"नक्सली और कोरोना
ये दोनों भाई हैं
कैसे इतने
ये आततायी हैं
इनके जुल्मों सितम से
लोग तबाह हो गए
लाखों निरपराध
मौत के आगोश में सो गए
हम...
हमारा समाज...
हमारी सरकार...
देश के तमाम ज्ञानियों के पास
कोई तो
कारगर हल होगा
जिससे भारत
भयमुक्त और
हमारा...
सुनहरा कल होगा...!"
नागपुर के सजग कवि श्री अनिल मालोकर की उपरोक्त कविता श्रद्धांजलि है उन २३ शहीदों के प्रति, जिनकी कायर, धोखेबाज, षडयंत्रकारी नक्सलियों ने जान ले ली। कवि की तरह और भी अनेकों सतर्क भारतीय हैं, जिनको यह सवाल लगातार चिन्तित और परेशान किये है कि देश में जब कोरोना के कारण लोगों की मौतें हो रही हैं, हर कोई भयभीत है तब छत्तीसगढ के बीजापुर और सुकमा जिले की सीमा पर नक्सलियों ने क्या सोचकर इस दरिंदगी को अंजाम दिया। जब कोरोना की बीमारी लोगों की जानें लेने पर तुली है, तब नक्सलियों ने यह शैतानी और हैवानी कृत्य कर दिखा दिया है कि उनका मानवता से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। यह जो इन्सानी हत्याएं की गई हैं वे काफी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं। नक्सलियों के इस खूनी खेल में कुछ भी नया नहीं, लेकिन कोरोना के जानलेवा काल में रॉकेट लाँचर और मोर्टार जैसे आधुनिक हथियारों से सुरक्षा बलों पर हमला करना उनकी उस क्षमता और ताकत को भी दर्शाता है, जो लगातार बढ रही है। कहां से आता है नक्सलियों के पास हथियार खरीदने के लिए पैसा। कैसे जुटा लेते हैं वे ऐसे-ऐसे साधन, जिन्हें जुटाना आसान तो कतई नहीं। तय है कि देश के भीतर कुछ ऐसे गद्दार तो हैं, जो नक्सलियों की सहायता करते हैं। कुछ पत्रकारों, वकीलों, स्वयंभू समाजसेवकों का नक्सली प्रेम बार-बार उजागर होता रहता है। उन्हें सुरक्षा बलों के प्राण गंवाने पर कोई गम नहीं होता। नक्सलियों के मारे जाने पर उनकी आंखों से धडाधड आंसू बहने लगते हैं और वे सीना तानकर मानव अधिकार के राग अलापने लगते हैं। इन नक्सली भक्तों के कारण ही नक्सलवाद और आतंकवाद के हौसले बुलंद होते रहे हैं। यह भी शर्मनाक सच है कि जब-जब भी नक्सली हमले होते हैं तब-तब कुछ दिनों तक अपने यहां अच्छी-खासी राजनीति होती है। नेता भाषण पर भाषण दागते हैं कि इस बार जवानों की शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी। नक्सलियों को उनकी औकात दिखाकर ही दम लिया जाएगा, लेकिन असल में होता क्या है किसी से छुपा नहीं है। पूरी तस्वीर हमारे सामने है।
नक्सलियों के प्रति सहानुभूति दर्शाने वाले नेता अक्सर कहते रहते हैं कि नक्सली तो भटके हुए क्रांतिकारी हैं। अपने ही देश में ऐसे नेता भी हैं, जो भाजपा को चुनाव में हराने के लिए खूंखार नक्सलियों की सहायता लेने में संकोच नहीं करते। यह घटिया नेता अपने खिलाफ खडे होने वाले प्रत्याशियों को हरवाने तथा ठिकाने लगाने के लिए नक्सलियों को धन मुहैया करवाते हैं। इन्हें हत्यारे नक्सलियों का संरक्षक और पालनहार कहने के साथ-साथ सुरक्षा बलों का हत्यारा कहने में कोई हर्ज नहीं। यह भी अत्यंत शर्म की बात है कि जो नृशंस हत्यारे हैं, सुरक्षाबलों, सैनिकों पर हमले करते रहते हैं और खून की नदियां बहाते रहते हैं, उनके खिलाफ कई बुद्धिजीवी अपनी जुबान तक नहीं खोलते। उलटे सरकार को कोसते रहते हैं कि वह नक्सलियों के साथ सौतेला व्यवहार करती है। नक्सली भी इसी देश की संतान हैं। ऐसे में उनके साथ मिल बैठकर बात क्यों नहीं की जाती? उनकी क्यों नहीं सुनी जाती? जो नक्सली पिछले तीस-चालीस वर्ष से आतंकी और हत्यारे बने हैं, उनके प्रति महानुभावों का सद्भाव कई प्रश्न ख‹डे करता है। उनकी निगाह में जो भटके हुए क्रांतिकारी हैं, उनकी असली हकीकत के पन्ने यही बताते हैं कि कभी नक्सलियों का कोई जनहितकारी मकसद रहा होगा, लेकिन अब तो अधिकांश नक्सली सरगना सौदागर बन चुके हैं। उनके बच्चे विदेशों में पढ रहे हैं। रहने और चलने के लिए उनके पास कोठियां और कारों के काफिले हैं। उनकी लूटमारी और वसूली के तरीके पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। तय है कि न तो वे रहम के काबिल हैं और न ही उनके समक्ष झुकने की जरूरत या कोई मजबूरी है। इनका साथ देने वालों को भी पूरी तरह से नंगा करने का वक्त आ गया है। यह दुष्ट खुद को नायक मानते हैं। खुद को दूसरों से अलग मानकर अपनी ही पीठ थपथपाते रहते हैं। इनसे यह कलम जानना चाहती है कि यह नक्सली भक्त आखिर चाहते क्या हैं? अपने ही देश के जवानों को लहुलूहान और शहीद होने पर तालियां बजाने और खुशी मनाने से इन्हें शर्मिन्दगी का अहसास क्यों नहीं होता? भारत माता को निरंतर जख्मी होते देखने के बाद भी उन्हें नींद कैसे आ जाती है। वे भी तो आखिर इसी देश की मिट्टी से उपजे अन्न, पानी और हवा पर जिन्दा हैं!
