Thursday, July 22, 2021

शोहरत

    डॉक्टर रंजन कुमार को फेसबुक से चिपका देख उसकी पत्नी का पारा चढ़ जाता है। कल रात को जब डॉ.रंजन लघुशंका के लिए उठा तो उसके हाथ में मोबाइल देख पत्नी फटकारने की मुद्रा में आ गई, ‘ये तो हद की भी इंतिहा हो गई। सब कुछ बर्बाद करने के बाद भी जब देखो तब फेसबुक खोलकर बैठ जाते हो। मुझे तो चिंता होने लगी है कि ये कहीं सचमुच का पागल बना कर तुम्हें पागल खाने न पहुंचा दे। तुम्हरी देखा-देखी अब तो बेटी भी मोबाइल से चिपकी रहती है। मुझे उसके भविष्य की भी चिंता सताने लगी है। अरे, अपनी नहीं तो कम अज़ कम मेरी नींद का तो ख्याल कर लिया करो। तुम अच्छी तरह से जानते हो कि बत्ती जलते ही मेरी नींद में खलल पड़ जाती है और यहां तुम हो कि आधी रात को एकाएक किसी न किसी बहाने उठकर बैठ जाते हो। तुम्हारे इस नशे के कारण मुझे सारी रात करवटें बदल-बदल कर काटनी पड़ती है। तुम्हारा क्या है...सुबह बारह बजे तक खर्राटों वाली नींद लेते रहते हो। मरण तो मेरा है जो समय पर बिस्तर न छोड़ूं तो बच्चे शोर मचाने लगते हैं उनकी भी कोई गलती नहीं। उन्हें सुबह आठ बजे तक स्कूल पहुंचना होता है। पत्नी बोलते-बोलते अंतत: शांत हो गई।
    डॉ. रंजन फेसबुक में मगन रहा। उसने शाम को अपनी ‘रक्तदान’ वाली जो फोटू फेसबुक पर डाली थी, उसमें उसे उतने लाइक नहीं मिले थे, जितने की उसे चाहत थी। डॉ. रंजन को फेसबुक के दोस्तों पर गुस्सा आने लगा। आदान-प्रदान के दस्तूर को भी निभाना नहीं जानते, ऐसी दोस्ती किस काम की...! बीमार होने के बावजूद वह आज गिरते-पड़ते दोपहर को रक्तदान शिविर में रक्तदान करने पहुंच गया था। बड़ी मुश्किल से एक अनजान औरत को तस्वीर लेने के लिए मनाया था। उसी तस्वीर को फेसबुक पर अपलोड करने के बाद कई मित्रों की पोस्ट पर कमेंट्स किये थे। धड़ाधड़ लाइक भी किया था। पांच हजार मित्र होने के बावजूद इतने घण्टों में ‘लाइक’ का आंकड़ा मात्र पचास तक ही पहुंच पाया था।  
    दरअसल, रंजन को कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही नाम कमाने और चर्चा में आने का चस्का लग गया था। तभी उसने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थीं। उसे तब बड़ी तकलीफ होती थी जब उसकी लिखी कविताओं को कहीं छापा नहीं जाता था। कई बार उसने दैनिक अखबारों के कार्यालयों के चक्कर काटे, लेकिन संपादकों को उसकी कविताएं पसंद नहीं आयीं। फिर भी कभी-कभार उसकी चार-छह लाइनों की तुकबंदी कहीं छपती तो वह खुशी में झूमने लगता। अपनी अनगढ़ कविता की पंक्तियों को अपने दोस्तों को सुनाने तथा दिखाने के लिए उतावला हो उठता। इसी दौरान उसने कहानियां लिखने की भी कोशिश की, लेकिन दाल नहीं गली। वह जब भी किन्हीं जाने-माने लोगों के बारे में अखबारों में प़ढ़ता तो अपना नाम और फोटो देखने की उसकी इच्छा और बलवति हो जाती।
तब पिता जिन्दा थे। उनकी शहर के मेन बाजार में बड़ी-सी रेडिमेड कपड़ों की दुकान थी। रंजन भी उनका हाथ बंटाता था। इसी दौरान उसने शहर में आयोजित होने वाले विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जाना प्रारंभ कर दिया था। आयोजकों से नजदीकी बनाने के लिए अपनी जेब भी ढीली करनी शुरू कर दी। किसी छपास रोगी की देखा-देखी उसने नियमित ऐसे रक्तदान शिविरों में जाकर रक्तदान करना भी प्रारंभ कर दिया, जहां पर नेताओं और मंत्रियों के कारण भीड़ उमड़ती थी और उनके रक्तदान महाकल्याण की खबरें शहर के समाचार पत्रों में प्रकाशित होती थीं। रंजन की हमेशा किसी मंत्री या बड़ी हस्ती के करीब खड़े होने की कोशिश होती। उसकी कुछ फोटोग्राफरों से भी पहचान हो चुकी थी, जिन्हें वह पहले से ही कुछ दान-दक्षिणा देकर अपनी असरदार तस्वीर लेने को तैयार कर लेता था। बाद में जब हर हाथ में मोबाइल आ गए तो उसे उनकी ज्यादा जरूरत नहीं रही। अब तो जो भी आसपास दिखता उसे अपना मोबाइल देकर फोटो लेने की विनती कर देता। धीरे-धीरे रंजन के पास अखबारों में छपी खबरों का विशाल भंडार जमा होता चला गया। उसने इनकी कटिंग काट कर कई फाइलें तथा एलबम तैयार कर लीं। इन्हें वह अपने घर के ड्राइंगरूम में रखी टेबल पर ऐसे सज़ाकर रखता कि आने वाले किसी भी मेहमान की उन पर नज़र पड़ ही जाती। बातचीत के दौरान वह अपनी खबरों तथा तस्वीरों से सजी-संवरी एलबम उन्हें ऐसे दिखाता जैसे कोई महान लेखक अपनी मौलिक कृति ज्ञानवान पाठक, समीक्षक के समक्ष पेश कर उसकी तारीफ तथा मूल्याकंन का सुख पाता है। इसी दौरान देश के विभिन्न शहरों में स्थित उन संस्थाओं से भी उसका संपर्क होता चला गया जो धन लेकर समाजसेवक, प्रकांड विद्धान, राष्ट्र सेवक साहित्य श्री, राष्ट्र प्रेमी, धर्माचार्य, सर्वश्रेष्ठ बिजनेसमैन आदि-आदि के प्रमाण पत्र तथा सम्मान पत्र देती थीं। पैसा फेंकने में हमेशा तत्पर रहने वाले रंजन को मेरठ की एक संस्था ने मोटी रकम की ऐवज में डॉक्टर की पदवी से भी नवाज दिया।  