चित्र : १ - अपने तो अपने होते हैं। घर, परिवार, बच्चों का मोह और कर्तव्यबोध हर सजग इंसान को एक मधुर सूत्र में बांधे रखता है। अपने देश और अपनी जडों के प्रति लगाव के धागे भी कभी कमजोर नहीं पडते। कानपुर में रहने वाले सत्तर वर्षीय शमसुद्दीन पाकिस्तान की जेल में आठ वर्ष तक यातनाएं भोगने के बाद जब इस दीपावली पर अपने घर लौटे तो खुशी के मारे उनके आंसू रूकने का नाम नहीं ले रहे थे। यह खुशी थी अपने वतन लौटने की तथा अपनों से मिलने-मिलाने की, जिसे पाने की उन्होंने उम्मीद ही छोड दी थी। शमसुद्दीन १९९२ में अपने किसी जान-पहचान के व्यक्ति के साथ नब्बे दिन के विजिट वीजा पर प‹डोसी देश पाकिस्तान गये थे। १९९४ में उन्हें पाकिस्तान की नागरिकता भी मिल गई। शमसुद्दीन को इस बात की ब‹डी पी‹डा होती थी कि उन्हें पाकिस्तान में अविश्वास और संदेह भरी ऐसी निगाहों से ऐसे देखा जाता था। जैसे वे जेब में कोई बम लेकर चल रहे हों। इसी बीच २०१२ में पाकिस्तानी पुलिस ने जासूसी के आरोप में गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिया। उनके लिए यह बहुत ब‹डा आघात था। अपना मुल्क छोडकर आने की गलती की ऐसी सज़ा की तो उन्होंने कभी कल्पना ही नहीं की थी। जेल में दिन-रात उन्हें यातनाएं दी जातीं। कभी नींद लगती तो जूते और डंडों की बरसात शुरू हो जाती। हर पल मौत की आहट दिल की धडकनें बढाती रहती। अपनों से दूर होने का अहसास और किसी से न मिल पाने की विवशता उन्हें पल-पल रूलाती। उन पर चौबीस घण्टे बस यही आतंकी दबाव रहता कि वे स्वीकार कर लें कि उन्हें भारत सरकार ने जासूसी करने के लिए पाकिस्तान भेजा है। उन्हें खूंखार कैदियों से भी पिटवाया जाता। अंदर तक बुरी तरह से तोड देने वाले हालातों के शिकंजे में त‹डपते इस उम्रदराज शख्स ने तो यही मान लिया था कि उनका बचना मुश्किल है। उन्होंने तो मौत के आगोश में समाने के लिए खाना-पीना भी बंद कर दिया था, लेकिन जब पाकी जेल के कारिंदे उनसे अपना मनचाहा उगलवाने में नाकामयाब रहे तो उन्हें रिहा कर दिया गया।
१४ नवंबर २०२० के दिन जब शमसुद्दीन की घर वापसी हुई तो उनके परिजन घण्टों खुशी से उनके गले लगकर रोते रहे। सभी ने उनके जिन्दा वापस लौटने की आशा ही छो‹ड दी थी। अपने बडे-बुजुर्ग को अपने बीच पाकर उनके मुंह से बस यही शब्द निकल रहे थे कि इस बार की दीवाली तो उन्हें सारी उम्र याद रहेगी। शमसुद्दीन भी यही कहते रहे कि मेरे अपने देश भारत में जो सुकून और अपनापन है वो और कहीं नहीं। मैं तो हर किसी को यही कहूंगा कि अपना देश, अपनी माटी को छो‹डकर और कहीं दूसरे देश जाने की भूल कभी न करना। खासतौर पर पाकिस्तान तो बिलकुल भी नहीं, जहां की सत्ता और व्यवस्था हैवानों के क्रूर हाथों में है।
चित्र : २ - माता-पिता, भाई-बहन दिवाली की तैयारी में जुटे थे। सभी को अपने सैनिक बेटे, भूषण सतई का इंतजार था, जो दिवाली पर घर आने वाला था, लेकिन अचानक खबर आयी, भारत-पाक-नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तानी सेना की ओर से की गई भीषण गोलाबारी के दौरान उनका दुलारा शहीद हो गया है। नागपुर के निकट स्थित काटोल के रहने वाले शहीद नायक भूषण सतई २०११ में भारतीय सेना में भर्ती हुए थे। अपने नौ वर्ष के कार्यकाल में उन्होंने सेना की विभिन्न मुहिम में हिस्सा लेकर अपनी दिलेरी का परिचय दिया था। पाकिस्तान की सेना को मुंहतोड जवाब देकर शहीद होने वाले भूषण सतई की अंतिम यात्रा में पूरा गांव उम‹ड प‹डा। अथाह शोक में भी गर्व समाहित था। पूरा इलाका 'अमर रहे-अमरे रहे शहीद भूषण अमर रहे' के नारों से गूंज रहा था। अपने जवान बेटे की शहादत पर पिता का सीना चौडा हो गया था। उनके दिल से निकले इन शब्दों ने स्पष्ट कर दिया कि उनके लिए अपने राष्ट्र के क्या मायने हैं, "मेरा २८ साल का बेटा शहीद हो गया है। हमारे लिए यह कठिन समय है, लेकिन मुझे अत्यंत गर्व हो रहा है कि मेरे बेटे ने पाक के नापाक इरादों पर पानी फेर दिया। पाकिस्तान सेना को मुंहतोड जवाब देकर मेरे भूषण और उसके साथियों ने मेरा सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। देश की रक्षा करते-करते मेरे दुलारे को शहादत मिली है। मुझे नाज़ है उस पर।"
अपने दिल-दिमाग और आंखों में अपने भाई की तस्वीर को संजोये बहन सरिता खुद को बडी भाग्यशाली मान रही थी। उसका प्यारा भैय्या भाई दूज के दिन तिरंगे में लिपट कर उससे अंतिम बार मिलने आया था। देशभक्ति का इससे ब‹डा उपहार और कोई नहीं हो सकता। छोटे भाई ने अपने बडे भाई की शहादत को सलाम करते हुए उनके सपने को पूरा करने की प्रतिज्ञा की तो गांव के कई युवक-युवतियों ने सेना में भर्ती होकर पाकिस्तान को सबक सिखाने की कसम खायी।
चित्र : ३ - एक मशहूर गायक इन दिनों दुबई में तरह-तरह के अपने राग अलाप रहा है। हिन्दुस्तान में उसने अपार धन भी पाया और सम्मान भी। भारतवासी हर कलाकार को आदर-सम्मान देना जानते हैं। सोनू निगम की भी झोली भर दी गई। फिर पता नहीं उसमें क्यों और कैसा अहंकार आया कि उसे विदेशी जमीन भाने लगी। उससे एक साक्षात्कार में पूछा गया कि क्या आपका बेटा भी गायक बनना चाहता है? उसका प्रत्युत्तर था कि, "अगर उसकी इच्छा होगी तो मैं उसे रोकूंगा नहीं, लेकिन मैं नहीं चाहता कि वह भारत में सिंगर बने। वह अब भारत में नहीं, दुबई में रहता है। मैंने उसे पहले ही भारत से निकाल दिया है।" ऐसे अहसानफरामोश, नमकहरामों पर किसे गुस्सा नहीं आयेगा! जिस देश ने इन्हें फर्श से अर्श पर पहुंचाया उसके प्रति यह अपमानजनक बोल, यह बताने के लिए काफी हैं कि यह गायक कितना गिरा हुआ घटिया इंसान है।
ऐसे कुछ शैतान और भी हैं, जो भारत माता और उसकी सरहदों के रखवाले शूरवीर सैनिकों के अपमान से बाज नहीं आ रहे हैं। समस्त राष्ट्रभक्तों का खून-खौलाते और उन्हें आहत करते इन बददिमागों को देश के लिए अपना जीवन बलिदान करने वाले सैनिकों का सम्मान करने में कमतरी का अहसास होता है। यह वही चेहरे हैं जो अपने न्यूज चैनलों पर लगातार भौंकते हुए दावा करते रहते हैं कि हम-सा कोई नहीं। हमारी मनपसंद राजनीतिक पार्टी तथा हम ही हैं जो देश की नैय्या पार लगा सकते हैं। जवानों के हत्यारे नक्सलियों को अपनी गोद में बिठाने तथा उनका गुणगान करने वाले कुछ अखबार तथा एनडीटीवी जैसे न्यूज चैनल वाले आतंकवादियों को तो शहीद करार देते हैं और देश पर कुर्बान होने वाले शहीदों के लिए तू-तडाक की भाषा का इस्तेमाल करते हैं। आतंकवादियों के द्वारा जवान फूंक दिये गये, मार गिराये गये, मर गये, मारे गये यह देश के उन चैनलों की भाषा है, जिनके कर्ताधर्ता और संपादक विदेशी पुरस्कार झटकने के फेर में भारत माता तथा उसके सपूतों का घोर अपमान कर अपनी असली औकात दिखा रहे हैं।
Thursday, November 26, 2020
राष्ट्र, राष्ट्रभक्त और नमकहराम
Thursday, November 19, 2020
ऐसा भी, खोना-पाना!