Thursday, April 8, 2021
नक्सलियों के पालनहार
Thursday, April 1, 2021
समयांतर
बात इंसान की। हर किसी की जान की। बाकी सब कुछ चलता-चलाता रहता है। हम और आप स्वस्थ हैं, चलायमान हैं, खुश और प्रसन्न हैं, तो ही इस दुनिया के होने की सार्थकता है, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनकी सोच और प्राथमिकता निजी स्वार्थ पर टिकी है। उनमें अथाह निर्ममता और लालच भरा पडा है। वे धन के लिए हत्यारे बनने से नहीं घबराते। कोरोना की दूसरी अंधी लहर में कुछ अस्पतालों तथा डॉक्टरों की शर्मनाक कारस्तानी सामने आ रही है। वह यही दर्शा रही है कि मौका पाते ही लूटपाट में लग जाना धनपशुओं के जीवन का असली मकसद है। नागपुर के एक अस्पताल में डॉक्टरों की घोर लापरवाही के कारण दो लोगों की मौत हो गई। मृत मरीज का इलाज कर मानवता को शर्मिन्दा करने वाले इस अस्पताल के डॉक्टरों की दरिन्दगी की हकीकत ही भयभीत कर देती है। आखिर हमें किन लोगों के भरोसे कोरोना से लडना पड रहा है! इन हत्यारों को अपने पावन पेशे को कलंकित करने में लज्जा क्यों नहीं आती? यह सवाल तभी से जवाब मांग रहा है, जब से कोविड-१९ की महामारी ने चारों तरफ अपने पैर फैलाकर इंसानों को बताया कि कुदरत के समक्ष वे कितने असहाय और बौने हैं।
कोरोना का इलाज करवाना हर किसी के बस की बात नहीं। यही वजह है कि अस्पताल में फांसी के फंदे पर झूल जाने की खबरें पढने-सुनने में आ रही हैं। नागपुर के मेडिकल अस्पताल व कॉलेज में कोविड वार्ड, ट्रामा सेंटर में भर्ती ८१ वर्षीय वृद्ध की आत्महत्या की खबर वाकई चौंकाने वाली है। सामान्य सर्दी खासी की शिकायत के बाद उन्हें अस्पताल में लाया गया था। परिवार के सदस्यों को जैसे ही पता चला कि बुुजुर्ग कोरोना पाजिटिव हो गये हैं, तो वे बिना कोई बातचीत के उन्हें मेडिकल अस्पताल में छोडकर चलते बने। वृद्ध अकेलेपन और असुरक्षा की भावना से टूट गए और चुपचाप बाथरूम में खुदकुशी कर ली। अपनों के एकाएक दूरी बनाने से कई स्वस्थ इंसान भी मौत के मुंह में समा रहे हैं। दरअसल सभी इतने सक्षम नहीं कि कोरोना की बीमारी के चपेट में आये अपने करीबियों के लिए धन की व्यवस्था कर सकें। ऐसा मान लेने वाले भी बहुतेरे हैं कि कोरोना हुआ है तो मौत भी तय है, जबकि यह सच नहीं है। कोरोनाग्रस्तों को हौसले तथा सुरक्षा के अहसास से इतना बलवान तो बनाया ही जा सकता है कि वे अंतिम सांस तक लडते रहें। वैसे तो पूरे देश में कोरोना की आंधी लोगों को अपने लपेटे में ले रही है, लेकिन महाराष्ट्र में कोरोना का आतंक कुछ ज्यादा ही देखने में आ रहा है। लगभग सभी जानते हैं कि कोरोना से बचने के लिए खुद का सतर्क होना जरूरी है, लेकिन ज्यादातर लोग उन नियमों का पालन करने में कंजूसी बरतते हैं, जो अति आवश्यक हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय का ताजा सर्वे बताता है कि पचास फीसदी लोग भीड-भाड में मास्क लगाने की चुस्ती नहीं दिखाते। उन्हें दूसरों का मास्क लगाना जितना जरूरी लगता है, उतना स्वयं का नहीं। विदर्भ के ग्रामीण और शहरी इलाकों में कोरोना ने जिस तादाद में मौत बांटनी प्रारंभ कर दी है, उससे यह भी माना जा रहा है कि शासन और प्रशासन खुद को असहाय पा रहा है। अस्पतालों में आईसीयू बेड की भारी कमी स्पष्ट दिखायी दे रही है। संतरानगरी नागपुर में कोरोना पॉजिटिव मरीज खुलेआम घूम रहे हैं। कोई भी पाबंदी उनपर असरकारी नहीं हो रही है। कोरोना संक्रमण के मामले में देशभर में नागपुर तीसरे स्थान पर है। नागपुर में हो रही मौतें देशभर में चिन्ता का विषय बन कर रह गई हैं। कोरोना का संकट आज नहीं तो कल खत्म हो जायेगा, लेकिन इस शर्मनाक सच को कभी भुलाया नहीं जायेगा कि जब लोग धडाधड मर रहे थे तब भी प्रदेश के कुछ शासक और प्रशासक जनता की सुरक्षा की चिन्ता की बजाय धन के प्रबंध में तल्लीन थे। उनके लिए इंसानी जानों से कहीं ज्यादा अपना धन-दौलत से भरपूर सुरक्षित भविष्य मूल्यवान था। इसके लिए उन्होंने इंसानियत को भी बेच खाया था...।
Thursday, March 25, 2021
खाकी शैतान... खादी भगवान?
वर्षों बाद महाराष्ट्र का एक वजनदार मंत्री अपने ही जाल में फंस चुका है। उसे लपेटे में लेने का दम दिखाने वाला कोई और नहीं वो भारतीय पुलिस सेवा का १९८८ के बैच का उच्च अधिकारी है, जिस पर कल तक गृहमंत्री विश्वास, स्नेह और कर्तव्यनिष्ठ होने के पुरस्कार लुटा रहे थे। सालभर से दोनों की प्यार-मोहब्बत मजबूत जंजीरों से बंधी दिखायी दे रही थी। लग रहा था दोनों में बेहतरीन तालमेल बना हुआ है। इस मुंबई पुलिस कमिश्नर जिसका नाम परमबीर सिंह हैं, ने मंत्री जी के दमदार आशीर्वाद से कितनी माया समेटी यह तो अबूझ पहेली ही बनी रहेगी। ऐसे रहस्य कभी पूरी तरह से नहीं खुल पाते। २०२१ के फरवरी माह में परमबीर सिंह ने अपने परम आका देशमुख पर यह आरोप जडकर तहलका मचा दिया है कि साहब बहादुर उस पर प्रतिमाह १०० करोड की अवैध वसूली कर उनकी झोली में डालने का दबाव डाल रहे थे, जो उसे रास नहीं आया। ५८ साल के इस खाकी अधिकारी को इस बात का भी घोर मलाल था कि उसके नीचे काम करने वाले साथी को भी बेवजह निलंबित कर दिया गया। वो भी पुलिसिया दस्तूर की तमाम वफादारियां निभाता चला आ रहा था। उनकी तरह वह भी सरकार तथा मंत्री के इशारों पर नाचते हुए कानून का रक्षक होने की आड में भक्षक बना हुआ था। फिर भी उसकी कद्र नहीं की गई। यह तो सरासर नादिरशाही है, कर्तव्यपरायणता की बेकद्री है। मंत्री पर अफसर के आरोप लगाये जाते ही सभी 'ईमानदार नेता' उनकी तरफ खडे हो गये। अफसर अकेले पड गये। मंत्री