मेडिकल साइंस कहां से कहां तक का सफर तय कर चुकी है। उसके कदम सतत आगे बढ़ते ही चले जा रहे हैं। उसका इरादा तो इंसान को अमरत्व प्रदान करने का है, लेकिन यह इंसान ही है, जो अक्सर अंधा हो जाता है। विवेकशून्य होने के कगार पर जा खड़ा होता है। अमानवीयता का नृशंस दामन थाम लेता है। जहां बड़ा दिल दिखाने की जरूरत होती है, वहां निजी स्वार्थ का गुलाम होकर रह जाता है। क्या कभी कल्पना की गई थी कि इंसान के अंदर सुअर का दिल धड़केगा? इंसान को इंसान का दिल लगाये जाने की उत्साहवर्द्धक हकीकत से तो सभी वाकिफ हैं। बहुतों की तरह मेरे लिए भी यह खबर चौंकाने और हिलाने वाली रही कि, ‘अमेरिका के मेरीलैंड अस्पताल में एक इंसान की जान को बचाने के लिए सुअर का हार्ट ट्रांसप्लांट किया गया है। जिस शख्स को सुअर का दिल लगाया गया है वह बहुत अच्छा महसूस कर रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि ‘ये अभूतपूर्व प्रक्रिया है। इससे अंग प्रत्यारोपण का इंतजार कर रहे लाखों लोगों में नई आशा का संचार हुआ है। जीने की उम्मीद जागी है।’ इस खबर को पढ़ने और जानने के चंद दिनों बाद ही यह खबर भी पढ़ने में आयी है कि वाशिंगटन में चिकित्सकों ने सुअर की किडनियों को ब्रेन-डेड व्यक्ति में प्रत्यारोपित किया और काफी सकारात्मक परिणाम सामने आये हैं। जानवरों के अंगोें को मानव शरीर में लगाने की कई कथाएं कभी सुनी-सुनायी जाती थीं, लेकिन उन पर कम ही यकीन होता था, लेकिन अब तो जीती-जागती सच्चाई हमारे सामने है।
जिस इंसान के हृदय ने उसका साथ देने से इंकार कर दिया हो, मौत सिरहाने खड़ी ठहाके लगा रही हो, पल-पल डरा रही हो, उसे विज्ञान की इस नई पहल, नये प्रयोग ने कितनी आत्मिक खुशी दी होगी उसे शब्दों में तो कतई व्यक्त नहीं किया जा सकता। इस सच को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि विदेशों में इंसानों की जान को बचाने के लिए किए जानेवाले विभिन्न प्रयोगों को शंका की निगाह से नहीं देखा जाता। दूसरों के लिए अपने सुखों और खुशियों की कुर्बानी देने वाले डॉक्टरों, नर्सों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों का आदर-सत्कार किया जाता है, लेकिन अपने देश में...!?
आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व असम में रहने वाले डॉक्टर धनीराम बरूआ ने एक बत्तीस वर्ष के दिल और फेफड़ों के मरीज को सुअर का दिल और फेफड़े ट्रांसप्लांट किए थे। हांगकांग के एक कुशल डॉक्टर के साथ मिलकर की गई इस थका देने वाली सर्जरी में 15 घंटे लगे थे। जिस मरीज पर यह अभूतपूर्व प्रयोग किया गया था वह काफी खुश और संतुष्ट था। यह सच्चाई अपनी जगह है कि एक हफ्ते के भीतर उसकी मौत हो गई थी, लेकिन उसने डॉक्टरों के अथक परिश्रम की बदौलत उपहार में मिले जो दिन जिए थे वे यकीनन अनमोल थे।
अमेरिका में तो इंसान की जान बचाने के लिए किये गए ऐतिहासिक प्रयोग की वाहवाही हुई, लेकिन भारत में शक्की और अहसानफरामोशों की कतार लग गई। एक हिंदुस्तानी डॉक्टर ने यह कैसा अपराध कर डाला? इंसान को सुअर का दिल! यह भी कोई बात हुई? लगाना था तो किसी अच्छे-साफ सुथरे जानवर का दिल लगाते। सुअर तो उस गंदगी और कीचड़ में जीता-खाता है, जिससे इंसानों की जात को घोर नफरत है। ऐसे में उसका दिल इंसान को... तौबा...तौबा। यह तो घोर अनर्थ है। अक्षम्य अपराध है। अधर्म है। अमेरिकी डॉक्टरों को जहां पुरस्कृत किया गया वहीं भारतीय डॉक्टर को चालीस दिन तक हत्या के जुर्म में जेल की हवा खानी पड़ी। उनके अस्पताल में तोड़फोड़ की गई। जेल से बाहर आने के बाद भी उन्हें लोगों के तंज, ताने सुनने पड़े। अपमान के नुकीले दंशों से बार-बार आहत होना पड़ा। डॉक्टर बरूआ ने तो खुद को कोसा होगा। किसी की जान बचाने चले थे, कातिल घोषित कर दिये गए। अपने देश में डॉक्टरों के साथ ऐसे अमानवीय और अभद्र व्यवहार का होना कोई नयी बात नहीं है। अस्पताल में भर्ती करवाने के पश्चात मरीज बच गया तो डॉक्टर भगवान और यदि कहीं मर गया तो वो हो गया हत्यारा और शैतान। भूल-चूक तो कहीं भी हो सकती है। होती ही रहती है, लेकिन डॉक्टरी के पेशे में यदि सतर्कता और मानवता नहीं होगी तो लोग डॉक्टर को धरती का भगवान मानना ही छोड़ देंगे। बीमार बड़े भरोसे के साथ डॉक्टर की शरण में जाता है और लगभग हर सच्चा डॉक्टर अपने मरीज की रक्षा-सुरक्षा के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देता है। कोई भी डॉक्टर अपने नाम पर बट्टा नहीं लगाना चाहता। हम भले ही डॉक्टर को भगवान मानें, लेकिन सच तो यही है कि वह भी इंसान है, जो अपना कर्तव्य निभाता है। कोरोना जब चरम पर था, तब हमारे यहां अधिकांश डॉक्टरों, नर्सों एवं अन्य स्वास्थ्य कर्मियों ने दिन-रात अपनी सेवाएं दीं, लेकिन कुछ लोगों ने जानबूझकर अपनी नीचता और वैमनस्य का प्रदर्शन किया। अस्पतालों और डॉक्टरों पर भेदभाव के आरोप लगाये गए। कई कोरोना से जंग लड़ते योद्धाओं को इसलिए मारा, पीटा और अपमानित किया कि उनके अपने करीबी बच नहीं पाये। कुछ मकान मालिकों ने उन्हें अछूत मानते हुए घर खाली करने का जिद्दी फरमान सुनाये तो कुछ ने उनका सामान ही सड़क पर फेेंक दिया। उनके आसपास रहने वाले लोग भी यह सोचकर उनसे दूरी बनाते रहे कि उनके निकट जाने से कहीं वे भी कोरोना के शिकार न हो जाएं। सोचिए जिन्हें सेवा के बदले सजाएं झेलनी पड़ें उनके दिल पर क्या बीतती होगी?
