Thursday, September 26, 2013

राजनीति के ठेकेदारों की नपुंसकता

कई सवाल वर्षों से जवाब मांग रहे हैं। जवाब नदारद हैं। सरकारें खामोश हैं। प्रशासन ने हाथ बांध रखे हैं। कितना भी खून खराब हो जाए, लाशें बिछ जाएं, नेताओं के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। बेचारा कानून हत्यारों को हाथ लगाने से घबराता है। सज़ा तो बहुत दूर की बात है। आजादी के इतने वर्षों के बाद भी यह कैसा दमघोटू आतंकी अधेरा ही अंधेरा नज़र आता है? हरियाणा के एक गांव में दलित युवक का हाथ काट डाला गया। क्या आपको पता है कि उस युवक का कसूर क्या था? दरअसल उसने एक धनवान किसान के खेत में रखे मटके को छूने की हिमाकत की थी। उसे प्यास लगी थी। उसने मटके से पानी पी लिया। उसी दौरान एक दबंग युवक उसके पास आया। उसने उसकी जाति पूछी। जैसे ही उसने खुद को हरिजन बताया तो युवक का खून खौल उठा। एक हरिजन की इतनी हिम्मत! हमारे मटके का पानी पीने का साहस दिखाए। गुस्साये किसान के बेटे ने उसे सबक सिखाने की ठानी। इधर-उधर नजर दौडायी। साइकिल में लगी दरांती निकाली। हरिजन युवक का हाथ ऐसे काट डाला जैसे किसी पेड की सडी टहनी को काटा जाता है। हरियाणा में ऐसा होना आम बात है। कुछ ही खबरें मीडिया में सुर्खियां पाती हैं। अधिकांश खबरों को जहां का तहां दफन कर दिया जाता है। गांव-कस्बों के पत्रकार दबंगों के खिलाफ कलम चलाने से घबराते हैं। नेताओं और समाजसेवकों की संदिग्ध भूमिका भी दबंगों के हौसले बढाती रहती है। आज भी देश के प्रदेश हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश और बिहार में दलितों को इंसान की निगाह से नहीं देखा जाता। उनके साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। प्रेमी जोडों के प्रति भी कुछ ऐसे ही हालात हैं। यह भी एक किस्म की छुआछूत की बीमारी है। प्रेमियों को पकड-पकड कर मौत के घाट उतार दिया जाता है। हरियाणा में तो ऐसे बदतर हालात हैं कि लगता ही नहीं कि हम इक्कसवीं सदी में रह रहे हैं। इस प्रदेश में खाप पंचायतें देश के कानून को कुछ समझती ही नहीं। इनका अपना कानून है। खाप पंचायत के फरमान की अनदेखी करने वाले प्रेमियों को कुत्ते से भी बदतर मौत की सौगात देने का चलन है। खाप पंचायत का तथाकथित कानून एक ही समुदाय एवं गांव में शादी की अनुमति नहीं देता। ऑनर किलिं‍ग यानी झूठी शान के लिए क्रूरतम हत्याओं को अंजाम देना आम बात है। इस आधुनिक दौर में भी हर वर्ष सैकडों प्रेमियों को इसलिए मार डाला जाता है, क्योंकि वे समाज और अपने परिवार की इच्छा के खिलाफ प्रेम और शादी करने की हिम्मत दिखाते हैं।
दलितों और प्रेमियों का एक जैसा हश्र करने वाले हरियाणा के रोहतक शहर में बीते सप्ताह झूठी शान के लिए एक युवक और युवती की निर्मम हत्या कर दी गयी। धर्मेंद्र और निशा का यही दोष था कि उन्होंने सच्चा प्रेम किया था। वे दोनों शादी करना चाहते थे। एक साथ जीना चाहते थे। पर उनके घरवाले कतई नहीं चाहते थे कि वे जीवनभर के लिए एक दूसरे के हो जाएं। यह दोनों प्रेमी इतने फटेहाल थे कि धन के अभाव में आर्य समाज मंदिर में शादी नहीं कर पाए। उनकी दिली इच्छा तो यही थी। धर्मेंद्र ने शादी के लिए कुछ रुपयों के लिए अपने गांव के दोस्त को फोन किया। धर्मेंद्र का दोस्त उस वक्त निधि के घर पर ही बैठा था। घर वालों को उनकी असली मंशा का पता चल गया। उन्होंने उसी दोस्त के माध्यम से प्रेमी जोडे को राजीखुशी शादी करवा देने का झांसा देकर बुलवाया और खात्मा कर दिया। इस खौफनाक हत्याकांड को अंजाम देने में युवती के परिजनों ने जो निर्मम भूमिका निभायी उससे बडे से बडे दिलवाला इंसान भी विचलित हो सकता है। ऐसे मामलों में पुरुषों को तो क्रूर कर्म करने का आदी माना जाता है, लेकिन एक मां के बेरहमी भी बेनकाब हो गयी। युवती की मां चीख-चीख कर हत्यारों का मनोबल बढाती रही और यह कहती रही कि इस कलमुंही ने पूरे परिवार की इज्जत पर बट्टा लगाया है। इसे जीने का कोई हक नहीं है। यह ऐसी मौत की हकदार है जिसे देखकर कोई भी बेटी घर से बाहर झांकने और परिवार की नाक कटवाने की जुर्रत न कर पाए। निर्मोही मां की आंखों के सामने एक मासूम बेटी की गर्दन धड से अलग कर दी गयी। प्रेमी युगल की चीखें गूंजती रहीं पर किसी को रहम नहीं आया। आसपास के लोगों ने भी उन्हें बचाने की बजाय हत्यारों का पूरा-पूरा साथ देने की नपुंसकता दिखायी। यह वही नपुंसकता है जो दलितों पर जुल्म ढाये जाने पर लोगों की चुप्पी में नजर आती है और इसी नपुंसकता की वजह से देश में बलात्कारों की संख्या को गिन पाना मुश्किल होता चला जा रहा है। देश के प्रदेशों में होने वाले आतंकी हमले और साम्प्रदायिक दंगे भी इसी मूक हिजडेपन की देन हैं।
यह कितनी हैरत की बात है कि इज्जत के नाम पर होने वाली अधिकांश हत्याओं में कभी लडके तो कभी लडकी के पूरे परिवार की सहमति होती है। कभी-कभी तो लडके और लडकी के परिवार वाले मिलकर ही मर्जी से विवाह करने के इच्छुक या सगोत्रीय प्रेमी जोडों को मौत की नींद सुला देते हैं। स्थानीय नेताओं की चुप्पी तो समझ में आती है पर मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले दिग्गज उम्रदराज नेता भी आनर किलिं‍ग की वकालत करते नजर आते हैं।
प्रा. दामोदर मोरे की कविता में उठाये गये प्रश्न पता नहीं कब तक उत्तर की बाट जोहते रहेंगे :
''मुझे बताओ! हमारे लिए
जातिवाद का जाल कौन बिछाता है?
हमारी राह पर ऊंच-नीच का गतिरोधक
कौन और क्यों खडा करता है?
अज्ञान के अंधियारे में हमें कौन ढकेलता है?
अन्याय की आग में हमें कौन जलाता है?
अस्पृश्यता की नागिन को,
हमारे आंगन में किसने छोडा है?
हमें हीन बनाकर इन्सानियत का गला किसने घोटा है?''
दलितों के दुश्मनों और इज्जत की खातिर अपनी ही संतानों के हत्यारों की अक्ल अगर समय रहते ठिकाने नहीं लगायी गयी तो भविष्य में और...और होने वाले अनर्थ की कल्पना कर यह कलम कांप उठती है। अब तो होश में आओ हुक्मरानों और राजनीति के ठेकेदारो... कब तक वोटों के लालच में अंधे और बहरे बने रहोगे?

