये थे कि नेताओं की स्मरण शक्ति लाजवाब होती है पर यहां तो उल्टा हो गया! खिलाडि‍यों के खिलाडी के घरवालों का यह भी कहना है कि कलमाडी कई बार तो कल का खाया-पिया भी याद नहीं रख पाते। इस अजूबी खबर को जिसने भी सुना वह हैरान होने के बजाय भ्रष्ट नेताओं की कौम को कोसता नजर आया। खुद को बचाने के लिए ये लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं। अपने यहां वैसे भी ऐसे-ऐसे महंगे वकीलों की अच्छी-खासी तादाद है जो अपने मुवक्किल को पाक-साफ दर्शाने के लिए तरह-तरह की तरकीबें खोजते रहते हैं। तय है कि जेठमालानी टाइप के किसी वकील ने अपना दिमाग लडाया है और भ्रष्टाचारी की याददाश्त खो जाने की खूबसूरत कहानी गढ कर पेश कर दी है। पर अब देशवासी ऐसी कहानियों पर कतई यकीन नहीं करते। कानून की आंख में धूल झोंकने के लिए गढी गयी इस कहानी ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि इस मुल्क के नेता आम जनता को बेवकूफ बनाने के लिए नये-नये बहाने और तरीके तलाशने में कोई कसर नहीं छोडते। यह लोग अक्सर कामयाब भी हो जाते हैं। दरअसल इनका कोई ईमानधर्म ही नहीं है। अब टू जी स्पैक्ट्रम घोटाले में जेल की हवा खा रहे पूर्व दूरसंचार मंत्री की याददाश्त वापिस लौट आयी है। वे चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि मैंने जो कुछ भी किया उसकी पूरी जानकारी प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिं‍ह और गृहमंत्री पी. चिदंबरम को थी। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी ने प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग कर डाली है। यह बात दीगर है कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा से इस्तीफा लेने में उनका पसीना छूट गया। कांग्रेस के एक नेता मणिशंकर अय्यर की निगाह में कांग्रेस पार्टी एक सर्कस है। परंतु सजग देशवासियों को हर राजनीतिक पार्टी के रंग-ढंग सर्कस जैसे नजर आते हैं। इस सर्कस में जोकर भी हैं और लुटेरे भी जिन्होंने देश का तमाशा बनाकर रख दिया है। इनके बेशर्म तमाशों से उकता कर अदालत को हंटर उठाने को विवश होना पड रहा है। क्या यह सरकार के लिए शर्म की बात नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट को उसे बार-बार फटकार लगानी पडती है और उसके बाद ही वह जागती है। २२ अगस्त २००८ के दिन कैश फॉर वोट कांड का मामला सामने आया था। इस संगीन मामले को दबाने के भरसक प्रयास किये गये। सरकार ने तो आंखें ही मूंद ली थीं। पर कोर्ट की लताड के बाद हलचल शुरू हो पायी। सत्ता के दलाल अमर सिं‍ह कटघरे में हैं। अमर सिं‍ह ही खरीद फरोख्त और लेन-देन की असली कडी थे। पाठक मित्रों को याद होगा कि अमेरिका से एटमी करार के मुद्दे पर वाम मोर्चा के साठ सांसदों ने मनमोहन सरकार से जब समर्थन वापस ले लिया था तब सरकार की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी थी। यदि उस संकट के समय समाजवादी पार्टी और कुछ अन्य छोटे दल समर्थन नहीं देते तो सरकार धराशायी हो जाती। तब भाजपा के तीन सांसदो ने लोकसभा में विश्वास मत से ठीक पहले एक करोड रुपयों की नोटों की गड्डियां लहराते हुए धमाका किया था कि उन्हें गैरहाजिर रहने के लिए यह नोट दिये गये हैं। यह एक तरह से लोकतंत्र की हत्या का मामला था। हत्यारों में अमर सिं‍ह के साथ-साथ सोनिया गांधी के खासमखास अहमद पटेल ने भी सुर्खियां बटोरी थीं। पर धीरे-धीरे शोर थम गया और राजनीति के दलाल दूसरे कामों में लग गये। इस तरह के और भी कई मामले हैं जिन्हें नेताओं ने मीडिया को खुश करते हुए आसानी से दबाकर रख दिया है। कैश फार वोट के मामले में यदि मीडिया का एक वर्ग अपना जमीर नहीं बेचता तो इसका तभी पर्दाफाश हो जाता। पर जहां चोर-चोर मौसेरे भाइयों का वर्चस्व हो वहां सच्चाई के सामने आने की उम्मीद रखना खुद को धोखा देने से ज्यादा और कुछ नहीं है। ऐसे में अगर यह कहा जाए कि हमारा मुल्क धोखेबाजों की गिरफ्त में छटपटा रहा है तो गलत नहीं होगा।

