Thursday, November 28, 2013

भेडीये होंगे बेनकाब

विचारों की आंधी कहीं थमने का नाम नहीं लेती। सोचो तो सोचते ही रह जाओ। आखिर यह क्या हो रहा है? कैसे-कैसे मंजर सामने आ रहे हैं! यह तो सरासर रिश्तो का कत्ल है। हत्यारे कोई और नहीं, अपने ही हैं। अपनी इकलौती बेटी आरुषि की निर्मम हत्या के आरोप में पिता डॉ. राजेश तलवार और मां डॉ. नूपुर को उम्रकैद की सजा सुनाये जाने की खबर सुनते ही देश के लाखों लोग हतप्रभ रह गये। एक पत्नी ने अपने पति का साथ देकर पतिव्रता का तो धर्म निभाया, लेकिन मातृत्व के धर्म को भूल गयी! इस डरावने सच ने न जाने कितने संवेदनशील भारतवासियों को आहत कर डाला। मां-बाप और बच्चों के बीच के रिश्ते में तो अपार मिठास होती है। हर बेटी अपने पिता के बेहद करीब होती है। जन्मदाता का दुलार, प्यार और वात्सल्य उसकी जडों को सींचता, संवारता और संस्कारित करता है। लगता है आरुषि इस मामले में बदकिस्मत थी। उसे भटके और बहके हुए मां-बाप मिले। जिनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य था मौजमस्ती... भोग विलास। अपनी बेटी की अच्छी परवरिश के लिए उनके पास वक्त ही नहीं था। उसे सहेलियों, नौकरों और इंटरनेट की अश्लील दुनिया के हवाले कर दिया गया। नौकर ने माता-पिता की कमजोरी भांप ली। नादान १४ वर्षीय आरुषि उसके जाल में फंस गयी। मदहोश मां-बाप को भनक भी नहीं लगी। १५-१६ मई २००८ के रात बारह से एक बजे के बीच जब डॉ. राजेश तलवार ने अचानक अपनी मासूम बेटी को उम्रदराज नौकर हेमराज के साथ हमबिस्तर देखा तो उनका खून खौल उठा। गुस्से से भरे पिता ने पहले तो बेटी और नौकर के सिर पर गोल्फ स्टिक मारी, फिर बाद में सर्जिकल ब्लेड से दोनों का गला काट दिया। यह पूरी मार-काट मां की आंखों के सामने हुई। दोनों ने मिलकर आरुषि के कपडे ठीक किए और सारे सबूत मिटाये। कानून ने पुख्ता सबूतों के आधार पर अपना काम कर दिया है। कई लोग ऐसे हैं जिन्हें यह सज़ा रास नहीं आयी। वे तो यह मानने को तैयार ही नहीं हैं कि कोई मां-बाप अपनी ही बेटी को मौत के घाट उतार सकते हैं। कत्ल तो नौकर का भी हुआ पर उसकी मौत का किसी को कोई मलाल नहीं।
दरअसल यह ऑनर किलिं‍ग है। इज्जत के नाम पर हरियाणा और उत्तरप्रदेश में प्रेमी-प्रेमिकाओं की हत्याओं का बेखौफ होकर इतिहास रचने वालों की राह पर चलते हुए ही आरुषि और हेमराज की हत्या को अंजाम दिया गया। बेटे-बेटियों को जिन्दा जमीन में गाढने और फंदे पर लटकाने के फरमान सुनाने वाली खाफ पंचायतों को एक पढे-लिखे मां-बाप ने भी अपना आदर्श मानने में संकोच नहीं दिखाया। यह सच्चाई हिलाने और रुलाने वाली तो ही है, कई सवाल भी खडे करती है। यह किसी प्रेमी-प्रेमिका का मामला नहीं है। यह तो एक मौकापरस्त नौकर की दगाबाजी की जीती-जागती तस्वीर है। यहां तो बेटी के भटकाव की असली वजह खुद मां-बाप ही हैं जिन्होंने बेटी को जन्म तो दिया, पर उसकी देखभाल नहीं कर पाये। अपनी बेटी को विश्वासघाती नौकर के साथ आपत्तिजनक हालत में देखकर उन्होंने आपा खो दिया। यकीनन नशे में रहे होंगे। होश में होते तो बेटी को समझाते। नौकर को सजा देने के लिए कानून का सहारा लेते। एकाएक आवेश में आकर ऐसे दोहरे हत्याकांड को अंजाम न देते जो आत्मीय रिश्तों को शर्मसार कर उनके परखचे ही उडा देता। हेमराज तो एक अनपढ, अहसानफरामोश नौकर था जिसने अपने मालिक से दगाबाजी की। तहलका के सम्पादक तरुण तेजपाल ने एक नामी शख्सियत होते हुए भी जो कुकर्म किया है क्या वह किसी भी तरह के बचाव और माफी के लायक है? इसमें कोई शक नहीं कि तरुण तेजपाल खोजी पत्रकारिता के नायक रहे हैं। उन्होंने अपने खुफिया कैमरो से कई नेताओं, खिलाडि‍यों और सत्ता के दलालों को बेनकाब किया। उनकी उपलब्धियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इन उपलब्धियों के ऐवज में उन्हें दुराचार करने की खुली छूट तो नहीं दी जा सकती। शराबी पत्रकार-सम्पादक ने अपनी सहयोगी पत्रकार की आबरू लूटने का जो घोर दुष्कर्म किया है उससे उनकी सारी की सारी महानता गर्त में समा गयी है। वे किसी को मुंह दिखाने लायक भी नहीं बचे हैं। सौदेबाज सम्पादक तेजपाल ने जिस युवती का यौन उत्पीडन किया वह उनके मित्र की बेटी है और उनकी बेटी की परम सहेली है। यानी यहां भी रिश्ते का कत्ल और घोर विश्वासघात! जिसकी सुरक्षा की जानी चाहिए थी, तेजपाल उसी की अस्मत लूटने पर उतारू हो गये। एक काबिल सम्पादक का यह कैसा व्याभिचारी रूप है? कहीं ऐसा तो नहीं कि इधर-उधर मुंह मारना इस लम्पट की फितरत है। पत्रकारिता का तो महज उसने नकाब ओढ रखा था, जिसकी बदौलत उसने उत्तरप्रदेश के कुख्यात कारोबारी पोंटी चड्डा जैसों के साथ विभिन्न धंधो में साझेदारी की और अरबों की माया जमायी। उसकी बेटी ने भी स्वीकार किया है उसने अपने पिता को तब किसी नवयौवना के साथ रंगरेलियां मनाते देखा था जब वह मात्र तेरह साल की थी। अपनी ही बेटी के सामने बेनकाब हो चुके तेजपाल प्रगतिशील पत्रकार कहलाते हैं। उनकी लीक और सीख पर चलने वालों की भी खासी तादाद है। अपनी बेटी की उम्र की लडकी को अपनी अंधी वासना का शिकार बनाने वाले खोजी सम्पादक की हर तरफ थू...थू हो रही है। ऐसे में कवि मुकेश कुमार मिश्र की कविता काबिलेगौर है:
कि इस शहर का
एक भेडि‍या प्रायश्चित कर रहा है...
कुछ लोग उसके साहस की
प्रशंसा कर रहे हैं...
कुछ लोग इन्टर्नल
बताकर मामले को दबा रहे हैं
कुछ लोग सेकुलर ढंग से
इस मुद्दे को सुलझा रहे हैं...
क्यों????
क्योंकि भेडि‍या 'लाल' है
क्यों????
क्योंकि भेडि‍या भेदिये का काम कर
'किसी को' तख्त दिलायेगा...
लेकिन भेडि‍या
लाल भेडि‍या
खूनी दरिंदा भेडि‍या
नहीं जानता कि
अब भेडि‍ये भीड में भी पहचाने जाएंगे
अपनी मांद से बाहर निकाले जायेंगे
कि भेडि‍या नहीं जानता कि
अपनी खाल बचाने के लिए जिस 'खोल'
को उसने ओढ रखा है...
अब जनता चुन-चुन कर
उन एक-एक धागों को तार-तार करेगी
अब इन लाल भेडि‍यों को बेनकाब करेगी...।

