चीन में कानून बनाया जा रहा है। बच्चों की करनी की सज़ा मां-बाप को भी मिलेगी। संतानों के अपराधी होने पर उन्हें भी कसूरवार ठहराया जायेगा। जब कोई किशोर मारपीट, नशा-पानी या और कोई छोटा-बड़ा अपराध करता पाया जायेगा तो अंतत: यह माना जाएगा कि माता-पिता की अनदेखी, लापरवाही, अच्छे संस्कार और शिक्षा देने की कमी के चलते बच्चे ने गलत राह पकड़ी है। इसलिए बच्चे के साथ-साथ वे भी दंड से नहीं बच सकते। अपने देश भारत में ऐसा कोई कानून नहीं। निकट भविष्य में इसके बनाये जाने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं, लेकिन फिर भी अपनी नालायक संतानों के कारण मां-बाप को किसी न किसी रूप में अपमान के कड़वे घूंट पीने के साथ-साथ मानसिक कष्ट तो भोगने ही पड़ते हैं। वे मां-बाप जो खुद अपराधी प्रवृत्ति के हैं, उन्हें तो कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका बच्चा बड़ा होकर चोर, डाकू, हत्यारा, नशेड़ी बने इसकी चिंता और परवाह करने की उनके पास फुर्सत ही कहां होती है। असली मरण तो शरीफों का होता है, जिनकी औलादें गलत संगत या किसी और कारण से भटक जाती हैं और उनके माथे पर कलंक का टीका लगाती हैं। समाज उन्हीं की परवरिश पर उंगली उठाता है। वह तो उनपर भी शंका करने लगता है। अपराध अमीरों की औलादें भी करती हैं, गरीबों की भी। मध्यम वर्ग के बच्चे भी इससे अछूते नहीं। नशा करने के रोग से न तो गरीबों की औलादें बची हैं और न ही अमीरों की। गरीब सस्ता नशा करते हैं और अमीर महंगा। यह जान और सुनकर हैरानी होती है कि रईसों की पैदाइशें नशे में लाखों रुपये फूंक रही हैं। यह लाखों रुपये आखिर तो उन्हें अपने मां-बाप से ही मिलते होंगे। चोरी, हेराफेरी हर रोज तो नहीं की जा सकती। नशा करने के लिए रोज पैसे चाहिए। जिनके यहां बेहिसाब काला धन बरसता है उन्हीं के यहां के लड़कों की तो मौज ही मौज होती है, लेकिन यह मौज पहले तो ऊपरी खुशी देती है, फिर संकट के पहाड़ खड़ा करते हुए होश ठिकाने भी लगाती है। नाम पर बट्टा अलग से लगता है।
वर्षों पहले अभिनेता संजय दत्त ने जब ड्रग का कसकर दामन थामा था और दाऊद इब्राहिम, अबू सालेम जैसे देश के दुश्मनों के करीबी पाये गये थे, तब उसके पिता सुनील दत्त का तो जीना ही मुहाल हो गया था। सर्वधर्म समभाव के जबरदस्त हिमायती सुनील दत्त एक बेइंतहा सज्जन इंसान थे। एक तरफ वे अपने महाबिगड़ैल बेटे को सुधारने की जद्दोजहद कर रहे थे तो दूसरी तरफ कानून का शिकंजा था, जिससे उन्हें किसी भी तरह से अपने पुत्र को बचाना था। कानून तो अपना काम करता है। देश-विदेश में इलाज करवाने के पश्चात बेटे को नशे की जंजीरों से मुक्त करवाने में तो शरीफ पिता ने काफी हद तक सफलता पा ली, लेकिन जेल जाने से नहीं बचा पाये। जिस परिवार की संतान जेल की काली कोठरी में बंद हो उसे भला नींद कैसे आ सकती है। अपराधी बेटा जेल में बंद था और बाहर पिता को वकीलों, राजनेताओं, सत्ताधीशों और पता नहीं किन-किन ताकतवर लोगों के घरों के चक्कर काटने पड़ रहे थे। कल तक नतमस्तक होकर आदर-सम्मान देने वाले नजदीकी लोग भी कन्नी काटने और ताने देने लगे थे। कैसे लापरवाह पिता हो, जो अपने इकलौते बेटे को भी नहीं संभाल पाये। खुद तो समाजसेवी बने फिरते हो, लेकिन बेटा आतंकवादियों के साथ उठता-बैठता है। वर्षों तक जेल की सलाखों के पीछे रहे संजय दत्त की बहनों का भी घर से बाहर निकलना दूभर हो गया था।
जैसा हश्र कभी अभिनेता सुनील दत्त का किया गया था, वैसी ही दुर्गति का सामना फिल्म अभिनेता शाहरुख खान को करना पड़ा। उनके दुलारे बेटे को भी ड्रग्स लेने की आदत के कारण जेल जाना पड़ा। यहां भी कानून ने अपना काम किया, लेकिन शाहरुख खान को अपनी रातों की नींद की कुर्बानी देने के साथ जिस-तिस की गालियां और तोहमतें झेलनी पड़ीं। उनकी पत्नी गौरी खान पर भी तंज कसे गये। उनकी बाथरूम में नशा करने की दास्तानें सोशल मीडिया में छायी रहीं। राजनीति करने वालों ने भी जी भरकर नाटक-नौटंकी की। इसके पीछे अभिनेता की दौलत की बहुत बड़ी भूमिका होने की कई-कई बातें हवाओं में तैरती रहीं। अभिनेता सुनील दत्त की सादगी और बेहतरीन साख ने उन्हें देश ही नहीं विदेशों में भी ख्याति दिलायी थी। वे थे तो कट्टर कांग्रेसी, लेकिन कभी भी उन्होंने यह नहीं कहा कि मेरी नापसंद पार्टी और उसका नेता देश का प्रधानमंत्री बना तो मैं देश छोड़ दूंगा। सुनील दत्त ने हमेशा लोकतंत्र की कद्र की और जनमत को सर्वोपरि माना। उन्होंने देश में कमाया धन देश में ही लगाया। दुबई, अमेरिका, कनाडा आदि में अरबों-खरबों की सम्पत्तियां नहीं खरीदीं। दुश्मन देश की तरफ उनका कभी भी झुकाव नजर नहीं आया। यही वजह रही कि वे निरंतर लोकसभा का चुनाव जीतते रहे। उन्हें मंत्री भी बनाया गया। उन पर बस बेटे के कुकर्मी होने का एक ही दाग लगा। इसी वजह से उन्हें यहां-वहां नाक रगड़नी पड़ी, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी। कल्पना तो शाहरुख ने भी नहीं की होगी कि उसे अपने नशेड़ी बेटे की वजह से इतने बुरे दिन देखने पड़ेंगे। वैसे भी भारत के फिल्मी सितारों की कलई खुल चुकी है। चेहरे की सारी की सारी फेयर एंड लवली धुल गई है। कोविड-19 ने भारतीयों के दिमाग पर लगे ताले खोल दिये हैं। उनके लिए अब फिल्मी सितारे नायक नहीं रहे। देश के लिए मेडल लाने और कोरोना में देशवासियों के काम आने वाले ही उनके असली महानायक हैं। नकली नायकों को तो अब दर्शकों का भी टोटा पड़ने वाला है। सड़कों पर निकलेंगे तो कोई ताकेगा भी नहीं। दर्शकों को बेवकूफ बनाकर जितना लूटना था। लूट चुके। अब और नहीं। बहुत झेला जा चुका है इन्हें। अपनी करनी का फल तो हर किसी को भोगना ही पड़ता है। यहां यह कहना कि ‘करे कोई और भरे कोई’ जंचता नहीं। अपनी संतान के पापों का दंड तो मां-बाप को किसी न किसी तरह से भोगना ही पड़ता है, लेकिन इतना भी नहीं। इसकी भी सीमा होनी चाहिए। लोगों को इस कदर भी निर्दयी नहीं होना चाहिए कि सामने वाले को पूरी तरह से नंगा करने पर उतर आएं, जिससे उसके लिए सिर उठाकर चलना भी मुश्किल हो जाए...। दुनिया के किसी मां-बाप को अपनी औलाद का पथभ्रष्ट होना अच्छा नहीं लगता। माता-पिता गरीब हों या अमीर अपने दुलारे की जेल की यात्रा तो उन्हें जीते जी मार देती है। इससे बुरा मंज़र तो और कोई हो ही नहीं सकता...।
Thursday, October 28, 2021
ऐसे भी मिलती है सज़ा!
