Thursday, April 26, 2018

इन्हें कौन सुधारे?

यह अच्छी बात है कि अधिकांश परिवारों-पुरुषों ने यह स्वीकार कर लिया है कि लडकियों को पढाया-लिखाया जाए। स्त्रियों को घर से बाहर आने-जाने की स्वतंत्रता दी जाए। लडकियों और महिलाओं के नौकरी करने पर भी कोई पाबंदी नहीं हो। कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर नारियां पुरुषों को जबर्दस्त चुनौती देती दिखायी देती हैं। खुले दिल के लोग इसे अच्छा संकेत मानते हुए तहेदिल से स्वीकार रहे हैं। अफसोस और चिन्ता की बात यह भी है कि देश में अभी भी कुछ संकीर्ण मनोवृत्ति वाले लोग हैं जो यह चाहते हैं कि नारियां उनके हिसाब से चलें। युवतियों का किसी युवक से हंस-बोलकर बात कर लेना उन्हे शूल की तरह चुभता है। भारत में ऐसा प्रदेश भी है जहां के गांवों में लडकियों का मोबाइल पर बात करना और जींस पहनना अपराध माना जाता है। लडकियों की स्वतंत्रता उन्हें डराती है और उन्हें अपनी नाक कटने की चिन्ता सताती है। ऐसे ही लोगों की भीड में अपनी नाक कटवाने वाले सीना तानकर चलते नजर आते हैं जिन्हें दूसरों की मां-बहनें बाजारू प्रतीत होती हैं। वे उनकी आबरू लूटने की फिराक में रहते हैं।
हिन्दुस्तान की केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी मुंबई से लौटी थीं और एयरपोर्ट से दिल्ली स्थित अपने निवास पर जा रही थीं। इस दौरान उन्होंने पाया कि एक सफेद रंग की कार उनकी गाडी का पीछा कर रही है। कार में चार लडके सवार थे। वे उनकी गाडी के बराबर अपनी कार दौडा रहे थे और उनकी तरफ देखते हुए ओछी हरकतें कर रहे थे। मंत्री ने अपने ड्राइवर से बीकन लाइट ऑन करने को कहा, लेकिन नशे में धुत चारों लडकों की अक्षम्य इशारेबाजी की रफ्तार तेजी पकडती गई। ऐसे में उन्होंने १०० नंबर पर कॉल कर दिया। पुलिस की पकड में आते ही वे हाथ-पांव जोडने लगे। उनका नशा काफूर हो गया। उनकी उम्र महज १८ से १९ साल है। वे अभी कालेज में पढाई कर रहे हैं। देश में महिलाओं से दुर्व्यहार और अश्लील हरकतों की वारदातें थम नहीं रही हैं। राजधानी दिल्ली में बीते सप्ताह एक उबर कैब चालक ने महिला यात्री के सामने ऐसी अश्लील हरकत की जिसकी वजह से महिला को बहुत गहरा सदमा लगा। चालीस वर्षीय यह महिला टूर एंड ट्रेवल्स एजेंसी में काम करती हैं। वे रविवार रात को इंदौर से लौटी थी। रात दस बजे उन्होंने एयरपोर्ट से घर जाने के लिए उबर कैब की। रास्ते में महिला ने देखा कि कैब चालक अपनी पैंट की चेन खोल कर अश्लील हरकत कर रहा है। महिला को बेहद बुरा लगा। गुस्सा भी आया। वह बार-बार व्यू मिरर के जरिए उन्हें देखते हुए अश्लीलता की पराकाष्टा पार करता रहा। हद तो तब हो गई जब उसने महिला से छेडछाड करनी शुरू कर दी। ऐसे में उन्होंने ड्राइवर को धमकाते हुए कैब रूकवाई व १०० नंबर पर शिकायत की। पुलिस की गिरफ्तारी के बाद पता चला कि वह पिछले डेढ साल से फर्जी लाइसेंस पर कैब चला रहा था। अब वो जमाना तो है नहीं कि महिलाएं घर में बंद कमरों में सिमटी रहें।
आज लडकियां आसमान छूना चाहती हैं। इसके लिए वे दौड-भाग करने में कोई कसर नहीं छोडतीं। हरियाणा के तरक्की करते शहर सोनीपत के गांव में पिछले दिनों पंचायत ने मुनादी कराई कि गांव की लडकियां जींस पहनना बंद कर दें और मोबाइल से भी पूरी तरह से दूरी बना लें। हैरानी की बात तो यह है कि अधिकांश ग्रामीणों ने पंचायत के इस फैसले की सराहना की। गांव के सरपंच का कहना है कि लडकियां जींस पहन कर लडकों को रिझाती हैं, लडके भी उनपर लट्टू हो जाते हैं। उनके हाथ में आया मोबाइल आग में पेट्रोल डालने का काम करता है। सरपंच बार-बार उन तीन लडकियों का जिक्र भी करते रहते हैं जो जींस पहनती थीं और मोबाइल भी रखती थीं। फिर अपने प्रेमियों के साथ गांव से भाग खडी हुर्इं। सरपंच कहते हैं कि लडकियों के भाग जाने से गांव और पंचायत की जबर्दस्त बदनामी हुई है। हम नहीं चाहते कि गांव की और लडकियां अपना मुंह काला करें इसलिए जींस और मोबाइल पर बैन लगाना निहायत जरूरी हो गया है। सरपंच लोगों को यह बताना भी नहीं भूलते कि उनकी दो बेटियां और एक नातिन है, जिन्हें साधारण कपडे पहनने को दिये जाते हैं और मोबाइल भी तभी उन्हें दिया जाता है जब किसी रिश्तेदार से बात करनी जरूरी हो। गौरतलब है कि हरियाणा तुगलकी फरमानों के लिया जाना जाता है। खाप पंचायतों की मनमानी और दादागिरी की कई खबरें पढने-सुनने में आती रहती हैं। प्रेमियों को सूली पर लटकाने में देरी नहीं की जाती। कुछ माह पहले एक खाप पंचायत ने चाऊमीन खाने पर प्रतिबंध लगाया था। वजह बतायी गयी थी कि इसे खाने से उत्तेजना बढती है और बलात्कारों में इजाफा होता है।
मनचलों के आतंक से लडकियां अक्सर परेशान रहती हैं। कुछ ही लडकियां उनकी छेडछाड का प्रतिरोध कर उन्हें सबक सिखा पाती हैं। बदमाश इसलिए बेफिक्र रहते हैं क्योंकि उनकी निगाह में लडकियों में आत्मविश्वास और हिम्मत का अभाव होता है जिससे उनके मंसूबे आसानी से पूरे हो जाते हैं। देश के प्रदेश मध्यप्रदेश के शहर में भी गुंडे-बदमाशों ने महिलाओं का जीना हराम कर रखा है। अपने भी दुष्कर्म में पीछे नहीं रहते। पिता द्वारा बेटी से दुष्कर्म, मौसा द्वारा भानजी से ओछी हरकत, पडोसी द्वारा नाबालिग पर अत्याचार की खबरें इस शहर में भी आम होने से चिंतित और परेशान लडकियों ने आत्मरक्षा के गुर सीखने शुरू कर दिये हैं। विशेषज्ञ उन्हें गुंडे बदमाशों का मुकाबला करने के विभिन्न तरीके सिखा रहे हैं। आत्मरक्षा के गुर सीख कर लडकियां निर्भीक बन रही हैं। कभी बदमाशों से भयभीत हो जाने वाली लडकियां आत्मविश्वास से लबरेज हैं। वे ऐलानिया स्वर में कहती हैं कि अगर किसी ने हमारे साथ बदसलूकी की तो हम बडे जोर से चीखेंगी और भीड इकट्ठा कर उन्हें भागने को विवश कर देंगी। हमने उनकी ठुकाई के भी तरीके सीख लिए हैं। अब गंदी सोच रखने वाले सावधान हो जाएं। अभी तक ५० बालिका और किशोरियां प्रशिक्षण प्राप्त कर चुकी हैं। यह सिलसिला अनवरत जारी है।

Thursday, April 19, 2018

यह कैसी पाशविकता?

