Thursday, August 27, 2015

खरे सोने की पहचान

इस सृष्टि में जितने भी संत, महात्मा, ज्ञानी-ध्यानी, चिंतक और सजग लेखक हुए हैं सभी की यही सोच और लक्ष्य रहा है कि इस दुनिया में कहीं भी अंधेरा न हो। लोग ईमानदार और चरित्रवान हों। हर किसी में राष्ट्रप्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी हो। हर देशवासी का संघर्ष रंग लाए और असीम सफलताएं कदम चूमें। सभी के चेहरे खुशी से दमकते रहें। सर्वत्र भाईचारा और ईमानदारी बनी रहे। कहीं कोई विकृति न हो।
इस सृष्टि का निर्माण कब हुआ इसका सही और सटीक जवाब किसी के पास नहीं है, लेकिन हमें विरासत में जो ग्रंथ मिले हैं वे वाकई अनमोल हैं। इन ग्रंथों में बडी सरल भाषा में जीवन जीने की कला से अवगत कराया गया है। दरअसल, यह ग्रंथ हमारे सच्चे मार्गदर्शक हैं। हमें अपनी जीवन यात्रा कैसे पूरी करनी है, हमें कौन सी राह पर चलना है, क्या अच्छा है, क्या बुरा, किस तरह से सफलता मिलेगी और कैसे हमारा संपूर्ण विकास होगा, इन सब सवालों का जवाब हमारे वेदों और शास्त्रों में समाहित है। यह भी सच है कि आम आदमी के पास इतना समय नहीं होता कि वह महान संतों द्वारा रचित समग्र साहित्य का पन्ना-पन्ना प‹ढ सके। उसके लिए तो साधु-संत ही वेद, पुराण और मार्गदर्शक होते हैं। भारत वर्ष में अनेक ऐसे संत हुए हैं जिन्होंने जन जागरण और जन कल्याण के दायित्व को बखूबी निभाया है। उनका चरित्र ही लोगों का मार्गदर्शन करता रहा है। जीवन पर्यंत उन पर कभी कोई दाग नहीं लगा। इसी देश में रामपाल, निर्मलबाबा, नित्यानंद, चंद्रास्वामी जैसे तथाकथित संतों और प्रवचनकारों का भी डंका बजता रहा है। जब इनकी असली सूरत सामने आयी तो लोग सच्चे संतों को भी शंका की निगाह से देखने लगे। ऐसा लगता है कि आस्था और धर्म को बाजार बनाने वाले मुखौटेधारियों के पर्दाफाश होने का दौर शुरू हो चुका है। आसाराम से शुरू हुआ यह सिलसिला उस राधे मां तक आ पहुंचा है जो शराब भी पीती हैं और मुर्गा, मटन भी चबाती हैं। किसी धूर्त मिठाईवाले की मार्केqटग की बदौलत पूरे देश में छाने वाली राधे मां अश्लील नृत्य कर लोगों को रिझातीं और अपना भक्त बनातीं है। अपनी खूबसूरत काया का जादू चलाने वाली इस पाखण्डी नारी पर हत्या और दहेज उत्पीडन के भी संगीन आरोप हैं। अमीर भक्तों के साथ लिपटा-लिपटी करने की शौकीन यह तथाकथित देवी छल, कपट की जीवन्त तस्वीर है। लगता है यह महिला आसाराम से प्रेरणा लेकर धर्म के बाजार में कूदी है। भक्तों से बटोरी गयी दस हजार करो‹ड से भी ज्यादा की रकम को बाजार में चलाकर मुनाफा कमाने वाले आसाराम की तरह और भी कुछ तथाकथित ईश्वर और भगवान हैं, जिन्होंने अरबों-खरबों की माया जुटा ली है।
अपने देश में कई विवादास्पद संतों और प्रवचनकारों की तरह कुछ चर्चित संन्यासिनें भी फाइव स्टार सुविधाओं में जीने की आदी हैं। तरह-तरह के विवादों से भी उनका चोली दामन का साथ यही बताता है कि संदिग्ध पुरुष संतों की तरह उनका भी जन कल्याण के प्रति उतना समर्पण नहीं है, जितने की अपेक्षा कर भक्त भीड की शक्ल में उनके समक्ष मस्तक झुकाते हैं। खुद को ईश्वर का दूत मानने और प्रचारित करने वाले कुछ भगवाधारी जिस तरह से गरीबों को नजरअंदाज कर 'ऊंचे लोगों' पर आशीर्वाद बरसाते हैं उससे उनकी भेदभाव की नीति और असली मंशा उजागर हो जाती है। तथाकथित ईश्वरों का यह तमाशा देखकर जो पी‹डा होती है उसी को कवि दिनेश कुशवाह ने इन पंक्तियों में बयां किया है :
"ईश्वर की सबसे ब‹डी खामी यह है कि
वह समर्थ लोगों का कुछ नहीं बिगाड पाता...
उसके आस-पास नेताओं की तरह
धूर्त, छली और पाखण्डी लोगों की भी‹ड जमा है।"