Thursday, January 27, 2022
डॉक्टर भी इंसान ही हैं
Thursday, January 20, 2022
थूको... थूको, जीभरकर थूको
हो सकता है कि आपने भी कुछ महीने पूर्व अखबारों में छपी इस खबर को पढ़ा हो, ‘‘बड़े शहर के एक रिहायशी इलाके में एक गुपचुप का ठेला लगाने वाला भइया खुद को थका महसूस कर रहा था। कुछ देर पहले उसके ठेले पर ग्राहकों की भीड़ थी। अब उसके लिए सुस्ताने और आराम करने का समय था। स्टूल पर बैठे-बैठे उसे अचानक ख्याल आया कि खट्टे-मीठे-तीखे जायकेदार पानी वाली मटकी लगभग खाली हो चुकी है। वो बाल्टी भी खाली थी, जिसमें वह घर से ग्राहकों को पिलाने के लिए पानी भरकर लाया था। यदि अभी कहीं भूले-भटके कोई गुपचुप प्रेमी आ धमका तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। इस इलाके की लड़कियां और औरतें तो उसके जलजीरे और खट्टे और तीखे-मीठे पानी की दिवानी हैं। उन्हें यह मसालेदार पेय खास तृप्ति देता है। सार्वजनिक नल भी नजदीक नहीं था। फिर आज उसका नौकर भी छुट्टी पर था। सोचते-सोचते उसने इधर-उधर देखा।
जब आसपास उसे कोई नज़र नहीं आया तो उसने अपनी धोती ऊपर की और कच्छे का नाड़ा खोलकर खाली लोटे में अपने पेशाब की धार छोड़ने लगा। वह बड़ी सतर्कता के साथ पानी की समस्या का हल करने में लीन था कि इसी दौरान अचानक एक युवती वहां आ पहुंची। उसकी आंखों के सामने ही उसने अपने द्रव्य को मटकी में उंड़ेल दिया था। युवती के लिए यह बेहद हतप्रभ कर देने वाला नज़ारा था। वह अपने मोबाइल से तस्वीरें लेने के पश्चात वीडियों बना चुकी थी। जैसे ही भइये ने युवती को देखा तो वह हक्का-बक्का रह गया। बुरी तरह से गुस्सायी युवती के समक्ष उसने अपनी मजबूरी का रोना रोया, लेकिन युवती ने ऐसा शोर मचाया कि देखते ही देखते अच्छी-खासी भीड़ जमा हो गयी। लोगों ने उसके ठेले का कचूमर निकालने के साथ उसकी भी अंधाधुंध धुनायी कर लहुलूहान कर दिया। बड़े ही सतर्क और जोशीले अंदाज में ‘आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है’ की कहावत को चरितार्थ करने वाला भइया हाथ-पांव जोड़कर माफी मांगता रहा, लेकिन भीड़ ने उसकी वो गत बनायी कि उसने जमीन पर नाक रगड़कर सपने में भी कभी गोलगप्पे का ठेला नहीं लगाने की कसम खायी और चुपचाप अपने गांव खिसक गया।’’
फैशन की रंगारंग दुनिया से वास्ता रखने वाले हर शख्स ने मशहूर हेयर स्टाइलिस्ट जावेद हबीब का नाम जरूर सुना होगा। मिलना-मिलाना भी हुआ होगा। देश और विदेश के कई शहरों में उसके नाम पर सैलून चलते हैं। सच तो यह है कि यह किसी फिल्मी हीरो-सा दिखने वाला हाई-फाई रंगीला नाई बड़ा पहुंचा हुआ व्यापारी और खिलाड़ी है। अभी हाल ही में इस खानदानी नाई का मुजफ्फरनगर में एक सेमिनार चल रहा था। इसी चमकदार सेमिनार में कई ब्यूटीपार्लर चलाने वाली महिलाएं आमंत्रित थीं। सेमिनार में फैशनपरस्त महिलाओं से घिरा जावेद हेयर कटिंग के जब नये-नये गुर सिखा रहा था तभी एक महिला के सूखे बालों को उसने अपनी थूक से गीला कर वाहवाही लूटनी चाही। यहां पर भी पानी की कमी इस नये अविष्कार की जननी बनी। थोड़ी देर बाद बाल कटवाने वाली महिला की छठवीं इंद्री जागी और वह कुर्सी छोड़ जावेद पर बरसने लगी। उसकी देखा-देखी दूसरी महिलाओं और पुरुषों ने भी उसे भला-बुरा कहा, लेकिन किसी ने भी उसकी वैसी पिटायी करने की हिम्मत नहीं की जैसी गुपचुप बेचने वाले की धुनाई कर दिखायी। अमीर हर जगह फायदे में रहता है। रंगीले नाई ने पानी की समस्या के समाधान के लिए एक नई परंपरा की नींव रखने की सोची थी, लेकिन होशियार महिला ने उसके मंसूबे पर पानी फेर डाला। बदनामी भी करवा दी। मैं जहां तक जानता और समझता हूं कि किसी पर थूकने की जुर्रत तब की जाती है, जब उससे घोर नफरत होती है। उसने कोई दगाबाजी, व्याभिचार और अत्याचार किया होता है। थूक से नवाजी गई महिला तो कुछ नया सीखने को आई थी। क्या सीखा उसने? उत्तरप्रदेश के किसी जोशीले नेता ने एलान कर दिया है कि, ‘नाई के मुंह पर थूकने वाले को अपनी जेब से इक्यावन हजार रुपये का इनाम दूंगा।’
यह तो ठीक है, लेकिन यही नेता कभी यह भी तो डंके की चोट पर कह दें कि वे सभी नेता चुल्लू भर पानी में डूब मरें, जिनका जनता को बेवकूफ बनाना ही एकमात्र पेशा है। जब वोट लेने आते हैं तो हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हैं। विधायक, सांसद, मंत्री बनते ही अपनी असली औकात पर आ जाते हैं। यह बहुरूपिये मतदाताओं को पहचानते तक नहीं। चुनावी वादे भी कभी पूरे करते नहीं। उन सफेदपोशों के मुंह पर थूको, जिन्हें दूसरों की बहन, बेटियो की कद्र करनी नहीं आती। भारत की बरबादी के सपने देखने वाले जयचंदो और भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगाकर देशभक्तों का खून खौलाने वाले ‘कन्हैया छाप’ जमूरों तथा नक्सलियों के हितैषी नालायक बुद्धिजीवियों की थू-थू करने की बजाय थूक की बोछारें करो। उन्हें भी कतई नजरअंदाज मत करो, जो बार-बार हिंदू देवी-देवताओं और हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का मज़ाक उड़ाते हैं। उन्हें भी सबक सिखाते रहो, जो खुद के धर्म को महान और दूसरे के धर्म और आस्था को नीचा दिखाने में लगे हैं। सच को छिपाने और झूठ को सिंहासन पर बैठाने वाले खोखले क्रांतिवीर पत्रकारों, संपादकों और मीडिया मालिकों को भी थूक की बरसात से नहला दो, जिससे वे अपना चेहरा तक न पहचान सकें। आपसी भाईचारे, ईमानदारी और इंसानियत के किसी भी शत्रु को बिलकुल मत बख्शो। यह भी जान लो कि महज शाब्दिक तीरों से कुछ भी नहीं होने वाला। लातों के भूत बातों से नहीं मानते।
Thursday, January 13, 2022
भूली नहीं जाती बेटी की पाती
वे आकाश से तो नहीं टपकतीं। उन्हें भी मां-बाप ही जन्म देते हैं। तो फिर उनके हिस्से में ऐसे जुल्म और गम क्यों आते हैं कि उनकी जीने की इच्छा खत्म हो जाती है और ऐसी-ऐसी खबरें पढ़ने और सुनने में आती हैं...।
