Thursday, February 23, 2017

मर्यादाहीन महारथी

यह उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनावों का नज़ारा है। यहां कभी मंदिर-मस्जिद की बात होती थी, अब श्मशान और कब्रिस्तान छाये हैं। मर्यादाओं को तिलांजलि दी जा चुकी है। छींटाकशी और जुमलेबाजी में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। छोटे-बडे का भी ख्याल नहीं रहा। येन-केन-प्रकारेण विधानसभा का चुनाव जीतने के लिए एक-दूसरे को नीचा दिखाने की तो जैसे प्रतिस्पर्धा-सी चल रही है। वाकई यूपी के विधानसभा चुनाव को वर्षों तक याद रखा जाएगा...। राजनीति के मैदान पर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने का चलन बडा पुराना है, लेकिन इस बार चलाये जा रहे नुकीले जुबानी तीर कभी न भरने वाले जख्म देते प्रतीत हो रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती के बारे में यह आम राय बन चुकी है कि वे गजब की धन प्रेमी हैं। दलितों की राजनीति ने उन्हें मालामाल कर दिया है। धन लेकर वे चुनावी टिकट थमाती हैं। उनकी इस कलाकारी ने उनके पूरे परिवार को अपार धनपति बनाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान बसपा पर निशाना साधते हुए कहा कि अब तो इस पार्टी का नाम ही बदल गया है। अब यह बहुजन समाज पार्टी नहीं बल्कि 'बहन जी संपत्ति पार्टी' बनकर रह गई है। मोदी के इस सर्वविदित कथन को सुनते ही बहन जी की बौखलाहट इन शब्दों में सामने आयी: नरेंद्र दामोदरदास मोदी नाम के असली मायने हैं, नेगेटिव दलित मैन। भारत वर्ष के प्रधानमंत्री मोदी दलित विरोधी हैं। वे दलितों के हितों के पक्षधर नहीं हैं। उन्हें दलितों के पक्ष में आवाज उठाने वाले लोग भी रास नहीं आते। बहन जी ने यह भी फरमाया कि उन्होंने दलितों के आर्थिक सहयोग की बदौलत अपनी पार्टी की मजबूत नींव रखी है। प्रधानमंत्री मोदी को बहुजन समाज पार्टी की तरक्की हजम नहीं हो रही है। दलित की बेटी हेलीकॉप्टर में घूमें उन्हें यह अच्छा नहीं लगता। उन्हें यह भी ज्ञात नहीं है कि बसपा एक राजनीतिक दल बाद में है, एक आंदोलन पहले है। बसपा सुप्रीमो यह बताना भी नहीं भूलीं कि उन्होंने दलितों, शोषितों, अल्पसंख्यकों और वंचितों के जीवन में बदलाव लाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है। मोदी ने तो शादी करने के बाद पत्नी का त्याग कर दिया, लेकिन मैंने तो शादी ही नहीं की। यूपी में ही नहीं बल्कि संपूर्ण देश के कमजोर तबके के लोग उन्हें देवी मानते हैं, जो उनका उद्धार कर सकती है।
उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की देश के शालीन राजनेताओं में गिनती की जाती है। इसमें दो मत नहीं कि प्रधानमंत्री को हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेलने में महारत हासिल है। चुनावी मौसम में लगभग सभी दल और राजनेता जाति-धर्म का ढोल पीटते हैं। पीएम ने फतेहपुर रैली में यह कहा कि धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। गांव में अगर कब्रिस्तान बनता है तो श्मशान भी बनना चाहिए। रमजान में अगर बिजली रहती है तो दिवाली में पर भी बिजली रहनी चाहिए। मोदी के इस बयान ने अखिलेश के तन-बदन को झुलसा दिया। उन्होंने फौरन शालीनता की सीमाएं लांघ डालीं। ऐसा लगा कि जैसे वे घोर अभद्रता का दामन थामते-थामते किसी तरह से रूक तो गए, लेकिन उनकी इस प्रतिक्रिया ने उनके अंदर के कुटिल नेता का असली चेहरा दिखा दिया : गुजरात में तो गधों को भी विज्ञापित किया जा रहा है। मैं सदी के महानायक अमिताभ बच्चन से अपील करता हूं कि गुजरात के गधों का प्रचार करना बंद करें। गुजरात वाले टीवी पर गधों का प्रचार कराते हैं और उत्तरप्रदेश में आकर श्मशान और कब्रिस्तान की बात करते हैं। गौरतलब है कि अखिलेश ने गधों के जिस विज्ञापन पर निशाना साधा है वह गुजरात पर्यटन विभाग के द्वारा निर्मित है, जिसमें अभिनेता अमिताभ बच्चन पर्यटकों से आग्रह करते नजर आते हैं कि वे गुजरात के कच्छ स्थित रण में आएं और जंगली गधों के अभ्यारण्य का लुत्फ उठाएं। स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि पांच वर्ष तक उत्तरप्रदेश के शासक की भूमिका निभाने के बाद अखिलेश में भी सत्ता के घोर भूखे नेताओं वाले गुण-अवगुण घर कर चुके हैं। देखकर भी अनदेखा करने की कला में उन्होंने महारत हासिल कर ली है। अमेठी से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी हैं गायत्री प्रजापति। अखिलेश सरकार के इस मंत्री पर एक महिला ने बलात्कार का आरोप लगाया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर यूपी पुलिस ने इस महान समाजवादी के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। प्रजापति के चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश ने अच्छी-खासी नौटंकी की। उन्होंने तब कहीं जाकर चुनाव प्रचार मंच पर पांव रखा जब प्रजापति वहां से चलते कर दिए गये। ऐसे पहुंचे हुए नेता को समाजवादी पार्टी की टिकट देने के पीछे कारण सुनने में आया है कि वे 'कमाऊ' होने के साथ-साथ चुनाव जीतने की जबर्दस्त क्षमता रखते हैं। प्रजापति ने जब २००२ में पहली बार विधानसभा का चुनाव लडा था तब उसने अपनी कुल संपत्ति ९१ हजार बताई थी। दस वर्ष बाद अमेटी में पर्चा भरते समय २०१२ में अपनी कुल संपत्ति तीन लाख ७१ हजार बताई थी, लेकिन अब उनकी संपत्ति दो लाख १२ हजार करोड की हो चुकी है। इतनी इफरात कमायी तो किसी एक नंबर के धंधे में तो नहीं, काली राजनीति में ही संभव है। बताया यह भी जाता है कि प्रजापति, मुलायम सिंह का दुलारा है। उन्हीं की जिद के चलते ही भ्रष्टाचारी प्रजापति को मंत्रिमंडल में दोबारा शामिल किया गया था। यह तो हो नहीं सकता कि अखिलेश को पता ही न हो कि उनके मंत्री प्रजापति ने कौन से 'समाजवाद के रास्ते' पर चलकर एकाएक इतनी दौलत जमा कर ली है। इस देश में बडा से बडा बेइमान नेता भी खुद को ईमानदार और परोपकारी ही बताता है। भ्रष्टाचार के कीर्तिमान रचने वाले लालू प्रसाद यादव, ओम प्रकाश चौटाला, तामिलनाडु की मुख्यमंत्री बनते-बनते रह गई शशिकला जैसे तमाम काले चेहरे खुद को ईमानदार जनसेवक घोषित करते नहीं थकते। उन्हें हमेशा यही लगता रहता है कि जनता बेवकूफ और भुलक्कड है।

Thursday, February 16, 2017

अब क्या कहें?

