भारत वर्ष का ही एक गांव है, व्यासपुरा। इसी गांव की एक नाबालिग दलित लड़की मोहल्ले की दुकान पर सामान लेने गई थी तभी दो युवकों ने इशारा कर उसे अपने पास बुलाया। कोई काम होगा, यह सोचकर वह उन तक गई। तो उन्होंने उसे बंदूक दिखायी, डराया, धमकाया और चुपचाप साथ चलने को कहा। किसी सुनसान स्थान पर ले जाकर उस पर बलात्कार कर दोनों यह कहकर चलते बने कि अगर पुलिस वालों को खबर की तो तुम्हारे मां-बाप को मार डालेंगे। लड़की के साथ हुई बातचीत और यहां तक कि उसके साथ हुए दुष्कर्म को भी गांव के ही कुछ लोगों ने अपनी आंखों से देखा, लेकिन किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा। देखकर भी अनदेखा कर अपने-अपने घरों में जाकर बैठ गये। लड़की ने अपने घर में जाकर अपने साथ हुई दरिंदगी की जानकारी दी तो मां-बाप का खून खौल उठा। वे फौरन बेटी को लेकर पुलिस स्टेशन जा पहुंचे। वहां पर जो खाकी वर्दीधारी विराजमान थे उनका अपने दायित्व और कर्तव्य से कोई लेना-देना नहीं था। वे बलात्कारियों के रुतबे से वाकिफ थे। हो सकता है उन्हें कुछ धन देकर समझा दिया गया हो कि उन्हें क्या करना है। बिक चुके पुलिसियों ने लड़की के मां-बाप से कहा, जो होना था हो गया। थाने और कोर्ट-कचहरी के चक्कर में पड़ोगे तो अपना घर बेचने की नौबत आ जाएगी। फिर भी न्याय नहीं मिल पायेगा। वे करोड़पति हैं, अपने बचाव के लिए महंगे से महंगे वकीलों को खड़ा करने की अथाह ताकत रखते हैं। तुम कितना भी जोर लगा लो, उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाओगे, इसलिए अक्लमंदी इसी में है कि कुछ रुपये लेकर समझौता कर लो और चुपचाप घर में जाकर आराम करो।
उत्तरप्रदेश के हमीरपुरा में एक लड़की अपने ब्वॉयफ्रेंड के साथ गार्डन में बैठी थी। तभी वहां छह लड़के आए और उन दोनों से पूछताछ करने लगे। कहां रहते हो? यहां क्या काम करने आए हो? दोनों ने बड़ी अदब के साथ उनके हर सवाल का जवाब दिया, लेकिन उनकी तो नीयत में ही खोट था। उन बदमाशों ने पहले तो दोनों को डंडे और बेल्ट से मारा-पीटा। दोनों हाथ जोड़ते रहे लेकिन उन्होंने लड़की को निर्वस्त्र कर वीडियो बनाया। गार्डन में मौजूद तमाशबीन इसलिए चुप्पी साधे रहे क्योंकि जिस लड़की के कपड़े उतारे गये वह न तो उनकी बेटी थी और न ही कोई करीबी रिश्तेदार।
बिहार की राजधानी पटना से लगे नौबतपुरा में एक व्यक्ति ने अपनी बेटी पर एक-एक कर पांच गोलियां इसलिए दागीं क्योंकि उसका किसी युवक से प्रेम प्रसंग चल रहा था। युवती अस्पताल में मौत से जंग लड़ रही है। युवती की मां ने पूछताछ में पुलिस से कहा कि गोलियां गलती से चलीं। जब पुलिस ने सवाल दागा कि गलती से तो एकाध गोली चल सकती है, पांच गोलियां कैसे चलीं? पतिव्रता पत्नी से इस प्रश्न का जवाब देते नहीं बना। वह तो येन-केन-प्रकारेण अपने पति परमेश्वर को कानून के शिकंजे से बचाना चाहती थी।