Thursday, July 21, 2011

जरूरी है जयचंदो की शिनाख्त

खबर है कि भारत सरकार ने हाल ही में दो अत्याधुनिक विमान खरीदें हैं। हर तरह के सुरक्षा उपकरणों से सुसज्जित इन विमानों की कीमत सैकडों करोड रुपये है। इन्हें खासतौर पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के लिए मंगवाया गया है ताकि उडान के दौरान उन पर कोई आंच न आए। इस देश में १० करोड ऐसे बदनसीब हैं जिन्हें भरपेट खाना नहीं मिल पाता। खुले आकाश के नीचे अपनी रातें गुजारने वालों की संख्या भी बेहिसाब है। आम लोगों की सुरक्षा का कहीं अता-पता नहीं है। शासकों के पास इनकी चिं‍ता करने का समय ही नहीं है। वे अपनी ही लडाई में उलझे हैं। इस मनमोहन सरकार का क्या हश्र होगा कुछ भी समझ में नही आ रहा है। यह तय है कि इससे कोई भी खुश नहीं है। चारों तरफ असंतोष के बादल मंडरा रहे हैं। सरकार के प्रति लोगों का विश्वास इस कदर घट चुका है कि अब वे मानने लगे हैं कि यह सरकार उनके किसी काम की नहीं। पर कोई विकल्प भी नहीं है। आखिर करें तो क्या करें! मुंबई में हुए सीरियल बम धमाकों ने तो जैसे लोगों को जागने के लिए विवश कर दिया है। जागे हुए लोग स्पष्ट देख रहे हैं कि आतंकवादियों से निपटने के लिए यह सरकार खुद को तैयार नहीं कर पा रही है। इच्छाशक्ति का तो जैसे दिवाला ही पिट गया है। देश में जितनी बार भी बम धमाके हुए हैं सभी में कहीं न कहीं इनके पीछे पाकिस्तान खडा दिखायी दिया है पर मनमोहन सरकार हाथ पर हाथ धरे रहने के सिवाय और कुछ भी नहीं करना चाहती। कांग्रेसी जिस राहुल गांधी को येन-केन प्रकारेन देश का प्रधानमंत्री बनाने पर तुले हैं वे कहते हैं कि देश में होने वाली सभी आतंकवादी घटनाओं को रोकना संभव नहीं है। कांग्रेसियों के इस भावी प्रधानमंत्री ने यह कहकर देशवासियों को अचंभे में डाल दिया है। राहुल गांधी से तो लोग कुछ और ही उम्मीद लगाये हुए थे। उनका बयान यह कहता प्रतीत होता है कि सरकार के पास और भी कई काम हैं। यही एक समस्या नहीं है जिसपर वह हर वक्त माथापच्ची करती रहे। देशवासी मनमोहन सरकार की कमजोरी से अच्छी तरह से वाकिफ हो गये हैं। यही कमजोरी है जिसके चलते आतंकियों के मंसूबे आसानी से पूरे होते चले आ रहे हैं और सरकार चलानेवाले जख्मों पर मरहम लगाना छोड पडौसी देश के हौसले बढाने के काम में लगे हैं। १३ जुलाई को हुए मुंबई बम धमाकों में अपनी जान गंवाने वाले मृतकों के परिजनों और घायलों के दिल पर क्या बीती होगी जब उन्होंने कांग्रेस के महान नेता दिग्विजय सिं‍ह के यह बोलवचन सुने होंगे कि इन धमाकों के पीछे हिं‍दू कट्टरवादियों का हाथ हो सकता है। बिना किसी सबूत के इतनी बडी बात कह गुजरने वाले नेताजी के लिए तो यह रोजमर्रा का काम है पर जिन्होंने अपनों को खोया है उनके लिए तो यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं हो सकती। इस तरह की भ्रामक बयानबाजी करने वाले नेताओं की कौम यह भूल गयी है कि उनके यही बयान आतंकवाद के पोषक पाकिस्तान तक यह संदेश पहुंचाते हैं कि हिं‍दुस्तान के नेता तो एक दूसरे पर कीचड उछालते रहते हैं। इनमें एकता का नितांत अभाव है इसलिए इनके देश में बम-बारुद बिछाते रहो और इन्हें आपस में लडाते रहो। पाकिस्तान अपने मकसद में कामयाब होता चला आ रहा हैं। ये नेताओं के ही बयान हैं जो देशवासियों के दिलों में भी एक-दूसरे के प्रति संदेह के बीज बोने का भी काम करते हैं। आतंकवाद से लडने के लिए सही सोच और सही राह पर चलने की बजाय राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे नेताओं को अहमदाबाद की रेशमा से सबक लेना चाहिए जिसने देशभक्ति का अद्वितीय उदाहरण पेश किया है। अहमदाबाद में शहजाद नामक एक शख्स को गिरफ्तार किया गया है जो अवैध हथियारों को बेचने के साथ-साथ आतंक और हिं‍सा फैलाने के लिए अपने घर में ही बम बनाया करता था। यह लगभग निश्चित है कि उसकी इस कारस्तानी से कुछ लोग तो जरूर वाकिफ रहे होंगे पर किसी ने भी उसके इस राष्ट्रद्रोही कृत्य का पर्दाफाश करने की हिम्मत नहीं दिखायी। आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त शहजाद का भंडाफोड करने की पहल की उसी की पत्नी रेशमा ने। रेशमा ने पुलिस को फोन पर बताया कि उसका पति बम बनाता है। पुलिस ने शहजाद को आठ बमों के साथ गिरफ्तार भी कर लिया है। रेशमा ने अपने पति को नहीं, एक राष्ट्रद्रोही को सीखंचों के पीछे पहुंचाने में अहम भूमिका निभायी है। इसके लिए उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम होगी। यह तो तय हो चुका है कि आतंकवादियों और अपराधियों का कोई धर्म नहीं होता। न ही उनका किसी से कोई रिश्ता-नाता होता है। पर अक्सर देखा गया है कि अधिकांश लोग अपने आसपास चलने वाली संदिग्ध गतिविधियों को जानबूझकर या फिर भय के चलते नजरअंदाज कर देते हैं। आगे जाकर यही गलती बहुत भारी पडती है। लोग यह मानकर चलते हैं कि किसी को पकडने या पकडवाने का काम तो पुलिस के जिम्मे है। हम क्यों बेकार में आफत मोल लें। पर इस तथ्य को याद रखें कि देश की सुरक्षा एजेंसियां शक के आधार पर विदेशी चेहरों से तो पूछताछ कर सकती हैं पर अपने ही देश के हर नागरिक को संदेह के आधार पर निशाना नहीं बना सकतीं। जयचंद तो कहीं भी हो सकते हैं। हजारों मील बैठे मौत के सौदागरों के हाथ इतने लंबे हैं कि वे जयचंदो तक अपनी पहुंच बना ही लेते हैं। गद्दारों के ईमान को खरीदना बहुत आसान होता हैं। आसपास के गद्दारों की भी शिनाख्त होना निहायत जरूरी है और यह काम हम सबको मिलजुल कर करना होगा। नेताओं की तरह हवा में तीर छोडने से बात नहीं बनेगी...।