तब से वह अपने नाम से पहले ‘डॉक्टर’ लगाने लगा। पिता चल बसे थे। अब तो वह मन का राजा था। नाम चमकाने तथा लोगों की नजरों में बने रहने की उसकी अपार लालसा के बारे में शहर ही नहीं, दूर-दूर के लोगों को पता चलता गया। कई धन की लालची संस्थाएं उसे निमंत्रित करने लगीं। वह उन्हें मोटा चंदा देकर मंच पर आसीन होने का आनंद लेता। जब वह मंच पर होता तो उसका सीना चौड़ा हो जाता। एक से एक चमकती शील्ड, प्रमाणपत्र, सम्मान पत्र और डिग्री पर डिग्री शोकेस में सजती चली गयी।
    आज तो सब खत्म हो चुका है, लेकिन तब पत्नी रोती-कलपती रहती थी कि दुकानदारी में ध्यान दो, लेकिन उसने उसकी एक नहीं सुनी। जब भी कोई उसे बुलाता, दुकान नौकरों के भरोसे छोड़कर चल देता। आखिरकार वही हुआ जो होता आया है...। एक समय ऐसा आया जब दुकान पूरी तरह से खाली हो गई। सामान नहीं होने के कारण ग्राहकों ने दुकान की तरफ झांकना तक बंद कर दिया।
    सोचते-सोचते जब रंजन को नींद आने लगी तब उजाला हो चुका था। पत्नी, बेटी और बेटे के लिए नाश्ता और टिफिन तैयार करने में लग चुकी थी। वह रंजन को लेकर भी बेहद चिंतित रहती है। पिता की छोड़ी विरासत को कुछ ही साल में तबाह करके रख देने वाले पति के प्रति उसके मन में गुस्सा और सहानुभूति दोनों है। अब तो रंजन की जेब भी पूरी तरह से खाली हो चुकी है। इन दिनों बस उसका एक ही काम है, फेसबुक पर विभिन्न पोस्ट तथा तस्वीरें डालकर कमेंट्स और लाइक्स का बड़ी बेसब्री से इंतजार करना...। जब कमेंट्स और लाइक मनमाफिक नहीं मिलती तो वह उदास हो जाता है। इस गम के दौर में भी वह दूसरों को लाइक देने में कंजूसी नहीं करता। सजग पत्नी को तो अपने पति की बर्बादी की वजह बताने में ही शर्म आती है...। दुकान के खाली हो चुके शोकेस में सजायी गई शील्डों, सम्मान पत्रों के साथ रखी पचासों तस्वीरें उसे गुस्सा दिलाती हैं, जिनमें मंचों पर पुरस्कृत होता रंजन नेताओं और खाकी वर्दी वालों के साथ मुस्कुराता नज़र आता है।
    घड़ी के कांटे बता रहे थे कि दोपहर के दो बज चुके हैं। उदास और निराश रंजन ने बड़ी मुश्किल से बिस्तर छोड़ा। चाय पिलाने के बाद पत्नी ने जो बताया उससे जो उसके हाथ-पैर कांपने लगे। सुबह करीब दस बजे मोहल्ले की एक कॉलेज गर्ल की किसी सिरफिरे ने चाकू घोंपकर निर्मम हत्या कर दी। हट्टा-कट्टा काला-कलूटा हत्यारा युवक किसी तरह कुछ पड़ोसियों के पकड़ में आ गया और उन्होंने उसे पुलिस के सुपुर्द कर दिया था। पुलिसिया पूछताछ में उसने बताया कि युवती उसकी फेसबुक फ्रेंड थी। छह महीने पहले दोनों दोस्त बने थे फ्रेंड रिक्वेस्ट युवती ने ही भेजी थी। दोस्ती के तुरंत बाद उसी ने चैटिंग की शुरुआत की थी। बार-बार कहती रहती, ‘‘मुझे तुम से प्यार हो गया है। अब तो कोरोना भी ठंडा पड़ गया है। जल्दी मिलने आ जाओ। खूब मौज-मस्ती करेंगे।’’मोबाइल नंबर देने की पहल भी उसी ने की थी। मेरी हर फोटो पर लाइक की झड़ी लगा देती और ऐसी-ऐसी कमेंट्स लिखती कि मैं मिलने को बेकरार हो गया। मिलने का दिन भी उसी ने सुझाया था। उसने वीडियो कॉल में मादक अंगड़ाई लेते हुए बताया था कि मकान मालिक कुछ दिनों के लिए बाहर गये हुए हैं। तुम बस उड़कर आ जाओ। मैं भी उसे पाने को उतावला था इसलिए अमृतसर से यहां आ पहुंचा। होटल के कमरे में नहा-धोकर जब उसके घर पहुंचा तो मेरी खुशी की कोई सीमा नहीं थी, लेकिन वह मुझे देखते ही जली-कटी सुनाने लगी, तुम तो कपटी और धोखेबाज इंसान हो। फेसबुक में तो अपनी ऐसी-ऐसी आकर्षक तस्वीरें डालते रहे, जिन्हें देखकर मैं तुम पर लट्टू होती चली गई। तुम्हें देखने के बाद तो मुझे डर लगने लगा है। फौरन दफा हो जाओ यहां से...। हजारों मील की लंबी रेलयात्रा कर मैं उसके पास पहुंचा था और उसने दुत्कारते हुए दरवाजा ही बंद कर लिया। ऐसे में मेरा खून खौल गया और चाकू घोंपकर मैंने उसे वो मौत दे दी, जिसकी वह हकदार थी...हत्यारे की हिंसक सोच ने पुलिस अधिकारी के खून को खौला दिया और उन्होंने उसे तब तक पीटना जारी रखा जब तक वह अधमरा नहीं हो गया।