ऐसे संत, महात्मा, प्रवचनकार, देवी, देवता और गुरुजी जो अपने प्रतिष्ठित, ताकतवर और धनवान भक्तों के आलीशान भवनों में ठहरने की दरियादिली दिखाते हैं और गरीब भक्तों के घरों की तरफ झांकते तक नहीं, वे यकीनन अपना मान-सम्मान घटाते हैं और धर्म-कर्म की गरिमा को भी धूमिल करते हैं। ऐसे भगवान बडी आसानी से पहचान में आ जाते हैं। मायावी रहन-सहन और लिफाफे लपकने की ललक ही उनकी असलियत बता देती है। धूर्त किस्म के प्रवचनकारों के दरबार में नतमस्तक होने वाले लोग भी कम दोषी नहीं हैं। यह बहुत अच्छी बात है कि देश में तेजी से बदलाव आ रहा है। जिस तेजी से कुछ भगवाधारियों के मुखौटे उतरे हैं उससे अधिकांश भारतवासियों को समझ में आने लगा है कि इन तथाकथित साधु-संतों से भय और qचता के निवारण और ज्ञान पाने की उम्मीद रखना व्यर्थ है। यह तो मुसीबतों और तकलीफों को बढाने के साथ-साथ अंधविश्वास और असमानता के पोषक हैं। यह मान लेना भी गलत होगा कि इस देश मेें सच्चे साधु-संतों और साध्वियों का घोर अकाल प‹ड गया है। पारखी आंखें खरे सोने की तुरंत पहचान कर लेती हैं। युवाओं के प्रेरणास्त्रोत, हिन्दुस्तान के पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम विद्वता, विनम्रता सदाचार और सादगी की ऐसी प्रतिमूर्ति थे, जिसकी दूसरी कोई और मिसाल नहीं दी जा सकती। डॉ. कलाम भगवाधारी तो नहीं थे, लेकिन सच्चे साधु और संत जरूर थे। कहीं कोई खोट नहीं, दिखावा नहीं। लोभ, लालच से कोसों दूर। सहज और सरल। कर्म को ही अपना धर्म मानने वाले डॉ. कलाम जब शिलांग में व्याख्यान दे रहे थे, तब अचानक उनकी तबीयत बिगड गयी। चिकित्सकों की लाख कोशिशों के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका। ताउम्र अविवाहित रहकर देश की सेवा करने वाले यह महापुरुष भगवत् गीता और कुरान पर एक समान पक‹ड रखते थे। गरीबी में पले-ब‹ढे अब्दुल कलाम का सफरनामा अचंभित करने के साथ-साथ यह संदेश भी देता है कि अथक परिश्रम करने वालों को सफलता जरूर मिलती है। उनका मानना था कि महज सपने देखने से कुछ नहीं होता। उन्हें साकार करने के लिए अपनी जान लगा देने वाले ही शिखर तक पहुंचते हैं। वे युवाओं को कहा करते थे कि बडे सपने देखो और पूरा करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दो। उस सपने का कोई मोल नहीं है जो नींद में देखा जाता है। असली सपना तो वह है जो आपकी नींद उडा दे। आप सोना भी चाहें तो सो न पाएं। विज्ञान और टेक्नालॉजी के इस युगपुरुष ने युवाओं के मार्गदर्शन के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर जिस तरह से एक अच्छे शिक्षक की भूमिका निभायी, उसे यह देश कभी भी नहीं भूल सकता। आज जब देश के अधिकांश राजनेता अपने इर्द-गिर्द सुरक्षा रक्षकों की बारात लेकर निकलते हैं और इसे प्रतिष्ठा सूचक मानते हैं वहीं डॉ. कलाम को अपनी सुरक्षा के लिए जवानों की तैनाती असहज बनाती थी। घण्टों खडे रहकर अपनी ड्यूटी निभाने वाले जवानों का हालचाल जानना भी वे नहीं भूलते थे। इस बहुआयामी हस्ती से किसी ने पूछा था कि कृपया आप बताएं कि आप किस बात के लिए याद किए जाना पसंद करेंगे? राष्ट्रपति, वैज्ञानिक, लेखक, मिसाइल मैन, इंडिया २०२०, टार्गेट थ्री बिलियन...। उन्होंने बडी सहजता से कहा था कि मैं टीचर के रूप में याद किया जाना चाहूंगा। कोई और होता तो उसका यही जवाब होता- सिर्फ और सिर्फ, राष्ट्रपति। इससे बडा पद कोई और तो नहीं होता। फिर छोटे को क्यों चुनना। इसी सादगी के कारण ही असंख्य भारतवासी इस टीचर को अपना भगवान मानते हैं। रामेश्वर मंदिर की ओर जाने वाली बसें अब पहले पेई कारम्बू में रुकती हैं, जहां पर डॉक्टर कलाम की कब्र है। मंदिर जाने वाले हजारों लोग प्रतिदिन पहले कब्र पर शीश नवाते हैं, अपने श्रद्धा सुमन च‹ढाते हैं फिर रामेश्वर की तरफ प्रस्थान करते हैं। देश के करोडों लोगों के आदर्श डॉक्टर कलाम के प्रति लोगों का यह आदर किसी दबाव या प्रचार का प्रतिफल नहीं है। यह तो उनके देशप्रेम और जनसेवा का प्रतिफल है जिसके कारण वे जन-जन के पूज्यनीय हैं।