Thursday, July 14, 2011

हादसे, दुर्घटनाएं और साजिशें

जिस तरह से यह देश राम भरोसे चल रहा है वैसे ही हाल भारतीय रेल के हैं। दौडते-दौडते कब-कोई ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। बीते रविवार को दो रेल हादसे हो गये। हावडा से दिल्ली आ रही कालका मेल उत्तरप्रदेश के फतेहपुर में मलवां स्टेशन के निकट दुर्घटनाग्रस्त हो गयी। दूसरी तरफ असम में गुवाहटी-पुरी एक्सप्रेस के छह कोच और इंजन पटरी से उतर गये। इस हादसे में लगभग १०० लोग घायल हुए। कालका मेल के पटरी से उतरने के कारण अस्सी से अधिक यात्रियों को जान गंवानी पडी और तीन सौ से ज्यादा यात्री घायल हुए। देश के हुक्मरानों के लिए ऐसी दर्दनाक दुर्घटनाएं कोई मायने नहीं रखतीं। उनके लिए यह आम बात है। हर दुर्घटना के बाद वे अपना फर्ज निभा देते हैं। मृतकों के परिवारों को कुछ लाख रुपये और घायलों को पच्चीस-पचास हजार पकडाकर चैन की नींद सो जाते हैं। भारतीय रेल की बदौलत सरकार के खजाने में अपार धन बरसता है पर यह धन पता नहीं कहां चला जाता है? अगर इस धन का सदुपयोग किया जा रहा होता तो रेल यात्रियों को बुनियादी सुविधाओं के लिए न तरसना पडता। सुविधाओं की जगह यातनाएं और मौत बांटने वाले रेलवे के कर्ताधर्ता आखिर हादसों से सबक क्यों नहीं लेते? लोगों की बेशकीमती जान चली जाती है और यह चंद सिक्के फेंककर ऐसे चलते बनते हैं जैसे किसी भिखारी को दान दे रहे हों! यह शर्मनाक सिलसिला वर्षों से चला आ रहा है। देश में जहां-तहां रेल दुर्घटनाएं होती रहती हैं। शोर मचता है। रेल मंत्रालय की तरफ से दुर्घटना के पीछे के कारणों की जांच कराये जाने की घोषणा होती है। पर जांच कभी नहीं होती। घोषणावीर जानते हैं कि जांच करवायेंगे तो खुद ही नंगे नजर आयेंगे। यही हैं जो देशवासियों को सपने दिखाते हैं कि शीघ्र ही भारत वर्ष में भी चीन और जापान की तरह ढाई से तीन सौ किलो मीटर की रफ्तार से दौडने वाली रेलगाडि‍यां नजर आयेंगी। इनसे कोई यह तो कहे कि सपनों के सौदागरों पहले सौ किलोमीटर की रफ्तार को तो संभालो फिर बाद में चीन और जापान के सपने दिखाना।नये रेलमंत्री गद्दी संभालते ही देशवासियों को यह बताना नहीं भूले कि रेल दुर्घटनाएं तो अमेरिका और यूरोप में भी होती रहती हैं। यानी ऐसे में अगर भारत में हो रही हैं तो कौन-सा तूफान टूट पडा है। तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी के पिट्ठू दिनेश त्रिवेदी रेलमंत्री के रूप में क्या गुल खिलायेंगे उसका अंदाजा उनके उपरोक्त बयान से सहज ही लगाया जा सकता है। वैसे भी रेलमंत्री का पद अपने-अपने राजनीतिक स्वार्थ साधने और माल कमाने का सहज ठिकाना है। जो भी नेता रेलमंत्री बनता है उसे देश की चिं‍ता कम और अपने प्रदेश की चिं‍ता ज्यादा रहती है। लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान और ममता बनर्जी जैसों का रेलमंत्री के रूप में किया गया कामकाज इसका गवाह है। होना तो यह चाहिए था कि देश की इस सबसे बडी यातायात सेवा पर देशवासी नाज करते। पर रेलवे को तो राजनीतिक हितों के हवाले कर दिया गया है। जो भी आता है अपने हिसाब से इसका दोहन कर चलता बनता है। किसी भी रेल मंत्री ने आंखें खोलकर हकीकत से रूबरू होने की कोशिश नहीं की। रेलवे की आधी से अधिक पटरियां इतनी पुरानी हो चुकी हैं कि उन्हें कबाडखाने के हवाले कर दिया जाना चाहिए। अनेकों पुल भी ऐसे हैं जिनके समीप पहुंचते ही रेल के ड्राइवरों का संभावित खतरे के भय के मारे पसीना छूटने लगता है। यह जर्जर पुल कभी भी धोखा दे सकते हैं। देश भर में ऐसे रेल फाटकों की संख्या लगभग बीस हजार के आसपास होगी जहां पर चौकीदारों की नियुक्ति नहीं की गयी है। ऐसे अंधे स्थानों पर अंधाधुंध दुर्घटनाएं होती रहती हैं और रेल मंत्रालय धन की कमी का रोना रोता रहता है और रेल मंत्री मौज मनाते रहते हैं। दरअसल मंत्रियों और नौकरशाहों की जमात इतने संवेदनहीन हो चुकी है कि उन पर बडी से बडी दुर्घटना कोई असर नहीं डालती। हर बार जब रेलवे का बजट बनता है तो नयी-नयी गाडि‍यां चलाने की घोषणा करने में कोई भी रेलमंत्री पीछे नहीं रहता, लेकिन वर्षों से सिर ताने खडी मूलभूत समस्याओं की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। पटरियों पर होने वाली टक्कर को रोकने के लिए टक्कर रोधी उपकरण लगाने की पहल करना किसी भी रेलमंत्री ने जरूरी नही समझा।मंत्रीजी को तो दुर्घटनाओं में मर-खप जाने वालों के परिवारों को मुआवजा राशि थमा कर शांत कर देने का चलन फायदे का सौदा नजर आता है। यात्रियों को बुलेट ट्रेन मुहैय्या कराने के सपने दिखाने वालों की पोल कालका मेल हादसे ने पूरी तरह से खोल कर रख दी हैं। रेलवे विभाग के पास दुर्घटनाग्रस्त हुई ट्रेन के डिब्बों में फंसे यात्रियों तक पहुंचने, डिब्बों की दिवारों को काटकर फंसे हुए यात्रियों को बाहर लाने के लिए पर्याप्त संख्या में गैस कटर तक नहीं थे। यही वजह थी कि कई यात्री जिन्हें बचाया जा सकता है देखते ही देखते मौत के चंगुल में जा फंसे। अगर गैस कटर होते तो मौत के आकडे को कम किया जा सकता था। गैस कटर कोई ऐसी कीमती चीज नहीं है कि जिन्हें भारतीय रेलवे खरीदने की औकात न रखता हो। यही हाल अन्य सहायता सुविधाओं का भी है। दुर्घटना घट जाती है तो रेलवे की सहायता ट्रेनों का अता-पता नहीं रहता। कालका मेल की दुर्घटना के शिकारों को जिन सरकारी अस्पतालों में भर्ती कराया गया वहां पर बुनियादी सुविधाएं ही नदारद थीं। कुछ घायल तो अस्पताल में ही चोरों के शिकार हो गये। सरकार ने जो सहायता राशि दी थी उसे ही उडा लिया गया। कई घायलों को सरकारी अस्पतालों को छोड प्रायवेट अस्पतालों की शरण लेनी पडी। अस्पताल में राहुल गांधी के पहुंचने की खबर सुनकर बिस्तरों पर धुली हुई चादरें बिछायी गयीं। एक घायल पर तो पंखा जा गिरा। सरकारी अस्पतालों के लिए यह रोजमर्रा का खेल है। जब सरकार ही नकारा हो तो सुधार की अपेक्षा रखना बेवकूफी से ज्यादा और कुछ नहीं है। कमजोर और निकम्मी सरकारें ही हादसों को निमंत्रण देती हैं और इन्हीं के कारण पडोसी देश पाकिस्तान के पाले-पोसे आतंकवादी बेखोफ बम बारुद बिछाकर निर्दोष भारतवासियों का खून बहाने से नहीं हिचकिचाते।