अपने अखबार के कार्यालय से घर लौटते समय छापरू चौक पर स्थित एक दवाई की दुकान पर लगी ग्राहकों की भीड अक्सर मेरा ध्यान खींच लेती है। इस दवाई की दुकान की तरह नागपुर शहर में चार दवाई दुकानें और भी हैं, जिनका मालिक एक ही शख्स था, जिसने बीते वर्ष आत्महत्या कर ली। जरीपटका के निवासी इस व्यापारी की खुदकुशी की खबर मैंने अखबारों में ही पढी थी। लगभग तीस लाख की आबादी वाले शहर नागपुर में अक्सर आत्महत्याएं होती ही रहती हैं, लेकिन इस आत्महत्या ने मुझे काफी विचलित कर सोचने को मजबूर कर दिया था। अखबार में छपी फिल्मी हीरो-सी तस्वीर मेरे मन-मस्तिष्क में बैठ-सी गई थी। उसकी उम्र पचास के आसपास थी। बहुत महत्वाकांक्षी था। चालीस की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते करोडों में खेलने लगा था। अपने व्यापार को अपार ऊंचाइयां प्रदान करने की अभिलाषा रखने वाले इस शख्स को किसी ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में हाथ आजमाने के लिए उकसाया तो वह फिल्में बनाने लगा। उसने खुद को पर्दे पर देखने की तमन्ना भी पूरी कर ली, लेकिन कोई भी फिल्म नहीं चली।
फिल्मों और फिल्मी सितारो की चकाचौंध में उसका ध्यान कुछ ऐसा भटका कि अपने चलते कारोबार को देखने की उसके पास फुर्सत नहीं रही। फिल्म निर्माण के लिए साहूकारों से करोडों की रकम भारी ब्याज पर लेने की नौबत ने उसकी सुख-शांति छीन ली। दवाओं की बिक्री का पैसा भी फिल्मों की भेंट चढने से दुकानें खाली होती चली गर्इं। ज्यों-ज्यों कर्जा बढता गया, तनाव उसका दिन-रात का साथी बनता चला गया। इस चक्कर में नशा करना रोजमर्रा की बात हो गई। शराब तो वह पहले से पीता था। अब नींद को आमंत्रित करने के लिए किस्म-किस्म की महंगी ड्रग भी लेने लगा। घर का माहौल भी अशांत हो गया। दिन-रात नशे में धुत रहने वाले कायर नशेडी का पत्नी पर हाथ उठने लगा। पत्नी की जब बर्दाश्त करने की सीमा खत्म हो गई तो वह बच्चों के साथ अलग रहने चली गई।
किसी जमाने में छाती तानकर चलने वाला लालची रईस लेनदारों से मुंह छिपाते-छिपाते इस कदर शर्मसार, भयभीत और परेशान हो गया कि एक रात वह फांसी के फंदे पर झूल गया और अखबारों और न्यूज चैनलों की सनसनीखेज खबर बन गया। उसे जानने वालों को जब उसकी खुदकुशी की खबर मिली तो उनका कहना था कि यह तो होना ही था। सभी का अनुमान था कि अब उसकी सभी दुकानों पर ताले लग जायेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वो डरपोक, सुविधाभोगी तो हमेशा-हमेशा के लिए इस दुनिया से चला गया, लेकिन उसकी दुकानों के शटर एक दिन भी नहीं गिरे।
लगभग सात-आठ महीने के बाद छापरू चौक की चिरपरिचित दुकान में मैंने जबरदस्त तब्दीली देखी तो देखता ही रह गया। बाजू की दुकान को भी उससे मिला दिया गया था। अब वह एक नहीं दो शटर वाली दुकान है, जहां पर हर समय खरीददारों की भीड लगी रहती है। इसके साथ ही उसकी अन्य दुकानों का भी जो विस्तार तथा कायाकल्प हुआ है वह किसी चमत्कार से कम नहीं। ऐसा भी नहीं, कि जब वह जीवित था तब इन दवाई की दुकानों पर ग्राहकों का अभाव रहता था। उसकी अच्छी-खासी कमायी हो रही थी, लेकिन उसके ध्यान के भटकने के कारण धीरे-धीरे कंगाली छाने लगी थी। ग्राहक आते थे, लेकिन दवाएं नहीं मिलने के कारण दूसरी दुकान का रूख करने लगे थे।
सच तो यह है कि समय किसी की परवाह नहीं करता। नागपुर शहर में एक इंसान सडक पर स्थित एक होटल में कप-प्लेट धोने को मजबूर है। लगभग पांच वर्ष पूर्व वह खुद का आइसक्रीम पार्लर चलाता था और पांच-सात नौकर उसके निर्देशों और आदेशों का पालन करते थे। कल तक वह आज़ाद था और आज वह गुलामों जैसी ज़िन्दगी जी रहा है। अपनी बर्बादी की वजह वह खुद है। उसका आइसक्रीम पार्लर जोर-शोर से चलता देख वर्ष २०१४ में किसी ने उसके कान में मंत्र फूंका कि यह किस छोटे से धंधे में अपनी उम्र गला रहे हो। चलो मैं तुम्हें नंबर दो का ऐसा सस्ता सोना दिलाता हूं, जिससे तुम रातों-रात करोडपति बन जाओगे। चमकते सोने के झांसे में उसने रातों-रात अपने पार्लर को मिट्टी के मोल बेचने के साथ-साथ अपने करीबी रिश्तेदारों, यार-दोस्तों से चालीस-पचास लाख जुटाये और सोने के सौदागरों के साथ मुंबई जा पहुंचा। सोना बेचने वाले गिरोह के लोगों ने सोने का वजन कराकर उसे सौंप दिया। मुंबई से लौटते समय खाकी वर्दीधारियों ने उसे तस्करी के आरोप में दबोच लिया। उसके तो हाथ-पांव फूल गये। उनको भी रिश्वत देनी पडी। बाद में पता चला कि यह तो उनकी 'गेम प्लान' का हिस्सा था। पूरी तरह से बरबाद होने के गम में उसकी पागलों जैसी हालत हो गयी। किसी नये-धंधे के लिए उसके पास एक कौडी भी नहीं बची। उसने अपनी पहचान वालों के समक्ष फिर से हाथ फैलाये, लेकिन कोई भी उसे कर्ज या उधार देने को तैयार नहीं हुआ। ऐसे में बस एक ही रास्ता जो उसे नज़र आया, वह आज सबके सामने है...।
भावनगर के महुआ तहसील के रहने वाले भानू भाई को किसी मामले को लेकर दस साल की जेल हो गई। तब उनकी उम्र पचास वर्ष थी। सज़ा होने पर मातम मनाने और रोने-गाने की बजाय एमबीबीएस कर चुके भानू भाई ने जेल में ही पढाई-लिखायी की और ३१ डिग्रियां हासिल कर देश और दुनिया में अपना सिक्का जमाया। जब वे जेल से बाहर आए तो उन्हें बडे आदर-सम्मान के साथ न सिर्फ सरकारी नौकरी मिली बल्कि उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्डस, एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड, यूनिक वल्र्ड रिकॉर्ड, इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड, वल्र्ड रिकॉर्ड इंडिया और यूनिवर्सल रिकॉर्ड फोरम तक में दर्ज हो गया। सरकारी नौकरी करते हुए कर्मवीर भानू भाई ने पिछले पांच वर्षों में अब २३ और डिग्रियां हासिल कर ली हैं। यानी अब तक वे ५४ डिग्रियां ले चुके हैं...!
Thursday, November 12, 2020
एक और कसम
"तुम्हारा तो हर हाल में इस दलदल से दूर रहने का वादा था?"
"क्या करती अपने बू‹ढे मां-बापूजी और छोटी बहन को चुपचाप मौत का निवाला बनते देखती रह जाती...!"
"इन बदनाम पगडंडियों पर फिसल-फिसल कर चलने के अलावा और भी तो रास्ते हैं, जिन पर चलने से तुम्हारा मान-सम्मान बना रहता। तुमने तो मेरे भरोसे के कत्ल के साथ-साथ अपना भविष्य भी चौपट करने की भूल कर दी!"