Thursday, October 21, 2021
क्या इन्हें हार पहनाएं?
उनका कहना है कि ‘सकारात्मक’ खबरें छापो। नकारात्मक खबरें पाठकों को बेचैन कर देती हैं। उनकी मानसिक सेहत पर बुरा असर डालती हैं। वे चिंता और भय से ग्रस्त हो जाते हैं। किसी अबोध बच्ची पर बलात्कार की खबर पढ़ते ही उनकी कंपकंपी छूटने लगती है। उनके सामने अपनी बेटी का चेहरा घूमने लगता है। उसकी सलामती के लिए दुआएं मांगने लगते हैं। उन्हें आतंकवादियों, हत्यारों को फांसी के फंदे पर लटकाया जाना भी अच्छा नहीं लगता। यह लोग बुद्धिजीवी हैं। इनकी बुद्धि रॉकेट से भी तेज दौड़ती है। अपनी इसी बुद्धि के दम पर तरह-तरह के गुल खिलाते चले आ रहे हैं। फांसी के खिलाफ यह जागरुकता लाना चाहते हैं। इन्हें अफजल गुरू और कसाब को फांसी के फंदे पर लटकाया जाना घोर राक्षसी कृत्य लगा था। इन्होंने याकूब को फांसी की सज़ा सुनाये जाने पर सड़कों पर जुलूस निकाले थे। ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे लगाये थे। इनकी जुबान ने सरकार, कानून और अदालत के खिलाफ ज़हर उगला था। इनके हिसाब से याकूब को फांसी की सजा सुनाकर घोर अन्याय किया गया था। इंसानियत की गर्दन काट कर रख दी गई थी। उससे सहानुभूति दर्शाने वालों ने आधी रात को न्यायालय पर दस्तक देने की पहल की थी और देश की महानतम अदालत ने अपने दरवाजे खोलकर देशद्रोही, हत्यारे के पक्ष में रखे गये एक-एक शब्द को बड़े ध्यान से सुना और समझा था। भारत माता के सीने को छलनी करने वाले माफिया सरगना खूंखार हत्यारे दाऊद इब्राहिम के साथी याकूब के पक्ष में ताल ठोकने वालों ने बार-बार यह हल्ला मचाया था कि उसे मुसलमान होने की सज़ा मिल रही है। कोई हिंदू होता तो माफ कर दिया जाता।
12 मार्च, 1993 के उस दिन को आप भी नहीं भूले होंगे, जब मुंबई में बम ब्लास्ट कर 257 निर्दोषों की जान तथा 700 से अधिक लोगों को बुरी तरह से लहूलुहान कर घायल कर दिया गया था। इन घायलों में कुछ इलाज के दौरान चल बसे थे तो कई जिन्दगी भर के लिए अपंग होकर रह गये। एक दर्जन से अधिक जगहों पर बम-बारूद बिछाकर पूरे देश को दहलाने वाले इस खूनी कांड की साजिश में याकूब अब्दुल रजाक मेमन प्रमुखता से शामिल था। पंद्रह वर्ष तक चले मुकदमे में इस नृशंस हत्यारे, राष्ट्र द्रोही को फांसी की सज़ा सुनायी गई थी। जिसे रुकवाने के लिए देश के कुछ नामी वकील, समाजसेवी, नेता, साहित्यकार घायल शेर की तरह पिल पड़े थे। मेमन के यह खास रिश्तेदार बमों से मार दिये गये मृतकों के परिवारों से मिलने का समय नहीं निकाल पाये। घायलों से भी इन शैतानों ने मिलना और उनका हालचाल जानना जरूरी नहीं समझा। इन लुच्चों और टुच्चों को 2001 में संसद पर हुए आतंकी हमले के सरगना मोहम्मद अफजल गुरू को 2013 में फांसी पर लटकाये जाने पर भी कानून और सरकार पर बड़ा गुस्सा आया था।
हाल ही में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने मुंबई से गोवा जा रहे क्रूज में रेव-ड्रग्स पार्टी की मौज-मस्ती में तरबतर नशेड़ियों को पकड़ा तो हिंदू-मुसलमान के गीत गाने वाले चिरपरिचित हंगामेबाज अपनी औकात दिखाना नहीं भूले। नशे में झूमती रईसों की बिगड़ी औलादों में खरबपति फिल्मी कलाकार शाहरुख खान का पुराना नशेड़ी बेटा आर्यन खान भी शामिल था। एनसीबी के अधिकारियों ने पूरी खोज-खबर लेने के बाद नशे की रंगीन पार्टी पर छापेमारी की थी। उनका हिंदू-मुसलमान से कोई लेना-देना नहीं था। समंदर के अंदर नशे में डगमगाते क्रूज में दबोचे गये चेहरों में हर धर्म के नशेबाज थे। एनसीबी की इस प्रेरक कार्रवाई की हर समझदार भारतवासी ने जी खोलकर तारीफ की, लेकिन इन दूरबीनधारियों को बस आर्यन खान के पकड़े जाने के गम ने गमगीन कर दिया। हाय! फिर एक मुसलमान के साथ घोर अन्याय कर डाला कानून और सरकार ने!! नशे के दलदल में धंसे या धंसने जा रहे अन्य धर्म के युवक-युवतियों से सहानुभूति दिखाने और उनका नाम लेने से ये ऐसे बचते रहे, जैसे वे तो लावारिसों की औलादें हों और आर्यन खान से कोई पुरानी अटूट रिश्तेदारी हो। खास धर्म का तबला बजाने वाले यह कहने से भी नहीं चूके कि एक बच्चे के साथ बड़ी बेइंसाफी हुई है। उसका मासूम खूबसूरत चेहरा उसके बेकसूर होने की गवाही दे रहा है। एनसीबी के निष्ठुर अधिकारी भेदभाव के रास्ते के राही हैं। पकड़ना भी था तो किसी मुस्टंडे को पकड़ते, जो सारी दुनिया देख चुका होता। इस अबोध बच्चे ने अभी देखा ही क्या है! नशा ही तो करता है। कोई कत्ल तो नहीं किया। सच तो यह है कि इस तेईस साल के मासूम बच्चे की देखा-देखी पता नहीं कितने और बच्चे ड्रग्स की जहरीली बोतल में बंद होकर रह गये होंगे इसकी भी तो कल्पना और चिंता की जाए। यह भी सच्चे मन से सोचा जाए कि इनकी इस लत ने न जाने कितना धन ड्रग माफियाओं की तिजोरी में भरा होगा। ड्रग माफिया और आतंकवादी एक दूसरे के प्रतिरूप हैं। देश की युवा पीढ़ी को नशे के दलदल में धकेल कर ये जो धन पाते हैं उसी से तबाही के बम-बारूद खरीदे जाते हैं और याकूब मेमन, अफजल गुरू, कसाब आदि-आदि भारत माता को बार-बार लहूलुहान करने की हिम्मत पाते हैं। हिन्दुस्तान में सर्वज्ञात और छिपे हुए गद्दारों की कमी नहीं है। यह बहुरुपिये राष्ट्र के दुश्मनों का साथ देकर देशद्रोह भी करते हैं और मौका और मौसम देखकर गांधी जयंती पर चरखा कातने भी बैठ जाते हैं। अहिंसा के पुजारी बापू के नाम पर बट्टा लगाने वालों को आप बड़ी आसानी से पहचान सकते हैं, जो खूंखार आतंकवादियों का अकसर साथ देते नज़र आते हैं। नक्सली तो इनके दिल में बसे हैं। आतंकवादियों के लिए आंसू बहाने और उनके लिए खाद-पानी का इंतजाम करने वालों को जेल नहीं तो कहां भेजा जाए? जेल की हवा ने आर्यन खान की अक्ल ठिकाने लगा दी। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अधिकारियों के समक्ष अपने गुनाह को कबूल करते हुए उसने कहा कि अब कभी भी वह ड्रग्स का चेहरा नहीं देखेगा। कैद के अंधेरे ने उसमें उजाला भर दिया है। अब वह खुद को बदल कर दिखायेगा। वो दिन ज्यादा दूर नहीं जब लोग उसे गरीबों की मदद करते देखेंगे। जो लोग आज उससे नफरत कर रहे हैं कल वे भी उसके बदले चेहरे को देखकर तारीफें करते नज़र आयेंगे।