Thursday, September 19, 2013

विषैला काला चोलाधारी

दिल्ली में हुए सामूहिक दुष्कर्म के चार अपराधियों को मौत की सजा सुना दी गयी। देश भी तो यही चाहता था। जैसी क्रुरता, वैसी सज़ा। लेकिन इसी देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें यह सज़ा रास नहीं आयी और ऐसी मिर्ची लगी कि तमतमाकर रह गये। वैसे यह अच्छा हुआ। काले कोटधारी का भी काला सच सामने तो आया। उस दोपहर ढाई बजे माननीय जज ने जैसे ही चारों दरिंदों को फांसी की सज़ा सुनाई तो पूरे कोर्टरूम में तालियां बज उठीं। जज का यह कहना था कि अपराधियों ने क्रुरता की सारी सीमाएं तोड दीं। यह ऐसा अपराध है, जिसने समाज को हिलाकर रख दिया। ऐसे में अदालत आंख मूंदे नहीं रह सकती। समाज में सख्ती का संदेश जाना जरूरी है। इस खुशी और तसल्ली के माहौल में एक व्यक्ति ऐसा भी था जो गुस्से के मारे फडफडा रहा था। यह शख्स था बलात्कारियों का वकील, जिसका नाम है एस.पी.सिं‍ह। माननीय जज के द्वारा फैसला सुनाये जाने के बाद इस वकील ने गुस्से में जोर से मेज पर हाथ मारा। आंखें तरेरीं और जब जज बाहर जाने लगे तो यह महाशय चीखे -'यह सरासर अन्याय है। जज साहब आपने सत्यमेव जयते की जगह झूठमेव जयते का परचम लहराकर न्याय का गला घोटने का संगीन अपराध किया है।'
बलात्कारियों को सज़ा सुनाने वाले जज पर उंगलियां उठाने वाले बचाव पक्ष के इस वकील ने निर्भया के चरित्र पर भी अपने अंदाज से शर्मनाक तीर चलाये। उसने आपत्तिजनक बयान देकर देश और दुनिया को स्तब्ध कर डाला : ‘अगर मेरी बेटी इस तरह से किसी दोस्त के साथ फिल्म देखने जाती और रात में उसके साथ घूमती-फिरती तो मैं उसे अपने फार्म हाऊस में लाकर परिवार के सामने पेट्रोल छिडकर आग लगा देता।' दरअसल एस.पी.सिं‍ह नामक यह वकील उन लोगों का मुखिया है जो औरत को गुलाम समझते हैं और हिकारतभरी सोच रखते हैं। दरअसल, यह लोग रहते तो इक्कासवीं सदी में हैं पर इनकी मंशा पूरी की पूरी तालीबानी है। इनकी निगाह में महिलाएं ही व्याभिचारी हैं और पुरुष देवता। यही लोग पुरुष को तो खुले सांड की तरह विचरण करने की छूट देने की पैरवी करते हैं, लेकिन औरतों को अपने-अपने घरों के पिं‍जरों में कैद देखना चाहते हैं। यह कतई नहीं चाहते कि नारी पढे-लिखे और पुरुष की बराबरी करने का साहस दिखाए। इन्हें नारी की स्वतंत्रता शूल की तरह चुभती है। इनकी यही मंशा रहती है कि बहू-बेटियां इनके इशारों पर नाचें। भूल से भी बाहर न ताकें। यह अपने परिवार का एकमात्र सुप्रीमों कहलाना पसंद करते हैं। कथावाचक भी अपने प्रवचनी और आश्रमी संसार का सुप्रीमो है। सुप्रीम को एक नाबालिग के साथ दुष्कर्म करने में कोई लज्जा नहीं आयी। हर सुप्रीमो बेलगाम और लज्जाहीन हो जाता है। गलियों, सडकों-चौराहों और जलसों-जलूसों में छाती तानकर अहंकारी भाषा में भाषणबाजी करता है।
अपने घरवालों पर दुशासन करते-करते उद्दंड सुप्रीमो के हौसले बुलंद हो जाते हैं। इनकी गुंडागर्दी और दादागिरी इस कदर बढ जाती है कि आसपास के लोगों के साथ-साथ पूरे समाज में अपनी धाक जमाने में लग जाते हैं। जो इनकी नहीं सुनते, उन्होंने ठिकाने लगाने में भी यह देरी नहीं लगाते। यही लोग आनरकिलिं‍ग को बढावा देते हैं। इस किस्म के समाज सुधारकों और तथाकथित चरित्रवानों ने यह धारणा बना रखी है कि रेप के लिए सिर्फ और सिर्फ लडकियां ही जिम्मेदार होती हैं। उनका पहनावा अच्छे-भले इंसानों की नीयत को डांवाडोल कर देता है। शरीफजादो को अर्धनग्न युवतियां खुद-ब-खुद आमंत्रण देती हैं। बाद में शोर मचाती हैं। रूढि‍वादी और विषैली सोचवाले ऐसे लोग चाहते हैं कि युवतियां बंद गले के कपडे पहनें। उनके जिस्म का कोई भी हिस्सा दिखना नहीं चाहिए। इनकी निगाह में लडकियों की लडकों से दोस्ती बलात्कार की जननी है। जिन महिलाओ को अपनी अस्मत को बचाये रखना हो उन्हें न तो मॉडर्न कपडे पहनने चाहिए और न गैर पुरुषों के निकट जाना चाहिए। दोस्ती-यारी से तो कोसों दूर रहना चाहिए। यह देश अभी उतना विशाल हृदयी नहीं हुआ है जितना कि समझने की भूल की जा रही है। लडकियों को अपनी पसंद के ही लडकों से भूलकर भी शादी नहीं करनी चाहिए। यानी लव मैरिज भी घोर अपराध है। मां-बाप जिससे बांधे उसी को स्वीकार कर लेना चाहिए। किसी भी युवक से बात करने से पहले अपने परिवार के बडे-बुजुर्गों की राय और अनुमति भी अवश्य लेनी चाहिए। हिं‍दु संस्कृति का संरक्षक होने का दावा करने वाले इन चेहरों का मानना है कि नारियों को सीता को अपना आदर्श मानते हुए सति-सावित्री की तरह जीवन जीना चाहिए। अपने पति-परमेश्वर की तमाम रावणी प्रवृतियों को भी हंसते-खेलते झेलने की आदत डाल लेनी चाहिए...। ऐसा होने पर ही उनकी बेटियां पथभ्रष्ट होने से बच पायेंगी। सच तो यह है कि अपनी संतानो को विचारहीनता और संकीर्णता के दमघोटू वातावरण में सांसें लेने को विवश करने वाले ऐसे लोगों के दम पर ही खाप पंचायतें बेलगाम हैं और खुद को कानून से ऊपर मानती हैं। मनमाने फैसले सुनाकर सच्चे प्रेमियों की जानें तक ले लेती और दंगे करवाती हैं। कहीं न कहीं शासन और प्रशासन भी इनकी अनदेखी कर देता है। मामला वोटों का है इसलिए हुक्मरान भी चुप्पी साधे हैं...।