Thursday, November 21, 2013

भाई-भतीजावाद की राजनीति

यह अपना देश हिन्दुस्तान ही है, जहां असंतुष्ट और बेचैन आत्माओं की लम्बी कतारें लगी हैं। शोर मचता है, काम होता नहीं। दरअसल देश कई संकटों से जूझ रहा है। चरित्र के चित्र धुंधला गये हैं। आदर्शों का बडा टोटा है। महात्मा गांधी की इस धरा पर ईमानदार और चरित्रवान नेताओं की कमी के चर्चे सरहदें पार कर चुके हैं। युवाओं को दूर-दूर तक ऐसा कोई नेता नजर नहीं आता जिसके पदचिन्हों पर गर्व के साथ चला जा सके। वाकई युवा पीढी असमंजस में है। उसे कुछ सुझता ही नहीं। ऐसे में उन्हें फिल्मी सितारे और क्रिकेटर ही अपने असली नायक प्रतीत होते हैं।
राजनेताओं को यह बात बडी खलती है। उन्हें पहले सी इज्जत मिलनी बंद हो गयी है। जिसे देखो वही दुत्कारने वाली निगाह से देखने लगा है। मीडिया और दूसरे क्षेत्रों के दिग्गजों के भी कुछ ऐसे ही हाल हैं। तहलका के सम्पादक तरुण तेजपाल एक युवती के यौन शोषण के चलते कटघरे में हैं। ऊंची-ऊंची झाडने और इस-उस का स्टिंग आप्रेशन कर खुद को पत्रकारिता का एकमात्र चरित्रवान महारथी बताने वाले तरुण के चेहरे का सारे का सारा चरित्र और 'तेज' गायब हो गया है। यह कोई इकलौता मामला नहीं है। राजनेताओं के साथ गठबंधन कर माल बनाने वाले पत्रकारिता के कई दलाल बेनकाब हो चुके हैं। सबकी कलई खुल चुकी है। फिर भी जहां देखो वहां पुरस्कार पाने, दिलाने और हथियाने की होड मची है। देश और दुनिया के जाने-माने क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर और प्रोफेसर सी.एन.राव को भारतरत्न घोषित करने के बाद देश के इस सर्वोच्च सम्मान पर सियासत करने वालो के झुंड भी नजर आने लगे हैं। किसी ने कहा कि इसके असली हकदार तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी हैं, तो किसी-किसी ने हाकी के जादूगर ध्यानचंद, तो कुछ ने और भी अपने मनचाहे नामों की वकालत कर डाली। जदयू नेता शिवानंद को सचिन को भारतरत्न देने के फैसले ने जैसे आग-बबूला कर दिया। उन्होंने फरमाया कि मेरी समझ में नहीं आ रहा कि ध्यानचंद को नजरअंदाज कर सचिन को भारतरत्न क्यों दिया गया। ध्यानचंद ने जब देश का मान बढाया तब उन्हें खास सुविधाएं नहीं मिलती थीं। सचिन मुफ्त में तो नहीं खेलते। उन्हें खेलने के ऐवज में करोडों रुपये मिलते हैं। नेताजी से कोई यह तो पूछे कि क्या आप लोग फोकट में राजनीति करते हो। क्या आपकी बिरादरी थैलियां नहीं समेटती? इसमें दो मत नहीं हो सकते कि अटल बिहारी वाजपेयी भारतरत्न के बेहद काबिल अधिकारी हैं। उनकी आदर्श छवि ने करोडों देशवासियों का दिल जीता है। वे बेहतरीन प्रधानमंत्री थे। इसके साथ ही वे ऐसे निर्विवाद आदर्श चरित्रधारी हैं जिनसे युवा वर्ग प्रेरणा लेता आया है और लेता रहेगा। इस महापुरुष को तो भारतरत्न के सम्मान से नवाजने में किसी किस्म की राजनीति नही की जानी चाहिए थी। पर अपने देश में तो हर मामले में राजनीति होती है। चरित्रवान और ईमानदार चेहरों की जानबूझकर अनदेखी की जाती है।
दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश में यह जरूरी भी नहीं कि हर राजनेता हर किसी की पहली पसंद हो। फिर भी अटल बिहारी वाजपेयी पर उंगली उठाने वाले कम ही मिलेंगे। जिस उदार मन से उन्होंने राजनीति का सफर तय किया उसका कोई सानी नहीं है। सभी पुरस्कारों पर एक ही परिवार का तो एकाधिकार क्यों है, इस सवाल का जवाब भी देशवासी चाहते हैं।
अटल जी की तरह सचिन ने करोडों लोगों के दिलों में अमिट छाप छोडी है। २४ साल के अपने क्रिकेट करियर में सचिन ने ऐसे-ऐसे कीर्तिमान रचे कि युवा तो युवा देश का हर वर्ग उनका दिवाना हो गया। सचिन की ऐतिहासिक सफलता की कहानी से हर कोई सबक ले सकता है। सफलता के शिखर पर पहुंचने के बाद भी अहंकार उन्हें छू भी नहीं पाया। सचिन ने तारीफों के साथ-साथ आलोचनाओं की बौछारे भी झेलीं। तब भी वे कभी विचलित नहीं हुए। उनका उत्साह और आत्मविश्वास सतत बना रहा। सचिन ने इस तथ्य को और भी पुख्ता कर दिया है कि कडी मेहनत और अटूट लगन की बदौलत कुछ भी हासिल किया जा सकता है। सिर्फ सपने देखने से कुछ हासिल नहीं होता। जो परिश्रम करता है वह अपनी मनचाही मंजिल तक पहुंचता ही है। सचिन तेंदुलकर को उनकी कर्तव्यनिष्ठा, विनम्रता और सौम्यता का जो पुरस्कार मिला है, उससे सबक लेने की जरूरत है न कि आलोचना करने की। जो लोग यह सोचते हैं कि सचिन देश के इस सर्वोच्च सम्मान के काबिल नहीं हैं, उनके बारे में कुछ भी कहना और लिखना व्यर्थ है। सभी को अपनी बात कहने की आजादी है। इस आजादी का मनचाहा दुरुपयोग करने वाले भी ढेरों हैं। इस देश के लोकतंत्र की कमान राजनेताओं के हाथ में है। वही पूरी व्यवस्था चलाते हैं। देश को चलाने वालो की नीयत में अगर खोट नहीं होता तो राम मनोहर लोहिया और अटल बिहारी वाजपेयी को तो कब का भारतरत्न के सम्मान से नवाजा जा चुका होता। दरअसल, राम मनोहर लोहिया को तो खुद समाजवादियों ने ही भूला दिया। उन्होंने लोहिया के सच्चे अनुयायी होने को नगाडा बजाकर सत्ता का तो भरपूर सुख भोगा पर अपने आदर्श (?) को भारतरत्न देने की पुरजोर मांग कभी भी नहीं उठायी। चाहे मुलायम हों, लालू हों या फिर नीतीश, सबके सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। जिस तरह से कांग्रेसियों ने महात्मा गांधी के नाम का सिक्का भुनाया उसी तरह का रास्ता तथाकथित लोहियावादियों ने अपनाया। रहा सवाल हॉकी के जादूगर ध्यानचंद को भारतरत्न देने का तो हमारे यहां क्रिकेटरों को जो सम्मान और नाम मिलता है, हाकी के खिलाडि‍यो को नहीं मिल पाता। क्रिकेटरों को तो भगवान बना दिया गया है और बाकी किसी भी खेल के धुरंधर की कभी कोई परवाह ही नहीं की जाती। यह परिपाटी तभी टूटेगी जब इस देश की आम जनता जागेगी।