बलात्कार और बलात्कारियों के खिलाफ कितना कुछ लिखा गया। सुधर जाने की चेतावनियां दी गर्इं। नपुंसक बनाने का डर दिखाया गया। चौराहे पर फांसी देने की भी मांग की गयी। हजारों बार कैंडल मार्च निकाले गये। लेकिन कोई फर्क नहीं पडा। लिखना, बोलना, चीखना, चिल्लाना जैसे सब व्यर्थ। अजय पुनिया लिखते हैं :
'बहन बेटी की इज्जत लुटते हुए
एक जमाना... हो गया है
बलात्कारी सब पकडे नहीं गये हैं
एक जमाना... हो गया है
रपट दर्ज नहीं... पुलिस को बिकते
एक जमाना... हो गया है
हवस के शहंशाह पुजते आ रहे
इक जमाना... हो गया है
हम सब पक्के हिजडे बन चुके हैं
इक जमाना... हो गया है।'
भारतीय जनता पार्टी के एक विधायक पर एक नाबालिग ने दुराचार का आरोप लगाया। सत्ता और पुलिस ने विधायक का साथ देकर हर किसी को निराश किया। लडकी के मां-बाप की किसी ने फरियाद नहीं सुनी। उलटे पिता को ही जेल में ठूंस दिया गया। जहां उन्हे इस कदर यातनाएं दी गर्इं कि उनकी मौत हो गई।
जम्मू के कठुवा में आठ साल की बच्ची के साथ कई दिनों तक हुए बलात्कार और उसकी बर्बर हत्या ने पूरी मानवता को स्तब्ध करके रख दिया। देश शर्मसार हो गया। राजधानी दिल्ली में सिरफिरे ने तमंचे के बल पर एक ११वीं कक्षा की छात्रा को अगवा किया और अपने ही घर में दस दिनों तक कैद कर उससे दुष्कर्म करता रहा। वह छात्रा के हाथ, पैर, मुंह बांधकर उसे बेरहमी से पीटता भी रहा। देश में इस तरह के दुराचारों की कतार-सी लग गई है। कोई भी दिन ऐसा नहीं बीतता जब बेटियों पर बलात्कार की खबरें इंसान होने की शर्मिन्दगी का अहसास न कराती हों। बलात्कार पर बलात्कार का शिकार होतीं छोटी-छोटी मासूम बच्चियों के बिलखते मासूम चेहरे नींद उडा देते हैं। मन में यह विचार भी आता है कि जहां पर पिता ही दुराचारी बन बेटियों की अस्मत लूटते हों वहां शाब्दिक प्रहार कितने असरकारी होंगे। दूसरों की मां, बहन, बेटी को वासना के तराजू में तौलने वालों के लिए शब्दों और रिश्तों की कोई अहमियत नहीं रही। एक फिल्म अभिनेत्री ने रहस्योद्घाटन किया है कि उसका अक्सर ऐसे मर्दों से सामना होता रहता है जो दिन में तो उसे बहन कहते हैं और रात में साथ सोने की मांग करते हैं। ऐसे चरित्रहीन लोगों के कारण ही कभी-कभी अच्छे और सच्चे चेहरों को शंका और अविश्वास के कटघरे में खडा कर दिया जाता है। तामिलनाडु के उम्रदराज राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित जिस हैरतअंगेज अनुभव से गुजरे हैं उसे वे जीवन भर नहीं भूल पाएंगे। हुआ यूं कि एक महिला पत्रकार के सवाल पर प्रसन्न होकर उन्होंने उसका गाल थपथपा दिया। इसके पीछे उनका उद्देश्य पत्रकार की सराहना और प्रोत्साहित करना था। वे वर्षों तक पत्रकारिता से जुडे रहे हैं। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा कि वात्सल्य को वासना समझ लिया जाएगा और हंगामा हो जाएगा। उन्होंने फौरन पत्रकार से यह कहते हुए माफी मांग ली कि आप तो मेरी पोती जैसी है। एक पत्रकार होने के नाते हौसला-अफजाई के लिए मैंने आपका गाल थपथपाया था।
खरगोन के डीआइजी ए.के. पाण्डेय जैसे तमाम लोग आज बेहद गुस्से में है, उनका क्रोध इन शब्दों में सामने आया है : "बलात्कार विरोध प्रदर्शन, कैंडल मार्च से नहीं बल्कि बलात्कारियों को कठोरतम सजा दिलाने से ही खत्म होंगे। यह कितनी शर्म की बात है कि जब बलात्कारियों को सजा देने की बात आती है तो इसी देश के कुछ सफेदपोश कहते हैं कि लडकों से तो गलती हो ही जाती है। इन नासमझों, बेचारों को फांसी देने की सोचना ही उनके साथ अन्याय करना है। एक सवाल यह भी है जब कोई बलात्कारी हमारा करीबी होता है तो हम उसका साथ देने के लिए खडे हो जाते हैं। ऐसा कम ही देखने में आया है जब बलात्कारी का उसके परिवार, रिश्तेदारों, दोस्तों और समाज ने बहिष्कार किया हो। यदि वास्तव में बलात्कार का विरोध करना है तो उन लोगों का भी बहिष्कार करना होगा जो बलात्कारी को बचाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाते हुए दुराचारियों के पक्ष में खडे हो जाते हैं। एक जाने-माने नेताजी की दलील है कि पिछले कई वर्षों से बलात्कार होते चले आ रहे हैं। यह कोई नयी बात नहीं है।" दरअसल, नेता भूल जाते हैं कि ऐसे बयान दुराचारियों के पक्ष में जाते हैं और उनका मनोबल बढाते हैं। बलात्कारी हिन्दू है या मुसलमान यह कहकर जनता को गुमराह किया जा रहा है। भारतवासी चाहते हैं कि देश में भरपूर 'फास्ट ट्रैक कोर्ट' हो जहां बलात्कारी को छह महीने में ही फांसी की सजा हो जानी चाहिए। देखने में तो यह आ रहा है कि जो बेटियां बलात्कार की शिकार हो रही है उन्हीं के परिजनों को कई तकलीफें झेलनी पडती है। बलात्कारी आराम से रहते-खाते रहते हैं और पीडितों को ऐसे लडाई लडनी पडती है जैसे उन्हीं ने कोई अपराध किया है। देश में लोग सुलग रहे हैं। प्रसिद्ध व्यवसायी आनंद महिन्द्रा का रोष-आक्रोष इन शब्दों में सामने आया है : जल्लाद का काम कोई ऐसा नहीं होता कि कोई खुशी-खुशी करना चाहे। लेकिन बच्चियों के साथ रेप और हत्या करने वालों को सजा देने के लिए मैं बिना हिचक जल्लाद बनने को तैयार हूं।
देश की सजग महिलाओं ने फेसबुक और वाट्सएप में जितना खुलकर इन दिनों लिखा उतना पहले कभी देखने में नहीं आया। मुंबई की कवयित्री डॉ. प्रमिला शर्मा के अंगारों जैसे तपाने और सचेत करने वाले यह अक्षर समाज, सत्ता और व्यवस्था के निकम्मेपन और तमाशेबाजी पर भी जबर्दस्त प्रहार हैं:
ओह बिटिया,
तुम थी सिर्फ़ आठ साल की,
तुम्हें नहीं पहचान थी मनुष्य के रूप में भेडियों की खाल की।
तुम किस धर्म और जाति की हो?
यह सवाल कोसों दूर था,
सिर्फ़ तुम्हारा लडकी होना ही सबसे बडा क़ुसूर था।
अगर उन राक्षसों को होती सिर्फ़ जातीय दुश्मनी,
तो उनकी करनी नहीं होती इतनी घिनौनी। अगर तुम लडकी नहीं, लडके के रूप में इस संसार में आई होती,
क्या तब भी उन नर पिशाचों ने ऐसी ही पाशविकता अपनाई होती?
तुम्हारे साथ हुआ है दुनिया का क़्रूरतम अत्याचार,
समाज में छटपटाहट तो है,
लेकिन तुम्हें न्याय दिलाने में है लाचार।
यही लाचारी गीदडों को निडर बनाती है
और हर दूसरे दिन एक निर्भया समाचार पत्रों के मुख पृष्ठ पर आती है।
अब यह प्रवृत्ति छोडनी होगी,
अपनी चुप्पी तोडनी होगी।
जब तक अपनी चरम पर नहीं पहुँचेगा आक्रोश,
तब तक सिस्टम यूँ ही पडा रहेगा बेहोश।
नारियों में अब निर्भया को निर्भय समाज दिलाने का जगाना होगा जुनून,
तभी गुनहगारों को फ़ौरन फाँसी पर लटकाने का बन पाएगा क़ानून।