विद्यालयों के प्रधानाध्यापकों और प्रधानाध्यापिकाओं के पद की एक गरिमा होती है। मस्तक खुद-ब-खुद झुक जाते हैं। शिक्षक यानी गुरु को साक्षात भगवान का दर्जा यूं ही नहीं दिया गया है। यही शिक्षक जब अपने पद की गरिमा को मिट्टी में मिलाने पर तुल जाएं तो यह कहने को विवश होना पडता है शिक्षा- मंदिर के भगवान शैतान हो गए हैं। इन्होंने मान-सम्मान पाने का हक खो दिया है। अनपरा (सोनभद्र) स्थित बालिका महाविद्यालय की प्रधानाध्यापिका ने होमवर्क न पूरा करने पर छात्राओं को स्कर्ट उतारकर पूरे स्कूल में चक्कर काटने का फरमान सुना दिया। गुरु की गरिमा को तहस-नहस करके रख देने वाली इस प्रिंसिपल ने छात्राओं के स्कर्ट उतरवाने के साथ-साथ उन्हें मुर्गा बनाकर सातवें आसमान पर पहुंचे अपने गुस्से का अभद्र प्रदर्शन कर दर्शा दिया कि शिक्षा के क्षेत्र में अमर्यादित महिलाएं भी प्रवेश कर चुकी हैं। पुरुषों की तरह उन्हें भी शिक्षा के क्षेत्र की अहमियत का ज्ञान नहीं है। दरअसल, वे इस पवित्र क्षेत्र के लायक ही नहीं हैं। छात्राओं ने घर पहुंचकर अपने माता-पिता को प्रिंसिपल की दरिंदगी के बारे में बताया तो वे सन्न रह गए। उन्होंने इस बददिमाग प्रधानाध्यापिका को खूब खरी-खोटी सुनायीं।
इसी तरह से राजस्थान की गुलाबी नगरी जयपुर में एक शिक्षक की काली करतूत उजागर हुई। यह शिक्षक ट्यूशन पढने आने वाले बच्चों के साथ कुकर्म कर कमीनगी की सभी हदें पार करने में मशगूल रहता था। छब्बीस वर्षीय रमीज नामक इस हैवान ने ११ बच्चों के साथ कुकर्म की वारदातें कबूली हैं। वह बच्चों को डरा-धमकाकर दूसरे बच्चों से की जाने वाली हरकतों की वीडियो क्लिपिंग तैयार करवाता था। अब तक पांच से पंद्रह साल तक के बच्चों की ७६ क्लिपिंग सामने आ चुकी हैं। बच्चों के परिजन जब पुलिस के पास पहुंचे तो उन्हें डांट-डपटकर भगा दिया गया। स्कूल प्रशासन ने भी मामले को दबाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी। बाबुलगांव तहसील के नांदुरा खुर्द स्थित जिला परिषद की प्राथमिक शाला की पांच छात्राएं अपने ही गुरु की अंधी वासना की शिकार हो गर्इं। इस शाला में कक्षा एक से चार तक की कक्षाएं हैं। यहां पर दो शिक्षक कार्यरत थे। हवस का पुजारी शिक्षक रमेश तुमाने मुख्याध्यापक तथा शिक्षक के तौर पर कार्यरत था। तुमाने छात्राओं को फांसने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाता था। छात्राएं जब गणित का गलत जवाब देतीं तो वह उन्हें शाला के एक कमरे में ले जाता और फिर उनसे अश्लील हरकतें करने लगता था। एक पीडित बालिका ने अपनी मां को आपबीती बतायी तो नराधम शिक्षक के दुराचार का पर्दाफाश हो गया। जिन छात्राओं ने भय के कारण पहले अपना मुंह बंद कर रखा था उन्होंने भी अपने साथ की गयी घिनौनी हरकतों का पूरा ब्यौरा पेश कर दिया। अभिभावक और ग्रामवासी गुस्से से इस कदर तिलमिला उठे कि अगर उनको रोका नहीं जाता तो वे अय्याश शिक्षक की हत्या तक कर देते। गुस्से की आग में जलती भीड ने उसे तब तक शाला के कमरे में कैद रखा जब तक पुलिस और तहसीलदार वहां नहीं पहुंचे। उन्होंने बदजात शिक्षक को कडी से कडी सज़ा दिलवाने का आश्वासन दिया। कुकर्मी तुमाने ने तो अपना जुर्म स्वीकार कर लिया... लेकिन गांव के लोगों का रोष और उनके चेहरों पर खिंची तनाव की गहरी लकीरें इतनी आसानी से नहीं मिटने वालीं। अभिभावक अपने बच्चों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए स्कूल भेजते हैं। वे कभी सपने में भी नहीं सोच सकते कि स्कूलों में ऐसे व्याभिचारी लोग हो सकते हैं।
वर्ष २०१६ के मार्च महीने में इसी तरह से राजधानी के एक सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल को कक्षा आठवीं में पढने वाली एक छात्रा के साथ छेडछाड करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। गुस्साए माता-पिता और स्थानीय लोगों ने प्रिंसिपल की जूतों और चप्पलों से ऐसी पिटायी की थी कि वे बेहोश हो गए थे। सन २०१५ के सितंबर माह में गोवा के एक प्रमुख कॉलेज के प्रिंसिपल की छात्राओं की खूबसूरती पर नीयत डोल गयी। लडकियों को फांसने के लिए प्रिंसिपल ने उन्हे शराब पीने के लिए उकसाया और जब उन पर नशा हावी हो गया तो वह उनके शरीर से खेलने लगा। बाद में छात्र-छात्राओं ने प्रिंसिपल की वो ठुकायी की, कि उन्हें गोवा छोडने को मजबूर होना पडा। दिल्ली की ही एक स्कूल की पैंतीस वर्षीय शिक्षिका अपने सोलह वर्षीय छात्र को पढाते-पढाते उस पर मोहित हो गई। वासना की आग में अपने विवेक को तिलांजलि दे चुकी शिक्षिका ऐन वेलेनटाइन डे की शाम छात्र के साथ भाग खडी हुई। यह स्तब्ध कर देने वाली खबर अखबारों और खबरिया चैनलों में छा गई। शिक्षिका के पति ने माथा पीट लिया। किसी तरह से दोनों को ढूंढ निकाला गया। शिक्षिका छात्र को छोडने को तैयार ही नहीं थी। लोगों के बहुतेरा समझाने-धमकाने के बाद ही उसकी अक्ल ठिकाने आई। स्कूल, कॉलेजों में ऐसी कई घटनाएं होती रहती हैं जिनसे शिक्षा जगत बदनाम होता है। लोग लाख कोसते रहें, लेकिन शिक्षकों के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आती। शिक्षा के मंदिरों में शिक्षकों की नियुक्ति करते समय उनके चरित्र की अनदेखी किये जाने का ही यह परिणाम है। दरअसल इस क्षेत्र में भी भ्रष्टाचार ने अपने पांव पसार लिए हैं इसलिए 'दक्षिणा' की बदौलत बदचलन चेहरों की भी चांदी हो गई है।