Thursday, October 14, 2021
कसूर बेकसूर
मोबाइल पर यह मैसेज पढ़ते ही मैं अनुराग के घर जाने के लिए निकल पड़ा, ‘‘मेरी अब जीने की इच्छा नहीं रही। मेरी खुदकुशी की खबर कभी भी आपको मिल सकती है।’’ उसका घर मेरे घर से ज्यादा दूर नहीं था। मात्र आठ किमी का फासला था। ड्राइवर ने घर के सामने कार रोकी। मैं भागा-भागा घर के अंदर गया। वहां तो मजमा लगा था। पता चला कि अनुराग तो फांसी के फंदे पर झूल ही गया था, लेकिन यह तो अच्छा हुआ कि ठीक उसी समय ड्यूटी से लौटी उसकी पत्नी की फुर्ती और सतर्कता ने उसकी जान बचा ली। डॉक्टर उसको देखकर जा चुका था। अब कोई चिन्ता की बात नहीं थी। हां, यदि अनुराग की पत्नी के पहुंचने में किंचित भी देरी हो जाती तो वह सदा-सदा के लिए शांत हो चुका होता। अड़ोसियों, पड़ोसियों के चले जाने के बाद मैंने पहले तो अनुराग को फटकार लगायी फिर उसकी इस कायराना हरकत की वजह जानी। अनुराग जिस कॉलेज में बीते पंद्रह साल से लेक्चरर है, वहीं की साथी लेक्चरर ने उस पर बलात्कार का आरोप लगाते हुए बाकायदा थाने में रिपोर्ट दर्ज करवायी थी। उसका आरोप था कि पहले तो उस पर डोरे डाले गये फिर शादी करने का आश्वासन देकर यौन संबंध बनाये गये। वह इस सच से बेखबर थी कि अनुराग शादीशुदा है। वह पूरा भरोसा कर बार-बार उसके साथ हमबिस्तर होती रही, लेकिन कुछ महीनों के बाद वह कन्नी काटने लगा। इस बीच पता चल गया कि वह तो हद दर्जे का धोखेबाज है, जिसने बाल बच्चेदार होने के बावजूद मुझे अपने जाल में फंसाया।
दूसरी तरफ अनुराग बार-बार कहता रहा कि उसे किसी गहरी साजिश का शिकार बनाया गया है। उसने कभी भी उस पर गलत निगाह नहीं डाली। यौन शोषण तो बहुत दूर का अपराध है, जिसे करने की वह कभी कल्पना ही नहीं कर सकता। इस महिला के चरित्रहीन होने का उसे पहले से पता था। इसलिए अकेले में बात करने से कतराता था, लेकिन यही गलत इरादे से मेरे निकट आने की अश्लील कोशिशें करती रहती थी। दोन-तीन बार मैंने इसे फटकारा भी था। अनुराग की सभी दलीलें अनसुनी रह गयीं। इसी दौरान अनुराग की पत्नी को पता चला कि वह पहले भी दो पुरुषों को अपने जाल में फंसा कर उनसे काफी रुपये ऐंठ चुकी है। अनुराग की पत्नी उनसे मिली। वे भी उसके खिलाफ आगे आने को तैयार हो गये। अनुराग की पत्नी ने आरोप लगाने वाली महिला को पूरी तरह से बेनकाब करने का भय दिखाया, तो वह हाथ-पांव जोड़ने लगी और उसने अदालत में अपने आरोपों को वापस लेते हुए माफी मांगी। अनुराग बलात्कार के घिनौने आरोप से बरी तो हो गया, लेकिन उसकी जिन्दगी दागदार हो गयी। जिस दिन उसने थाने का मुंह देखा, जेल की हवा खायी उसी दिन उसकी सामाजिक मौत हो गयी। किसी को मुंह दिखाना मुश्किल हो गया। उसे बस यही लगता कि भरे बाजार उसे नंगा किया जा चुका है। लोग उस पर थू-थू कर रहे हैं। दोस्तों और रिश्तेदारों को सफाई देते-देते वह थक चुका था। उसी का नतीजा था यह फांसी का फंदा, जिस पर झूल कर वह अपना खात्मा करने जा रहा था।
अनुराग की पत्नी तो अभी भी भयग्रस्त थी। वह मुझसे बस यही कहती रही कि भाईसाहब आप ही इन्हें समझायें। मैं तो थक चुकी हूं। जो होना था हो चुका। फिर कभी ये ऐसी गलती न करें। मैं हमेशा तो इनके करीब नहीं रह सकती। बात करते-करते मुझसे भी यह नजरें चुराने लगते हैं। मुझे तो कभी भी इन पर अविश्वास नहीं हुआ। जब उस कुलटा ने इन पर लांछन लगाये थे तब भी इनके साथ खड़ी थी। मैंने कभी भी दूसरों की नहीं सुनी। क्या इनका भी फर्ज नहीं बनता कि हमारे लिए अतीत को भुलाकर नये सिरे से जीना प्रारंभ कर दें। इन्हें निराश और उदास देखकर बच्चे भी चौबीस घण्टे बुझे-बुझे रहते हैं। अनुराग के घर से मैं लौट तो आया, लेकिन उसका पत्थर सा चेहरा मेरी आखों से ओझल नहीं हो पाया। रात भर मैं उसी के बारे में सोचते-सोचते आसिफ और अरविंद तक जा पहुंचा। आसिफ मेरे बचपन के दोस्त इकबाल का बेटा है, जिसे पुलिस ने दिल्ली में हुए बम धमाके के आरोप में बंदी बनाया था। आसिफ का घर पानीपत में था। जिस दिन धमाका हुआ उस दिन वह दिल्ली में ही था। विस्फोट स्थल के निकट होने की वजह ने उसे हथकड़ियां पहना दीं, जिनसे बाइज्ज़त आजाद होने में उसे दस वर्ष लग गये। गिरफ्तारी के बाद उसको आतंकवादी और देशद्रोही करार दे दिया गया। पुलिस ने तो उसकी अंधाधुंध पिटायी कर जान ही निकाल लेनी चाही, लेकिन उसने अपराध कबूल नहीं किया। पुलिस चाहती थी कि वह किसी तरह से धमाके में शामिल होने की जिम्मेवारी स्वीकार कर ले। वकीलों की मोटी-मोटी फीस चुकाने में उसका घर बिक गया। पिता चल बसे। जिस पढ़े-लिखे परिवार की बेटी से उसकी शादी होने वाली थी, उन्होंने भी मीडिया की तरह उसे आतंकवादी मानते हुए अपनी बेटी को किसी अन्य युवक से ब्याह दिया। देश की अदालत ने तो उसे अंतत: बरी कर दिया, लेकिन समाज तो अभी तक उसे अपराधी माने हुए है, जिससे उसकी जिन्दगी का पूरा ताना-बाना तहस-नहस हो चुका है। वह जहां कही नौकरी मांगने गया वहां से दुत्कार कर भगा दिया गया। जो युवक कभी कलेक्टर बनने के सपने देखा करता था आज मोहल्ले में पान दुकान लगाये बैठा है। वर्षों तक बरपी मानसिक और शारीरिक यातनाओं के कारण उसके शरीर में ज्यादा भाग-दौड़ करने की ताकत भी नहीं बची।