लुधियाना में एक महिला को उसके पति और ससुर ने क्रिकेट बैट से बुरी तरह से पीटते हुए उसके मुंह में तकिया रखकर दम घोटने की कोशिश करने के बाद सड़क पर फेंक दिया। उसका कसूर बस यही था कि वह ऐसे घर-परिवार की बेटी थी, जो उनकी दहेज की मांग को पूरा करने में असमर्थ थे। पंजाब के ही शहर जालंधर में ब्याही गई 39 साल की प्रिया छाबड़ा ने नये साल 2022 का चेहरा देखने से पहले ही इस दुनिया को अलविदा कह दिया। पति का अच्छा-खासा कारोबार था। वह अगर चाहता तो बड़े ठाठ से अपने परिवार के साथ दिन गुजारता। सभी के चेहरे खिले रहते, लेकिन उसे तो और-और धन-दौलत की अंधी भूख थी। उसके लालच ने उसे शैतान बना दिया था। धनलोलुप पति लवलीन ने अपनी पत्नी प्रिया की जिंदगी में कलह, शंका और हिंसा के ऐसे बीज बोए, जो धीरे-धीरे कांटेदार पेड़ की शक्ल अख्तियार करते चले गये। इस पेड़ में दूर-दूर तक छांव का नामो-निशान नहीं था। पत्ते हरे होने से पहले झड़ चुके थे। शाखाएं मरी-मरी-सी हो चुकी थीं। रहने को आलीशान विशाल कोठी थी, लेकिन उसका कोना-कोना अशांत और वीरान था। रोज-रोज की कलह से प्रिया तंग आ चुकी थी। शादी हुए 17 साल हो चुके थे, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी पति-पत्नी में वो विश्वास, जुड़ाव और अपनत्व नहीं आ पाया था, जो इस पवित्र रिश्ते की आत्मा होता है। प्रिया वर्षों तक पति लवलीन की गालियां तथा मार-कुटायी सहते-सहते तंग आ चुकी थी। उस पर किसी पुराने यार के संग रंगरेलियां मनाने के गंदे-गंदे आरोप भी लगाये जाते थे। लवलीन को प्रिया के फोन रिकॉर्ड करने की तो जैसे उसे लत लग गई थी। प्रिया बार-बार सफाई देती कि वह चरित्रहीन नहीं। गलत रास्ते पर चलने की तो वह कल्पना ही नहीं कर सकती, लेकिन धन से धनवान और मन से कंगाल लवलीन ने उसकी नहीं सुनने की कसम खा ली थी। प्रिया को यह गम भी हरदम खाये रहता था कि पति के जुल्म और प्रताड़ना के साथ-साथ सास-ससुर, जेठ और ननद भी दहेज के लिए तंग करने के साथ-साथ उसे हमेशा अपमानित करने के अवसर तलाशते रहते थे। उसके पलटकर जवाब देने पर सभी एकजुट हो उसके जिस्म पर खूंखार भेड़िये की तरह टूट पड़ते। बर्दाश्त करने की भी कोई हद होती है। अंतत: 39 साल की प्रिया ने रोज-रोज का नर्क भोगने की बजाय नये वर्ष के चंद दिन पहले ही खुदकुशी कर ली। फांसी के फंदे पर झूलने से पहले इस सचेत मां ने अपने 15 साल के बेटे के मोबाइल पर रिकॉर्डिंग भेजी, ‘मेरे लाल, मुझे माफ करना..., मैं हमेशा-हमेशा के लिए यह दुनिया छोड़कर जा रही हूं। तुम अपनी बहन का अच्छी तरह से ध्यान रखना।’ प्रिया अंदर और बाहर से कितनी आहत और लहुलूहान थी इसका पता उसके इस सुसाइट नोट से चलता है, जो उसने जाते-जाते अपने दुर्जन पति लवलीन के लिए लिख छोड़ा था,
‘‘मैं प्रिया... आज तुम्हें यह कहना चाहती हूं कि तुम बहुत बुरे पति हो। तुम्हारे होते हुए भी मैं विधवा सी रही। अब मुझे तुम विदा भी एक विधवा की तरह ही करना। मेरी चिता को तो छूने की हिम्मत ही नहीं करना। मेरी मृतदेह को मेरा बेटा हार्दिक ही आग लगाए। मैं तुम्हें हसबैंड होने के नाते कभी माफ नहीं करूंगी।’’
प्रिया किसी की बेटी थी। उसके मां-बाप ने उसे बड़े अरमानों के साथ पाला था। उसके पंद्रह वर्षीय बेटे हार्दिक ने उसकी चिता को मुखाग्नि देकर पुत्र होने का फर्ज़ निभाया। पति लवलीन वहां झांकने तक नहीं आया। हार्दिक मन ही मन पिता को कोस रहा था। उसकी प्यारी मां ने फांसी के फंदे पर झूलने से पहले अपनी दोनों कलाई की नसें भी काटी थीं। हार्दिक को अपनी मां को खोने के गम से उबरने में वक्त लगेगा। उसके नाजुक मन में पिता के प्रति जो घृणा घर कर चुकी है वह तो खत्म होने से रही। उसे अपनी जननी को सताये जाने के तमाम मंजर ताउम्र याद आते रहेंगे। काश! वह अपनी मां को बचा पाता! पापा की तो मां को परेशान करने की आदत पड़ चुकी थी। मम्मी ने इससे पहले भी कई बार सुसाइड करने की कोशिश की थी। पिछली बार जब वह छत से कूदने जा रही थी, तब उसी ने मां को समझाया और मनाया था। पापा मम्मी को खर्चा नहीं देते थे। उन्होंने तो उसे घर से निकालने की साजिशों का जाल भी बुन डाला था। वह बेटे और बेटी को लेकर कितनी फिक्रमंद थी, इसका पता उसके इस दूसरे सुसाइड नोट से चलता है,
‘‘मैं अपने बच्चों के हक के लिए लड़ रही हूं। मैं हारी भी नहीं हूं। मैं अपने बच्चों को बहुत प्यार करती हूं। अफसोस है उनके लिए कुछ नहीं कर पाई।’’
सूरत के वडोद गांव में एक श्रमिक परिवार की ढाई साल की मासूम का शव बस्ती से करीब 300 मीटर दूर झाड़ियों में पड़ा मिला। बच्ची के साथ इतनी निर्दयता के साथ कुकर्म किया गया था कि उसका जननांग जिस्म से बाहर निकल गया था।
राजस्थान में झूंझनू जिले के एक सरकारी स्कूल के हेडमास्टर पर सातवीं कक्षा की छात्रा ने आरोप लगाया कि वासना के भूखे भेड़िये ने स्कूल में ही उस पर बलात्कार कर दिया। इस दुष्कर्म में स्कूल की दो शिक्षिकाओं ने भी वहशी का साथ दिया। विरोध करने पर शिक्षिकाओं ने उसे बार-बार धमकाया।
चेन्नई में 11वीं की एक छात्रा के साथ कुछ दरिंदों ने ऐसी दरिंदगी की, जिससे उसके जीने की इच्छा ही मर गई। उसने अपने करीबी दोस्तों से दूरियां बना लीं। पुरुषों के कदमों की आहट उसके मन-मस्तिष्क में खौफ पैदा करने लगी। वह सोने की कोशिश करती तो नींद ही बगावत कर देती। उसे बार-बार अपने साथ हुए कुकर्म के वो काले पल याद आते। उसे कुछ भी नहीं सूझता। बस वह खामोश घर की दीवारों पर अपना सर पटकने लगती। उसके मां-बाप उससे पूछ-पूछ कर थक गये, लेकिन उसने किसी को कुछ भी नहीं बताया और 2021 के घनी शीत से पिघलते दिसंबर महीने में अपने कमरे में फांसी के फंदे पर लटक कर मौत का दामन थाम लिया। उसके कमरे से जो सुसाइड नोट मिला उसने सभी के रोंगटे खड़े कर दिए,
‘‘स्टॉप सेक्सुअल हैरेसमेंट... मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर सकती। मैं इतने दर्द में हूं कि कोई ढांढ़स नहीं बंधा सकता। मेरे भीतर अब पढ़ने या लिखने की क्षमता चूक गई है। मुझे बार-बार बुरे सपने आते हैं, जो मुझे सोने नहीं देते। हर माता-पिता को अपने बेटों को लड़कियों का सम्मान करना सिखाना चाहिए। मैं जाते-जाते कह रही हूं कि अपने रिश्तेदारों या शिक्षकों पर भरोसा न करें। अब तो स्कूल भी लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं रह गया है। लड़कियों के लिए अब एकमात्र सुरक्षित स्थान मां की कोख और कब्रिस्तान है...।’’
Thursday, January 6, 2022
हंगामा... हंगामा!