Thursday, April 12, 2018

शर्म क्यों नहीं आती?

बिना आगा-पीछा देखे यह तेजी से दौडने का ज़माना है। एक दूसरे को पछाडने के लिए तरह-तरह के साधन और साजो-सामान ईजाद कर लिये गये हैं। आधुनिकता के इस दौर में जब इंसान के जबरन लापरवाह और मंदबुद्धि होने की खबरें सामने आती हैं तो घबराहट-सी होने लगती है। असुरक्षा की भावना पनपने लगती है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में एक अजीबो-गरीब किस्म का मामला सामने आया जिसने दर्शा दिया कि पढे-लिखे होने के बावजूद कुछ लोगों को समय की रफ्तार ने बहुत पीछे छोड दिया है। एक सरकारी स्कूल की टीचर सुधा ने डेढ साल पहले उत्तराखंड स्थित मातृछाया से एक बच्चे को गोद लिया था। महिला का पति एक प्राइवेट अस्पताल में काम करता है। सुधा ने बच्चे को गोद ले तो लिया था, लेकिन बच्चे के काले रंग के कारण उसके उत्साह पर पानी फिर गया था। बच्चे को गोरा बनाने के लिए उसने उसका कई जगह इलाज कराया। करीब एक साल पहले किसी ने उसके कान में डाला कि बच्चे को काले रंग के पत्थर से घिसा जाए तो वह अंग्रेजों के बच्चों की तरह गोरा-चिट्टा हो सकता है। पढी-लिखी शिक्षिका सुधा को तो जैसे वेदमंत्र ही मिल गया। वह फौरन कहीं से काला पत्थर ले आई और दिन-रात मासूम बच्चे के शरीर पर जोर-जोर से घिसने लगी। इससे बच्चे की कलाई, कंधे, पीठ और पैरों में घाव होते चले गए, लेकिन शिक्षिका ने कोई परवाह नहीं की। उसके सिर पर बच्चे को गोरा करने का भूत सवार था। कडे खुरदरे पत्थर को घंटो शरीर पर रगडे जाने के कारण पांच वर्षीय बच्चे का रोना-चीखना भी स्वाभाविक था। बच्चे की पीडा को देखकर शिक्षिका की बहन की बेटी से रहा नहीं गया। उसने कई बार रोकने की कोशिश की, लेकिन फिर भी सुधा को सुध नहीं आई। वह बच्चे को प्रताडित करने से बाज नहीं आई। आखिरकार बहन की बेटी के द्वारा 'चाइल्ड लाइन' और पुलिस में शिकायत की गयी। बच्चे को मुक्त करवाकर अस्पताल ले जाया गया। बच्चे की बहुत बुरी हालत हो चुकी थी। उसके शरीर का कोई हिस्सा ऐसा नहीं था जहां पर घाव न हों।
सोमवार की रात को बाइक से जा रहे उभरते गायक आरुष को कार ने टक्कर मार दी। पुलिसवाले उन्हें नई दिल्ली के नामी बत्रा हॉस्पिटल ले गए। वहां इलाज शुरू करने से पहले ४० हजार रुपये जमा कराने को कहा गया। यह भी बताया कि रोज का ३५ हजार का खर्च आयेगा। पैसों का इंतजाम न होने पर आरुष को उसके परिजन दूसरे अस्पताल ऐम्स ट्रामा सेंटर में ले गए। वहां पर भी नोटों को भगवान मानने वाले डॉक्टरों ने इलाज करने से मना कर दिया। हैरान-परेशान परिवार वाले आरुष को सफदरगंज अस्पताल ले गए। दूसरे दिन सुबह दस बजे आरुष की मौत हो गई। यहां पर भी बडी शर्मनाक और आहत करने वाली ड्रामेबाजी हुई। आरुष की मौत की सूचना मिलने के बाद यार-दोस्त और घरवाले हास्पिटल की मार्चुरी के बाहर खडे होकर यह सोचते रहे कि अंदर पोस्टमार्टम किया जा रहा होगा इसलिए लाश को उनके सुपुर्द करने में देरी हो रही है। चार घण्टे के बाद एक डॉक्टर ने बताया कि शव का पोस्टमार्टम यहां नहीं बल्कि एम्स में होगा। डॉक्टरों से जब यह पूछा गया कि अगर पोस्टमार्टम करना ही नहीं था तो पहले क्यों नहीं बताया। चार घण्टे तक इंतजार करवाने की क्या जरूरत थी? डॉक्टर सवाल को अनसुना कर चलते बने। एम्स ने भी कई लटके-झटके दिखाये और दूसरे दिन सुबह अहसान जताते हुए शव का पोस्टमार्टम किया। देश की राजधानी के अस्पतालों की मृत हो चुकी इंसानियत का शर्मनाक चेहरा दिखा दिया। अगर बत्रा हास्पिटल ने थोडी-सी भी इंसानियत दिखाई होती तो आरुष आज जिन्दा होता। उसे