Thursday, February 9, 2017

जुमलेबाजों का तमाशा

देश का ऐसा कौन-सा प्रदेश है जहां शराब और अन्य नशे के सामान नहीं मिलते। शासन और प्रशासन को भी पूरी खबर रहती है, लेकिन अनदेखी का दस्तूर निभाया जाता है। देश के जिन प्रदेशों में शराब बंदी है वहां पर भी शराब आसानी से उपलब्ध हो जाती है। गुजरात इसका जीता-जागता प्रमाण है। इतिहास गवाह है कि जिन प्रदेशों में नशाबंदी के प्रयोग किये गए वहां पर सफलता नहीं मिल पायी। पूरी तरह से सफलता मिल पाना मुमकिन भी नहीं है। शराब के बारे में तो यह बात दावे के साथ की जा सकती है। कौन नहीं जानता कि नशा पंजाब की जवानी को दीमक की तरह खा रहा है। गांवों से लेकर शहरों के डिस्कोथेक और क्लबों तक हर जगह नशीले पदार्थ उपलब्ध हैं। पुलिस ने बीते कुछ वर्षों में अरबों रुपयों की ड्रग पकडी। कई गिरोहों का पर्दाफाश किया। आजकल चुनाव के समय सभी विपक्षी पार्टियां नशे के मुद्दे को भुनाने में लग जाती हैं। सच यह भी कि जब उनकी सत्ता आती है, तब भी नशे का कारोबार सतत चलता रहता है। जितनी जांचें होती हैं उनमें से अधिकांश में कहीं न कहीं सत्ताधारी नेताओं की भागीदारी सामने आती है, लेकिन होता-जाता कुछ नहीं। पंजाब में हुए विधानसभा चुनावों में नशे का मुद्दा छाया रहा। प्रश्न यह उठता है कि आखिर ऐसा क्यों और कैसे हो गया कि एक राज्य जो कभी गेहूं का कटोरा माना जाता था, नशा करने वालो का राज्य बन गया? दूध और लस्सी पीने वाले शराब के शौकीन हो गए? जानकार बताते हैं कि पंजाब में आतंकवाद के ठंडे पडने के बाद अचल सम्पत्तियों की कीमतों में भारी उछाल आया। अनेक लोग जमीनें बेचकर रातों-रात लखपति-करोडपति बन गए। जमीन बेचकर अमीर बने खेतों के मालिकों ने बिहार और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों से मजदूर बुलाने शुरू कर दिए। उनसे काम लिया जाने लगा। युवाओं के पास कोई काम-धाम नहीं रहा। कहावत भी है कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है। युवा नशे की ओर आकर्षित होने लगे। धीरे-धीरे हालात कुछ ऐसे बने कि शराब तो शराब, अफीम और हेरोइन भी युवाओं की साथी बनती चलती गई। एक सच यह भी है आतंकवाद के दौरान आतंकवादियों की वजह से भी पंजाब में नशाखोरी बढी। युवाओं में असमंजस की स्थिति बन गयी थी और आतंकवादी गिरोह हथियार खरीदने के लिए नशे के सामानों को बाजार में फैलाकर धन जुटाने लगे थे। उसी दौर में पडोसी देश पाकिस्तान से इफरात ड्रग्स आने का सिलसिला शुरू हो गया। पंजाब के एक पत्रकार ने कुछ वर्ष पूर्व इस लेखक को बताया था कि पंजाब के कई गांव नशे की भेंट चढ चुके हैं। उन्हीं गांवों में से है एक गांव मकबूलपूरा जो अमृतसर के निकट स्थित है। इस गांव को विधवाओं और अनाथों के गांव के रूप में पहचाना जाता है। यहा पर लगभग हर घर में से किसी न किसी परिवार के सदस्य को मादक पदार्थों की लत के कारण अपनी जान गंवानी पडी। इस गांव में १९९० में नशीले पदार्थों का चलन शुरु हुआ था और सन २००० तक तो ऐसे हालात बन गये कि शराब, सिंथेथिक दवाओं, अफीम इंजेक्शन, चरस, गांजा आदि नशों ने गांव वालों को अपना गुलाम बनाकर रख दिया। चौंकाने वाली सच्चाई यह भी थी कि स्कूली बच्चे भी नशेडी बन गए थे। हालांकि अब हालातों में काफी सुधार आता दिखायी दे रहा है। पंजाब में नशे की समस्या को काफी करीब से देखने वाले एक डॉक्टर बताते हैं कि धनलोलुपों को जैसे ही पता चला कि नशे के धंधे में बहुत बडा मुनाफा है तो वे विभिन्न नशीले पदार्थों को गांव-गांव पहुंचाने लगे। १९९१ में जब उन्होंने मनोरोग चिकित्सालय बनाया तब हर सप्ताह दो-चार नशे के मामलों से रूबरू होते थे, लेकिन कालांतर में इनकी संख्या कई गुणा बढती चली गयी। जब नशे के सौदागरों ने देखा कि ड्रग्स युवाओं की कमजोरी बन चुकी है तो उन्हें और नशे के गर्त में धकेलने के लिए एक नया फंडा अपनाया। जो स्मैक पहले प्रति ग्राम ४५० रुपये में बेची जाती थी, वही स्मैक २५० रुपये प्रति ग्राम के रेट पर बेची जाने लगी। आज पंजाब में कुछ ऐसे हालात बन चुके हैं कि जो नशेडी महंगी ड्रग्स नहीं खरीद सकते उनके लिए कई ऐसी दर्द निवारक दवाएं आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं जो भरपूर नशा देती हैं। नशे की लत ने पंजाब के कई हंसते-खेलते परिवारों को बरबाद करके रख दिया है। नशे के चक्कर में बर्बाद हुए कई लोगों को भीख का कटोरा थामना पडा। ऐसा तो हो नहीं सकता कि पंजाब के शासक और राजनेता इस चिंताजनक हकीकत से वाकिफ न रहे हों। यकीनन उन्हें हालात की पूरी खबर थी, लेकिन वे जानबूझकर चुप्पी साधे रहे। इस बार के पंजाब विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों ने मतदाताओं में शराब बांटने के लिए एक नया हथकंडा अपनाया। वोटरों को टोकन दिए गये जिनसे उन्होंने शराब की दुकानों से जमकर शराब हासिल की। कूपन या टोकन के माध्यम से शराब बंटने के खेल को देखकर चुनाव आयोग भी दंग रह गया! पंजाब के विभिन्न शहरों में भारी मात्रा में शराब की बरामदगी के बाद चुनाव आयोग को शराब के उत्पादन और बिक्री पर रोक लगाने के आदेश देने पडे। इसी तरह से गोवा के विधानसभा चुनाव में कसीनो और ड्रग्स बडे सियासी मुद्दे बने रहे। गोवा एक ऐसा प्रदेश है जहां पर देश और विदेश से लाखों सैलानी पहुंचते हैं। शराब, बीयर और अन्य नशों के साथ-साथ कसीनो का आकर्षण भी उन्हें गोवा खींच लाता है। कसीनो यानी जुआघर भारत में आमतौर पर प्रतिबंधित है। लेकिन गोवा, दमन एवं दीव और सिक्किम में राज्य सरकारों की स्वीकृति से वर्षों से कसीनो चल रहे हैं। बीती सदी के अंतिम दशक में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने गोवा में कसीनो की अनुमति पर्यटन को बढावा देने के लिए दी थी। वर्तमान में गोवा में डेढ दर्जन से ज्यादा कसीनो हैं। गोवा में कसीनो का व्यवसाय १२०० करोड रुपये सालाना का है। इसमें करीब दस हजार लोगों को रोजगार मिला हुआ है और विभिन्न करों के रूप में कारीब २०० करोड रुपये हर साल सरकार को प्राप्त होते हैं, जो खनन और पर्यटन के बाद सरकार की आय का सबसे बडा जरिया है। देशी-विदेशी पर्यटकों की बडी संख्या तो गोवा में सिर्फ कसीनो का आनंद उठाने और दांव लगाने के लिए ही आती है। गोवा में मटका (एक तरह का जुआ-सट्टा) भी युवाओं की बरबादी का कारण बन चुका है। इसे तो कसीनो से भी ज्यादा खतरनाक माना जाता है। कसीनो में तो ज्यादातर रईस ही पहुंचते हैं, लेकिन मटका के चक्कर में तो गोवा के बहुतेरे युवा बर्बाद हो रहे हैं। इस बार के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने कसीनो और नशे के कारोबार के खात्मे का ढोल पीटकर भाजपा को घेरने की भरपूर कोशिश की। भाजपा जब सत्ता में नहीं थी, तब उसने भी गोवा को हर तरह से सुधारने के वादे किये थे। इस चुनावी जुमलेबाजी का कभी अंत होने वाला नहीं है।