"आदरणीय पत्रकार महोदय, यह जीवन भी बडा अजीब है। कब किसके साथ क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता। जिस तरह से कोरोना ने करो‹डों लोगों को तबाह कर दिया। लाखों की मौत हो गयी। उसकी किसी ने कभी कल्पना की थी? मैं तो लॉकडाउन के दौरान घर में रहकर पढाई-लिखायी में लीन थी। बाबूजी कभी-कभार जिद करके कमाने-धमाने के लिए घर से बाहर चले जाते थे। इधर-उधर से थोडी-बहुत सहायता भी मिल रही थी, लेकिन अचानक एक दिन मां और बाबूजी को खांसी, जुकाम और बुखार ने जकड लिया। कोविड-१९ का टेस्ट करवाया तो पॉजिटिव निकलने पर डर के मारे हम सबके हाथ-पांव फूल गये। हर सुख-दु:ख में साथ देने का आश्वासन देने वाले रिश्तेदारों तथा पडोसियों को जैसे ही दोनों के कोरोना संक्रमित होने की खबर लगी तो सहायता का हाथ बढाना तो दूर सबने हमारे घर के आसपास फटकने से भी तौबा कर ली। दोनों को अस्पताल में भर्ती कराने के सिवाय और कोई चारा नहीं था। पहले तो डॉक्टर आनाकानी करते रहे, लेकिन जब मैंने उन्हें पूरी तरह से यकीन दिलाया कि जो भी फीस होगी पांच-सात दिन में जमा करा दूंगी। तब कहीं जाकर उन्होंने अपने हाथ-पैर चलाने प्रारंभ किये। पांच हजार रुपये मैंने एडवांस भी जमा करवा दिये।
दूसरे कोरोना मरीजों के परिजनों से यह पता चल गया था कि कम-अज़-कम पचास-साठ हजार रुपये तो लगेंगे ही। डॉक्टरों के लिए कमायी का यह सुनहरा मौका है। उन्हें अपनी मजबूरी बताते हुए लाख रोते-गाते रहो, लेकिन वे किसी पर भी रहम नहीं करते। मेरे पास तो सोने-चांदी के कोई जेवर भी नहीं थे, जिन्हें साहूकार को बेचकर अस्पताल की फीस दे पाती। मेरे पढने-लिखने के इंतजाम के लिए घर पहले ही गिरवी रखा जा चुका था। मेरे पास एक अपना जिस्म ही था, लेकिन लॉकडाउन में ग्राहक ढूंढना आसान नहीं था। हां, मुझे यह जरूर पता था कि हमारे समुदाय की लडकियां, औरतें हमेशा की तरह इन दिनों भी हाइवे से गुजरने वाले ट्रकों के ड्राइवरों की वासना पूर्ति कर घर परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का प्रबंध कर रही हैं, लेकिन मेरे सामने तो इलाज के लिए मोटी रकम के जुगा‹ड की घोर समस्या थी। काफी सोच-विचार करने के पश्चात अंतत: रात को मैं हाइवे पर स्थित उस कुख्यात ढाबे पर जा पहुंची, जहां से कभी मां ने वेश्यावृति की शुरुआत की थी। अपनी पूरी जवानी इस बदनाम धंधे में कुर्बान कर देने वाली मां ने कसम खायी थी कि अपनी बेटियों को इस नर्क में कभी नहीं जाने देगी, लेकिन...। ढाबे के मालिक को जब मैंने अपनी समस्या से अवगत कराया तो उसे मुझ पर बडा रहम आया। उसने फौरन कुछ अनजान चेहरों से मिलवा दिया।
जिस देह व्यापार से मुझे नफरत थी उसी ने चार दिन में मेरी पहाड-सी समस्या का समाधान कर दिया। दो दिन तक दर्द से तडपती रही। मां-बाबूजी स्वस्थ होकर घर आ गये। मां को जब मेरे बिकने की हकीकत पता चली तो वह घण्टों रोती रही। तसल्ली देने के लिए मैंने ही उन्हें समझाया और याद दिलाया कि हमारा बांछडा, बेड़िया तथा सांसी समुदाय पेट पालने के लिए सदियों से ही देह व्यवसाय करता चला आ रहा है। दूसरों के यहां जहां बेटों के जन्मने पर खुशियां मनायी जाती हैं, हमारे यहां तो बेटी का होना शुभ माना जाता है। खूब ढोल-नगाडे बजाये और गीत-गाने गाये जाते हैं। कई दिनों तक जश्न का जोश इस उमंग की तरंग में डूबा रहता है कि रोजगार में इजाफा करने के लिए घर में एक और नारी देह का आगमन हुआ है।
फिर अब तो हमारे समुदाय के लोगों की धन की भूख इस कदर बढ गयी है कि दूसरे समाज की लडकियों को भी खरीदकर अपने परंपरागत पेशे में खपाया जाने लगा है। बडे गर्व के साथ मासूम बच्चियों को जिस्मफरोशी में धकेलने वाले हमारे समुदाय के लोगों को मेहनत-मजदूरी करने में लज्जा आती है। बहू-बेटियों को बेचकर पेट भरने वाले लोगों की भीड में अपवाद स्वरूप मेरे मां-बाबूजी जैसे लोग भी हैं, जो बेटियों को बाजार की हवा नहीं लगने देना चाहते, लेकिन कोई न कोई मजबूरी, उनके सपनों का खून कर देती है। सरकार ने भी घोषणाएं और दावे तो बहुत किए, करोडों का फंड देने की घोषणा भी की, लेकिन हमारा समुदाय वहीं का वही है। यह सरकारी धन पता नहीं किनके पास जाता है। हम तक आया होता तो किंचित तो सुधार के लक्षण नजर आते! सरकार के साथ-साथ मेरी नाराज़गी और शिकायत तो आपकी पत्रकार बिरादरी से भी है, जो हमारे समुदाय की औरतों, लडकियों और बच्चियों के प्रति दिखावटी सहानुभूति दर्शाते हैं। हमारे बारे में जो खबरें तथा लेख लिखे, छापे जाते हैं वे निमंत्रित करते आकर्षक विज्ञापन ज्यादा लगते हैं, उन्हीं को पढकर पता नहीं कहां-कहां से लोग हमारे ठिकानों तक दौडे चले आते हैं। उन्हें हमारी गरीबी, अशिक्षा, बीमारी और बदहाली तो नहीं दिखती, नारी देह जरूर दिखती है। हर किसी ने यह मान लिया है कि उसे विधाता ने धरती पर पुरुषों की वासना की आंधी को शांत करने के लिए ही भेजा है।"
"लेकिन अब तो तुम्हारे माता-पिता बीमारी से मुक्त हो चुके हैं। जो हुआ उसे भूल जाओ। अपनी पढाई-लिखाई की तरफ ध्यान दो। अब बस यही सोचकर खुद को तसल्ली दो कि कोई बुरा सपना देखा था, जिसने कई कटु अनुभवों से साक्षात्कार कराकर तुम्हारी आंखें खोल दीं। भविष्य में तुम्हें अपने समुदाय में बदलाव लाने के लक्ष्य की पूर्ति के लिए बहुत संभल-संभल कर चलना है।"
"कौन सी दुनिया में रह रहे हैं पत्रकार महोदय! अब आपको वो सच भी बताये देती हूं, जिसे मैंने आपसे छिपाये रखने की सोची थी। मां-बाबूजी को कोरोना से मुक्त होने के बाद भी अस्पताल से छुट्टी नहीं दी जा रही थी। लालची डॉक्टरों की जिद थी जब तक बाकी के और चालीस हजार रुपये नहीं भरे जाएंगे तब तक उन्हें उनकी कैद में रहना होगा। जोरदार तमाशा-सा खडा कर दिया गया था। पचास हजार तो मैं दे चुकी थी। बाकी की फीस को चुकाने के लिए अब मुझे कई हफ्तों से देहभोगी डॉक्टरों के बिस्तर पर बिछना पड रहा है। दोनों डॉक्टर तो अपनी मनमानी करते ही हैं, अपने दोस्तों को भी बुला लेते हैं। इसे मैं उनकी भलमानस कहूं या कुछ और... रात भर मेरी देह के साथ खिलवाड करने के पश्चात कभी-कभार पांच-सात हजार की मेरी वेश्यावृत्ति की फीस देना नहीं भूलते। उसी से मां-बाबू जी की दवाई, छोटी बहन की पढाई और घर का चूल्हा जल रहा है।"
"देखो, अब कोरोना की बीमारी का प्रकोप काफी कम हो चुका है। तुम अपनी इस भयावह दुनिया से बाहर निकलने की ठान लोगी तो सब ठीक हो जाएगा। किसी बडे सुरक्षित शहर में रहने और पढने का पूरा प्रबंध मेरे जिम्मे रहा।"
"क्या पत्रकार जी! आपको अभी भी मैं वो बच्ची लग रही हूं, जिससे आप सात साल पहले मिले थे। अब पूरे सत्रह साल की हो गई हूं। यहां की और वहां की दुनिया की सच्चाई मेरे से छिपी नहीं है। हर जगह वहशी दरिंदे भरे पडे हैं। अखबार में आज सुबह ही मैंने यह खबर पढी है, "पुणे के निकट स्थित एक गांव में बीती रात शौच करने के लिए निकली एक महिला को किसी वहशी इंसान ने दबोच लिया। जब महिला के प्रतिरोध के कारण वह बलात्कार नहीं कर पाया तो उसने उसकी आंख ही निकाल ली...।"
"ऐसी वारदातें तो अब अपने देश में रोजमर्रा का खेल हैं, लेकिन तुमने जो किया, उससे मेरा दिल टूट गया है।"