Thursday, July 15, 2021

अंतहीन फिल्म

    वो भी क्या दिन थे जब मैं और साहित्यकार मित्र गिरीश पंकज रात का शो सायकल पर बैठकर देखने जाया करते थे। आधा रास्ता सायकल गिरीश चलाते तो आधा रास्ता मैं। वो मोटर सायकलों, स्कूटरों के नहीं पैदल और सायकल के दिन थे। पांच-सात सौ की पगार थी, लेकिन शहजादाओं वाले ठाठबाट थे। कई वर्ष बीत जाने के बाद भी बिलासपुर की प्रताप, लक्ष्मी, मनोहर और बिहारी टाकीज की याद आ जाती है। सदर बाजार का वो मारवाड़ी भोजनालय भी यादों में है जहां की शुद्ध घी से चुपड़ी पतली-पतली रोटियां और रविवार को विशेष तौर पर परोसी जाने वाली मिठाई-कलाकंद या गुलाब जामुन अभूतपूर्व तृप्ति और उत्सव का अहसास कराते थे। अब भी जब कभी हम दोनों मिलते हैं, तो उन दिनों को याद कर तरंगित हो जाते हैं। काश! वो दिन फिर हमारे हिस्से में आते।

    उन दिनों राजेश खन्ना, संजीव कुमार, जितेंद्र, धर्मेंद्र, मुमताज, राखी, हेमामालिनी आदि के जलवे थे। राजेश खन्ना की दो रास्ते, आराधना, सफर, खामोशी, आनंद तो संजीवकुमार की संघर्ष और खिलौना जैसी फिल्मों को देखने के लिए जबरदस्त भीड़ उमड़ा करती थी। दिलीप कुमार, राजकपूर और देवानंद की सजीव अदाकारी के दिवाने भी कम नहीं थे। पर्दे के नायक तथा नायिका की तकलीफें और परेशानियां दर्शकों को चिन्ता में डाल देती थीं। फिल्म के अंत में हीरो की मौत असहज और उदास कर देती थी। कुछ फिल्में मनोरंजन के साथ-साथ रुलाती भी थी। फिल्मों में मिलने-बिछड़ने, धोखा देने, धोखा खाने के दृश्यों को देखकर लड़कियां और महिलाएं ही नहीं, पुरुष भी भाव विभोर होकर अपनी आंखें गीली कर लेते थे। सिनेमा हॉल के अंदर प्रवेश करते ही तनाव गायब हो जाता था। बेफिक्र होकर फिल्म का आनंद लिया जाता था। तब आज सी भागम भाग नहीं थी।
फिल्मी हीरो, हीरोइन वाकई आसमान के चमकते सितारे थे। धरती पर कम ही उनके पांव पड़ते थे। उन्हें देखने के लिए भीड़ ऐसे पगला जाया करती थी जैसे वे कोई फरिश्ते हों। इन फरिश्तों के निजी जीवन के बारे में छपने वाली खबरें भी लोगों को आकर्षित करती थीं। कितनी फिल्मी पत्रिकाओं की रोजी-रोटी उल्टी-सीधी गप्पबाजी से चलती थी। कुछ अभिनेता अपनी फिल्म को हिट करवाने के लिए भी अपने बारे में ऐसे-ऐसे किस्से गढ़वाते और छपवाते थे, जिससे लोग मनोरंजित होते थे और उनकी कल्पनाओं के घोड़े दौड़ने लगते थे। बेमेल इश्क के खेल में धोखे खाये भी जाते थेे और दिये भी जाते थे। समय तो बदलता ही है। उसका रथ कहां रुकता है।
    मोबाइल के इस युग में बहुत कुछ बदल गया है। इसी बदलने के तारतम्य से मुझे चाकलेटी सितारों पर भारी पड़ने वाले अभिनेता ओमपुरी की याद आ रही है, जिनकी फिल्म अर्धसत्य ने दर्शकों के दिमाग के ताले खोल दिये थे और शासन-प्रशासन के भ्रष्ट चेहरे को बेनकाब कर सोचने को विवश कर दिया था। कालांतर में नामी-गिरामी सितारों का साक्षात्कार लेना मेरा पसंदीदा काम होता चला गया। गिरीश पंकज ने साहित्य के क्षेत्र में तेजी से झंडे गाड़ने प्रारंभ कर दिये। तब ऐसे-ऐसे हीरो और हीरोइन से मिलना सहज होता चला गया था, जिनकी फिल्में देखे बिना कभी चैन नहीं आता था। ऊबड़-खाबड़ चेहरे वाले अभिनेता ओमपुरी से दिल्ली के कनॉट प्लेस के काफी हाऊस में अचानक हुई मुलाकात बाद में हल्की-फुल्की दोस्ती में तब्दील हो गयी थी। एक समय ऐसा भी आया जब ये मंजा हुआ अदाकार अपनी ही पत्नी नंदिता की दुष्टता और गद्दारी से टूट गया था। पत्नी पत्रकार थी। 48 साल के ओमपुरी का 26 साल की नंदिता पर दिल आ गया था। बहुत भरोसा करते थे वे अपनी पत्रकार पत्नी पर, लेकिन उसी पत्नी ने अपने पति पर एक ऐसी किताब लिख डाली जो वास्तव में ओमपुरी का काला इतिहास थी। कोई भी पति अपनी पत्नी से सच नहीं छुपाता। ओमपुरी ने किन्हीं मधुर पलों में अपनी वो कमियां और भूलें उजागर कर दीं जिन्हें छिपाये रखना जरूरी था, लेकिन नंदिता तो उनकी पत्नी थी। पूरा भरोसा था उस पर लेकिन उसने भरोसे का कत्ल करने से पहले यह भी नहीं सोचा कि पति को अय्याश साबित कर नाम कमाने की भूख अच्छे-खासे रिश्ते को तबाह कर देगी। नंदिता की बेवफाई ने ओमपुरी को शराबी बना दिया। इतना ही नहीं उसने तो एक पिता को अपने बेटे से मिलने पर भी बंंदिशें लगा दीं। 2017 की एक रात शराब के नशे में इस महान कलाकार की हार्ट अटैक से मौत हो गई, लेकिन नंदिता को कोई फर्क नहीं पड़ा।
    महान फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार 98 वर्ष की उम्र में चल बसे। इस दुनिया में जो भी आया है, उसे एक न एक दिन तो जाना ही होता है। दिलीप कुमार ने भरपूर जिन्दगी जी और इसमें अतुलनीय योगदान रहा उनकी पत्नी सायरा बानो का। सर्दी, जुकाम भी होता तो वे पति को अस्पताल ले जाने में देरी नहीं लगातीं। कितनी बार इलाज के लिए दिलीप कुमार अस्पताल ले जाए गये इसकी गिनती तो उनका इलाज करने वाले डॉक्टरों के पास भी नहीं होगी। वे भी सायरा के समर्पण को सलाम करते होंगे। सायरा बानो तो बस मौत के सामने दीवार बनकर डटी रहीं। कभी पत्नी तो कभी मां और बहन बनकर। इतनी देख-रेख और सेवा तो कोई मां ही कर सकती है। दिलीप कुमार ने भले ही किसी दूसरी औरत से कभी रिश्ते जोड़े हों, लेकिन सायरा ने कभी भी वफा का दामन नहीं छोड़ा। अपनी सारी नींदें कुर्बान कर दीं। पति तक किसी चिंता और गम की आंच नहीं पहुंचने दी। पति के चल बसने पर टूटे तन-मन से बोलीं, ‘मेरे जीने का मकसद ही नहीं रहा...।’
    अभिनेत्री मंदिरा बेदी कम उम्र में विधवा हो गयीं। मात्र 49 वर्ष के थे उनके पति राज कौशल। अचानक आये हार्ट अटैक से चल बसे। मंदिरा की तो सारी दुनिया ही लुट गई। दुखों के पहाड़ के बोझ तले दबी मंदिरा अंतिम समय तक पति के साथ बनी रहीं। जब पति के शव को अस्पताल से श्मशानघाट ले जाया गया तो काफी दूर तक अर्थी को पकड़े चलती रहीं। वे लोग जिनका काम ही बस आलोचना करना है उन्हें मंदिरा का पति की अर्थी को कंधा देना भारतीय परंपरा का अपमान लगा। कुछ विचारवानों ने उसकी मुड़ी-तुड़ी टी शर्ट और जींस पर तंज कसे। उनके विचार से उसे अपने पति की मौत का मातम तक मनाना नहीं आया। उसे अच्छी सुसंस्कृत नारी की तरह सफेद साड़ी या सलवार सूट पहन कर लोगों के सामने आना चाहिए था। सदियों से चली आ रही परंपरा को तोड़ने की हिमाकत जो उसने की वह अक्षम्य अपराध है। ऐसे बुद्धिधारियों को हमारा यही कहना है कि जिस नारी को अचानक अपना पति खोना पड़े, वह तो अपनी सुध-बुध ही खो देगी। पति की लाश सामने पड़ी हो और पत्नी लोगों की पसंद का परिधान पहनने के लिए दौड़-भाग करने लगे, सोचकर ही अटपटा और शर्मनाक लगता है। यकीनन, मंदिरा ने वही किया जो एक अच्छी पत्नी के लिए जरूरी था, वह राज से सच्चा प्यार करती थी। सच्चे प्यार में नापतौल और नाटक-नौटंकी की कोई जगह हो ही नहीं सकती...।