Thursday, November 14, 2013

बचकानी और घटिया बयानबाजी

नेता डरे हुए हैं। चुनाव सिर पर हैं। बेचारों की नींद गायब है। प्रचार करना भी जरूरी है। घर से बाहर निकले बिना काम नहीं चलने वाला। जीत-हार की चिं‍ता तो अपनी जगह है। जबसे मोदी की रैली में बम फटे हैं, तभी से उन्हें अपनी जान भी खतरे में नजर आने लगी है। आतंकियों के बमों की सलामी झेलने के बाद नरेंद्र मोदी की पार्टी भी दहशत की गिरफ्त में है। भाजपा की तरफ से मोदी को वैसी ही सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध करवाये जाने की मांग की गयी है जैसी कि देश के प्रधानमंत्री को मिलती है। मोदी छोटी-मोटी हस्ती नहीं हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री तो हैं ही, भाजपा के भावी पीएम भी हैं। केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिं‍दे ने इस मांग पर पानी फेर दिया है। गृह राज्यमंत्री आरपीएन सिं‍ह ने तो अजब-गजब तर्क देकर लोगों को चौंका दिया है। उनका कहना है कि राजग सरकार की ढीली-सुरक्षा व्यवस्था के कारण ही पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को अपनी कुर्बानी देनी पडी थी। मंत्री हैं तो पढे-लिखे फिर भी पुराने जख्मों को कुरेदने से बाज नहीं आते। यह तो एक तरह से बदला लेने की सोच है। नरेंद्र मोदी की पटना में हुई हुंकार रैली में जिस तरह से आतंकियो ने बमों के धमाके किये और निर्दोषों को मौत के हवाले किया, उसे कोई छोटी-मोटी घटना तो नहीं कहा जा सकता। यह तो मोदी की किस्मत अच्छी थी, जो वे बच गये। असली निशाना वही तो थे। आतंकियों का देशभर में अशांति फैलाने का इरादा था। वैसे भी मोदी वर्षों से आतंकियों के निशाने पर हैं। जब इस सच का सबको पता है तो उनकी सुरक्षा व्यवस्था में किसी भी तरह की कमी और कोताही क्यों? देश पहले भी सुरक्षा के अभाव में दो पूर्व प्रधानमंत्रियों को खो चुका है। निर्दोष नागरिकों के मौत के मुंह में समाने और उनके हताहत होने का आंकडा भी हजारों में है। जो नेता मजाकबाजी में लगे हैं उन्हें होशो-हवास में आना चाहिए। यह मज़ाक का वक्त नहीं है। कांग्रेस के ही एक और नेता हैं राज बब्बर। यह महाशय कभी समाजवादी पार्टी में हुआ करते थे। खुद को मुलायम सिं‍ह का हनुमान बताया करते थे। इन्हें समाजवाद पर बडे-बडे भाषण झाडते भी अक्सर देखा जाता था। तब ये कांग्रेस की नीतियों का मज़ाक उडाने वालों में अग्रणी थे। इन्हें कांग्रेस और कांग्रेसी भ्रष्टाचार की जीती-जागती मूरत नज़र आते थे। पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिं‍ह के खासमखास (तब के) अमर सिं‍ह की वजह से उन्हें समाजवादी पार्टी छोडनी पडी। राज बब्बर का कहना था कि अमर सिं‍ह सत्ता का दलाल हैं। उन जैसा भ्रष्टाचारी देश में आज तक पैदा नहीं हुआ। मुलायम सिं‍ह इस भ्रष्टाचारी के इशारों पर नाचते हैं। किसी दूसरे की सुनते ही नहीं। ऐसे में उनके पास समाजवादी पार्टी को त्यागने के अलावा और कोई चारा ही नहीं था। कभी कांग्रेस को पानी पी-पीकर कोसने वाले अभिनेता-नेता ने कांग्रेस का दामन थामने में जरा भी देरी नहीं लगायी। उन्होंने कांग्रेस के गढ में डेरा जमाकर बैठे भ्रष्टाचारी दिखायी ही नहीं दिये। तब से लेकर अब तक वही हाल है। उनकी इसी होशियारी के चलते ही कांग्रेस ने उन्हें हाथों-हाथ लिया। उन्हें फौरन लोकसभा के चुनाव की टिकट भी दे दी गयी। चुनाव जीतने के बाद तो उन्होंने हवा में उडना शुरु कर दिया। कांग्रेस को ही देश की भाग्य निर्माता और एकमात्र ईमानदार पार्टी बताने के अभियान में जुट गये। जो काम कभी समाजवादी पार्टी के लिए करते थे, अब कांग्रेस के लिए करने लगे। इसी पलटबाजी की कला की बदौलत ही राज बब्बर राजनीति में खूंटे गाढने में सफल हुए हैं। जिन फिल्मवालों के पास यह हुनर नहीं था वे अपने-अपने काम धंधों में लग गये हैं। गोविं‍दा और धर्मेन्द्र इसकी जीवंत मिसाल हैं।
घाट-घाट का पानी पी चुके राज बब्बर कांग्रेस सुप्रीमों सोनिया गांधी और पार्टी के भावी पीएम राहुल गांधी की गुडबुक में आने के लिए कोई भी मौका नहीं चूकना चाहते। देशवासियों को याद होंगे उनके यह बोल वचन कि मुंबई में बारह रुपये में भरपेट खाना मिल जाता है। जबकि इस मायानगरी में इतने रुपयों में तो हल्का-फुल्का नाश्ता भी नहीं मिलता। मोदी को प्रधानमंत्री के समकक्ष सुरक्षा मुहैया कराये जाने की मांग के जवाब में उनका यह कहना उनकी ओछी मानसिकता को दर्शाता है- चाहे कसाब हो या मोदी, सरकार तो सभी को सुरक्षा देती है। क्या यह एक कुंठाग्रस्त नेता की घटिया सोच नहीं है? दरअसल, बचकानी और घटिया बयानबाजी करने वाले ऐसे नेताओं ने ही देश का कबाडा करके रख दिया। इन्होंने यदि भारत माता की आत्मा को पहचाना होता, मुसलमानों को महज वोट बैंक नहीं समझा होता, युवकों को शिक्षा और रोजगार दिलाने में अपनी आधी भी ऊर्जा लगा दी होती, भ्रष्टाचार को पनपने ही न दिया होता, अपराधियों को शह नहीं दी होती और आदिवासियों को अनदेखी न की होती तो आज किसी भी राजनेता पर इस तरह से खतरे के बादल न मंडराते। यह मतलब परस्त राजनेता तो अपने ही देश को सुरक्षित और व्यवस्थित नहीं रख पाए। ऐसे में दुश्मनों की हिम्मत तो बढनी ही थी। पाकिस्तान इस देश के हुक्मरानों, राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं की रग-रग से वाकिफ हो गया है। उसने इनकी औकात जान और पहचान ली है। इसलिए वह बेखौफ होकर आतंकवादियों को हिं‍दुस्तान भेजता है और वे बडी आसानी से अपना काम कर जाते हैं। इस देश को चलाने वाले यदि होश में आ जाएं तो किसी बाहरी और अंदरूनी ताकत में दम नहीं कि वह बम-बारूद बिछाने की हिम्मत कर सके।