किसी को बचाने और किसी को फंसाने के खेल में सच फांसी के फंदे पर लटका दिखायी दे रहा है। कुछ दिन पहले एक खबर पढ़ी। शीर्षक था, दुष्कर्म के मुआवजे में घूस। राजस्थान में बलात्कार की शिकार नाबालिग बच्चियों को अधिकतम पांच लाख रुपये का मुआवजा देने का प्रावधान है। राजस्थान के पाली में वासना के भूखे भेड़ियों ने आठ साल की एक बच्ची से दुष्कर्म कर सड़क पर फेंक दिया। सरकारी योजना के तहत बच्चों के भविष्य के लिए सवा चार लाख की राशि स्वीकृत की गयी थी। इस सहायता राशि को बच्ची के मां-बाप को देने में बाल कल्याण समिति के कर्ताधर्ताओं को तकलीफ होने लगी। बच्ची के मां-बाप जब चक्कर काट-काटकर थक गये तो उन्होंने समिति के अध्यक्ष से पूछा कि आखिर वे चाहते क्या हैं? तो उन्होंने बड़ी बेशर्मी से कहा कि जब तुम्हें मुफ्त में माल मिल रहा है तो हमें हमारा हिस्सा भी तो मिलना ही चाहिए। सरकारी मुआवजे की राशि में रिश्वत के रूप में अपना दस प्रतिशत हिस्सा मांगने वाले बेईमानों को एसीबी की टीम ने गिरफ्तार तो कर लिया है, लेकिन इस लूट परंपरा पर ज़रा भी आंच नहीं आई है। बलात्कारी भी बेखौफ हैं। यह सच कितना चौंकाने वाला है कि राजस्थान में ही कई बच्चियां दुष्कर्मियों की शिकार होकर गर्भवती तक हो जाती हैं, लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिलता। सरकारी मुआवजा तो बहुत दूर की बात है। नारियों से बलात्कार और अन्याय के मामले में अकेले राजस्थान को कटघरे में करने का हमारा कोई इरादा नहीं। हमारे देश के हर प्रदेश में बच्चियां, और महिलाएं असुरक्षित हैं। महिलाओं को अपने घर से बाहर निकलते ही कई मुश्किलों तथा खतरों से रूबरू होना पड़ता है। अस्मत के लुटेरे ताक में लगे रहते हैं, मौका पाते ही अपनी मनमानी कर गुजरते हैं। कार्यालयों, स्कूलों, कॉलेजों, सड़कों, चौराहों, बसों, रेलगाड़ियों, बाग-बगीचों में घोषित गुंडे-बदमाशों तथा सफेदपोशों की गंदी निगाहें नारी देह पर विषैले सांप की तरह रेंगती रहती हैं। महिलाओं पर छींटाकशी करना, घूरना और अभद्र इशारे करना उनके लिए मनोरंजन का साधन है। कामकाजी महिलाएं और छात्राएं उचक्कों की सीटीबाजी, शारीरिक छेड़छाड़ और अश्लील शब्दावली को सुनते-सुनते तंग आ जाती हैं। तमिलनाडु में महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक नया कानून बनाया गया है। यदि कोई सड़क छाप मजनू या सफेदपोश रसिक महिलाओं के साथ गंदी अभद्र हरकतें करते पाया और पकड़ा जाता है तो उसे जेल की हवा खाने से कोई नहीं बचा पाएगा। उसका सलाखों के पीछे पहुंचना तय है।
महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानून तो पहले भी बने हैं। देश का हर प्रदेश खुद को महिलाओं के सशक्तिकरण का पक्षधर दिखाने की कोशिश करता है। केंद्र सरकार के सत्ताधीश भी नारियों के सम्मान पर कोई आघात नहीं लगाने की सीख देते नहीं थकते, लेकिन अधिकांश राजनेता खुद नारी को कितना सम्मान देते हैं, इसका पता उनकी बातों और व्यवहार से चलता रहता है। इस कलमकार ने कितने नेताओं को मां-बहन की गालियां देकर गर्वित होते देखा है। यह सच भी