के भक्त नारे उछालते दिखे, नेताजी आप आगे बढो, हम तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारे साथ थे। डरो नहीं। देशभक्त नेताओं पर तो भारत में भ्रष्टाचार के आरोप तो लगते ही रहते हैं। इन छोटे-मोटे आरोपों से काहे का घबराना। जब काजल की कोठरी में पांव धर ही दिए हैं, तो कालिख भी सफेद खादी को कहां बख्शने वाली है। हर सफेदपोश नेता को ऐसे बुरे दिन देखने ही पडते हैं। फिर आपके साथ तो अपने शरद पवार जी का भी पूरा आशीर्वाद है। उनके होते हुए आपकी राजनीति पर कभी आंच नहीं आ सकती। कुछ ही वर्ष पूर्व जब महाराष्ट्र में कांग्रेस, राष्ट्रवादी गठबंधन की सरकार थी तब तक एक अत्यंत ही सभ्य और ईमानदार पुलिस कमिश्नर ने तब के गृहमंत्री छगन भुजबल पर आरोप लगाया था कि साहब बहादुर मोटी रिश्वतें खाते हैं। नोटों की थैलियां लेकर उनकी वहां नियुक्ति की जाती है, जहां धन की बरसात होती है। अपराधियों को शह देने का पाठ पढाने वाले धनखोर मंत्री इसी कोशिश में रहते हैं कि भले ही चोर, हत्यारे छूट जाएं, लेकिन उनके यहां थैलियां पहुंचती रहें। कई अफसरों को हर माह उनके यहां देन पहुंचाना परिपाटी बन चुका है। उस कर्तव्यपरायण अधिकारी को छगन का चलन इतना चुभा था कि उसने रातों-रात नौकरी को लात मार दी थी। आज भी बीस साल बाद सच्चे कर्मयोद्धा की तरह वे अदालतों से गरीबों, असहायों के लिए लडाई लडते हैं। छगन भुजबल को बाद में अपने काले कारनामों के कारण जेल जाना पडा था। कई महीने जेल में रहे इस राष्ट्रभक्त की पीडा थी कि बुरे वक्त में उसका किसी ने साथ नहीं दिया। आका शरद पवार भी मुंह मोडकर बैठ गये। छगन के शब्द थे कि यहां दलित नेताओं का यही हश्र होता है। वो मालदार बन जाएं तो सही और हम धनवान बनते ही गुन्हेगार हो जाते हैं। यह तो भेदभाव ही है, जो राजनीति में चलाया जा रहा है और दलितों को रुलाया जा रहा है...। कभी सडक किनारे सब्जी का ठेला लगाकर पच्चीस-पचास के लिए तरसने वाला यह दलित नेता आज हजारों करोड का स्वामी है। कहां से आया इतना माल? इसका उत्तर न कभी छगन देंगे, न मायावती, और न ही वो सभी दलित तथा सवर्ण नेता, जिनके भाई, बंधु, अरबपति, खरबपति बन चुके हैं। उन्हीं की चमत्कारिक राजनीति की बदौलत जिसपर ज़रा-सी आंच आने की कल्पना तक उन्हें डराने लगती है। तरह-तरह के कवच ओढने लगते हैं, बहाने बनाने लगते हैं। अपने अनुयायियों के कानों में मंत्र फूंकने में जुट जाते हैं कि हम पर होने वाला अन्याय तुम पर किसी वार से कम नहीं। इसलिए एक हो जाओ। जो हमें भ्रष्टाचारी कहें उन्हें पीट-पीटकर अधमरा कर दो। बाकी हम देख लेंगे। एक सुलगता सच यह भी जनाब कि... छगन भुजबल वर्तमान महाराष्ट्र सरकार में दमदार मंत्री हैं। किस बात के ईनाम स्वरूप मंत्री बने हैं आप ही तय करें...।
Friday, March 19, 2021
बस... सावधान
"हां मारा है, तो...? उत्तर प्रदेश के एक फाइव स्टार होटल में पत्रकारों की पिटायी के बाद यही जवाब दिया प्रदेश के एक पूर्व मुख्यमंत्री ने। पुराने समाजवादी बाप के इस बेटे की तरह अकडने, झगडने वाले नेता और भी हैं, जिन्हें पत्रकारों को लताडने और अपमानित करने में बडा मजा आता है। अपने यहां के अधिकांश पत्रकार फिर भी बददिमाग लडाकू गुंडे किस्म नेताओं के आगे-पीछे डोलने से बाज नहीं आते। जिस युवा राजनेता के इशारों पर उनकी पार्टी के बेलगाम कार्यकर्ताओं ने पत्रकारों को लाठी, डंडों, घूसों और थप्पडों से अंधाधुंध मारा-पीटा आजकल उनका पारा काफी चढा रहता है। भारत के नेता सत्ता से बाहर होने के बाद बौखलाये रहते हैं। जब सत्ता पर काबिज रहते हैं, तब तो पत्रकारों को जमीनें, लिफाफे, महंगे उपहारों से नवाजते रहते हैं। हां मारा है, तो...? के धमकी भरे अंदाज और उग्र तेवर दिखाने की बजाय पत्रकारों की सुरक्षा का जिम्मा अपने सिर पर ओढे रहते हैं। इस बहादुर धमकीबाज ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में अपने पिता का अनुसरण कर अपनी आरती गाने वाले पत्रकारों, संपादकों की कोई भी इच्छा अधूरी नहीं रहने दी। इस दरियादिली का यही मकसद था कि मीडिया के ये चेहरे हमेशा उनके प्रति वफादार बने रहेंगे। सत्ता आज है कल नहीं। इस अटल सच से हर नेता वाकिफ है, लेकिन सत्ता के छिनने के बाद समाजवादी बाप के समान बेटे ने कभी कल्पना नहीं की थी उनकी जी-हजूरी करने वाली फौज बागी हो जाएगी। उन्हीं से ऐसे-ऐसे सवाल करने लगेगी, जिनका जवाब देना मुश्किल होगा। पिछले कई महीनों से पत्रकारों को कोसने का चलन तेजी से बढा है। उन्हीं की बिरादरी में विभाजन की रेखाएं खिंच चुकी है। अखबारनवीसों को तो सम्मान मिल जाता है, लेकिन न्यूज चैनलों के कर्ताधर्ताओं ने खुद को लोगों की निगाह से गिराते हुए तमाशा बना कर रख दिया है। अधिकांश न्यूज चैनलों के एंकर तथा संवाददाता और संपादक इस भ्रम में जीने लगे थे कि वे अपने आप में बहुत बडी हस्ती हैं। उनके भीतर इस भ्रम को पनपाने में राजनीति, राजनेताओं का अहम योगदान है। अपने देश में कई चैनली बाबू करोड में खेल रहे हैं। भ्रष्ट नेताओं की इनकी काली कमायी के असली स्त्रोतों का पता लगाना आसान नहीं है। यही वजह है कि अधिकांश चैनल वाले यारी दोस्ती के चलन दस्तूर पर चल रहे हैं। वे किसी से पंगा नहीं लेते। अपने दोनों हाथों में लड्डू रखकर पत्रकारिता का आनंद लूट रहे हैं। उनपर कभी भी किसी नकली समाजवादी को अकड दिखाते नहीं देखा जाता। वे तो आज भी शाम को उनकी महफिलों का हिस्सा हैं। उत्तर प्रदेश के शहर गाजियाबाद में एक बारह साल के बच्चे ने मंदिर का पानी क्या पिया कि उसे अपराधी मान लिया