2021 तो चला गया, लेकिन कुछ कटु यादें छोड़ गया। इस एक साल में उत्थान भी देखा। पतन भी देखा। कई लोगों की महानता तो कुछ लोगों की नीचता भी देखी। यह सच भी समझ में आया कि कुछ भारतीयों की वाणी हरदम जहर उगलने को आतुर रहती है। उन्हें आप कितना भी दूध पिला लो, समझा लो, लेकिन वे विष उगलना नहीं छोड़ते। इनमें नामी-बेकामी ज्ञानी चेहरे भी शामिल हैं। इस कुटिल खेल में शामिल तो वे भी हैं, जिन्हें बात-बात पर प्रतिक्रियाएं देने की बीमारी है। बदतमीजी करने और उकसाने वाले जन्मजात बयानवीरों को नजरअंदाज करना तो उन्होंने सीखा ही नहीं। अपने-अपने तरीके से बस उनका मनोबल बढ़ाते रहते हैं। ये चुप्पी बनाये रहते तो बड़े से बड़े बकवासी की जुबान पर कुछ तो ताला लग जाता और हौसला ठंडा हो जाता। दरअसल ये धुरंधर आग में पेट्रोल डालने की कला के जबरदस्त खिलाड़ी हैं। धूर्त, कपटी और तमाशबीन तो वे भी कम नहीं, जो खुद को सेक्युलर यानी धर्मनिरपेक्ष बताते हैं और अपने स्वार्थ का झंडा लहराते हैं। इनमें से कई तो कांग्रेस के सत्ता में नहीं होने के गम में डूबे हैं। बेचारे कभी-कभार दिखावे के लिए गांधी का चरखा चलाकर अपने आकाओं का दिल बहलाते हैं...।
पिछले कुछ वर्षों से बड़े ही सुनियोजित तरीके से आस्थाएं और परिभाषाएं बदलने का भी नाटक चल रहा है। नाटककारों के लिए न दर्शकों की कमी है और ना ही तालीबाजों की। इसलिए भय और नफरत का सैलाब लाने वालों के हौसले बुलंद हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आयोजित धर्म संसद के मंच पर खुद को हिंदुओं का रक्षक कहने वाले कालीचरण ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को देश का सत्यानाश करने वाला बताते हुए हत्यारे नाथूराम गोडसे को नमस्कार किया तो वाहवाही भी हुई और तालियां भी गूंजीं। मंच पर उपस्थित एक-दो भगवाधारियों के विरोध के स्वरों ने जब हलचल मचायी तो हंगामा बरपा हो गया कि अच्छे-भले मंच पर एक भगवाधारी ने यह क्या कह डाला? सच कहें तो इसमें नया कुछ भी नहीं था। हैरत जताने वालों को कालीचरण के इतिहास की पूरी जानकारी थी। उसने गांधी को अपमानित करने वाले बोल कोई पहली बार तो नहीं बोले थे। वह तो वर्षों से ही अपने सोचे-समझे अभियान में लगा है। टोकने-बोलने वाले कितना भी जोर लगाते रहें सवाल पर सवाल उठाते रहें कि क्या संत ऐसे होते हैं? उसे न फर्क पड़ा है और न ही पड़ने वाला है। उसकी अपनी धारणा है, अपने ही विचार हैं...। उसका दावा है कि वह सनातन धर्म, मानवता और हिंदुओं के लिए लड़ रहा है। अपनी राह में रोड़ा अटकाने वालों को वह अपना शत्रु मानता है।
हत्यारे नाथूराम गोडसे को नमन और बापू को देश का शत्रु मानने वाला कालीचरण पहला शख्स नहीं, जिसने गांधी के खिलाफ कटु शब्दों का छाती ठोक कर इस्तेमाल कर अपनी विषैली उद्दंडता दिखायी है। सच तो यह है कि जो चेहरे बापू के हत्यारे गोडसे का मंदिर बनाने का साहस दिखा सकते हैं उनकी तस्वीरों पर गोलियां बरसा कर लाल रंग की धारा दिखा सकते हैं, उनमें बदलाव लाने की कल्पना ही बेमानी है। कालीचरण की तरह उसकी हिंदू राष्ट्र सेना तथा सैनिकों ने भी यह धारणा अपने मन-मस्तिष्क में बसा ली है कि महात्मा गांधी हिंदू समाज के सबसे बड़े दुश्मन थे। गांधी का महात्मापन नकली था। उसे किसी पर जबरन नहीं थोपा जा सकता। वह स्वतंत्रता सेनानी हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्रपिता नहीं। कालीचरण के भक्तों के पास और भी कई सवालों और आपत्तियों की भरमार है...। जेएनयू में जब देश विरोधी नारे लगते हैं तब गांधी के अधिकांश अनुयायियों के मुख पर ताले क्यों लग जाते हैं? खुद पर सेक्युलर का ठप्पा लगाये घूमते असली-नकली क्रांतिकारी बुद्धिजीवी कौन-सी बिल में घुस जाते हैं? श्री कृष्ण और श्रीराम को कटघरे में खड़े करने और उनके अस्तित्व को नकारने वालों के होश ठिकाने क्यों नहीं लगाये जाते? इस सच को भी क्यों नजरअंदाज किया जाता है कि देश को आजाद कराने में अकेले गांधी की ही सर्वोपरि भूमिका नहीं थी। शहीद भगतसिंह, लाला लाजपत राय, सुभाषचंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद जैसे कई नाम हैं, जिनकी कुर्बानी गांधी से कमतर नहीं। गांधी और नेहरू परिवार को ही आजादी के एकमात्र नायक दिखाने की साजिश के सूत्रधार कौन हैं? सभी सवाल अपनी जगह हैं, लेकिन कलमकार का यही मानना है कि आप चाहे किसी को भी अपना नायक मानें, लेकिन दूसरों की पसंद और आस्था को अपमानित करने का गुनाह क्यों? गाली और गोली तो वो हिंसा है, जिसके जख्म कभी नहीं भर पाते।