जगजाहिर है। कई अश्लील गालीबाज और बलात्कारी तो विधायक और सांसद भी बनने में सफल हो जाते हैं। उन पर सवाल भी उठते हैं, लेकिन उनका बस यही रट्टा-रट्टाया जवाब होता है कि उनसे ज्यादा चरित्रवान तो और कोई हो ही नहीं सकता। राजनीति में ऐसे झूठे आरोपों का सुनने और सहने की तो हमारी आदत पड़ चुकी है। कुत्ते भोंकते रहते हैं और हाथी अपनी चाल में मस्त चलता चला जाता है। खुद को हाथी बताने वालों ने ही देश के लोकतंत्र को शर्मिंदा कर रखा है। जहां पुलिस बिक रही हो, अमीर अपराध पर अपराध के बाद भी कानून के शिकंजे से दूर न्याय व्यवस्था की खिल्ली उड़ा रहे हों और गरीब न्याय के लिए तरस रहे हों तो वहां सवाल तो उठने ही हैं। वो दौर खत्म हुआ जब न्यायाधीशों को न्याय का देवता माना जाता था, लेकिन अब तो उन पर भी उंगलियां उठने लगी हैं। ये भी सच है कि सभी जज दागी नहीं, लेकिन ये भी तो सच है कि एक सड़ी हुई मछली सारे तालाब को गंदा और विषैला बनाकर रख देती है। आज देश की लगभग व्यवस्था क्यों कटघरे में है इसका जवाब भुक्तभोगी बड़ी आसानी से दे सकते हैं, लेकिन उनकी यहां सुनता कौन है?
Thursday, August 25, 2022
सवाल तो जरूर उठेंगे...
Thursday, August 18, 2022
इनका कौन करे इलाज?
‘‘यह मेरी बेटी है। उम्र है 16 साल। इसकी कीमत मैंने रखी है, एक लाख रुपये। इससे एक धेला भी कम नहीं लूंगा। पसंद है तो मोल चुकाओ और अभी अपने साथ ले जाकर मन में जो आए वो करो। यह हमेशा अपना मुंह बंद रखेगी।’’ अपनी ही बेटी की बोली लगाते इस नराधम पिता की आत्मा मर चुकी है। इसके लिए बेटी से ज्यादा पैसा कीमती है। हो सकता है कि आपको हैरानी हो, लेकिन यही हकीकत है कि देश के प्रदेश राजस्थान में स्थित उदयपुर व झाड़ोल के बीस से ज्यादा गांवों में आज भी बेटियां बेची जा रही हैं। बेचने वालों में देह के दलाल भी हैं और सगे मां-बाप भी, जिनकी दलालों से भी बदतर भूमिका है। देह के भूखे बड़ी आसानी से 50 हजार से एक-डेढ़ लाख में लड़कियां खरीदकर ले जाते हैं और अपनी वासना की सेज सजाते हैं। यह देश की बदकिस्मती है कि इस शर्मनाक कारोबार में कई नेता भी शामिल हैं, जो एक तरफ विभिन्न मंचों पर ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ का राग अलापते हैं, तो दूसरी तरफ बेटियों को बेचने-बिकवाने में संकोच नहीं करते। गुजरात से सटा शहर उदयपुर कोई छोटा-मोटा शहर नहीं है, न ही अंधेरे में डूबा रहता है, जो वहां लगने वाला मासूम बेटियों का बाजार किसी को दिखायी न दे। सबकुछ खुलेआम... बेखौफ हो रहा है। कई बेटियां तो बार-बार बिक रही हैं। झाड़ोल के पारगियापाड़ा के रामलाल ने तीन साल पहले अपनी बड़ी बेटी को दो लाख में किसी रईस को बेचकर खून के रिश्ते को कलंकित किया था। रणजीतपुरा की 15 साल की बेटी की डेढ़ लाख की बोली लगी और उसे गुजरात का एक व्यापारी बड़ी शान से अपने साथ ले गया था। वहीं के एक जागरूक संवेदनशील शिक्षक से यह जुल्म देखा नहीं गया तो वह उस बेटी को व्यापारी की कैद से मुक्त करा लाया, लेकिन लालची नकारा बाप फिर से कोई मोटा ग्राहक ढूंढ़ता फिर रहा है। इसी रेतीले प्रदेश की ही जो 12 बेटिया केरल में बेचने के लिए ले जायी गई थीं उन्हें पुलिस की मदद से जैसे-तैसे वापस लाया गया।