अरविंद ने प्रापर्टी और दवाइयों के कारोबार में करोड़ों कमाये। वर्षों तक व्यापार करने के पश्चात अपने बचपन के शौक को पूरा करने का मन में विचार आया तो हिन्दी की एक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन प्रकाशन प्रारंभ कर दिया। इसी दौरान अरविंद का एक ऐसी नारी से पाला पड़ा, जो खुद को अनुभवी पत्रकार बताती थी और महीनों से बेरोजगार थी। अरविंद ने उसे काम पर रख लिया, लेकिन कुछ ही दिनों में अरविंद को समझ में आ गया कि उसका काम पर ध्यान कम रहता है। वह तो अपने सम्पादकीय सहयोगियों से इधर-उधर की बातें और गप्पे मारने में अपना अधिकांश वक्त बिता देती है। ऐसे में अरविंद ने वही किया, जो हर समझदार मालिक करता है। अरविंद के काम छोड़कर चले जाने के आदेश को सुनते ही वह तरह-तरह की बकवासबाजी करते हुए अपनी असली औकात पर उतर आयी, ‘‘आप मुझे जानते नहीं, मैं आपको रेप के आरोप में जेल भिजवा सकती हूं। मैंने आपकी नीयत को पहले ही भांप लिया था। इसलिए मैंने अपने यू-ट्यूब चैनल के दोस्तों को आपकी जासूसी पर लगा दिया था। अब तो आपको हमें दस लाख रुपये देने होंगे या फिर जेल जाना होगा। आपकी यह साहित्यिक पत्रिका हमेशा-हमेशा के लिए बंद हो जाएगी। इसके साथ ही इज्जत के भी परखच्चे उड़ जाएंगे। यह तो आपको पता ही है कि कानून महिलाओं की पहले सुनता है। बलात्कार कोई छोटा-मोटा अपराध नहीं है, जो आपने मेरे साथ किया है...।’’ अरविंद को अपनी भूल पर गुस्सा आया। उसने इस शातिर ब्लैकमेलर युवती को आंख बंद कर नौकरी पर रख लिया था। युवती की धमकी के दूसरे दिन से उसके गिरोह के ब्लैकमेलरों के भी दस लाख रुपयों के लिए फोन आने लगे। अरविंद बिना देरी किए पुलिस अधिकारी से मिला और पूरी हकीकत बयां कर दी...।
Thursday, October 7, 2021
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एक तरफ तरह-तरह की अवधारणाओं और जंजीरों को तोड़ने के ताकतवर सफर का सिलसिला है, जो सदियों तक याद रहने वाला इतिहास लिख रहा है, दूसरी तरफ वही पुराना अनंत उत्पीड़न है, वहशीपन है, जो खत्म होने को तैयार नहीं! केरल के त्रिशूल जिले की सुबीना रहमान को हिंदू श्मशान घाट पर शवों का दाह संस्कार करते हुए तीन वर्ष से ज्यादा हो चुके हैं। सुबीना से लोग अक्सर सवाल करते हैं कि मुसलमान होकर भी हिंदुओं का दाह संस्कार क्यों करती हैं, तो वह उन्हीं से पूछती हैं कि आप ही बताएं कि मौत का किसी जात-पात और धर्म से कोई नाता है? हर इंसान के खून का रंग भी तो एक-सा लाल है और हर किसी को खाली हाथ अपनी अंतिम यात्रा पर जाना है...। फिर कैसा भेदभाव और दूरियां! मेरे लिए तो इंसानियत से बढ़कर और कोई मजहब नहीं...। आपसी सद्भाव और मानवता की यह सच्ची साधक रोज सुबह श्मशान घाट पहुंच पीतल का दीया जलाकर शवों के दाह संस्कार की तैयारी में लग जाती है। पहले तो शवों की संख्या ज्यादा नहीं होती थी। कुछ आराम करने का वक्त मिल जाता था, लेकिन कोविड-19 ने एकाएक मृतकों की तादाद इतनी अधिक बढ़ा दी कि दो पल राहत की सांस लेना भी मुश्किल हो गया था। फिर भी सुबीना कतई नहीं घबरायी। कोरोना महामारी के हाथों असमय मारे गये लगभग ढाई सौ लोगों के शवों का अंतिम क्रियाकर्म कर चुकी इस अकेली जान को घंटों पीपीई किट में जलती चिताओं की तपन से पसीना-पसीना होते देख लोग हैरत में पड़ जाते थे, लेकिन सुबीना के चेहरे पर कोई शिकन नहीं होती थी। ऐसा लगता जैसे वह किसी पूजा-अर्चना में तल्लीन है। हां, कई बार उसे इस बात का अफसोस जरूर होता था कि कई मृतकों के परिजन बीमारी, महामारी के डर से उनकी अंतिम यात्रा में शामिल नहीं होते थे। अग्नि देना तो बहुत दूर की बात थी।
हिम्मती सुबीना यह कहने में भी कभी कोई संकोच नहीं करती कि उसके इस पेशे में आने का एक कारण धन पाना भी है, जिससे उसके परिवार का भरण-पोषण होता है और बीमार पिता का समुचित इलाज भी हो पा रहा है। वह तो बचपन में पुलिस अधिकारी बनने के सपने देखा करती थी...। भाग्य में जो लिखा था, उससे भागना संभव नहीं हो पाया। वैसे यह मेरी खुशनसीबी ही है, जो ऊपर वाले ने मुझे इंसानी फर्ज़ और धर्म को निभाने की ताकत बख्शी है...। भारतीय समाज में नये कदमों और नये विचारों को पूरे मनोबल और निर्भीकता के साथ आत्मसात करने वाली नारियों की कभी कमी नहीं रही। पुरुषों को चुनौती देती चली आ रही संघर्षशील महिलाओं के रास्ते में कंटक बिछाने की साजिशें हमेशा होती आयी हैं। नारियों की उदारता, सहनशीलता और समर्पण भावना की पहचान पुरुष को अभी भी नहीं हो पायी! सच तो यह है कि उसकी गहराई और विशालता का पता लगा पाना आज भी दंभी और स्वार्थी पुरुषों के बस की बात नहीं। स्त्री-पुरुष में पिता, भाई और प्रेमी का चेहरा तलाशती है, लेकिन पुरुष देह के चक्रव्यूह से बाहर ही नहीं निकल पाता। सच्चे प्रेम को लेकर भी नारियां जितनी गंभीर हैं, पुरुष नहीं। बुरे समय में पुरुषों का साथ देने में नारियां अपना सबकुछ अर्पित कर देने में नहीं हिचकिचातीं। बेटियां तो पिता की दुलारी होती हैं। मां से ज्यादा वे पिता के करीब होती हैं। उनके जीवित रहने और गुजर जाने के बाद भी। हर पिता भी अपनी दुलारी को हमेशा खुश देखना चाहता है। पुत्री की हल्की-सी उदासी उसे गमगीन कर देती है। उसकी रातों की नींद तक उड़ जाती है, लेकिन कुछ बाप सिर्फ पाप हैं। कहने को वे अपवाद हैं, लेकिन इन्हीं दुष्टों ने पवित्र रिश्तों पर ऐसी कालिख पोत दी है, जिसे मिटाना आसान नहीं।