"आप चिन्ता न करें। एक कसम टूट गई तो उसे जाने दें। मेरा एक बार फिर से वादा है कि अपनी छोटी बहन को कभी भी नहीं बहकने दूंगी। उसे इतना पढाऊंगी-लिखाऊंगी और जगाऊंगी कि वह अपनी सारी उम्र आपके सपने को साकार करने में लगा देगी। वो कसम तो टूट गई, लेकिन इस कसम को अपने जीते-जी तो कभी भी टूटने और बिखरने नहीं दूंगी।"
१५ अगस्त १९४७ के दिन जन्मे पत्रकार, स्वतंत्र कुमार ने जब से पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा तभी से मध्यप्रदेश के मंदसोर जिले में महिलाओं के जागरण और उत्थान में लगे हैं। उन्हें कुछ लडकियों को देह धंधे के कीचड से बाहर निकालने में सफलता भी मिली है। उनका एकमात्र लक्ष्य और हार्दिक तमन्ना है कि कोई भी लडकी बिकने को मजबूर न हो।
Saturday, November 7, 2020
वो भी और यह भी
चित्र १ - हर समझदार इंसान अपनी पसंद के लोगों से जुडना पसंद करता है। उसे उनसे जुडकर और मिलकर हार्दिक प्रसन्नता होती है, सुकून भी मिलता है, जिनकी अभिरूचि उसके जैसी होती है। धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को अगर अपने जैसे सत्संगी मिल जाएं तो उनके लिए इससे बडी उपलब्धि कोई और हो ही नहीं सकती। ललितपुर की २५ वर्षीय कमलेश, कृपालु महाराज की परम भक्त है। कृपालु महाराज के सतसंग और प्रवचनों में लीन रहने में उसे अपार सुख मिलता था। फेसबुक पर भी उसके जितने मित्र थे, सभी धार्मिक और सात्विक प्रवृत्ति के थे। इसी तारतम्य में विदिशा निवासी चंद्रजीत ने फेसबुक पर माधव ठाकुर के नाम से फर्जी आईडी बनाकर खुद को कृपालु महाराज का अनन्य भक्त बताते हुए कमलेश से मित्रता कर ली। कुछ दिनों के बाद उन दोनों में फोन पर भी बातचीत होने लगी। चंद्रजीत ने कमलेश पर अपनी लच्छेदार बातों का ऐसा जादू चलाया कि दोनों का मिलना-मिलाना भी शुरू हो गया। फिर दोनों ने शादी भी कर ली। शादी के कुछ दिनों के बाद ही वह कमलेश को अपना असली रंग दिखाने लगा। उसने अपनी पत्नी कमलेश के अश्लील वीडियो बनाकर वायरल कर दिए। इतना ही नहीं यह शैतान धार्मिक सोच-विचार वाली पत्नी से जबरन मोबाइल एप पर अश्लील वीडियो कॉलिंग करवाकर धन कमाने लगा। कहा नहीं मानने पर वह हैवानों की तरह उसे मारता-पीटता और लहुलूहान कर देता। इतना भयावह धोखा खाने वाली कमलेश ने हिंसक, वहशी, धोखेबाज के खिलाफ थाने पहुंचकर रिपोर्ट दर्ज करवायी तो भेद खुला कि दोस्ती, शादी और धोखा देना तो उसका धंधा है। महज दसवीं तक पढा यह धूर्त पहले से शादीशुदा है। कमलेश ने बताया कि वह इस शातिर के सम्मोहन के जाल में इस कदर फंस गई थी कि उसके दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था। तभी तो वह पचास हजार रुपये नगद तथा १५ लाख के जेवर समेट कर उसके साथ भाग खडी हुई और भोपाल के आर्य समाज मंदिर में फौरन शादी तक कर ली।
चित्र २ - बरेली का बिलाल मंदिर जाता था। माथे पर चंदन का टीका लगाता था। उसके हाथ में कलावा भी बंधा रहता था। आठवीं में फेल होने के बाद उसने पढाई-लिखायी से नाता तोड लिया था, लेकिन फिर भी वह खुद को दिल्ली विश्वविद्यालय का छात्र बताता था। वह जिस अंदाज के साथ चलता-फिरता, उठता, बैठता, बतियाता था उससे लोग उसे काफी पढा-लिखा और हाईक्लास सोसाइटी से जुडा मान लेते थे। लडकियां भी उसके आकर्षक तडक-भडक वाले दिखावे के जाल से बच नहीं पाती थीं। दो साल पहले जिस ल‹डकी ने उसके खिलाफ छेडछाड की शिकायत की थी। मामला पुलिस थाने तक भी गया था। वही लडकी जब घर छोडकर बिलाल के साथ भाग खडी हुई तो हंगामा मच गया। बीएससी कर रही लडकी का आठवीं फेल संदिग्ध चरित्रवाले लडके के साथ फुर्र हो जाना हर किसी को चौंका गया। विभिन्न हिन्दू संगठन आग-बबूला होकर सडक पर उतर आये। थाने में तोडफोड कर दी। पुलिस को भीड पर लाठियां बरसानी पडीं। राजस्थान में अजमेर दरगाह इलाके के एक होटल से पुलिस ने दोनों को जब दबोचा तो छात्रा के नाम से दो फर्जी आधार कार्ड बरामद हुए। एक पर माहिरा तो दूसरे पर राखी नाम दर्ज था। लाखों रुपये भी मिले, जिन्हें छात्रा घर से चुराकर भागी थी। खुद को खाकी वर्दीवालों से घिरा देख छात्रा भडकते हुए बोली, "हमने कोई गुनाह नहीं किया है। उसके साथ कोई जोर-जबर्दस्ती भी नहीं हुई। वह अपने प्रेमी के साथ निकाह करना चाहती है। वह १९ साल की बालिग है।" उसने घर जाने से भी इंकार कर दिया। बिलाल को चोरी-धोखाधडी के आरोप में जेल तो लडकी को नारी निकेतन भेज दिया गया।
चित्र ३ - फरीदाबाद में कॉलेज से लौटती निकिता की गोली मारकर हत्या कर दी गई। निकिता का कसूर इतना ही था कि उसे अपने धर्म से अटूट प्यार था। वह तौसीफ के साथ जीवनभर के बंधन में बंधने को तैयार नहीं थी। उनकी जब पहली मुलाकात हुई थी, तब हत्यारे ने अपना नाम राहुल बताया था। उसके इस छल-कपट भरे झूठ ने निकिता को सचेत कर दिया था, लेकिन तौसीफ धर्म बदलकर शादी के लिए उसके पीछे पडा रहा। निकिता का इंकार उसे शूल की तरह चुभा और उसने उसकी हत्या कर दी। यह कैसा प्यार था? सच्चे प्रेमी कभी ऐसे नहीं होते। वक्त आने पर जान दे देते हैं, भूलकर भी कभी मौत नहीं देते! २०२० के अक्टुबर महीने में निकिता की नृशंस हत्या करने वाले तौसीफ ने २०१८ में भी निकिता के साथ हैवानी हरकत की थी, लेकिन कुत्ती राजनीति यहां भी अपने हरामीपने से बाज नहीं आयी। हरियाणा की राजनीति में तौसीफ के परिवार का दखल और दबदबा रहा है। पुलिस भी राजनेताओं के इशारे पर नाचती आयी है। दोषी तो निकिता के परिजन भी हैं। तब यदि उन्होंने बदनामी के भय तथा नेतागिरी करने वाले दबंगों के खौफ में आकर समझौता नहीं किया होता तो तौसीफ की उद्दंडता, बदनीयती और कातिल हौसलों की उडान एक स्वाभिमानी लडकी पर धर्म बदलकर शादी करने का आतंकी दबाव बनाने का साहस ही नहीं कर पाती।
चित्र ४ - उम्रदराज़ पत्नी हिन्दू है, पति मुसलमान। ४५ साल पहले दोनों विवाह सूत्र में बंधे थे। किसी ने अपना धर्म नहीं बदला। दोनों में आज भी उतना प्यार है, जितना तब था। दोनों का एक दूसरे के धर्म के प्रति आदर सम्मान भी है और अटूट विश्वास भी। हिन्दू पत्नी रोजा रखती है, तो मुस्लिम पति गणपति की आरती करते हैं। दोनों की बडी मज़े से कट रही है। अखबारनवीसी करने वाली आनम खान २००८ में कॉलेज की पढाई के दौरान सुकांत शुक्ला के आकर्षण में बंधीं। कालांतर में दोनों लिव इन में रहने लगे। दोनों के परिवार वाले खुले दिल-दिमाग के थे। २०१४ में बिना धर्म बदले दोनों ने शादी कर ली। शादी के छह साल बाद भी दोनों खुश हैं। उनका धर्म भले ही अलग है, लेकिन दोनों के परिवार एक हैं। हर खुशी और गम के मौके पर एक साथ नज़र आते हैं। लगता ही नहीं कि वे अलग-अलग धर्म से ताल्लुक रखते हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता दीपक कबीर और वीना की शादी १९ साल पहले हुई थी। दीपक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार से हैं, वीना प्रगतिशील मुस्लिम परिवार से। दोनों की कॉलेज में पढाई के दौरान दोस्ती हुई। दोनों के विचार आपस में मिलते-जुलते थे। सामाजिक कार्यों में अभिरूचि थी। प्रगाढ दोस्ती