Thursday, July 7, 2011

कुछ तो करो सरकार!

विदेशों में जमा कालाधन वापस न लाने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगायी है। फटकार तभी लगायी जाती है जब कोई सुन कर भी अनसुना कर देता है। देश की सरकार के भी यही हाल हैं। अंधी और बहरी सरकार के मुंह पर तमाचा मारते हुए उच्चतम न्यायालय ने विदेशों में जमा काले धन की जांच और उसे वापस लाने के उपायों की निगरानी के लिए एक उच्चस्तरीय विशेष जांच दल का गठन कर यह संकेत भी दे दिये हैं कि अगर शासक इसी तरह से सोये रहे तो उसे ही पहल करनी पडेगी। वैसे सरकार भी कम चालाक नहीं है। वह भी हमेशा यही कहते नहीं थकती कि उसे भी देश की चिं‍ता है और वह भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने और काले धन को वापस लाने की मंशा रखती है। सरकार यह संकेत देना भी नहीं भूलती कि भ्रष्टाचार को रातोंरात खत्म नहीं किया जा सकता। सरकार कहती तो बहुत कुछ है पर करती कुछ खास नहीं। पहाड को हिलाने के लिए उंगली लगाना काफी नहीं होता। पर सरकार का तो कुछ ऐसा ही रवैय्या दिखायी देता हैं। सरकारें पता नही इतनी बेरहम और असंवेदनशील क्यों हो जाती हैं कि वे अपने ही देश के करोडों लोगों की गरीबी और बदहाली को नजर अंदाज कर चंद लोगों की तिजोरियां भरने के स्वार्थ में फंस कर रह जाती हैं! यह देश गरीब तो कतई नहीं है। अगर गरीब होता तो इसकी दौलत विदेशों में नही सड रही होती। अगर यह गरीब होता तो मंदिरों और देवालयों में अरबों-खरबों के हीरे-जवाहरात और सोना-चांदी ना भरे पडे होते। दरअसल इस देश को गरीब बनाया है उस सोच ने जो इंसानों को तो कुचल डालना चाहती है पर बाबाओं और पत्थर की मूर्तियों को पूजते रहना चाहती है। उसके लिए जीते जागते इंसानों की कोई कीमत नहीं है। इस देश में न जाने कितने ऐसे मंदिर और अखाडे हैं जहां अरबों-खरबों के भंडार भरे पडे हैं। कुछ पाखंडी साधु-संन्यासी और पंडे इस अपार धन-दौलत का सुख भोग रहे हैं और देश की गरीबी को चिढा रहे हैं। इन दिनों श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर का नाम देश और दुनिया में छाया हुआ है। अभी तक तो यह मंदिर देश में भी उतना जाना-पहचाना नहीं था। इस मंदिर से मिले खरबों रुपये के खजाने ने हर किसी को चौंका कर रख दिया है। एक लाख करोड रुपये कम नहीं होते। इनसे लाखों लोगों का जीवन संवर सकता है। इस मंदिर के तहखानों में से जो बेहिसाब दौलत निकली है वह तो कुछ भी नहीं है। अभी तो असली रहस्य से पर्दा उठना बाकी है। मंदिर के खजाने को लेकर देश भर में बहसबाजी का दौर भी चल पडा है। कई लोग यह चाहते हैं कि इस धन का जन कल्याण हेतु सदुपयोग होना चाहिए। तर्कशास्त्री यू. कलनाथन जैसे लोगों का मानना है कि यह धन भी इस देश के लोगों का है इसलिए इसे उनके कल्याण के लिए खर्च करने में कोई हर्ज नहीं है। वैसे भी जो धन किसी के काम न आए और पडे-पडे सड जाए उसका क्या फायदा? हीरे-जवाहरात, स्वर्ण मुद्राएं, सोने की ईटों और नोटों की गड्डियां किसी संग्रहालय या प्रदर्शनी में रखने की चीज़ नहीं हैं। परंतु इस देश में अपने ही तौर तरीकों के साथ चलने वालों की भरमार है। तभी तो लोगों के कल्याण की बात करने वाले तर्कशास्त्री का विरोध किया जाता है और उन्हें ठिकाने लगाने की कोशिश में उनके घर में तोडफोड और आगजनी की जाती है। तर्क शास्त्री को यह बात भी समझा दी जाती है कि इस देश में अपने दिल की बात उजागर करना गुनाह है। सुप्रीम कोर्ट की मेहरबानी से अभी तो एक ही मंदिर के तहखानों ने इतनी दौलत उगली है जिससे देश के प्रदेश केरल, जहां पर यह मंदिर स्थित है का सारा कर्ज चुका कर प्रदेश के चेहरे की रौनक बढायी जा सकती है। इसी देश में शिरडी का साई मंदिर, मुंबई का सिद्धि विनायक, तिरुपति बालाजी, माता वैष्णोदेवी, श्री सबरीमाला संस्थान जैसे सैकडों मंदिर और पूजालय हैं जहां हीरे-जवाहरात, स्वर्ण मुद्राओं, सोने की इंटों और नोटों के अंबार लगे हैं। इसी देश का दूसरा चेहरा है जहां गरीबी, बदहाली और भूखमरी का साम्राज्य है। न जाने कितने युवक रोजगार न मिलने के कारण अपराधी बनने को विवश हो जाते हैं। देश में आज समस्याओं का अंबार लगा है। अधिकांश समस्याएं धन के अभाव के चलते बनी हुई हैं। देश के साधु-संतो और बाबाओं के साथ-साथ मंदिरों में जो दौलत भरी पडी है उसे उजागर करना और जनहित के काम में लाया जाना वक्त की मांग है। यह धन और दौलत इस देश का कायाकल्प कर सकते हैं। इंसानों की दुनिया में इंसानों से बढकर और भला कौन हो सकता है! जो लोग यह कहते हैं कि मंदिरों की तमाम दौलत भगवान की है तो वे यह क्यों भूल जाते हैं कि इंसानों को भी तो भगवान ने ही पैदा किया हैं। कोई भी पिता अपनी औलादों को भूख से बिलबिलाते नहीं देख सकता। अब यह सरकार सोचे कि उसे क्या करना है। जनता को भी जागना होगा। विदेशों में जमा काला धन तो जब आयेगा तब आयेगा पर देश में जहां-तहां बेकार पडे धन की अनदेखी कब तक होती रहेगी?