Thursday, September 12, 2013

मायावी संतों की ठगी के हैं बहुतेरे हिस्सेदार

यह अच्छा हुआ। जैसे-तैसे सच बाहर तो आया। आसाराम को भगवान मानने वालो का भ्रम तो टूटा। कई अंध भक्त अभी भी जागना नहीं चाहते। पता नहीं उनकी कौन-सी मजबूरियां हैं? यह शख्स हद दर्जे का सौदागर है। अपने भक्तों के साथ भी सौदेबाजी करना इसकी फितरत है। जिस किशोरी के साथ इसने दुराचार किया उसी के पिता ने इसका मुखौटा उतार डाला। वह अपना माथा पीटने को विवश है। उसे तो इस ढोंगी को बहुत पहले ही पहचान लेना चाहिए था। अंधश्रद्धा अंधेर का कारण बन गयी। बिटिया के भविष्य पर सवालिया निशान लग गये। पछतावे की आग में जलते पिता को बार-बार उस दोपहरी की याद हो आती है जब शातिर आसाराम ने अपने अनुयायियों की उपस्थिति में चुटकी बजाते हुए उससे कहा था कि बोल तुझे कितने रुपये चाहिए। अपने अराध्य के सवाल के पीछे छिपी महा दगाबाजी को वह समझ ही नहीं पाया था। उसे तो यही लगा था कि वे उसे उसकी गुरूभक्ति से प्रसन्न होकर पुरस्कृत करना चाहते हैं।
आसाराम ने तब यह कहा भी था कि यह मेरा सच्चा भक्त है। सच्चे भक्त के साथ ऐसा सलूक! समर्पित भक्त की बेटी पर भी रहम नहीं आया। कभी भी न मिटने वाले दंश और दाग दे डाले! कहावत है... 'डायन भी एक घर छोड देती है।' आसाराम से यह भी नहीं हो पाया! पीडि‍त किशोरी का भाई कहता है कि मैंने तो अपने पिता को कई बार मना किया था। अंधभक्त पिता माने ही नहीं। अपने अच्छे-खासे ट्रांसपोर्ट के व्यवसाय को नजर अंदाज कर आसाराम की सेवा में लगे रहे। पैसा और समय बर्बाद करते रहे। आसाराम का असली चेहरा सामने आते ही भाई का दिल दहल उठा। गुस्से के मारे वह पागल हो उठा। यह अंतहीन गुस्सा ही है जिसकी वजह से आसाराम के कृत्य से आहत किशोरी ने राज्य महिला कल्याण निगम की अध्यक्ष लीलावती के समक्ष अपने इरादे स्पष्ट करने में कोई संकोच नहीं किया। जब उससे यह पूछा गया कि अगर कानूनी लडाई लडते-लडते तुम्हारे पिता ने अपने घुटने टेक लिए तो तुम क्या करोगी? तमतमाई किशोरी का जवाब था : 'तब मैं इस वहशी बाबा को खुद गोली से उडा दूंगी। इस बाबा ने न जाने कितनी बेटियों के जीवन को बर्बाद किया है। जब तक इसे अपने दुष्कर्मों की सजा नहीं मिलेगी, मैं चैन से नहीं बैठूंगी।' क्रोध और अपमान की आग में झुलसी किशोरी की अथाह पीडा को उसके इस कथन से भी समझा और जाना जा सकता है : 'वह रात मेरे जीवन की भयावह काली रात थी...। ताउम्र नहीं भूल पाऊंगी वह घिनौना खेल जो मुझ पर कहर बनकर टूटा। आसाराम ने हमारे तमाम सपने चूर कर दिए। ऐसे वासनाखोरों को सबक सिखाने के लिए मैंने आईएस बनने की ठान ली है। कभी मेरा इरादा सीए बनने का था।'
आसाराम को जेल भेजे जाने के बाद कई लडकियां और भी सामने आयीं, जिनपर उसने गलत नजर डाली थी और अश्लील व्यवहार किया था। यह सिलसिला और लंबा चलने वाला है। लोगों की आस्थाओं के साथ खिलवाड करने वाले इस शख्स ने इतिहास ही कुछ ऐसा रचा है। इस काले इतिहास के कई पन्ने खुलने के बाद भी उसके कई भक्त ऐसे हैं जिन्हें यकीन ही नहीं हो रहा है। उनके लिए आसाराम आज भी भगवान हैं। इस घोर विवादास्पद भगवान के आश्रमों में चलने वाले गोरखधंधों और वहां के शाही ठाठबाट के नजारें भी कम हैरान करने वाले नहीं हैं। स्वयंभू संत के चेलों का आक्रामक होना भी बेहद चौंकाता है। कई आश्रमों पर चेलों ने पहरेदारी करनी शुरू कर दी है। मीडिया को देखते ही वे