Thursday, October 26, 2017

इस रोग का क्या है इलाज?

२०१७ की दिवाली की शाम। नागपुर में फिर एक युवक अंधश्रद्धा की बलि चढा दिया गया। कुणाल खेरे नामक छत्तीसगढी १९ वर्षीय युवक अपने घर के होम थियेटर पर गौरा-गौरी के गानों का आनंद ले रहा था। नागपुर के डिप्टी सिगनल इलाके में काफी बडी संख्या में रोजी-रोटी की तलाश में छत्तीसगढ के लोग आकर बसे हैं। छत्तीसगढ की तर्ज में नागपुर में भी गौरा-गौरी उत्सव बडी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। उत्सव की तैयारियों के उत्साह में कुणाल भजनों भरे गीत जोर-शोर से बजाने में तल्लीन था। गीतों की तेज आवाज उसके पडोसी को खल रही थी। उसे गुस्सा आ रहा था। जब उसने देखा कि शोर थमने का नाम नहीं ले रहा है तो उसने कुणाल के घर के सामने खडे होकर अपना तीव्र विरोध जताना शुरू कर दिया। पडोसी का कहना था कि भजनों को सुनने से उसकी पत्नी के शरीर में देवी आ जाती है और वह बेकाबू हो जाती है। कुणाल और उसके परिवार के लोगों ने पडोसी के विरोध को नजरअंदाज कर दिया। इससे पडोसी आग बबूला हो गया और देखते ही देखते दोनों परिवारों में गाली-गलोच और मारपीट होने लगी। इसी दरम्यान कुणाल और उसके पिता पर तीक्ष्ण हत्यारों से हमला कर दिया गया। कुणाल की घटनास्थल पर मृत्यु हो गई।
अंधविश्वास, अंधभक्ति और अंधश्रद्धा ने इस सृष्टि में कितना कहर ढाया है इसका हिसाब-किताब किसी के पास नहीं है। यह वो रोग है जो कहीं न कहीं सदियों से जिन्दा है। इसके खात्मे की न जाने कितनी कोशिशें की गर्इं, लेकिन पूरी तरह सफलता नहीं मिली। गांव तो गांव प्रगतिशील शहर भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं हैं। वैसे यह भी सच है कि शहर हों या गांव आखिर बनते तो लोगों की वजह से ही हैं। हमारे ही समाज में ऐसे लोगों की अच्छी-खासी तादाद है जो अंधविश्वास से मुक्त नहीं होना चाहते। इन्हीं की वजह से नये-नये बाबा जन्मते रहते हैं और अपना मायाजाल फैलाकर अंधेरगर्दी का अंधकार फैलाकर अपने आर्थिक साम्राज्य का अकल्पनीय विस्तार करते चले जाते हैं। मायावी साधु-संतों ने समाज को दिया कम और वसूला ज्यादा है। हमारे देश में जिस तादाद में साधु-संत-प्रवचनकार हैं उससे तो होना यह चाहिए था कि आम लोगों में संयम, शालीनता का वास होता और गुस्से की जगह नम्रता और शालीनता की धारा बह रही होती। लेकिन ऐसा दिखता नहीं है। बडे तो बडे बच्चे भी हत्यारों की भूमिका में नजर आने लगे हैं। जो मंजर सामने आ रहे हैं वे बेहद डराते हैं।
नागपुर से ज्यादा दूर नहीं है यवतमाल शहर। इस शहर में ऐन दिवाली के दिन छठवीं कक्षा के एक बारह वर्षीय छात्र की हत्या कर दी गई। हत्यारे थे उसी के तीन हमउम्र साथी। पतंग को लेकर आपसी विवाद हुआ था। तीनों नाबालिगों ने पुलिसिया पूछताछ में बताया कि शाम को ट्यूशन से लौटते समय अभीजित ने पतंग लूट ली थी जिसे उन तीनों ने छीन लिया। अभीजित ने उनकी इस हरकत का पुरजोर विरोध किया और गाली-गलोच पर उतर आया। इसपर वे भी अपना आपा खोकर उसकी तब तक धुनायी करते रहे जब तक वह बेहोश नहीं हो गया। उसे बेहोश देखकर उन्हें शंका हुई कि कहीं वह मर तो नहीं गया। ऐसे में उन्होंने उसका पूरी तरह से काम तमाम करने के लिए पत्थर उठाया और कुचल कर उसे पूरी तरह से मुर्दा कर लाश झाडियों में छुपा दी। जब तीनों नाबालिगों ने इस भयावह वारदात को अंजाम दिया उस समय वे नशे में थे। जहां लाश मिली वहां पर नशेडियों का जमावडा लगा रहता है। नशा करने वालों की वह मनपसंद जगह है।
लोग तरह-तरह का नशा करते हैं। कहते हैं कि सत्ता और धन का नशा सबसे खतरनाक होता है। इसके नशे में चूर इंसान को भी हैवान बनते देरी नहीं लगती। अपने देश में सत्ता के नशे के गुलामों का अहंकार देखते बनता है। देश के विशालतम प्रदेश बिहार के एक गांव में पंचायत के मुखिया दयानंद मांझी की उपस्थिति में दर्जनभर दबंगों ने एक गरीब को जबरन थूक चटवायी और चप्पलों से पिटायी कर अपने अहंकार की पीठ थपथपायी। उस बुजुर्ग गरीब का कसूर यह था कि वह खैनी (तम्बाकू) की चाह में बिना अनुमति लिए एक दबंग के घर चला गया था। दरवाजे पर कोई नहीं था। गांव में शहरों की तरह दिखावटी औपचारिकता निभाने और दिखाने का चलन नहीं है। भारतीय ग्रामों में एक-दूसरे के घरों में बिना पूछे चले जाना आम है। लेकिन दबंग को उस गरीब का घर में प्रवेश करना रास नहीं आया। कोई धनवान होता तो उसे कोई फर्क नहीं पडता, लेकिन गरीब का बिना पूछे घर में प्रवेश करना उसे बुरी तरह से चुभ गया। उसके घर की महिलाओं ने उस पर छेडखानी का आरोप जड दिया। दिवाली के दिन दबंग के घर गांव के मुखिया की अगुवाई में पंचायत बुलाई गई। पंचायत ने जमीन पर थूक फेंककर गरीब बुजुर्ग को चाटने का आदेश दिया जिसे उसे मानना ही पडा। इसके साथ ही महिलाओं ने भी उसकी चप्पलों से पिटायी की। उससे यह शपथ भी दिलाई गई कि वह बिना पूछे किसी के घर में नहीं जाएगा। दबंगों ने तो उसके चेहरे पर कालिख पोत गधे पर बिठाकर पूरे गांव में घुमाने की तैयारी भी कर ली थी। इतनी प्रताडना सहने के बाद भी पीडित थाने में जाकर शिकायत करने की हिम्मत नहीं कर पाया। पंचायत और रईसों की सामंती सोच का विडियो जब वायरल हुआ तो तब कहीं जाकर पुलिस हरकत में आयी। गांव वालों का रवैय्या भी कम शर्मनाक नहीं रहा। गरीब की इज्जत लुटती रही और वे तमाशा देखते रहे। वैसे भी तमाशा देखने के मामले में हम भारतवासियों का जवाब नहीं। विशाखापटनम में एक नशेडी स्थानीय रेलवे स्टेशन के पास के फुटपाथ पर एक विक्षिप्त महिला के साथ बेखौफ होकर बलात्कार करता रहा और लोग अनदेखी कर आते-जाते रहे। कुछ अति उत्साही तमाशबीनो ने तस्वीरें खींची और वीडियो भी बनाया, लेकिन किसी ने भी उस वहशी बलात्कारी को रोकने का साहस नहीं दिखाया।

Thursday, October 19, 2017

क्यों नहीं लेते सबक?