Thursday, June 30, 2011

सत्ता के सपनों में खोयी भाजपा

राजनीति के रंगमंच पर रंगारंग बयानबाजी करने वाले कुछ कांग्रेसी जब भी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाये जाने की मांग करते हैं तो भारतीय जनता पार्टी के नेता भी बयानबाजी पर उतर आते हैं। पिछले दिनों बडबोले कांग्रेसी दिग्विजय सिं‍ह ने राहुल गांधी को पीएम बनाने की फुलझडी छोडी तो भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवानी बारुद की तरह फट पडे। हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री बनने में नाकामयाब रहे आडवानी ने दिग्विजय सिं‍ह को खरी-खोटी सुनाते हुए चेताया कि वे इस तरह के चापलूसी भरे बयान देना बंद कर दें। अपने सपनों के पूरा न हो पाने से आहत हो चुके आडवानी ने कहा कि प्रधानमंत्री का पद किसी एक परिवार की जागीर नहीं है।वैसे देखा जाए तो यह कोई नयी बात नहीं है। बेचारे कांग्रेसी करें भी तो क्या करें? गांधी और नेहरू परिवार की बदौलत ही उनकी राजनीति चलती आ रही है। उनके पास और दूसरा कोई नेता भी नहीं है जिन्हें देखकर देश की जनता अपने वोट कुर्बान कर दे। याद करें वो दौर जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली थी और उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की कोशिशें की गयी थीं। भाजपा ने सोनिया गांधी के विदेशी होने का मुद्दा उठाकर कांग्रेस को ही कटघरे में खडा करने का अभियान चलाया गया था। इस तथ्य की भी अनदेखी कर दी गयी सोनिया गांधी को देश की जनता ने ही लोकसभा के चुनाव में विजयश्री दिलवायी। मरणासन्न कांग्रेस में भी सोनिया गांधी की बदौलत नयी जान आयी और देश की जनता ने भी बता दिया कि जब तक गांधी परिवार के हाथ में कांग्रेस की बागडोर है तब तक कांग्रेस जैसी भी है हमें मंजूर है। राहुल गांधी भी देश के सांसद हैं। जनता ने उन्हें चुना है ऐसे में जब राहुल को प्रधानमंत्री बनाये जाने की बात उठती है तो विरोध का कोई तुक नजर नहीं आता। जिस परिवार की बदौलत कांग्रेसियों का वजूद है उसी के प्रति आस्था प्रकट करना उनकी मजबूरी है। इसे चापलूसी कहें या भक्तिभावना। वैसे भी यह कांग्रेस का निजी मामला है वह जिसे चाहे उसे प्रधानमंत्री बना सकती है। यही बात भाजपा पर भी लागू होता है। वह जिसे चाहे उसे अपना भावी पीएम घोषित कर सकती है। इस देश की नब्बे प्रतिशत जनता का इस बात से कोई लेना-देना ही नहीं है कि कौन देश का प्रधानमंत्री हो। उसे तो दो वक्त की रोटी चाहिए। पर इस देश के हुक्मरानों ने तो उसे इस लायक भी नहीं समझा। भ्रष्टाचार और अनाचार के कीर्तिमान स्थापित करने वालों ने आम आदमी को खून के आंसू रुलाने में कभी कोई कसर नहीं छोडी। जिस कांग्रेस ने वोट हथियाने के लिए १०० दिन में महंगाई खत्म करने का वायदा किया था वह खुद इतनी बेबस नजर आ रही है कि देश चौराहे पर खडा नजर आ रहा है। देशवासी आखिर किस पर यकीन करें? उन्हें कहीं से भी कोई जवाब नहीं मिल पा रहा है। देश की दो राजनीतिक पार्टियां आमने-सामने खडी हैं। कांग्रेस पर महंगाई को बढाने के साथ-साथ भ्रष्टाचार और काले धन को प्रश्रय देने के संगीन आरोप हैं। भारतीय जनता पार्टी सहित अन्ना हजारे और रामदेव जैसों की फौज कांग्रेस को जिस तरह से अपने घेरे में ले चुकी है उससे यह भी आभास हो