दादागिरी दिखाये लगते हैं। सभी आश्रमों में मीडिया का प्रवेश निषेध कर दिया गया है। फिर भी मीडिया वाले पहुंच ही जाते हैं। जबलपुर के आश्रम के मुख्य द्वार पर चेलों ने ताले जड दिये और यह गुरुमंत्र बुदबुदाते नजर आये : 'बापू हमारे बाप हैं, उनके खिलाफ मीडिया जो कर रहा है उसके कारण मीडिया का आश्रम में प्रवेश सख्त निषेध कर दिया गया है।' जब कुछ पत्रकार वहां पहुंचे तो उन्हें धमकाया-चमकाया गया : 'तुम लोग बापू की ताकत से वाकिफ नहीं हो इसलिए इतना शोर-शराबा कर रहे हो। हमारे बापू भी पत्रकार और सम्पादक हैं। उनके सम्पादन में कई पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है। पत्रिका 'ऋषिप्रसाद' का सर्कुलेशन लाखों में है। अकेले जबलपुर में ही इसके १६ हजार स्थायी ग्राहक हैं, जो तन, मन और धन से बापू के साथ हैं। ऐसे में आप लोग खुद अंदाजा लगा लिजिए कि इसी शहर में एक आवाज पर कितने लोग इकट्ठे हो सकते हैं और आप लोगों का दिमाग दुरुस्त कर सकते हैं।'
आसाराम के दम पर मालामाल हुए सेवक उसके लिए कुछ भी करने को तैयार दिखते हैं। शिवा नामक सेवक के पास २०० करोड की सम्पत्ति का होना इस रहस्य से पर्दा हटाने के लिए काफी है कि कुछ भक्त अपने 'देवता' के प्रति इतने समर्पित क्यों हैं। नागपुर, मुंबई, दिल्ली, छिं‍दवाडा, इंदौर, जबलपुर, जोधपुर आदि शहरों में आसाराम के आशीर्वाद से मालामाल हुए ऐसे सेवकों की सहज ही शिनाख्त की जा सकती है। जो आसाराम के मोटे-मोटे चंदों, फंदों, प्रवचनी कार्यक्रमों और आश्रमों की बदौलत फर्श से अर्श तक जा पहुंचे हैं। यह भी सच है कि इस किस्म के स्वार्थी भक्तों की बदौलत ही आसाराम भौतिक सुख-सुविधाओं का ऐसा विशाल साम्राज्य खडा करता चला गया, जिसकी सच्चाई बेहद विस्मित करने वाली है। बीते शनिवार को इंदौर के खंडवा रोड स्थित आसाराम के आश्रम का भव्यतम नजारा जगजाहिर हो गया। यह भी स्पष्ट हो गया कि जब भी उस पर कोई संकट आता तो वह इंदौर की दौड क्यों लगाता है। आसाराम जिस कुटिया में एकांतवास करता रहा उसकी भव्यता बडे-बडे रईसों के बंगलों को मात देती है। यह आलीशान कुटिया करीब पांच हजार वर्गफीट में बना ढाई मंजिला सर्व-सुविधायुक्त बंगला है, जहां आसाराम और उसके लाडले नारायण साई की रासरंग भरी लीलाएं चलती थीं। कुटिया में बना स्वीमिं‍ग पूल पिता-पुत्र के मौज मनाने के तौर-तरीकों का भी पर्दाफाश करता है। अब निर्णय लेने का सटीक वक्त आ गया है। देश में जहां-जहां आसारामों, सुधांशु महाराजों, नित्यानंदो और इच्छाधारियों जैसे मुखौटेधारियों ने आश्रमों, स्कूलों और कुटियाओं के नाम पर सरकारी जमीनें पायी हैं और अवैध कब्जे किये हैं उन पर फुटपाथ पर रहने वाले गरीबों को बसाया जाए। दिखावटी साधु-संतों को सरकारी खैरातें मिलनी बंद होनी चाहिए। यह कहां का इंसाफ है कि सफेदपोश ठगों को अरबों-खरबों की ऐसी जमीनें मुफ्त में दे दी जाएं जहां हजारों-लाखों बेघरों को बसाया जा सकता है और उन्हे खुले आसमान के आंधी-पानी और तमाम मुसीबतों से निजात दिलायी जा सकती है। यह तो सरासर अन्याय है। लोकतंत्र का अपमान है। धोखेबाजी है। अब इसे और बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। अगर मायावी संतों की जमीनें गरीबों और असहायों को नहीं दी जातीं तो रास्ते और भी हैं। सजग जरूरतमंदों के लिए इशारा ही काफी है। जब सीधी उंगली से घी न निकले तो उंगली टेडी करने में कोई हर्ज नहीं है...।