Thursday, July 8, 2021

वार्तालाप

‘‘यार ये भी कोई बात हुई? किन्नर से शादी! ये आजकल के लौंडे आफत मचाये हैं। अरे, ऐसी भी क्या गर्मी कि मान-मर्यादा की ऐसी-तैसी करके रख दी!’’
‘‘गुरूजी, क्या फिर कोई नया खेल-तमाशा हो गया है?’’
‘‘पत्रकार जी, जो खबरें आपको पहले पता लगनी चाहिए उनसे तो अनभिज्ञ रहते हो। जब देखो तब बेकार की खबरों में ही उलझे रहते हो! कम अज़ कम अपने शहर में होने वाले धमाकों से तो बेखबर मत रहा करो।’’
‘‘गुरुजी, अब पहेलियां बुझाना छोड़ असली मुद्दे पर तो आएं। ऐसी कौन सी बिजली गिर पड़ी कि आपका तन-मन झुलसा हुआ है?’’
‘यार पत्रकार, मैंने जबसे सुना है कि शहर के एक छोकरे ने हिजड़े से ब्याह रचाया है तो मेरा ब्लड प्रेशर ही बढ़ गया है। शर्म की बात तो यह भी है कि मां-बाप ने भी मंजूरी दे दी है।’’
‘‘गुरुजी, यह तो बड़ी अच्छी खबर है। मैं कल ही उनसे जाकर मिलता हूं। दोनों का साक्षात्कार लूंगा और अपने अखबार के पहले पेज पर छापूंगा। आज के दौर में ऐसे हिम्मती युवक बचे ही कहां हैं। हमारे समाज का फर्ज बनता है कि वे दोनों को सराहें, दिल खोलकर आदर-सत्कार करें।’’
‘‘तुम्हारी ऊलजलूल सोच को लेकर ही तो मुझे हमेशा बड़ा गुस्सा आता है। समाज को साफ-सुथरा रखना छोड़ गंदगी फैलाने की पैरवी में लगे रहते हो। मुझे तो लगता है कि किन्नर ने इस अच्छे-खासे छोकरे पर कोई जादू टोना कर दिया होगा। बड़ी चालू किस्म की है ये जमात। बिन बुलाये किसी के भी यहां पहुंच जाते हैं ये लोग। इनके नेटवर्क के सामने तो बड़े-बड़े जासूस फेल हैं। किसके यहां शादी होने वाली है, बच्चा होने वाला हैं, इन्हें सबसे पहले पता चल जाता है ये लोग भरोसे के तो कतई काबिल नहीं। अब तुम्हीं बताओ कि दुनिया में क्या खूबसूरत लड़कियों का अकाल पड़ गया है जो मर्दों को हिजड़ों के साथ सात फेरे लेने पड़ें! कल जब साक्षात्कार लेने जा ही रहे हो तो उससे यह पूछना नहीं भूलना कि क्या तुमने एमए बीएड की डिग्री मर्दों को फांसने के लिए ही ली है? अपने शिक्षा के ज्ञान को अपनी बिरादरी के लोगों के विकास में लगाती तो इतनी बड़ी डिग्गी सार्थक हो जाती, लेकिन इसकी असली मंशा तो किसी भी पुरुष को फांसने की ही रही होगी।
‘गुरुजी, आपने तो दो-दो शादियां की हैं। आपके समलैगिंक संबंधों पर तो फिल्म भी बन चुकी है। फिर भी लगता है कि इस सच को भूला बैठे हैं कि प्यार तो किसी से भी हो सकता है। आप ही तो लिखते और बताते आये हैं कि प्यार वो मधुर एहसास है जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। प्यार के सागर में गोते लगाने वाले प्रेमी किसी की परवाह नहीं करते। जीवन में अगर मनपसंद साथी मिल जाए तो जिंदगी सार्थक हो जाती हैं। युवक ने किन्नर में वही अपनापन ही तो देखा होगा जिसकी हर इंसान को तलाश रहती है। आपके विरोध और उलझन को देखकर मुझे कभी अखबार में पढ़ी यह खबर याद हो आयी है जिसमें बताया गया कि दक्षिण अफ्रीका में अब पुरुषों की तरह महिलाओं को भी एक से ज्यादा पति रखने की अनुमति देने पर विचार किया जा रहा है, लेकिन यह बात उन लोगों को चुभ रही है जो रूढ़ीवादी सोच रखते हैं। मानवाधिकार समूहों का मानना है कि एक से अधिक शादी का अधिकार सभी के लिए समान होना चाहिए। विख्यात व्यापारी और टीवी की एक जानी-मानी हस्ती की चार बीवियां हैं, लेकिन उन्हें भी महिलाओं को पुरुषों के बराबर दर्जा दिये जाने पर घोर आपत्ति है उनका कहना है कि महिलाएं कभी भी पुरुषों की बराबरी नहीं कर सकतीं। उनकी सोच बिलकुल आपकी जैसी ही है। आपको तो किन्नर इंसान ही नहीं लगते। इसलिए उनके हक पाने के कदम को ही गलत मानते हैं।’’
‘‘पत्रकार, मुझे लगता है तुम्हारी अक्ल का भी दिवाला पिट चुका है। ज़रा आंखे बंद करके खूबसूरत से खूबसूरत हिजड़े के शरीर के नाप-जोख की कल्पना तो करो...। मेरा तो तन-बदन कांपने लगता है। हिजड़े के साथ जिस्मानी रिश्ता...। पत्नी का दर्जा!
‘‘गुरु जी, जिन लोगों को अपनी किन्नरों के रहन-सहन और तहजीब का ज़रा भी भान नहीं है, वे ही उन्हें हिकारत की नज़र से देखते हैं। आपने कभी गंभीरता से सोचने की तकलीफ  नहीं की...कि किन्नर भी औरत और मर्द की पैदाइश हैं, इनकी बदकिस्मत यही है कि इनके मां-बाप भी इनके जन्मने पर माथा पीटते रह जाते हैं। उन्हें अपनी ही संतान का परिचय देने में इसलिए शर्म आती है क्योंकि समाज इन्हें आपकी तरह बदनुमा दाग मानता है। किन्नरों को अपनों से जहां नफरत और दुत्कार मिलती है, वहीं किन्नर समाज अपने में समाहित कर लेता है। किन्नरों के समाज के भी अपने नियम-कायदे हैं जिन्हें तोड़ने पर दण्ड का प्रावधान है।’’
‘आप कितनी भी कोशिश कर लें, लेकिन विधाता के विधान को नहीं बदल सकते। किन्नरों को शादी-ब्याह एवं अन्य खुशी के अवसरों पर नाचने-गाने और दुआएं देने के लिए ऊपर वाले ने धरती पर भेजा है। देखते नहीं, आजकल ये लोग अपराध भी करने लगे हैं। सड़कों, पार्कों, रेलगाड़ियों, बसों चौक-चौराहे, पर जबरन शरीफों को रोक कर पैसों की मांग करते हैं। नहीं देने पर गालियां और बददुआएं देने लगते हैं। कई भरे-पूरे गुदाज बदन वाली किन्नर तो वेश्यावृत्ति में भी लिप्त हैं।’
‘‘दरअसल आप को किसी का अच्छा पक्ष दिखता ही नहीं। आपने जो ठान लिया, बस उसी पर अटल रहते हैं। आपको तो पता भी नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने किन्नर समुदाय को हम सब की तरह माना है। स्त्री-पुरुष की तरह इन्हें भी थर्ड जेंडर की मान्यता मिल चुकी है। वे भी पैतृक संपत्ति के अधिकारी हैं।’’
‘‘पत्रकार जी, बड़ी-बड़ी बातें करना बड़ा आसान है, लेकिन सच ये है कि इनकी सहायता, सुरक्षा और अधिकरों के लिए कितने भी कानून बन जाएं, लेकिन हमारा समाज  इन्हें कभी भी अपने साथ नहीं बिठायेगा। आप लोग थर्ड जेंडर के तप और त्याग की लाख दलीलें देते रहो, लेकिन इन्हें करना वही है जिसके लिए ये पैदा हुए हैं। कभी एक शबनम मौसी विधायक बनी थी तो आप की जमात ने कितनी तालियां पीटी थीं। दो-चार किन्नरों के पढ़-लिख जाने और किसी ओहदे पर पहुंच जाने का यह मतलब तो नहीं कि इन्हें अपने सिर पर बिठा लिया जाए...?’’
‘गुरु जी आप से तो भगवान भी नहीं जीत सकता, लेकिन जिस नये रिश्ते को लेकर आपने वार्तालाप प्रारंभ की थी, उस पर अपनी बात खत्म करते हुए मेरा तो बस यही मानना है कि देश तभी तरक्की करेगा जब ऐसे युवक सामने आएंगे। खुले दिल-दिमाग से थर्ड जेंडर को अपनाएंगे। इससे थर्ड जेंडर को अच्छी जिन्दगी के साथ-साथ अच्छी मौत भी नसीब होगी। आपको भले ही कोई फर्क नहीं पड़ता हो, लेकिन मेरा तो दिल दहल जाता है... बेचारे जीते जी तो अपमानित होते ही हैं, मृत होने पर भी अपने समाज के लोगों के द्वारा जूते-चप्पलों से पीटे जाते हैं...।

Thursday, July 1, 2021

क्या हो रहा है आसपास?