रहा है कि कोई न कोई परिणाम सामने आकर रहेगा। पर क्या यह संभव है? डा. मनमोहन सिं‍ह भले ही मंजे हुए राजनीतिज्ञ न हों पर क्या वे इतनी आसानी से कुर्सी छोड देंगे? सोनिया गांधी एंड कंपनी क्या इतनी जल्दी हार मान लेगी? भाजपा तो बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने के इंतजार में है। देश की जनता कांग्रेस और भाजपा दोनों के असली चरित्र से वाकिफ हो चुकी है। जनता के सामने कोई विकल्प नहीं है। उसे तो इन दो पाटों के बीच पिसते रहना है। कांग्रेस यानी डा. मनमोहन सिं‍ह ने तो मंत्रियों-संत्रियों और अपने करीबी राजनीति के खिलाडि‍यों को भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते सींखचों के पीछे खडा करने की हिम्मत दिखा दी पर भाजपा क्या कभी ऐसा साहस दिखा पायी? भाजपा के हाथों में जब केंद्र की सत्ता थी तब उसने ऐसा कोई खास काम नहीं किया जो कांग्रेस को पछाडने वाला हो। यही वजह है कि कांग्रेस और भाजपा में बेहतर कौन हैं? का जवाब तलाशना बहुत मुश्किल नजर आता है। इसमें दो मत नहीं हैं कि देश के जिन प्रदेशों में भाजपा का शासन है वहां पर एकाध को छोडकर बाकी सभी प्रदेशों में कई जनहितकारी काम हो रहे हैं। छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिं‍ह, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिं‍ह चौहान अपने-अपने प्रदेशों के विकास में जी-जान से जुटे हैं।अब जब भाजपा फिर से केंद्र में शासन करने के सपने देख रही है तो यह तथ्य भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि अगर कांग्रेस में भ्रष्टाचारी भरे पडे हैं तो भाजपा भी कोई सुधरी हुई पार्टी नहीं है। दोनों पार्टियों के अधिकांश नेताओं का आचरण लगभग एक जैसा ही है। देश में छह साल तक अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार रही। इस सरकार से देशवासियों को कई उम्मीदें थीं पर सबकी सब धरी की धरी रह गयीं। अगर यह कहें कि अटलबिहारी वाजपेयी के कारण ही भारतीय जनता पार्टी को केंद्र की सत्ता नसीब हुई थी तो गलत न होगा। इन छह सालों में देश का चेहरा बदला जा सकता था। हर किसी को यकीन था कि अटलबिहारी वाजपेयी ऐसा कुछ कर दिखायेंगे जिसे सदियों तक याद रखा जायेगा। डा. मनमोहन सिं‍ह और अटलबिहारी वाजपेयी में ज्यादा फर्क दिखायी नहीं देता। दोनों के शासनकाल में भ्रष्टाचारियों की खूब चली। दोनों घोर ईमानदार होने के बावजूद भ्रष्टाचार पर लगाम कसने में नाकामयाब रहे। इतिहास के पन्नों में अटल और मनमोहन का नाम पाक-साफ प्रधानमंत्रियों के रूप में तो जरूर दर्ज होगा पर साथ ही यह भी जरूर लिखा जायेगा कि इनकी ईमानदारी ने कई बेईमानों को फायदा पहुंचाया। सबकुछ देखने-समझने और सुनने के बाद भी यह दोनों असहाय बने रहे।अटलबिहारी वाजपेयी राजनीति से संन्यास ले चुके हैं। भाजपा में उनकी जैसी लोकप्रिय छवि वाला कोई और नेता दूर-दूर तक नजर नहीं आता। जनता के वोट खींचने के लिए कांग्रेस के पास सोनिया गांधी भी हैं और राहुल, प्रियंका भी पर भाजपा इस मामले में लगभग खाली हाथ है। खाली हाथ होने के बावजूद भी एक दूसरे की टांग खि‍चायी चलती रहती है। इस पार्टी में एक भी सर्वमान्य नेता नहीं है और यही कमी उसे कांग्रेस के समक्ष बौना बनाती है...।

Thursday, June 23, 2011

चुप्पी कब टूटेगी?