Thursday, September 5, 2013

इतने बुरे दिन...?

आसाराम ने हाथ-पैर तो खूब मारे पर बात बन नहीं पायी। आखिरकार उसे जेल जाना ही पडा। जेल जाने से पहले उसने कई नाटक किये। क्या कुछ नहीं कहा। धमकियां देने से भी बाज नहीं आया चतुर-चालाक कथावाचक। शासन और प्रशासन को डराता रहा। अपने अंधभक्तों को भी भडकाता रहा। पहले कहा कि एकांतवास के लिए जेल है अच्छी जगह। फिर बोल फूटे कि जेल भेजा गया तो शरीर त्याग दूंगा। जेल के अन्न-जल को हाथ भी नहीं लगाऊंगा। पुलिसिया पूछताछ में यह सवाल भी दागा कि पोती जैसी शिष्या के साथ एकांतवास गुनाह है क्या? अपनी गिरफ्तारी से ऐन पहले उसने राजस्थान सरकार को खुली धमकी दे डाली : मदहोश सरकार होश में आओ। ध्यान रखो कि कुछ ही महीने बाद प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। कोई आलाकमान तुम्हें बचा नहीं पायेगा। दुनिया के १६७ देशों में मेरे अनुयायियों की भरमार है। देश भर में फैले मेरे चार करोड भक्त तुम्हारा बाजा बजा सकते हैं। मुझे फंसाओगे तो हर हाल में चुनाव हार जाओगे। किसी फकीर को परेशान करना ठीक नहीं है।
खुद को कानून और अदालत से ऊपर समझने वाला आसाराम आखिर तक लुका-छिपी का खेल खेलता रहा। पीडि‍ता को लेकर द्विअर्थी टिप्पणी-दर-टिप्पणी भी जारी रही। दुनिया को नैतिकता का पाठ पढाने वाले वाचक ने नैतिकता की धज्जियां उडाकर रख दीं। आसाराम पर सरकार और राजनीतिक पार्टियां हमेशा मेहरबान रहीं हैं। इस बार भी उसे यकीन था कि अकूत दौलत और प्रभावशाली शिष्य उसके रक्षाकवच साबित होंगे। आसाराम के एक पुराने साथी जिनका नाम राजू चांडक है, कहते हैं कि उन्होंने राजस्थान में आसाराम को एक महिला के साथ संभोग करते देख लिया था, तभी से उससे घृणा हो गयी। ऐसे और भी कई आंखों देखे किस्से हैं। अहमदाबाद के कई लोगों का दावा है कि यह महापुरुष १९५९ में शराब का धंधा करता था। इसने शराब पीकर परशुराम नाम के व्यक्ति के साथ मिलकर एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी। यह वही आसाराम है जिसपर अहमदाबाद में ही १६ मामले दर्ज हैं। तंत्र साधना के लिए दो बच्चों की बलि देने और आश्रम के नाम पर सीधे-सादे लोगों की जमीने हडपने वाले इस शख्स ने आसुमल से आसाराम बापू तक का सफर जिस चालाकी के साथ तय किया उसका भी भंडाफोड हो गया है। कभी शराब का कारोबार करने वाले आसाराम की सौदागर प्रवृति का इससे बडा सबूत और क्या हो सकता है कि उसने अपने अनुयायियों की संख्या बढने के साथ-साथ अपने धंधो में भी विस्तार करना शुरू कर दिया। पहले आयुर्वेद की दवाओं का कारोबार फैलाया। फिर तरह-तरह के साबुन, शैम्पू, अगरबत्ती, फलो के जूस और पत्र-पत्रिकाओं की दुकानें सजाने और जमीने हथियाने का कीर्तिमान रच डाला।
आसाराम ने अपने धर्म के धंधे को जमाने के लिए एक किताब भी लिखी जिसका नाम है गुरुभक्ति। इस किताब में चतुर आसाराम ने अपने चेलों को सुझाया कि गुरू से कभी भी सवाल-जवाब मत करो। गुरू गलत हो तब भी चुप्पी साधे रहो। इतना ही नहीं उसने अपने शिष्यों को चेताया कि यदि शिष्य गुरू से सवाल-जवाब करता है या फिर गुरू के आदेशों की अवहेलना करता है तो उसके बुरे दिन आने में देरी नहीं लगती। एक दिन ऐसा भी आता है जब वह अपार कष्टों के तूफानों में घिर कर रह जाता है। आसाराम ने इस किताब में यह नसीहत भी दे डाली कि गुरू के आलोचकों के खिलाफ हिं‍सात्मक होना अपराध नहीं है। यानी गुरू जो कहे, जो करे, वही सही। बाकी सब बेकार और गलत। बहादुर आसाराम ने अपने सैनिकों का मनोबल बढाने के लिए यह भी लिखा कि यदि आलोचक दूसरे धर्म का हो तो उसकी जीभ तक काट डालो। नाबालिग से दुष्कर्म करने के पुख्ता आरोप के चलते जैसे ही स्वयंभू संत आसाराम की गिरफ्तारी हुई तो उसके चेले-चपाटे भडक उठे। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर एकत्रित होकर ट्रेनें रोक दीं। पीडि‍त लडकी के पिता को आसाराम के समर्थकों ने धमकी दी कि उनके गुरू के खिलाफ सीबीआई की जांच की मांग करने से बाज नहीं आए तो उनकी सात पुश्तें बर्बाद कर दी जाएंगी। खाकी वर्दी को भी खरीदने की कोशिश की गयी। इतना ही नहीं आसाराम के कई अंध-भक्त जोधपुर के अलग-अलग स्थानों पर मीडिया कर्मियों को मार-पीट, शांति भंग और धरना प्रदर्शन कर गिरफ्तार हुए और फिर अदालत के आदेश पर जेल भेज दिये गये, जहां आसाराम कैद हैं। उनकी इस गिरफ्तारी का एकमात्र मकसद अपने भगवान के निकट रहना और उनकी भरपूर सेवा करना है। इस महागुरु की गिरफ्तारी के बाद यह खुलासा हो गया है कि वे लडकियों से अकेले में मिला करते थे। यह उनका शौक था। बाबा रामदेव ने आसाराम का कांड सामने आने के बाद साधु-संतो को तुरंत यह सलाह दे डाली कि वे महिलाओं से एकांत में मिलने से बचें। काश! बाबा ने यह सुझाव पहले दिया होता तो कम से कम आसाराम को इतने बुरे दिन तो न देखने पडते...।

Thursday, August 29, 2013

नर-भेडि‍यों पर रहम क्यों?