पेशे से डॉक्टर रजनी के पिता की बीते वर्ष कोरोना से मौत हो गई थी। पिता को मुखाग्नि देने के लिए जब इधर-उधर देखा जा रहा था, तब रजनी ने बेटी होने के बावजूद बेटे का फर्ज निभाया। इस वर्ष पितृपक्ष में उसने श्राद्घ और तर्पण कर बेटे की कमी पूरी की। रजनी कहती हैं कि जिस पिता ने उम्र भर मुझे दुलार, प्यार दिया, पढ़ाया-लिखाया, मेरी सुख-सुविधाओं के लिए अपनी सभी खुशियां कुर्बान कर दीं उनके लिए मैं बेटी होने के साथ-साथ बेटे का दायित्व और कर्तव्य क्यों न निभाऊं? रजनी की तरह और भी अनेकों बेटियां हैं, जो फर्ज़ और परिवर्तन की मशाल जलाती चली आ रही हैं, लेकिन यह कितना शर्मनाक सच है कि हौसलों के साथ उड़ान भरती बेटियों के पंख काटने वाले कई मर्द अपने भीतर की कुरूपता और नपुंसकता उजागर करने से बाज नहीं आ रहे हैं।
बिहार के बक्सर जिले में एक शिक्षक ने गुरू-शिष्य... शिष्या के पवित्रतम रिश्ते को वासना की सूली पर लटका कर अपना असली चेहरा दिखा दिया। यह नराधम शिक्षा देना छोड़ अपनी छात्राओं को निर्वस्त्र कर नचवाता था। इसकी गंदी निगाहें और हाथ उनके जिस्म को टटोलते रहते थे। छात्राएं विरोध करतीं तो वह उनकी छड़ी से पिटायी कर अपनी शारीरिक तथा मानसिक हवस की आग को बुझाता था। मध्यप्रदेश के धार जिले में एक 19 वर्षीय युवती को अपने 21 वर्षीय प्रेमी के साथ घर से भागने की सज़ा के तौर पर गले में टायर डालकर गांव में घुमाया और नचवाया गया। इतना ही नहीं जिस तेरह वर्षीय नाबालिग लड़की ने घर से भागने में दोनों की सहायता की थी उसका भी उनके साथ नग्न जुलूस निकाला गया। यह सारा तुगलकी तमाशा समाज के जाने-माने प्रतिष्ठित चेहरों की निगाहों के सामने चलता रहा, लेकिन वे उसे बंद करवाना छोड़ मनोरंजित और आनंदित होते रहे। जब मैं इन खबरों को पढ़ रहा था तभी एकाएक मेरी निगाह दो अगल-बगल छपी इन खबरों पर पड़ी। पहली खबर का शीर्षक था, डूबती बच्ची को कुत्ते ने बचाया। एक छोटी-सी बच्ची समुद्र के किनारे खेलते-खेलते लहरों के बीच में जा फंसी। उसी वक्त घर के पालतू कुत्ते ने उसे देखा और डूबने का अंदेशा होते ही तेजी से उसकी तरफ दौड़ा। समुद्र की तेज लहरें बच्ची को निगल जाने को आतुर थीं। बेबस बच्ची को बड़ी तेजी से अपने साथ बहाती चली जा रही थीं। अपने मालिक के वफादार कुत्ते ने चीते की सी फुर्ती के साथ नायक की तरह बच्ची के कपड़े को मुंह में दबाया और खींचकर किनारे ले आया। बच्ची की जान बच गई। दूसरी खबर इंसान के घोर पतित और खूंखार जानवर होने की है..., एक नाबालिग लड़की महीनों अपने ही पिता की अंधी वासना की भेंट चढ़ती रही। उसके रोने, बिलखने और रहम करने की फरियाद को भी नराधम ने अनदेखा कर दिया। जब वह गर्भवती हो गई तब कहीं जाकर मां की आंखें खुलीं। आसपास रहने वाले लोग माथा पीटते रह गये। इस खबर को पढ़ते... पढ़ते मुझे लगा किसी ने ऊंचे पुल से नीचे बहती नदी में फेंक दिया है। यह कितनी शर्मनाक हकीकत है कि जिस जन्मदाता पर अपनी इकलौती बेटी की रक्षा-सुरक्षा की जिम्मेदारी थी, वही भक्षक बन गया! उस बच्ची को तो कुत्ते ने डूबने से बचा लिया, लेकिन मानव के रूप में जन्मा यह कुत्ता-पिता वहशी जानवर बन ऐसी खबर बन गया, जिसे पढ़कर कितनों का खून खौल गया। उनका बस चलता तो गर्दन मरोड़कर जान ही निकाल देते। बस मुर्दा ज़िस्म ही कहीं गटर में पड़ा मिलता।
Thursday, September 30, 2021
पैसा फेंको, तमाशा देखो
वो साधु थे। सभी को उपदेश देते थे। भागो नहीं, लड़ो। हर मुश्किल का डटकर सामना करो। भागोगे तो भगौड़े कहलाओगे। लोग थू...थू करेंगे। कहेंगे, कायर था। शक्तिशाली होने का दिखावा कर रहा था। उसके अंदर तो जान ही नहीं थी। एकदम खोखला था। बस लोगों को बेवकूफ बनाता रहा। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि महाराज अपने भक्तों, अनुयायियों, श्रोताओं और साथियों को यही तो कहते और समझाते थे, लेकिन वे खुद ही फांसी के फंदे पर झूल गये! उनके आठ पेज के सुसाइट नोट ने उन्हें ही कमजोर साबित कर दिया। जब मैदान में लड़ने की बारी आयी तो पीठ दिखाकर भाग खड़े हुए। सदा-सदा के लिए दुनिया से मुंह मोड़ लिया। किसी भी प्रभावी साधु-संत, प्रवचनकर्ता उपदेशक का इस तरह से धरा का त्याग करके चले जाना सवाल तो खड़े करता ही है। महंत नरेंद्र गिरि की आत्महत्या की खबर सुनते ही मुझे तुरंत आधुनिक संत भय्यू महाराज की याद हो आयी, जिन्होंने कुछ वर्ष पूर्व खुद को गोली मारकर खत्म कर दिया था।
भय्यू महाराज एक अच्छे प्रभावी उपदेशक थे। खासा मान-सम्मान था। मीडिया में अक्सर छाये रहते थे। आम लोगों के साथ-साथ खास लोग भी उनके भक्त थे। देश के कई राजनेताओं से उनके करीबी रिश्ते थे। नेता और समाजसेवक उन्हें अपने मंचों पर आदर के साथ बिठाते थे। उनकी सलाह ली जाती थी। अनुसरण भी किया जाता था। उनका पहनावा आम साधुओं वाला नहीं था। कभी कुर्ता-पायजामा, कभी जींस, टी-शर्ट तो कभी पैंट कोट में किसी फिल्मी सितारे की तरह चमक बिखेरते नजर आते थे। जब वे प्रवचन देते तो लगता था कि उन्होंने धर्मग्रंथों में अपना दिमाग खपाया है। उनमें परंपरागत साधु-संतों की सभी खूबियां विद्यमान हैं।