देखने से यह कतई नहीं लग रहा था कि उसे बहुत अधिक चोट लगी होगी। उसके शरीर में बाहर से कहीं से भी बहुत अधिक खून नहीं बह रहा था। वह बेहोश जरूर था। आरुष के दोस्तों को भी इस बात का जीवनभर मलाल रहेगा कि अस्पतालों की अमानवीयता के कारण उनके चहेते मित्र को अपनी जान गंवानी पडी। वह अपने भाई-बहन का और मां का भी बहुत चहेता था। वह किसी को भी किसी काम के लिए मना नहीं करता था। किसी के भी पारिवारिक कार्यक्रम में वह गाना गाकर महफिल में जान डाल देता था। वह हरियाणवी स्टार बनना चाहता था। उसने अपने नाम से यू-ट्यूब चैनल भी शुरू किया था। पांच गाने उसने अपने चैनल पर डाले थे। और भी गानों की तैयारी में जुटा था। उसपर पूरे घर को चलाने की जिम्मेदारी थी। उस रात भी वह खाना डिलिवर करने जा रहा था। तभी अचानक एक तेज रफ्तार गाडी ने टक्कर मार दी। कुछ दिन पहले ही उसे एक नई अच्छी नौकरी मिली थी। वह खुश था कि अब अच्छे पैसे मिलेंगे। जिन्हें जोडकर वह बहन की शादी करेगा। शादियों की पार्टियों में बतौर डीजे का भी काम करने वाले आरुष के दुर्घटनाग्रस्त होने की खबर सुनकर जब परिजन मौके पर पहुंचे तब तक पुलिस उसे बत्रा हॉस्पिटल ले जा चुकी थी। गरीब माता-पिता, परिजनों को भी इस बात का मलाल है कि उनके पास बेटे की जान को बचाने के लिए पैसे नहीं थे। अगर होते तो बेटा आज जिन्दा होता। जहां देखो वहां धन के लालची जमा हो गए हैं। युवतियों को अकेला पाकर खाकी वर्दी वालों की नीयत डोल जाती है।
दिल्ली की वह युवती दो सहेलियों के साथ अपने दोस्त का जन्मदिन मनाने नोएडा के एक फार्महाऊस में गई थी। पार्टी के दौरान सभी मेहमान डीजे पर नाच-गा रहे थे। बेफिक्री और मस्ती का आलम था। ऐसे में अचानक २० लोग फार्महाऊस में पहुंचे और अंधाधुंध लाठी-डंडे बरसाने लगे। कुछ बदमाशों ने तीनों युवतियों को घेर कर छेडछाड शुरू कर दी। इसी दौरान किसी ने १०० नंबर पर पुलिस को कॉल कर दिया। थोडी देर बाद एक आम गाडी में वहां पर पहुंची। उसमें से एक सिपाही बाहर निकला जिसने सबसे पहले बदमाशों के मुखिया को झुककर नमस्कार किया। लडकियों को कॉन्स्टेबल ने अपनी गाडी में बिठाया और लडकों को दूसरी गाडी में डालकर थाने ले गया। स्कार्पियो में महिला पुलिस कर्मी नहीं थी। इसी का फायदा उठाते हुए रास्ते भर वह लडकियों से अश्लील हरकतें करता रहा। पुलिस स्टेशन पहुंचने पर तीनों युवतियों की शिकायत भी दर्ज नहीं की गई। उलटे उनसे घूस के रूप में बीस हजार रुपये वसूल लिए गये। पुलिस का यह अय्याश, लुटेरा और भक्षक चेहरा इन तीनों युवतियों को ताउम्र याद रहेगा। उनसे जब कोई कहेगा कि पुलिस तो विपदा में फंसे लोगों की रक्षक होती है तो जवाब में वे थूकने और गाली देने में देरी नहीं करेंगी। कुछ लोग हद दर्जे के मतलबी और असंवेदनशील हो गये हैं। दूसरों की पीडा में रोमांच और मनोरंजन तलाशते हैं। मरते हुए इंसानों की आखिरी सांसों को रिकॉर्ड करने वालों की करतूत ईश्वर के सच्चे बंदों के खून को खौला देती है। दिल्ली में ही एक तेज रफ्तार कार ओवरटेक करते हुए बाइक सवार को कुचलती हुई चली गई। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि बाइक सवार युवक करीब १० फुट उछलकर डिवाइडर पर जा गिरा। खून से लथपथ युवक तडप रहा था। लोग वहां से गुजरते रहे। गाडियां भी रूक गर्इं। काफी भीड जमा हो गई। किसी को भी उसे अस्पताल पहुंचाने की नहीं सूझी। हां कुछ तमाशबीन फोटो खींचने और वीडियो बनाने में जरूर लगे रहे। आरुष के साथ भी ऐसा ही हुआ था। वह तडप रहा था और तमाशबीन फोटो और वीडियो बनाकर दुर्घटना को यादगार बनाने में लगे थे।