Thursday, August 20, 2015

रोशनी के लुटेरे

हम सबका देश भारत वाकई महान भी है... अद्भुत और निराला भी। तभी तो इक्कसवीं सदी में भी यहां पंद्रहवीं और सोलहवीं सदी पूरे दमखम के साथ जिंदा है। बिहार के कैमूर जिले में रहने वाले कोरबा जनजाति के लोग इस आधुनिक दौर में भी तांत्रिकों और ओझाओं को अपना भगवान मानते हैं। कोरबा आदिवासी देश और दुनिया की चमक-धमक से कोसों दूर हैं। हिंदुस्तान के यह आदिवासी आज भी उस आदिम युग में रह रहे हैं जहां आजादी का उजाला अभी तक नहीं पहुंच पाया है। अधिकांश आदिवासियों ने रेलगाडी में चढना तो दूर, उसे देखा तक नहीं है। इनकी तमन्ना है कि वे अपने जीते जी एक बार तो रेलगाडी देख लें और अपने बच्चों को भी उसके दीदार करवा दें।
उन्हें चूहा, चिडिया, खरगोश, सांप आदि खाकर खुद को जिंदा रखना पडता है। वो दिन तो उनके लिए उत्सव हो जाता है जब पीने को महुआ की दारू और खाने को चावल नसीब हो जाते हैं। असुविधा, अशिक्षा, गरीबी और असुरक्षा इनके जीवन भर के साथी हैं। घोर अभावों और विपदाओं को अपने गले से लगाकर संघर्षरत रहने वाले यह भारतवासी जब किसी गंभीर बीमारी का शिकार होते हैं तो उन्हें मजबूरन तांत्रिक और ओझाओं की शरण लेनी पडती है। यही उनका अस्पताल और डॉक्टर हैं। इन डॉक्टरों के पास कोई विश्वसनीय दवाइयां तो होती नहीं इसलिए ये तंत्र-मंत्र और किस्म-किस्म के पूजापाठ का चक्र चलाते हैं। मरीज के मन में यह बात बिठा दी जाती है कि बुरी आत्माओं की नाराज़गी और रोष के चलते उसे बीमारी ने जकड लिया है। यही वजह है कि आदिवासियों को जब भी टीबी, चेचक, डायरिया, पीलिया, दस्त जैसी बीमारियां और तकलीफें दबोचती हैं तो इन्हें भूत, डायन या चुडैल का जादूटोना होने का डर दिखाकर अपने-अपने तरीके से इलाज किया जाता है। जिसकी मौत हो जाती है उसके लिए कहा जाता है कि भूत के बहुत गुस्से में होने तथा उचित समय पर झडवाने के लिए नहीं लाये जाने के कारण बीमार चल बसा।
भारत दुनिया का पहला देश है जहां लाख कोशिशों के बाद भी अंधविश्वास की जडें पूरी तरह से कट नहीं पायी हैं। अंधभक्ति और अंधविश्वास के कारण कुछ लोग इंसान से हैवान बनने में जरा भी देरी नहीं लगाते। झारखंड की राजधानी रांची के निकट अंजाम दी गयी यह शैतानी वारदात अच्छे-भले आदमी का दिल दहला सकती है। जो बेरहम और मतलबपरस्त हैं उनके लिए यह जालिमाना हरकत महज एक खबर है जिसे पढकर फौरन भुला दिया जाना बेहतर है। झारखंड के इस गांव में बीते कुछ महीनों में एक-एक कर चार बच्चों की किसी बीमारी की वजह से मौत हो गयी। गांव के कुछ लोगों ने गहन-चिंतन मनन किया कि आखिर बच्चे अचानक क्यों चल बसे? अंतत: उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि यह मौतें उन पांच महिलाओं की देन हैं, जो कि वस्तुत: डायन हैं। अपने जादू-टोने से अच्छे खासे इंसान को ऊपर पहुंचा सकती हैं। यह रहस्योद्घाटन होते ही गांव वालों के गुस्से को आसमान पर पहुंचने में देरी नहीं लगी। कुछ लोगों ने अपने-अपने घरों में रखे घातक हथियार उठाये और पहुंच गए उन तथाकथित डायनोें के घर। पांचों को बडी दरिंदगी के साथ घर से निकाला गया। फिर उन्हें निर्वस्त्र कर, बुरी तरह से पीटा और घसीटा गया। इतने में भी उनकी हैवानियत की आग ठंडी नहीं हुई। वह औरतें, जिसमें एक मां-बेटी भी शामिल थी, रोती और गिडगिडाती रहीं, लेकिन किसी का भी दिल नहीं पसीजा। इस कू्रर तमाशे की भीड में गांव की महिलाएं भी शामिल थीं। उनके चेहरे पर गम नहीं, खुशी की रौनक थी। गजब का तसल्ली भाव भी था। आखिरकार भरी भीड के समक्ष पांचों औरतों को पत्थरों और भालों से लहुलूहान कर  मौत के घाट उतार दिया गया।
यदि आप यह सोचते हैं कि अंधभक्ति, अंधविश्वास और ढोंगियों के जाल का फैलाव सिर्फ गांवों तक ही सीमित है और अनपढ ही इसकी लपेट में आते हैं तो आप फौरन अपनी सोच बदल लें। आज के युग के कपटी भगवाधारी नगरों और महानगरों में लूट और अंधविश्वास की फसलें बोने में पूरी तरह से कामयाब हैं। एक आसाराम के तंत्र-मंत्र और छलकपट के मायाजाल के पर्दाफाश होने की सुर्खियों की आग ठंडी भी नहीं पडती कि कोई नया आसाराम श्रद्धा और आस्था के बाजार में परचम लहराता नजर आता है। कोई रूपसी राधे मां बन जहां-तहां हलचल मचा देती है। असंत होने के बावजूद संतों का भेष धारण कर आडंबर करने वाले तथाकथित साधु-संतों को मान-सम्मान देने वाले न तो उनका काला अतीत जानना चाहते हैं और न ही पर्दे के पीछे का घिनौना वर्तमान। लोगों की इसी कमजोरी का फायदा उठाने के लिए ही आसाराम और राधे मां जैसे चेहरे धर्म और आस्था के बाजार में बेखौफ उतर जाते हैं, जहां धन भी बरसता है और भरपूर मान-सम्मान भी। वैसे भी इस देश में भगवाधारियों के प्रवचन सुनने को लोग बेताब रहते हैं। उन पर अपना सर्वस्व अर्पण करने में भी देरी नहीं लगाते। उनकी आस्था की तंद्रा कभी भी नहीं टूटती। आसाराम की जेलयात्रा के बाद भी उसके अंधभक्तों की भक्ति में कोई कमी नहीं आयी। वे मानने को तैयार ही नहीं कि आसाराम एक ऐसा अपराधी है जिसने अपने आश्रमों को अय्याशी का ऐसा अड्डा बना दिया था जहां महिलाओं की अस्मत लूटी जाती थी। राधे मां के इर्द-गिर्द भी जिस तरह से रसूखदारों और धनवानों की भीड कवच बनी खडी नजर आती है उससे यह भी प्रतीत होता है कि इन आत्मघोषित भगवानों की बदौलत और भी कई लोगों के स्वार्थ सधते होंगे, इसलिए सच से वाकिफ होने के बावजूद भी यह परमभक्त टस से मस नहीं होते। अदालतों और पुलिस थानों में भी अपने आराध्य के झूम-झूम कर जयकारे लगाते हैं। आजकल टेलीविजन के विभिन्न चैनलों पर भी तंत्र-मंत्र का कारोबार बुलंदियों पर है। कुछ गुजरे जमाने के फिल्मी सितारे भी बडे-बडे दावों के साथ खुशहाली लाने वाले चमत्कारी यंत्रों की विज्ञापनबाजी कर मोटी कमाई कर रहे हैं। इनके झांसे में आने वाले अनाडियोेंं के दिन तो बदलने से रहे, लेकिन छल, कपट और फरेब का कारोबार तो अबाध गति से बढता ही चला जा रहा है!