Thursday, February 2, 2017

कफन पर लिखी पीडा

लानत है इन नेताओं पर जो हमेशा रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के खात्मे का ढोल पीटते हैं और चुनाव के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिए मुफ्त सामान देने का रिश्वती जाल फेंकते हैं। उत्तरप्रदेश में मुलायम के बागी पुत्र अखिलेश ने अपने समाजवादी घोषणा पत्र में फिर से उनकी सरकार बनने पर स्कूल जाने वाले हर बच्चे को एक किलो देसी घी और महिलाओं को प्रेशर कुकर देने का वादा किया है। पिछली बार भी अखिलेश ऐसे ही मुफ्तखोरी के वादे कर सत्ता पाने में कामयाब हुए थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने कितने छात्रों को लैपटाप के लालीपाप बांटे यह तो शोध का विषय है, क्योंकि शासक जितना करते है उसका हजार गुणा ज्यादा ढिंढोरा पीटते हैं। वोट हासिल करने के लिए नेताओं का मतदाताओं को रिश्वत देने का तरीका बदल चुका है। पहले कैश, कंबल, साडियां और शराब छुप-छिपा कर बांटी जाती थी, अब डंके की चोट पर प्रलोभन दिया जा रहा है। अपनी पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र में यह लोग इस अंदाज से मतदाताओं को लुभाने का अभियान चला रहे हैं जैसे अपना घर लुटाने की तैयारी कर चुके हों। सत्ता में आने के बाद बडी बेदर्दी से सरकारी धन लुटा कर अपने चुनावी वायदे पूरे करने का नाटक करने वाले इस देश के नेताओं के असली चरित्र को समझना कोई टेढी खीर तो नहीं है। सच सभी के सामने है।
लगभग सभी राजनीतिक दल और उनके कर्ताधर्ता एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। वोटरों को ललचाने के लिए किसी भी हद तक गिरने को तत्पर रहते हैं। भारतीय जनता पार्टी को देश की स्वाभिमानी और गरिमामय पार्टी माना जाता है। इस पार्टी ने भी पंजाब में दोबारा सत्ता में आने पर नीले राशन कार्ड धारकों को २५ रुपये प्रति किलो की दर से देसी घी देने का वादा किया है। गौरतलब है कि पंजाब में भाजपा और अकाली दल का गठजोड है। अकाली दल ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में हर गांव में मुफ्त वाई-फाई और क्लोज सर्किट टीवी देने की घोषणा कर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के लिए धर्म संकट खडा कर दिया है। वैसे इन दोनों पार्टियों का दावा है कि यदि मतदाताओं ने उन्हें मौका दिया तो वे पंजाब में जहां-तहां फैले नशे के कारोबार को खत्म करके ही दम लेंगी। आम आदमी पार्टी तो नशे के खिलाफ कुछ ज्यादा ही आवाज बुलंद कर रही है। वह सत्ता पर काबिज होते ही कांग्रेस और अकाली दल के ऐसे नेताओं को जेल में ठूंसने की बात कह रही है जो वर्षों से नशे के काले कारोबार में लिप्त हैं और उन्होंने पंजाब के लाखों-लाखों युवाओं को नशे की लत के हवाले कर दिया है। यह भी सच है कि आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान खुद अक्खड शराबी हैं। संसद में नशे में टुन्न होकर जाने का उनका पुराना इतिहास है। चुनाव प्रचार के दौरान भी वे नशे में धुत होकर पार्टी का प्रचार करने के लिए जा पहुंचे, जहां उन्हें खुद को संभालना ही मुश्किल हो गया। चुनावी मंच पर उनके अनियंत्रित होने की तस्वीरें मीडिया में छायी रहीं। पंजाब में नशाखोरी की हकीकत से बच्चा-बच्चा वाकिफ है। प्रदेश में पिछले तीन दशकों से लगातार बढती यह समस्या अब बेकाबू हो चुकी है। राज्य में लगभग दस लाख लोग हेरोइन जैसी जानलेवा ड्रग के पूरी तरह से आदी हो चुके हैं। पंजाब के बुजुर्ग बताते हैं कि नशे की शुरुआत अफीम से हुई। तब लोगों को मुनाफा कमाने का यह आसान तरीका लगा। कई नेताओं ने नशे के कारोबार में सक्रिय भूमिका निभाकर अरबों-खरबों कमाये। पंजाब में नशाखोरी को सिर्फ बेरोजगारी और अशिक्षा से नहीं जो‹डा जा सकता। यहां नशे के आदी लोगों में ८९ फीसदी साक्षर या पढे लिखे लोग हैं और ८३ फीसदी के पास रोजगार है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि ड्रग के नाम पर महज चुनावी पतंग उडाई जा रही है या फिर राजनीतिक दलों और नेताओं के स्थायी समाधान तलाशने के भी कोई पुख्ता इरादे हैं? पंजाब में ऐसे कई पिता हैं जिन्होंने ड्रग्स के चलते अपने जवान बेटे खोये हैं। उन्हीं में से एक हैं मुख्तियार सिंह, जो इस चुनावी मौसम में ड्रग्स के खिलाफ प्रचार करते धूम रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बेटे के कफन पर अपना दुखडा लिखकर भेजा है। उनका बेटा मंजीत दिन-रात ड्रग्स लेता था जिससे उसकी मौत हो गई। ४६ वर्षीय मुख्तियार कहते हैं कि सत्ता के भूखे सभी नेता सब कुछ जानते हैं, लेकिन पंजाब के सुधार के लिए कुछ नहीं करते हैं। मैं एक ऐसा बदनसीब बाप हूं जिसे अपने जवान बेटे की लाश को श्मशान लेकर जाना पडा। नेताओं की कौम उनके दर्द को नहीं समझ सकती। मैं नहीं चाहता कि किसी अन्य बाप को अपना बेटा खोना पडे इसलिए ड्रग्स के खिलाफ लडते-लडते इस दुनिया से विदा होना चाहता हूं। ड्रग्स के खिलाफ जंग में उनकी पत्नी भी उनके साथ है। वे हर रोज सुबह से शाम तक ड्रग्स के खिलाफ जागरूकता फैलाने के लिए लोगों के बीच जाते है। यकीनन पंजाब के विधानसभा चुनाव प्रचार में नशे का मुद्दा उफान पर है। कांग्रेस के बागी उम्मीदवार संदीप सिंह मन्ना पंजाब में नशे के बेपनाह चलन पर चिन्ता व्यक्त करते हुए निम्न पंक्तियों को अपने भाषण के दौरान गाना नहीं भूलते,
"इक रोई सी धी (बेटी) पंजाब दी,
तू लिख-लिख मारे वैण।
आज्ज लखां धियां रोंदिया तैनू
वारिस शाह नू कैण।"
मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम के द्वारा देश के विभाजन के दौरान लहुलूहान पंजाब की स्थिति पर लिखी गई इस कविता में पंजाब के मशहूर सूफी कवि वारिस शाह को उलाहना दिया गया है कि आज पंजाब की लाखों बेटियां रो रही हैं, तुम कहां हो? वैसे यह सवाल आज के राजनेताओं से भी है जो अपने स्वार्थ में इस कदर अंधे हो गये हैं कि उन्हें सत्ता के सिवाय और कुछ नहीं दिखायी देता! देश के गरीबों, दलितों, शोषितों और वंचितों को मुफ्त में गेहूं, दाल, चावल, घी आदि देने का वादा कर सत्ता पाने वाले नेता हमेशा 'दाता' बने रहना चाहते हैं और जनता को  सक्षम बनाने की बजाय 'पाता' यानी मुफ्तखोर बनाये रखना चाहते हैं। ध्यान रहे कि मुफ्तखोरी अच्छे-खासे इंसान को निकम्मा, आरामपरस्त और अपराधी बना देती है और ऐसे में ही 'खाली दिमाग शैतान का घर' की कहावत साकार होती है। शैतानों को व्यसनी और व्याभिचारी बनने में भी देरी नहीं लगती।