Thursday, April 5, 2018

उनका क्या कसूर?

हां... कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने हिन्दुस्तान के अमन-चैन, सद्भावना और आत्मीयता को जख्म पर जख्म देने की आदत पाल ली है। नफरतों की आंधियों का समर्थन करना और बम बारुद बिछाकर खून की नदियां बहाते हुए इंसानियत को शर्मिंदा करने की कारस्तानियां करते रहना उनकी फितरत है। उन्हें पता कि अधिकांश भारतवासी उनसे नफरत करते हैं। दूरियां बनाकर रहते हैं। उनका बस चले तो मानवता के इन शत्रुओं का गला ही घोंट दें। लेकिन कानून और भारतीय संस्कृति उन्हें इसकी इजाजत नहीं देते। हर सच्चा हिंदुस्तानी खून बहाने नहीं, एक-दूसरे को गले लगाने में यकीन रखता हैं। सर्वधर्म समभाव और भाईचारे के पोषकों के समक्ष नतमस्तक होता चला जाता है। हिंसा की फसले बोने वाले भी हमारे इर्द-गिर्द रहते हैं, जिनकी शिनाख्त करने में हम अक्सर चूक जाते हैं या फिर नजरअंदाज कर देते हैं। अधिकांश दंगई भी हमीं लोगों के बीच के लोग होते हैं जिन्हें सदैव मौके की तलाश रहती है। यही भूलें और चूकें अब बहुत भारी पडने लगी हैं। कभी जंगलों में रहकर खून खराबा करते हुए शासन प्रशासन को चुनौती देने वाले नक्सली शहरों को सुरक्षित मानने लगे हैं।
मैंने जब यह खबर पढी कि गुजरात के भावनगर में ऊंची जाति के लोगों ने एक दलित युवक की इसलिए निर्मम हत्या कर दी क्योंकि उसे घोडी रखने और उसकी सवारी का शौक था तो मुझे हत्यारों की घटिया सोच और अमानवीयता पर बेइंतहा गुस्सा आया। प्रदीप नाम के इस युवक की उम्र मात्र इक्कीस वर्ष थी। दो माह पहले ही उसने अपनी मेहनत की कमायी से एक घोडी खरीदी थी। सामंती सोच रखने वाले सवर्ण जाति के लोगों को उसका घोडी खरीदना और उस पर बैठना ही खंजर की तरह चुभ गया था। उन्होंने अपना ऐतराज जताते हुए प्रदीप को धमकाया था कि अपनी औकात मत भूलो। दलित हो... सिर झुका कर चलो। ऊंची जाति के लोगों की बराबरी करने के सपने देखना छोड दो। तुम जैसे हवा में उडने वालों को मिट्टी में मिला दिया जाता है। धमकियों पर धमकियां मिलने के बाद प्रदीप ने तो घोडी को बेचने का मन बना लिया था लेकिन उसके पिता ने उसे ऐसा न करने और अपने में मस्त रहने की सलाह दी थी। खेतीबाडी के काम में पिता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पसीना बहाने वाला बेटा गुरुवार की सुबह यह कहकर खेत गया था कि वापस आकर साथ में खाना खाएंगे। जब देर तक वह नहीं आया तो पिता को चिन्ता ने घेर लिया। वे उसे खोजने के लिए निकले। गांव के करीब दो-तीन किमी दूर एक सुनसान खेत की ओर जाने वाली सडक पर अपने जवान बेटे को मृत पडा देखकर पिता बेहोश हो गए। बेटे की प्रिय घोडी भी कुछ ही दूरी पर मरी हुई पायी गई। ऊंची जाति के होने का दंभ पालने वाले इस तरह के सवर्ण कैसे भूल जाते हैं कि दलित वर्ग हिंदू समाज का अभिन्न अंग है उन्हें भी सबके बराबर खडा होने का हक है। इस आधुनिक युग में छुआछूत और भेदभाव यकीनन अहंकार की निशानी है। दलित उत्पीडन की घटनाओं को देखकर सभ्य समाज का माथा शर्म से झुक जाता है फिर भी...।
आगरा में एक दलित की महज इसलिए पिटायी कर दी गई क्योंकि उसका हाथ गलती से ब्राह्मण के शरीर को छू गया था।  कन्नोज में एक दलित महिला के साथ बलात्कार के बाद उसे तेजाब से नहला दिया गया। चित्तौडगढ में बाइक चोरी के आरोप में दलित बच्चे को नंगा कर बेरहमी से पीटा गया। ऐसी कई खबरें लगभग रोज पढने और सुनने को मिल जाती हैं। एक सर्वेक्षण के आंकडे बताते हैं कि देश में हर दूसरे घंटे किसी न किसी दलित को निशाना बनाया जाता है। हर २४ घंटे में तीन दलित महिलाओं पर बलात्कार होता है। हर घंटे कोई न कोई दलित मारा जाता है। ऐसी तमाम वारदातें दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र देश पर कलंक से कम नहीं हैं।
पश्चिम बंगाल के आसनसोल में रामनवमी के दिन से भडकी सांप्रदायिक हिंसा की आग के चलते चार लोगों को अपनी जान गंवानी पडी। इन मृतकों में आसनमोल की मस्जिद के इमाम का सोलह वर्षीय बेटा भी सम्मिलित था। दंगाइयों ने उनके बेटे की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। कोई आम पिता होता तो गुस्से से तिलमिला जाता। दंगाइयों के होश ठिकाने लगाने के लिए भडकाऊ भाषणबाजी पर उतर आता। लेकिन इमाम ने जिस सहनशीलता और धैर्य का परिचय दिया उसे देखकर लोगों की आंखें भीग गयी और उन्हें यकीन हो गया कि दरिंदों की भीड में ऐसे फरिश्ते भी बसते हैं। गुस्सायी भीड हिंसक मुद्रा में थी। अपना आपा खोती भीड को संबोधित करते हुए इमाम ने कहा, 'मेरे पुत्र के लिए अल्लाह ने जितना समय मुकर्रर किया था, उतना वह जी लिया। अब किसी और बच्चे की जान न लें। इस्लाम शांति और सौहार्द का धर्म है। वह बदला लेने तथा हिंसा की  शिक्षा नहीं देता।' अपने दुलारे बेटे को हमेशा-हमेशा के लिए खो चुके इस शांतिदूत ने यहां तक कह डाला कि अगर किसी ने हिंसा और बदले की बात की तो मैं मस्जिद और शहर छोडकर चला जाऊंगा।
अभी तक हम यही पढते और सुनते थे कि नक्सली दुर्गम जंगली इलाकों में रहकर आतंक और लूटमारी की वारदातों को अंजाम देते हैं। लेकिन अब कई नक्सलियों ने नगरों और महानगरों को अपनी कर्मस्थली बना लिया है। अभी हाल ही में राजधानी दिल्ली के निकट स्थित नोएडा में बडे आराम से रह रहे नक्सली को पकडा गया। सुधीर भगत नामक यह व्यक्ति मूलरूप से बिहार का रहने वाला है। पुलिस ने नोएडा के एक मकान पर छापा मारकर उसे गिरफ्तार किया। फर्जी आधार कार्ड, कॉलेज के आईकार्ड और अन्य कागजात के साथ पकड में आए इस नक्सली पर बिहार में १४ हत्याएं और छह नरसंहार के मामले दर्ज हैं। यह नक्सली बिहार में बैठे अपने साथियों के जरिए हर माह लाखों की वसूली करता चला आ रहा था। वर्ष २०१४ में एक विधायक के प्रतिनिधि को पूरे गांव के सामने खुलेआम तडपा-तडपा कर मारने वाले इस दरिंदे की बिहार पुलिस के पास कोई फोटो नहीं थी। २००८ से वह नोएडा में रह रहा था। ताज्जुब है कि किसी को भी भनक नहीं लग पायी कि एक ईनामी खूंखार नक्सली उनके आसपास बडे मज़े से रह रहा है!