के प्यार में तब्दील होने के बाद जब शादी करने की ठानी तो उन्होंने भी स्पेशल मैरिज एक्ट का रास्ता चुना। आज उनका एक बेटा है, जिसका नाम है सूफी सिद्धार्थ कबीर। उसकी कोई जाति या धर्म नहीं है। उसकी सोच भी अपने माता-पिता जैसी ही है। प्यार धर्म को देखकर नहीं होता। यह तो बस हो जाता है। इस पर किसी का बस नहीं। फिर यह कोई जुर्म भी तो नहीं, जो हंगामा बरपा हो। प्यार मोहबत में जात-पात, अमीरी, गरीबी का भी क्या काम। यह तो दिल के दिल से जुडने की वो पवित्र अवस्था है, जो कुर्बानी देना सिखाती है। एक-दूसरे का ताउम्र साथ देने के वचन की मधुर जंजीरों में बंधे रहने के संकल्प को कभी कमजोर नहीं होने देती। महज शादी के लिए धर्म परिवर्तन, धोखा और लव जेहाद, हैवान और शैतान दिमागों की उपज है। कट्टर हिन्दू परिवार के शैलेंद्र और मुस्लिम नीलिमा जाफरी ने ११ साल की दोस्ती के बाद २०१० में कोर्ट में जाकर शादी तो कर ली, लेकिन दिक्कत उस समय आयी जब उसके यहां बेटी आलिया का जन्म हुआ। उन्हें अस्पताल में बेटी का बर्थ सर्टिफिकेट पाने के लिए एक फार्म भरना था। जिसमें धर्म वाले कॉलम में अपने धर्म का नाम लिखना आवश्यक था। शैलेंद्र ने यह काम पत्नी नीलिमा के जिम्मे छोड दिया। नीलिमा ने फार्म लेकर उसमें लिखा- हिन्दू। दोनों की आज दो बेटियां हैं आलिया और आभार्या। दोनों स्कूल में प्रार्थना के सेशन में गायत्री मंत्र का पाठ करती है। यहीं नहीं लखनऊ में मोहर्रम पर पूरी शिद्दत से शिरकत करती हैं। दोनों बेटियां किसी भी धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र हैं।
अलग धर्म के युवक-युवती में प्यार होना कोई नयी बात नहीं। इतिहास में एक से एक उदाहरण भरे पडे हैं। हमारे संविधान ने भी तो प्रेमियों के लिए दरवाजें खोल रखे हैं। स्पेशल मैरिज एक्ट जिसे १९५४ में लाया गया, वह अलग-अलग धर्मों को मानने वालों को विवाह सूत्र में बंधने का अधिकार देता है, लेकिन अधिकांश लोगों को इस संविधान के बारे में पता ही नहीं है। इसलिए तरह-तरह के तकलीफदायक मंजर सामने आ रहे हैं और डरा रहे हैं।
Thursday, October 29, 2020
नारे... नारे... कितने नारे?
बड़ा पुराना रोग है। छूटे तो कैसे छूटे! पुरुष होने का अहंकार बचपन से उनका सच्चा साथी बना हुआ है। ऐसे में उसे कैसे त्याग दें! यह उनसे नहीं होगा। चाहे लोग कितना रोकते-टोकते समझाते रहें। औरतों की तौहीन करना, उन्हें बार-बार नीचा दिखाना इनकी फितरत है। यह देश के नेता हैं। नारी को कल भी अपने पैर की जूती समझते थे और आज भी तिरस्कार करने से बाज नहीं आते। मतदाता भी इनके लिए इंसान नहीं सामान हैं, जिसका प्रयोग कर फेंक देते हैं, भूल जाते हैं। भोले-भाले अधिकांश मतदाता जिन्हें अपना कीमती वोट देकर सांसद, विधायक बनाते हैं, उन्हें फरिश्तों जैसा सम्मान भी देते हैं। यही फरिश्ते जब अपनी असली औकात दिखाते हैं, तो हंगामा बरपा हो जाता है।
रात के दस बजे वह खानदानी युवा नेता, सांसद क्या कर रहा था, कैसी हालत में था, कौन सी खिचड़ी पका रहा था इसकी परवाह किये बिना अपनी मुसीबत से परेशान एक युवक ने उनसे बड़े हक के साथ मोबाइल पर बात की। उसने अपने क्षेत्र के सांसद को अपनी समस्या से अवगत कराया, लेकिन उधर से फटकार और दुत्कार मिली। 'मैं तुम्हारे बाप का नौकर नहीं। तुमने भले ही मुझे वोट दिया होगा, लेकिन खरीद तो नहीं लिया है। मेरी आजादी छीनने की गुस्ताखी करने का किसी को अधिकार नहीं।' दरअसल, मदद के बदले अपने सांसद से डांट खाने वाले युवक की दुकान से बीस बोतल देशी शराब पकड़ी गई थी। जब उसने उन्हें फोन लगाया तब वह पुलिस की गिरफ्त में था। उसके मन में आया होगा कि पुलिस वालों के सामने अपने सांसद से बात कर धौंस जमाने में कामयाब हो जायेगा। पुलिस वाले उसे वैसे ही छोड़ देंगे, जैसे विधायकों, सांसदों तथा मंत्रियों के पाले-पोसे अपराधियों को ये लोग बड़ी इज्जत के साथ विदा कर देते हैं।
वैसे भी कोई ऐरा-गैरा इन 'ऊंचे लोगों' को फोन लगाने की हिमाकत नहीं करता। जिन्हें इनकी मित्र-मंडली की कारस्तानियों का पता होता है वही ऐसा हौसला दिखाता है। नेताओं की मित्र मंडली में शरीफों के साथ-साथ कुख्यात भी शामिल होते हैं, जिनके बचाव के लिए अक्सर पुलिस थानों के लैंडलाइन तथा मोबाइल फोन बजते रहते हैं। अगर यह युवक भी सांसद का करीबी होता तो इस कदर बेइज्ज़त नहीं किया जाता। दरअसल, वह एक आम मतदाता है, जिसने खुद को खास समझने की महाभूल की और सहयोग के बदले शाब्दिक जूता खाया। यह हिंसा तो अपने देश के नेताओं के खून में चौबीस घण्टे छलांगे लगाती रहती है, जिसकी वजह से सदियों पहले 'महाभारत' हुई थी। ७२ साल का एक पका-पकाया नेता अपने चुनावी भाषण के दौरान मर्यादा का गला घोटते हुए महिला विधायक को 'आइटम' करार देकर तालियां बटोरता है। खुद को 'आइटम' कहे जाने पर वह महिला फूट-फूटकर रोते हुए कहती है, यह उम्रदराज राजनेता पहले भी मेरे साथ बदसलूकी करता रहा है। मैं जब भी इससे मिली इसने कभी इज्जत नहीं दी। दूसरी महिलाएं तो इसकी बगल की कुर्सी पर बैठती थीं, लेकिन मेरे लिए तो इसके सामने कुर्सी पर बैठने की ही मनाही थी। दलित नेत्री की पार्टी के नेता और कार्यकर्ता शोर मचाते हुए सड़क पर उतर आते हैं। अनशन-वनशन करते हुए दहाड़ते हैं कि यह तो भारतीय दलित महिला का घोर अपमान है। दलितों के साथ होने वाला शर्मनाक दूजाभाव है। जिसको 'आइटम' कहकर अपमानित किया गया है वह कोई अनपढ़-गंवार नारी नहीं, पढ़ी-लिखी साहित्यप्रेमी सुलझी हुई महिला हैं।
दरअसल, महिला विरोधी मानसिकता वाले अधिकांश पुरुष नेता मानते हैं कि जिस तरह से फिल्म को हिट कराने के लिए आइटम गर्ल को नचवाया जाता है वैसे ही राजनीति की दुकान पर ग्राहकों (वोटरों) को खींचने के लिए महिलाओं को आगे लाया जा रहा है। इन महिलाओं में अक्ल-वक्ल तो है नहीं, बस महिला होने का फायदा उठा रही हैं। मतदाता भी इन्हें राजनीति की आइटम मानकर वोट देते हैं और जीतवाते हैं। ऐसी घटिया सोच वाले नेताओं के व्यवहार, दर्द, तिरस्कार और उपेक्षा के दंशों की कटु स्मृतियां सदियों से दलितों, शोषितों के दिल और दिमाग के तहखाने में जमी पड़ी हैं। होना तो यह चाहिए था कि राजनेता इन विषैली यादों को भुलवाने में सहायक होते, लेकिन यह तो जख्मों को कुरेद रहे हैं। बार-बार हरा कर रहे हैं।
राजेश्वरी सरवण तामिलनाडु में एक ग्राम पंचायत की अध्यक्ष हैं। वे दलित हैं इसलिए उनके साथ जातीय आधार पर भेदभाव किया जा रहा है। गणतंत्र दिवस पर उन्हें राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराने दिया गया। ग्राम पंचायत की बैठकों के दौरान जहां अन्य सदस्य कुर्सी पर विराजते हैं, दलित अध्यक्ष को कुर्सी तक नहीं दी जाती, जमीन पर ही बैठने को विवश किया जाता है। अपमान के दंश से बचने के लिए राजेश्वरी ने स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में भाग ही नहीं लिया। राजेश्वरी के अंदर गुस्सा भरा पड़ा है। रोष तथा पीड़ा भरे स्वर में कहती हैं, 'हमें बार-बार अपमान का विष पीने के लिए इसलिए मजबूर होना पड़ता है क्योंकि हम दलित हैं, अछूत हैं!'