ज़िन्दगी अनमोल है। इसके साथ खिलवाड करना ठीक नहीं है। लोगों को इस बारे में आप लाख समझाते रहो, सतर्क होने का पाठ पढाते रहो, फिर भी कुछ लोग जानबूझकर भूलें करते ही चले जाते हैं। यह हकीकत कितनी हैरान करने वाली है कि भारतवर्ष में हर वर्ष लापरवाही से पटाखे जलाने के कारण लगभग छह हजार लोग अपनी आंखें गंवा देते हैं। 'ब्लू व्हेल' नामक जानलेवा ऑनलाइन सुसाइड गेम की वजह से भारत और दुनिया में कई बच्चों ने को मौत को गले लगा लिया। यह वो आत्मघाती खेल है जिसमें खिलाडी को ५० दिन के अंदर कई टास्क पूरे करने होते हैं और इसका आखिरी टास्क खिलाडी को आत्महत्या के लिए विवश कर देता है। ब्लू व्हेल से दूर रहने के लिए कितना कुछ लिखा और समझाया गया, लेकिन लत तो लत है जो पीछा नहीं छोडती। माना कि स्मार्ट फोन पर युवाओं को रोमांचक गेम खेलना बहुत लुभाता है, लेकिन जान दे देना कहां की अक्लमंदी है? कल ही एक खबर पढने में आयी कि चीन में इसी शौक की वजह से एक इक्कीस वर्षीय लडकी की आंख की रोशनी चली गई। गौरतलब है कि इस लडकी ने लगातार २४ घण्टे तक अपने स्मार्ट फोन पर 'ऑनर ऑफ किंग्स' नामक गेम खेला जिसके बाद उसकी आंख की रोशनी जाती रही। 'ऑनर ऑफ किंग्स' चीन का बेहद लोकप्रिय गेम है जो धीरे-धीरे भारत में भी अपने पांव पसार रहा है। इस गेम को चीन के लगभग २० करोड लोग प्रतिदिन खेलते हैं। अपनी आंखों की रोशनी गंवा चुकी लडकी इस गेम को खेलने के चक्कर में ८-१० घण्टे न कुछ खाती-पीती थी और न ही टायलेट जाती थी। यहां तक कि जिस दिन ऑफिस में छुट्टी होती थी उस दिन सुबह छह बजे उठकर नाश्ता करने के बाद शाम चार बजे तक वह गेम खेलती और नाम मात्र की नींद लेकर फिर रात १ बजे तक गेम खेलती थी।
जीते-जागते इंसानों की जान लेने के खेलों और साजिशों के इस दौर में धन की हद से ज्यादा अहमियत बढ गई है। हम भारतवासी हजारों वर्षों से दीपावली मनाते चले आ रहे हैं। यह महापर्व अंधकार पर प्रकाश की, बुराई पर अच्छाई की, दुर्गुणों पर सदगुणों की और दुर्जनों पर सज्जनों की विजय का प्रतीक है। फिर भी घोर अंधकाररूपी इन बुराइयों का अंत होता नजर नहीं आता। लगभग हर रोज कितनी धोखाधडी, लापरवाही और लूटमारी की खबरें अंधेरे की काली तस्वीर सामने लाकर रख देती हैं। देश की राजधानी दिल्ली में स्थित बाबू जगजीवन अस्पताल में डॉक्टरों की लापरवाही और लालची प्रवृति का बदरंग और बेहद भयावह चित्र देखने में आया है। दिल्ली की जहांपुरी इलाके की निवासी सलमा गर्भवती थीं। उन्हें ५ अक्टूबर को उक्त अस्पताल में भर्ती कराया गया था। सात अक्टूबर को जब सलमा का अल्ट्रासाउंड कराया गया तो डॉक्टरों ने जच्चा और बच्चा दोनों को स्वस्थ बताया, लेकिन सलमा दर्द के मारे बेहाल थी। उसकी चीखें अस्पताल के कमरे की दीवारों को हिला रही थीं। कुछ घण्टों के बाद उसके परिजनों ने सलमा की असहनीय तकलीफ के बारे में जब डॉक्टरों को बताया तो उन्होंने कहा गर्भावस्था में ऐसी पीडा का होना आम बात है। परिजनों के भारी दबाव के बाद जब सलमा का एक और अल्ट्रासाउंड कराया गया तो बहुत ही चौंकाने वाला सच सामने आया। रिपोर्ट के मुताबिक बच्चा दो दिन पहले ही गर्भ में मर चुका था। डॉक्टरों के पास इसका कोई जवाब नहीं था। जवाब देते भी कैसे? उनके अंदर बैठे डकैत ने उनकी मानवता का हरण जो कर लिया था। इन डाकुओं की घोर लापरवाही के कारण एक ममतामयी मां का शिशु इस दुनिया में आने से पहले ही दम तोड गया। ऐसे में वही हुआ जो अक्सर होता देखा जाता है। अस्पताल में ही मारपीट और गाली-गलौच की तमाशेबाजी शुरू हो गयी। डॉक्टर खुद को दोषी मानने को तैयार ही नहीं थे। पुलिस ने अस्पताल पहुंचकर परिजनों को शांत करने में बहुत बडी भूमिका निभायी। उसके बाद सलमा को दूसरे अस्पताल ले जाया गया जहां मृतभ्रूण को बाहर निकाला गया और संक्रमण फैलने की स्थिति टल पाई।
कई लोग कभी नहीं बदलते। स्वार्थ और लालच के पहिए पर उनकी जिन्दगी सतत दौडती रहती है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें उनके जीवन में आने वाले तूफान बदल कर रख देते हैं। ऐसा भी कह सकते हैं कि वे खुद में परिवर्तन लाने या दिखाने को मजबूर हो जाते हैं। इस हकीकत ने बहुत तसल्ली दी कि अपनी बेटी आरुषि की हत्या के मामले में जेल में लगभग चार साल तक बंद रहे तलवार दंपति ने कैदियों की सेवा में खुद को पूरी तरह से समर्पित कर दिया था। जब वे जेल में आए तो उन्हें जेल अधिकारियों ने कैदियों की सेवा में जुट जाने का अनुरोध किया। दांत की बीमारी को लेकर कई कैदी परेशान थे और दंत चिकित्सा विभाग बंद हो चुका था। कैदियों को इलाज के लिए बाहर भी नहीं भेजा जा सकता था। तलवार दंपति ने कैदियों की तकलीफों को समझते हुए फौरन स्वीकृति दे दी। नुपुर तलवार महिला कैदियों के इलाज तो राजेश तलवार पुरुष कैदियों के दर्द को दूर करने में इस कदर डूब गए कि जेल अधिकारी भी उनकी सेवा-भावना का अभिनंदन करने को विवश हो गए। दोनों ने १४१८ दिन जेल में काटे। उनकी रिहाई के फैसले से दस मिनट पहले जेल क्लीनिक से संदेश आया कि एक कैदी के दांतों में बहुत दर्द है तो राजेश तलवार तुरन्त क्लीनिक पर गए और उसका इलाज किया। उन्हें जेल में रोज महज ४० रुपये दिहाडी मिलती थी। दोनों ने ४९,५००-४९,५०० रुपये यानी कुल मिलाकर निन्यानवे हजार रुपये कमाए। इस रकम को भी उन्होंने दान कर दिया। जेल से रिहा होने के बाद तलवार दंपति ने यह निश्चय किया है कि वे कैदियों के इलाज के लिए हर १५ दिन में डासना जेल जाते रहेंगे।