Thursday, January 26, 2017

तार-तार नकाब

सन २०१६ के रविवार की शाम थी। जिन लोगों को समाचार चैनल देखने की लत है, वे अपनी-अपनी पसंद के चैनल पर नजरें गढाये थे। एक चैनल पर स्वयंभू देवी राधे मां की दास्तान दोहरायी जा रही थी। राधे मां का कसीनो में डांस करता हुआ वीडियो वायरल हुआ था। जिस तरह से आसाराम, इच्छाधारी, नित्यानंद आदि तथाकथित संत व्याभिचार में लिप्त होने पर सुर्खियों में आए, वैसे ही राधे मां ने पुरुषों से अवैध सम्बंध रखने के कीर्तिमान रचकर कुख्याति पायी। पाखंडी बाबा ओमजी अपनी आराध्य राधे मां के गुणगान में जमीन-आसमान एक कर रहे थे तो एक अन्य तथाकथित साध्वी दीपा शर्मा राधे मां के घृणित काले इतिहास के पन्ने-दर-पन्ने को खोलते हुए उसके कुटिल आचरण का बखान कर रही थी। इस तेजतर्रार साध्वी का साथ दे रही थी एक नारी ज्योतिषचार्य, जिसका नाम वाई राखी बताया जा रहा था। जैसे-जैसे मुखौटेधारी राधे मां के अतीत के पन्ने खुल रहे थे, बिकाऊ ओमजी महाराज का ब्लड प्रेशर बढता चला जा रहा था। घाट-घाट का पानी पी चुका ओम शायद दीपा शर्मा के अतीत से वाकिफ था। इसलिए उसने अपने फूहड अंदाज में उसकी निजी जिन्दगी के दाग-धब्बों और फिसलनों का विवरण पेश करना शुरू कर दिया। देखते ही देखते वातावरण में तेजाबी गर्मी आ गई। दोनों तरफ से आपत्तिजनक शब्दों की बौछार का अंतहीन सिलसिला-सा चल पडा। चैनल पर लगातार बीप बजती रही, लेकिन अनोखे साधु और साध्वियों के बीच की गाली-गलोज भरी हमलेबाजी नहीं थमी। एक-दूसरे के चरित्र का चीरहरण होता रहा। दो नारियों के बीच फंसे ओम को अपनी पूज्य राधे मां पर होने वाला हर कटाक्ष शूल की तरह चुभ रहा था। उसे लग रहा था कि राधे मां के व्याभिचार और छल-कपट के किस्सों के पर्दाफाश के बहाने उस पर व्यंग्यबाण छोडे जा रहे हैं। उसकी मर्दानगी को चुनौती दी जा रही है। ऐसे में उसका खून खौल उठा और उसने हर मर्यादा को ताक पर रखते हुए दीपा शर्मा को चरित्रहीन घोषित करते हुए जब यह कहा कि, 'मेरी नजरों में तुम जैसी औरतों की औकात दो टक्के से ज्यादा नहीं। मेरी राधे मां तो देवी हैं। उनके लाखों अनुयायी हैं जो उनके लिए अपनी जान तक देने को तत्पर रहते हैं। किसी को भी उनकी बुराई करने की जुर्रत करने का कोई हक नहीं है।' ओम के व्यक्तिगत प्रहार, बोलने और ललकारने के अंदाज ने दीपा के तन-बदन को क्रोध की अग्नि के हवाले कर दिया। उसने खुद पर नियंत्रण खो दिया और फटाक से ओम तक जा पहुंची और उसके गाल पर करारा तमाचा जड दिया। ओम भौंचक्क रह गया। उसके लिये यह व्यवहार, यह पुरस्कार अकल्पनीय था। जैसे-तैसे उसने खुद को संभाला और अपनी मर्दानगी दिखाने के लिए घायल सांड की तरह दीपा से भिड गया। गर्मागर्म बहस धक्का-मुक्की, घूसों और थप्पडबाजी में तब्दील हो गई। साधु और साध्वी के कुत्ते और बिल्ली की तरह भिडने से करोडों मनोरंजन प्रेमियों की रविवार की छुट्टी साकार हो गई। संवेदनशील जन माथा पीटते रह गए। वाकई यह हैरतअंगेज घटना थी।
विदेशी टीवी चैनलों पर तो ऐसी घटनाएं होती ही रहती हैं। वहां पर लाइव शो के दौरान कभी-कभी खुद महिला एंकर ही यकायक बेलिबास होकर दर्शकों को मनोरंजित करने लगती हैं। भारतवासियों के लिए यह नजारा अभूतपूर्व था। मारपीट और अंधाधुंध गालीगलोज के इस लाइव शो ने पूरी दुनिया को हिन्दुस्तान के बाजारू साधु-संतों का असली चेहरा दिखा दिया! 