धर्म और अधर्म के बीच फर्क बताने वाले तथाकथित धार्मिक चेहरों के मंच पर अपनी भड़ास निकालने वाला कालीचरण अपने मकसद में तो कामयाब हो ही गया। अभिजीत धनंजय सराग उर्फ कालीचरण ने घाट-घाट का पानी पिया है। मात्र आठवीं तक पढ़े इस शख्स ने कई साल इंदौर में स्वर्गीय भैय्यूजी महाराज के दरबार में गुजारे, जो खुद पहुंचे हुए प्रवचनकार थे। यह सच दीगर है कि उन्हें किन्हीं कारणों से आत्महत्या करनी पड़ी। कालीचरण ने और भी कई साधु-महंतों की चौखट में माथा टेका। कुछ ग्रंथ भी पढ़े होंगे, लेकिन लगता है वह प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ना भूल गया या फिर पढ़कर भी भुला बैठा और संतई के अर्थ ही बदलने पर तुल गया है। वह ‘काली विद्या’ में सिद्धहस्त होने का भी दावा करता है। वह तो बड़े गर्व से यह भी बताता है कि मैं स्वयं काली हूं और काली माता मुझमें समाहित है। राजनीति में रमने को आतुर साधु-संतों की संगत में रहते-रहते उसने यह भी जान लिया है कि विवाद और धमाके बड़े काम की चीज़ हैं। मजबूत प्रचार तंत्र का होना भी निहायत जरूरी है। उसे खुद के लोकप्रिय होने का जबरदस्त भ्रम है। इसलिए उसने 2017 में महापालिका चुनाव लड़ा, लेकिन पराजय का मुंह देखना पड़ा। चुनावों में होने वाली हार-जीत के मायने भी उसे पता हैं। सोशल मीडिया पर हमेशा छाया रहने वाला कालीचरण कच्ची नहीं, पक्की मिट्टी का बना है। गिरफ्तारी के बाद भी उसके तेवर नहीं बदले। उसका लक्ष्य भी धूमिल होता दिखायी नहीं दिया। दरअसल, उसके सामने कई ऐसे चेहरों की जीती-जागती तस्वीरें हैं, जिन्होंने हिंदुओं के मन में भय जगाकर अपने सपनों को साकार किया है। उन्हीं में से एक नाम है, प्रज्ञासिंह ठाकुर का, जो मुस्लिमों और गांधी पर शाब्दिक वार करते-करते सांसद बन लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में पहुंच चुकी हैं...।
Thursday, December 30, 2021
काले कुबेरों के कवच
मैं आज दावे के साथ लिख रहा हूं कि अपने देश हिंदुस्तान में भ्रष्टाचार का कभी भी पूरी तरह से खात्मा नहीं हो सकता। मेरी इस धारणा के विरोध में जिन्हें जो कुछ भी कहना और सोचना है, उन्हें मुझे कुछ भी नहीं कहना। यहां भ्रष्टाचार, वहां भ्रष्टाचार, कहां नहीं है भ्रष्टाचार। इसने तो देश के रहनुमाओं को भी असहाय बना दिया है। कुछ विद्वानों का तो यहां तक कहना है कि रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार को एक कारोबार के रूप में अब वैध कर दिया जाए। इसका विरोध वही लोग करते हैं, जिन्हें लूटने-खसूटने का मौका नहीं मिलता। मोटा माल कमाने के अवसर की तलाश तो उन्हें भी रहती है, जो ईमानदारी और सदाचार के गीत गाते हैं। पांच-सात प्रतिशत भारतीय ही ऐसे बचे हैं, जिन्हें हराम की कमायी से परहेज है, बाकी तो ऊपर से भ्रष्टाचारी नेताओं, अफसरों, उद्योगपतियों को गरियाते भी हैं और अंदर ही अंदर उनसे निकटता बनाये रखने की कोशिशों में भी लगे रहते हैं। कुछ दिन पहले देशभर के अखबारों में यह खबर छपी थी कि एक भ्रष्ट इंजीनियर ने रेलवे का स्टीम इंजन कबाड़ियों को बेचकर दिखा दिया है कि भारत देश का कोई मां-बाप नहीं है। यह तो लावारिस है। जहां... मौका मिले लूट लो इसे। इसकी नस-नस के खून को राक्षस की तरह चूस लो। यहां की व्यवस्था पूरी तरह से अपाहिज हो चुकी है। सभी चोर-चोर मौसेरे भाई हैं यहां। किसी का भी बाल बांका नहीं होने वाला। बस ‘मैनेज’ करने का तरीका आना चाहिए। चालाक वकीलों की फौज है तो कानून गया तेल लेने।
उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक इत्र कारोबारी के हाल ही में छापे में लगभग 290 करोड़ से अधिक की नगद रकम बरामद हुई। सोने-चांदी का अपार भंडार मिला। दीवारों में नोट, जमीन के अंदर नोट और तिजोरियों में नोटों का जखीरा देखकर आयकर अधिकारी माथा पकड़ कर बैठ गये। कई अफसरों ने इतनी असीम काली माया पहली बार ही देखी। नोटों को गिनने के लिए मशीनें मंगवानी पड़ीं। इत्र के व्यापारी पीयूष जैन का खुशबू का धंधा पूरे देश में फैला है। विदेशों में भी उसकी महक का डंका बजता है। अंधाधुंध कमाते तो हैं, लेकिन टैक्स भरने का मन नहीं होता। इसी खिलाड़ी ने कुछ दिन पहले ‘समाजवादी इत्र’ बाजार में पेश की थी। इस काले कुबेर की समाजवादी पार्टी के दिग्गजों से गहरी छनती रही है।
अधिकांश भ्रष्ट राजनेता और अफसर अपने काले धन को ऐसे ही टैक्स चोरों के यहां रखवाते हैं। जब उनकी तूती बोलती है, तो इन्हें अवैध धंधे करने की खुली छूट होती है। प्रदेश और देश को दोनों हाथों से लूटने की इन्हें पूरी-पूरी आजादी मिल जाती है। राजनीतिक दबंगों और सत्ता के चित्तेरों के ऐसे कई ठिकाने हैं, जहां उनका काला धन जमा रहता है। चुनाव आने पर इसी काली माया को बाहर निकलवाकर विभिन्न तरीकों से वोटों को खरीदते हैं। लोकतंत्र के साथ धोखाधड़ी करते हैं। यह गुनाह भारत देश का लगभग हर नेता और राजनीतिक दल करता चला आ रहा है। उद्योगपतियों और व्यापारियों में इतना दम नहीं कि वे सत्ताओं, नेताओं और भ्रष्ट अफसरों के वरदहस्त के बगैर अपने काले धंधों को चमकाते रहें और देखने वालों की आंखों को चुंधियाते रहें। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की फोटो के साथ समाजवादी इत्र लांच करने वाले काले कुबेर जैन को अब पहचानने से ही इंकार किया जा रहा है। कहा जा रहा है हमारा तो उनसे कोई लेना-देना ही नहीं है। तो यह है हमारे यहां के नेताओं का असली भ्रष्ट चरित्र। यहां एक से एक झूठे और मक्कार भरे पड़े हैं। एक पुरानी कहावत है, ‘जैसा राजा वैसी प्रजा।’ इस कहावत के एकाएक याद हो आने की असली वजह है, यह खबर,