स्याह रात नहीं लेती
नाम खत्म होने का
यही तो वक्त है
सूरज तेरे निकलने का
नागपुर के आठ युवकों ने देश की राष्ट्रपति से इच्छा मृत्यु की मांग की है। हिं‍दुस्तान के चप्पे-चप्पे में अपनी जडें जमा चुके भ्रष्टाचार और भ्रष्ट व्यवस्था से नाराज इन युवकों का कहना है कि वे ऐसे हालातों में जीना नहीं चाहते। १८ से ३० वर्ष तक की आयु के इन युवाओं ने राष्ट्रपति को भेजे अपने पत्र में कई सुलगते सवाल उठाये हैं। इस दमघोटू व्यवस्था से मुक्ति पाने को आतुर युवक जानना चाहते हैं कि इस देश में भ्रष्टचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों पर कहर क्यों ढाया जाता है? देश को लूटने वालों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वालों पर लाठियां भांजना कहां की मर्दानगी है? इन युवकों का यह भी मानना है कि भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को सरकार का संरक्षण मिला हुआ है। जिनके हाथ में सत्ता है वही लोग अपनी मनमानी कर रहे हैं। खुद तो देश को लूट ही रहे हैं साथ ही अपने सगे संबंधियों और यार दोस्तों को लूटमार करने के भरपूर अवसर मुहैया करवा रहे हैं। नक्सलवाद तथा आतंकवाद से लडने और देश की सुरक्षा के लिए जान कुर्बान करने को तत्पर युवकों को यह भी लगता है कि भ्रष्टाचार से लड पाना उनके बस की बात नहीं है। यानी भ्रष्टाचारी आज इतने ताकतवर हो चुके हैं कि उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। जो भी इनके खिलाफ आवाज उठाता है उसे ठिकाने लगा दिया जाता है। ईमानदारी की इस देश में कोई कीमत नहीं है। यही पीडा उन्हें बेहाल किये हुए है। बडी तेजी से महानगर की शक्ल अख्तियार करता नागपुर देश का हृदय स्थल है। नागपुर के युवकों की इच्छा और पीडा को सिर्फ एक शहर तक सीमित नहीं किया जा सकता। देश के करोडों युवक कुछ ऐसी ही सोच के साथ सरकार के जागने और व्यवस्था के दुरुस्त होने के इंतजार में हैं। वैसे इंतजार और सब्र की भी सीमा होती है।अन्ना हजारे और बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जो अलख जलायी उसका उजाला लगभग पूरे देश में फैल चुका है। कल तो जो सोये थे वे भी जाग गये हैं। लोगों का गुस्सा संभाले नहीं संभल पा रहा है। फिर भी सत्ता का सुख भोग रहे राजनेताओं की आंखें अभी भी खुलने का नाम नहीं ले रही हैं। उन्हें तो यही लग रहा है कि कुछ दिनों बाद लोग सब कुछ भूल जायेंगे। इस देश की अधिकांश जनता वैसे भी रोजी-रोटी की समस्या में उलझी रहती है। भूख हडतालों और आंदोलनों से उसका कोई वास्ता नहीं होता। ये तो कुछ सिरफिरे हैं जो भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ शोर मचाये हुए हैं। इन पर भी जब सरकार का डंडा चलेगा तो यह अपने आप ठंडे हो जायेंगे। सच कहूं... सरकार इस बार इस भूल से मुक्ति पा ले तो बेहतर होगा। देशवासियों की सहनशीलता अब खत्म हो चुकी है। जब युवक इच्छा मृत्यु की मांग कर रहे हों तो सरकार को समझ लेना चाहिए कि पानी सिर से ऊपर जा चुका है। अब खास ही नहीं आम लोग भी यह मानने लगे हैं कि शासकों में ही ऐसे कई चेहरे शामिल हैं जो देश के साथ गद्दारी करते चले आ रहे हैं। सरकार अच्छी तरह से वाकिफ है कि वे कौन लोग हैं। फिर भी वह नही चाहती कि उनके इर्द-गिर्द के भ्रष्टाचारी बेनकाब हों। मेरे सामने कुछ अखबार पडे हैं जिनमें यह खबर छपी है कि उत्तरप्रदेश की आंवला लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी की सांसद मेनका गांधी ने आरोप लगाया है कि स्विस बैंक में जमा आधे से ज्यादा धन कांग्रेस नेताओं का है। यही वजह है कि विदेशी बैंक खातों की जांच करने से कांग्रेस कतरा रही है। सच तो यह है कि काले धनपतियों और काले धन को बचाने के लिए कांग्रेस ने अपनी पूरी साख को दांव पर लगा दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की बागी पुत्रवधु ने दावे के साथ यह भी कहा है कि बोफोर्स तोप घोटाले का धन भी विदेशों में जमा किया गया है। मेनका गांधी का शुमार गंभीर किस्म के नेताओं में किया जाता है। उनके मुंह से निरर्थक और फालतू शब्द कम ही फूटते देखे गये हैं। देश के मुखर नेता सुब्रमण्यम स्वामी भी अक्सर गांधी परिवार पर इस तरह के आरोप दागते देखे गये हैं परंतु उन्हें देश की जनता ने कभी उतनी गंभीरता से नहीं लिया। अब जब गांधी खानदान की एक जिम्मेदार सदस्या कांग्रेस और सोनिया गांधी पर आरोप लगा रही हैं तो उन्हें जवाब देने में देरी नहीं करनी चाहिए। आज भी देश की सत्तर प्रतिशत जनता मीडिया में आयी खबरों पर पूरा यकीन करती है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी की चुप्पी देशवासियों को कहीं न कही सशंकित किए हुए है। सोनिया गांधी नहीं तो कम से कम राहुल गांधी को तो स्थिति स्पष्ट करनी ही चाहिए। अपनी चाची के आरोपों का जवाब न देकर कहीं न कहीं वे कांग्रेस पार्टी का भी नुकसान कर रहे हैं। वैसे तो राहुल गांधी हर मुद्दे पर जबान खोलते हैं पर भ्रष्टाचार और काले धन पर उन्हें कभी बोलते नहीं देखा गया। यह चुप्पी चौंकाती है और उन युवाओं को हतोत्साहित करती है जो कांग्रेस के इस युवराज को अपना आदर्श मानते हैं। राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए उछलकूद मचाने वाले दिग्विजय सिं‍ह जैसे नेता पता नहीं राहुल गांधी को इस गंभीर मुद्दे पर खुलकर बोलने की सलाह क्यों नहीं देते?