'राधे मां की चौकी के पांच रहस्य' का यह ड्रामा कई दिनों तक विभिन्न न्यूज चैनलों पर अनवरत चलता रहा। ओम की तो जैसे निकल पडी। उसका बाजारभाव आसमान पर जा पहुंचा। पुरस्कार स्वरुप उसे मनोरंजन की आ‹ड में फूहडता और अश्लीलता परोसने वाले 'बिग बॉस' में भाग लेने का सुनहरा अवसर भी मिल गया। बद और बदनाम ओम की तो बल्ले-बल्ले हो गयी। वैसे भी 'बिग बॉस' में ऐसे चेहरों को प्राथमिकता दी जाती है जो विवादास्पद होने के साथ-साथ कुख्यात भी हों। बिग बॉस के आयोजकों ने 'थप्पड कांड' से प्रभावित होकर ही ओम को अपने शो में मान-सम्मान के साथ जगह दी। वे जानते थे कि ऐसे कुख्यात प्रतिभागियों की बदौलत ही लोगों में शो के प्रति आकर्षण बढता है और टीआरपी में जबर्दस्त उछाल आता है। स्वामी ओम ने भी बिग बॉस के आयोजकों को निराश नहीं किया। उसने शो में ऐसी-ऐसी ओछी हरकतें कीं, कि सजग दर्शक बिग बॉस के आयोजकों को कोसते नजर आए। देशभर में अपने ४५ लाख अनुयायी होने का दावा करने वाले इस शख्स ने शो में शामिल महिलाओं पर भद्दी-भद्दी टिप्पणियां करते हुए जी भरकर अभद्रता की सभी सीमाएं लांघीं। लोपमुद्रा नामक प्रतिभागी युवती ने स्वामी पर अश्लील  इशारेबाजी करने, बदन को गलत इरादे से छूने और बार-बार घूरने का आरोप लगाया। बदचलन ओम पर प्रतिभागियों के निजी सामान चुराने के आरोप भी लगे। शो के दौरान ही मीडिया में इस खबर ने धमाका मचाया कि यह स्वामी तो हद दर्जे का लुच्चा और टुच्चा इंसान है। यह दिल्ली की लोधी कालोनी स्थित अपने छोटे भाई प्रमोद की दुकान का ताला तोडकर एक दर्जन साइकल, महंगे स्पेयर पार्टस और कागजात चुराने के आरोप में गिरफ्तार भी हो चुका है। गैरकानूनी हथियार रखने का भी उस पर मुकदमा चल रहा है। डिफेंस कालोनी पुलिस ने उसके यहां से हथियार, गोलाबारूद और अश्लील तस्वीरें बरामद की थीं। इन तस्वीरों के सहारे वह महिलाओं को ब्लैकमेल करता था। न्यूज चैनलों के दम पर उभरे ओम की बिग बॉस में बार-बार नाक कटती रही और जगहंसाई होती रही, लेकिन फिर भी उसकी छाती चौडी होती गई। बेहूदा हरकतों और महिलाओं पर छींटाकशी करने के कारण आखिरकार उसे शो से खदेड दिया गया। बहुत ही बेआबरू होकर बिग बॉस से बाहर आने के बाद भी खबरिया चैनलों ने जिस तरह से उसे हाथों-हाथ लिया उससे प्रबुद्ध लोग हतप्रभ रह गए। उसका साक्षात्कार लेने के लिए कई चैनलों के संपादकों में होड मच गयी। उसे चैनलों के स्टुडियो में ऐसे निमंत्रित किया जाने लगा जैसे कि वह बहुत बडा ज्ञानी-ध्यानी हो और उसमें हर समस्या के निराकरण करने की क्षमता हो।
३१ दिसंबर की रात बंगलुरु में महिलाओं के साथ हुई अभद्रता पर न्यूज चैनलों ने अपने विचार रखने के लिए देश के जिन विद्धानों को आमंत्रित किया उसमें ओम का भी समावेश था। ऐसा लग रहा था जैसे चैनलवालों को नववर्ष २०१७ के लिए एक बेमिसाल चेहरा मिल गया है। देश में इससे बडा 'एक्सपर्ट' और कोई हो ही नहीं सकता। खुद को 'हिन्द बाबा' के नाम से प्रचारित करने वाला ओम यहां पर भी अपनी कमीनगी से बाज नहीं आया। उसके द्वारा दर्शकों में बैठी एक महिला के लिए बेहद असंसदीय शब्दों को इस्तेमाल किये जाने के कारण भीड और मेहमान भडक उठे। मेरी मुर्गी की एक टांग की कुनीति पर चलने वाले इस कपटी बाबा ने आखिर तक अपनी गलती स्वीकार नहीं की। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह न्यूज चैनल वाले पगला गए हैं जो ऐसे बेहूदा छिछोरे नकली साधु को स्टुडियों में बुलाकर गर्वित होते हैं, जिसे महिलाओं के साथ बेअदबी से पेश आने के कारण थप्पड और जूते खाने पडे और बिगबॉस से बाहर कर दिया गया। लगता है चैनलवालों को अपनी हंसी उडवाने में बडा मज़ा आता है...।