‘‘छत्तीसगढ़ में स्थित गांव बंसुला में 54 मकान चोरी हो गये और कोई शोर-शराबा नहीं हुआ। अटल आवास योजना के तहत बने इन आधे-अधूरे मकानों की ईंटें, छड़ें और यहां तक मलबा भी चोरों ने गायब कर दिया, लेकिन हाउसिंग बोर्ड के अधिकारी, कर्मचारी नकली निद्रा में लीन रहे। जब उन तक इस हैरतअंगेज डकैती की खबर पहुंचायी गई तब उन्होंने हड़बड़ाने का वैसा ही नाटक किया जैसा हमेशा बेइमान, नौकरशाह, नेता, राजनेता और सत्ताधीश करते आये हैं। अपने खून-पसीने की कमायी लुटी होती तो उन्हें कोई दर्द होता और चिंता-फिक्र भी करते। उनके पास तो इन 54 मकानों का कोई रिकॉर्ड ही नहीं था, जबकि नियम कहता है कि इन सभी मकानों की तस्वीरें फाइलों में होनी ही चाहिए थीं। अफसरों की खामोशी और टालमटोल चीख-चीख कर कह रही है कि यह तो ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ वाली नंगी कारस्तानी है। रेल यानी देश की संपत्ति रेलवे स्टीम इंजन को जिस इंजीनियर ने कबाड़ियों को बेचा उसका दमखम पुरस्कार के काबिल है। आदर सत्कार के हकदार तो रेलवे के अन्य अधिकारी और वो पुलिस दरोगा और उसके चेले-चपाटे भी हैं, जिन्होंने साथी बनकर सरकारी संपत्ति को बेचने का अदम्य साहस दिखाया। यह तो इन डकैतों और लुटेरों की बदकिस्मती है कि उनके अखंड भ्रष्टाचार का पर्दाफाश हो गया, लेकिन फिर भी उन्हें पता है कि उनका कुछ भी नहीं बिगड़ेगा। सफेदपोश डकैत देश की व्यवस्था के रेशे-रेशे से वाकिफ हैं। वे यह भी जानते हैं कि मामले को उसी कोर्ट में ही तो चलना है, जहां महंगे और ऊंचे वकीलों की फौज अपनी ‘कलाकारी’ दिखाती है और अक्सर मनचाहे फैसले का ‘उपहार’ दिलाती है। यदि अपने पक्ष में फैसला नहीं भी आता तो पेशी पर पेशी का चक्कर चलवाकर वर्षों मामले को लटकाये रखने का मायावी खेल होता रहता है। उनके मान-सम्मान और प्रतिष्ठा में कोई कमी नहीं आती। काले धंधे भी सतत चलते रहते हैं। नोटों की बरसात में मौज-मज़े करते हुए कानून के बौने और खुद के ताकतवर होने का डंका पीटते रहते हैं। धीरे-धीरे वो समय भी आ जाता है, जब ऊपरवाले का बुलावा आ जाता है और सारा खेला खत्म हो जाता है...।
Thursday, December 23, 2021
पुरुषो जवाब दो...
यह किस दुनिया के वासी हैं? दिमाग-विमाग है भी या यूं ही ये सांसद विधायक बन जाते हैं? इनके घरों में लड़कियां नहीं जन्मतीं! बस बेटे ही पैदा होते हैं? जब देखो तब लड़कियों को कोसते रहते हैं। उन्हें बोझ और कमतर मानते हुए राग-कुराग छेड़ते रहते हैं। इनकी निगाह में सारी आजादी और शिक्षा-दीक्षा के अधिकारी बेटे ही हैं। बेटियां तो पराया धन हैं। जितनी जल्दी छुटकारा मिल जाए, उतना अच्छा। बेटियों को नाम मात्र की स्कूली शिक्षा दिलवाना ही बहुत है। ज्यादा पढ़ेंगी तो लड़कों से आगे निकलने की हिमाकत करेंगी। ससुराल जाकर भी अकड़ दिखायेंगी। यह भूल जाएंगी कि पति तो परमेश्वर है। उसका बोला और कहा खुदा का आदेश है, जिसका पालन और अनुसरण करना हर पत्नी का कर्तव्य और धर्म है। सरकार तो बेवकूफ है। उसकी अक्ल मारी गई है, जो बेटियों को बेटों के बराबर खड़े करने के नियम-कानून बना रही है। कभी जमीन और आसमान की बराबरी हो पायी है? जमीन... जमीन है और आसमान... आसमान है, जिसकी ऊंचाई को लड़कियां नहीं छू सकतीं।
बेटों को ऊंचा आकाश मानने वाले महानुभवों के कानों तक जैसे ही यह खबर पहुंची कि सरकार ने फैसला किया है कि लड़कियों की शादी भी 21 वर्ष की उम्र में होनी चाहिए तो वे छटपटाने लगे और अपनी प्रतिक्रियाओं की गोलियां दागने लगे। यह इनकी पैदाइशी सनक भी है और बीमारी भी..., जिसका इलाज तलाशा जा रहा है। यह पुराने रोगी इस भ्रम में हैं कि इनकी अंट-शंट दलीलों में बड़ा दम है। सुनने वाले इनकी वाहवाही करेंगे। जोरदार तालियां भी बजेंगी, लेकिन सच तो यह है कि जितने भी समझदार भारतीय हैं, राष्ट्र प्रेमी हैं, लड़कियों का भला चाहते हैं, उन्हें आकाश की बुलंदियों को छूते देखना चाहते है वे इनकी बक-बक पर थू-थू कर रहे हैं। हां, यह बकबक और बेअक्ली नहीं तो और क्या है? कि... ‘‘लड़कियों की शादी तो 16-18 साल की दहलीज छूने के साथ ही कर दी जानी चाहिए। उसके बाद उनके बहकने, भटकने और गलत निगाहों में आने और सताये जाने का खतरा बढ़ जाता है। जब तक लड़कियां सोलह-सत्रह साल की रहती हैं, तब तक उनमें आकर्षण बरकरार रहता है। उनके साथ शादी करने वाले युवकों की कतारें लगी रहती हैं। उसके बाद तो मां-बाप को लड़के वालों की चौखट पर नाक रगड़नी पड़ती है। मोटा दहेज देने का प्रलोभन भी देना पड़ता है। 18 साल की उम्र ही शादी के लिए एकदम उपयुक्त हैं। इस उम्र में शादी न होने पर उनके आवारा होने की संभवनाएं और मौके बढ़ जाते हैं। लड़कियां अगर उच्च शिक्षा हासिल करना चाहती हैं तो शादी के बाद भी उनके लिए दरवाजे खुले रहते हैं।’’