Thursday, March 29, 2018

मानहानि का तमाशा

अन्ना हजारे। पूरा नाम किसन बाबूलाल हजारे। कम ही लोग होंगे जो इस नाम से वाकिफ न हों। कुछ वर्ष पूर्व इस शख्स ने रामलीला मैदान पर आमरण अनशन कर तत्कालीन कांग्रेस गठबंधन की सरकार की चूलें हिलाकर रख दी थीं। यह कहना गलत नहीं होगा कि नरेंद्र मोदी और भाजपा को केन्द्र की सत्ता दिलवाने में इस सत्याग्रही ने बहुत ब‹डी भूमिका निभायी। अरविंद केजरीवाल को दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाने का श्रेय भी अन्ना को जाता है। उन्हीं के मंच ने आम आदमी पार्टी को जन्म दिया। अन्ना की प्रभावी लडाई से ऐसा प्रतीत होने लगा था कि देश और प्रदेशों में अवश्य बदलाव आयेगा। अन्ना की सभी मांगे पूरी होंगी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। सात साल बाद एक बार फिर से ८१ वर्षीय वृद्ध अन्ना हजारे को उसी रामलीला मैदान पर आमरण अनशन के लिए बैठना पडा। मंच पर वो रौनक नजर नहीं आयी, लेकिन मांगें वही की वही थीं। न जन लोकपाल आया ना ही लोकायुक्त की नियुक्ति की गयी। किसानों की आत्महत्याओं की संख्या बढती चली जा रही है। बूढी काया के फिर से आमरण अनशन पर बैठने के बाद पुराने चेहरों ने जिस तरह से उनकी सुध-बुध लेना जरूरी नहीं समझा उससे स्पष्ट हो गया कि स्वार्थ पूरे होते ही अन्ना उनके लिए निरर्थक हो गये। पागलों की तरह अन्ना के आगे-पीछे दौडने वाले न्यूज चैनलों ने भी एकदम किनारा कर लिया। अन्ना तो वही हैं, लेकिन वक्त बदल गया है। पिछली बार जब उन्होंने आमरण अनशन किया था तो हजारों का हुजूम होता था और ६०-६५ कैमरे लगे रहते थे, लेकिन इस बार चंद चेहरे दिखे और एकाध कैमरा टिका कर खानापूर्ति की गयी। कहावत है कि 'दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है।' अन्ना ने इस बार स्पष्ट कह दिया था कि वही लोग उनके आंदोलन का हिस्सा बनेंगे जो कभी राजनीति में नहीं जाएंगे। इस बार अन्ना को अरविंद, कुमार विश्वास, सिसोदिया आदि की बहुत याद आई होगी। यही लोग ही थे जिन्होंने उनका मंच लूट लिया था। अरविंद केजरीवाल को अगर अन्ना का साथ नहीं मिला होता तो वे राजनीति के नायक की तरह नहीं उभर पाते। अन्ना के मंच से ही उन्होंने भ्रष्टाचारियों को ललकारने का अभियान चलाया था। आम आदमी के चेहरे-मोहरे और पहनावे वाले केजरीवाल के तूफानी भाषणों का दिल्ली ही नहीं, देश की जनता पर भी काफी प्रभाव पडा था। लोगों को लगने लगा था कि यही वो निर्भीक शख्स है जो पथभ्रष्ट राजनीति को सही रास्ते पर लाने का दमखम रखता है। सत्ता पाने के बाद यह कभी बहकेगा नहीं। कोई भी लालच इसको खरीद नहीं पायेगा। जोर-शोर के साथ देश के दिग्गज नेताओं पर आरोप पर आरोप लगाने और सबूत के पुलिंदे लहराने वाले अरविंद केजरीवाल ने भी कभी कल्पना नहीं की थी कि उनकी आम आदमी पार्टी को हाथों हाथ लिया जाएगा और एक दिन ऐसा भी आयेगा जब वे दिल्ली के मुख्यमंत्री होंगे। उन्होंने मुख्यमंत्री बनने से पहले और बाद में विरोधी नेताओं और उनके परिवारों के खिलाफ भ्रष्टाचार, अनाचार के ऐसे-ऐसे आरोप लगाये कि लोग दंग रह गए। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को तो उन्होंने उम्र भर के लिए जेल में सडाने की कसम खाई थी। वे अपने भाषणों में यह बताने से नहीं चूकते थे कि वे कभी तथ्यहीन आरोप नहीं लगाते। पूरे सबूत जुटाने के बाद ही अपनी जुबान खोलते हैं। यही वजह थी कि लोगों को लगने लगा था कि  देश को सच्चा राजनेता मिलने के साथ-साथ एक ऐसा योद्धा मिल गया है जिसकी वर्षों से तलाश थी। दिग्गज राजनेताओं और बडे-बडे उद्योगपतियों को भ्रष्टाचारी, ठग और लुटेरा बताने वाले केजरीवाल को देश के मीडिया ने भी रातोंरात हीरो बना दिया था। हर न्यूज चैनल पर जैसे उनका कब्जा हो गया था। केजरीवाल ने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, अरूण जेटली, पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल उनके पुत्र अमित सिब्बल, पंजाब के अकाली दल के नेता विक्रम मजीठिया से लेकर न जाने कितने नेताओं को तेजाबी आरोपों की बौछारों से नहलाया। गडकरी को तो केजरीवाल के संगीन आरोपों के बाद भाजपा अध्यक्ष पद से त्यागपत्र तक देना पडा था। अरूण जेटली की भी काफी बदनामी हुई थी। तभी तो उन्होंने केजरीवाल और उनके साथियों पर कई करोड की मानहानि का मुकदमा दर्ज कर रखा है। नतीजतन वे तकरीबन ४० मुकदमो की गिरफ्त में आ गए। हालत इतने गंभीर हो गए कि उनके सामने यह समस्या खडी हो गई कि मुख्यमंत्री के दायित्व को निभायें या फिर मुकदमों से निपटने के लिए अपना कीमती समय जाया करें। ऐसे में उन्होंने अपना दिमाग लडाया तो उन्हें मानहानि के मुकदमों से मुक्ति पाने के लिए माफी मांग लेना ही सबसे आसान रास्ता लगा। इससे वे न्यायालयों के चक्कर काटने से तो बच जाएंगे। पंजाब के अकाली दल के नेता विक्रम मजीठिया, जिन्हें उन्होंने नशे का सौदागर घोषित कर जेल में पहुंचाने की हुंकार लगायी थी, से माफी मांग ली है। इसके साथ ही नितिन गडकरी, कपिल सिब्बल के पुत्र से भी लिखित माफी मांग कर यह संकेत दे दिए हैं कि वे उन सभी नेताओं, उद्योगपतियों से माफी मांगने से संकोच नहीं करने वाले, जिनकी कभी उन्होंने डंके की चोट पर बदनामी की थी। कभी आरोपों के कीचड उछालकर नायक बनने वाले केजरीवाल के झुकने के पीछे का असली सच यही है कि उन्होंने बिना गहराई से अध्ययन किए सुनी-सुनायी बातों के आधार पर आरोप तो लगा दिए, लेकिन जब सबूत पेश करने की बारी आयी तो उन्हें नानी याद आ गई। अगर उनके पास पुख्ता सबूत होते तो वे माफी मांगने की सोचते भी नहीं। वे जानते थे कि जनता का दिल कैसे जीता जा सकता है। उन्होंने सत्ता पाने के लिए तब वही किया जो इस देश के धूर्त नेता करते आए हैं। माफी मांगकर वे यह दिखाना चाहते हैं कि आज की तारीख में देश की राजनीति में उन सा साहसी और कोई नेता नहीं है। वे इस भ्रम के साथ अपना सीना ताने हैं कि माफी के खेल से उनके कद में बढोत्तरी हुई है। सवाल यह है कि क्या वे अब जब किसी पर आरोप लगायेंगे तो क्या लोग उन पर यकीन कर लेंगे? यही साख ही तो किसी भी राजनेता की असली पूंजी होती है जो उन्होंने खो दी है। देश के अन्य बडबोले बेसब्रे नेताओं को अरविंद के माफीनामों की झडी से सीख ले लेनी चाहिए कि वे बिना पुख्ता सबूतों के अपने विरोधियों पर कीचड उछालने से बचें। भले ही राजनीति में यह कार्य आम माना जाता हो, लेकिन अदालत में तो साक्ष्य पेश करने ही पडते हैं अन्यथा जेल और जुर्माने की चोट खानी ही पड सकती है। एक सच यह भी है कि अपने यहां के सभी नेता दूध के धुले नहीं हैं। अरविंद ने जिन्हें निशाना बनाया उनमें कुछ तो बेहद कुख्यात रहे हैं। कुख्यात भ्रष्टाचारी भी जानते है कि आरोपों को कोर्ट में सिद्ध करना बेहद मुश्किल होता है इसलिए वे खुद को पाक साफ दिखाने के लिए करोडो रुपये की मानहानि का मुकदमा करने में देरी नहीं लगाते।