जिन लोगों की किन्ही वजहों से शादी नहीं हो पाती उन्हें यहां बड़ी आसानी से छोटी-बड़ी लड़की मिल जाती है। पचासों शातिर दलाल हैं, जो बाल तस्करी भी कर रहे हैं और कुंवारों की शादी की तमन्ना पूरी कर माया बटोर रहे हैं। देश को आजाद हुए 75 वर्ष हो गये, लेकिन बेटियां अभी भी गुलाम हैं। उन पर तरह-तरह से जुल्म ढाए जा रहे हैं। उनके बचपन और सपनों को बड़ी बेदर्दी से रौंदा जा रहा है। नारंगी नगर नागपुर में अंधविश्वास ने पूरे परिवार के दिमाग के सोचने-समझने की क्षमता छीन ली। उन्हें इस कदर विवेकशुन्य और अंधा बना दिया कि उन्होंने अपनी ही पांच साल की मासूम अबोध बेटी अनक्षी की जादू-टोने के चक्कर में पीट-पीट कर नृशंस हत्या कर दी। गुरू पूर्णिमा के दिन अनक्षी की तबीयत बिगड़ने पर उसे तांत्रिक शंकर बाण के यहां ले जाया गया। अनक्षी का जन्मदाता सिद्धार्थ चिमणे पढ़ा-लिखा है। यू-ट्यूब चैनल चलाता है। कई लोग उसके पास अपनी समस्याओं को सुलझाने के उपाय जानने आते हैं। मेडिटेशन और भाषण दागने में भी वह निपुण माना जाता है। ऐसे ज्ञानी-ध्यानी पिता की बेटी की जैसे ही तबीयत बिगड़ी तो पूरे परिवार ने टोने-टोटके प्रारंभ कर दिए। तांत्रिक के यह बताने पर कि बच्ची पर बुरी आत्मा का साया है तो पूरा परिवार ही बच्ची का शत्रु हो गया। तांत्रिक ने पहले तो मठ में झाड़-फूंक और पूजा-पाठ की। फिर परिवारवालों को घर में ही टोटके करते रहने की सलाह दी। ढोंगी बाबा के चक्कर में अंधे हो चुके परिवार ने बच्ची को यातनाएं देनी प्रारंभ कर दीं। उसे बेल्ट से मारने के साथ-साथ ज़िस्म पर सुइंया चुभो-चुभोकर पूछा जाता कि बता तेरे शरीर में कौन आया है? नादान भोली-भाली बच्ची क्या जवाब देती? उसके पास तो रोने-बिलखने के सिवा और कोई चारा ही नहीं था। असहनीय पीड़ा से वह कराहती रहती, लेकिन किसी को भी उस पर रहम न आता। इस दौरान उसे न खाने को कुछ दिया गया और ना ही पीने को पानी। लगातार मारपीट से बेहाल भूखी-प्यासी बच्ची ने अंतत: प्राण त्याग दिए। मेडिकल अस्पताल में जब पांच वर्षीय गुड़िया उर्फ अनक्षी को पोस्टमार्टम के लिए लाया गया, तब वहां पर भीड़ लगी थी। नजदीकी तथा दूर के रिश्तेदार भी वहां मौजूद थे। हर कोई हतप्रभ था। इस इक्कीसवीं सदी में ऐसी क्रुर अंधी श्रद्धा... तांत्रिक पर घोर विश्वास! ऐसा कोई नहीं था, जिसकी आंखें न भीगी हों और उसे गुस्सा भी न आया हो। मासूम बच्ची को ऐसी वहशी निर्दयता के साथ पीटा गया था, जिससे उसकी चमड़ी छिल गई थी। शरीर पर किसी नुकीली वस्तु तथा आग से दागने के गहरे निशान स्पष्ट दिखायी दे रहे थे। गुड़िया के हत्यारों को मगरमच्छी आंसू बहाते देख सभी को बड़ा गुस्सा आ रहा था। उनका तो मन हो रहा था कि इन शैतानों... हैवानों को पीट-पीट कर अधमरा कर दें, लेकिन यदि वे खून-खराबे पर उतर आते तो बेटी के हत्यारों और उनमें क्या फर्क रह जाता। यही आत्मनियंत्रण और इंसानी सोच ही तो अभी तक रिश्तों तथा मानवता को पूरी तरह से मरने से बचाये हुए है।