    हम कहां से चले थे, कहां जाना था और कहां आ गये हैं! सम्मान, इज्ज़त, मान-मर्यादा, शालीनता, संवेदनशीलता को तो जैसे अपराधी की तरह चौराहे पर खड़ा कर दिया गया है। जिन्हें थूकना है जीभरकर थूकें। वस्त्रहरण करना है तो बेखौफ होकर करते चले जाएं। कोई रोकने-टोकने वाला नहीं। आज़ाद देश के पूरी तरह से आज़ाद नागरिक जो हैं। दूसरों का मान-सम्मान और अधिव्यक्ति की स्वतंत्रता जाए चूल्हे में...।
    इन दिनों के डरावने नजारे कह रहे हैं कि दोषी तो वही है जो सबसे कमजोर कड़ी है। जितना जुल्म ढाना है, ढा लो, कोई कुछ नहीं बोलेगा। तमाशा देखने के लिए हजारों खड़े हो जाएंगे। बीती रात मैंने एक असहाय लड़की के साथ बलात्कार का वीडियो देखा। लाख कोशिशों के बाद भी भूल नहीं पा रहा हूं। इस वीडियो में पांच शैतान एक लड़की को दबोचे हुए हैं। इनमें एक औरत भी शामिल है। मासूम लड़की को शैतानी जोर-जबर्दस्ती के साथ वस्त्रहीन किया जा रहा है। एक उसके गुप्तांग में अंगूठा तो दूसरा बीयर की बोतल डाल रहा है। पीड़ा से तड़पती लड़की की चीख को दबाने के लिए उसके मुंह में कपड़ा भी ठूंस दिया जाता है। बेबस लड़की को पूरी तरह से अपने बस में करने के बाद उनकी हरकतें और अनियंत्रित होती चली जाती हैं। पगलाये सांड की तरह वे उसे गंदी-गंदी गालियां बकने लगते हैं। इस हैवानियत को देखकर बड़ा गुस्सा आया। नारी को पूजे जाने वाले देश में बेटियों को कैसे-कैसे हवस के भूखे भेड़ियों केे जुल्मों का शिकार होना पड़ रहा है। कुछ ‘प्रबुद्धजनों’ को लड़की के साथ हुई घोर अमानवीयता के इस शाब्दिक चित्रण पर आपत्ति हो सकती है, कहा जा सकता है कि बलात्कारियों ने तो निर्लज्जता की धज्जियां उड़ा दीं, लेकिन लिखने और बताने में भाषा का संयम तो रखा ही जा सकता है। खुल्लम खुला लिखने की क्या जरूरत?  ऐसे चरित्रवानों से यह सवाल कि जब तुम्हारी आंखों के सामने नंगा नाच हो रहा है, तुम सबकुछ देख रहे हो और चुप्पी इसलिए साधे हो कि तुम्हें मज़ा आ रहा है। तुम्हारे लिए तो यह तमाशा है। लेखक इस खून खौला देने वाले सच को लिखने-बताने में क्यों संकोच करे! जिन्हें नहीं मालूम उन्हें भी तो पता चले कि हम कैसे जंगल में रह रहे हैं, जहां जरा सी चूक हमारी बहन-बेटियों को हिंसक पशुओं का निवाला बना सकती हैं।
    क्या ये सच नहीं कि हिंसा, मारपीट और गंदी-गंदी गालियां तो आज हमारे घरों में घुसपैठ कर चुकी हैं। जो अश्लील गालियां कभी छुप-छुपाकर दागी जाती थीं और यह कोशिश भी होती थी कि बच्चों और महिलाओं तक उनकी तैजाबी आंच न पहुंचे, लेकिन आज चीख-चीखकर बकी और बकवायी जा रही हैं। कोविड-19 ने जो खालीपन और जबरन छुट्टियां दीं उस दौरान से वेब सीरीज़ का जो तूफानी दौर शुरू हुआ उसने तो पता नहीं कितनी मर्यादाओं के जिस्म को छलनी करके रख दिया। पहली बार ओटीटी प्लेटफार्म पर देखी एक सीरीज में जब धड़ाधड़ बलात्कार, मारकाट और सड़क छाप गालियां सुनीं तो दिल की धड़कनें बेकाबू होने लगीं। कुछ भी समझ में नहीं आया। इसे वेब सीरीज के निर्माता कौन सी दुनिया से ताल्लुक रखते हैं! क्या इनके घर में मां, बहनें और बच्चे, बुजुर्ग नहीं हैं? इस लेखक ने तय कर लिया कि ऐसी वेब सीरीज परिवार के साथ तो नहीं देखी जाएंगी। अश्लील गालियों के साथ-साथ और भी बहुत कुछ ऐसा है जिससे सिर्फ गुस्सा तथा शर्मिंदगी ही हासिल हुई। भरे पूरे परिवार की हर औरत का सम्मान और गरिमा होती है, लेकिन उसी नारी को बेटे और ससुर के साथ बिस्तर बाजी करते देख नज़रें झुका लेनी पड़ीं। इसके साथ ही इस सच को भी स्वीकारने को विवश होना पड़ा कि हमें उस दौर के द्वार पर पहुंचाया जा चुका है। जिसके अंदर ऐसे नाटकों का मंचन चल रहा है जिन्हें देखने से पहले निहायत ही बेशर्म होना जरूरी है ताकि आप अपने परिवार के साथ नंगा नाच देखकर भी तालियां पीटते रहें। सोशल मीडिया पर एक-दूसरे के बीच नफरत की आग जलाने वाले महा गालीबाज ‘भाऊ हिंदुस्तानी’ जैसे कई चेहरे छाये हुए हैं। उसी की तरह कुछ बदतमीज नेता भी छाये हुए हैं। उन्हीं में से एक हैं गांधी परिवार की महान नेता,  मेनका गांधी कमजोरों की इज्ज़त से कैसे खेला जाता है, कोई इनसे सीखे। वे पशुप्रेमी तथा पर्यावरण प्रेमी हैं। उन्हें पशुओं के साथ क्रूर बर्ताव करने वालों पर गुस्सा आता है, लेकिन इस स्वयंभू महारानी ने किसी के भी कपड़े उतारने का ठेका ले रखा है। उन्हें याद ही नहीं रहता कि वे लोकसभा की सदस्य हैं। देश के जाने-माने राजनीतिक परिवार की बहू हैं। मेनका को बस याद हैं, वो भद्दी-भद्दी धमकियां और घटिया गालियां जो अपने कुछ चम्मचों को खुश करने के लिए बकती और रचती रहती हैं। इस गांधी परिवार की महारानी ने हाल ही में एक पशु चिकित्सक को ऐसे धमकाया जैसे कोई गली का बदमाश अपना दबदबा बनाये रखने के लिए गुंडागर्दी पर उतर आता है। चिकित्सक से किसी के पालतू कुत्ते के इलाज में कोई चूक हो गई थी। कुत्ता इस पूर्व केंद्रीय मंत्री के किसी करीबी का था। उस करीबी ने जानवरों से बेइंतहा (?) प्रेम करने वाली इस गुस्सैल नारी को कुत्ते के साथ हुई बेइंसाफी की जानकारी क्या पहुंचायी कि यह महान नारी अच्छे-खासे डॉक्टर की ऐसी-तैसी करते हुए उसकी नौकरी ही खा जाने की धमकियां देने लगी। मेनका के आतंकी गालीबाज चेहरे को देखकर इस प्रश्न का जवाब भी मिल गया है कि हिंसा और गाली-गलौच से भरपूर वेब सीरीज बनाने वालों को आखिर इतना हौसला और प्रेरणा कहां से मिलती है...।

Thursday, June 24, 2021

आपकी प्रतिक्रिया?