Thursday, January 19, 2017

उनकी शिनाख्त होनी ही चाहिए

पहले जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर तैनात २९वीं बटालियन के जवान तेज बहादुर यादव ने सोशल मीडिया पर अपनी पीडा उजागर करते हुए कहा कि जवानों को खराब खाना दिया जा रहा है। जली हुई रोटियां और पानी में डूबी नाममात्र की दाल खिलाकर उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड किया जा रहा है। जब अधिकारियों से इसकी शिकायत की जाती है तो वे अनसुना कर देते हैं। वे इस सच को भूल जाते हैं कि हम जवानों को कैसी कडकती ठंड में विपरीत हालातों में अपनी ड्यूटी निभानी पडती है। यहां हमारी फरियाद को सुनने वाला कोई नहीं है। उसके बाद केंद्रीय रिजर्व पुलिस के एक जवान ने वेतन एवं अन्य तकलीफों पर अपनी पीडा व्यक्त की। उसके बाद तो जैसे एक सिलसिला चल पडा। देश के लिए अपना सबकुछ कुर्बान कर देने वाली वर्दी के असंतोष ने सजग देशवासियों को चिन्तन-मनन करने को विवश कर दिया। आर्मी के लांस नायक वाई.पी. सिंह का जो वीडियो सामने आया, उसमें आरोप लगाया गया कि उनका सीनियर अफसर उनसे गालीगलौज करने के साथ-साथ जूते भी साफ करवाता है। आदेश न मानने पर नौकरी से निकाल देने की धमकी देता है। बीएसएफ में खराब खाना देने की शिकायत करने वाले जवान तेज बहादुर की पत्नी ने आरोप लगाया कि उनके पति पर शिकायत वापस लेने का दबाव तथा माफी मांगने को कहा जा रहा है। अर्धसैनिक बल के जवानों को सेना के बराबर वेतन एवं अन्य सुविधाओं की मांग करने वाले जवान जीत सिंह ने अपने वीडियो संदेश में कहा- "मैं कांस्टेबल जीत सिंह सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ) का जवान हूं। मैं आप लोगों के जरिए हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी तक एक संदेश पहुंचाना चाहता हूं। मेरा कहना यह है कि हम लोग इस देश के अंदर कौन-सी ड्यूटी है, जो नहीं करते। लोकसभा चुनाव, राज्यसभा चुनाव, यहां तक कि छोटे-मोटे ग्राम पंचायत चुनाव में भी काम करते हैं। इसके अलावा वीवीआईपी सिक्योरिटी, संसद भवन, एयरपोर्ट, मंदिर, मस्जिद कोई भी ऐसी जगह नहीं है जहां सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स के जवान योगदान न देते हों। सेना और सीआरपीएफ को दिए जाने वाले वेतन और सुविधाओं में काफी फर्क है। अफसोस कि हमारे दु:ख और दर्द को समझने वाला कोई नहीं है।"
कहीं न कहीं यह प्रतीत तो होता ही है कि सेना और अर्द्धसैनिक बलो में सबकुछ ठीक नहीं है। ऐसी शिकायतों और असंतोष का बेवजह जन्म नहीं होता। देश के तमाम सैनिक जान की परवाह न करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। सैनिकों के साथ न तो पक्षघात होना चाहिए और न ही उन्हें किन्हीं दिक्कतों का सामना करने को मजबूर किया जाना चाहिए। उन्हें पौष्टिक भोजन मिलना ही चाहिए। यह उनका हक है। लेकिन यह बहुत ही शर्म की बात है कि सैन्यबल भी भ्रष्टाचार के कीटाणुओं से अछूते नहीं हैं। सैनिकों को खराब और घटिया भोजन उपलब्ध कराने का आरोप लगाने वाले जवान तेज बहादुर ने सेना के अधिकारियों को कठघरे में खडा करते हुए यह भी कहा है कि उनकी भ्रष्टाचारी और भेदभाव की नीति के कारण ही जवानों को पौष्टिक भोजन से वंचित रहना पडता है।
यह तो देश की रक्षा करने वाले सैनिकों और जवानों के जीवन के साथ खिलवाड करने वाला एक ऐसा अपराध है जो यकीनन अक्षम्य है। भ्रष्टाचार के कैंसर ने भारत को अंदर ही अंदर कितना खोखला कर डाला है यह किसी से छिपा नहीं है। लेकिन सरहद पर सैनिकों के साथ होने वाला अन्याय, भ्रष्टाचार और भेदभाव देश के साथ विश्वासघात है। जो सैनिक देश के लिए कुर्बानी देने को सदा तत्पर रहते हैं उनके साथ यह बहुत बडी बेइंसाफी है। अभी तक तो हमने यही सुना और जाना था कि सैनिकों के लिए खरीदे जाने वाले कम्बलों, जूतों और अन्य सामानों में भ्रष्टाचार, हेराफेरी और रिश्वतखोरी चलती है, लेकिन अब यह भी साफ हो गया है कि राशन की खरीदी और वितरण में भी बेइमानी की जाती है। बढ़िया भोजन सामग्री अधिकारियों के यहां और घटिया सामग्री सैनिकों तक पहुंचायी जाती है। सेना के कुछ सीनियर अफसरों के द्वारा यह भी कहा गया कि बीएसएफ के जवान तेज बहादुर ने घटिया खाने के खिलाफ आवाज उठाकर अनुशासन तोडा है। लेकिन यह भी सच है कि जब अन्याय हद से ज्यादा बढ जाता है तो मुंह खोलने को विवश होना ही पडता है। जवानों ने चुप्पी तोडकर देशवासियों की आंखें खोल दी हैं। शुक्रिया सोशल मीडिया का... जिसने जवानों को अपनी तकलीफों और परेशानियों को जगजाहिर करने का अभूतपूर्व हथियार उपलब्ध करवाया है। देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री तक जवानों की आवाज पहुंच चुकी है।
गौरतलब है कि देश के जवान पहले भी ऐसे गंभीर समस्याओं को उठाते रहे हैं। लेकिन उनकी कभी सुनी नहीं गई। गत वर्ष कैग ने भी अपनी रिपोर्ट में यह खुलासा किया था कि जवानों को घटिया खान-पान और खाने के सामानों में तय मानकों से कम सामान दिया जा रहा है। यह गोरखधंधा पिछले कई वर्षों से चल रहा है। कैग की रिपोर्ट पर तो किसी का ध्यान नहीं गया, लेकिन सोशल मीडिया के जरिए धमाका हो गया। जो लोग जवानों को दिए जाने वाले राशन में भ्रष्टाचार करते हैं उन्हें कतई माफ नहीं किया जाना चाहिए। उन्हें भी नहीं बख्शा जाना चाहिए जो जवानों को अपना गुलाम समझते हैं। राशन, वर्दी और बाकी सामानों में चलने वाली कमीशनखोरी और कमीशनबाजों की शिनाख्त होना जरूरी है। यह काम ठेकेदारों और अफसरों की मिलीभगत से ही होता है। सेना में भी भ्रष्टाचारी और बेइमान भरे पडे हैं। इसका यदा-कदा पर्दाफाश होता रहता है। पिछले दिनों भारत के पूर्व वायुसेना प्रमुख ए.पी.त्यागी को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया गया। भारत के इतिहास में यह पहली घटना थी। इससे यह तो पता चल ही गया कि ऊंचे पदों पर विराजमान लोग कितने भ्रष्ट हो सकते हैं। इन्हें अपना आदर्श मानने वालों की कहीं कोई कमी नहीं है।