उनके पास धन-दौलत भी बेहिसाब थी। संतई के आकाश में चमकते इस प्रतिभावान चेहरे को भौतिक सुखों से भी बेहद लगाव था। महंगी-महंगी कारों में सफर करने और आलीशान बंगलों में रहने का शौक था। उन्होंने अचानक जब आत्महत्या कर ली तो हर किसी को वैसी ही हैरानी हुई थी, जैसी महंत नरेंद्र गिरि की खुदकुशी पर हुई। महंत की संदिग्ध मौत ने भी कई सवाल खड़े किये। जो भगवाधारी करोड़ों लोगों का सम्मान पाता रहा। जिसके दरबार में सत्ताधीश नतमस्तक होते रहे वही अंतत: भय्यू महाराज की तरह बदनाम होने के भय से इस दुनिया से ही हमेशा-हमेशा के लिए विदा हो गया! उनके साथ भी नारी के जुड़ाव की खबरें उछलीं। भय्यू महाराज तो रसिक प्रवृत्ति के थे ही, लेकिन नरेंद्र गिरि को कभी भी भटकते नहीं देखा गया। आरोप लगाने वाले तो किसी को भी नहीं छोड़ते, लेकिन सभी खुदकुशी तो नहीं कर लेते। नरेंद्र गिरि तो नकली साधुओं के खिलाफ मोर्चा खोल चुके थे। उन्हें संतों की भीड़ में मंडराते असंतों की पहचान करनी थी, लेकिन वे भी भय्यू महाराज की तरह अपने आसपास के चेहरों को पहचान नहीं पाये और रेशमी ब्लैकमेलिंग के डर से भाग खड़े हुए।
सोच कर ही हैरानी होती है कि कोई अपराधी किसी संत पर औरतबाज और व्याभिचारी होने का आरोप जड़े और संत की रातों की नींद ही उड़ जाए! भय्यू महाराज और नरेंद्र गिरि के सफेद और भगवा लिबास पर किन्हीं शातिर ब्लैकमेलरों ने कीचड़ क्या फेंका कि उन्होंने वो कीचड़ सने गंदे वस्त्र उतार फेंकने की बजाय अपनी देह को ही निर्जीव कर दिया। जैसे देह ही सारे कष्टों की वजह हो। उन्होेंने खुदकुशी करने से पहले यह भी नहीं सोचा कि इससे उनकी वर्षों की तपस्या और प्रतिष्ठा की भी मौत होने जा रही है। उन पर कहीं न कहीं कायर और भगौड़े का भी ठप्पा लगने जा रहा है। जब सच्चे संत ही आरोपों और लांछनों का जवाब देने से घबरायेंगे... कतरायेंगे तो उन्हें कटघरे में तो खड़ा किया ही जाएगा। कौन नहीं जानता कि अपने हिंदुस्तान में अधिकांश धार्मिक स्थल अपराध और अपराधियों की शरणस्थली के लिए भी कुख्यात हैं। साधुओं के भेष में कई असाधु, चोर-उचक्के विभिन्न तीर्थ स्थलों पर पहुंच चुके हैं, जिन्हें भीड़ में पहचानना भी मुश्किल हो रहा है। कुख्यात डकैत, हत्यारे, बलात्कारी भी केसरिया वस्त्र धारण कर किस तरह से लोगों की आंखों में धूल झोंक रहे हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण है डकैत शिवकुमार उर्फ ददुआ, जिसने खुद रहस्योद्घाटन किया था कि बरसात के दिनों में वह चित्रकूट में भगवा वस्त्र धारण कर महीनों बड़े आराम से छुपा रहता था। कोई भी उसे पहचान नहीं पाता था। अभी हाल ही में लेखक ने अखबारों में खबर पढ़ी है कि अयोध्या में एक ऐसे खूंखार अपराधी को पुलिस ने दबोचा है, जिसकी उसे वर्षों से तलाश थी। पुलिस यह जानकर हतप्रभ थी कि भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या में वह ‘महंत’ का ताज पहने बड़े मज़े कर रहा था। उसके कई अनुयायी भी थे, जो उसके सच्चे संत होने के धुआंधार प्रचार में लगे हुए थे।
विभिन्न धार्मिक नगरियों में महंत और महामंडलेश्वर बनना बड़ा आसान है। पैसा फेंको और तमाशा देखो। चरित्र से कोई लेना-देना नहीं। कुछ वर्ष पूर्व नोएडा के एक अरबपति शराब कारोबारी सचिन दत्ता को महामंडलेश्वर की पदवी से नवाजा गया था। बड़ा शोर मचा था। शराब के काले धंधे से मालामाल हुए सचिन दत्ता का धर्म से कोई जुड़ाव नहीं था। दूसरों को नशे में डुबोने वाला खुद भी हर नशे का गुलाम था। महामंडलेश्वर बनना भी उसके शौक और नशे का हिस्सा था। धर्म भी उसके लिए धंधा था और इस नये धंधे की बदौलत वह शराब तथा अपने अन्य अवैध धंधों का विस्तार करना चाहता था। उसे मान-सम्मान की भी बेइंतिहा भूख थी, जो उसे शराब के काले धंधे से हासिल नहीं हो पा रही थी। उसने कई संदिग्ध चेहरों को संत का चोला ओढ़कर अपना सिक्का जमाते और मालामाल होते देखा था। उसको पता चल गया था कि धर्म-कर्म में भी बहुत बड़ा व्यापार है और यहां अथाह धन के भंडार भरे पड़े हैं, जो किसी का भी ईमान डिगा सकते हैं। उसे वो भीड़ भी ललचाती थी, जो किसी भी भगवाधारी के चरणों में गिरकर खुद को खुशकिस्मत मानती है।
Thursday, September 23, 2021
अमन लायब्रेरी
जीते जी तो नहीं, मरने के बाद मेरे मित्र अमन का सपना पूरा हो गया। अभी-अभी मैं उसके घर से लौटा हूं। अमन के उम्रदराज पिता ने बाकायदा सभी मित्रों को निमंत्रण-पत्रिका भी भिजवायी थी, जिसमें अमन के सपने का उल्लेख था। अमन मेरा सबसे प्रिय दोस्त था। हमराज था। सुख-दु:ख का पक्का साथी था। भले ही उम्र में वह मुझसे काफी छोटा था। हम दोनों काफी समय एक साथ बिताते थे। एक-दूसरे से कुछ भी नहीं छुपाते थे। पिछले साल बहुतों की तरह कोरोना ने उसे भी अंतिम यात्रा पर भेज दिया। अमन ने अपनी मेहनत के दम पर चंद वर्षों में करोड़ों रुपये कमाये थे। प्रापर्टी और थोक कपड़े के व्यापार में उसका खासा नाम था। सफल व्यापारी होने के बावजूद भी वह बेहद भावुक इंसान था। धन से ज्यादा उसकी नज़र में रिश्तों का मान था। दोस्त भी उसके लिए रिश्तेदार से कम न थे। उसने अपने ही चचेरे भाइयों से विषैला धोखा खाया था। अपनी ही जायदाद के लिए महीनों कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटे थे। जीत आखिर सच की ही हुई थी...।