Thursday, March 22, 2018

अदने से शख्स की विराट सीख

कई लोग प्यार की शुरुआत में तो बहुत उत्साहित रहते हैं। उनके हावभाव उनके वफादार होने के संकेत देते हैं, लेकिन समय बीतने के साथ-साथ जब उनकी मनोकामनाएं पूरी नहीं होतीं तो वे प्यार को बरबाद करके रख देते हैं। ऐसा ही कुछ खूबसूरती को लेकर भी है। इसका आकर्षण किसी को भी बहका सकता है, लेकिन बहकने का वो अर्थ नहीं होता जो इन दिनों देखने में आ रहा है। बडे-बडे लोग जब प्यार की परिभाषा में खरे नहीं उतरते तब किसी अदने से इंसान के द्वारा सच्चे प्यार की परिभाषा गढ देना चौंका कर रख देता है। रेशमा के पति उस्मान का भी यही दावा था कि उसे अपनी पत्नी से बेइंतहा प्यार है। उस्मान ऑटो चलाता था। गरीब परिवार में पली-बढी रेशमा उस्मान को एक ही नजर में भा गई थी। वह उसकी बेइंतहा खूबसूरती पर मर मिटा था तभी तो उसने शादी के लिए हां करने में देरी नहीं लगायी थी। शादी के बाद रेशमा का जब पति से सुहाग की सेज पर पहली बार सामना हुआ तो यह बता दिया गया कि उसे बेटे की मां बनना है। उनके परिवार को बेटी नहीं, बेटा ही चाहिए। पति ने यह मान रखा था कि बेटा या बेटी का होना औरत के अपने हाथ में ही होता है। जो औरतें बेटे नहीं पैदा कर पातीं वे किसी काम की नहीं होतीं। बहरहाल, करीब डेढ वर्ष के बाद रेशमा गर्भवती हुई। रेशमा की खूबसूरती पर मर-मिटने वाले उस्मान के अरमान तब ठंडे पड गए जब रेशमा ने बेटी को जन्म दिया। पहली बार तो पति और परिवार वालों ने किसी तरह से खुद को संभाला, लेकिन रेशमा ने जब एक-एक कर पांच बेटियों को जन्म दे दिया तो पति और घर के सभी सदस्य उसके बैरी बन गए। उसे जानवर से भी बदतर माना जाने लगा। बेतहाशा मारपीट की जाने लगी। रेशमा की बडी बेटी तेरह साल की हो चुकी थी। छठवीं बार जब वह गर्भवती हुई तो पति अस्पताल चलकर गर्भस्थ शिशु के लिंग परीक्षण के लिए जोर डालने लगा, लेकिन रेशमा तैयार नहीं हुई। पति के लिए यह असहनीय बात थी। उसे बडा गुस्सा आया। वह भागते-भागते बाजार गया और तेजाब खरीद लाया। घर वापस लौटने के बाद पहले तो उसने रेशमा के साथ खूब गाली गलौच की फिर उसके पेट पर तेजाब उंडेल दिया जिससे उसका पेट और नाभी के नीचे का हिस्सा बुरी तरह से झुलस गया। निर्दयी पति और उसके परिवार वाले रेशमा को तडपता देखकर आनंदित होते रहे। वह चीखती-बिलखती रही। कुछ पडोसियों को जब खबर लगी तो उसे अस्पताल पहुंचाया गया। रेशमा के साथ हुए जुल्म की दास्तान अखबारों में छपी। लोगों ने ऐसे अत्याचारी पति और परिवार को कोसा और थू-थू की। रेशमा का कई दिनों तक सघन उपचार चलता रहा और उसने छठी बार बेटे को जन्म दिया। बेटे के जन्म के बाद रेशमा ने निर्दयी पति के घर जाने से साफ इनकार कर दिया। आज वह ३५ वर्ष की हो चुकी है। उसे जो जख्म दिये गए हैं वे तो कभी भी नहीं भर सकते। उसे तो पुरुष और शादी के नाम से भय लगने लगा है। उसने कसम खायी है कि वह अपनी पांचों बेटियों और बेटे की परवरिश के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएगी। अपना खून पसीना बहाकर उनका भविष्य संवारेगी। रेशमा की खूबसूरती आज भी पुरुषों को अपनी तरफ आकर्षित करती है, लेकिन अब वह किसी के झांसे में नहीं आना चाहती।
खूबसूरत चेहरे के दिवाने एक मनचले के तेजाबी दंश झेलने वाली लक्ष्मी को आज भी इस सवाल का जवाब नहीं मिल पाया है कि जो लोग किसी के चेहरे को पसंद करते हैं उसके इनकार को बर्दाश्त क्यों नहीं कर पाते! यह कहां का प्यार है जो एकतरफा राह पर दौडता है और जो मेरी नहीं हुई उसे किसी और की नहीं होने देने के लिए तेजाब से नहला दिया जाता है। लक्ष्मी का कहना है कि दुनिया वैसी ही है जैसे पहले थी। कुछ भी नहीं बदला है। अब तो मैंने देखने का नजरिया ही बदल दिया है।
बडे-बडे लोग भी खूबसूरती को लेकर ओछे और शर्मनाक बयान देने से बाज नहीं आते। कर्नाटक के पूर्व डीजीपी एच.पी. सांगलियान ने कहीं पर निर्भया की मां को देख लिया। वही निर्भया जिसके साथ देश की राजधानी में चलती बस में सामूहिक बलात्कार कर मरने के लिए सडक पर फेंक दिया गया था। अधिकारी ने मर्दाने अंदाज में कहा कि निर्भया के मां की खूबसूरती को देखकर ही अंदाजा हो जाता है कि निर्भया कितनी हसीन रही होगी। यानी ऐसी खूबसूरती पर तो किसी का भी दिल मचल सकता है। खूबसूरत थी तभी तो बदमाशों की निगाह में आ गई और दुराचार की शिकार हो गई।
तमिलनाडु के स्वास्थ्य मंत्री ने भी खूबसूरती को अपने अंदाज से निशाने पर लिया। हुआ यूं कि मंत्री के विधायकों की बैठक से बाहर आने के दौरान महिला रिपोर्टर ने मीटिंग में लिये गए फैसलों की जानकारी मांगी तो मंत्री ने कोई जवाब देने की बजाय कहा, आप बहुत अच्छी लग रही हैं। अगले दो सवालों पर भी मंत्री ने रिपोर्टर का मुंह बंद करने की कोशिश की : आपका चश्मा आपकी खूबसूरती पर चार चांद लगा रहा है। मंत्री महिला पत्रकार से खुलकर तो कह नहीं सकते कि तुम पहले खुद को संभालो। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम जैसी हसीन युवतियों को फांसने के लिए शिकारी जहां-तहां घूमते रहते हैं। देश में दिन-रात न जाने कितनी खूबसूरत युवतियां बलात्कार का शिकार होती रहती हैं। इसलिए मेरा कहा मानो... यह पत्रकारिता और सवाल पूछना छोड घर में जाकर बैठ जाओ। तुम सिर्फ वहीं सुरक्षित रहोगी।
२४ फरवरी २०१८ को खूबसूरत अभिनेत्री श्रीदेवी की दुबई में मृत्यु हो गई। श्रीदेवी के जीवंत अभिनय और बेमिसाल खूबसूरती के करोडों चाहने वालों में एक हैं गांव तकिया के रहने वाले गंगाराम। गंगाराम दिन-रात श्रीदेवी की फिल्मों के गाने सुनते और उनकी कोई भी फिल्म देखना नहीं भुलते थे। कुछ फिल्में तो उन्होंने दस-दस बार भी देखीं। उन्होंने श्रीदेवी को अपनी जीवन संगिनी बनाने का सपना देखा था जिसके पूरे होने का सवाल ही नहीं उठता था। फिर भी वे श्रीदेवी की दिवानगी से कभी मुक्त नहीं हो पाए। श्रीदेवी की मौत की खबर सुनते ही गंगाराम गहरे सदमे में डूब गए और खुद को घर के कमरे में कैद कर लिया। श्रीदेवी के अंतिम संस्कार के बाद उन्होंने अपना सर मुंडवाया और तस्वीर के सामने पुतला बनाकर जल अर्पित करने के साथ अगरबत्ती और फूलों से उनका पूजन किया। ध्यान रहे कि आमतौर पर मृतक की आत्मा की शांति के लिए मृतक के परिजन ही यह संस्कार करते हैं। गंगाराम श्रीदेवी को अपनी जान से ज्यादा चाहते थे। तभी तो उन्होंने सर्वप्रिय अभिनेत्री के नाम से १०१ आम के पेडों का बगीचा लगाने के साथ-साथ प्रतिमा स्थापित करने का संकल्प लिया है ताकि रोज उनकी पूजा कर सकें। सच्चे प्यार और समर्पण की बेमिसाल परिभाषा पेश करने वाले गंगाराम एक कॉलेज में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी हैं।

Thursday, March 15, 2018

वो का जाने पीर पराई...