पहले आप यह खबर पढ लें...
नई दिल्ली से पुणे जा रही इंडिगो की उडान में एक महिला ने अपने पति की धुनाई कर दी। लात और घूसों से पति परमेश्वर की पिटायी करने वाली महिला का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा था। वह चिल्ला-चिल्लाकर यात्रियों को बता रही थी कि इस कुकर्मी ने तो अपनी बेटी तक को नहीं बख्शा। यह वो दरिंदा है जिसे अपनी बेटी की अस्मत लूटने में कोई शर्म नहीं आयी। जब विमान में सवार यात्रियों और हवाई सुंदरियों ने महिला को ठंडा करने की कोशिश की तो उसका पारा और ऊपर चढ गया। उसकी तमतमाती पीडा इन शब्दों में मुखरित हो उठी- 'यह इंसान दिखने में तो बडा सीधा-सादा है। लेकिन इसकी घिनौनी हरकतें शैतान को भी मात देने वाली हैं। बेटी के साथ दुराचार करने वाला यह वहशी बाप कहलाने का भी हकदार नहीं है। खुद की बेटी को अपनी हवस का शिकार बनाने वाले इस नीच शख्स को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।' सुरक्षा रक्षकों ने जैसे-तैसे उस गुस्सायी मां को अलग सीट पर बिठाया। फिर भी वह गाली-गलोच कर अपनी भडास निकालती रही। पति पूरे सफर के दौरान चुपचाप सिर झुकाए बैठा रहा। दुनिया की कोई भी मां अपनी दुलारी बिटिया के साथ अशोभनीय व्यवहार बर्दाश्त नहीं कर सकती। फिर बलात्कार तो ऐसा पाप है जो जननी की रूह तक को कंपा और रूला कर रख देता है और वह चंडिका बनने में भी नहीं सकुचाती।
वैसे तो हर मां-बाप को बेटियां जान से प्यारी होती हैं। कुछ बाप ऐसे भी होते हैं जिनकी वासना उन्हें हैवान बना देती है। जहां आस्था और विश्वास के रिश्ते कलंकित होने लगते हैं वहां मानवता तो क्या देवी-देवताओं पर से भी विश्वास उठने लगता है। इंसानों और पशुओं में अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता है। देश के विख्यात कथा वाचक आसाराम पर देश की एक बेटी ने दुराचार का आरोप लगाया है। ७५ साल के तथाकथित संत के हाथों छली गयी बालिका की अंतहीन पीडा को झुठलाने की साजिशें की जा रही हैं। कोई भी लडकी बेखौफ होकर किसी बडी हस्ती पर ऐसे आरोप नहीं लगा सकती, जैसे आसाराम पर लगे हैं। देश की इस बहादुर नाबालिग बिटिया का कहना है कि बापू अनुष्ठान के बहाने उसे जोधपुर में मणाई स्थित आश्रम में पिछले दरवाजे से अपने कमरे में ले गये थे। उस समय अनुष्ठान के भ्रम में उसके माता-पिता कमरे के बाहर प्रार्थना कर रहे थे। वह तो आसाराम के पास जाना ही नहीं चाहती थी। परिवार वालों की अंधभक्ति ने उसे मजबूर कर दिया और वह तमाशा बन गयी। आसाराम के अंधभक्तों को १६ साल की लडकी छल-कपट और झूठ का प्रतिरूप लग रही है और उम्रदराज गुरू पूरी तरह से सीधा, सच्चा और पाक-साफ। कोई इन भक्तों से पूछे कि यदि उनकी बेटी के साथ ऐसा कुछ हुआ होता तो क्या तब भी वे चुप रह जाते। बापू के साथ खडे रह पाते? यह तो अच्छा हुआ कि लडकी बहादुर निकली। कमजोर होती तो आत्महत्या कर लेती और पूरे देश में हंगामा हो जाता। अपने देश में जिन्दा लोगों की उतनी नहीं सुनी भी जाती। स्वामी नित्यानंद के व्याभिचार के किस्सों को भी देशवासी अभी तक नहीं भूले हैं। कई महिलाओं से रिश्ते रखने वाले नित्यानंद को ५२ दिनों जेल की हवा खानी पडी थी। बाहर आते ही वह अपने प्रवचनों के धंधे में लग गया। भीड भी जुटने लगी। कुछ ढोंगी साधु-संतो के आश्रम आस्था के खंडहर बनते चले आ रहे हैं। मुंबई की शक्ति मिल भी खंडहर में तब्दील हो चुकी थी। इसी उजाड खंडहर में २२ वर्षीय फोटो पत्रकार सामूहिक दुष्कर्म का शिकार हो गयी। पांच हैवानों की यातना के दंश झेलने के बाद भी युवती का हौसला बरकरार है। यही इस देश की नारी की असली पहचान है। उसका कहना है दुष्कर्म के कहर से जिन्दगी खत्म नहीं होती। उसकी बस यही तमन्ना है कि बलात्कारियों को ऐसी कठोरतम सजा मिले कि वे दोबारा किसी महिला की ओर बुरी निगाह डालने के काबिल ही न रहें।
कुछ महीने पूर्व जब चलती बस में दामिनी पर बलात्कार की खबर से देश दहल उठा था। तब लोग सडकों पर उतर आये थे। हर किसी ने बलात्कारियों को फांसी पर लटकाने की मांग की थी। जिस तरह से सरकार ने बलात्कारियों के प्रति कडे तेवर अपनाने का ऐलान किया था उससे तो यही लगा था कि बलात्कार थम जाएंगे। पर बलात्कारों का तो सिलसिला-सा चल पडा। यह बात भी तय हो गयी है कि बलात्कारी न तो जनआक्रोश से भयभीत होते हैं और न ही कानून से। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ लोगों को अपनी मर्यादा खोने में फख्र महसूस होता है। जहां पिता ही बेटी की अस्मत का लुटेरा बन जाए और गुरू तथा साधु-संत ही बलात्कारी के चोले ओढने लगें वहां पर कानून को और धारदार होना ही पडेगा। जैसे को तैसे की भूमिका अपनानी ही पडेगी। बलात्कारी चाहे कोई भी हो उसे बिना कोई रियायत दिए फौरन मौत की सजा दी ही जानी चाहिए। यही समय की मांग है। बलात्कारियों के प्रति लोगों में इतना अधिक गुस्सा है कि वे कुछ भी कर सकते हैं। लोग अब कहने भी लगे हैं कि देश में तभी बलात्कार रूकेंगे जब नामी-गिरामी बलात्कारियों को भरे चौराहों पर खडा कर कुत्ते की मौत मारा जायेगा। इनका ऐसा हश्र देखकर आम अपराधी भी सुधरेंगे और बलात्कार करने का जौहर दिखाने से बाज आएंगे।