गया। मासूम को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया गया। भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, लाला लाजपतराय, महात्मा गांधी ने इसी दिन के लिए तो अपनी शहादत नहीं दी थी। वे तो किसी बर्बरता की कल्पना ही नहीं कर सकते थे। वोटों के लिए इंसानों को जाति-धर्म, समाज, अपने परायों में बांटने वाले लालुओं, भालुओं, मुलायमों, अखिलेशों ने राजनीति को युद्ध के मैदानों में तब्दील करके रख दिया है। चुनावों के मौसम से पहले ही हिंसा और मारकाट शुरू हो जाती है। अब तक चुनाव जगाते कम डराते ज्यादा हैं। पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले हिंसा का जो दौर चला है, उससे हर सजग भारतीय हैरान है। ताज्जुब की बात तो यह भी है कि हिंसा में भी फायदे तलाशे जा रहे हैं। पच्चीस-पचास की कुर्बानी से यदि बाजी पलटी जा सकती है या दोबारा सत्ता पर काबिज हुआ जा सकता है तो खून की नदियां बहाने में कोई हर्ज नहीं... ऐसा वो राजनेता भी मान चुके हैं। भले ही खुलकर दिखाते नहीं, लेकिन उनके इशारे सब कह रहे हैं। नेता और व्यक्ति विशेष के विरोध की राजनीति हर किसी के लिए डराने वाली है। नेता की मौजूदगी में उसी के गुंडों के द्वारा पत्रकारों को पीटने के पीछे एक बडा कारण यह भी है कि इस नेता और उसकी तरह के अधिकांश नेताओं को अपना भविष्य अंधकारमय दिखायी दे रहा है। वे जितना विरोध करते हैं, बकवासबाजी करते हैं उससे वो 'कर्मवादी' और बलशाली होता चला जा रहा है। जनता को इतनी समझ तो है ही कि कौन सच्चा देश सेवक है और किस-किस ने भारत को निरंतर लूटा-खसोटा है।
Thursday, March 11, 2021
उदास शहर का दर्द
शहर हैरान है। वह बोलता नहीं। देखता तो है। अपने चेहरे-मोहरे में लाये जा रहे अच्छे बदलाव से उसे प्रसन्नता होती है। मन खिल उठता है, लेकिन यह जो शर्मनाक तमाशे हो रहे हैं, उसे कतई नहीं सुहाते। उसकी भी अपनी संस्कृति है। संस्कार हैं। जिनकी बदौलत पूरे देश में उसके नाम का डंका बजता है। दूर-दूर से लोग बार-बार उससे मिलने आते हैं। कई लोगों को तो यह शहर इतना भाता है कि वे यहीं बस जाते हैं। शहर भी उन्हें भरपूर मान-सम्मान के साथ अपनाता है। उसकी नजर में सभी एक समान हैं। जात-पात-धर्म, गरीबी, अमीरी उसके लिए कोई मायने नहीं रखते। मायने रखती है तो बस इंसानियत, भाईचारा, मेल-मिलाप और अपराधमुक्त स्वच्छ और पवित्र वातावरण। शहर को ऐसी बेवकूफियों, घटिया हरकतों और ऐसी खबरों से सख्त नफरत है, जो बार-बार उसकी साख पर बट्टा लगाती हैं...।
"पैसों की बारिश का झांसा, लडकियों से निर्वस्त्र पूजा" ...हां यही शीर्षक है उस पहली खबर का, जिसने शहर को गमगीन कर दिया। फिर से निराशा के गर्त में धकेल दिया। इस आधुनिक युग में कुछ जादू-टोना का जाल फैलाने वाले शैतानों ने १६ से १८ वर्ष की ल‹डकियों को ५ करो‹ड रुपये दिलाने का लालच देकर अपने जाल में फांस लिया। कम उम्र की लडकियों से मेलजोल ब‹ढाकर उन्हें शहर से दूर ले जाया जाता था। पैसों के लालच में वे भी सहर्ष तैयार हो जाती थीं। ल‹डकियों को धूर्त यह कहकर अपने मजबूत घेरे में ले लेते थे कि वे चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं, क्योंकि उनके पास महाकाली की अपार शक्ति है। यह तो अच्छा हुआ कि एक किशोरी की सजगता के कारण ५० करोड के कडकते नोटों की बारिश करने का लालच देनेवाले ल‹डकियों की अस्मत के लुटेरे जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिये गये हैं। उनके मोबाइल में कई कम उम्र की ल‹डकियों की निर्वस्त्र तस्वीरें मिली हैं।
कोविड की दूसरी लहर आने की वजह से शहर में लॉकडाउन लगा था। पुलिस वाले ब‹डी सतर्कता के साथ अपनी ड्यूटी निभा रहे थे। स‹डक पर सन्नाटा था। सभी अपने-अपने घरों में बंद थे। होटल और पान ठेले भी बंद हो चुके थे। ऐसे में जब गश्ती दल को एक घर के सामने से गुजरते समय कोई हलचल होते दिखी तो वह चौकन्ना हो गया। घर के बाहर महंगी-महंगी मोटर साइकलों तथा आलीशान कारों की कतारें लगी थीं। तब पुलिस ने वही किया जो उसे करना चाहिए था। घर के अंदर का नज़ारा देखकर पुलिस वाले दंग रह गये। वहां तो युवक-युवतियों का मेला लगा था। मौजमस्ती की जबरदस्त पार्टी चल रही थी। किसी के हाथ में शराब का गिलास तो किसी के हाथ में बीयर की बोतल थी। नशीले तंबाकू वाला हुक्का भी अपने जलवे दिखा रहा था। यानी हर नशे का भरपूर आनंद लिया जा रहा था। रात के दो बजे के बाद घर से बाहर नशे में मदमस्त होकर कानफाडू डीजे के शोर में झूमने, चूमने-चाटने के साथ-साथ और भी बहुत कुछ कर गुजरने की प्रतिस्पर्धा चल रही थी। यह कोई मामूली परिवारों की बिगडी हुई औलादें नहीं। किसी का बाप ब‹डा कारोबारी तो किसी का पुलिस अधिकारी है। इन्हीं के शागिर्दों ने शहर के आशादीप शासकीय महिला आश्रय गृह बनाम सुधार गृह में लडकियों तथा महिलाओं को निर्वस्त्र नाचने को मजबूर कर दिया। इस आश्रय स्थल बनाम सुधार गृह में दुनियाभर की उन सतायी नारियों को पनाह दी जाती है, जिनका दूर-दूर तक कोई अपना नहीं। कुंवारी माताएं, विधवाएं और पारिवारिक हिंसा की शिकार असहाय महिलाएं यहां आती तो हैं, शांति और सुरक्षा के साथ स्वावलंबी बनने के लिए, लेकिन उनका अक्सर चीरहरण होता रहता है। सरकारी आशादीप में रात के अंधेरे में लडकियों के शोषण की जानकारी अखबारों को भी होती है, न्यूज चैनलों के धुरंधर भी अनभिज्ञ नहीं होते, लेकिन उनके लिए अब ऐसी खबरें कोई अहमियत नहीं रखतीं। वे भी 'याराना' निभाने की परिपाटी के गुलाम हैं। जब लडकियों ने जान-समझ लिया कि मीडिया उनकी नहीं सुनने वाला तो उन्होंने आखिरी दांव के तौर पर कुछ तेजतर्रार युवा कार्यकर्ताओं को अपना दुखडा कह सुनाया तथा उन्हें निर्वस्त्र नचाने वाला वीडियो भी वायरल हो गया तो जहां-तहां हंगामा मच गया। मंत्री और राजनीति के सोये शेर जाग गये।