कथन और यथार्थ के बीच कितना बड़ा फासला है इसका अंदाज बयानवीरों को नहीं है? या फिर हर जनहितकारी कदम का विरोध करना उनकी जन्मजात फितरत है? वे तो सवाल का जवाब देने से रहे, लेकिन मैं अपने पाठक मित्रों को बिहार की राजधानी पटना के एक गांव की महत्वाकांक्षी लड़की नेहा के बारे में बता रहा हूं। नेहा का अपने पैरों पर खड़े होने का सपना था। अच्छी तरह से पढ़-लिख कर बेहतर मुकाम पाने के बाद ही वह शादी करना चाहती थी, लेकिन उसके माता-पिता ने इस पुख्ता आश्वासन के साथ कि शादी के बाद भी उसकी पढ़ाई में कोई अड़ंगा नहीं आएगा, बिहार के सारण जिले के रहनेवाले त्रिलोकी कुमार के साथ शादी के रिश्ते में बांध दिया। शादी के चंद दिनों में ही उसकी समझ में आ गया कि पति और सास-ससुर उसे घर में कैद रखने के आकांक्षी हैं। वे कतई नहीं चाहते कि वह आगे की पढ़ाई जारी रखे और अपना करियर बनाने की सोचे। फिर भी नेहा ने उन्हें मनाने-समझाने की भरसक कोशिश की, लेकिन उनके कान पर तो जूं तक नहीं रेंगी। ऐसे में वह ससुराल से भाग खड़ी हुई। बाद में भेजी चिट्ठी में नेहा ने लिखा कि उसकी शादी यह कहकर कराई गई थी कि वह ससुराल में जाकर आगे की पढ़ाई पूरी कर सकती है। उसे करियर बनाने का भरपूर मौका मिलेगा, लेकिन ससुराल वाले जब आनाकानी करने लगे तो उसे मजबूरन वह कदम उठाना पड़ा, जो किसी को भी रास नहीं आनेवाला, लेकिन वह अपने जीवन के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकती। उसे हर हाल में अपने सपनों को साकार करना है। जिन्हें जो कहना और सोचना है... उनकी मर्जी...। नेहा के ससुराल छोड़कर भागने के बाद उसके माता-पिता ने थाने में ससुराल वालों के खिलाफ हत्या व शव गायब करने तक की रिपोर्ट दर्ज करवा दी। किसी ने किसी पुराने यार के साथ गायब हो जाने तो किसी ने पति पसंद नहीं आने के कारण भाग खड़े होने का शिगूफा छोड़ा। जितने मुंह उतनी बातें। बिलकुल वैसे ही जैसे लोगों की आदत है। उन्हें तो लड़कियों के पैदा होना ही शूल की तरह चुभता है। नारियों का पुरुषों को टक्कर देना उनका माथा घुमा देता है। उन्हें तो लड़कियों के मनपसंद कपड़े पहनना और रात को घर से बाहर निकलना भी नहीं सुहाता। उन्हें एक ही झटके में चरित्रहीन घोषित कर दिया जाता है। हर स्वाभिमानी नारी पर उंगलियां उठाने और उनपर शक करने वाले धुरंधर बड़ी आसानी से विधायक और सांसद भी बन जाते है! यही विद्वान विधानसभा में नसीहत देते हैं कि जब रेप होना ही है तो लेट जाओ और इसके मजे लो। बदतमीजी, मूर्खता, अभद्रता और बेहयायी के कीचड़ में डुबकियां लगाने वालों को टोका और रोका भी नहीं जाता! उलटे उनके बेहूदा प्रवचनों पर तालियां पीटी जाती हैं। ठहाके लगाये जाते हैं।
महिलाएं तो कभी भी पुरुषों की राहों में कांटे नहीं बिछातीं। उन्होंने तो कभी भी पुरुषों के कहीं भी आने-जाने पर आपत्ति नहीं जतायी। वे तो उनको मिलने वाली सुविधाओं और तरक्की पर खुश होती हैं। यह पुरुष ही क्यों नारी के खिलाफ ज़हर उगलने से बाज़ नहीं आते? क्या नारी को अपने सपनों को साकार करने का हक नहीं? क्या वह बेअदबी और बलात्कार होने पर चुप रहे? एसे अनगिनत सवाल हैं, जिनके उसे जवाब चाहिए। जब अधिकांश लोग ही तमाशबीन हैं। समाज भी उनकी मुट्ठी में है, तो आज की नारी इनकी क्यों सुने, क्यों न अपनी मनपसंद राह चुने? अब वह किसी की गुलाम होकर नहीं जीना चाहती। उसने भी दुनिया देखी है। इतिहास की किताबें पढ़ी हैं। वह पुरुष सत्ता की फितरत से अनजान नहीं है। उसने कभी नहीं कहा कि देवी मानकर मेरी पूजा करो। वह तो बस समानता का अधिकार चाहती है। बातें...बातें और आश्वासन सुनते-सुनते वह थक गई है। पता नहीं किसने यह पंक्तियां लिखी हैं, जो नारी की आकांक्षा, पीड़ा और पसंद, नापसंद को बखूबी बयान करती हैं,
‘‘तुमने कहा था हम एक ही हैं
तो अपने बराबर कर दो न
तुम क्रिकेट भी अपनी देखो
मैं सीरियल अपना भी लगाऊंगी
तुम थोड़ा हाथ बंटा देना
मैं जब भी किचन में जाऊंगी
मत करो वादे जन्मों के
इस पल खुशी की वजह दो न
कभी तुम भी सिर दबा दो मेरा
यह भी कमी एक खलती है
कभी बाजारों से ध्यान हटे तो
मकां को घर भी कर दो ना
आओ पास बैठो कुछ बातें करें
कभी दिल के जख्म भी भर दो न
तुमने कहा था हम एक ही हैं
तो अपने बराबर कर दो न।’’
Thursday, December 16, 2021
हर दिल में बसता है फौजी
वक्त का तो काम ही है चलते जाना, ढलते जाना, बीतते जाना। वक्त की तेज धारा की नदी की पता नहीं कितनी सदियों-सदियों से चली आ रही यह परिपाटी है। अटूट रीत है। इस नदी में जिन्हें तैरने का हुनर आता है, वही कमाल कर गुजरते हैं। उन्हीं के नाम का डंका बजता है। उन्हीं को सदियों तक याद रखा जाता है। यूं तो कितने इस धरा पर आते हैं और चले जाते हैं। सबको कहां याद रखा जाता है। याद रखा भी नहीं जा सकता। वक्त के वक्ष पर अपने अमिट हस्ताक्षर छोड़ जाने वीर... शूरवीर यकीनन किसी आम मिट्टी के नहीं बने होते। विधाता उन्हें बड़े मनोयोग से गढ़ता और बनाता है। तभी तो वे जीते जी सबके चहेते... तो चले जाने के बाद भी दिलों में बसेरा बनाये रहते हैं। अपने देश के प्रथम चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत और उनकी अर्धांगिनी मधुलिका के अंतिम संस्कार की टीवी पर जब खबरें आ रही थीं तब मैं उनकी वीरता, त्याग और अटूट समर्पण के बारे में सोच रहा था। आंखें नम हो रही थीं। ऐसा लग रहा था कि अपने बेहद करीबियों ने अचानक साथ छोड़ दिया है।