बिहार के दरभंगा जिले में एक १४ वर्ष की लड़की से बलात्कार के बाद उसकी नृशंस हत्या की खबर ने खूब सुर्खियां बटोरीं। इस लड़की ने एक बाग से आम चुराया था, नाबालिग को उसी चोरी की मिली यह सज़ा! इस सज़ा में डर छुपा है। देश में तेजी से बढ़ती दलित शक्ति से कई सत्ताखोर घबराये हुए हैं। इसलिए दलित बच्चियों, लड़कियों और महिलाओं पर अत्याचार कम होने की बजाय बढ़ रहे हैं। अपने आपको महान समझने के भ्रम में जी रहे शातिर राजनेताओं के अंदर की ईर्ष्या, गंदगी, बेहूदगी बाहर आ रही है और वे निरंतर बेनकाब हो रहे हैं। उन्हें सशक्त दलित महिलाओं का राजनीति में आना कतई नहीं सुहा रहा है। दलितों, वंचितों, गरीबों, किसानों की सुध लेने की बजाय देश में जहां-तहां उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। उनके बच्चों के लिए शिक्षा एक सपना है। रहने को घर नहीं, खाने को भोजन नहीं। आजादी के ७४ साल बाद भी घोर अभावों में उनकी जिन्दगी गुज़र रही है। मुफलिसी, जुल्म, अवहेलना, दुत्कार की मार बढ़ती ही चली जा रही है। फिर भी रोज़ खबरें आती हैं कि सरकारें असहायों के विकास के लिए यह कर रही हैं, वो कर रही हैं। हर वर्ग तथा समाज की नारियों को बिना किसी भेदभाव के हर तरह से सशक्त बनाया जा रहा है। बच्चियां पूरी तरह से सुरक्षित हैं।
सच को मोटे-मोटे परदों और नकाबों में छुपाने और झूठ पर झूठ बोलने की नेताओं की आदत जाती नहीं दिखती। देश के सजग साहित्यकार भेदभाव की पीड़ा भोगते तमाम वंचितों के दर्द को बयां करने से नहीं चूक रहे हैं। जो देश में दिख रहा है, हो रहा है, उसे उजागर करने का धर्म वे पूरी तरह से निभा रहे हैं। देश के जमीन से जुड़े विख्यात साहित्यकार डॉ. इंद्र बहादुर सिंह ने लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व यह पंक्तियां लिखी थीं। आईना दिखाती यह पंक्तियां आज भी कितनी-कितनी सच्ची-सार्थक हैं, इसका पता तो देश का चेहरा देखकर चल जाता है...
"सड़ी-गली ये सारी व्यवस्था अखबारों पर जिन्दा है।
मेरे देश बधाई तुझको, तू नारों पर जिन्दा है।।
बस्ती का एक-एक सूरमां बस्ती छोड़ के भाग गया।
मिल-जुलकर रहने का नारा दिवारों पर जिन्दा है।।
समय तेरी बलिहारी तूने कैसे-कैसे ढोंग रचे।
बुद्धि पर इतराने वाला दरबारों पर जिन्दा है।।"
Thursday, October 22, 2020
वंश, मोक्ष और मुक्ति
खबरें खुश करती हैं। खबरें उदास करती हैं। खबरें आशा तथा उत्साह की राह पर ले जाती हैं। खबरें ही पीड़ा, वेदना तथा घोर निराशा के कगार पर ले जाकर छोड़ देती हैं। यह जानकर बड़ा अच्छा लगा कि बेटे और बेटियों को लेकर काफी लोगों की सोच बदल रही है। अब वो जमाना नहीं रहा, जब बेटियों पर पुत्रमोह भारी पड़ता था। बेटे के नहीं होने पर मायूसी छायी रहती थी। मुझे अपने मामाजी याद आ रहे हैं, जिन्होंने पांच बेटियों के पिता बन जाने के बाद भी खुद को नहीं रोका। यह तो अच्छा हुआ कि पांच बेटियों के बाद उनके यहां बेटे ने जन्म ले लिया। उनकी तो जिद थी कि जब तक बेटा नहीं होगा, उनका प्रयास जारी रहेगा। जिस पंजाब तथा हरियाणा में बेटे की चाहत की जिद में दस-दस बेटियों के जन्मने के बाद भी विराम नहीं लगता था, अब वहां पर भी लोग बदल रहे हैं। उनकी सोच में परिवर्तन दिखायी देने लगा है। एक या दो बेटियों के होने के बाद परिवार नियोजन अपनाया जा रहा है। लड़की के जन्म लेने पर खुशियां मनायी जा रही हैं। जिस तरह से लड़के के पैदा होने पर खुद को सौभाग्यशाली माना जाता था, अब लड़की के आगमन पर भी खुद को खुशनसीब समझने वालों की खबरें अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। दत्तक लेने के मामले में भी बेटियां बाजी मार रही हैं। वो जमाना और समय लुप्त होने को है, जब अनाथ आश्रमों में लड़के को गोद लेने वाले दंपतियों की कतारें लगती थीं। कोने में दुबकी लड़की की तरफ तो देखा तक नहीं जाता था, लेकिन अब अधिकांश दंपति अपनी गोद में बिटिया की किलकारी की गूंज सुनना चाहते हैं। शहरों में ही नहीं, गांवों में भी बेटे की पैदाइश की जिद में कमी आने के पीछे की वजह है कि लड़कियों का 'कुलदीपकों' से कमतर न होना। लड़कियों के आत्मबल, साहस और जुनून को पिछले कुछ वर्षों में अच्छी तरह से देखा और परखा गया है। अवसर मिलते ही कई लड़कियोें ने उन बुलंदियों को छूकर दिखाया है, जिसके बारे में अधिकांश लोगों की यह राय रहती थी कि वहां तक तो लड़के ही पहुंच सकते हैं। लड़कियों के बस की बात कहां...!
मध्यमवर्गीय मराठी परिवार में पली-बढ़ी सायली को २५ जनवरी २०२० के दिन देश के महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रीय सम्मान देकर सम्मानित किया। ढेर सारी प्रशंसा भी की। सायली की बचपन से ही कुछ अलग हटकर करने की तमन्ना थी। हालात और परिस्थितियां कतई अनूकुल नहीं थीं फिर भी जिद की पक्की सायली ने हार नहीं मानी। लोग तो उसका मज़ाक उड़ाने से बाज नहीं आते थे कि गरीब परिवार की लड़की होकर ऐसे सपने देख रही हो, जिन्हें पूरा करना अच्छे खासे सम्पन्न लड़कों के बस की बात नहीं। सायली आत्मबल के दमखम में कम नहीं थी। तभी तो उसने पुलिस कमिश्नर बनकर दिखाया और वो वर्दी पहनी, जो कभी उसका सपना थी। कई गौरवशाली पुरस्कारों से सम्मानित युवा आईपीएस सायली अपने अटूट साहस तथा नये-नये प्रयोगों के लिए जानी जाती हैं। जब वे बिहार के पटना साहिब की पुलिस अधीक्षक थीं, तब वहां पर एक बलात्कार हुआ था। मामला काफी संवेदनशील था। गुस्से में बेकाबू हो चुकी भीड़ के उन्मादी तेवर और मारकाट के इरादे भांपने के बाद पुरुष वर्दीधारियों के पसीने छूटने लगे थे। डर कर भागने का विचार भी उनके मन में आया था, लेकिन साहसी सायली ने बड़ी हिम्मत के साथ विपरीत परिस्थितियों में इस चुनौती का सामना कर नारी होने की सार्थकता का जो प्रदर्शन किया, उससे पुरुषों ने भी दांतो तले उंगली दबा ली। इस महिला खाकी वर्दीधारी ने हमला करने पर उतारू हो चुकी हजारों की भीड़ से किंचित भी खौफ न खाते हुए ललकारा और भीड़ की तरफ दौड़ने लगीं। उनका यह आक्रामक रूप देखकर लोग दुम दबाकर इधर-उधर दौड़ने लगे। बॉडीगार्ड भी अपनी निर्भीक अधिकारी के पीछे-पीछे दौड़ रहा था। भीड़ का पीछा करते-करते वे एक छोटी-संकरी-सी गली तक जा पहुचीं। वहां पर डंडे, लाठी तथा