    चित्र-1 : कल तक अपनी मेहनत की बदौलत उनका गुजर बसर चल रहा था। जालिम महामारी ने तो उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा। खुद भूख से तड़प कर मर भी जाते, लेकिन अपने परिवार की भुखमरी और बदहाली को बर्दाश्त कर पाना उनसे नहीं हो पाया। उसके बाद तो उन्होंने ऐसी-ऐसी राहें चुन लीं जो अकल्पनीय थीं। उनकी इच्छा और छवि के अनुकूल ही नहीं थीं। देश के प्रख्यात शहर जयपुर की हस्ती थे बलवंत राय। सोना, चांदी और हीरा के व्यापार में खूब धन और नाम कमाया था इस मेहनतकश स्वाभिमानी इंसान ने। रहने के लिए भव्य कोठी थी, कहीं आने-जाने के लिए कारें थीं। हंसता-खेलता परिवार था। महामारी के दौरान कारोबार ठंडा पड़ गया। उन्होंने बहुत कोशिशें कीं, लेकिन दूसरी लहर तो उन्हें कहीं ओर बहाकर ले जाने की ठान चुकी थी। कर्ज बढ़ने लगा। जिन्हें ऋण दे रखा था, वे कोरोना का रोना रोते हुए अकड़ कर कहने लगे कि जब धंधा ही नहीं है तो कर्ज कहां से चुकाएं। जब हाथ में पैसा होगा तभी देने की सोचेंगे। अभी तो हमें अपनी चिंता करनी है। अपने बाल-बच्चों को हर आफत से बचा कर रखना है। सरल, सहज स्वभाव के बलवंत खुद भी तकलीफ से गुजर रहे थे इसलिए अपनी पैसों की वसूली के लिए दबाव बनाने की बजाय चुपचाप अपने घर लौट आते, लेकिन यहां उनका सामना होता अपने उन बदमाश और क्रूर लेनदारों से जिनके लिए पैसा ही सबकुछ था। बलवंत लेनदारों के पैर पकड़ते, कुछ दिन सब्र करने की फरियाद करते, लेकिन शैतान धनपशु धमकाते हुए कहते, 'कोरोना-वोरोना जाए भाड़ में हमें तो अपनी रकम चाहिए। अभी नहीं दी तो तुम्हारी इज्जत के चिथड़े उड़ाकर रख देंगे। तुम्हारी खूबसूरत बीवी और दोनों बेटे सड़क पर भीख मांगते नजर आएंगे।' रोज-रोज की धमकियों और गंदी-गंदी गालियों की बौछार ने बलवंत का जीना हराम कर दिया। अपना मान-सम्मान चौराहे पर नीलाम होने की चिंता ने रातों की नींद छीन ली। कर्ज न चुका पाने के स्वनिर्मित अपराधा बोध ने दहशत के गर्त में धकेल दिया। कुछ शुभचिंतकों ने बलवंत को सलाह दी कि अपनी जमीन बेचकर कर्ज चुका दो, लेकिन वह नहीं माना। लेनदारों की गुंडागर्दी कम नहीं हुई। कुछ दिन और सब्र करने का हाथ जोड़कर किया गया निवेदन बेअसर रहा। साहूकार उस पर यकीन न करने की जैसे कसम ही खा चुके थे। एक दिन की सुबह तो उन्होंने बलवंत की पत्नी को बेहूदा कटाक्ष कर अपमानित कर दिया जो बलवंत बर्दाश्त नहीं कर पाया। शाम को उसने अपनी पत्नी और दोनों बेटो को फांसी के फंदे पर लटकाने के पश्चात खुदकुशी कर ली। पूरे परिवार की आत्महत्या की खबर जिसने भी सुनी और देखी उसकी तो रूह ही कांप गयी। विशाल कोठी पूरी तरह से खाली हो चुकी थी। लोगों ने कई तरह की चर्चाओं के पिटारे खोल दिये। बलवंत को अपनी इज्जत की यदि इतनी ही चिंता थी तो उसने अपनी कोठी क्यों नहीं बेच दी? करोड़ों की इस कोठी को बेचकर तो वह आसानी से सभी के कर्ज से मुक्त हो सकता था, लेकिन उसकी तो यही जिद थी कि यह कोठी तो उसके बच्चों की अमानत है। जब तक इंसान जिन्दा है तभी तक धन और जमीन-जायदाद भी मायने रखती है। जब इंसान ही नहीं रहा तो करोड़ों की सम्पत्ति मिट्टी ही तो है...।
    चित्र-2 : नारंगी नगर नागपुर के एक रिक्शाचालक ने जब देखा कि कोई साथ देने को तैयार नहीं। किसी से उम्मीद करना भी व्यर्थ है तो उसने लॉकडाउन में ही रिक्शा निकाला और सवारियों की तलाश में यहां-वहां चक्कर लगाने लगा। लॉकडाउन के कारण सभी अपने-अपने घरों में कैद थे। नाममात्र के लोग ही सड़कों पर नज़र आ रहे थे। भटकते-भटकते सुबह से शाम हो गई। एक भी सवारी नहीं मिली। अब तो बस भूख से तड़पते बच्चों का चेहरा ही उसकी आंखों के सामने आ रहा था। वह खुद को दोषी मानते हुए बेहद शर्मसार था। घर का चूल्हा ही न जल पाए तो उसका होना न होना एक बराबर है। चाहे कुछ भी हो जाए, लेकिन आज ऐसा नहीं होने देना है। उसने तुरंत अपने रिक्शे को सड़क के किनारे खड़ा किया और भीख मांगनी शुरू कर दी। पैंसठ वर्षीय पिता के हाथों कुछ ही घण्टों में इतने रुपये तो आ ही गये जिससे परिवार के रात को भूखा नहीं सोना पड़ा। अब तो यह रोज का काम हो गया। जब भी सवारी नहीं मिलती तो रिक्शा को कहीं सुरक्षित स्थान पर खड़ा करने के पश्चात वह हाथ पसारकर खड़ा हो जाता। दो-चार घण्टे में पच्चीस-पचास रुपये मिल ही जाते। कुछ लोग फटकार लगाने से भी नहीं चूकते। उन्हें लगता कि बुड्ढा शराब का शौकीन है इसलिए भीख मांग रहा है। दाल-चावल खरीद कर जब बुजुर्ग घर लौटता तो उसे खुद के भिखारी बनने का सच कचोटता रहता। एक जमाना था जब शहर में साइकिल रिक्शा दौड़ा कर ठीक-ठाक कमायी हो जाती थी। छह-सात लोगों के परिवार को दाल-रोटी का संकट नहीं झेलना पड़ता था। पिछले तीन-चार वर्षों से ई-रिक्शा का चलन बढ़ने से सवारियां भी साइकिलरिक्शा पर बैठना कम पसंद करती हैं। हर कोई जल्द से जल्द अपने गंतव्य तक पहुंचना चाहता है। एक तो पैसंठ पार की उम्र और उस पर दिव्यांग होने के कारण रिक्शा चलाना उसके बस की बात नहीं रही फिर भी उसने कभी हार नहीं मानी थी...। यह किसी एक बलवंत और रिक्शेवाले की दास्तान नहीं है। कोरोना ने तो लाखों भारतीयों को तबाह करके रख दिया है...।
    चित्र-3 : अमीरों ने कोरोना के विकराल वक्त में दिल खोलकर सहायता कर हाथ बढ़ाया, लेकिन सभी तो एक जैसे नहीं हैं। जब लोगों की धड़ाधड़ मौतें हो रहीं थीं तब कई रईस विदेशों की सैर पर निकल गये। कितनों ने अपना वो देश ही छोड़ दिया जहां पर वे पनपे थे। करोड़पति-अरबपति बने थे, लेकिन अब उन्हें भारत नर्क लगने लगा था। उन्होंने अपना वो अतीत भुला दिया जब वे कुछ भी नहीं थे। किसी ने कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की राह पकड़ी तो किसी ने आयरलैंड, पुर्तगाल, ऑस्ट्रिया, माल्टा, साइप्रस, तुर्की जैसों देशों में पनाह ले ली। रईसों के देश को छोड़ने की शुरुआत तो कोरोना की पहली लहर से ही हो गई थी। दूसरी लहर में तो विदेशों में जाकर बसने के इच्छुक लोग वीजा और इमिग्रेशन सर्विस देने वाली कंपनियों के यहां पूछताछ के लिए काफी बड़ी संख्या में पहुंचने लगे। ऐसे धनवानों के दिल दिमाग में इस बात ने घर कर लिया कि जिस देश में हमने उद्योग धंधे खड़े किये, हजारों लोगों को नौकरियां उपलब्ध करवायीं, सरकार को मोटा टैक्स चुकाया, वहां की सरकार यदि हिफाजत नहीं कर पा रही है, आम और खास लोगों को किफायती और जवाबदेह हेल्थकेयर सिस्टम उपलब्ध नहीं करवाया जा रहा है, वहां पर रहने का क्या फायदा! किसी लेखक ने गलत तो नहीं कहा कि इंसान जब ताकतवर हो जाता है तो उसे सिर्फ अपनी ही सूझती है। उसके सामने लाशें भी बिछी हों तो वह उन्हें रौंदते हुए आगे निकल जाता हैै...।