खाकी वर्दी वालों की तरह कुछ डॉक्टर भी शैतान बनने के मौके तलाशते रहते हैं। उन्हें भी वासना की आंधी इस कदर बेकाबू तथा अंधा करती रहती है कि क्या कहें...। वह महिला कोरोना उपचार केंद्र में बडे भरोसे के साथ इलाज के लिए भर्ती हुई थी। वहां के एक डॉक्टर ने उसे अपने जाल में फांसने के लिए पहले तो उससे मीठी-मीठी बातें कीं। उसे जल्दी स्वस्थ हो जाने का विश्वास दिलाते हुए मोबाइल नंबर भी ले लिया। सडक छाप लोफरों की तरह आधी-आधी रात को उसके स्वास्थ्य की जानकारी लेने के बहाने फोन पर फोन करने लगा। इसी दौरान उसने अपनी असली मंशा प्रकट करते हुए सीधे-सीधे देह सुख की मांग कर दी। बीमार महिला को गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन उसने कोई जवाब नहीं दिया। अय्याश डॉक्टर ने चुप्पी को ‘हांङ्क मान लिया। रात के दो बजे धडधडाते हुए उसने अस्पताल पहुंचकर जबरदस्ती बीमार महिला को छत पर ले जाने की मर्दाना कसरत की। महिला विरोध करते हुए जोर-जोर से चीखी-चिल्लायी तो सोये हुए दूसरे मरीज भी जाग गए। पूरे अस्पताल में सनसनी फैल गई। रिश्तेदार भी अस्पताल पहुंच गए। सभी ने उसे जूतों, चप्पलों, मुक्कों, तमाचों से पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। अस्पताल के कर्मचारियों ने किसी तरह से बीच-बचाव कर उसे मुर्दा होने से बचाया।
अपनों के गम से उबरना बहुत मुश्किल होता है। उस पर बेटी को खोने का गम! वो भी दहेज लोभी दामाद के हाथों! २६ फरवरी, २०२१ को साबरमती नदी में कूदकर जान देने वाली आयशा रोज़ शहर के सपनों में आती है। उसका बस यही सवाल होता है कि पुरुषों का लालच कब खत्म होगा! पत्नी को सामान नहीं इंसान मानने की भावना कब पूरी तरह से जागेगी? यह पहली आयशा नहीं, जिसने धनलोलुप पति के आतंक से तंग आकर मौत को गले लगाया हो। यह ऐसा शर्मनाक सिलसिला है, जो थम ही नहीं रहा है। अपनी बेटी को खोने के गम में डूबे पिता के इन शब्दों ने शहर को रुला दिया, "मेरी बेटी तो सदा-सदा के लिए चली गई। कम अज़ कम अब तो होश में आओ। दूसरी बेटियों को तो बचा लो। कब तक हिन्दू-मुसलमान करते हुए नफरत के बीज बोते रहोगे। हुक्मरानों देश की असली समस्याओं से नज़रे चुराना बंद करो।"
८ मार्च २०२१, विश्व महिला दिवस की सुबह जब शहरवासी जागे तो उन्होंने शहर के विभिन्न चौक-चौराहों पर लगे होर्डिंग्स पर यह संदेश लिखा पाया तो दंग रह गये, "लडकियो डरो नहीं, लडो। धन के लालची पतियों से शेरनी की तरह भिड जाओ। मौत के हकदार वे हैं, तुम नहीं। तुम तो इस सृष्टि की रचयिता हो। बेटी, आयशा यदि तुम बेरहम पति के गाल पर तमाचे जड उससे अलग होने का ऐलान करती और बहादुर नारी की तरह हर जंग के मैदान में डटी रहती तो कितना अच्छा होता। बिटिया, कोई भी परिवार अपनी बेटी को खोना नहीं चाहता। बेटियां भटकाव के लिए नहीं, सही राह के लिए हैं। मेरी हर बेटी से यही विनती है कि, कोई भी गलत कदम उठाने से पहले हजार बार सोचना...।" शहर में लगे इन पचासों होर्डिंग्स को किसने लगाया, अभी तक पता नहीं चल पाया है...।
Thursday, March 4, 2021
स्वेच्छा-मरण... शर्मनाक पलायन
माना तो यही जाता है कि जिन्दगी तो सबको प्यारी है। कोई भी मरना नहीं चाहता। अमर होने के रास्ते भी खोजे जाते हैं। कोई भी कष्ट और कोई भी खतरा सामने आने पर इंसान उससे मुक्ति पाने और टकराने के उपाय खोज ही लेता है। आसानी से हार मान लेना उसकी फितरत नहीं। कोविड-१९ के दौरान भी लगभग सभी ने अपने हौसले को बनाये रखा। कोरोना के वायरस से बचने और उसे हराने के तरह-तरह के उपाय तलाशे। दवाओं पर दवाएं लीं। खुद को घरों में कैद रखा। जो लोग हद से ज्यादा लापरवाह रहे उन्हें मौत ने नहीं बख्शा। यही कोरोना था, जिसने लोगों को हतप्रभ कर उनकी आंखें खोलीं और जीवन का मोल बताया। इस अकल्पनीय काल में यह सच बार-बार सामने आया कि गरीबों का तो किसी न किसी बहाने मरना ही मरना है। देश और दुनिया के करोडपतियों, अरबपतियों ने अपनी तथा अपने परिवार की सुरक्षा की खातिर अपनी सारी दौलत लुटाने की तैयारी ही नहीं की, लुटायी भी। एक अमेरिकन कंपनी ने महामारी से बचने और बचाने के लिए देखते ही देखते अत्यंत दुर्गम क्षेत्र में कई फीट मोटी दीवार के ५७२ बंकर बना डाले, जिनमें भूगर्भ में बडे आराम से रहने के लिए स्पा, स्विमिंग पूल, बीयर बार, इनडोर शूटिंग रेंज के साथ-साथ ऐसी-ऐसी सुख-सुविधाएं हैं, जो सिर्फ फाईव स्टार होटलों में ही मिल पाती हैं। एक बंकर में उसके आकार के हिसाब से लगभग १० से २४ लोग रह सकते हैं। इन बंकरों में आश्रय लेने वाले धनवानों का यहां ताउम्र रहने का इरादा है। यह बंकर सिर्फ किराये पर ही उपलब्ध हैं। बेचे नहीं जा रहे हैं। एक बंकर के लिए पहले चौंतीस हजार डॉलर यानी भारतीय मुद्रा में चौबीस लाख रुपये अग्रिम भुगतान करना होता है और उसके पश्चात हर माह एक हजार डालर अर्थात ७२ हजार रुपये का किराया देना होता है। सोने के लिए रेलगाडी की तरह ऊपर नीचे बर्थ हैं। एक से एक लजीज भोजन भी यहां उपलब्ध है, जो सस्ता नहीं, बेहद महंगा है।