Thursday, October 12, 2017

बदलाव के बीज

बाल मजदूरों, भीख मांगने और नशा करने वाले बच्चों पर लोगों का कम ही ध्यान जाता है। नेता उनकी कमजोरी, विवशता और मुश्किलों को अपने भाषणों में ही ज़ाहिर कर संतुष्ट हो जाते हैं। इस दुनिया में शायद ही ऐसे माता-पिता होंगे जो अपने बच्चों को पढा-लिखाकर बडा आदमी बनाने की ख्वाहिश नहीं रखते होंगे। गरीब से गरीब मां-बाप अपने बच्चों के स्वर्णिम भविष्य का सपना देखते हैं, लेकिन जिनके पास न रहने को घर होता है और न ही दो वक्त की रोटी का जुगाड, उनकी सभी चाहतें धरी की धरी रह जाती हैं। उनके बच्चों का बचपन उन्हीं के सामने दम तोड देता है और वे कुछ नहीं कर पाते। मेरे देश में ऐसे बेबस लोगों की संख्या करोडों में है। मेरे ही देश में ऐसे कुछ धर्मात्मा हैं जो सडक पर भीख मांगते और बाल मजदूरी करते बच्चों को देखकर विचलित हो जाते हैं और उनकी आंखें भीग जाती हैं।
मैंने कल ही एक खबर पढी : पंजाब में स्थित पटियाला के थापर इंजिनियरिंग के तीन छात्र अनोखे मिशन पर हैं। वे बाल मजदूरी कर रहे या भीख मांग रहे मासूम बच्चों को मुफ्त में पढाते हैं। उन्होंने बिना किसी सरकारी सहायता के कटोरा थामने को विवश हुए हाथों में कलम थमाकर उन राजनेताओं और शासकों के मुंह पर तमाचा जडा है जो देश के भविष्य को संवारने का झांसा देकर वोट हथियाते हैं और निर्लज्जता के साथ सत्ता पर काबिज होते चले जाते हैं। यह तीनों छात्र गांव-गांव जाकर लोगों को बाल मजदूरी न कराने के लिए जागरूक करते हैं। उनकी इस मुहिम से और भी कई लोग जुडते चले जा रहे हैं। उन्होंने अपनी इस मुहिम को 'हर हाथ कलम' नाम दिया है। हरीश कोठारी जो कि 'हाथ धरे कलम' के संरक्षक हैं, ने बताया कि तीन साल पहले वह अपने दो दोस्तों के साथ यूनिवर्सिटी के बाहर चाय पीने गए थे, तब वहां दीपक नामक छोटा बच्चा चाय के जूठे बर्तन धो रहा था। हमने बच्चे से पूछा कि तुम्हे इस छोटी-सी उम्र में मजदूरी क्यों करनी पड रही है तो उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी आंखों में तैरती उदासी और गहरी चुप्पी ने हमारे मन को झकझोर कर रख दिया। हमें पता चला कि उसके माता-पिता पास के ही गांव में रहते हैं। हम गांव गये और वहां जाकर हमने उन्हें बेटे को बालमजदूरी नहीं कराने के लिए किसी तरह से राजी किया। आज वह दस वर्षीय बच्चा रोजाना दूसरे बच्चों के साथ स्कूल पढने जाता है। उसके चेहरे की चमक देखते बनती है। दीपक की तरह कई बच्चों के हाथों से भीख का कटोरा छूट गया है। 'हाथ धरे कलम' के द्वारा गरीब बच्चों को कॉपी व किताबें मुहैय्या कराई जाती हैं। गौरतलब है कि भीख मांगना छोड चुके बच्चों को पढाने के लिए स्थान की जरूरत थी इसके लिए प्रशासन ने शहर के तीन नामी स्कूलों - रेयान इंटरनेशनल, सेंट पीटर्स एवं डीएवीवी पब्लिक स्कूल में बच्चों को पढाने की मंजूरी दिला दी है। यह तीनों परोपकारी छात्र करीब सत्तर बच्चों को शाम पांच बजे से सात बजे तक खुद पढाते हैं।
अभिषेक सिंह राठौर उच्च अधिकारी हैं। पिछले वर्ष उनकी नियुक्ति नैनीताल में हुई तो वे सहज ही शहर में घूमने के लिए निकले। उन्होंने सडक पर बच्चों को भीख मांगते देखा। कुछ बच्चे नशा करते भी नजर आए। ऐसे दृश्य हर शहर में देखने को मिल जाते हैं। शासन और प्रशासन के द्वारा इसे सामान्य घटना मान नजरअंदाज कर दिया जाता है। हालांकि भिखारियों के पुनर्वान के लिए सरकारें करोडो रुपये खर्च करने का दावा करती हैं। भिखारियों की पकडा-धकडी भी होती है फिर भी उनकी संख्या बढती चली जाती है। बच्चों को भीख मांगते देख राठौर के मन में विचार आया कि इन्हें भीख देने की बजाय किसी और तरीके से सहायता की जाए। भीख मांगना और भीख देना दोनों अपराध हैं। उन्होंने बच्चों से बात करने की कोशिश की। पहले तो वे राजी नहीं हुए। फिर जब एक दिन बच्चों को पैसों का लालच दिया तो वे यह बताने को राजी हो गए कि उन्होंने भीख मांगना कब और क्यों शुरू किया। कई बच्चे ऐसे थे जिन्हें परिवार की गरीबी के चलते भीख मांगनी पडती थी। कुछ के पिता नकारा थे और वे खुद बच्चों को भीख मांगने के लिए विवश करते थे। कुछ बच्चे ऐसे भी थे जो अनाथ थे। ऐसे मां-बाप की संख्या ज्यादा थी, जिन्होने अपने बच्चों को स्कूल को पढाने-लिखाने की कभी सोची ही नहीं थी। उनका यही मानना था कि अगर बच्चे भीख नहीं मांगेगे तो उनके पूरे परिवार को रात को भूखे पेट सोना पडेगा। राठौर ने संकल्प कर लिया कि भीख मांगने वाले और नशेडी बच्चों के भविष्य को किसी न किसी तरह से संवार कर ही दम लेना है। यकीनन यह काम आसान नहीं था। लेकिन राठौर एक जिद्दी और जूनूनी अधिकारी हैं जो ठान लेते हैं उसे अंजाम तक पहुंचा कर ही दम लेते हैं। राठौर ने बच्चों के मां-बाप से मिलने का निश्चय किया। सभी के घर गंदी बस्तियों में थे जहां हर कोई जाना पसंद नहीं करता। राठौर अफसर होते हुए भी उनके मां-बाप से मिले और उन्हें समझाया कि आप लोगों ने अपनी तो जिन्दगी तबाह कर दी पर अब बच्चों के साथ तो बेइंसाफी मत करो। इन्हें पढाओ-लिखाओ। इनका भविष्य बनाओ। पहले तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया। उनका कहना था कि ऐसा नहीं हो सकता। उनका परिवार भीख से ही चलता है। वर्षों से ऐसा होता चला आ रहा है। फिर बच्चों को पढाई-लिखाई में होने वाला खर्च भी तो उठा पाना भी उनके लिए आसान नहीं है। राठौर ने उन्हें आश्वस्त किया कि वे बच्चों की पढाई और छोटी-मोटी तमाम जरूरतों को पूरा करेंगे। माता-पिता को भी रोजगार और नौकरी दिलवाने में अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। आखिरकार कई मां-बाप राजी हो ही गए। राठौर ने बच्चों को छावनी परिषद के एक स्कूल में दाखिल करा दिया। स्कूल संचालकों को मनाने के लिए भी उन्हें काफी पापड बेलने पडे। धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। कुछ बच्चों के माता-पिता जो खून-पसीना बहाने से नहीं कतराते थे उनके लिए भी नौकरी, रोजगार की व्यवस्था भी की। राठौर को इस बात का भी दु:ख सताता रहा कि कुछ परिवार वालों ने स्कूल के बाद शाम को बच्चों से भीख मंगवाने का सिलसिला बरकरार रखा। धीरे-धीरे अधिकांश बच्चों में सुधार देखने को मिलने लगा है। राठौर सतत अपने अभियान में लगे हैं। कोई भी बच्चा भीख मांगता दिखता है तो उसे स्कूल में दाखिल करवा देते हैं। बच्चों की पढाई अनवरत चलती रहे इसके लिए आर्ट आफ लिविंग की एक संस्था 'हैपीनेस ह्यूमन कलेक्टिव' की मदद भी ली जा रही है। बच्चों की माताओं को स्कूल में भोजन बनाने का रोजगार भी उपलब्ध कराया गया है। बच्चों को नशे से मुक्ति दिलाने के लिए भी कई संस्थाओं की मदद ली जा रही हैं। वे कहते हैं कि मेरी योजना इन बच्चों को पढा-लिखाकर ऐसा आदर्श उदाहरण बनाने की है जो अपने जैसे बच्चों के लिए खुद ब्राँड एम्बेसेडर का काम करें।