Thursday, June 17, 2021

नाटक-नौटंकी

    एक तरफ सच्चे समाज सेवक हैं, जो कोरोना से बचाव के लिए जागरुकता अभियान चला रहे हैं। वे बार-बार लोगों से कह रहे हैं कि स्वस्थ रहना है तो फौरन वैक्सीनेशन कराओ। सरकारें भी कह रही हैं, टीका लगवाएं, कोरोना हटाएं, लेकिन कुछ अड़ंगेबाज हैं जिन्हें टीके में खोट नज़र आता है। वे नहीं चाहते कि लोग सचेत हों। खुशी-खुशी टीका लगवाएं और स्वस्थ जीवन जीएं। आश्चर्य तो यह भी है कि कई लोग इनके बहकावे में आ रहे हैं। उन्हें झूठे और मक्कार, अफवाहबाजों पर तो भरोसा है, लेकिन सच्चे समाज सेवकों और सरकार पर नहीं। इन्हें झोलाछाप डॉक्टरों और तंत्र-मंत्र के खिलाड़ियों की शरण में जाकर जेबें कटवाना मंजूर है, लेकिन सही जगह पर जाकर सही इलाज करवाना मंजूर नहीं। कोरोना महामारी का प्रकोप अभी भी उन्हें बच्चों को खेल लगता है। भले ही लाखों लोगों की कोरोना की चपेट में आकर मौत हो चुकी है, लेकिन उनका तो अपनी देवी मां पर अटूट विश्वास है। ‘कोरोना माता’ उनका बाल भी बांका नहीं होने देगी। देश के विभिन्न दुर्गम इलाकों में अपना पसीना बहाते हुए जब स्वास्थ्य कर्मचारियों का टीका लगाने के लिए जाना हुआ तो उन्हें ग्रामीणों के अजब-गजब विरोध का सामना करना पड़ा। कुछ स्त्री-पुरुष तो उन्हें मारने-पीटने के लिए डंडे-लाठियां तक उठा लाये। लाख मिन्नतें करने के बावजूद वे टीका लगवाने को तैयार नहीं हुए। चंद्रपुर जिले के कुछ ग्रामों के जिद्दी लोगों की बहसबाजी वाकई हैरान करने वाली थी, ‘आप लोग चाहे कितना जोर लगा लो, लेकिन हम टीका तो नहीं लगवायेंगे। हम अपनी देवी मां के आदेश के खिलाफ नहीं जा सकते। हमारी देवी मां ने हम सबके सपने में आकर कहा है कि भूलकर भी यह खतरनाक टीका मत लगवाना। अगर गलती की तो बच नहीं पाओगे। मैडम, हमारी तो आपको भी यही सलाह है कि चुपचाप अपने-अपने घर जाकर देवी मां की आराधना में लीन हो जाओ। टीके के लिए किसी के साथ भी ज्यादा जोर-जबरदस्ती बड़ी महंगी पड़ सकती है आपको। दूसरों की जान बचाने के चक्कर में आपको अपनी जान तक गंवानी पड़ सकती है।’
    शहरों की पिछड़ी बस्तियों और ग्रामों में ठगी और लूटपाट करने के लिए अंधश्रद्धा के खिलाड़ी-व्यापारी तो कोरोना की पहली लहर के दौरान ही सीना तानकर मैदान में कूद पड़े थे। उनकी तंत्र-मंत्र की दुकानों पर देखते ही देखते भीड़ लगने लगी थी। कोरोना का सत्यानाश करने का झांसा देकर उन्होंने लोगों को डॉक्टरों और अस्पतालों तक जाने से रोकने में बड़ी आसानी से सफलता पा ली थी। झोलाछाप डॉक्टरों तथा तांत्रिकों ने कितने लोगों को मौत के घाट उतारा और कितनों को कंगाल कर दिया इसका अंदाज उनके अंधभक्तों की अपार संख्या से लगाया जा सकता है, जिन्होंने कभी भी न जागने की कसम खा रखी है। भ्रम और दुष्प्रचार के शिकार हुए लोगों को वैक्सीन के लिए मनाने के लिए शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को क्या-क्या पापड़ नहीं बेलने पड़े। प्रलोभन का जाल तक बिछाना पड़ा। देश के एक प्रदेश के विधायक को तो अधिक से अधिक नागरिकों को टीके के प्रति आकर्षित करने के लिए मोबाइल तथा अन्य आकर्षक उपहार देने की घोषणा करनी पड़ी। जो लोग आनाकानी कर रहे थे वे मुफ्त का सामान पाने के लिए दौड़े-दौड़े चले आए। लालच के वायरस तो हर जगह विद्यमान हैं। अमेरिका के वॉशिंगटन में वैक्सीनेशन को बढ़ावा देने के लिए गांजा भेंट में देने का वादा कर ललचाया गया। मुफ्त में गांजा पाने और मदमस्त होकर धुआं उड़ाने की उमंग में टीका लगवाने वालों की कतारें लग गईं। इतना ही नहीं, अमेरिका के कुछ राज्यों में वैक्सीन लगवााने पर हवाई जहाज के टिकट, स्पोटर्स टिकट, स्कॉच और बीयर भी उपहार में दी गयी। अपने देश हिंदुस्तान में अंदर ही अंदर भले ही ऐसे करिश्मों और प्रलोभनों को आजमाया गया हो, लेकिन खबरें तो नहीं सुनने में आयीं। अपने कर्तव्य तथा जिम्मेदारियों से बचने वाले एक से एक बहानेबाज जरूर देखने में आए। कोरोना ने उन्हें बेशर्म बनने का भी हथियार थमा दिया।
    अपने ही देश भारत के प्रदेश बिहार के एक गांव में एक लड़की को अकेले ही मां के शव को दफनाने को विवश होना पड़ा। कोरोना के खौफ के चलते कोई भी रिश्तेदार आसपास नहीं फटका, लेकिन दस दिन बाद आयोजित किये गए श्राद्धकर्म में डेढ़ सौ से ज्यादा लोग भोज का मज़ा लेने के लिए पहुंच गए। सभी का यही कहना था कि हम तो सांत्वना देने आये हैं। इसी बहाने भोज का भी आनंद ले लिया। सच कहें तो मुफ्तखोरों ने देश की तस्वीर ही बिगाड़ कर रख दी है। इन्हीं के कारण लुच्चे-लफंगे चुनाव जीत जाते हैं। ईमानदारों की जमानतें जब्त हो जाती हैं और भ्रष्टाचारी टीवी, फ्रिज, शराब, कंबल, साड़ियां और नोटों से भरे लिफाफे बांटकर विधायक, सांसद और मंत्री तक बन जाते हैं। अपने यहां पिछले कई वर्षों से यही तो होता चला आ रहा है। ईमानदारी, बेईमानी से मात खा जाती है। अफवाहें हकीकत का गला घोंट देती हैं। अधिकांश मीडिया भी नकारात्मक खबरों को उछाल कर आनंदित होता है। टीका लगवाने के बाद शरीर पर लोहा चिपकने की खबर में उसे काफी दम नज़र आता है। पाठक मित्रों की जानकारी के लिए बता दूं कि नासिक शहर के सिडको इलाके के एक बुजुर्ग ने ‘रहस्योद्घाटन’  किया है कि वैक्सीन के दोनों डोज लगवाने के बाद उनके शरीर से लोहे और स्टील की वस्तुएं चिपकने लगी हैं। उनका शरीर चुम्बक बन गया है। कुछ धुरंधरों ने अफवाह फैलायी कि कोरोना का टीका नपुसंक बना देता है। विरोधी पार्टी के कुछ नेताओं ने टीके को ‘मोदी ब्रांड’ घोषित कर दिया। उन्होंने संदेह जताया कि विरोधियों को ऊपर भिजवाने के लिए भाजपा मंडली ने इसका निर्माण किया है। वैज्ञानिकों का इससे कोई लेना-देना नहीं है। वैक्सीन से जितना दूर रहो, उतना अच्छा है। कुछ योगी-भोगी भी पहले तो दहाड़ते हुए कहते रहे कि योग करते रहो, टीके की कोई जरूरत नहीं। बाद में एक-एक कर सभी ने टीका भी लगवाया और शर्मिंदगी से गर्दनें भी झुकानी पड़ीं। इनकी नाटक-नौटंकी से यह तो पता चल गया है कि ये कितने बीमार और दिलजले हैं। शहरों में तो लोगों के घरों तक पहुंचकर टीका लगाया जा रहा है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य कर्मियों को अथाह परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई गांव तो ऐसे हैं जहां इंटरनेट की कोई व्यवस्था नहीं इसलिए वहां के निवासी शहरों में रहने वाले लोगों की तरह टीकाकरण के लिए पंजीयन नहीं करवा सकते। इन्हें टीका लगााने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों को कई-कई टीका लगाने के लिए पैदल भी जाना पड़ रहा है। लेकिन फिर भी उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं। अपना कर्तव्य निभाते हुए वे संतुष्ट और खुश हैं।