Thursday, August 13, 2015

हिन्दुस्तान की पीडा

देश की आजादी की वर्षगांठ पर वो उमंग और खुशी नदारद है, जिसकी तरंगों से देश का जन-जन उमंगों के झूले में झूलता नजर आना चाहिए था। नयी सरकार भी देशवासियों को प्रफुल्लित नहीं कर पायी। अजीब-सी खामोशी है जो चीखने को बेताब है। पिछले कई वर्षों से देश को लहुलूहान करती चली आ रही नक्सली समस्या का भी अभी तक कोई हल नहीं तलाशा जा सका। हिंदुस्तान की धरती पर पलते किस्म-किस्म के गद्दार भी अमन-शांति और तरक्की की राह में जबरदस्त अवरोध बने हुए हैं। कुछ भारतीय पत्रकारों के विदेशी ताकतों के हाथों खेलने और आइएस में शामिल होने की राह पर बढने की खबरों ने स्तब्ध कर दिया है। उस पर पडौसी देश पाकिस्तान अपनी दरिंदगी और नीचता से कभी भी बाज नहीं आने की कसम खाये है। तभी तो पंजाब के गुरदासपुर में एक पुलिस थाने पर जहरीले पाकिस्तान के सिखाये-पढाये आतंकवादी हमला करने की जुर्रत कर दिखाते हैं। इस हमले की खबरें अभी ठंडी भी नहीं पडतीं कि जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर पाकिस्तानी आतंकी बीएसएफ के दो जवानों को मार गिराते हैं। यह आतंकी वारदातें यही बताती हैं कि कुत्ते की पूंछ के सीधे होने के भ्रम में रहना कितना घातक हो सकता है। मात पर मात खाता पाकिस्तान अपनी अंदरूनी बरबादी से इतना बौखलाया हुआ है कि उसे कुछ भी नहीं सूझ रहा है। बस...भारत में आंतक के नये-नये मोर्चे खोलता चला जा रहा है। आश्चर्य, हम बेबस हैं! हां, यह अच्छी बात है कि एक आतंकी को हमने जीवित पकडने में सफलता पाकर पाकिस्तान को मुंहतोड जवाब देने का अवसर जरूर पा लिया। इस पाकिस्तानी को पकडने और दबोचने में अगर स्थानीय लोग हिम्मत और सतर्कता नहीं दिखाते तो यह मौका भी धरा रह जाता। मुंबई हमलों के गुनहगार अजमल कसाब के बाद पाकिस्तान में पले-बढे और प्रशिक्षित हुए इस दूसरे आतंकी के जिन्दा पकडे जाने से पूरी दुनिया भी जान गयी है कि भारतवर्ष यूं ही शोर नहीं मचाता कि पाकिस्तान ही आतंक और आतंकियों का असली पोषक और जन्मदाता है। इस अपाहिज देश के शातिर हुक्मरानों ने पडौसी देश का जीना हराम कर रखा है। यह खुद के देश को गर्त में डुबोते हुए हिन्दुस्तान में बम-बारूद बिछवाकर निर्दोष इंसानों की जानें लेते चले आ रहे हैं।
 पकड में आया आतंकी नावेद पाकिस्तान की साजिशों का वो निर्मम चेहरा है जिसका एक ही मकसद है भारत पर बार-बार हमले और आतंक का कहर बरपाते चले जाना। भारतीय सीमा तथा भारत के कई शहरों में भी पाकिस्तान की पाठशाला के कई नावेदों के फैले होने की प्रबल संभावना है। पकडा गया आतंकी गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर है। वह कभी अपना नाम कासिम खान, कभी उस्मान तो कभी नावेद बताकर चकमा देने की कोशिश करता रहा। उसकी उम्र बीस के आसपास है, लेकिन जिहादी जुनून, धार्मिक कट्टरता और दु:साहस ने उसे हद से ज्यादा अंधभक्त और कू्रर बना दिया।
मैं यहां हिन्दुओं को मारने आया हूं, मुझे ऐसा करने में मज़ा आता है।'  कुटिल मुस्कान के साथ कहे गये उसके यह शब्द उसके पूरी तरह से पत्थर दिल होने के गवाह हैं। उसके दिल और दिमाग में यह बिठा दिया गया है कि हिन्दुओं का कत्लेआम करने के बाद उसे हर हालत में जन्नत नसीब होगी।  देश के उम्रदराज विख्यात लेखक पत्रकार श्री रमेश नैयर कई बार पाकिस्तान की यात्रा कर चुके हैं। उन्होंने अपने यात्रा संस्करण में लिखा है कि, '१९९५ में पाकिस्तान यात्रा में मैंने पाया कि वहां के बच्चों को शुरुआत से ही भारत के प्रति नफरत का पाठ पढाया जाता है। स्कूलों में जो इतिहास पढाया जाता है, उसकी शुरुआत २० जून सन ७१२ इस्वी में मुहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध के राजा दाहिर सेन की पराजय व हत्या से होती है। बच्चों को बार-बार याद दिलाया जाता है कि 'उन्होंने आठ सदियों तक हिन्दुस्तान पर हुकूमत की थी और फिर से करेंगे। पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान ने भारत को परेशान करने के लिए क्या कुछ नहीं किया। हालांकि युद्ध के मैदान में मुंह की खाने के बाद उसे यह पता चल ही गया है कि भारत को पराजित करने की उसकी औकात नहीं है। फिर भी वह सपने देखने से बाज नहीं आता। आज हिन्दुस्तान इतना मजबूत हो चुका है कि सौ पाकिस्तान भी इसका बाल भी बांका नहीं कर सकते। यहां के बच्चों को दुष्ट पाकिस्तान की तरह अनैतिकता  और हिंसा का पाठ नहीं पढाया जाता। न ही भारत वर्ष से पाकिस्तान में चोरी छिपे आत्मघाती दस्तों को भेजकर पीठ में छूरा घोपने की नीच हरकतें की जाती हैं। भारत तो पाकिस्तान के साथ एक सच्चे साथी की तरह रहना चाहता है, लेकिन पाकिस्तान अभी भी उन सपनों में खोया है जो कभी पूरे नहीं होने वाले। दुनिया के किसी भी देश में भारत से टकराने का दम नहीं, लेकिन घर में छिपे गद्दारों का क्या किया जाए? आजादी के ६९वें वर्ष में भी हिंदुस्तान को यही चिंता खाए जा रही है। जम्मू और कश्मीर में उर्दू और अंग्रेजी में कुछ अखबार छपते हैं जो हिंसा को भडकाने के हिमायती हैं। देशहित की खबरों को प्राथमिकता देने के बजाय इन अखबारों में भारत की संप्रभुता और अखंडता को खतरा पहुंचाने वाली खबरें और लेख धडाधड छापे जाते हैं फिर भी इन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। इस देश की हवा में सांस लेने वाले कई बुद्धिजीवियों की संदिग्ध हरकतें भी qचता में डाल देती हैं। बेहद गुस्सा भी आता है। आतंकवादी याकूब को जब फांसी की सजा सुनायी गयी तो तथाकथित बुद्धिजीवियों ने जिस तरह से हो-हल्ला मचाया, वह सच्चे देशप्रेमियों को कतई रास नहीं आया। देश की लोकसभा और राज्यसभा में होने वाली तमाशेबाजी ने भी शासकों तथा राजनेताओं के कद को घटाया है। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस यह कहकर नहीं बच सकती कि उसने भी वही किया जो कभी भाजपा ने किया था। इसमें आखिर देश हित कहां है? स्वतंत्रता दिवस पर समस्त देशवासियों का हार्दिक अभिनंदन ...असीम शुभकामनाएं।