Thursday, October 5, 2017

घुटने न टेकने की जिद

कुछ नारियों से मिलने, उनके बारे में पढने और जानने के बाद मन में अपार सम्मान, श्रद्धा और नतमस्तक होने के भाव जाग उठते हैं। उनका धरा-सा धैर्य, सेवा भावना, अग्नि-सा तेज और नीर-सी मिलनसारिता खुद-ब-खुद उन्हें आदर्श नायिकाओं वाली वो पदवी दिला देती है जिस पर गर्व ही गर्व होता है। अपनी हिम्मत, ज़ज्बे और हौसले की बदौलत कुछ नया करने और विपरीत से विपरीत परिस्थितियों का डटकर सामना करने वाली वैसे तो भारतवर्ष में कई महिलाएं हैं, लेकिन कुछ महिलाओं के द्वारा उठाये गये नये कदम और जीवन संघर्ष पर मेरा लिखने को मन हो रहा है। बेटे के हत्यारों को अधिकतम सजा दिलाकर दम लेने वाली नीलम कटारा के अटूट साहस और विपरीत हालातों से टकराने की लम्बी कहानी है। उन जैसी हौसले वाली महिलाएं कम ही देखने में आती हैं। उनका एक जवान बेटा था जिसका नाम था- नीतीश कटारा। नीतीश ने मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी गाजियाबाद संस्थान से स्नातक की उपाधि ली थी। २५ वर्षीय नीतीश पढाई के दौरान अपनी सहपाठी भारती यादव से प्यार करने लगा था। भारती भी उसे दिलोजान से चाहती थी। भारती के परिवार वालों को दोनों के प्रेम और मिलने-जुलने पर घोर आपत्ति थी। १७ फरवरी २००२ को भारती के भाई विकास ने नीतीश की हत्या कर दी। विकास का पिता डीपी यादव कहने और दिखाने को राजनेता है, लेकिन दरअसल वह छंटा हुआ गुंडा और बदमाश है। नेतागिरी का नकाब ओढकर उसने अपार धन-दौलत कमायी है। दौलत और रसूख के गरूर में अंधे हो चुके पिता और बेटे को एक आम परिवार से ताल्लुक रखने वाले युवक से अपनी बेटी का रिश्ता जोडना गवारा नहीं था। हत्यारों ने नीतीश के शव को बुरी तरह से जलाकर फेंक दिया था ताकि उसकी शिनाख्त न हो सके। मां नीलम ने लगभग पूरी तरह जल चुके बेटे के शव को देखते ही पहचान लिया था। वे काफी देर तक बेटे के शव को निहारती रहीं। भीड को लगा कि युवा बेटे की मां खुद को संभाल नहीं पायेगी। लेकिन इस बहादुर मां ने फौरन ही खुद को संभाला और पुलिस वालों से जब यह पूछा कि शव का डीएनए टेस्ट कहां होगा तो लोग उनकी तरफ देखने लगे। अपने लाडले बेटे को खो चुकी मां ने तभी ठान लिया था कि अब इंसाफ की लडाई लडना ही उनके जीवन का एकमात्र मकसद है। न्याय की लडाई लडने के लिए उन्हें कई तकलीफों का सामना करना पडा। बार-बार धमकियां दी गयीं। धन लेकर चुपचाप बैठ जाने का दबाव भी डाला गया, लेकिन बहादुर मां ने हार नहीं मानी। बेटे के हत्यारों की हर चाल को नाकाम करते हुए उन्हें अधिकतम सजा दिलवा कर ही दम लिया। नीलम कटारा ने निर्बलों को न्याय दिलाना अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लिया है। अनाचारी नेताओं और नकाबपोश समाज के ठेकेदारों के खिलाफ उनकी बुलंद आवाज गूंजती रहती है।
देश में जहां-तहां बेटियों पर तेजाब फेंककर उनकी जिन्दगी तबाह करने की खबरें सतत पढने और सुनने को मिलती रहती हैं। एकतरफा प्यार करने वाले बिगडैल युवकों को एसिड अटैक कर तसल्ली का आभास होता है। देखने में आ रहा हैं कि अधिकांश एसिड अटैक करने वाले कानूनी दांवपेच की बदौलत बच जाते हैं या फिर बहुत कम सजा मिलती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंक‹डों के अनुसार तेजाब फेंकने की सबसे अधिक घटनाएं पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में हो रही हैं। २०१५ में ही देशभर में ऐसे मामलों में ३०५ लोगों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन हकीकत यह है कि मात्र १८ मामलों में ही दोष सिद्ध हो पाया। वास्तविकता यह भी है कि सभी तेजाबी हमलों की रिपोर्ट पुलिस थानों में दर्ज नहीं होती। इसलिए तेजाब से कितनी जिन्दगियां तबाह होती हैं इसके वास्तविक आंकडे सामने नहीं आते। यह भी सच है कि तेजाबी अत्याचार, शोषण, बलात्कार, हत्या से भी अधिक पीडा देता है। यह एक तरह से जीवन की सारी खुशियां और सपने छीन लेता है। लक्ष्मी अग्रवाल जैसी चंद नारियां ऐसी भी हैं जिन्होंने तेजाब के जानलेवा वार को झेलने के बाद संघर्ष की ऐसी मिसाल पेश की है जिसका यशगान देश और दुनिया में गूंज रहा है। देश की राजधानी दिल्ली में १९९० में जन्मी लक्ष्मी अग्रवाल जब पंद्रह वर्ष की थीं तब एक तरफा प्रेम में पडे ३२ वर्षीय सनकी युवक ने तेजाब