Thursday, June 10, 2021

चुनौतियों को चुनौती

    हिवरे बाजार...हां यही नाम है महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित एक शानदार अनुशासित गांव का जिसकी आबादी मात्र दो हजार के आसपास है। इस गांव के सरपंच हैं पोपटराव। पोपट नाम का उच्चारण करने पर कुछ लोगों को अटपटा लगता है। ठहाकों के साथ-साथ मजाक भी सूझता है, लेकिन इस नाम के शख्स को भारत सरकार के अत्यंत प्रतिष्ठित पुरस्कार पद्मश्री के साथ-साथ अनेकों पुरस्कारों, सम्मानों से नवाज़ा जा चुका है। पोपटराव 1990 में हिवरे बाजार के सरपंच बने। पहली बार सरपंच बनने के बाद उन्होंने गांव में विकास की गंगा बहा दी। उसके बाद तो लगातार चुनाव में विजयी होकर वे सरपंच बनते चले आ रहे हैं। उनका दिखावटी विरोध होता है। विरोधी भी उनके मुरीद हैं। हों भी क्यों न, पर्यावरण प्रेमी सरपंच के कारण गांव में सर्वत्र पेड़-पौधे और हरियाली और खुशहाली नज़र आती है। पहले जो गांव रात के अंधेरे में दुबका रहता था अब वह बिजली की रोशनी में चमकने लगा है। गांव वालों ने वो भी दिन देखे हैं जब उनकी बहन-बेटियों तथा उन्हें खुले में शौच के लिए जाना पड़ता था, लेकिन अब घर-घर में शौचालय है। ग्रामीणों के सहयोग से पुल और पुलिया बिछ गयी हैं। अंडरग्राउंड ड्रेनेज पाइपलाइन बिछायी जा चुकी हैं। परिवार नियोजन को अपनाकर जनसंख्या को नियंत्रित कर लिया गया है। स्कूल, विद्यालय, अस्पताल, बाग-बगीचे और सर्वत्र साफ-सफाई हिवरे बाजार की पहचान और शान है। जो गांव कभी सूखे के कारण मुरझाया रहता था। वह हरा-भरा बना दिया गया है। प्याज, आलू और मौसमी सब्जियों की अपार पैदवर से ग्रामीणों के यहां धन बरसता है। जो लोग कभी रोजगार की तलाश में मुंबई, पुणे, दिल्ली चले गये थे, वे भी अपने हिवरे बाजार में लौट आये हैं।
    कोरोना की दूसरी लहर के दौरान जब देश के सभी शहर और ग्रामवासी घबराये हुए थे, उन्हें मौत का भय सता रहा था तब हिवरे बाजार के सरपंच पोपटराव के सशक्त प्रयासों और सावधानियों से तुरंत कोरोना को मात देने में सफलता पा ली गयी थी। मार्च और अप्रैल महीने में ऐसे चिंताजनक हालात थे जब हिवरे बाजार में 52 मरीज हो गये थे। सजग सरपंच ने उनका टेस्ट कराने के बाद कुशल डॉक्टरों की मदद से उन्हें तुरंत इलाज मुहैया करवाया। जिन्हें वेंटिलेटर की जरूरत थी उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया। इसी दौरान एक मरीज की मौत भी हो गई, लेकिन पोपटराव की प्रेरणा, देखरेख और समझाइश के परिणाम स्वरूप शीघ्र ही पूरे गांव से कोरोना का नामोनिशान ही मिट गया। हिवरे बाजार में हर ग्रामवासी ने कभी भी मास्क लगाना नहीं छोड़ा। हर पल सामाजिक दूरी का पालन किया। जब थोड़ा सा भी कोरोना का खतरा दिखा तो अस्पताल जाकर जांच करवायी और जरूरी सावधानियां बरतीं। जो लोग दूसरे गांव जाते वे लौटने पर सैनेटाइज करने और परिवार से अलग रहने की सरपंच की सलाह का पूरी तरह से पालन करते। पोपटराव की बिना किसी से भेदभाव के काम करते चले जाने की ललक और ईमानदारी का दूर-दूर तक डंका बजता है। ग्रामवासी तो उन पर गर्व कर खुद को खुशनसीब मानते हैं। उनके निर्देशों और सुझावों का पालन करने में कोई भी आनाकानी नहीं की जाती। लोगों का विश्वास जीतने की कला से प्रभावित होकर अहमदनगर जिले के कलेक्टर ने इस जनप्रिय सरपंच को 1300 गांवों के प्रधानों को संबोधित करने तथा मदद देने के लिए आमंत्रित किया। कलेक्टर चाहते थे कि सभी जनप्रतिनिधि पोपटराव पवार के सेवाकार्य के तरीकों को अपनाकर अपने-अपने गांव को कोरोना से मुक्त करें।
    आपने और हमने ज्यादतर यही देखा और जाना है कि सरकारी अधिकारी नौकरी से रिटायर होते ही सैर-सपाटा करने, आराम करने, तरह-तरह की मौज-मस्ती की योजनाओं को क्रियान्वित करने में लग जाते हैं। उनके लिए रिटायरमेंट का अर्थ होता है जेल से आजादी। खुले आकाश में परिंदों की तरह उड़ने का सुअवसर, लेकिन राकेश पालीवाल उर्फ आर.के.पालीवाल किसी और ही मिट्टी के बने हैं। उनकी सोच औरों से अलग है।  मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा अन्य प्रदेशों में 35 वर्षों तक आयकर अधिकारी के रूप में पूरी ईमानदारी से अपनी सेवाएं देने वाले आर. के. पालीवाल जब 31 मार्च, 2021 को सेवानिवृत्त हुए तो उन्होंने उसी दिन घोषणा कर दी कि वे घर में तान कर सोने की बजाय समाजसेवा के धर्म को निभाने का निश्चय कर चुके हैं। गांधीवादी विचारक, कथाकार, गजलकार आर. के. पालीवाल सेवानिवृत्ति के दूसरे दिन से ही कोरोना मुक्त गांव अभियान की कंटीली और पथरीला राह पर खुशी-खुशी चल पड़े। उनकी निष्कलंक जनसेवी की छवि का ही असर था कि देखते ही देखते उनकी सोच वाले अन्य कई समाजसेवी उनसे जुड़ते चले गये। फिर तो जैसे बदलाव की लहर सी चल पड़ी।  देश के कई राज्यों में फैले लगभग 40 एनजीओ के जमीनी साथ और सहयोग से देश के 900 गांवों को कोरोना के घातक चंगुल से बचाने का इतिहास रच दिया गया। यह अभूतपूर्व चमत्कार हुआ ग्रामीण क्षेत्रों में जागरुकता लाने और सघन निगरानी की बदौलत। हालांकि यह काम आसान नहीं था, लेकिन आईआरएस अधिकारी पालीवाल और उनकी जागरूक टीम के लोग ग्रामीणों को बार-बार जान का मोल बताकर मास्क लगाने, सुरक्षित दूरी अपनाने और कोरोना का खतरा दिखने पर इलाज से न कतराने का प्रभावी संदेश देते रहे। इसी दौरान उनका कई ऐसे लापरवाह लोगों से भी सामना हुआ जिन पर समझाने-बुझाने का असर ही नहीं होता था। यह लोग डांटने-फटकारने पर जेब में रखा मास्क चढ़ा तो लेते, लेकिन थोड़ी दूर जाने पर फिर जेब में रख लेते। देश में ऐसे ‘बहादुरों’ की तादाद उन लोगों से कहीं ज्यादा है जो नियम-कायदों का पालन करते हैं। चिंतक, विचारक पालीवाल के अनुभवों का निचोड़ यह भी है कुछ लोग हमेशा असंतुष्ट रहते हैं। वे लोग समाज और देश के लिए कुछ नहीं करते। बस हमेशा हालातों का रोना रोते रहते हैं। यह लोग यह मान चुके हैं कि हालात इतने बदतर हैं कि उन्हें सुधारना किसी के बस की बात नहीं। यह तमाम बकबकवादी, हताशावादी और निराशावादी लोग पहले दुनिया भर की लापरवाही बरत कर अपने घर को कोरोनामय करते हैं। आस-पड़ोस और कॉलोनी में संक्रमण फैलाते हैं। कोई सजग नागरिक जब मास्क तथा अन्य सावधानियां अपनाने का सुझाव देता है तो आनाकानी करते हुए उसी की खिंचाई करने में लग जाते हैं। ऐसे अजूबे चेहरे जब कोरोना की चपेट में आकर अस्पताल में भर्ती होते हैं तो वहां की कमियां गिनाते हुए डॉक्टरों, नर्सों, कंपाउडरों को कोसने लगते हैं। महात्मा गांधी कहते थे जब तक हम नहीं सुधरेंगे तब तक दुनिया भी नहीं सुधरेगी। इसलिए पहले खुद को तो बदलो। आर.के.पालीवाल, राकेश कमर के नाम से सार्थक गजलें और कविताएं लिखते हैं। उनकी लिखी एक कविता का शीर्षक है, गिरगिट और आदमी।
‘गिरगिट तो
केवल बदलता है रंग
सुरक्षा या शिकार के लिए
 बदलता है आदमी
और कई चीजें, रंग के अलावा
मसलन गुट, दल, कैंप, हावभाव,
प्रेमनिष्ठा, दोस्ती, दुश्मनी
और यहां तक माई बाप भी
अपने स्वार्थ के लिए’

    कोरोना की दूसरी लहर ने देशवासियों को झकझोर दिया था। लाखों लोग मौत के हवाले हो गये। कइयों ने अपनों को खोया। बच्चे अनाथ हो गये। बहुतों का सर्वस्व लुट गया। खतरा अभी भी टला नहीं है। भले ही लॉकडाउन हटा दिया गया है। महामारी की तीसरी लहर की आशंका बनी हुई है। कहा जा रहा है कि अगस्त महीने में तीसरी लहर धमाका कर सकती है। इस बार बच्चों पर खतरा मंडरा रहा है। यदि ऐसा होता है तो इसके लिए भी हमारी लापरवाहियां, साजिशें, चालाकियां, होशियारियां और गुस्ताखियां ही कसूरवार होंगी। इसलिए सावधान...।