विभिन्न हथियारों से लैस असमाजिक तत्वों ने उन्हें घेरने की कोशिश की। उनकी तो उन्हें वहीं खत्म कर देने की प्रबल मंशा थी। तभी संयोग से उस गली से एक सायकल सवार गुजर रहा था, जिससे उन्होंने सायकल मांगी और फिर उस पर बैठकर गुंडई दिखाते बदमाशों के पीछे भागीं। महिला अधिकारी को सायकल से पीछा करते देख गुंडे ठंडे पड़ गये। उनकी हिम्मत जवाब दे गई और एक-एक कर भाग खड़े हुए। उसके बाद पटना साहिब के अशांत क्षेत्र में पूरी तरह से शांति तो स्थापित हुई ही, तमाम कुख्यात असामाजिक तत्व भी उनसे खौफ खाने लगे। आज भी लोग जब उस घटना को याद करते हैं, तो उनकी आंखों के सामने अदम्य साहसी सायली का चेहरा घूमने लगता है। उस दिन यदि उन्होंने पीठ दिखा दी होती तो तय था कि कई पुलिस वाले गुस्सायी भीड़ की हिंसा का शिकार हो जाते। तब रामनाथ कोविंद बिहार के राज्यपाल थे। उन्होंने इस कर्तव्यपरायण आदर्श नारी की काफी सराहना की थी और एक समारोह में प्रशस्तिपत्र देकर सम्मानित किया था। सायली को पुलिस सेवा में मात्र दस वर्ष ही हुए हैं, लेकिन पुरस्कार तथा सम्मान पाने के मामले में उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भी पीछे छोड़ दिया है। बिहार के अररिया जिले में धाकड़ छवि माने जाने वाले पुलिस अधिकारी भी दुर्दांत अपराधियों के दिमाग को दुरुस्त नहीं कर पाते, लेकिन सायली ने यहां पर भी अपनी कार्यक्षमता की गज़ब की छाप छोड़ी। बोगस मतदान और हिंसक घटनाओं के लिए कुख्यात अररिया में शांतिपूर्ण ढंग से चुनाव सम्पन्न करवाने का श्रेय भी उन्हें जाता है। यह उनके काम करने के तौर-तरीके तथा निर्भीक तथा अनुशासित छवि का ही प्रतिफल है, कि २०१९ के लोकसभा चुनाव में एक भी बोगस मतदान का केस दर्ज नहीं हुआ और ना ही कहीं कोई हिंसक घटना हुई।
पिछले दिनों ग्वालियर में एक बारह-तेरह साल की लड़की मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान की कार के सामने बेखौफ आकर खडी हो गई। मुख्यमंत्री की सुरक्षा में लगे अफसर कुछ कह और समझ पाते उससे पहले मुख्यमंत्री ने उसे अपने पास बुलाया और वजह पूछी। लड़की ने बिना घबराये उन्हें अपनी समस्या बतायी कि मेरी मां को कैंसर हो गया है। यहां के डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिये हैं। मुझे आपकी मदद चाहिए। मेरे पास और कोई रास्ता नहीं था। जब मुझे कहीं से पता चला कि आप ग्वालियर आये हैं तो मैंने आप से मिलने का यह रास्ता चुना। आप कहने को तो प्रदेश की हर लड़की के मामा हैं, लेकिन आपके निकट पहुंचना आसान नहीं। ऐसे में आप आम लोगों की समस्याओं से अवगत ही नहीं हो पाते। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को बहादुर लड़की की पूरी मदद करने का निर्देश देने के साथ उसका मोबाइल नंबर भी ले लिया। इस सच से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि लड़कियों के मन में अपने माता-पिता और परिजनों के प्रति जो आदर, स्नेह और अपनत्व होता है, उसका आधा हिस्सा भी लड़कों में नहीं होता। बेटियां अपने अभिभावकों के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने के ऐसे-ऐसे उदाहरण पेश कर रही हैं, जिनकी पहले कल्पना तक नहीं की जाती थी। बेटिया अब श्मशान घाट जाने से नहीं घबरातीं। पिता की चिता को मुखाग्नि देने की पहल करने वाली बेटियो ने कई परंपराओं को तोड़ने का साहस दिखाया है। फिर भी जब छोटी-छोटी बच्चियों पर बलात्कार और नृशंस दुराचार की खबरें सुनने-पढने में आती हैं तो बड़ी तकलीफ होती है। यह जानकर भी मन बहुत आहत होता है कि अभी भी कुछ दुष्ट लोग हैं, जो लड़की के जन्म लेने पर मातम मनाते हैं। बेटियां उनके लिए अशुभ तो बेटे सौभाग्यशाली हैं, जो वंश को आगे बढाते हैं। यही लोग ही बेटी के जन्म लेने पर उसे कचरे के ढेर पर या अनाथ आश्रम में छोड़कर निर्ममता तथा दरिंदगी का इतिहास लिखते हैं।
मैंने अपने इस जीवन-काल में बेटियों के एक से बढ़कर एक दुश्मन देखे हैं, लेकिन बदायूं में एक शैतान हैवान ने जो क्रूर अपराध कर्म किया है, वह तो मानवता को शर्माने तथा दिल को रूलाने वाला है। मैंने जब यह खबर पड़ी तो मेरे रोंगटे ही खड़े हो गये। दिल तथा दिमाग को क्षत-विक्षत कर देने वाली इस खबर को मेरे लिए तो ताउम्र भूला पाना मुश्किल होगा- "बेटे की चाहत में कई हैवान देखे, लेकिन ऐसा पहली बार देखा..., जिसने यह पता लगाने के लिए पत्नी का पेट ही फाड़ डाला कि उसके गर्भ में बेटा है या बेटी। बदायूं शहर के नेकपुर मोहल्ले में गली नंबर तीन में रहने वाले पन्नालाल पांच बेटियों का पिता है। जब उसकी पत्नी छठवीं बार गर्भवती हुई तो उसे फिर से बेटी के होने का भय सताने लगा। पन्नालाल ठीक-ठाक कमाता था। उसकी पत्नी ने भी परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार और उठाव लाने के लिए घर पर ही छोटी-सी किराना दुकान खोल ली थी। दुकान वही संभालती थी। उसे बेटियों के पैदा होने का कोई गम नहीं था। उसकी तो यही कोशिश और दिली तमन्ना थी कि वे उन्हें पढ़ाए-लिखाए और अपने पैरों पर खड़े होने लायक बनाए। लेकिन पन्नालाल वंश के आगे न बढने की चिन्ता में पगलाया था। वह प्रतिदिन रात को शराब पीता और फिर अनीता को बेटा पैदा न करने की सज़ा देने लगता। यह मारपीट उसने तब से प्रारंभ कर दी थी, जब से उसके यहां दूसरी बेटी ने जन्म लिया था। उसे बेटियों से सख्त नफरत थी। उन्हें वह अपने मोक्ष के मार्ग की बाधा मानता था। जब पत्नी आठ महीने की गर्भवती हुई तो उसके दिमाग में भूचाल आने लगा। रातों की नींद उ‹ड गई। एक रात उसने जमकर शराब पी और हमेशा की तरह पत्नी से मारपीट करने लगा। पत्नी ने दिलासा देने के अंदाज में समझाया कि ईश्वर पर भरोसा रखो। सब ठीक होगा, लेकिन उस बेसब्र शैतान ने चीखते हुए कहा कि, मैं प्रसूति के समय का इंतजार नहीं कर सकता। मैं तो आज ही सबकुछ जानकर रहूंगा। नशे में धुत हैवान ने हंसिया से पत्नी का पेट फाड़ डाला। लहुलूहान पत्नी की पेट की आंतें बाहर निकल गईं। परिवार व पास-पड़ोस में कोहराम मच गया। अस्पताल में अनीता का ऑपरेशन कर बच्चे को बाहर निकाला गया। वह बेटी नहीं, बेटा था...। जिसकी वंश और मोक्ष प्रेमी दरिंदे पिता ने ही हत्या कर दी...।"
Thursday, October 15, 2020
और कितनी आज़ादी चाहिए?