फेंक दिया। लक्ष्मी का दोष बस इतना था कि उसने शादी से इन्कार कर दिया था। सिर से पांव तक तेजाब में नहायी लक्ष्मी स‹डक पर तडप रही थी और लोग देखकर भी अनदेखा कर आगे बढते चले जा रहे थे। एक शख्स को दया आयी और उसने लक्ष्मी को अस्पताल पहुंचाया। पूरे दो महीने तक वह अस्पताल के बिस्तर पर बिलखती-तडपती, कराहती रही। डिस्चार्ज होने के बाद जब वह अपने घर पहुंची तो उसके मन में दर्पण देखने की इच्छा जागी। लेकिन घरवालों ने तो सभी दर्पण ही गायब कर दिए थे। अंतत: उसने पानी में अपनी सूरत देखी तो उसे पूरी दुनिया ही घूमती नजर आई। आत्महत्या के प्रबल विचार ने उसे जकड लिया। घर से बाहर निकलने पर आसपास के लोगों की तानाकशी ने भी लक्ष्मी को काफी आहत किया। लोग अजीब निगाह से देखते और यही जताते कि जैसे इस सबकी वह ही दोषी हो। यह तो लक्ष्मी के पिता ही थे जिन्होंने उसे लोगों की नुकीली निगाहों और तानों को नजरअंदाज कर नया जीवन जीने की सीख दी। पिता की सीख ने लक्ष्मी के मन-मस्तिष्क में नई ऊर्जा का संचार कर दिया। उसके बाद लक्ष्मी ने तेजाब फेंकने वाले बदमाश को अधिकतम सजा दिलवाने और जमाने को यह दिखाने की ठान ली कि चेहरे की सुंदरता तो दिखावटी है। इंसान को तो दिल से सुंदर होना चाहिए। लक्ष्मी अगर तब घुटने टेक देतीं तो उनका भी वही हश्र होता जो एसिड अटैक से तन-बदन जला कर अंधेरे के हवाले हो चुकी कई महिलाओं का हो चुका है। लक्ष्मी ने एसिड अटैक पीडित महिलाओं की सहायता करने की राह पकड ली। अनेक तेजाब पीडित महिलाओं के अंधेरे जीवन में उजाला भर लक्ष्मी ने अपने सभी गमों को बहुत पीछे छो‹ड दिया। उन्होंने ताज नगरी आगरा में ताजमहल से थो‹डी दूरी पर 'शीराज हैंगआउट' नामक कैफे शुरू किया जिसे एसिड अटैक पीडित महिलाएं चलाती हैं। ३०० से ज्यादा महिलाओं को प्रशिक्षित कर चुकी लक्ष्मी को २०१४ में यूएस की फस्र्ट लेडी मिशेल ओबामा के हाथों 'इन्टरनेशनल वाइल्ड ऑफ कौर्यज अवार्ड' से नवाजा जा चुका है। २०१४ में ही वह आलोक दीक्षित नाम के सामाजिक कार्यकर्ता के संपर्क में आयीं। दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे और जीवनपर्यंत एक साथ रहने का फैसला कर लिया।
भयंकर गर्मी के दिन थे। एक युवती अपने दोस्तों के साथ मॉल में खरीदी और मौज-मज़ा करने के लिए गई थी। जब वह मॉल के बाहर निकली तो उसने ऐसे कुछ गरीब बच्चों को देखा जिनके पैरों में चप्पल नहीं थी। पेट की भूख की तडप उनके चेहरे से साफ-साफ झलक रही थी। उन्हें भीख मांगते देख उसके मन में कई तरह के विचार आने लगे। वह मॉल से घर लौट तो आई, लेकिन नंगे पैर, भीख मांगते बच्चों का चेहरा बार-बार उसके सामने आ जाता। उसके मन में विचारों की आंधी चलने लगी। उसने सोचा कि पांच-सात सौ रुपये तो वह यूं ही उडा देती है। इन बच्चों को पचास-सौ रुपये की चप्पल नसीब नहीं। नंगे पैर घूमने से बच्चों के पैरों में इन्फेक्शन और कई बीमारियां हो जाती हैं। इन रुपयों से दस-बारह बच्चों का खाना और पैरों में एक जोडी चप्पल तो जरूर आ सकती है। उसने सबसे पहले बच्चों के नंगे पैरों के लिए चप्पलें उपलब्ध कराने का निर्णय लिया। वह अपने दोस्तों से मिली। बच्चों की तकलीफ के बारे में उन्हें अवगत कराया। आपस में मिलकर पैसे जुटाये गए। इन पैसों से बच्चों के लिए चप्पलें खरीदी गयीं। युवती ने रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और गलियों में रहने वाले गरीब बच्चों को चप्पलें बांटनी शुरू कर दीं। उसका साथ देने वालों का कारवां बढता चला गया। आज उसकी टीम में डाक्टर, इंजिनियर और समाजसेवक शामिल हैं। जहां चप्पलें बांटनी होती हैं वहां पर उनकी टीम पहले जाकर सर्वेक्षण करती है फिर उन परिवारों को चप्पले बांटी जाती हैं जिन्हें इनकी वास्तविक जरूरत होती है। जयपुर से अपनी पढाई पूरी कर दिल्ली लौटी युवती ने यहां पर भी अपना काम जारी रखा है। सैकडों बच्चों को चप्पलें उपलब्ध करा इस सच्ची बालसेविका का अगला लक्ष्य गरीब बच्चों को एक फिटनेस किट मुहैया कराना हैं। वे चाहती हैं कि दूसरे लोग भी अपने स्तर पर अपने आसपास के गरीब बच्चों की मदद करें। ताकि कोई भी बच्चा नंगे पैर होने के कारण बीमार न पडे। बच्चों के नंगे पैरों में चप्पलें पहनाने वाली इस आदर्श युवती का नाम है डॉ. समर हुसैन। क्या आप उसका अभिनंदन नहीं करना चाहेंगे?