Thursday, January 12, 2017

चीनी और चींटियाँ

"छोटे कपडों के कारण ही लडकियों से छेडखानी होती है। जो लडकियां छोटे कपडे पहनती हैं उन्हें आधुनिक माना जाता है। लडके-लडकियों को इधर-उधर घूमने की छूट नहीं मिलनी चाहिए। जहां चीनी होगी, वहां चींटियाँ तो आएंगी ही।" यह भद्दे विचार हैं एक समाजवादी नेता के... जो उन्होंने बंगलुरू में नये साल की पूर्व संध्या पर जश्न मनाने के लिये जुटी युवतियों के साथ की गयी बदतमीजी के बाद प्रकट किए। इसी तरह से एक मंत्री ने भी बेतुका बयान देते हुए कहा कि लडकियों को आधुनिक पहनावे में देखकर युवक इतने अधिक उत्तेजित हो जाते हैं कि उनका खुद पर नियंत्रण नहीं रह पाता। नेताओं की यह ओछी सोच यकीनन यही दर्शाना चाहती है कि महिलाओं के साथ अभद्रता के साथ पेश आनेवाले छिछोरे 'मर्द' कतई दोषी नहीं हैं। असली कसूरवार तो वे युवतियां हैं जो इस आजाद देश में अपने मनचाहे पहनावे में घूमने निकल पडती हैं। पुलिस की तैनाती के बाद भी उन्हें मनचलों की छेडछाड और अश्लील टिप्पणियों से दो चार होना पडता है। बंगलुरू का विख्यात एमजी रोड जहां कई सीसीटीवी कैमरे लगे थे, हर कोना रोशनी में नहा रहा था, लोगों की भीड थी, वहां पर लडकियों को पकडा और दबोचा गया। उनके कपडे फाडे गए। घोर ताज्जुब कि वहां पर लगभग १५०० पुलिसवाले भी तैनात थे।
जिस बंगलुरू को सभ्य, शालीन, अनुशासित और समृद्ध लोगों का शहर माना जाता है वहां पर ३१ दिसंबर की रात ऐसी घिनौनी और घटिया हरकतों का होना बेहद डराता और चिंतित करता है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि सतर्क और समझदार लोग भी हैवानियत के नंगे नाच को देखकर तमाशबीन बने रहते हैं या फिर अनदेखा कर देते हैं? दिल्ली विश्वविद्यालय की एक महिला प्रोफेसर को नववर्ष २०१७ ने एक ऐसा उपहार दिया जिसे वे कभी नहीं भूल पाएंगी। उन्हें सार्वजनिक जगह पर बेवजह गाली-गलौच और मारपीट का शिकार होना पडा। वे कॉलेज में कक्षाएं लेने जा रही थीं। पेट्रोल भराने के लिए उन्होंने पेट्रोल पम्प पर अपनी कार रोकी। कार से निकलकर पैसे देकर वे वापस बैठने जा रही थीं, तभी उल्टी दिशा से स्कूटी पर आये एक नकाबपोश युवक ने उनके पर्स पर झपटा मार दिया। पर्स के साथ वे भी घसिटती चली गर्इं। उन्होंने जोर लगाकर अपने पर्स को युवक के हाथ से खींचा तो वह नीचे गिर गया। नीचे गिरते ही उसने गालीगलौच व धमकाना शुरू कर दिया। प्रोफेसर के विरोध करने पर बदमाश ने उनपर थप्पड और घूसों की बरसात कर दी। प्रोफेसर का चश्मा टूट कर नीचे गिर गया। वहां पर खडे लोग तमाशा देखते रहे। युवक के भाग जाने के बाद पेट्रोल पम्प पर खडे कुछ लोग प्रोफेसर के पास आए और पेट्रोल भरनेवाले लडके को डांटने लगे कि उसने युवक को रोका क्यों नहीं। बदतमीज युवक को डांटना-फटकारना उसकी जिम्मेदारी थी। एक-दो ऐसे भी निकले जिन्होंने अफसोस जताते हुए प्रोफेसर से कहा कि वे तो यही समझ रहे थे कि वह आपका पति हैं। इसलिए हमने बीच-बचाव करने की जरूरत नहीं समझी। प्रोफेसर ने फेसबुक पर अपने दर्द को व्यक्त करते हुए लिखा, "यह समाज को क्या हो गया है? अगर वह मेरा पति भी होता तो क्या कोई किसी भी औरत को यूं ही पिटते देखना सहज महसूस करता है? औरतों के लिए कोई जगह सुरक्षित नहीं है। ठग और मनचले गलियों में खुलेआम घूम रहे हैं। मेरे साथ खुलेआम हिंसा हुई, जिसके जख्म मेरे शरीर पर हैं। इससे ज्यादा मैं इस बात पर हैरत में हूं कि खुलेआम कोई भी किसी महिला को मौत का भय दिखाकर उसके साथ मारपीट, गालीगलौच और यौन हिंसा कर सकता है। महिला पर हमला होता है, उसके साथ यौन हिंसा होती है और लोग बस तमाशा देखते रहते हैं।"
बदमाशों और सडक छाप मजनूओं की पैरवी करने वालों के खिलाफ देशभर में गुस्सा फूटता देखा गया। एक अभिनेत्री ने खुलकर अपनी बात रखी, "लडकियों के साथ होने वाली अभद्रता के बाद हमेशा लडकी के कपडे, उसके अकेले होने या फिर उसके गलत समय पर बाहर रहने जैसे विषय उठाए जाते हैं। ऐसी हर घटना के बाद कहीं न कहीं लडकी को ही जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है। सवाल यह है कि अगर लडकियां छोटे कपडे पहनकर पाश्चात्य सभ्यता का अनुसरण कर रही हैं, तो जो ल‹डके उन्हें छेडते हैं क्या वह भारतीय सभ्यता की नकल कर रहे हैं? क्या यह इतने पतित और कमजोर हैं कि किसी भी युवती को देखकर उत्तेजित हो जाते हैं?
बंगलुरू की शर्मनाक घटना के बाद आये निष्कृष्ट और आपत्तिजनक बयानों ने सजग फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार का खून खौला दिया। उन्होंने चेतावनी देने के अंदाज में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि, "दिल से बोलूं... आज मुझे अपने इंसान होने पर शर्म आ रही है। अपनी बेटी को गोद में उठाए एयरपोर्ट से निकल ही रहा था कि टीवी पर आ रही एक खबर पर नजर पडी। बंगलुरू में नए साल में खुलेआम सडक पर कुछ लोगों की वहशियत का नंगा नाच देखा। उसे देखकर पता नहीं आप लोगों को कैसा लगा, लेकिन भगवान कसम, मेरा खून खौल उठा। एक बेटी का बाप हूँ। अगर ना भी होता तो यही कहता कि जो समाज अपनी औरतों को इज्जत नहीं दे सकता, उसे अपने आप को इंसानी समाज कहने का कोई हक नहीं। सबसे शर्म की बात पता है क्या है? कुछ लोग राह चलते एक लडकी के हैरेसमेंट को उचित ठहराने की औकात रखते हैं। लडकी ने छोटे कपडे पहने क्यों? लडकी रात में घर से बाहर गई क्यों? ऐसे सवाल करते हैं। शर्म करो। छोटे लडकी के कपडे नहीं, छोटी आपकी सोच है। भगवान न करे जो बंगलुरू में हुआ है, वह आपकी बहन या बेटी के साथ हो। ये बदतमीजी करने वाले किसी दूसरे ग्रह से नहीं आए हैं। ये हमारे यहां से ही हैं। हमारे आपके घरों से ही हैं। हमारे बीच ही घूमते हैं ये दरिंदे। अभी भी वक्त है, सुधर जाओ। वर्ना जिस दिन इस देश की बेटी ने पलटकर जवाब दिया ना, सुधरोगे नहीं, सीधा ऊपर सिधार जाओगे। लडकियों से भी मैं कुछ कहना चाहूंगा। लडकियां किसी भी तरह लडकों से अपने आप को कमजोर न समझें। आप अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह काबिल बन सकती हैं। ऐसे लडकों को संभालने की ऐसी छोटी और आसान टेक्निक्स हैं मार्शल आर्ट्स में। किसी में इतना दम नहीं कि आपकी मर्जी के बिना आपको हाथ भी लगा सके। आपको डरना नहीं है। बस अलर्ट रहो। सेल्फ डिफेंस सीखो। क्योंकि पुरुष नहीं सुधरेंगे, इसलिए वक्त है कि औरतें इस सुधार को अपने हाथों में लें। और हां, अगली बार आपके कपडों पर आपको कोई ज्ञान देने की कोशिश करे, तो उससे कहना कि अपनी सलाह अपने पास रखिए और अपने काम पर ध्यान दीजिए, मुझ पर नहीं।"
केंद्रीय मंत्री वी.के.सिंह ने छेडखानी की घटनाओं पर खेद जताते हुए कहा कि मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूं कि हमारी मौजूदा प्रणाली महिलाओं के खिलाफ अपराध से निपटने में प्रभावी नहीं है। ऐसे में हमें दूसरे देशों से सीख लेनी चाहिए जो इस बुराई से सफलतापूर्वक निपट रहे हैं। यौन अपराधियों का रासायनिक बंध्याकरण आज के समय की बहुत ब‹डी जरूरत है। जब तक आदतन दुराचारियों को ऐसा कडा दंड नहीं मिलता तब तक देश में व्याभिचारियों के सुधरने के आसार नज़र नहीं आते।