Thursday, August 6, 2015

सूरत की असली सूरत

किसी भी शहर की असली पहचान वहां की लम्बी-चौडी सडकों, जहां-तहां तन कर खडी गगनचुम्बी इमारतों और विशालतम मॉल से नहीं, वहां पर रहने और बसने वाले लोगों से होती है। उनके व्यवहार, रहन-सहन और उनके आपसी रिश्तों से तस्वीर का काफी कुछ सच बयां हो जाता है। इमारतें तो बनती, टूटती रहती हैं। मॉल और बाजारों की शक्ल बदलने में भी देरी नहीं लगती। गुजरात के तेजी से बढते शहर सूरत को यूं तो कपडा और हीरा उद्योग के लिए जाना जाता है, लेकिन इस शहर की और भी कई विशेषताएं हैं, जो इसे खास दर्जे से भी काफी ऊपर ले जाती हैं। यह कहना कहीं कोई अतिशयोक्ति नहीं कि इस व्यावसायिक नगरी में पूरा भारत बसता है। बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, उडीसा के मेहनतकश लोगों को यह शहर सम्मानजनक नौकरियां और रोजगार उपलब्ध कराता है। हरियाणा और छत्तीसगढ के पानीपत, सोनीपत, रोहतक, झज्जर, रायपुर, बिलासपुर, कोरबा, राजनांदगांव आदि जैसे छोटे शहरों से कई लोग यहां आए और अपनी मेहनत और सूझबूझ के दम पर देखते ही देखते कपडा बाजार के सम्राट बन करोडों और अरबों में खेलने लगे। उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वे इतनी अधिक आर्थिक तरक्की कर लेंगे कि देखने वालों की आंखें चौंधिया जाएंगी। दरअसल, यह शहर बिना किसी भेदभाव के हर किसी की उन्नति और स्वागत को तत्पर रहता है। जिनके हौसले बुलंद होते हैं और अपने सपनों को साकार करने की अथाह जिद होती है, उन्हें यह नगरी कभी निराश नहीं करती। यहां पर कई पीढ़ियों से रहते चले आ रहे गुजराती भाई और अन्य बाशिंदे टांग खीचने की बजाय पीठ थपथपाने की परिपाटी के हिमायती हैं। यहां के किसी नेता ने बाहर से आने वाले लोगों के प्रति कभी रोष नहीं जताया। किसी भी उभरते नेता ने गुजरातियों को भडकाने के लिए यह भाषणबाजी नहीं उछाली कि देश के दूसरे प्रदेशों से आने वाले लोगों ने यहां के मूल निवासियों की तरक्की के रास्ते रोक दिए हैं। गुजरात और सूरत पर सिर्फ हमारा अधिकार है। अगर आपको साम्प्रदायिक सौहाद्र्र की जीवंत तस्वीर देखनी हो तो गुजरात के शहर सूरत से बेहतर और कोई जगह नहीं हो सकती। यहां पर लाख कोशिशों के बाद भी आपको गोधरा कांड और उसके बाद हुए गुजरात दंगों की याद दिलाने वाली स्मृति की परछाई तक दिखायी नहीं देगी। यह शहर कभी भी अतीत में नहीं जीता। यहां के लोग वर्तमान में जीने की कला में पारंगत हैं। जो बीत गया, वो सपना था। कटु सपनों को याद रखने से क्या फायदा...। यहां के लोग रिश्ते निभाने में कभी कोई कंजूसी नहीं करते। जाति और धर्म की संकीर्ण भावना से ऊपर उठकर इन्हें अटूट दोस्ती निभाना भी खूब आता है। ऐसी ही एक दोस्ती की दास्तां से जब मुझे रूबरू होने का अवसर मिला तो एक बारगी तो मन में विचार आया कि ऐसा तो सिर्फ फिल्मों में होता है, लेकिन यह सच है। सौ फीसदी सच। हिंदू जय और मुस्लिम जुनेद सूरत की पहचान बन चुके हैं। प्रबल एकता और भाईचारे के प्रतीक। जय और जुनेद की दोस्ती की शुरुआत लगभग तीस वर्ष पूर्व हुई। जय का पूरा नाम है जयकुमार अग्रवाल और जुनेद का मेमण जुनेद ओरावाला। दोनों के विचार मिलते थे,  इसलिए पहली मुलाकात में ही दोस्ती की ऐसी नींव पडी, जिसे आज तक कोई हिला नहीं पाया। १९८९, १९९२ तथा २००२ में जब गुजरात में दंगे हुए तो सूरत भी उनकी लपेट में आने से नहीं बच पाया था। जय और जुनेद ने चुपचाप तमाशा देखने की बजाय फौरन दंगाग्रस्त क्षेत्र में पहुंचकर पीडितों की तन-मन-धन से मदद की। इतना ही नहीं, उन्होंने दोनों समुदायों के लोगों को समझाया-बुझाया और मिलजुल कर रहने का पाठ पढाया। हमारे यहां धर्म-कर्म के ढोल तो बहुत पीटे जाते हैं, लेकिन इन्हें जीवन में उतारने का जब समय आता है तो अक्सर कन्नी काट ली जाती है। सभी धर्मों का आदर-सम्मान करने वाले जय और जुनेद के धर्म और जीवन का मूल मंत्र दुखियारों, गरीबों और सभी जरूरतमंदों की निस्वार्थ सेवा करना है। जय और जुनेद की दोस्ती को उनके परिजनों तथा समाज ने भी पूरे मन के साथ स्वीकारा और सराहा है। सभी को उनकी इस आदर्श दोस्ती पर फख्र है। दोनों के परिवारों के बीच की प्रगाढ आत्मीयता देखते बनती है। एक दूसरे के पारिवारिक कार्यक्रमों, त्योहारों में जय और जुनेद के परिवार के लोग बडे उत्साह के साथ उपस्थित होकर खुशियां मनाते हुए एक दूसरे को अटूट शुभकामनाओं और बधाई से सराबोर कर देते हैं। राजस्थान में रहने वाली जय की बहन मंजू तो जुनेद पर अपनी जान छिडकती है। उसे जुनेद पर अपने भाई जय से ज्यादा भरोसा है। वह किसी पर्व पर भले ही जय को भूल जाए, लेकिन जुनेद को याद करना नहीं भूलती। दोनों दोस्त अपने-अपने धर्म के प्रति भी पूरी तरह से समर्पित हैं। जय जहां प्रतिदिन मंदिर जाकर पूजा अर्चना करते हैं वहीं जुनेद की नियमित नमाज में कभी कोई चूक नहीं होती। इनकी दोस्ती का संदेश दूर-दूर तक पहुंचा है। सूरत तथा आसपास के इलाके के असहाय मरीजों की देखभाल करने वाली संस्था मरहूम अ. सत्तार नुरानी सार्वजनिक सहायता केंद्र में जय कुमार को सदस्य बनाया है। इस संस्था में २४ सदस्य हैं। जय कुमार एकमात्र हिंदू सदस्य हैं। सूरत के जय और जुनेद ने दोस्ती की आदर्श मिसाल पेश कर किसी कवि की लिखी इन पंक्तियों को यकीनन बडी सहजता और खूबसूरती के साथ साकार किया है :
"दोस्ती की नन्हीं-सी परिभाषा,
मैं शब्द, तुम अर्थ, तुम बिन मैं व्यर्थ।।"