Thursday, September 28, 2017

इस हिंसा और बर्बरता के क्या हैं मायने?

क्या जमाना है। कोई कानून तोड रहा हो, माहौल बिगाड रहा हो, बेहूदा हरकतें कर रहा हो, वातावरण को दूषित कर रहा है... तो भी आप उसे रोक नहीं सकते। सामने वाला आपको अपना शत्रु मानने लगता है उसके सिर पर खून सवार हो जाता है। कल दिल्ली में एक वकील सार्वजनिक स्थल पर सिगरेट के धुएं के छल्ले उडा रहा था। उसकी इस हरकत को फोटोग्राफी के दो छात्र देख रहे थे। उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने बडी शालीनता के साथ वकील को सरेआम सिगरेट न पीने का अनुरोध किया। छात्र तो सर... सर कर बात कर रहे थे, लेकिन वकील तू... तडाक और गाली-गलौच पर उतर आया। छात्र शालीनता का दामन थाम अपनी बाइक पर सवार होकर जाने लगे तो वकील ने अपनी कार बाइक पर च‹ढा दी। एक छात्र की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। वकील शराब के नशे में धुत था और सिगरेट के छल्ले बनाकर आने-जाने वाली महिलाओं के मुंह पर मार रहा था। लोग तमाशबीन बने देख रहे थे। किसी ने भी उसे फटकारने की हिम्मत नहीं की। दो सजग छात्रों ने पहल की तो एक छात्र को जान से हाथ धोना पड गया। यह हमारे समाज का वो डरावना चेहरा है जो डराता है और चिंतन-मनन को विवश करता है कि आखिर लोगों में इतना गुस्सा क्यों है और वे कानून से खौफ क्यों नहीं खाते?
मध्यप्रदेश के अशोक नगर में एक पिता ने पत्नी और गांव वालों के तानों से तंग आकर अपनी दो बेटियों को बेतवा पुल के नदी में फेंककर मार डाला। हत्यारे पिता का कहना था कि मुझसे बार-बार कहा जाता था कि तेरी तीन-तीन बेटियां हैं। तेरी पत्नी फिर गर्भवती हो गई है। उस पर तुम कामधंधा तो करते नहीं हो फिर ऐसे में बच्चों की परवरिश कैसे करोगे। उनका पेट कैसे भरोगे...?
कमलेश अहिरवार नामक यह दरिंदा अपनी छह वर्षीय बेटी रक्षा और तीन वर्षीय बेटी पूनम को इलाज के बहाने ले गया और जब दो दिन बाद वह अकेला घर लौटा तो पत्नी ने बेटियों के बारे में पूछा। उसने नजर चुराते हुए बताया कि चौराहे पर सुलाकर कहीं चला गया था। जब वापस आया तो बेटियां वहां से गायब थीं। पत्नी, पति के जवाब को सुनकर हैरत में पड गई। यह कैसा बाप है जिसे अपनी बेटियों का गायब होना किसी मामूली से सामान के गुम हो जाने जैसा लग रहा है! पति चुपचाप कमरे में जाकर चादर ओढकर बेफिक्र सो गया। पत्नी के तो होश ही उड चुके थे। उसने पति को फटकारा और फौरन थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने दबाव डालने लगी, लेकिन वह टालमटोल करने लगा। पत्नी ने अपने रिश्तेदारों के साथ जाकर थाने में बेटियों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई तो बेटियों की हत्या का यह शर्मनाक, भयावह सच सामने आया। इस तरह से मेरठ में एक जल्लाद बाप ने अपनी दुधमुंही बेटी को गला घोटकर मार डाला और शव को सूखे तालाब में दबाकर बेफिक्र हो गया। हुआ यूं कि राजेश कुमार नामक युवक का अपनी दूसरी पत्नी से झगडा हुआ। पत्नी गुस्से में घर से निकल गई। इसके कुछ मिनटों के बाद बच्ची रोने लगी। राजेश गुस्से में आग बबूला हो गया और उसने अपनी मासूम बच्ची का गला दबाकर मार डाला। गांव के लोग सुबह सैर को निकले तो उनकी नजर सूखे तालाब में मिट्टी हटाकर कुछ नोचने की कोशिश करते कुत्तों पर पडी तो उनका माथा ठनका। कुत्तों को वहां से हटाया गया तभी सात माह की बच्ची का शव नजर आया।
दिल्ली के गोकुलपुरी इलाके में एक शख्स को पडोसी के नाबालिग बेटे को शराब न पीने की नसीहत देना भारी पड गया। वह शख्स जब अपने घर जा रहा था तो रास्ते में उसे अपने पडोसी का लडका अपने कुछ दोस्तों के साथ शराब पीते नजर आया। उसने पडोसी धर्म निभाते हुए लडके को कहा कि वह अक्सर उसे यहां दोस्तों के साथ शराबखोरी करते देखता है, आज तो वह उसके पिता को उसकी शिकायत करके ही रहेगा। वह नाबालिग फौरन अपने घर गया और पिता को बुला लाया पिता-पुत्र ने रॉड से हमला कर नसीहत देनेवाले शख्स को इतना पीटा कि उसे अस्पताल ले जाना पडा। बडी मुश्किल से उसकी जान बच पायी।
खून के रिश्तों को डसती निष्ठुरता की खबरें हिलाकर रख देती हैं। कुछ महीने पूर्व एक बेटे की बेरहमी की खबर ने काफी सुर्खियां पायी थीं। बेटा विदेश में रहता था और मां अकेली दिल्ली में। उम्रदराज मां के नाम दिल्ली में करोडों की सम्पत्ति थी। इकलौते बेटे के सात समन्दर पार रहने के कारण मां की देखरेख करने वाला कोई नहीं था। एक दिन बेटा विदेश से लौटा। मां को संपूर्ण सम्पत्ति बेचकर अपने साथ विदेश चलने के लिए राजी कर लिया। किसी भी मां के लिए बेटे के साथ से बढकर और कुछ नहीं होता। वह राजीखुशी तैयार हो गई। बेटे ने आनन-फानन में संपत्ति का सौदा कर करोडों रुपये अपनी अटैची में रखे और मां को साथ लेकर हवाई अड्डे पहुंच गया। मां की खुशी का पार नहीं था। अपने बेटे, पोते-पोतियों के साथ शेष जीवन बिताने का उसका वर्षों का सपना पूरा होने जा रहा था। "मां तुम यहां पर बैठों मैं एक जरूरी काम निपटाकर आता हूँ।"  बेटे ने बडी आत्मीयता के साथ मां को आश्वस्त किया और चला गया। घडी की सुई खिसकने लगी। मां राह देखती रही। दोपहर से रात हो गयी, लेकिन बेटे का कोई अता-पता नहीं था। उसने हवाई अड्डे के अधिकारियों को अपनी चिन्ता से अवगत कराया। खोजबीन की गई तो पता चला कि बेटा तो घंटो पहले विदेश फुर्र हो चुका है। अकेली मां रोती-बिलखती रही। यह खबर देश के तमाम अखबारों में छपी। लोगों ने नालायक बेटे को जी-भरकर कोसा। दूसरे दिन की सुबह अपनी ही औलाद के हाथों ठगी गई मां की हार्टअटैक से मौत हो गई।
दिल्ली के निकट स्थित नोएडा में बीते सप्ताह एक और अहसानफरामोश बेटा अपनी उम्रदराज मां को जिला अस्पताल के इमरजेंसी में इलाज के बहाने छोडकर चलता बना। उसने अस्पताल को अपना मोबाइल नंबर भी गलत दिया था। बुजुर्ग मां अपनी गंभीर बीमारी को भूल बार-बार बेटे का नाम लेकर रोती रही। बेटे ने मां को पूरी तैयारी के साथ अस्पताल में लाकर छोडा था। उसने मां के पूरे कपडे और अन्य जरूरी सामान एक बडे अटैची में भरे थे। डॉक्टर ने जब इलाज शुरू किया तो वह दवाई लेने के बहाने से अस्पताल से जो गया कि डॉक्टर भी इंतजार करते रहे और मां के तो रो-रो कर आंसू ही सूख गए।