कोरोना तो २०२० की देन है। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं, जो इससे पहले भी किसी बीमारी से कोसों दूर रहने के लिए सावधानी बरतते रहे हैं। अमेरिका के ही रहनेवाले ६७ वर्षीय शख्स, जिनका नाम डेल लैम्बर्ट है, बीते तीस वर्षों से हर दिन बीस विटामिन की गोलियां खाते हैं। उन्हें बहुत पहले अंदेशा होने लगा था कि कोई खतरनाक वायरस दुनिया को अपनी चपेट में ले सकता है। अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाने और बरकरार रखने के लिए और भी कई तरह की एहतियात बरतने वाले डेल कहते हैं कि, अब भी मैं शक्तिशाली घोडे को भी फुर्ती के मामले में मात दे सकता हूं। कोरोना वायरस के संक्रमण की जानकारी मिलते ही डेल ने अपने घर में और भी इतनी सारी दवाएं जमा कर लीं, जो कई वर्ष तक खत्म नहीं होने वाली। डेल की तरह दुनिया के और भी कई अरबपतियों ने अपनी तथा अपने परिवार की सुरक्षा के लिए एक से एक इंतजाम करने में कोई कमी नहीं की। भारत के धनाढ्य भी इस मामले में पीछे नहीं रहे। कइयों ने घने जंगलों, समुद्री द्वीपों, फार्महाउसों, टापुओं, बंदरगाहों को अपना ठिकाना बनाया तो बहुतों ने डेल की राह पकडी। सभी बस यही चाहते थे कि भले ही दुनिया खत्म हो जाए, लेकिन उनके घर-परिवार के किसी भी सदस्य पर कोई आंच न आने पाए। सभी जिन्दादिली के साथ जिन्दा रहें। एक विशाल अपार्टमेंट के फ्लैट में रहने वाली महिला को यह भय सताने लगा कि यदि कहीं पानी की आपूर्ति बंद हो गई तो उसका परिवार तो जिन्दा ही नहीं रह पायेगा। ऐसे में उसने पूरा हिसाब किताब लगाकर डिस्टिल वॉटर के इतने बडे-बडे कैन घर में बुलवा कर रख लिए, जिनका महीनों खत्म होना मुश्किल था।
जब सारी दुनिया के लोग अपनी जान बचाने की जद्दोजहद में लगे थे। दिन-रात ऊपर वाले से प्रार्थनाएं कर रहे थे कि कुछ भी अशुभ न हो। जिसने भी इस धरती पर जन्म लिया है वह अपनी पूरी उम्र जीकर ही इस दुनिया से विदा हो। तब जगह-जगह से लगातार आत्महत्याओं की खबरें आ रही थीं। यह खुदकुशी करने वाले चेहरे न तो गरीब और फकीर थे और ना ही किसी गंभीर रोग के शिकार। फिर भी इन्होंने तब मौत का दामन थामा, जब सभी उससे येन-केन-प्रकारेण बचना चाहते थे। नागालैंड के पूर्व राज्यपाल अश्वनी कुमार, जिन्हें बेहद महत्वाकांक्षी तथा हिम्मती शख्स के रूप में जाना जाता था। अपनी योग्यता और कर्मठता की बदौलत जो सीबीआई और एसपीजी में प्रमुख पदों पर भी रहे, उन्होंने बदनामी वाला मौत का रास्ता चुन लिया। अश्वनी कुमार किसी तरह की तकलीफ, नाराजगी या डिप्रेशन के शिकार भी नहीं थे। फांसी के फंदे पर लटकने से पहले उन्होंने जो सुसाइड नोट छोडा वह भी बेहद चौंकाने वाला था, 'मैं अपना जीवन समाप्त कर रहा हूं। हर कोई खुश रहे। मेरी आत्मा नई यात्रा पर निकल रही है...।'
ऐसी ही अंतिम यात्रा पर फिल्मी कलाकार सुशांत राजपूत की रवानगी हो गई और कई महीनों तक उनकी खुदकुशी को हत्या मानने वाले लोग हत्यारों की तलाश करते रहे और जिस-तिस को कटघरे में खडा करते रहे। उसकी प्रेमिका तक को कई दिन सलाखों के पीछे काटने पडे। सुशांत की ही अबूझ पहेली नुमा राह पकडी एक्टर संदीप नाहर ने। सुशांत ने तो कोई सुसाइड नोट नहीं छोडा था, लेकिन संदीप जरूर अपनी आप बीती से दुनिया को अवगत करा गये। देश के विख्यात क्रिकेटर महेंद्र सिंह धोनी की जीवनी पर बनी हिट फिल्म 'एम एस धोनी : द अनटोल्ड स्टोरी' ने सुशांत को अभूतपूर्व ख्याति दिलवायी थी। इस फिल्म में उनका अभिनय भी बेमिसाल था। इसी फिल्म में संदीप नाहर ने नायक के दोस्त की बडी सशक्त भूमिका निभाकर दर्शकों का दिल जीता। इसमें दो मत नहीं कि संदीप भी राजपूत की तरह मंजा हुआ अभिनेता था, जिसके लिए खुशहाल जिन्दगी अपनी बाहें फैलाये खडी थी, लेकिन वह ही कायर, अहसान फरामोश निकला। संदीप की शादीशुदा जिन्दगी सही नहीं चल रही थी। पत्नी जब-तब उसे अपमानित करती रहती थी। बात-बात पर लडना-झगडना उसकी आदत थी। दोनों के विचार बिलकुल मेल नहीं खाते थे। जिस खुशी और सुकून के लिए संदीप ने शादी की थी वह तो उसे मिली ही नहीं। उनकी शादी दो साल पहले हुई थी। इन दो सालों में पत्नी पचासों बार उसे धमकी दे चुकी थी कि वह खुदकुशी कर लेगी और उसे पूरी तरह से कसूरवार ठहराने वाला सुसाइड नोट लिख छोडेगी, जिससे वह सारी उम्र जेल में ही स‹डता रहेगा। संदीप की सास अपनी जिद्दी अहंकारी और अपने पति के साथ हमेशा बदसलूकी करने वाली बेटी का ही साथ देती थी। दरअसल सास की दखलअंदाजी और दबाव ने संदीप के समूचे जीवन में ज़हर घोल दिया था। संदीप अपने माता-पिता से बेइन्तहा प्यार करता था। वह उनके लिए बहुत कुछ करना चाहता था। वह अपनी पत्नी को भी दिलोजान से चाहता था। उसे लगता था कि वह अभी नादान है। भोली है। उसकी मां ने उसके दिमाग को घुमा-फिरा दिया है। संदीप को यह भी अच्छी तरह से पता था कि खुदकुशी तो घोर बेवकूफी और कायरता की निशानी है। फिर भी वह कई पन्नों का अंतिम पत्र लिखने के बाद फांसी के फंदे पर झूल गया और हमेशा-हमेशा के लिए इस दुनिया से चलता बना। उसने यह भी याद नहीं रखा कि हर मुसीबत का इलाज है। रिश्ते की अहमियत तब तक है, जब तक वह निभे और जब यह लगने लगे कि अब रिश्ते का बोझ ढोना मुश्किल हो रहा है, तो उससे छुटकारा पाने के लिए कानून बना हुआ है। तलाक लेकर बडे सम्मानजनक तरीके से अलग राह पकडी जा सकती है। नासूर बने रिश्ते के साथ बने रहना अक्लमंदी तो नहीं...।