अपने दस हजार वर्गफुट के पुराने घर को ढहाकर आलीशान बंगला बनाना प्रारंभ कर दिया था उसने। उसकी एक खासियत और भी थी, गीत-गजलों और कविताओं का बेहद दिवाना था। पुरानी फिल्में देखने का भी उसे जबरदस्त शौक था। हिन्दी के विख्यात गजलकार दुष्यंत कुमार के गजल संग्रह ‘साये में धूप’ तथा मुनव्वर राणा की कालजयी कृति ‘मां’ की सैकड़ों प्रतियां दोस्तों तथा रिश्तेदारों को उपहार स्वरूप अर्पित करने वाला अमन चालीस साल की आयु में अस्सी साल के विविध खट्टे-मीठे अनुभवों को अपने अंदर समेट चुका था। यह सब हुआ था उन किताबों और पत्रिकाओं की बदौलत, जिन्हें पढ़े बिना उसे चैन नहीं आता था। लोग त्योहारों के अवसर पर नये-नये कपड़े खरीदते हैं, वह नये-पुराने लेखकों की किताबे खरीद कर आनंदित होता था। बड़े से बड़े पढ़ाकू साहित्यकार के यहां आने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं से ज्यादा पत्रिकाएं डाक से अमन के घर के पते पर आती थीं। वह इनका नियमित पाठक और सहृदयी शुल्कदाता था। कला मंच, व्हाट्सएप्प ग्रुप से जुड़े मित्र उसकी शेरो-शायरी तथा साहित्य की गहरी समझ से विस्मित रहते थे। अक्सर वे सोचा करते थे कि इतना व्यस्त रहने वाला कारोबारी गीत-गज़लों तथा उपन्यासों को पढ़ने के लिए समय कैसे निकालता होगा। वह वाकई किसी पहेली से कम नहीं था। अमन सिर्फ नाम का ही अमन नहीं था। वह जब धर्म-कर्म के नाम पर लोगों को एक दूसरे पर टूटते देखता तो बिखर कर रह जाता था। शहर के अनाथालयों में गुप्तदान देने और वृद्धाश्रमों में समय-समय पर जाकर सहायता का हाथ बढ़ाने तथा असहाय स्त्री-पुरुषों का आशीर्वाद लेना वह कभी नहीं भूलता था। नये बंगले में उसने अपनी खास प्रायवेट लायब्रेरी बनवानी प्रारंभ कर दी थी। वह अक्सर मुझसे कहता कि अपनी घरेलू लायब्रेरी का उद्घाटन आपसे करवाऊंगा और सभी मित्र छुट्टी के दिनों में गज़लों कविताओं, शेरो-शायरी के रस सागर में डूबने का आनंद लेंगे। कोविड-19 का आतंक जब सभी को डराने लगा था और मौतों की झड़ी लगने लगी थी, तब वह सभी दोस्तों को सतर्क और सुरक्षित रहने के सलाह देता नहीं थकता था, लेकिन किसे पता था कि दूसरों की चिंता-फिक्र करने वाला अमन खुद कोरोना के नुकीले पंजों में ऐसा फंसेगा कि हफ्तों अस्पताल में भर्ती रहने के बाद भी बच नहीं पायेगा। रिश्तेदार, दोस्त, सभी चाहने वाले रोते-बिलखते रह जायेंगे।
उसकी मौत की खबर मेरे लिए अत्यंत असहनीय थी। कई दिनों तक मैं गम में डूबा रहा था। अमन की मोती-सी चमकती आंखें और मुस्कुराता चेहरा आज भी तब मेरे सामने था, जब उसके पिता के साथ खड़ा मैं आलीशान बंगले के विस्तृत बरामदे से जुड़े कमरे में बनी लायब्रेरी के उद्घाटन का फीता काट रहा था। मेरी आंखें दो चेहरों पर जमी थीं। पैंसठ वर्षीय अमन के पिता, जिन्होंने अपने बेटे के सपने को साकार करने के लिए किसी उत्सव की तरह पूरे घर को सजाया था। उनकी आंखों में ठहरे आंसुओं को देखकर मेरी आंखे बार-बार नम हो रही थीं। नये बने बंगले का विशाल बरामदा पीपल के सूखे पत्तों से पटा था, जिन्हें अब कभी भी हरा नहीं होना था। फिर भी बेटे के सपने को एक पिता ने साकार कर दिखाया था। अमन के पिताश्री ने हम सभी का परिचय चाय की ट्रे लिए घूमती उस युवती से करवाया, जिससे उनका दुलारा शादी करने वाला था, लेकिन किस्मत दगा दे गयी। पैंतीस-छत्तीस साल की डॉक्टर रागिनी के बारे में हम सबने खबर पड़ी थी... कि कैसे उसने मौत के कगार पर झूलते एक गंभीर कोरोना मरीज को अपने मुंह से कृत्रिम सांस देकर बचाया था। बाद में वह खुद भी कोरोना की शिकार हो कई दिनों तक बिस्तर पर पड़ी रही थी। लायब्रेरी का उद्घाटन सम्पन्न होने के बाद जब सभी मेहमान चले गये थे, तब बुजुर्ग पिता ने मुझे यह भी बताया था कि डॉ. रागिनी उनकी बेटी से भी बढ़कर है। जिस दिन अमन ने अंतिम सांस ली, तब भी वह उसके साथ थी। उन्होंने कई बार उसे अपने घर लौट जाने को कहा, लेकिन वह नहीं मानी। बस यही कहती है, आपको अकेला नहीं छोड़ सकती। इस बेटी ने तो मेरे अंदर नई आशा और ऊर्जा भर दी है। अब तो मैं अमन के फैलाये बड़े कारोबार को धीरे-धीरे समेटने में लगा हूं और मेरी दिली तमन्ना है कि रागिनी की शादी किसी अच्छे नौजवान से हो जाए, जो इसे हर तरह से खुश रख सके। रागिनी के लिए कोई सर्वगुण संपन्न युवक देखने के उनके अनुरोध के जवाब में मैंने कहा था कि रागिनी तो काफी समझदार है। वह अपना जीवनसाथी खुद तलाश कर लेगी। तो उनका जवाब था कि वह तो अब शादी ही नहीं करना चाहती, लेकिन मुझे हर हाल में पिता होने का फर्ज निभाना है। क्या पता कब ऊपर वाले का बुलावा आ जाए। मैंने तो अपनी और बेटे की सारी जायदाद इसके नाम कर दी है। मेरे यह पूछने पर कि दोनों ने समय रहते शादी क्यों नहीं की तो उनका कहना था कि दोनों पिछले दस वर्ष से एक-दूसरे के प्यार में गिरफ्तार तो थे, लेकिन अमन को अपने व्यापार में तो रागिनी को अपने अस्पताल से फुर्सत ही नहीं थी। मैं चिन्तित रहता था। अमन की मां भी कब की स्वर्गवासी हो चुकी है। आखिरकार मैंने ही पिछले साल उनके परिणय सूत्र में बंधने की तारीख पक्की कर दी थी, लेकिन कोविड-19 ने अपनी मनमानी और अनहोनी कर दी।
‘‘अमन ही जब इस दुनिया में नहीं रहा तो इस लायब्रेरी के अब क्या मायने हैं?’’ मेरे इस सवाल का जवाब देने के लिए उन्हें ज्यादा सोचना नहीं पड़ा था।
‘‘यह लायब्रेरी अब उसके सभी दोस्तों और सभी पुस्तक प्रेमियों के लिए हमेशा खुली रहेगी। किताबें पड़ते युवा चेहरों में मैं अपने अमन को देखूंगा। मैंने लायब्रेरी में आने-जाने के लिए अलग रास्ता भी बना दिया है, जिसकी जब इच्छा हो यहां आ सकता है...।’’ मैं जब से उनसे मिलकर लौटा हूं तब से डॉ. रागिनी के बारे में सोच रहा हूं। ताज्जुब... आज भी ऐसे प्रेमी और प्रेमिकाएं जिन्दा हैं, जिन्हें कब का किताबों में कैद किया जा चुका है। आते वक्त मैं खुद से प्रश्न कर रहा था। अमन ने इतनी बड़ी बात मुझसे क्यों छुपाये रखी? वह तो हमेशा डॉ. रागिनी को अपनी अच्छी दोस्त भर बताता था...। अब कुछ और सवाल भी मुझे भटकाये हैं। इस अद्भुत रिश्ते पर मैं लम्बी कहानी लिखना चाहता हूं। पिछले चार घण्टों में बीस-पच्चीस पन्ने लिख-लिख कर फाड़ चुका हूं। कहानी की शुरूआत ही नहीं हो पा रही है। पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ? जब भी लिखने बैठा दिमाग से तेज कलम दौड़ती रही। आज कलम रेंग ही नहीं रही!