Thursday, September 21, 2017

जवाब मांगते सवाल

एक जमाना था जब स्कूल, पाठशाला का नाम लेते ही आंखों के सामने देवी-देवताओं की मूर्तियों से सुसज्जित मंदिर की तस्वीर घूमने लगती थी। माता-पिता अपने बच्चों को इस मंदिर में भेजकर गर्वित होते थे। उन्हें वहां पर अपनी संतानों के पूर्णतया सुरक्षित होने का भरोसा रहता था। मां-बाप सबकुछ मंदिर के भगवान पर छोड देते थे। मास्टरजी भी अपने छात्रों को अपनी औलादों की तरह ज्ञान, स्नेह और सुरक्षा प्रदान करते थे। वक्त पडने पर डंडे से कुटायी भी कर देते थे। अभिभावकों को भी कोई आपत्ति नहीं होती थी। वक्त बदलने के साथ-साथ स्कूल, पाठशालाएं भी बदल गयीं और मास्टर साहब भी। बीते सप्ताह गुरुग्राम में स्थित एक नामी स्कूल, जिसे रायन इंटरनैशनल स्कूल के नाम से पूरे देश में जाना जाता है, में हुई प्रद्युम्न नामक सात साल के बच्चे की निर्मम हत्या ने समस्त सजग देशवासियों को हिलाकर रख दिया। दरअसल, यह हत्या उस भरोसे की हुई जिस भरोसे से बच्चों को पढने और संस्कारित होने के लिए स्कूल भेजा जाता है। माता-पिता को जब अपने बच्चे की बर्बर हत्या की खबर मिली तो वे अपनी सुध-बुध खो बैठे। उनके लिए उनका बेटा ही उनके जीने का एकमात्र मकसद था। उनके सारे सपने चकनाचूर हो गए। आज भी मां के सामने बार-बार बेटे का चेहरा घूमने लगता है, जिसे वह रोजाना स्कूल के लिए तैयार करती थी। उसने उसे बडा आदमी बनाने के लिए अपनी सभी इच्छाओं को तिलांजलि दे दी थी। बेटी बडी है और बेटा छोटा था। बेटे को स्विमिंग, साइकलिंग और क्रिकेट का काफी शौक था। वह कहता था कि मुझे विराट कोहली बनना है। दिनभर घर में क्रिकेट का बैट लेकर घूमता रहता था।
मां को हवाई जहाज में सारी दुनिया घुमाने की बातें करने वाले बेटे की तस्वीर को निहारती मां के मुंह से बार-बार यही शब्द निकलते हैं कि मेरे बेटे के साथ जो हुआ वह दुनिया में किसी बच्चे के साथ न हो। शिक्षा को कारोबार और व्यापार बनाने वाले निजी स्कूलों की बहुत लंबी श्रृंखला है। अधिकांश स्कूल अंधाधुंध कमायी का जरिया बन गए हैं। यह भी जान लें कि अधिकतर प्रायवेट स्कूल नेताओं, मंत्रियों, तथाकथित समाज सेवकों, उद्योगपतियों और धन्नासेठों के द्वारा चलाये जा रहे हैं। यह ऐसी जमात है जिसका एकमात्र लक्ष्य धन कमाना है। इनमें से अधिकांश खुद अंगूठा छाप हैं, लेकिन बडे-बडे डिग्रीधारियों को अपने इशारे पर नचाते हैं। दरअसल इनके लिए स्कूल, कालेज और अस्पताल चलाना धंधा बन गया है। सरकारें भी इन पर मेहरबान रहती हैं। कौडी के दाम पर जमीनें दे दी जाती हैं। महाराष्ट्र में कई नेता ऐसे हैं जिनके बीसियों स्कूल, कालेज, अस्पताल चल रहे हैं। राकां के दिग्गज नेता प्रफुल्ल पटेल के तो चालीस से ज्यादा स्कूल, कालेज दौड रहे हैं। मेडिकल और इंजिनियरिंग कालेजों में प्रवेश के नाम पर लाखों की वसूली की जाती है। फीस भी अच्छी-खासी होती है। इनके यहां चलने वाली भर्राशाही की तरफ शासन और प्रशासन का बहुत कम ध्यान जाता है। धंधेबाजों के हाई-फाई स्कूलों की मनमानी और लापरवाही की वजह से सतत दिल दहलाने वाली घटनाएं सामने आती रहती हैं। धन के बल पर स्कूलों के प्रबंधक, मालिक तमाम कायदों और दिशा-निर्देशों को जूते की नोक पर रखते हैं और छात्र-छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार, दुराचार एवं हत्याओं तक की खबरें सुर्खियां पाती रहती हैं। दो वर्ष पूर्व बंगलुरु में एक नामी-गिरामी स्कूल में पढने वाली पहली कक्षा की छात्रा पर एक नरपशु जिम इंस्ट्रक्टर ने बलात्कार का जुल्म ढाया था। इस शर्मनाक घटना के विरोध में अभिभावकों और स्थानीय लोगों ने जमकर विरोध प्रदर्शन और तोडफोड की थी। इसी तरह से मुंबई में इसी वर्ष के अगस्त महीने में विख्यात सेठ जुग्गीलाल पोद्दार स्कूल में चार साल की एक मासूम बच्ची बलात्कार का शिकार हुई। बलात्कारी स्कूल का ही चपरासी था।
राजस्थान के बीकानेर के एक निजी स्कूल में तेरह साल की छात्रा के साथ आठ शिक्षकों ने डेढ साल तक बलात्कार किया। इतना ही नहीं यह दुष्ट, छात्रा की अश्लील क्लिप बनाकर उसे लगातार ब्लैकमेल और प्रताडित करते थे जिसके चलते उसे समर्पण हेतु विवश होना पडता था। बलात्कारी शिक्षक स्कूल की छुट्टी हो जाने के बाद उसे कमरे में जबरन बंद कर मनमानी करते थे। पीडिता कहीं गर्भवती न हो जाए इस भय से बलात्कारी शिक्षकों ने उसे इतनी अधिक मात्रा में गर्भ निरोधक गोलियां जबरन खिलायीं जिससे उसे कैंसर हो गया। यह सच भी बेहद चौंकाने वाला है कई पब्लिक स्कूलों के एकदम निकट शराब की दुकानें खुली हुई हैं जहां पर लडते- लुढकते शराबियों का जमावडा लगा रहता है। रायन इन्टरनैशनल स्कूल के समीप खुली दारू की दुकान लोगों के गुस्से का शिकार हो गयी। यहां पर भी बच्चों के सामने आपत्तिजनक गतिविधियां चलती रहती हैं। शराबी छात्राओं के साथ बेखौफ छेडछाड करते हैं। स्कूल की छुट्टी के बाद खुलेआम शराबियों को शराब पीते देखकर बच्चों पर क्या असर पडता होगा इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। देश के विभिन्न शहरों में चलने वाले पब्लिक स्कूलों के निकट खुली शराब की दुकानों से न स्कूल संचालकों को कोई फर्क पडता है और न ही प्रशासन के दिमाग की घंटी बजती है। बार-बार यही सवाल उठता है कि १०० मीटर के दायरे में शराब की दुकान खोलने की अनुमति कैसे मिल जाती है? यकीनन यह सब धन की माया है। छात्र-छात्राओं की सुरक्षा के प्रति घोर लापरवाही बरतने वाले स्कूल प्रबंधक जानबूझकर इस सच को भी नजरअंदाज करते चले आ रहे हैं कि किशोर न्याय अधिनियम २०१६ की धारा ७५ में स्पष्ट उल्लेख है कि बच्चा जिसके संरक्षण में होगा उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उसी संस्था की होगी।