Thursday, July 30, 2015

किस-किस का अपमान!

एक जमाना था जब नेता, मंत्री और अफसर बहुत सोच-समझकर बोला करते थे। मंत्री तो सभ्यता और शालीनता की प्रतिमूर्ति हुआ करते थे। इक्कीसवीं सदी में बहुत कुछ बदल गया है। पढे-लिखे राजनेता और नौकरशाह भी ऊल-जलूल वाणी बोलकर अपने पद की गरिमा और अहमियत को सूली पर चढाने में देरी नहीं लगाते। उनकी बदजुबानी और बेवकूफियों पर सजग देशवासी माथा पीटते रह जाते हैं। ऐसा भी लगता है कि कुछ प्रतिष्ठित और ताकतवर नौटंकीबाजों के लिए देश एक रंगमंच बन चुका है। बिना थके बकवासबाजी और उछलकूद करते ही रहते हैं। कभी किसी राजनेता के मन में बलात्कारियों के प्रति प्रेम उमडने लगता है तो कोई राष्ट्रद्रोही के पक्ष में भी छाती तानकर खडा हो जाता है। कौन सम्मान का हकदार है और किसे लताडना चाहिए इसकी समझ को भी दरकिनार कर दिया गया है। अपने देश में किसानों की जितनी आत्महत्याएं होती हैं, शायद ही किसी और देश में होती हों। देश के केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने किसानों की आत्महत्याओं के नये कारणों की खोज की है। वे फरमाते हैं कि किसान घरेलू समस्याओं, नपुंसकता, बांझपन, इश्कबाजी और नशाखोरी के चक्कर में फंसकर इतने निराश और हताश हो जाते हैं कि अन्तत: उन्हें खुदकुशी करने को मजबूर होना पडता है। मंत्री महोदय की सोच, समझ और चिंतन प्रक्रिया तो यही दर्शाती है कि वे हद दर्जे के बेवकूफ, जाहिल और गंवार इंसान हैं। उन्हें देश के अन्नदाता के बारे में कुछ भी पता नहीं है। ऐसे में सवाल यह भी है कि जिस शख्स को अपने देश के मेहनतकश किसानों की मूल समस्याओं का ज्ञान नहीं, उसे कृषि मंत्री क्यों बना दिया गया? जवाब बडा सीधा-सादा है। हिंदुस्तान में कुछ भी संभव है। मंत्री बनने के लिए विद्धता और समझदारी की कोई जरूरत नहीं है।
उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में साहूकार की चालबाजी और शैतानी से तंग आकर आशाराम नामक किसान ने डीएम के आवास के समक्ष फांसी लगाकर इस दुनिया से हमेशा-हमेशा के लिए विदायी ले ली। सत्ता की चौखट पर अपने प्राण त्यागने वाले किसान का इरादा प्रशासन को जगाना और यह बताना था कि मैं अपने प्राण त्याग कर यह संदेश छोडे जा रहा हूं कि सभी देशवासियों का पेट भरने वाले किसान की अनदेखी मत करो। उसकी तकलीफों को जानो और समझो, लेकिन बाराबंकी के अंधे, बहरे और निर्लज्ज डीएम ने फौरन यह बयान दाग दिया कि 'किसान आशाराम तो शराबी था। कोई काम-धाम करता ही नहीं था। ऐसे में उसने वही किया जो उसके जैसे दूसरे शराबी करते हैं।' यानी इस देश में आत्महत्या करने वाला हर किसान किसी न किसी ऐब से ग्रस्त होता है। हर किसान की समस्या का अंतिम इलाज फांसी यानी मौत ही है। मगराये कृषि मंत्री और डीएम पता नहीं इस हकीकत को क्यों भूल गये कि इस देश के रईस शराब में डुबकियां लगाते हैं। अवैध रिश्ते बनाने के भी कीर्तिमान बनाते रहते हैं। उनके यहां भी पारिवारिक युद्ध होते रहते हैं। उन्हें भी प्रेम संबंधों के टूटने की पीडा से रूबरू होना पडता है, लेकिन वे तो ऐसे आत्महत्या नहीं करते जैसे किसान करते चले आ रहे हैं। मंत्रीजी, किसानों के फंदे पर झूलने और जहर खाकर मौत को गले लगाने की असली वजह गरीबी है। वो आर्थिक तंगी है, जिसे आप लोग दूर करने का प्रयास ही नहीं करते। आप लोगों का दिमाग भी तो ऊल-जलूल सोच में उलझा रहता है। किसानों को कैसे नये-नये तरीकों से फायदे की खेती के लिए प्रेरित किया जा सकता है इसकी तरफ ध्यान देने का समय नहीं है आप जैसों के पास।
अरविंद केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं। उन्हें सभी पुलिसिये 'ठुल्ले' नजर आते हैं। जब से वे दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं, तभी से उनकी दिल्ली की पुलिस से ठनी हुई है। यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं है कि हर विभाग की तरह पुलिस विभाग में भी कुछ वर्दीधारी अपने कर्तव्य को सही ढंग से नहीं निभाते। रिश्वतखोरी और बेईमानी के कर्मकांडों में इस कदर लिप्त रहते हैं कि अपराधियों और उनमें कोई फर्क नहीं रह जाता, लेकिन पुलिस विभाग में ऐसे भी अधिकारी और कर्मचारी भरे पडे हैं जो अपना फर्ज निभाने में कहीं कोई कोताही नहीं बरतते। उन्हीं के कारण ही अराजक तत्वों के हौसले पस्त रहते हैं और कानून व्यवस्था के साथ अमन-चैन बना रहता है। आम नागरिक खुद को सुरक्षित नहीं महसूस करता। गौरतलब है कि 'ठुल्ला' ऐसे शख्स को कहा जाता है जो दिए गए काम को करने में नाकाम रहता है। यकीनन नाकामी की कई वजहें होती हैं। ठुल्ला और नाकारा एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। मुख्यमंत्री के इस संबोधन से ईमानदार और कर्तव्यपरायण पुलिस वालों का दु:खी होना जायज है। उनकी इस अपमानजनक टिप्पणी ने दिल्ली पुलिस के हर उस अधिकारी, कर्मचारी का मनोबल तोडा है जो अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभाते हैं। कई कानून के जानकारों का यह भी कहना है कि किसी भी शब्दकोश में 'ठुल्ला' शब्द को अपमानजनक नहीं माना गया है। यह तो मजाकिया लहजे में बोला जाने वाला ऐसा शब्द है, जिसका इस्तेमाल आम है। पुलिस वालों के लिए इस शब्द का वर्षों से चलन है। पहले तो कभी किसी ने इस पर आपत्ति नहीं जतायी?
जब एक मुख्यमंत्री ही खाकी वर्दी वालों का उपहास उडाने में कोई संकोच नहीं करता तो आम लोगों को दोष देना बेमानी है। मुख्यमंत्री का काम पुलिस व्यवस्था में सुधार लाना है न कि सभी पुलिसवालों का मजाक उडाना। 'जैसा राजा वैसी प्रजा' की कहावत को शब्दकोश में जगह देने से पहले यकीनन कई-कई बार सोचा गया होगा। जो पुलिस कर्मी ठंड, गर्मी और बरसात की चिंता छोड परिवार से दूर चौबीस घण्टे काम करते रहते हैं उन्हें कोई भी मजाक और कटाक्ष आहत करता है। उनकी प्रतिष्ठा पर जो चोट पहुंचती है, उसका आकलन बडबोले सत्ताधीश नहीं कर सकते। हुक्मरानों के भटकाव के कारण ही देश की तस्वीर बद से बदतर होती चली जा रही है। जहां पर उनका ध्यान होना चाहिए वहां तो वे देखते ही नहीं! मध्यप्रदेश के एक स्कूल में सातवीं के बच्चों को पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के गुणगान का पाठ पढाने की पुख्ता खबर ने हैरत में डाल दिया। क्या हमारे देश में महापुरुषों की कमी है जो पाकिस्तान के एक घटिया शासक की जीवनी से छात्रों को अवगत कराया जा रहा है? इसी अहसान फरामोश, धोखेबाज और बदजात मुशर्रफ के कार्यकाल में कारगिल युद्ध हुआ, जिसमें भारत के कई सैनिक शहीद हुए थे। मुशर्रफ ने हमेशा भारत के खिलाफ जहर उगला। आतंकी हमले करवाए। अफसोस! देश की नयी पीढी को शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, लाला लाजपत राय जैसे देश के सच्चे सपूतों की जीवनगाथाओं से अवगत कराने की बजाए देश के दुश्मनों का महिमामंडन कर देश के शहीदों का अपमान किया जा रहा है...!