Thursday, September 16, 2021
फूट डालो, राज करो
पटना से नई दिल्ली जा रही तेजस राजधानी एक्सप्रेस में अजीब तमाशा चल रहा था। तमाशेबाज थे बिहार के विधायक गोपाल मंडल। तेज रफ्तार से दौड़ती रेलगाड़ी में जब सभी यात्री सोने की तैयारी में थे, तब पता नहीं उन्हें क्या सूझी कि उन्होंने अपने कपड़े उतार फेंके। अखाड़े के पहलवान की तरह चड्डी-बनियान में वे कंपार्टमेंट से कंपार्टमेंट का सैर-सपाटा करने लगे। उनकी नंग-धड़ंग घुमायी को देखकर सहयात्री हैरान-परेशान हो गये। महिलाओं ने शर्म से अपनी नज़रें इधर-उधर टिकानी प्रारंभ कर दीं। फिर भी घंटों विधायक के अश्लील दीदार होते रहे। काफी देर बाद भी जब उनका रेल गाड़ी में बदमाशों की तरह टहलना बंद नहीं हुआ तो पुरुष सहयात्रियों ने उन्हें कम अज़ कम गमछा या टावेल लपेट लेने को कहा, तो वे भूखे शेर की तरह गुर्राते हुए बदतमीजी पर उतर आए, ‘यह रेलगाड़ी तुम लोगों के बाप की नहीं, जो मुझे रोक-टोक रहे हो। फिर मैं कोई आम इंसान नहीं, विधायक हूं। वो भी उस पार्टी का, जिसका बिहार में शासन चल रहा है।’ सत्ता के नशे में चूर विधायक ने शराब भी जम कर पी रखी थी। उसकी डगमगाती चाल और बेकाबू जुबान बता रही थी कि वह जनप्रतिनिधि होने के काबिल बिलकुल नहीं है। बाहुबल, जात-पात और धनबल के दम पर यह दंभी और ओछा शख्स विधायक बनने में कामयाब तो हो गया है, लेकिन इंसानियत इससे कोसों दूर है। ये जनप्रतिनिधि खुद को सर्वशक्तिमान माने है और दूसरों को कीड़ा-मकोड़ा। जिसे लोगों के साथ उठने-बैठने और व्यवहार करने का सलीका नहीं पता वो अपने क्षेत्र की उस जनता के खाक काम आता होगा, जिसने इसे अपना कीमती वोट दिया है। सारी रात सहयात्रियों को अपनी नंगाई दिखाने और उन्हें गोली से उड़ा देने की धमकी देने वाले घटिया विधायक के खिलाफ थाने में रिपोर्ट तो दर्ज करवा दी गयी है, लेकिन सभी जानते हैं कि उसका बाल भी बांका नहीं होने वाला।
सरकारी संपत्ति को अपने बाप-दादा, परदादा की जागीर समझने और खुलेआम हेकड़ी दिखाने की गुंडे बदमाशों वाली गंदगी और भी कई राजनेताओं के खून में समायी हुई है। देशभर के दलितों के खैरख्वाह होने का दावा करने और सिर्फ और सिर्फ मंत्री की कुर्सी के लिए जीवनपर्यंत पगलाये रहने वाले स्वर्गीय राम विलास पासवान के सांसद बेटे चिराग पासवान को भी घमंड हो गया है कि वह दलितों और शोषितों का एकमात्र मसीहा है। यह हकीकत दीगर है कि वह अपने बाप के नाम की बैसाखी पकड़ कर राजनीति के मैदान में कूदने-फादने के लायक बन पाया है। सभी को पता है कि देश की राजधानी में नेताओं को उतने समय तक सरकारी बंगला दिया जाता है, जब तक कि वे सांसद रहते हैं। चुनाव में पिट जाने अथवा निधन के पश्चात उस बंगले पर उनका या उसके परिजनों का कोई हक नहीं रहता, लेकिन अहंकारी और मंदबुद्धि वाले चिराग तो खुद को दूसरों से ऊंचा मानते हैं तभी तो अपने पिता केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान के गुजर जाने के बाद भी 12, जनपथ बंगले पर खूंटा गाड़ कर जमे हुए हैं। हद तो ये भी कि बंगले को अपने पिताश्री के नाम का स्मारक बनाने के लिए उन्होंने ‘राम विलास पासवान स्मृति’ बोर्ड तक टांग दिया है। उनका कहना है कि उनके पिताश्री इस देश के महान राजनेता थे, इसलिए उनके नाम को अमर रखने के लिए ही उन्होंने बोर्ड लगाने का करिश्मा किया है। यानी चिराग बाबू को पता था कि सरकार तो यह महान काम करने से रही इसलिए उन्होंने ही यह ‘पुण्य’ कर दिखाया! लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि जबरन अपनों की याद में ‘स्मृतिभवन’ अपनी ही जमीन पर बनाये जाते हैं। सरकारी जमीन पर नहीं।
येन-केन-प्रकारेण सरकारी बंगलों को हथियाने की ऐसी कलाकारियां हिंदुस्तान में ही दिखायी जाती हैं। विदेशों में तो मंत्री, सांसद, विधायक अपना कार्यकाल समाप्त होते ही सरकारी बंगले खाली कर चलते बनते हैं, लेकिन यहां एक बार सांसद, मंत्री बन क्या जाते हैं कि सरकारी जमीनों को कब्जाने और हथियाने में दिमाग खपाने लगते हैं। देश के प्रदेश झारखंड में भारतीय जनता पार्टी के विधायकों ने विधानसभा के प्रांगण में गले में जयश्री राम लिखा अंगवस्त्र पहनकर हनुमान चालीसा का पाठ किया। विधानसभा भवन में इस पूजा-पाठ की वजह बनी सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण की चालाकी, जिससे वशीभूत होकर विधानसभा में नमाज अदा करने के लिए एक अलग कमरा निर्धारित कर दिया गया। विधानसभा तो जनहित के लिए चिंतन-मनन करने और कानून बनाने के लिए है, लेकिन झारखंड की सरकार ने लोकतंत्र के मंदिर में मुसलमान विधायकों को नमाज के लिए अलग कमरा आवंटित कर पाखंडी राजनेताओं की असली नीयत और मंशा उजागर कर दी है। पूजा, अर्चना और नमाज के लिए देश में मंदिरों और मस्जिदों की कोई कमी नहीं है। यदि प्रदेश की सरकार को अपने विधायकों, मंत्रियों, संत्रियों के पूजा-पाठ की इतनी ही चिन्ता-फिक्र थी तो अन्य सभी को भी खुले मन से कमरे आवंटित कर देती, जिससे झमेला और हंगामा तो नहीं होता, लेकिन सत्ताधीशों को ऐसे खेल खेलने में मज़ा आता है। लोगों के बीच उन्माद फैलाये बिना उन्हें खुद के नेता होने की अनुभूति ही नहीं होती। जहां मौका पाते हैं, वहीं मजहबी दीवारें खड़ी करने की साजिशें करने लगते हैं, ताकि देशवासी बंटे रहें। एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते रहें। कट्टरता पनपती रहे। खून-खराबा होता रहे। लाशें बिछती रहें और इनके वोटों की फसल पकती रहे...।