Thursday, August 22, 2013

नायक और खलनायक

प्याज तो बहुत छोटी चीज़ है। सत्ता के लिए यह कुछ भी कर सकते हैं। वैसे भी नाटक करने में इनका कोई सानी नहीं है। बडे ही सिद्धहस्त कलाकार हैं ये। डबल रोल करने में भी माहिर हैं। कई तो ऐसे भी हैं जो खलनायक होने के बावजूद भी हमेशा नायक का चोला धारण किये रहते हैं। बरसाती मेंढक भी अपने-अपने रंग में आ जाते हैं। चुनावी मौसम के आते ही देशभर में इनकी उछलकूद शुरू हो जाती है। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली इनका बेहद पसंदीदा मंच है। देश भर के दर्शकों की निगाहें भी तो दिल्ली के इसी भव्य मंच पर टिकी रहती हैं।
मंच पर इन दिनों तरह-तरह के नाटक मंचित हो रहे हैं। मंच पर दूकाने सजी हैं। प्याज के ढेर लगे हैं। जोकरों के हाथों में तराजू हैं। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित पचास रुपये किलो में प्याज बेच रही हैं। भाजपा के विजय गोयल और आम आदमी पार्टी के अरविं‍द केजरीवाल अपने चुनावी प्याज चालीस रुपये किलो में बेच रहे हैं। तय है कि ज्यादा भीड इन्हीं दोनों स्टालों पर है। लोग धडाधड प्याज खरीद रहे हैं। शीला को गुस्सा आ रहा है। चिं‍तित भी हैं। चिं‍तन-मनन कर रही हैं। कमबख्त लुटिया डुबोने पर तुले हैं। पर मैं इनकी दाल किसी भी हाल में गलने नहीं दूंगी। देखती हूं कितने दिन तक घाटा खाकर प्याज बेचते हैं। एक-एक को नानी याद दिला दूंगी। आखिर दिल्ली में मेरी सरकार है। अपनी सल्तनत को यूं ही नहीं लुटने दूंगी। इन्हें मात देने के लिए सारी सरकारी तिजोरियां खोल दूंगी। यह लोग अगर बाज नहीं आए तो मुफ्त में प्याज के साथ-साथ दूसरी सभी सब्जियां बांटने से भी नहीं चूकूंगी। यह थके हुए खिलाडी क्या जानें सत्ता की ताकत।
भाजपा के लिए तो यह बदला लेने का बेहद अच्छा मौका है। वह यह कैसे भूल सकती है कि १९९८ में इसी प्याज की वजह से ही उसने शीला दीक्षित से मात खायी थी और अपनी सत्ता गंवानी थी। आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो केजरीवाल को भी प्याज के आसमान छूते दामों ने सत्ता पाने के भ्रम का शिकार बना दिया है। उन्हें भी इतिहास के दोहराये जाने का यकीन है। उन्हें यह भी भरोसा है कि इस बार सिर्फ और सिर्फ उनकी ही किस्मत का ही ताला खुलने वाला है। कांग्रेस और भाजपा आपस में लड मरेंगे और दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनेगी।
चुनावों में जीत का सेहरा बांधने को लालायित कई नेता टोटकेबाजी और भ्रम के भंवर में डूबे हैं। यह लोग देशवासियों को भी भ्रम का शिकार बनाये रखना चाहते हैं। इनके चेहरे पर लुभावने मुखौटे सजे हुए हैं। भ्रम जब कभी फलदायी हो जाता है तो उसके साथ विश्वास भी जुड जाता है। यह विश्वास धीरे-धीरे अंधविश्वास में तब्दील हो जाता है। अंधविश्वास ने इस देश का कितना कबाडा किया है और किस कदर अपराधों को जन्म देने का सिलसिला बनाये रखा है उससे सभी सजग भारतवासी वाकिफ हैं। पर नेताओं को इससे कोई फर्क नहीं पडता। मरना तो उन्हें पडता है जिन्हें अंधविश्वासियों के दिलों में जडे जमा चुकी तूफानी आस्था के खात्मे के लिए खुली जंग लडनी पडती है...।
दरअसल देश का आम आदमी लुटे-पिटे दर्शक की मुद्रा में है। उसे सत्ता के कुछ लुटेरों ने भरे बाज़ार लूट लिया है। नेता और मुनाफाखोर दोनों मजे में हैं। प्याज की जमाखोरी करने वाले कई सफेदपोश नेतागिरी के धंधे के भी सिकंदर हैं। किसी का कांग्रेस से तो किसी का भाजपा आदि... आदि से टांका भिडा है। इस देश के गरीब के पास न तो खाने के लिए पैसे हैं, न ही दवाओं को खरीदने के लिए। जीवनरक्षक दवाएं तो अब उसके लिए सपना होने जा रही हैं। बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों ने मुंह मांगी कीमतों पर भारतीय दवा कंपनियों को खरीदने का अभियान तेज कर दिया है। ऐसे में दवाएं कितनी महंगी होंगी और जिं‍दगियां कितनी सस्ती हो जाएंगी इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। आठ सौ करोड रुपये से ज्यादा की कीमत की भारतीय दवाओं पर विदेशी कंपनियों का कब्जा होने जा रहा है। सरकार बेबस है। देश का रुपया लगातार गिर रहा है। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया है। महंगाई अपनी चरम सीमा को पार कर चुकी है। देश दिवालिया होने के कगार पर है। घपले-घोटाले करने वाले आनंदित हैं। उनके कुकर्मों की फाइलें गुम होने लगी हैं। यह कोई नयी बात नहीं है। भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए बडी-बडी ताकतें अपना काम करती रहती हैं। साजिशें चलती रहती हैं। जब हाथ की सफाई कारगर नहीं हो पाती तो उस कार्यालय को ही राख कर दिया जाता है जहां फाइलें सजी होती हैं। कोयला घोटाले की कई फाइलें गायब हो गयी हैं। इन फाइलों को पहिये नहीं लगे थे। तय है कि नौकरशाहों, नेताओं और उद्योगपतियों ने ही यह खेल खेला है। इस पूरी की पूरी जमात को ऐसे खेल खेलने का बडा पुराना तजुर्बा है। इन डकैतों के गिरोह में कुछ मीडिया दिग्गज भी शामिल हैं। यह मीडिया के वो मक्कार चेहरे हैं जिनका पूरा कालाचिट्ठा खुलना अभी बाकी है।  सत्ताधीश भी नहीं चाहते कि ऊंचे लोगों पर कोई आंच आए। चुनाव सिर पर हैं। करोडों-अरबों का मोटा चंदा भी तो इन्हीं से मिलता है... इन्हें नाराज करने का जोखिम कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं उठाना चाहती।

Wednesday, August 14, 2013

कैसी आज़ादी... किसकी आज़ादी?