बच्चियों और महिलाओं पर जुल्म ढाने में तथाकथित साधु-महात्मा भी कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। नकली संतों, प्रवचनकारों ने हाल के वर्षों में अपनी साख को खोने का कीर्तिमान रचा है। नामों को गिनाने का कोई फायदा नहीं। सभी सजग भारतीय उन्हें जानते हैं। अफसोस तो इस बात का है कि धोखे पर धोखे खाने के बाद भी लोग सतर्क नहीं हो रहे हैं। अंधविश्वास की जड़ें इतनी गहरी हैं कि दिल-दिमाग से बाहर निकल ही नहीं पा रही हैं। खासकर महिलाएं तो कपटी और धूर्त नकली साधुओं के चंगुल में बार-बार बड़ी आसानी से फंस रही हैं। अभी हाल ही में साधु बाबा की शक्ल में एक भेड़िये वैराग्यनंद गिरी उर्फ मिर्ची बाबा को पुलिस ने दबोचा है। रायसेन की एक महिला शादी के चार साल होने के बाद भी संतानहीन थी। पति और सास ने ताने मारने शुरू कर दिये थे कि कैसी औरत हो, जो अभी तक एक बच्चे को जन्म नहीं दे सकी। दिल में तीर-सी चुभने वाली बातें सुनते-सुनते वह तंग आ चुकी थी। हर पल तनाव उसे दबोचे रहता था। इसी दौरान मोहल्ले की किसी औरत ने उसे बताया कि, भोपाल में मिर्ची बाबा नाम के एक पहुंचे हुए योगी रहते हैं, जिनकी दवाई से बांझ औरत को भी बच्चा हो जाता है। हताश और निराश इंसान को जब कोई पक्का भरोसा दिलाता है, तो वह मौका गंवाना नहीं चाहता। ज्यादा विचार किए एक दिन वह महिला मिर्ची वाले बाबा के दरबार में जा पहुंची। बाबा ने उस खूबसूरत महिला को अपने बगल में बैठाकर बच्चा होने का विश्वास दिलाते हुए कोई दवा खिलाई। जिसे खाने के कुछ पलों के बाद महिला का माथा चकराने लगा। शातिर शिकारी बड़ी आसानी से महिला से दुष्कर्म करने में सफल हो गया। जब महिला को होश आया तो बाबा ने उसकी पीठ सहलाते हुए कहा, घबराओ नहीं। मेरी दवा कभी भी असरहीन नहीं होती। अब तुम घर जाओ। हां, बीच-बीच में आकर मिलती रहना। तुम्हारे यहां जरूर अत्यंत खूबसूरत गोल-मटोल बच्चा पैदा होगा, जिसे देखकर तुम्हें अपनी किस्मत पर नाज होगा। हां, तब तुम हमें मिठाई खिलाना भी नहीं भूलना। महिला बाबा के दरबार में तो चुपचाप उसकी सुनती रही, लेकिन बाहर निकलने के बाद उसने थाने में रिपोर्ट दर्ज करवा दी। नि:संतान महिला पर बलात्कार करने वाला अय्याश कुसंत पुलिस से बचने के लिए यहां-वहां भागता रहा, लेकिन अंतत: पकड़ में आ ही गया है। झांसे और प्रलोभन के जाल फेंकने में अभ्यस्त वैराग्यनंद गिरी राजनेताओं का भी अत्यंत प्रिय रहा है। वह उनको चुनाव में विजयी होने का ही आशीर्वाद नहीं देता, बल्कि उसके लिए पूजा-पाठ और कर्म-कांड भी करता रहा ह। वैसे ही जैसे महिलाएं उसके जाल में फंसती रही हैं वैसे ही कई नेता भी उसके मायावी जाल से नहीं बच पाये। इसने कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह की जीत के लिए कभी मिर्ची से हवन-पूजन कर खूब प्रचार तथा चर्चाएं बटोरी थीं, लेकिन दिग्विजय सिंह की लोकसभा चुनाव में जो शर्मनाक हार और दुर्गति हुई वो सबको पता है।