महाराष्ट्र में स्थित है शहर अहमदनगर। इसी नगर की कर्जत तहसील के राशिनगांव में एक जाने-माने डॉक्टर ने अपने पूरे परिवार को इंजेक्शन देने के बाद खुद भी फंदे पर लटककर आत्महत्या कर ली। अपनी पत्नी और दोनों बेटों के इस ४६ वर्षीय हत्यारे डॉक्टर ने मृत्युपूर्व सुसाइड नोट में लिखा कि, 'मेरा बेटा कान से सुन नहीं सकता है, जिसकी वजह से आसपास के लोग और रिश्तेदार उसे अपमानित करते रहते हैं। यह हमें मंजूर नहीं। लोगों के गलत बर्ताव और ताने कसने से तंग आकर हमें अपनी जान देने को विवश होना पड रहा है। हम अब बस यही चाहते हैं कि हमारी सारी सम्पत्ति दिव्यांग बच्चों को दान कर दी जाए।ङ्क एक छोटी सी आम परेशानी को सहन नहीं कर पाने वाला यह डॉक्टर एक अच्छा समाजसेवी भी था। १९ फरवरी, २०२१ को इस समाजसेवी डॉक्टर के श्रीराम अस्पताल और निवास, जहां पर इस हृदयविदारक घटना को अंजाम दिया गया, वहां का मंजर जिसने भी देखा उसके रोंगटे ही खडे हो गए।
एक बार नहीं, पूरे सात बार लोकसभा का चुनाव जीतकर दिखाने वाला शख्स कोई ऐसा-वैसा नेता तो हो नहीं सकता। आज के जमाने में नगरसेवक का चुनाव लडना और उस पर जीतना आसान नहीं। लोगों को जब उनकी मुंबई के एक होटल में फांसी के फंदे पर झूल जाने की खबर लगी तो वे सन्न होकर सोचते रह गये। कोई भी आसानी से यह मानने को तैयार नहीं था कि मोहन डेलकर जैसा धैर्यवान, साहसी जन नेता खुदकुशी कर सकता है। केंद्र शासित प्रदेश दादरा-नगर हवेली में उनका डंका बजता था। इस दबंग सांसद ने दुनिया को अलविदा कहने से पहले पूरे १५ पेज का सुसाइड नोट भी लिखा था, जिसमें गुजरात के कुछ ऐसे नेताओं और अफसरों के नामों का उल्लेख था, जिन्होंने उनका जीना हराम कर रखा था। वे बार-बार उन्हें परेशान करते रहते थे, लेकिन राजनीति में यह कोई नयी बात तो नहीं। वह राजनेता ही क्या, जिसके विरोधी न हों। असली सच क्या था, यह तो कोई भी नहीं बता सकता। जाने वाला कई सवाल छोडकर चला गया, लेकिन यह स्वेच्छा-मरण जहां अबूझ पहेली है वहीं कायरता की शर्मनाक निशानी भी है। यहां पर किसी भी प्रकार की शिकायत और बहानेबाजी कोई मायने नहीं रखती...।
Thursday, February 25, 2021
रिश्ते-फरिश्ते
आप भी उससे मिलेंगे तो यही लगेगा कि कोई किताब पढ रहे हैं। आधे में छोडने का तो बिलकुल मन नहीं करेगा। पन्ना-पन्ना पढकर ही दम लेंगे। इस किताब में कुछ भी काल्पनिक नहीं। सौ फीसदी सच है। हकीकत है। ऐसी किताबें जुनून और जिद की कलम से लिखी जाती हैं। यह किताबें अंधेरे में भी चमकती नज़र आती हैं। इस किताब की असली नायिका मां है तो नायक बेटा है। नायक का नाम है श्रीकांत बोला। उम्र तीस वर्ष। जन्मजात नेत्रहीन है। झोपडी से महल तक पहुंचने की संघर्ष गाथा उसी की जुबानी...
"मेरा जन्म १९९१ में आंध्रप्रदेश के सीतारामपुरम गांव में हुआ। माता-पिता को तब आघात लगा, जब उन्हें पता चला कि उनका बच्चा तो अंधा है। रिश्तेदारों, अडोसी, पडोसियों ने भी उन्हें घोर बदकिस्मत करार दे डाला, जिनके यहां लडका तो पैदा हुआ, लेकिन किसी काम का नहीं। उम्र भर के लिए बोझ। तकलीफों और परेशानियों का घर। सभी ने उन्हें सलाह दी कि ऐसे बच्चे का होना न होना एक बराबर है। वैसे भी लडके तो मां-बाप की सेवा और उनका नाम रोशन करने के लिए जन्मते हैं। मां-बाप के सपने अपनी अच्छी औलाद की बदौलत ही साकार होते हैं। यह अंधा तो उनके लिए फंदा है। ऐसे फंदों से मुक्ति पाना ही अक्लमंदी है। जैसे दूसरे समझदार मां-बाप करते हैं, तुम भी इसका गला घोंट दो। चुपचाप कहीं दफना दो। यह नहीं कर सकते तो अनाथालय में ले जाकर छोड दो। वही इसे खिलाएंगे, पिलायेंगे और जो उनकी मर्जी होगी, करेंगे। अनाथालय की शरण में पल-बढकर भीख मांगना तो सीख ही लेगा। तुम लोगों का तो इसे पालते-पालते ही दम निकल जायेगा। घर के बर्तन तक बिक जायेंगे और हाथ में कटोरा पकडकर भीख मांगने की नौबत आ जाएगी।"
कुछ दिन तक तो मां हर किसी के उपदेश सुनती रहीं, लेकिन एक दिन उन पर बिफर पडीं। उन्हें आसपास फटकने तक से मना कर दिया। मां के अंतिम फैसले के रूप में कहे गये इन शब्दों ने सभी की जुबानें बंद कर दीं, "तुम लोग कान खोलकर सुन लो कि जब तक मैं जिन्दा हूं, अपने बच्चे पर आंच नहीं आने दूंगी। खुद को बेचकर भी इसकी इतनी अच्छी तरह से परवरिश करूंगी कि तुम लोग भी देखते रह जाओगे।" "चार साल का हुआ तो मां ने गांव के स्कूल में दाखिला करवा तो दिया, लेकिन घर से अकेले बाहर निकलना मेरे लिए आसान नहीं था। कभी पिता स्कूल छोडने जाते तो कभी मां छोड आती और लेने भी पहुंच जाती। स्कूल में मेरे साथ पढने वाले बच्चे मुझ से दूरी बनाये रहते। जब मैं तीसरी कक्षा में पहुंचा तो प्रिंसिपल ने मेरे लिए फरमान जारी कर दिया कि हमें ऐसे बच्चों की जरूरत नहीं, जिसके लिए हमें जरूरत से ज्यादा दिमाग खपाना और अपना कीमती समय बरबाद करना पडे। मां के जुनून ने मुझे हैदराबाद के ब्लाइंड स्कूल में पहुंचा दिया, लेकिन वहां भी मुझे कुछ भी सुझायी नहीं देता था। चौबीस घण्टे बस घबराया-घबराया रहता। एक रात मैंने स्कूल से भागने की कोशिश की तो वार्डन की मुझ पर निगाह पड गई। उन्होंने मेरे इरादे को भांप लिया था। गुस्से में उन्होंने मुझे अपने पास खींचा और पांच-सात तमाचे जडते हुए कहा कि कहां-कहां भागोगे। ऐसे भागने से तुम्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा। अपना नहीं तो उस मां का ख्याल करो, जिसने कई सपने पाल रखे हैं। ईश्वर ने तुम्हें किसी चमत्कार के लिए इस धरती पर भेजा है। डरो नहीं, बस लडो... लडते ही रहो। वार्डन के चांटों और शब्दों का ही असर था कि उस दिन मुझे लगा कि मैं तो देख सकता हूं। मुझे हर चुनौती का डटकर सामना करते हुए खुशी-खुशी जीना है। मेरे अंदर साहस की रोशनी की तरंगें दौडने लगीं। मैं दसवीं तक टॉपर रहा, लेकिन मेरे मनोबल को तोडने वाली ताकतें तब भी मेरे पीछे पडी रहीं।