१५ अगस्त २०१३। राष्ट्रीय साप्ताहिक 'विज्ञापन की दुनिया' की १७ वीं वर्षगांठ। जिस निष्पक्ष और निर्भीक अखबार को देखते ही देखते लाखों सजग पाठकों ने हाथों-हाथ लिया हो और पूरी आत्मीयता के साथ अपनाया हो उसके बारे में ज्यादा लिखने की वैसे तो कोई गुंजाइश नहीं बचती। लेकिन मामला वर्षगांठ का है। यानी मौका भी है और दस्तूर भी इसलिए दिल की बात कहने का इससे अच्छा कोई और अवसर हो भी तो नहीं सकता। वैसे भी अभी तक जहां पर 'विज्ञापन की दुनिया' पहुंचा है, वह मंजिल नहीं पडाव मात्र है।
१५ अगस्त १९९६ के शुभ दिन 'विज्ञापन की दुनिया' की यात्रा की शुरुआत हुई। स्वतंत्रता दिवस के पर्व पर ही इस अखबार के प्रकाशन के पीछे और भी कई उद्देश्य थे। धन्नासेठों के अखबारों में नौकरी करते-करते और उनके दांवपेचों को देखते-समझते यह बात तो समझ में आ गयी थी कि पत्रकारिता को पतित करने की कैसी-कैसी साजिशें रची जा रही हैं। राजनेताओं और भिन्न-भिन्न माफियाओं के इशारों पर चलने वाले तथाकथित बडे-बडे अखबार अपने आकाओं की आरती गाने के सिवाय और कुछ नहीं कर रहे हैं। उद्योगपतियों, बिल्डरों और नेताओं के अखबारों के प्रकाशन का एकमात्र उद्देश्य दौलत कमाना तथा सरकार और जनता को बेवकूफ बनाना है। खुद को बुद्धिजीवी और प्रगतिशील कहने वाले सम्पादकों को बाजारी और अंगूठा छाप मालिकों की जी हजूरी करते देख बहुत पीडा होती थी। मोटी तनख्वाह के लालच में उनके दडंवत होने के शर्मनाक अंदाज को देखकर गुस्सा भी आता था। हालात आज भी पूरी तरह से नहीं बदले हैं। ऐसे हालातों में निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता की कल्पना ही नहीं की जा सकती। हां... राज्यसभा का सदस्य जरूर बना जा सकता है। करोडों के सरकारी ठेके हथियाये जा सकते हैं। कौडिं‍यों के मोल सरकारी जमीनों की खैरात पायी जा सकती है। स्कूल, कालेज और दारू की फैक्टरियां खोलने के लायसेंस बडी आसानी से प्राप्त किये जा सकते हैं। सरकारी जमीनों को कौडिं‍यों के मोल हासिल करने में भी कोई अडचन नहीं आती। लगभग मुफ्त में पायी गयी इन लम्बी-चौडी जमीनों पर भव्य व्यावसायिक इमारतें खडी कर अरबों-खरबों के वारे-न्यारे किये जा सकते हैं। अब तो कुछ मीडिया दिग्गज दलाली भी करने लगे हैं। पिछले दिनों देश के दो अखबार मालिकों ने हजारों करोड की कोयला खदाने हथिया कर अपने जबरदस्त दमदार होने का सबूत पेश कर दिया है। आम आदमी कल्पना भी नहीं कर सकता कि कारोबारी अखबारीलाल अखबारों की आड में कितने काले-पीले धंधों को अंजाम देते हैं। सरकारी तंत्र को यह ताकतवर लोग अपनी उंगलियों पर नचाते हैं। नचैयों की भी अपनी कमजोरियां और मजबूरियां होती हैं। पत्रकारिता के ऐसे दुखद और दमघोंटू माहौल में 'विज्ञापन की दुनिया' के प्रकाशन का निर्णय लिया गया। देशभर के सजग पाठकों के बीच अपनी छाप छोडने में इस साप्ताहिक को ज्यादा समय नहीं लगा। हमारी कल्पना से भी कहीं बहुत ज्यादा लोग इससे जुडते चले गये और कारवां बनता चला गया। ऐसे में हमारा विश्वास और भी पुख्ता हो गया कि पाठक ऐसे अखबारों को कतई पसंद नहीं करते जो अपने धंधे चमकाने की पत्रकारिता करते हों। जिनपर किसी राजनीतिक पार्टी का ठप्पा लगा हो। सजग पाठक सिर्फ और सिर्फ ऐसी कलम के पक्षधर हैं जो बेखौफ हो और किसी भी कीमत पर बिकने को तैयार न हो। सरकारी विज्ञापनों के लिए सरकार के हर गुनाह की अनदेखी करने वाले अखबारों को पहचानने में भी सजग पाठक देरी नहीं लगाते। फिर भी वे ऐसे अखबारों को इसलिए भी ताउम्र खरीदते रहते हैं क्योंकि महंगाई के जमाने में भी यह डेढ-दो रुपये में मिल जाते हैं। रद्दी में बेचने पर भी फायदा हो जाता है। ऐसे अखबारों के मालिकों को तो मुफ्त में भी अखबार बांटने से कोई फर्क नहीं पडता। सरकार की आखों में धूल झोंककर अधिकतम कीमत पर विज्ञापन हथियाने के लिए धन्नासेठ ऐसे ही फंडे अपनाते हैं। मुफ्त में अखबार बांटते हैं और उसे बिक्री में दर्शाकर अपना सर्कुलेशन बढाते हैं। इससे काली कमायी भी सफेद हो जाती है। अखबार के अलावा भी इनके कई धंधे होते हैं। मंत्रियों और नेताओं की जेबों से निकाली गयी रकम को भी तो सफेद करना होता है।
राष्ट्रीय साप्ताहिक 'विज्ञापन की दुनिया' केवल अपने पाठकों और शुभचिं‍तकों की बदौलत ही भ्रष्टाचारियों की नींद हराम करता चला आ रहा है। सिद्धांतों से समझौता करना इसने सीखा ही नहीं। गलत को सही बनाने का खेल इसे नहीं भाता। बडे से बडे तुर्रमखां के आगे झुकना भी इसके उसूल के खिलाफ है। शासकों के तलवे चाटने वालो से नफरत करने वाले 'विज्ञापन की दुनिया' ने कभी भी शासकों के दरबार में हाजिरी नहीं बजायी। हमें अपने साथ-साथ अपने उन लाखों पाठकों के मान-सम्मान और स्वाभिमान की सदैव चिन्ता रहती है। उनके अपार विश्वास को हम कभी भी ठेस नहीं पहुंचने देंगे। यह हमारी प्रतिज्ञा भी है और वायदा भी।
१५ अगस्त २०१३...। भारतवर्ष की आजादी की ६६वीं वर्षगांठ। क्या होते हैं ६६ वर्ष के मायने? इसका जवाब शासक तो देने से रहे जिन्होंने सतत भ्रष्टाचार के कीर्तिमान रचे और भारत माता की आत्मा को आहत-दर-आहत किया। अब तो देशवासियों को जाग ही जाना चाहिए। कब तक बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी, शोषण, लूटमारी, अनाचार, व्याभिचार, माफियागिरी और महंगाई के दंश पर दंश झेलते रहेंगे? हिन्दुस्तान से भी छोटे कई देश दस-बीस साल में कहां से कहां पहुंच गये और यह विशालतम देश हाथों में भीख का कटोरा थामे लगभग वहीं का वहीं खडा है। इस देश के नेता यही मानकर चल रहे हैं कि चंद लोगों के अरबपति-खरबपति बन जाने से मुल्क की तस्वीर बदल गयी है। गरीबी का खात्मा हो गया है। देश में चारों तरफ खुशहाली ही खुशहाली है। देश को हांकने वाले नेता अंधे तो कतई नहीं हैं। यह तो हद दर्जे के शातिर और चालाक हैं। आम जनता को हर हाल में भ्रम के भंवर में फंसाये रखना चाहते हैं। यह सतत अपने मकसद में कामयाब भी होते चले आ रहे हैं। जिस दिन हम और आप पूरी तरह से जाग जाएंगे तब इनकी हस्ती मिटते देर नहीं लगेगी। कब जागेंगे हम-सब?
समस्त देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।