Sunday, November 10, 2013

तारीफ करना मना है...

भारत रत्न लता मंगेशकर। कौन है जो इस नाम से वाकिफ नहीं। अपनी मधुर आवाज़ के जादू से सम्मोहित कर लेने वाली लताजी के प्रशंसको की संख्या का अनुमान लगा पाना बेहद मुश्किल है। वर्षों बीत गये...उनका जादू और सम्मोहन जस का तस है। जिसने भी उनके गाये गीत सुने, वह उनका हमेशा-हमेशा के लिए मुरीद हो गया। स्वर कोकिला लता मंगेशकर राज्यसभा की मनोनीत सदस्य भी रह चुकी हैं। हर दिल अज़ीज़ लता दीदी का कभी भी किन्हीं विवादों से कोई लेना-देना नहीं रहा। अपने संगीत की सृष्टि में मगन रहने वाली इस महानतम हस्ती ने बीते सप्ताह एक कार्यक्रम के दौरान अपनी चाहत उजागर कर दी: 'मेरी ही नहीं पूरे देश की इच्छा है कि नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बनें।' इस देश के संविधान ने हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की है। इसे छीनने और इस पर प्रहार करने का किसी को कोई हक नहीं है। लताजी की इस हार्दिक इच्छा ने कई राजनीतिबाजों के तन-बदन में आग लगा दी। उनकी तल्ख वाणी का एक ही अभिप्राय है कि जानी-मानी हस्तियों को अपनी पसंद जाहिर करने का कोई हक नहीं है। कांग्रेस और उसकी साथी पार्टी राष्ट्रवादी कांग्रेस ने तो लताजी को इशारों ही इशारों में यह कह डाला कि आपने नरेंद्र मोदी की तारीफ कर उस पार्टी के साथ अहसान फरामोशी की है जिसने आपको राज्यसभा की मनोनीत सदस्य बना कर सम्मानित किया था।
दरअसल, करोडो-करोडों संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करने वाली लता मंगेशकर तो कला और संगीत की पुजारी हैं। उन्हे अगर राजनीति और राजनेताओं की असली फितरत का पता होता तो वे राज्यसभा की दहलीज पर कदम रखने की सोचती ही नहीं। उन्हें क्या पता था कि उन्हें जीवनभर उन सत्ता के खिलाडि‍यों की शान में कसीदे पढने होंगे जिन्हें वे नापसंद करती हैं। लेकिन सियासत और राजनीति का यही दस्तूर है। जिन्हें राज्यसभा के इनाम से नवाजा जाता है उनसे जीवनभर 'वफादारी' की ही उम्मीद की जाती है। देश की लगभग सभी बडी राजनीतिक पार्टियां उद्योगपतियों, पत्रकारों, लेखकों, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों और स्थापित कलाकारों को राज्यसभा की सदस्यता से नवाजती ही इसलिए हैं कि उनके गुणगान के ढोल बजते रहें। जब से देश आजाद हुआ है तभी से यह परंपरा चली आ रही है। उद्योगपतियों और व्यापारियों के द्वारा राजनीतिक दलों को थैलियां पहुंचाने और फायदा उठाने का चलन तो आम है। पत्रकारों, सम्पादकों आदि...आदि को राज्यसभा की माला पहनाने के पीछे राजनीतिक पार्टियों का बहुत बडा स्वार्थ छिपा होता है। अच्छे खासे विद्धानों और कलमकारों को तोता बनाकर राजनीति की ओछी शाब्दिक जंग में झोंक दिया जाता है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को तोते पालने का कुछ ज्यादा ही शौक है। मजबूरी भी है। वर्तमान में जहां कांग्रेस के पास विजय दर्डा और राजीव शुक्ला जैसे 'ढोलकीनुमा' राज्यसभा सांसद हैं तो भाजपा के पास बलबीर पुंज, तरुण विजय और चंदन मित्रा जैसों की भरमार रही है, जो अपनी पार्टी की जय-जयकार करते नहीं थकते। लोकमत ग्रुप के कर्ताधर्ता, राज्यसभा सांसद विजय दर्डा ने बीते वर्ष नरेंद्र मोदी की शान में कुछ मधुर तराने गाये थे, जो कांग्रेस को कतई रास नहीं आये थे। खूब हो-हल्ला मचा था। जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करने के आरोप भी इस हवा-हवाई अखबार मालिक पर लगे थे। दर्डा पत्रकार होने के साथ-साथ व्यापारी भी हैं। सौदेबाजी में माहिर हैं। इसलिए बात आयी-गयी हो गयी। यहां अपने पाठक मित्रों को यह याद दिलाना भी जरूरी है कि विश्व विख्यात अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने जब मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी के अयोग्य बताया था तो भाजपा के अहसानों तले दबे नामी पत्रकार चंदन मित्रा ने उनसे भारतरत्न वापस लेने की मांग कर दी थी। वैसे यह अच्छी बात है कि कांग्रेस के किसी बडबोले सेवक ने लता मंगेशकर को भारत रत्न लौटाने का फतवा जारी नहीं किया।
पत्रकारिता के कई धुरंधर बडी दूर की सोचकर राजनीति में आते हैं। इन्हें अपने कर्तव्यों और दायित्वों का अच्छा-खासा ज्ञान होता है। यह लोग अपने अखबारों और न्यूज चैनलों में अपनी पार्टी की यशगाथा को ही प्राथमिकता देते हैं। अपने पालनहारों के दाग-धब्बों को धोने की भी इनकी जिम्मेदारी होती है। इसके ऐवज में इन्हें कोयला, पत्थर, रेत, लोहा और तरह-तरह के खनिज पदार्थ खाने-पचाने को मिलते रहते हैं। शादीशुदा अभिनेता धर्मेंद्र से ब्याह रचाने वाली हेमा मालिनी और रेखा जैसी बदनाम नायिकाएं भी राज्यसभा में पहुंचने में कामयाब हो जाती हैं। इनकी एकमात्र योग्यता होती है आकर्षण और भीड जुटाने की क्षमता। इस देश की राजनीतिक पार्टियां विख्यातों के साथ-साथ कुख्यातों को भी भरपूर दाना डालती हैं। दस्यू सुंदरी फूलन देवी और हत्यारे शहाबुदीन जैसों को लोकसभा की चुनावी टिकट देकर अपनी अक्ल के दिवालियापन का सबूत पेश करने वाले दलों के मुखियाओ से जब इस बाबत सवाल किया जाता है तो वे बडी बेशर्मी के साथ कहते हैं कि जिनमें चुनाव जीतने की क्षमता होती है उन्हीं को मैदान में उतारा जाता है।
राजनीति पार्टियों की इसी सोच की वजह से ही खूंखार हत्यारे, डकैत, माफिया और राष्ट्रद्रोही चेहरे भी संसद की गरिमा पर बट्टा लगाते चले आ रहे हैं। देश के किसी भी दल को अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं होती। मीडिया भी जब उन्हें आईना दिखाने की कोशिश करता है तो वे भडक उठते हैं। उस पर प्रतिबंध लगाने की मांग की जाने लगती है। कांग्रेस इन दिनों न्यूज चैनलो से खफा है। अधिकांश न्यूज चैनलों के चुनावी सर्वेक्षण उसकी लुटिया डूबने का दावा कर रहे हैं। इसलिए देश की सबसे पुरानी पार्टी ने ओपिनियन पोल पर पाबंदी लगाने की मांग कर डाली है। भाजपा गदगद है। चुनावी सर्वेक्षण उसके पक्ष में जो हैं। उसने कांग्रेस पर निशाना साधा है कि कांग्रेस मीडिया के काम में दखलअंदाजी कर रही है। एक लोकतांत्रिक देश में ओपिनियन पोल पर पाबंदी लगाना पूरी तरह से नाजायज़ है। वैसे यह भी सच है कि यदि न्यूज चैनल वाले भाजपा को पिटता हुआ बता रहे होते तो उसके भी तेवर बिलकुल वैसे ही होते हैं जैसे कांग्रेस के हैं...। इस देश की हर पार्टी कपटी और ढोंगियों से भरी पडी है जिन्हें आलोचना, विरोध और सच तो किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं होता। इन्हें वो चेहरे तो अपने जन्मजात दुश्मन लगते हैं जो इनके कट्टर और दमदार विरोधियों की तारीफ करने का साहस दिखाते हैं।