Thursday, July 23, 2015

हिम्मत तो दिखानी ही होगी

कहीं न कहीं कोई बहुत बडी गडबड तो है। अंधेरा पूरी तरह से छंटने का नाम नहीं ले रहा है। देशवासी बेहद शंकित हैं। ऐसा कब तक चलता रहेगा? २००६ में कई मासूम बच्चों की हत्या कर उनका मांस खाने वाले दो हैवान बडी मुश्किल से कानून की पकड में आये थे। नोएडा पुलिस ने धनवान, शैतान मोनिंदर सिंह पंधेर और उसके नौकर सुरेंद्र कोली को दबोचा था। कोली ने बारह बच्चों की निर्मम हत्या की बात कबूली थी। उसे फांसी की सज़ा सुना दिये जाने के बाद भी उसे जिन्दा रहने का मौका उपहार स्वरूप दे दिया गया! जब कानून मात्र दिखावा बनकर रह जाता है तो अपराधियों के हौसले बढते ही हैं। निठारी जैसे कांडों का सिलसिला चलता ही रहता है।
लगभग ९ साल बाद निठारी कांड से भी भयावह बलात्कार और हत्या कांड के सामने आने से यह मान लिया जाना चाहिए कि राक्षसी प्रवृत्ति के हैवानों के हौसले कम नहीं होने वाले। उन्हें कानून का कोई भय नहीं है। किसी भी सज़ा का खौफ उन्हें नहीं सताता। सन २०१५ के जुलाई महीने में पुलिस के शिकंजे में आया कुकर्मी रविन्द्र मासूम बच्चों को देखकर शैतान बन जाता था। वह पार्क में खेलते बच्चों या कहीं भी अकेले दिखने वाले मासूमों को चाकलेट और रुपयों का झांसा देकर सुनसान जगह पर ले जाता और फिर उनका यौन शोषण कर बडी बेदर्दी से हत्या कर चलते बनता। अकेले दिल्ली में ही उसने कई वारदातों को अंजाम दे डाला। नोएडा, बदायूं और अलीगढ आदि में भी इस दरिंदे ने कई मासूम बच्चों को अपनी हत्यारी-वासना का शिकार बनाया। पूरा आंकडा तो उसे भी याद नहीं है। फिर भी लगभग चालीस बच्चे उसकी अंधी वासना की बलि चढ गये। उसे अश्लील फिल्में, शराब तथा गांजा पीने की लत लग चुकी थी। जब नशा उफान पर होता तो वह शैतान बन जाता और बच्चों को अपनी हैवानियत का शिकार बनाता चला जाता। बाद में पकडे जाने के भय से बच्चों की निर्मम हत्या कर आराम से घर में जाकर सो जाता। कहते हैं कि अपराधी खाकी से कांपते हैं, लेकिन उसके चेहरे पर चिंता और डर की कोई शिकन नहीं देखी गयी। उसने यह कहने में भी देरी नहीं लगायी कि यदि पकड में नहीं आता तो वह ऐसे ही दो से दस वर्ष के बच्चों के साथ कुकर्म कर उनकी नृशंस हत्याएं करता चला जाता। ट्रक में हेल्पर की नौकरी करने वाला २४ वर्षीय यह दरिंदा पिछले सात वर्षों से ऐसी वारदातों को अंजाम देता चला आ रहा था। ट्रक के साथ जहां जाता था, वहीं मौका मिलते ही किसी भी मासूम बच्चे को लुभावने लालच के जाल में फांस लेता था। उसे अच्छी तरह से मालूम है कि अब उसकी सारी जिन्दगी जेल में ही बीतने वाली है, लेकिन इसका उसे कोई गम नहीं है।
हर बलात्कारी यह सोचकर संतुष्ट हो जाता है कि उसने जो चाहा था, वह पा लिया। अब जो होगा देखा जायेगा। असली पहाड जिन पर टूटता उनके दर्द और पीडा को कभी देखा और समझा नहीं जाता। वैसे भी यहां कौन किसकी फिक्र करता है। अदालतों में विराजमान कुछ न्याय के देवताओं का देवत्व भी गायब होता जा रहा है। उनकी असंवेदनशीलता बताती है कि वे भी कहीं न कहीं बला टालने की मानसिकता के शिकार होते चले जा रहे हैं।
कुछ दिनों पूर्व मद्रास उच्च न्यायालय ने एक नाबालिग से बलात्कार के मामले में हैरतअंगेज फैसला सुनाते हुए पीडिता को बलात्कार के आरोपी से शादी करने की सलाह डाली। वे यह भूल गये कि बलात्कार की शिकार महिला को बलात्कारी के साथ शादी करने की सलाह देना उसकी आत्मा को छलनी और लहुलूहान करने जैसा है। यह सुझाव बलात्कारी के हौसले को पस्त करने के बजाय उनके मनोबल को बढाने वाला है। किसी महिला की इज्जत पर डाका डालने और उसके सम्मान के साथ जीने के अधिकार को छीनने की भरपायी न तो धन-दौलत से हो सकती है और न ही शादी से। पीडिता २००८ में वी. मोहन नामक बलात्कारी की हैवानियत का शिकार हुई थी। तब वह दसवीं की परीक्षा की तैयारी कर रही थी। मोहन उसका पडोसी था। मोहन ने उसे किसी काम के बहाने अपने घर बुलाया। फिर बडी चालाकी से कोल्डड्रिंक में नशीली दवा मिला कर पिलायी। उसे पीते ही वह अपनी सुध-बुध खो बैठी। मोहन ने उस पर बलात्कार कर तस्वीरें भी खींच लीं। इन्हीं नग्न तस्वीरों का डर दिखाकर वह लगातार नीचकर्म करता रहा। लडकी कई बार गिडगिडायी, हाथ पांव भी जोडे पर उसे दया नहीं आयी। आखिरकार बेबस लडकी गर्भवती हो गयी। उसकी पढाई भी छूट गयी। भविष्य चौपट हो गया। लोग छींटाकशी के तेजाब की बौछारें करने लगे। जीना दुश्वार हो गया। जैसे-तैसे उसने खुद को संभाला। बलात्कारी के खिलाफ अदालती लडाई लडती रही। महिला कोर्ट ने बलात्कारी मोहन पर न सिर्फ दो लाख रुपये का जुर्माना लगाया, बल्कि सात साल की सजा भी सुनायी। बलात्कारी मोहन ने इस फैसले के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट में जमानत के लिए अपील दायर की। हाईकोर्ट ने उसकी अंतरिम जमानत मंजूर करते हुए पीडिता के साथ शादी कर घर बसाने का हैरतअंगेज सुझाव देकर हर सजग देसवासी को हैरान-परेशान कर दिया। लडकी इस फैसले को सुनकर स्तब्ध रह गयी। उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बलात्कार के मामले में शादी के नाम पर किसी भी तरह का समझौता पीडिता और बलात्कारी में नहीं हो सकता। इस तरह के सुझाव देना असंवेदनशीलता की श्रेणी में आता है। अपनी सात वर्षीय बेटी के साथ संघर्ष करती और लोगों के ताने झेलती लडकी का दर्द इन शब्दों में छलका है : "अगर मैं जज के फैसले को मान लेती तो जिन्दगी भर मेरा रेप ही होता रहता। मेरे लिए चरित्र और मान-सम्मान से ज्यादा और किसी चीज़ की अहमियत नहीं है।"
आज वह बिनब्याही मां है, लेकिन थकने और हारने को तैयार नहीं। वह आत्मबल और स्वाभिमान की प्रतिमूर्ति है उसने ठान लिया है कि बेटी के साथ वह भी पढाई करेगी। वह अपनी बेटी को अच्छी से अच्छी शिक्षा देने में कोई कभी नहीं रखेगी। यही ताकत और जिद ही तो भारतीय नारी की असली पहचान है। यह भी सच है कि इस देश में बडी क्रूरता के साथ अंजाम दिये जाने वाले सभी बलात्कारों की रिपोर्ट पुलिस थानों में दर्ज नहीं हो पाती। कई बलात्कृत नारियां कानून का दरवाजा खटखटाने से कतराती हैं। पिछले दिनों हर तरफ सुर्खियां पाने वाली यह खबर इस कलमकार को बेहद निराश कर गयी कि कजलीगढ में गुंडे-बदमाशों के एक गिरोह ने दो वर्षों में ४५ लडकियों के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया, लेकिन किसी भी लडकी ने थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाने की हिम्मत नहीं दिखायी!!

Thursday, July 16, 2015

धमकाने और दबाने की राजनीति

महानगरों, शहरों और ग्रामों में कुछ धन्नासेठों, नेताओं और तथाकथित समाज सेवकों की अपनी अलग सत्ता चलती है। अराजक तत्वों से दोस्ती और शासकीय अधिकारियों पर रौब झाडकर अपना काम निकलवाने में इन्हें महारत हासिल होती है। जब भी इनका कोई चहेता किसी बडे लफडे में फंस जाता है तो फौरन इनका फोन अधिकारी तक पहुंच जाता है। हत्यारों, बलात्कारियों, माफियाओं और गुंडे बदमाशों की खाकी के संग यारी और हिस्सेदारी अक्सर उजागर होती रहती है। दुनिया के सबसे बडे इस लोकतांत्रिक देश में देशद्रोहियों तक को कानून और पुलिसिया शिकंजे से बचाने के लिए कसरतबाजी चलती रहती है। छोटे शहरों में छुटभैय्ये नेता भी अपना काम निकालने के लिए शासकीय अधिकारियों पर धौंस जमाते रहते हैं। जब तक उनकी सुनी जाती है तब तक तो सब ठीक रहता है, अनसुनी करने पर अधिकारी को सबक सिखाने के लिए अपने ऊपर के आकाओं तक दौड लगायी जाती है। सत्तारुढ पार्टी के नेता तो अपने शहर और गांव में पुलिस वालों पर ऐसे हुक्म बजाते हैं जैसे वे ही असली पीएम और सीएम हों। अगर कोई ईमानदार अधिकारी उन्हें भाव नहीं देता उनका खून खौल उठता है। वे उसका स्थानांतरण करवाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं। कुछ नेता तो सफल भी हो जाते हैं। ऐसे में उनकी चारों तरफ तूती बोलने लगती है। राजनीतिक भविष्य भी उज्जवल हो जाता है। भूमाफिया, खनन माफिया, काले धनपति और तमाम संदिग्ध कारोबारी उन नेताओं से करीबी बनाने की फिराक में रहते हैं, जिनका असरदार शासकीय अधिकारियों के बीच उठना-बैठना होता है। यह नेता भी उन्हें कभी निराश नहीं करते। इस हाथ दे और उस हाथ ले के दस्तूर पर चलते हुए अपनी राजनीति की दुकान का रूतबा और रौनक बढाते रहते हैं। देश में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने से पहले नागपुर के एक नेता भ्रष्टाचार के आरोपों के चक्रव्यूह में फंस गये थे। आयकर विभाग ने अपना शिकंजा कसना शुरू किया ही था कि उन्होंने आयकर अधिकारियों पर चेतावनी की बंदूक तान दी थी कि यह मत भूलो कि अब केंद्र और प्रदेश में हमारी पार्टी की सरकार आने वाली है। भाजपा की सत्ता आते ही मैं एक-एक को देख लूंगा। वे नेता वर्तमान में केंद्र सरकार में दमदार मंत्री हैं। देश के दिग्गज राजनेता सरकारी अधिकारियों पर ऐसे ही धौंस जमाते हैं और इसका ज्वलंत उदाहरण है भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी अमिताभ ठाकुर और मुलायम सिंह के बीच की धमाकेदार तनातनी। आईजी अमिताभ ठाकुर भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ अक्सर अपनी आवाज बुलंद कर सुर्खियां पाते रहते हैं। इस बार उन्होंने उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान मुख्यमंत्री के पिताश्री मुलायम सिंह यादव को अपनी चौंकाऊ वीरता दिखायी है। अखिलेश सिंह यादव के राज में मंत्री कितने भ्रष्ट और बेलगाम हो चुके हैं, इसकी पिता और पुत्र को छोडकर सभी को खबर है। उन्हीं में से एक हैं खनन मंत्री गायत्री प्रजापति। अमिताभ ठाकुर की पत्नी ने सजग नागरिक का फर्ज निभाते हुए इन महाशय के तमाम काले कारनामों का साक्ष्यों सहित लोकायुक्त को ब्यौरा सौंपा था। जिसमें स्पष्ट किया गया कि अखिलेश सरकार के यह शातिर खनन मंत्री अवैध धंधों में इतने पारंगत हैं कि देखते ही देखते इन्होंने अरबों-खरबों जुटा लिये हैं और लखनऊ और अमेठी में सैकडों करोडों की जमीन-जायदाद खडी कर ली है। जैसे ही लोकायुक्त के पास मंत्री का काला चिट्टा पहुंचा, अमिताभ और उनकी पत्नी को धमकी भरे फोन आने लगे। जब धमकाने-चमकाने वालों ने देखा कि उनकी दादागिरी का ठाकुर दंपति पर कोई असर नहीं हो रहा है तो वे उन्हें बदनाम करने के षडयंत्र रचने लगे।
हद तो तब हो गयी जब अभी हाल ही में मुलायम सिंह यादव ने अमिताभ ठाकुर को फोन कर सुधर जाने की हिदायत दे डाली। यह फोन भी एक तरह से धमकी ही है कि हमारी सरकार के मंत्री चाहे जो करें, लेकिन तुम कौन होते हो उनके खिलाफ शिकायत करने वाले। तुम सिर्फ अपनी ड्यूटी पर ही ध्यान दो। तुम्हारी इतनी औकात नहीं है कि तुम समाजवादी सरकार के मंत्री पर निशाना साधो। दरअसल, मुलायम सिंह यादव एक घुटे हुए उम्रदराज नेता हैं। उन्हें आपा खोने में देरी नहीं लगती। वे सरकारी अधिकारियो को अपने पैर की जूती समझते हैं। उनकी हरकतों को देखने के बाद यह कतई नहीं लगता कि वे सच्चे समाजवादी हैं। भ्रष्टाचारियों के पनाह देते रहना और उन्हें बचाने के लिए गुंडागर्दी पर उतर आना उनकी पुरानी आदत है। उनके चेले भी उनका अनुसरण करते है। जिनमें कार्यकर्ता से लेकर सांसद, विधायक, मंत्री, नेता तक शामिल हैं। उत्तरप्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश सिंह यादव भी अपने पिताश्री के पदाचिन्हों पर चल रहे हैं। उन्हें भी ईमानदार अधिकारी नहीं सुहाते। वे भी अपनी सरकार के बेईमान मंत्रियों की पीठ थपथपाने में कोई कमी नहीं रखते। उनके राज में सपाई गुंडों को बेखौफ और खुलेआम कानून की धज्जियां उडाते हुए देखा जा सकता है। ईमानदार अधिकारियों और पत्रकारों पर बिजलियां गिरती रहती हैं।
पिता और पुत्र की एक ही नीति है कि उन अधिकारियों पर चाबुक बरसाते रहो जो उनके इशारे पर नहीं नाचते। इनके लिए कर्तव्य परायणता और ईमानदारी का कोई मोल नहीं है। आईएस अधिकारी दुर्गा नागपाल ने खनन माफियाओं की कमर तोडने के लिए पचासों छापे मारे और उनके वाहन जब्त किये। करोडों रुपये की राजस्व वसूली कर अपनी कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया। अखिलेश सरकार ने पीठ थपथपाने की बजाय उन्हें निलंबित कर दिया। खनन माफियाओं की ऊपर तक पहुंच थी। निर्भीक अधिकारी को सजा दिये जाने का कारण यह बताया गया कि वे एक धार्मिक स्थल की दीवार को गिरवाकर दंगा करवाने और साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाडने पर तुली थीं। अपने देश में राजनीतिक दबाव के आगे कभी न झुकने वाले अफसरो को तोडने और झुकाने की कई-कई कोशिशें की जाती हैं। लेकिन जिनकी नसों में ईमानदारी का खून दौडता है वे किसी से खौफ नहीं खाते। हरियाणा के आईएसएस अधिकारी अशोक खेमका का बार-बार तबादला इसलिए होता चला आ रहा है, क्योंकि वे सत्ताधीशों के इशारों पर नहीं नाचते। वे हर सरकार के निशाने पर रहे। उन्होंने २०१३ में जब कांग्रेस की सुप्रीमों सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की जमीनों के गोरखधंधे को उजागर किया तो उनका जीना हराम कर दिया गया। अशोक खेमका ने तो जगजाहिर भ्रष्टाचारी पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला का गलत आदेश मानने से ही इंकार कर दिया था। भ्रष्टाचारी चौटाला अपने दुष्कर्मों के चलते जेल में सड रहा है। मुंबई के पूर्व आईपीएस अधिकारी वाय.पी.सिंह ने पुलिस विभाग में सत्ताधीशों और नेताओं की दखलअंदाजी पर काफी कुछ लिखा है। उनकी अच्छी-खासी नौकरी थी। रूतबा और दबदबा था। फिर भी वाय.पी. सिंह का दम घुटता था। दरअसल, वे उन बिकाऊ पुलिस अधिकारियों जैसे नहीं थे जो अपनी खुद्दारी की बोली लगाकर शर्मनाक समझौते करते चले जाते हैं और 'खाकी' की गरिमा को ही दांव पर लगा देते हैं।