दसवीं के बाद आईआईटी की कोचिंग के लिए एक कोचिंग सेंटर गया तो वहां के संचालक ने तीखा थप्पड-सा शब्द बाण मारा कि तुम जैसे पौधे कभी पेड नहीं बन सकते, क्योंकि उनमें तेज बारिश और आंधियों को सहने की ताकत नहीं होती। हमेशा-हमेशा के लिए फौरन धराशायी हो जाते हैं और साथियों के तेजी से दौडते कदमों से रौंद दिये जाते हैं। साइंस में एडमिशन पाने के लिए अंतत: मुझे कोर्ट की शरण लेनी पडी। मां के हाथ और साथ के दम पर वो लडाई भी मैंने डट कर लडी और जीत हासिल की। आंध्रप्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड में साइंस लेकर ९२ प्रतिशत नंबर के साथ पास होने वाला मैं पहला नेत्रहीन छात्र बना। उसके बाद तो बडी आसानी से अमेरिका के एमआईटी में प्रवेश मिल गया और यहां भी तब तक किसी दृष्टिहीन छात्र को प्रवेश नहीं मिला था। अमेरिका से पढाई कर लौटा तो तकदीर मेरे स्वागत के लिए सभी दरवाजे खोले खडी थी। मैं हौसले से लबालब था। मां खुशी से फूली नहीं समा रही थी। मैंने अपने दम पर हैदराबाद में कंज्यूमर फूड पैकेजिंग कंपनी शुरू की। २३ की उम्र में बोलैंट कंपनी का सीईओ बना। आज जब तीस साल का होने जा रहा हूं तब कंपनी ६०० करोड के आंकडे को छू चुकी है। मेरी कंपनी में चार सौ कर्मचारी काम करते हैं, जिनमें ७० प्रतिशत दिव्यांग हैं। जिन्दगी ने मुझे एक ही पाठ पढाया है कि ऊपर वाला भी तभी साथ देता है, जब हम हिम्मत और योजना के साथ चलते रहते हैं। चाहे कितनी भी मुश्किल भरी राहें हों, जुनूनी संघर्ष की बदौलत अंतत: आसान हो ही जाती हैं और मंजिल खुद-ब-खुद गले लगाती है।
बेटे के लिए अपनी जिन्दगी होम कर देने वाली मां का यह बेटा आज छह सौ करोड का मालिक है। आने वाले वक्त में मेरी तिजोरी में दस-बीस हजार करोड रुपये भी होंगे, लेकिन मां और उनकी कुर्बानी से बढकर तो नहीं होंगे। मेरी सबसे बडी दौलत तो मेरी मां है, जिन्होंने मुझे यहां तक पहुंचाया है।"
बीते हफ्ते महाराष्ट्र के नाशिक जिले में एक भाई अपनी बहन को बाइक पर दस किलोमीटर दूर स्कूल छोडने जा रहा था। सुनसान रास्ते में घनी झाडी में छिपे तेंदुए ने छलांग लगाकर बहन के पैर को अपने मुंह में दबोच लिया। ऐसा लग रहा था कि भूखा तेंदुआ उसकी जान लेकर ही दम लेगा। भाई ने आंधी की तरह बाइक की रफ्तार बढा दी। साथ-साथ दौडते तेंदुए ने बहन की पीठ पर टंगे बैग को जोर से खींचा और बैग उसके मुंह में आ गया। आगे बाइक दौड रही थी और पीछे-पीछे दौडता तेंदुआ बहन को दबोचने के लिए अपनी पूरी ताकत लगाये था। भाई की भी जिद थी कि किसी भी हालत में बहन को बचाना है। भले ही खुद की जान क्यों न चली जाए। भाई बाएं हाथ से बहन को जकडकर, दाएं हाथ से बाइक दौडाता रहा। वह भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि बहन पर किंचित भी आंच न आए। इसी भागादौडी में तेंदुए के खिंचाव से बैग का पट्टा टूट गया और बैग उसके मुंह में फंसा रह गया। दोनों ने राहत की सांस ली। तेंदुआ बहुत पीछे छूट चुका था। उसके गुर्राने की दहशती आवाज अभी भी आ रही थी। उनकी बाइक सीधे स्कूल पहुंचकर ही रुकी। बहनों के प्रति भाइयों के स्नेह, समर्पण और उनकी सुरक्षा के लिए कुछ भी कर गुजरने की हजारों दास्तानें हैं। ऊपर वाले ने रिश्ते बनाये ही इसलिए होंगे। यह खून के रिश्ते हैं...। लेकिन एक और रिश्ता भी है, जो इंसानियत का रिश्ता कहलाता है। यह रिश्ता कई बार खून के रिश्तों को भी मात दे देता हैं, क्योंकि यह बिना किसी भेदभाव के सभी का साथी बन जाता है।
एक सवाल कि एक रुपये में क्या होता है, क्या मिलता है? हलकी सी चाकलेट और संतरे के स्वाद वाली गोली जरूर मिल जाती है, जिसे आज के बच्चे भी पसंद नहीं करते। भिखारी भी एक रुपये के सिक्के को लेने से कतराते हैं। कागज़ के नोट तो वैसे भी आजकल कम नज़र आते हैं, जो हैं भी, वो शादी, ब्याह या किसी अन्य शुभ कार्य में दस को ग्यारह, सौ को एक सौ एक और पांच सौ को पांच सौ एक के शुभ आंकडे बनाने... दर्शाने के काम आते हैं। महंगाई भी कितनी बढा दी गई है। कुछ भी सस्ता नहीं मिलता। अनाज, दूध, सब्जियां, दवाएं सब महंगी होती चली जा रही हैं। पीने के पानी तक की कीमत चुकानी पड रही है। गरीब आदमी यदि किसी गंभीर बीमारी का शिकार हो जाए तो उसका बचना मुश्किल है। डॉक्टरी के पेशे की इंसानियत भी जाती रही है, लेकिन फिर भी सच्चे इंसानों के अंदर का इंसान जिन्दा है इसे साबित कर दिखाया है ओडिशा के संबलपुर जिले के युवा डॉक्टर शंकर रामचंदानी ने, जिन्होंने गरीबों और वंचितों के इलाज के लिए 'एक रुपया' क्लिनिक खोला है। किराये के मकान में खोले गये इस अस्पताल में मरीजों की भीड लगी रहती है। गरीबों से एक रुपया फीस भी इसलिए लेते हैं ताकि उन्हें यह न लगे कि वे मुफ्त में इलाज करा रहे हैं। वे लंबे समय से चाह रहे थे कि ऐसे चिकित्सालय की स्थापना करें, जहां गरीब और बेसहारा लोग आसानी से पहुंचकर मुफ्त में इलाज करवा सकें। उनका मानना है बडे-बडे अस्पतालों में बडे निवेश की आवश्यकता होती है, इसलिए वहां पर इलाज भी महंगा हो जाता है। इसलिए उन्होंने आलीशान अस्पताल खोलने की बजाय साधारण अस्पताल खोला है, जहां पर उनकी कोशिश है कि जिनकी जेबें खाली हैं वे भी गर्व के साथ बीमारी से छुटकारा पा सकें। अडतीस वर्षीय डॉक्टर की पत्नी भी डॉक्टर हैं। दोनों विभिन्न अस्पतालों में कई वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। दोनों अच्छी तरह से जानते हैं कि आज अधिकांश डॉक्टर कैसे निर्दयी सौदागर बन कर रह गये हैं, लेकिन इन पति-पत्नी को धन की कोई भूख नहीं। ताउम्र इंसानियत का धर्म निभाते हुए जीना चाहते हैं... ताकि खुद की निगाहों से गिरना न पडे...।