एक हादसे में घायल बीस साल के युवक को अस्पताल वालों ने मृत घोषित कर दिया था। घर वाले दफनाने की तैयारी में थे। कब्र खोदी जा चुकी थी। इसी दौरान किसी परिजन को उसके शरीर में हरकत दिखाई दी। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने बताया कि वह जिन्दा है। परिवार ने बताया कि घायल होने के बाद युवक को जिस प्रायवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया था, वहां इलाज के दौरान उन्होंने सात लाख रुपये जमा करा दिये थे। चार-पांच दिन बाद अस्पताल प्रशासन ने और रकम की मांग की। हमारे पास देने को कुछ नहीं था। कुछ ही घण्टों के बाद उनके बेहोश बेटे को मृत घोषित कर दिया गया...।
एक सत्रह साल की इस देश की बेटी जेल में बंद अपने पिता से मिलने पहुंची थी। जेल के गेट के पास उसे दो युवक मिले, जिन्होंने उसके पिता को जेल से छुडाने का झांसा देकर उस पर बलात्कार किया और अश्लील वीडियो भी बना ली...। यह और इन जैसी पचासों खबरें महज खबरें नहीं हैं, जिन्हें पढ-सुनकर भुला दिया जाए। यह तो आस्था और भरोसे के कत्ल किये जाने की चिन्ताजनक दास्तानें हैं, जिनकी दहशत सतत बनी हुई है। भारत के पुरातन ग्रंथ कहते हैं कि, विश्वास के शीशे का धूमिल होना, दरकना, टूटना-फूटना सबसे ज्यादा चोट तथा पीडा देता है। यह शीशा एक बार जो टूटा तो जुडना मुश्किल। फिर भी अपने निजी फायदे और स्वार्थ के लिए यह अपराध बार-बार किया जा रहा है। अफसोस तो इस बात का भी है कि जिन पर अपराधियों को बेनकाब करने की जिम्मेदारी है, वे ही आज अपराधी की तरह कटघरे में खडे हैं। देश का मीडिया जिस पर कभी नाज़ था, आज तमाशा बनकर रह गया है। उसी के खिलाफ कई-कई शिकायतें हैं। हर तरफ नाराज़गी है। उसे दंडित किये जाने की मांग की जाने लगी है। इसलिए क्योंकि वह अब निष्ठुर सौदागर की तरह काम कर रहा है। अपनी जेब भरने के लिए धोखाधडी पर भी उतर आया है।
करोडों-करोडों रुपये के विज्ञापन हथियाने के लिए टीवी न्यूज चैनल वाले फर्जी लोकप्रियता दिखाकर विज्ञापनदाताओं की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। उन्हे किसी भी तरह से पैसा और दर्शक चाहिए। फर्जी दर्शकों से भी उन्हें परहेज नहीं। इसके लिए भले ही कितना छल-कपट और झूठ क्यों न बोलना पडे। उनकी एक पक्षीय आहत करने वाली खबरों की वजह से लोग अदालतों के दरवाजें खटखटाने लगे हैं। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय को उसे आईना दिखाने के लिए आगे आना पड रहा है। जब कोरोना की महामारी फैल रही थी, तब एकाएक पूरे देश में यह खबर तेज आंधी की तरह फैलायी गयी कि राजधानी दिल्ली के निजामुद्दीन में आयोजित तबलीगी जमात के आयोजन में शामिल हुए मुसलमानों ने कोविड-१९ का संक्रमण देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंचाया है। जहां-जहां जमातियों के कदम पडे वहां-वहां पर कोरोना तूफानी गति से फैला है। पूरे देश में अजीब-सी दहशत छा गई थी। एक तो कोरोना की जानलेवा बीमारी और उस पर यह अनेकों मानव बम! हां अधिकांश न्यूज चैनलों ने ऐसे ही भय का माहौल बना दिया था। घृणा, तनाव और दूरियां बढाने की साजिशी मंशा दर्शाने वाली इस खबर को रबर की तरह खींचने की प्रतिस्पर्धा खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। दिल्ली के निजामुद्दीन-मरकज में देश और विदेश के हजारों मुस्लिम बंधु शामिल हुए थे। तबलीगी जमात के इस आयोजन की समाप्ति के बाद उन्हें अपने-अपने स्थायी ठिकानों पर लौटना था, लेकिन इस बीच कोविड-१९ ने अपना शिकंजा तेजी से कसना प्रारंभ कर दिया। विदेश ही नहीं देश की भी हवाई, रेल, बस आदि की सेवाएं बंद हो गईं।
कोरोना काल में आयोजित तबलीगी गतिविधि को लेकर यदि न्यूज चैनलों ने शोर नहीं मचाया होता तो साम्प्रदायिक तनाव, घृणा और समाज को बांटने वाली प्रवृतियों को बल नहीं मिलता। कोविड-१९ के चिन्ताजनक काल में सोशल मीडिया पर भी मुसलमानों की गलत छवि पेश करने वाली ऐसी शंका तथा भेदभाव की आंधी नहीं चलती तो शहर की गली-गली में घूमकर सब्जी बेचने वाला रहमान आज भी जिन्दा होता। कल तक जो लोग उसकी ताजी सब्जी का इंतजार करते थे, अब उन्हें उसकी सब्जी में विष होने का संदेह होने लगा था। कुछ अति उत्साही, असामाजिक तत्वनुमा चेहरों ने उसकी इसलिए पिटायी भी कर दी... कि उसने उनके मोहल्ले में आने की जुर्रत ही क्यों की...! कमायी बंद हुई तो रहमान बीमार पड गया। कुछ दिनों के पश्चात इलाज के अभाव में वह चल बसा।
राजधानी में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने के लिए विदेशों से आये कुछ तबलीगी जमात के लोगों का नागपुर में आगमन हुआ था। कोविड-१९ के संकट के दिन उन्होंने यहां बडे इत्मीनान से गुजारे। प्रशासन ने कुछ दिन तक निर्धारित स्थान पर क्वारंटाइन भी किया। नारंगी नगर से विदा होते समय उनकी आंखे नम थीं। उनका कहना था कि इस शहर में उन्हें जो मान-सम्मान तथा अपनापन मिला उसे वे कभी भुला नहीं पाएंगे। सर्वधर्म समभाव के जीवन-सूत्र के प्रबल हिमायती नागपुरवासी दहशत और विकट संकट काल में सतत हौसला अफजाई कर हमें दिलासा देते रहे कि आपके साथ बेइंसाफी नहीं होगी। आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने दूध का दूध और पानी का पानी कर हमारे माथे पर थोपे कलंक के दाग को मिटा ही दिया है। उन लोगों की भी आंखें खोली हैं, जिन्हें देश और दुनिया के सभी मुसलमान कोरोना फैलाने के महा षडयंत्र में शामिल लग रहे थे। यकीनन, कुछ समय जरूर लगा, लेकिन यह स्पष्ट तो हो गया है कि हिन्दुस्तान में कोरोना तबलीगी जमातियों की वजह से नहीं, लोगों की अपनी असावधानी की वजह से तेजी से फैला। न्यूज चैनलों ने सनसनी फैलाने तथा लोकप्रियता पाने के लिए पत्रकारिता को एक नहीं, हजार बार कलंकित किया।
ड्रग्स मामले में करीब एक महीना जेल में बिताने के बाद अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती को जमानत मिल गई। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमय मौत के बाद न्यूज चैनलों ने रिया को घेरने का जो एक पक्षीय आतंकी अभियान चलाया, उससे भी तमाम मीडिया के प्रति यही राय बनी है कि इसने धन और नाम चमकाने के चक्कर में चिन्तन-मनन करना बंद कर दिया है। जिस तरह भूखा शेर मौका पाते ही शिकार पर झपटता है, उसी तरह से भारतीय मीडिया भी जिस किसी को भी लपेटता है, तो उसकी बडी निर्दयता के साथ चीर-फाड करने में लग जाता है। उसके खुद के शोर में शिकार की हर आवाज़ तथा फरियाद दबकर रह जाती है। उसकी सुनना मीडिया को अपना अपमान लगता है। उसके क्षेत्र में दखल देने की कुचेष्टा लगता है।
इस बेकाबू, लापरवाह मीडिया पर जब भी उंगली उठती है, तो उसकी तरफ से लट्ठ घुमाने के अंदाज में बस यही कहा जाता है कि कुछ दुष्ट हमारी अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने पर आमादा हैं। हम यह कदापि नहीं होने देंगे। दरअसल अधिकांश न्यूज चैनलों के कर्ताधर्ताओं ने यही मान लिया है कि यह आजादी सिर्फ उन्हीं के लिए है, दूसरों के लिए तो बिलकुल ही नहीं। इनकी तरह कई लोग और भी हैं, जिनकी शैतानी हरकतों से देश परेशान है। देश को भी समझ में नहीं आ रहा है कि उन्हें कितनी आजादी चाहिए और कितने टुकडे...! इससे किसी को इंकार नहीं कि हर किसी को विरोध करने तथा अपनी बात कहने का पूरा हक है। शाहीन बाग में कई हफ्तों तक जबरन हुए धरने प्रदर्शन से दिल्लीवासियों को अथाह तकलीफें झेलनी पडीं। एक अच्छे-खासे सार्वजनिक स्थल को बंधक बनाया गया। किसी की भी नहीं सुनी गई। उससे भले ही कुछ लोगों को संतुष्टि मिली हो, लेकिन भारत माता आहत होकर रह गई। अपने अधिकारों के लंबे तमाशे में दूसरों के अधिकारों की लूट तथा तकलीफ देने की जिद की सबकी तरफ से खुलकर भर्त्सना नहीं की गयी। कुछ थाली छेदकों से भारत माता बहुत परेशान है। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री व नेशनल कांफ्रेस के नेता फारूख अब्दुल्ला को यह कहते ज़रा भी लज्जा नहीं आयी कि चीन के समर्थन से जम्मू-कश्मीर में फिर से अनुच्छेद ३७० लागू करके ही दम लेंगे। यानी यह और इन जैसे शैतान, अहसानफरामोश, अशांति फैलाने और हिन्दुस्तान को नीचा दिखाने के लिए दुश्मन देश की शरण में जाने से भी नहीं हिचकिचाने वाले। इसलिए सावधान, भारत देश...! हमें खतरा बाहरी आतंकवादियों से कम, देश में उजागर तथा छिपे हुए गद्दारों से अधिक है...।