Thursday, September 14, 2017

आस्था के सौदागर

राजनीति और धर्म के बाजार में वर्षों से खोटे सिक्के धडल्ले से चल रहे हैं। इनके बारे में पूरी जानकारी होने के बावजूद कोई प्रभावी कदम उठाने की कोशिश ही नहीं की गई। पथभ्रष्ट नेताओं को तो लगभग पूरी तरह से बख्श दिया गया है। वे हर तरह की मनमानी करने को स्वतंत्र हैं। इसके लिए सबसे ज्यादा दोषी हम और आप हैं जो आंख मूंदकर इस छलिया बिरादरी का अंधानुकरण करते हैं। डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत का धूर्त और कपटी चेहरा सामने आने के बाद अखिल भारतीय अखाडा परिषद ने १४ फर्जी और ढोंगी बाबा की जो सूची जारी की है उसमें गुरमीत के अलावा जो नाम शामिल हैं उनमें से कुछ जेल में हैं तो कुछ का डंका अभी भी गूंज रहा है। हमारे यहां धर्मांध लोगों को कितना भी सचेत किया जाए, लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पडता। आज से लगभग तीन वर्ष पूर्व जब प्रवचनकार आसाराम के कुकर्मों का पिटारा खुला था तो होना तो यह चाहिए था कि लोग कपटी बाबाओं से दूरी बना लेते। बाबा भी खुद में सुधार लाते, लेकिन न तो अंधभक्तों के दिमाग के ताले खुले और न ही फर्जी बाबाओं ने आसाराम की गिरफ्तारी से कोई सबक सीखा। उन्होंने तो यही मान लिया था कि आसाराम बदकिस्मत था जो पकड में आ गया। वे बहुत सतर्क होकर अपना काम करते हैं इसलिए उनकी पोल कभी भी नहीं खुलेगी। उनकी शिकार महिलाएं कभी भी उनके खिलाफ मुंह नहीं खोलेंगी। आसाराम को जेल में ठूंसे जाने के बाद कई धूर्त बाबाओं के कुकर्मों का भांडाफोड हुआ, लेकिन ढोंगी बाबाओं के अंधभक्तों की तंद्रा नहीं टूटी। यही वजह है कि रामपाल और गुरमीत जैसे कपटियों का धर्म का धंधा सरपट दौडता रहा। कहावत है कि 'पाप का घडा एक न एक दिन फूटता ही है। पिछले वर्ष रामपाल को जेल भेजे जाने पर उसके अनुयायियों ने जमकर अपनी गुंडागर्दी का तमाशा दिखाया था। उनपर काबू पाने के लिए पुलिस की भी सांसें फूल गयी थीं। रामपाल भक्तों के धन की बदौलत राजसी जीवन जीने के साथ-साथ नारियों की अस्मत लूटता था। गुरमीत ने तो जैसे सभी अय्याश पाखंडियों को मात दे दी। उसके भक्तों की संख्या करोडों में बतायी जाती है। अपने ही भक्तों के साथ विश्वासघात करने वाला गुरमीत तो बहुत बडा जालसाज और अपराधियों का सरगना निकला। उसके अपराधों की फेहरिस्त काफी लम्बी है। उसको अदालत के द्वारा दोषी करार दिये जाने के बाद जो हिंसा हुई उसमें ४० लोगों ने अपनी जान दे दी और सैक‹डो घायल हुए। यह सब उस अंधभक्ति के कारण हुआ जो धूर्त साधुओं की पूंजी है। नाबालिग लडकी के यौन शोषण के आरोप में २०१४ से जेल में बंद आसाराम के चेलों ने भी उसे जेल में डाले जाने पर कम तमाशेबाजी नहीं की थी। जिस तरह से गुंडे-बदमाश और पेशेवर हत्यारे अपने खिलाफ खडे होने वाले गवाहों को धमकाते-चमकाते हैं वैसा ही धतकर्म आसाराम और उसके खरीदे हुए गुंडों ने किया। कुछ गवाहों की तो हत्या तक करवा दी गयी। एक जमाना था जब आसाराम के यहां मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और बडे-बडे नेताओं का भी जमावडा लगा रहता था। इसी जमावडे ने आसाराम की 'साख' में खूब इजाफा किया था और उसके अनुयायियों की संख्या बढती चली गई थी। तब भी उस पर कई संगीन आरोप लगते थे, लेकिन उनपर ध्यान नहीं दिया जाता था। गुरमीत और रामपाल जैसे नकाबपोश देहभोगियों ने भी जी-भरकर आसाराम का अनुसरण किया और चंद वर्षों में अरबों-खरबों का साम्राज्य खडा कर लिया। दरअसल इन लोगों की सोच साधु-संतों वाली है ही नहीं। यह धन और सम्पत्ति के जन्मजात भूखे हैं। येन-केन-प्रकारेण धन बटोरना ही इनका मूल उद्देश्य है। दुनिया को तो यह मोहमाया से दूर रहने, भौतिक सुखों के त्यागने की शिक्षा देते हैं, लेकिन खुद चौबीस घण्टे भोग विलास में डूबे रहते हैं। गुरमीत ने बिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के मुख्यालय में तलाशी में कई रहस्योद्घाटन हुए। गुरमीत कितना अय्याश था और साध्वियों का कहां-कहां यौन शोषण करता था इसका पता तो इस सच से चलता है कि वह जिस गुफा में रहता-सोता था उससे जुडा एक गुप्त रास्ता था जो सीधे साध्वी निवास पर खुलता था। इसी साध्वी निवास में विभिन्न महिलाएं रखी जाती थीं जिन्हें वह अपनी अंधी वासना का शिकार बनाता था। डेरा छोड चुके कुछ लोगों ने बताया कि डेरा प्रमुख गुरमीत और उसके कुछ करीबियों के अलावा गुफा में घुसने की किसी को भी इजाजत नहीं थी। खुद को संत कहने वाले 'भगवान के दूत' के यहां एके-४७, विस्फोटकों एवं पटाखों की फैक्टरी का मिलना आखिर क्या दर्शाता है? गौरतलब है कि गुरमीत को महिलाओं से मालिश करवाने की लत थी। इसीलिए वह अपनी मुंहबोली बेटी हनीप्रित को अपने साथ जेल में रखना चाहता था। जेल में गुरमीत के स्वास्थ्य की जांच करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि वह 'सेक्स एडिक्ट' है। इसी वजह से जेल में वह बेचैन रहता है। गुरमीत के एक पूर्व सेवक का दावा है कि गुरमीत नियमित सेक्स टॉनिक लेता था। उसके लिए आस्ट्रेलिया और कई देशों से यौन क्षमता बढाने वाला पेय मंगाया जाता था। इतना ही नहीं कुछ लोगों का यह भी दावा है कि वह सुंदरियों के साथ-साथ सुरा का भी गुलाम था। हजारों अनुयायियों को इसकी जानकारी थी फिर भी उनका गुरमीत से पता नहीं मोहभंग क्यों नहीं हुआ? अपने दुखों को दूर करने और सुकून की चाहत में आश्रमों और डेरों में पहुंचने वाली भीड में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिन पर बाबाओं को बहुत भरोसा होता है। यह भरोसा काफी जांचने-परखने के बाद बलवती होता है। यह भक्त भी बहती गंगा में हाथ धोने के मौके तलाशते रहते हैं। अपने 'भगवान' के ऊपर जाने या जेल में जाने के बाद यह उनकी धन-सम्पत्ति पर कब्जा करने की साजिशों में लीन हो जाते हैं। एक थे आशुतोष महाराज जिनका २९ जनवरी २०१४ को देहावसान हो गया था। लेकिन उनके कुछ करीबी चालाक भक्तों ने यह प्रचारित कर दिया कि महाराज तो गहरी नींद में लीन हैं। जैसे ही उनकी नींद खुलेगी वे अपने भक्तों के बीच खडे नज़र आएंगे। तीन साल से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है और महाराज का शव डीप फ्रीजर में रखा हुआ है। अंधभक्त उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब महाराज अपनी चेतना में लौट आएंगे। महाराज का बेटा अपने पिता की देह का अंतिम संस्कार करना चाहता है, लेकिन महाराज के आश्रम पर कब्जा जमा चुके 'दबंग' चेहरे उन्हें इसकी इजाजत देने को तैयार नहीं हैं। महाराज की अरबों-खरबों की जो सम्पत्ति है उस पर भी उन्होंने अपना कब्जा जमा लिया है। आसाराम के जेल में जाने के बाद इंदौर, नागपुर, अहमदाबाद, सूरत आदि शहरों में उनके जो आश्रम थे और धन सम्पत्ति थी उस पर कुछ विश्वस्त भक्तों ने कब्जा जमा लिया है। कई भक्तों ने बडी-बडी इमारतें खडी कर ली हैं और महंगी आलीशान गाडियों में घूमने लगे हैं। इंदौर के एक 'गुटखाछाप' भक्त ने तो बडी 'दबंगता' के साथ देश के विभिन्न महानगरों से एक दैनिक अखबार का प्रकाशन प्रारंभ कर 'दुनिया' को अपना जलवा दिखा दिया है। ऐसे खुशकिस्मत और प्रतिभावान लोग अब यही चाहते हैं कि आसाराम जेल में ही पडा-पडा मर-खप जाए। गुरमीत उर्फ राम रहीम के नजदीकी अनुयायियों की भी नजर उसके डेरों, जमीनों और तमाम धन-दौलत पर है जो उसने लोगों को बेवकूफ बनाकर जुटायी है।