तीनों सेनाओं के प्रमुख योद्धा बिपिन रावत के साथ-साथ जिन 12 अन्य शूरवीरों को देश ने हेलिकॉप्टर दुर्घटना में खोया उन्हीं में शामिल थे शहीद गुरसेवक। उनका पार्थिव शरीर आर्मी के प्लेन से जैसे ही अमृतसर पहुंचा तो उनके पिता और भाई-बहन ताबूत से लिपटकर रोने लगे, लेकिन इस रोने में गर्व भी समाहित था। पत्नी अंतिम बार अपने शहीद पति का चेहरा देखने को तरसती रही, लेकिन सैन्य अधिकारियों ने शरीर की हालत ठीक न होने का हवाला देकर चेहरा दिखाने से मना कर दिया। गुरसेवक के चार साल के मासूम बेटे गुरफतह ने जब अपने पिता की अर्थी को अंतिम सैल्यूट किया तो वहां पर उपस्थित कोई भी ऐसा शख्स नहीं था, जिसका कलेजा न कांपा हो और अश्रुधारा बही न हो। चारों तरफ ‘भारत माता की जय’ और ‘शहीद गुरसेवक सिंह अमर रहे’ के नारे गूंज रहे थे और मासूम गुरफतह भीड़ को बड़े अचंभे के साथ देख रहा था। उसने वही यूनीफार्म पहन रखी थी, जो उसके पिता ने मात्र डेढ़ महीने पहले बड़े चाव से उपहार में दी थी।
शहीद कुलदीप सिंह राव के अंतिम दर्शनों के लिए उनके पैतृक गांव घरड़ाना में अथाह भीड़ उमड़ पड़ी। मां कमलादेवी और पिता रणधीर सिंह ने अपने लाड़ले बेटे की पार्थिव देह को जब भरी आंखों से सैल्यूट किया तो पूरा गांव जयकारों से गूंज उठा। शहीद की बहादुर पत्नी यश्विनी ने पति की तस्वीर सीने से लगा रखी थी। अंतिम यात्रा में वे शांत और खामोश रहीं। मुखाग्नि भी उन्होंने दी, लेकिन अंत में उनके सब्र का बांध टूट गया और चीख पड़ीं- ‘‘आई लव यू कुलदीप।’’
अभिता सिंह, डिप्टी कमांडेट, नेवी जो शहीद कुलदीप की बहन हैं को छोटे भाई के कहे यह शब्द बार-बार याद आ रहे थे, ‘देखना दीदी मैं भी सेना में जाऊंगा। तुमसे भी आगे और दुनिया मुझे देखेगी।’ बहन ने कभी कल्पना ही नहीं की थी कि जब देश पर मर मिटने की बारी आएगी तो छोटा भाई सचमुच उससे आगे निकल जाएगा। भाई तिरंगे में चिर निद्रा में सोया था और वह अपना सब्र खोते माता-पिता को संभालने में लगी हुई थीं। एल.एस. लिद्दर की 17 वर्षीय बेटी आशना अपने बहादुर पिता को मुखाग्नि देने के बाद पहले तो फफक-फफकर रोयी, फिर उसने खुद को संभाला और कहा कि, ‘‘मेरे पिता मेरे सबसे बड़े हीरो थे। मेरी हर बात मानते थे। यहां खड़े-खड़े मुझे सबकुछ याद आ रहा है। पापा की अच्छी यादों के साथ अब हमें जीवन जीना है।’’ ब्रिगेडियर की साहसी देश प्रेमी पत्नी गीतिका लिद्दर के शब्द थे, ‘‘मैं एक सैनिक की पत्नी हूं। हमें उनको अच्छी विदाई देनी चाहिए, मुस्कुराते हुए विदा करना चाहिए।’’
सच तो यह है कि सैनिकों की तरह उनके परिवार भी सच्चे होते हैं। योद्धा सैनिकों को अपने स्वजनों से ही भरपूर ताकत मिलती है और वो मनोबल भी मिलता है, जो उनके हौसलों को कभी भी ठंडा नहीं होने देता। माता-पिता, बहन, पत्नी और बच्चे जिस तरह से अपने आंसुओं को छुपाकर शहीद जवानों को याद कर गर्वित हो रहे थे, उसी से पता चल रहा था कि सैनिकों को धूप, बरसात, बर्फ आंधी में भी कौनसे स्नेह और अपनत्व की ताकत हर पल ऊर्जावान बनाये रहती है। जनरल बिपिन रावत के पिता और दादा भी सेना में थे। सेना नायक का तो जन्म ही राष्ट्र के लिए हुआ था। उनकी पत्नी भी सैनिकों के परिवारों के हित के प्रति समर्पित थीं। जनरल रावत छोटे-बड़े सैनिक में कभी कोई भेदभाव नहीं करते थे। सेना के अधिकारियों के घरों में जवानों के काम करने की परिपाटी को उन्होंने ही खत्म किया। उन्हें उन जयचंदों से भी घोर नफरत थी, जो खाते भारत का है और गाते पाकिस्तान का हैं। सेना में अवैध हथियारों की खरीद-फरोख्त, कमीशनबाजी, नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद और मनमानी पोस्टिंग पर भी उन्होंने बंदिशें लगा दी थीं। चीन और पाकिस्तान उनसे खौफ खाने लगे थे। उन्हें किसी भी शोषण प्रवृत्ति से नफरत थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो उनपर अटूट भरोसा करते ही थे, उनके गांव के लोग भी उनके सरल स्वभाव के मुरीद थे। उनकी बेबाकी, निडरता और साहस की दास्तानें श्रद्धांजलि देने पहुंचे लोगों की जुबान पर थीं। लोग रणनायक के बारे में बताते-बताते खामोश हो जाते। अपने नायक को खोने की पीड़ा आंसू बन बहने लगती। सहज, सरल यह शूरवीर जब भी गांव आते तो गांव वालो से गढ़वाली में बात करते थे। रिटायरमेंट के बाद योद्धा का अपने पिछड़े गांव के लिए बहुत कुछ करने का इरादा था। अभी उनका एक साल का कार्यकाल और बचा था। उत्तराखंड के जिला पौड़ी गढ़वाल में है जनरल का गांव सैण। हैरतभरा सच यह भी है कि उनके घर तक जाने के लिए पक्की सड़क तक नहीं है। देश का रणनायक घर तक पक्का मार्ग चाहता था, लेकिन...? किसी राजनेता का घर होता तो उसे डेढ़ से दो किलोमीटर पक्की सड़क बनने का इंतजार नहीं करना पड़ता। नेताओं के बच्चों की जब जंगलों में भी शादी समारोह होते हैं तो वहां पर पहुंचने के लिए रातोंरात पक्की सड़कें बन जाती हैं! यही फर्क सबको नजर आता है, जो बहुत तड़पाता है। राजनेता दिखावा करते हैं। फौजी तो आम भारतीयों के दिलों में बसते हैं। हर सजग राष्ट्र प्रेमी भारतीय सैनिकों के अपमान, अवहेलना से चिंतित और दुखी है। कवि पप्पू सोनी की कविता भी देशवासियों की पीड़ा, चिंता और कटु सच से रूबरू कराने के साथ-साथ और भी बहुत कुछ कह रही है,
‘‘आज दिशाएं मौन यहां,
कलम मेरी थर्राती है।
वाणी भी नि:शब्द हुई,
और बुद्धि भी चकराती है।
क्रूर नियति की दुर्घटना से,
मेरा भारत छला गया।
असाधारण अजेय सेनापति,
मेरे देश का चला गया।
राष्ट्र सुरक्षा और सेना की,
पावन वर्दी उनका ईमान रही।
देश के खातिर हर खतरे से,
टकराना उनकी पहचान रही।
आतंक और चीन की चालाकी को
हर पग से ललकारा है।
जो भी टकराया भारत से,
वो हर शत्रु हारा है।"