Thursday, October 31, 2013

कैसे-कैसे मंज़र!

ऐन दिवाली से कुछ दिन पूर्व पटना में हुई भाजपा की चुनावी महारैली ने दबे-छिपे खतरों के संकेत दे दिये हैं। यह तो खबर थी कि कई ताकतें नरेंद्र मोदी से खफा हैं। उनकी हुंकार रैली को जिस तरह से बम और बारुद से सलामी दी गयी उससे बिहार सरकार की निष्क्रियता की भी पोल खुल गयी है। नीतीश कुमार सुशासन के दावे करते हैं। उनके सुशासन में एक के बाद एक बमों का फटना, छह लोगों का बे-मौत मारा जाना और लगभग सौ लोगों का घायल होना उनकी घोर लापरवाही और नाकामी को ही दर्शाता है। मोदी की पटना किसी भी हालत में रैली न होने पाए, ऐसा तो नीतीश कुमार शुरू से ही चाहते थे। राजनीतिक शत्रुता तो समझ में आती हैं पर यह सिलसिलेवार धमाकेबाजी कई शंकाएं पैदा करती है। सत्ता के नशे में चूर मुख्यमंत्री के चेहरे पर कहीं कोई शिकन नजर नहीं आयी। मृतकों और घायलों के प्रति उन्होंने ऊपरी तौर पर ही संवेदना और सहानुभूति दर्शायी। यह निर्मम चेहरा किसी को भी नहीं भाया। क्या राजनीति इंसान को पत्थर से भी गया-बीता बना देती है? उनकी निगाहें सिर्फ और सिर्फ मोदी की हुंकार रैली और उनके भाषण पर टिकी रहीं। तभी तो उन्होंने मोदी के सवालों के सिलसिलेवार जवाब देने में देरी नहीं लगायी। उन्होंने मोदी को अज्ञानी और हिटलर का अनुयायी घोषित कर तालियां बटोरीं। यकीनन नीतीश अंदर से घबराये हुए हैं। उन्हें मोदी का भय खाये जा रहा है। उन्हीं के प्रदेश की राजधानी में आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन ने जिस तरह का खूनी खेल खेला उससे तो अगले वर्ष होने जा रहे लोकसभा चुनावों पर भी भयावह खतरा मंडराने लगा है। मुख्यमंत्री के दंभी तेवरों से तो यही लगा कि वे बिहार के जन्मजात शासक हैं। वे जैसा चाहेंगे वैसा ही होगा। अपने राजनीतिक विरोधियों का बिहार की धरा पर कदम धरना भी इन्हें खलता है। उनके इसी रवैये के कारण ही उनकी पार्टी के कुछ नेता भी उनसे काफी नाराज हैं। जेडीयू के मुखर सांसद शिवानंद तिवारी ने तो मुख्यमंत्री के चेहरे का रंग ही उतार दिया। उन्होंने भरी सभा में कहा कि नीतीश जमीनी नेता नहीं हैं। नरेंद्र मोदी ने पिछडे परिवार में जन्म लेकर कडा परिश्रम कर जो मुकाम हासिल किया है उसकी तारीफ की ही जानी चाहिए। हुंकार रैली के दौरान भाषण देते वक्त नरेंद्र मोदी ने शालीनता का दामन छोडने की भूल नहीं की। नीतीश ने तो नरेंद्र मोदी की तुलना जेल में कैद दुराचारी आसाराम से ही कर डाली। उनकी इस सोच ने उनके अंदर छिपे कपटी चेहरे को उजागर कर दिया है। राजनीति इतनी विषैली भी हो सकती है, इसका भी पता चल गया है।
देश के पांच राज्य पूरी तरह से चुनावी रंग में डूब चुके हैं। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ में भाजपा, दिल्ली राजस्थान और मिजोरम में कांग्रेस की सत्ता है। दोनों पार्टियों ने सत्ता पाने और सत्ता में बने रहने के लिए तरह-तरह की तिकडमों और प्रलोभनों का जाल फेंकना शुरू कर दिया है। दिल्ली में 'आप' पार्टी ने भाजपा और कांग्रेस की नींद हराम कर दी है। शीला दीक्षित को पता नहीं क्यों फिर से दिल्ली की सत्ता पाने का पूरा भरोसा है। उनके राज में दिल्ली में कितने बलात्कार हुए और कितनी लूटपाट की घटनाएं हुर्इं, इसका तो शायद उन्हें अता-पता नहीं है फिर भी बडी-बडी बातें करने से बाज नहीं आतीं। इसी शीला ने कभी कहा था कि लडकियों को अंधेरा होते ही घरों में दुबक जाना चाहिए। यानी वे उनकी सुरक्षा कर पाने में असमर्थ हैं। दोनों ही पार्टियां लोकलुभावन योजनाओं की घोषणाएं कर वही वर्षों पुराना खेल खेल रही हैं। धर्म, जाति और क्षेत्र की राजनीति करने में कांग्रेस और भाजपा को महारथ हासिल है। इस जंग में 'आप' के सुप्रिमो अरविंद केजरीवाल की कितनी दाल गल पाती है इस ओर सभी की निगाहें लगी हैं। सभी जानते हैं कि बिना धन-बल के चुनाव लड पाना असंभव है। फिर भी यदि वे जमे-जमाये सूरमाओं को पटकनी देने में कामयाब हो जाते हैं तो यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं होगा कि इस देश में ईमानदारी की अभी भी पूछ होती है...। जहां-जहां भाजपा की सत्ता है वहां पर कांग्रेस जी-जान लगा रही है कि किसी भी तरह से बिल्ली के भाग्य से छींका तो टूट जाए। वही हाल भाजपा का भी है। वह भी येन-केन-प्रकारेण कांग्रेस शासित प्रदेशों को अपने कब्जे में लेना चाहती है। सत्ता को पाने और हथियाने का जबरदस्त नाटक चल रहा है। जनहितकारी मुद्दों का कहीं अता-पता नहीं है। कोई पार्टी बिजली मुफ्त देने का प्रलोभन दे रही है तो किसी ने एकाध रुपये किलो में चावल-गेहूं देने का वायदा कर वोटरों को फांसने के लिए अपना-अपना जाल फेंक दिया है। भ्रष्टाचार के दलदल में धंसी कांग्रेस की धारणा है कि वह दिल्ली में चौथी बार भी चुनाव जीतने की अधिकारी है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह आश्वस्त हैं कि मतदाता तीसरी बार भी उन्हीं के गले में विजय की माला पहनाएंगे। छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी अपनी चाउरबाबा की छवि को भुनाने की फिराक में हैं। उन्होंने जब छत्तीसगढ की कमान संभाली थी तो प्रदेशवासियों के दिलों में उम्मीद जगी थी कि वे प्रदेश में उद्योग धंधो की कतार खडी कर देंगे। जिनसे लोगों को रोजगार मिलेगा। गरीबी और बदहाली दूर होगी। लोगों को यह भी भरोसा था कि नक्सली समस्या का भी खात्मा हो जायेगा। डॉ. रमन चाउर वाले बाबा बनकर अपनी छवि को चमकाने में तो कामयाब जरूर हुए पर छत्तीसगढ की हालत में कोई खास सुधार नहीं कर पाये। लोगों को औने-पौने दाम पर या फिर मुफ्त में चावल-दाल उपलब्ध करवा कर गरीबी तो दूर नहीं की जा सकती। अब इसका जवाब तो डॉ. रमन ही दे सकते हैं कि उन्होंने मूल समस्याओं के निराकरण की तरफ ध्यान क्यों नहीं दिया? उन्हें इस बात की भी खबर होगी कि नक्सलियों ने उस आतंकी संगठन इंडियन मुजाहीदीन से हाथ मिला लिए हैं, जिसने पटना में बम बिछाकर मनचाहा खूनी कहर ढाया।
वसुंधरा राजे भी राजस्थान की मुख्यमंत्री बनने के सपनों के घोडे पर सवार हैं। उन्हें यकीन है कि अशोक गहलोत भले ही असली जादूगर हों पर इस बार उनका ही जादू चलने वाला है। प्रदेश की जनता रानी साहिबा को हाथोंहाथ लेने को तैयार खडी है। सत्ता के सिंहासन के लिए बेशुमार आश्वासन बांटते राजनेताओं के भ्रम को अगर कोई तोड सकता है तो वे सिर्फ और सिर्फ मतदाता ही हैं। देखें, इस बार वे क्या करते हैं। जागते हैं या फिर सोये के सोये रह जाते हैं। दरअसल आजकल चुनावी मंचों पर अभिनेताओं की भरमार हो गयी है। फिल्मी अभिनेताओं की तो पूछ रही नहीं, इसलिए नेता ही अभिनेता बन गये हैं। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को अतीत की दास्तानें सुनाने में सुकून मिलता है। भाजपा के भावी प्रधानमंत्री के अभिनय का तो कहीं कोई सानी ही नहीं है। ऐसे बनावटी और दिखावटी दौर में समस्त देशवासियों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

Thursday, October 24, 2013

पत्रकार को किसने मारा?