पिता की दिली तमन्ना थी कि उनके बेटा-बेटी बडा होकर इंजीनियर बनें। कुदरत के खेल बडे निराले हैं। आदमी कुछ चाह रहा होता है और वह एकाएक अकल्पनीय दृश्य उपस्थित करते हुए यह संदेश दे देती है कि तुम्हारी चाहतें और इच्छाएं अपनी जगह हैं। मेरे फैसले तो अटल हैं। तुम मात्र मूकदर्शक ही हो। दिल की बीमारी के कारण पिता का अचानक निधन हो गया। शव आंगन में पडा था और बेटा-बेटी को ४५ किलोमीटर दूर परीक्षा केंद्र में दसवीं की परीक्षा देने जाना था। दोनों की आंखों से झर-झर कर आंसू बह रहे थे। बच्चों को पिता के सपने और परीक्षा की भी चिन्ता थी। तीनों लिपटकर रोते रहे। मां ने बच्चों को परीक्षा की याद दिलायी। दोनों पिता के शव के पास गए। चरणस्पर्श किया और आंखों में आंसू लिए परीक्षा देने के लिए चल दिए। उनके आने तक घर वालों ने इंतजार किया और शाम को अंतिम संस्कार किया गया। परीक्षा देकर लौटे बेटे ने मुखाग्नि दी। रिश्तेदारों, मित्रों और आसपास के लोगों की आंखों से अश्रुधारा बहती रही। रात को बेटा-बेटी अगले दिन की परीक्षा की तैयारी में जुट गए। अचानक अपने पति को खोने वाली मां बच्चों की मनोभावना को अच्छी तरह से समझ रही थी।
मां-बाप की इच्छाओं को पूरा करने का तीव्र ज़ज्बा रखने वाली संतानों की जितनी तारीफ की जाए, कम है। यह भी देखने में आता है कि बच्चों को गलत राह पकडने में देरी नहीं लगती। भटकाने वालों की मायावी चालें युवाओं के जीवन से खिलवाड करने को आतुर रहती हैं। देश के असंख्य किशोर और युवा नक्सलियों और आतंकियों का अनुसरण कर अपनी जिन्दगी तबाह कर रहे हैं। उनके बूढे असहाय मां-बाप पर क्या बीतती होगी इसकी उन्हें पता नहीं चिन्ता क्यों नहीं सताती! छत्तीसगढ, महाराष्ट्र, उडीसा, झारखंड आदि के कई वृद्ध माता-पिता वर्षों से अपने उन बच्चों के इंतजार में दिन काट रहे हैं जो वर्षों से नक्सलवादियों के बनाये प्रलोभन के घने जंगल गुम हो गये हैं। आज से लगभग सत्रह वर्ष पूर्व नक्सलियों के फैलाये जाल का शिकार होकर बंदूक थामने वाले बस्तर के रहने वाले युवक नीरू के उम्रदराज माता-पिता ने छत्तीसगढ की सीमा पर गढचिरोली (महाराष्ट्र) व आसपास के इलाकों में जगह-जगह पर पोस्टर चिपकाये हैं। जिनमें बेटे से लौट आने की फरियाद की गई है :
"बूढी हुई मां,
झुकी कमर,
अब तो लौट आ।
करना न तू देर
सांसें चंद बाकी
अब तो लौट आ।
पथरा गई है आंखें
इक नजर देखने को
अब तो लौट आ।"
गंभीर रूप से बीमार बिस्तर पर पडी मां को यकीन हैं कि उसकी आवाज उसके बेटे तक जरूर पहुंचेगी। तभी तो उसके कांपते ओंठों से बस यही शब्द निकलते हैं- मेरा नीरू जरूर आएगा। छडी के सहारे बडी मुश्किल से चल पानेवाली मां ने बेटे के नाम आंसुओं से भीगा एक खत भी लिखा हैं :
मेरे नीरू,
दूर से ही सही, मेरा और अपनी मां का आशीर्वाद लेना। भगवान जगन्नाथ की कृपा से तू जहां भी हो, अच्छे से हो, यही हमारी आशा है। पिछले १७ साल से हम तुम्हारे वापस आने की राह देख रहे हैं। अब भी हमे आशा है कि तू हमारे पास सुरक्षित वापस आएगा। सभी माता-पिता की इच्छा होती है कि वृद्धावस्था में उसका बेटा साथ में हो। यही इच्छा हम दोनों पति-पत्नी की भी है। मुझे वह दिन कल जैसा ही लग रहा है, जब तुमने अपनी मां का अस्पताल में इलाज कराया था। तुम्हारे जाने के बाद से हमारी स्थिति बहुत खराब हो गई है। तुम्हें याद कर रो-रोकर हमारा बुरा हाल है। इसी वजह से तुम्हारी मां ने बिस्तर पकड लिया है। हमारा पूरा घर टूट गया है। पैसे खत्म हो गए हैं। झोपडी में रहने को मजबूर हैं। यदि तू झोपडी को देखेगा तो आंखों में आंसू आ जाएंगे। हमें आशा है कि तू वह रास्ता छोडकर हमारे पास वापस आ जाएगा। हम तुम्हारे आने की राह देख रहे हैं। तू ही अपनी मां की आंखों से बहते आंसू पोंछ पाएगा। हमारा टूटा घर भी बना पाएगा। हमारी आशा को निराश मत करना।
तुम्हारे हताश और दुखी माता-पिता
नरहरि राउत व सरस्वती राउत।
किसी भी माता-पिता के मन में अपनी औलाद के प्रति असीम स्नेह होता है। नरहरि और सरस्वती का बेटा नीरू उनसे सत्रह वर्षों से दूर है। वे उनसे मिलने के लिए तडप रहे हैं। ऐसे और भी कई मां-बाप हैं जिन्हें नक्सलियों की आतंकी दुनिया में भटकते अपने बेटे-बेटियों का इंतजार है। सोचिए, जब किसी का बच्चा सुबह स्कूल जाता है और शाम को तय समय पर नहीं लौटता तो वे कितने व्याकुल और बेचैन हो जाते हैं। जब किसी के बच्चे का अपहरण हो जाता है तो वह उसे छुडाने के लिए कुछ भी देने और करने को तैयार हो जाता है। धनवान तो मुंहमांगी फिरौती देने में भी देरी नहीं लगाते। जिनके बच्चे वर्षों से नक्सली षडयंत्र के शिकार बन उनसे दूर हो गए हैं उन पर क्या बीतती होगी। नक्सलियों के द्वारा गरीब आदिवासियों के बच्चों का अपहरण कर लेने पर कहीं से भी कोई आवाज नहीं उठती। उनकी व्याकुलता और पीडा को कभी समझा ही नहीं जाता। यह कितनी हैरत की बात है कि हम काल्पनिक कहानियों पर तो यकीन कर लेते हैं और विचलित हो जाते हैं, लेकिन इस सुलगती हकीकत पर नाममात्र की चिन्ता भी नहीं जताते। किसी ने सच ही कहा हैं :
"जाके पांव न फटी बिंवाई,
वो का जाने पीर पराई..."
नक्सलवाद का जन्म पश्चिमी बंगाल के दार्जिलिंग जिले में नेपाल की सीमा से लगे एक कस्बे नक्सलवाडी में गरीब किसानों को बडे खेतिहर किसानों के शोषण जाल से मुक्त कराने और उनके जीवन में सुधार लाने के उद्देश्य से हुआ था। प.बंगाल से शुरू हुए नक्सलवाद ने धीरे-धीरे उडीसा, छत्तीसगढ, महाराष्ट्र, झारखंड और कर्नाटक तक अपनी पैठ जमा ली। सरकार की ढुलमुल नीतियों ने भी इसके फलने-फूलने में खासी भूमिका निभायी। नक्सलवादी समर्थक भी कहते नहीं थकते कि सत्ताधीशों की मक्कारी के चलते प्रजातंत्र के विफल हो जाने के कारण ही नक्सली आंदोलन जन्मा। लेकिन इस आंदोलन का हश्र आज हमारे सामने है। नक्सलवादियों ने पुलिस और विशेष पुलिस दल के जवानों पर घात लगाकर जितने हमले किए और खून खराबा किया उससे हर राष्ट्रप्रेमी का खून बार-बार खौल जाता है। अपने परोपकारी लक्ष्य को पूरी तरह से विस्मृत कर हत्यारे बन चुके नक्सलियों ने उन गरीब आदिवासियों का जीना हराम कर दिया है जिनके जीवन में बदलाव लाने के दावों के साथ नक्सलवाद की नींव रखी गई थी। खून की होली खेलते चले आ रहे हिंसक नक्सलियों ने न जाने कितनी लडकियों को भी अपने साथ जबरन जोडकर उनका यौन शोषण किया और उनके जीवन को नर्क से भी बदतर बनाकर रख दिया है।