Thursday, June 16, 2011

देश को इन पर नाज़ है

उजाला हो न हो
यह और बात है
मेरी हर आवाज
अंधेरों के खिलाफ है...
महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में फिर एक पत्रकार की हत्या कर दी गयी। देश का महानगर मुंबई जिसे मायानगरी भी कहा जाता है कई-कई रंगों के साथ जीता है। किस्म-किस्म के अपराधी और माफिया यहां भरे पडे हैं। सफेदपोश अपराधियों की भी यहां भरमार है। दूसरे शहरों की तुलना में यहां अगर रंगीनियां ज्यादा हैं तो खतरे भी कम नहीं हैं। मुंबई की फितरत से वाकिफ हर सच्चा पत्रकार जानता है कि यहां पर कलम के दुश्मनों के कितने लंबे हाथ हैं। पर वो पत्रकार ही क्या जो दुश्मनों से डर जाए। अंडरवल्र्ड और मुखौटेबाज सफेदपोशों पर कलम चलाने वालों को कई खतरों से जूझना पडता है। जिसके खिलाफ लिखो वही जान का दुश्मन बन जाता है।पत्रकार ज्योतिर्मय डे भी एक ऐसे पत्रकार थे जो अपनी जान हथेली पर लेकर चला करते थे। मुंबई की सडकों पर बेखौफ अपनी मोटर सायकल पर दौडने वाले ज्योतिर्मय डे उर्फ जे.डे ने मुंबई की काली दुनिया का सच उजागर करने का अभियान चला रखा था। पिछली बीस वर्ष से वे बिना किसी से डरे विभिन्न गैंगस्टरों, तेल माफियाओं और खाकी वर्दी में लिपटे गद्दारों को बेनकाब करने में लगे थे। पिछले दिनों जब सरकार ने एकाएक पेट्रोल की कीमतें बढा कर देशवासियों को स्तब्ध कर दिया था तब जे.डे ने अपनी रिपोर्ट में बेखौफ यह जानकारी दी थी कि किस तरह देशवासियों को लूटा जा रहा है और इस लूट के खेल में बडे-बडे राजनेता, मंत्री और तेल माफिया शामिल हैं। यह लुटेरे आपस में हाथ मिला चुके हैं। उनके गठजोड को तोड पाना आसान नहीं है। यह जे.डे की खोजी खबरें ही थीं जिनके छपने के बाद कई अपराधियों पर कानूनी कार्रवाई की गाज गिरी थी। इस जागरुक पत्रकार को अपराध जगत के चप्पे-चप्पे की जानकारी रहती थी और अपराधियों के काम करने के तौर तरीकों का भी ऐसा ज्ञान था कि खबरें छपने के बाद अपराधी भी विस्मित हुए बिना नहीं रह पाते थे। अंडरवल्र्ड के काम करने के तौर-तरीकों पर उनकी लिखी दो पुस्तकें काफी चर्चित हुई। माफियाओं के 'कोड वल्र्ड' का जे.डे ने जो खुलासा किया उससे पुलिस वालों का भी काम काफी हद तक आसान हो गया था। पुलिस वालों से भी तेज दिमाग रखने वाले जे.डे राजनीतिज्ञों और अपराधियों के याराने से भी अच्छी तरह से वाकिफ हो चुके थे। उनकी कलम सफेदपोश नेताओं और खाकी वर्दीधारियों को भी नहीं बख्शती थी। अगर यह कहा जाए कि जे.डे अपराधियों के साथ-साथ खाकी और खादी के निशाने पर भी थे तो गलत न होगा। उनकी हत्या से यह भी तय हो गया है कि मायानगरी में समर्पित पत्रकार कतई सुरक्षित नहीं हैं। अंडरवल्र्ड के शैतान किसी को भी निशाने पर ले सकते हैं। महाराष्ट्र में दाऊद इब्राहिम, छोटा शकील, अरुण गवली, पप्पू कालानी, छोटा राजन आदि माफियाओं के बाद और भी कई नये माफिया सिर उठा चुके हैं। तेल माफिया तो इतने हिं‍सक हो चुके हैं कि सरकार का भी उन पर कोई बस चलता नहीं दिखता। कुछ ही महीने पहले नासिक के सहायक कलेक्टर यशवंत सोनावडे को इन्ही तेल माफियाओं ने जिं‍दा जला दिया था। पुलिस और तेल माफियाओं की आपस में कितनी छनती और बनती है उसका पता तो इससे चल जाता है कि सोनावडे के हत्यारों के खिलाफ समय सीमा के अंदर चार्जशीट ही नहीं दाखिल की गयी और हत्यारों को जमानत मिल गयी।पत्रकारिता के प्रति जीवनभर समर्पित रहे जे.डे ने तेल माफियाओं के जुर्म की दास्तान से सरकार को निरंतर अवगत कराया पर सरकार तो सरकार है। उसके काम करने के रंग-ढंग बडे निराले हैं। जब किसी अधिकारी के तेल माफियाओं के हाथों मारे जाने पर उसको कोई फर्क नहीं पडता तो पत्रकार तो पत्रकार हैं। सिर्फ कलम घिस्सू...। सरकार के लिए उनकी जान की कोई कीमत नहीं है। जब किसी पत्रकार की निर्मम हत्या कर दी जाती है तब सरकार के मंत्री संवेदना के दो शब्द उछाल कर चलते बनते हैं। कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो पत्रकारों पर भी उंगली उठाते हुए इशारों-इशारों में यह कह देते हैं कि पत्रकारों को भी सोच-समझ कर रिपोर्टिंग करनी चाहिए। खतरों से बचकर रहना चाहिए। इन इशारों के पीछे यह सीख भी छिपी होती है कि देख कर भी अनदेखा करना सीखो। पत्रकारों को ज्ञान बांटने वालों की कमी नहीं है। कई तो ऐसे हैं जो पत्रकारों की आचार संहिता की जंजीरों में बांध देना चाहते हैं। भंडाफोड करने वाले पत्रकार उन्हें फूटी आंख नहीं सुहाते। इसलिए जब कोई सच्चा पत्रकार मौत के मुंह सुला दिया जाता है तो ये चेहरे यह कहने से भी नहीं चूकते कि यह तो अपनी करनी का फल जो हर किसी को भुगतना पडता है। वैसे भी महाराष्ट्र का चेहरा अब पहले जैसा नहीं रहा। भ्रष्टाचार और अपराध यहां की पहचान बन चुके हैं। कई राजनेताओं की छवि जिस तरह से कलंकित हुई है वह भी कोई लुकी-छिपी नहीं है। सफेदपोश नेताओं के चेहरों के मुखौटे उतारने का काम भी ज्योतिर्मय डे जैसे पत्रकारों ने ही किया है। भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने और आम आदमी की आवाज बन अंधेरे के खिलाफ लडने वाले पत्रकारों पर देश को नाज़ है। इन्हीं की बदौलत लोकतंत्र सुरक्षित है और रहेगा...।