पत्रकारों को तो हिम्मती और दिलेर माना जाता है। हर संकट-कंटक और जुल्म से भिडने का उनमें अभूतपूर्व साहस होता है। उनकी निर्भीक कलम बडे-बडे माफियाओं, जालसाजों और भ्रष्टाचारियों की रूह को कंपा कर रख देती है। यह भी सबको खबर है कि अराजक तत्वों को बेनकाब करने वाले निष्पक्ष पत्रकारों को अक्सर कई जानलेवा तूफानों का सामना भी करना पडता है। भ्रष्ट सत्ताधीशों, अफसरों और राजनेताओं के द्वारा खोजी पत्रकारों को पिटवाये और मरवाये जाने की कितनी ही खबरें पढने और सुनने में आती रहती हैं। फिर भी पत्रकारों का उत्साह कम नहीं होता। पत्रकारीय दायित्व को निभाते हुए समाज के शत्रुओं के साथ उनकी लडाई सतत जारी रहती है। बीते सप्ताह भोपाल के एक पत्रकार की आत्महत्या कर लेने की खबर बेहद स्तब्ध कर गयी। समर्पित कलमकारों को वतन के लुटेरों और धोखेबाजों के द्वारा गोलियों से भून-भूना देने के दौर में एक सजग पत्रकार को जहर पीकर इस दुनिया से विदायी लेनी पडी! यह तो वाकई बेहद चौकाने वाली घटना है।
देश के प्रदेश मध्यप्रदेश की राजधानी के पत्रकार राजेंद्र सिं‍ह राजपूत एक जुनूनी पत्रकार थे। बिलकुल वैसे ही जैसे हर देश प्रेमी पत्रकार होता है। उन्हें कहीं से खबर लगी कि मौजूदा काल में जब देश के लाखों पढे-लिखे नवयुवक नौकरियों की तलाश में मारे-मारे भटक रहे हैं, तब कई शातिरों ने शासन और प्रशासन की आंख में धूल झोंककर अच्छी-खासी सरकारी नौकरियां हथिया ली हैं। वे फौरन सक्रिय हो गये। उन्होंने सूचना के अधिकार के जरिए ऐसे ३०० अफसरों की पुख्ता जानकारी हासिल की जिन्होंने सामान्य वर्ग के होने के बावजूद अनुसूचित जाति के फर्जी प्रमाण पत्र बनवाये और भारत सरकार तथा विभिन्न प्रदेशो में शानदार रूतबे वाली नौकरियां पायीं। यह तो शासन और प्रशासन के साथ बहुत बडी धोखाधडी थी। इसका पर्दाफाश होना बहुत जरूरी था। पत्रकार राजपूत ने सजग पत्रकारिता के धर्म को निभाते हुए अपने अखबार में उन तमाम जालसाजों को नंगा करने का अभियान शुरू कर दिया, जो फर्जी प्रमाण पत्रों की बदौलत मेडिकल आफिसर, इंजिनियर, रजिस्ट्रार, इन्कम टैक्स कमिश्नर, पुलिस और वन अधिकारी आदि-आदि की कुर्सी पर काबिज होकर ऐश कर रहे हैं। योग्य उम्मीदवार जिन्हें नौकरी की दरकार है वे अपनी किस्मत को कोस रहे हैं।
फर्जीवाडा कर अफसरी के मज़े लूटने वाले २५० लोगों के खिलाफ राजपूत ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका भी दायर करवायी। उनकी शिकायत पर मध्यप्रदेश शासन की राज्य स्तरीय अनुसूचित जाति छानबीन समिति ने २० सितंबर २००६ को ५६ अधिकारियों, कर्मचारियों को तत्काल नौकरी से बर्खास्त करने का आदेश दे दिया। इतना ही नहीं उनके फर्जी प्रमाण पत्रों को राजसात कर दंडात्मक कार्रवाई करने व उनके पुत्र-पुत्रियो के जाति प्रमाण पत्र भी निरस्त कर राजसात करने का आदेश पारित कर पत्रकार राजपूत की खबर पर पूरी सच्चाई की मुहर लगा दी।
राजपूत यकीनन पत्रकारिता के धर्म निभा रहे थे, लेकिन फर्जीवाडा करने वालों की धाकड जमात उनकी जान की दुश्मन बन गयी। उनका अपहरण किया गया। शिकायत वापसी के लिए आवेदन पत्र एवं शपथ पत्र पर हस्ताक्षर कराये गये। उनकी पत्नी और बेटी को भी धमकाया गया। मारने-पीटने और फर्जी केस में फंसाने का कभी न खत्म होने वाला सिलसिला चला दिया गया। आरोपी अफसरों की ऊपर तक पहुंच थी, इसलिए राजपूत की किसी ने नहीं सुनी। उन्होंने मुख्य सचिव, डीजीपी, आईजी से लेकर हर पुलिस अफसर और सत्ताधीश की चौखट पर जाकर फरियाद की, कि माई-बाप मुझे बचाओ। फर्जीवाडा करने वाला गिरोह मेरी जान लेने को उतारू है। मेरे खिलाफ अलग-अलग थानों में धोखाधडी के फर्जी केस दर्ज करवा दिये गये हैं। यह तो 'उलटा चोर कोतवाल को डांटे' वाली बात है। मैंने जालसाजों को बेनकाब कर देश की सेवा की है। इन ठगों और लुटेरों को तो जेल में होना चाहिए। पर इनका तो बाल भी बांका होता नहीं दिखता। मैं आखिर कहां जाऊं? सच की लडाई लडने वाला पत्रकार जालसाजों से निरंतर जूझता रहा। न शासन ने उसकी सुनी, न ही प्रशासन ने। सफेदपोश गुंडों की धमकियों और चालबाजियों ने उसका तथा उसके परिवार का जीना इस कदर हराम कर दिया था कि आखिरकार उसे आत्महत्या करने को विवश होना पडा। आत्महत्या करने से पहले उसने २२ पेज का एक सुसाइड नोट भी लिखा, जिसमें उन तमाम बदमाश अफसरों के नाम दर्ज हैं। यकीनन राजपूत कायर तो नहीं था। अगर बुजदिल होता तो इस जंग की शुरुआत ही नहीं करता। दरअसल, उन्हीं जालसाज कायरों ने ही उसकी हत्या की है जिसका उन्होंने बेखौफ होकर पर्दाफाश किया। उन्हें तो पुरस्कृत किया जाना चाहिए था। पर उन्हें मौत दे दी गयी। यह कैसी व्यवस्था है? उनकी मौत के बाद मुख्यमंत्री का बयान आया कि पत्रकार के परिवार के लोग मेरे परिवार जैसे ही हैं। मैं इनकी हर तरह से सहायता करने को कटिबद्ध हूं। यह कैसी विडंबना है कि एक जीते-जागते पत्रकार को पूरी तरह से निरीह बनाकर रख दिया गया और उसके मरने के बाद उसके परिवार को दाल-रोटी देने और न्याय दिलाने का आश्वासन दिया जा रहा है! यह ढोंग कब तक चलता रहेगा।

Thursday, October 17, 2013

जैसा बोया, वैसा काटा

अपने आश्रमों में यौन वर्द्धक दवाइयां बनाने और बेचने वाले प्रवचनकार के बेटे को पुलिस तलाश रही है। बेटे पर भी वही आरोप हैं जिनके चलते सौदागर बाप को सलाखों के पीछे जाना पडा है। गहराई से सोचें तो बडी हैरानी होती है। कोई आम बाप-बेटा होते तो ज्यादा आश्चर्यचकित होने की कोई वजह नहीं थी। दोनों शौकीनों पर विश्वास करने वालों की अच्छी-खासी तादाद है। बाप के अनुयायियों की संख्या तो करोडों में बतायी जाती है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या ज्यादा है। यह महिलाएं उसे अपना भगवान मानती रही हैं। कई तो ऐसी भी हैं जिनके पूजाघरों में आसाराम की तस्वीर को खास जगह मिली हुई थी। बेचारी सुबह-शाम नतमस्तक होती थीं। उनकी आस्था और विश्वास को आसाराम ने जो घाव दिये हैं उनका भर पाना असंभव है। देश के दूसरे सच्चे संत भी चिं‍तित और दुखी हैं। एक कुसंत के कुकर्मो ने पूरी की पूरी संत बिरादरी को सिर झुकाने को मजबूर कर दिया है। न पहले कभी ऐसा देखा गया और न ही सुना गया। खबरें चीख-चीख कर बता रही हैं कि आसाराम तो आसाराम, उसका बेटा, बेटी और पत्नी भी ...छल कपट के प्रतिरूप हैं। इनके छलावी संसार में पावन रिश्तों की गरिमा को सूली पर लटकाया जा चुका है। ऐसे में मन में विचार आता है कि यह लोग एक दूसरे से किस तरह से पेश आते होंगे। क्या इन्हें एक दूसरे से निगाह मिलाते हुए कोई शर्म-वर्म नहीं आती होगी? इस देश के किसी भी साधारण परिवार में जब कोई मुखिया व्याभिचार के दलदल में फंस जाता है तो सभी परिजन उससे दूरियां बना लेते हैं। बाप का बलात्कारी होना संतानों को अंतहीन पीडा देता है। बेटियां तो शर्म के मारे पानी-पानी हो जाती हैं। यह भी हकीकत है कि एक सच्चा हिन्दुस्तानी पिता अपने दुराचारी पुत्र की शक्ल देखना भी पसंद नहीं करता। यहां तो सबके सब कीचड में धंसे लगते हैं। बेटा बाप से दस कदम आगे है। बाप ने अपने दुलारे को शिक्षा ही कुछ ऐसी दी कि वह सिर्फ और सिर्फ देहभोगी बनकर रह गया। होना तो यह चाहिए था कि कपटी कथावाचक को पत्नी दुत्कारती और बहन अपने कामुक भाई को लताडती। पता नहीं इनकी ऐसी कौन सी मजबूरी थी जो यह चुपचाप दुष्कर्मियों की संगी-साथी बनी रहीं।
भारतवर्ष तो एक ऐसा देश है जहां कोई भी वफादार पत्नी अपने बदचलन पति को बर्दाश्त नहीं कर पाती। उसका बेटा अगर बलात्कारी और घोर व्याभिचारी हो तो उसे अपना जीवन ही व्यर्थ लगने लगता है। उसके लिए लोगों को अपना मुंह दिखाना भी मुश्किल हो जाता है। समाज में सिर उठाकर चलने की गुंजाइश ही खत्म हो जाती है। चमगादड का सूरमा लगाने वाले आसाराम का तो पूरा परिवार ही मुखौटेबाज लगता है। अपने भक्तों को अनुशासन, शालीनता और मर्यादा का पाठ पढाने वाले आसाराम ने पतन का जो काला इतिहास लिखा है उसे कोई भी शरीफ आदमी पडना नहीं चाहेगा। भोगी और विलासी आसाराम ने जैसा बोया, वैसा ही काटा है। उसकी लम्बी जेल यात्रा के बाद कुकर्मी बेटे का भी जेल जाना तय है। अफीमची आसाराम ने अपने बेटे का नाम नारायण तो रखा पर वह उसे इंसान भी नहीं बना पाया। उसमें ऐसे-ऐसे कुसंस्कार भर दिये कि वह भोगी और विलासी बन सेविकाओं के साथ बलात्कार कर अपनी मर्दानगी दिखाने लगा। तथाकथित संत से शैतान बने बाप-बेटे ने यह भ्रम पाल लिया था कि उनकी लीलाएं हमेशा पर्दे में ढकी रहेंगी। यह तो अच्छा हुआ कि एक बहादुर लडकी सामने आयी और उसने वासना में डूबे बाप-बेटे का काला चिट्ठा खोलकर रख दिया।
आसाराम के प्रवचनों के सम्मोहन के कट्टर कैदियों के अभी भी होश ठिकाने नहीं आए हैं। राम जाने, इस शख्स ने उन्हें ऐसी कौन सी अफीम खिलायी है जो उनका नशा टूटने का नाम ही नहीं ले रहा है। जैसे-जैसे वक्त बीत रहा है भुक्तभोगियों और प्रत्यक्ष दर्शियो की संख्या बढती चली जा रही है। हवस के पुजारियों ने कितनी नारियों की अस्मत लूटी इसका असली आंकडा तो शायद ही कभी सामने आ पाए। पर क्या यह कम चौंकाने वाली बात है कि आसाराम किसी भी युवती को भोगने से पहले उसे अफीम और अन्य उत्तेजक नशों का गुलाम बनाता था। 'पंचेड बूटी' के आदी एक तथाकथित संत का यह भोगी चेहरा यकीनन भयभीत करता है। पैरों तले की जमीन खिसकने लगती है। आसाराम ने अपने भक्तों के साथ जो अक्षम्य विश्वासघात किया है उसकी तो कभी कोई कल्पना ही नहीं कर सकता था। खुद को कृष्ण-कन्हैया दर्शाते हुए बाप-बेटे भोली-भाली युवतियों को अपनी अंधी और दंभी वासना का शिकार बनाते रहे। अंध भक्त भी अनदेखी कर तालियां बजाते रहे। चढावा चढाते रहे और जाने-अनजाने में अपनी बहू-बेटियो को भोगियों के निशाने पर लाते रहे। किसी ने सच ही कहा है कि पाप का घडा एक न एक दिन भरकर ही रहता है और पापी को अपना मुंह दिखाना भी मुश्किल हो जाता है। फरेबी आसाराम और उसके परिवार की जो दुर्गति हुई है और एक तथाकथित संत का जो शैतानी चेहरा सामने आया है उससे उन लोगों को यकीनन सबक लेना चाहिए जो मुखौटेधारियों की शिनाख्त किये बिना फौरन उनके अंधभक्त बन जाते हैं। यह उम्मीद भी की जा सकती है कि देश को ऐसे धूर्तो से मुक्ति मिलेगी। आसाराम जैसे सभी पाखंडी जेल में नजर आएंगे...।