Wednesday, August 10, 2022
दुनिया तुम्हें देखे
समय की ताकत को कोई भी नहीं पहचान पाया। यह इतना शक्तिशाली है कि बड़े-बड़े सूरमा पलक झपकते ही इसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं, तिनके की तरह बिखर-बिखर जाते हैं। यह वक्त ही है जो राजा को रंक तो रंक को राजा बनाता है। यह भी अकाट्य सत्य है कि अनुकूल और प्रतिकूल हालात जीवन के ही रंग हैं जो हर इंसान को देखने ही पड़ते हैं। कोई इन बदलते दृश्यों से घबरा जाता है तो कोई अपने रास्ते तलाश कर लेता है। कोई भी कठिनाई कई लोगों को रास नहीं आती। उन्हें लगने लगता है कि अपने बस में अब कुछ भी नहीं रहा। हमारी तो किस्मत ही खराब है। सतत सघर्षों से जूझते और सफलताओं-असफलताओं से मेल-मिलाप करते रहे एक विख्यात लेखक और अभिनेता कहते हैं कि अगर हम हारें नहीं तो बहुत कुछ कायम रहता है। जिन्दगी से जो चाहिए, मांग कर तो देखिए। निराश होकर हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहने वालों को यहां कुछ नहीं मिलता। वे तो बस दूसरों के लिए तमाशा ही बनकर रह जाते हैं।
एक ही शहर में एक ही समय में दो लोगों को अचानक अपनी आंखों की रोशनी खोनी पड़ी। एक तो निराशा के सागर में डूब गया और पेट भरने के लिए फौरन उसने भीख मांगने का रास्ता चुना। वर्षों बाद आज भी उसे शहर के मंदिर के सामने भीख का कटोरा थामे देखा जा सकता है। कई बार उसे दुत्कारा और फटकारा भी जाता है। तुम्हें शर्म नहीं आती, अच्छे खासे हट्टे-कट्टे होकर भी भीख मांगते हो! लोगों की गालियां सुनने की तो उसे आदत पड़ चुकी है। दिन भर भीख में जो चंद सिक्के मिलते हैं, उन्हीं से शाम होते ही दारू खरीद कर पीता है और नशे में बेसुध होकर यहां-वहां सो जाता है। दूसरे शख्स ने आंखों की रोशनी खोने के बाद भी निराशा का दामन नहीं थामा। प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद हार नहीं मानी। संघर्ष-दर संघर्ष करते हुए अपनी राह बनायी। अंधेरे को उजाले में बदला। सड़कों पर पेन बेचे, अगरबतियां बेचीं तथा और भी कई सामान बेचकर अपना मस्तक ताने रखा। पिछले तीस साल से दृष्टि बाधित इस लड़ाकू इंसान को आज भी तामिलनाडु के शहर मदुरे में स्थित सरकारी प्रिंटिंग प्रेस में किताबें, पैम्फलेट और पत्रिकाएं बनाने के लिए मुद्रित पृष्ठों को काटते, सिलते व स्टेपल करते देखा जा सकता है।
भावेश भी दृष्टिहीन हैं। उम्र पचास के आंकड़े को पार कर चुकी है, लेकिन उनकी हार नहीं मानने की दूर-दूर तक कोई सानी नहीं। भावेश की बचपन में ही रेटिना मस्कुलर डेटोरिएशन की बीमारी के कारण आंखों की रोशनी कुछ कमजोर थी। 23 साल की उम्र में जब वह एक बड़े होटल में मैनेजर थे तभी उनकी आंखों की रोशनी पूरी तरह से जाती रही। अच्छा-खासा इंसान बेबस और बेरोजगार हो गया, लेकिन भावेश ने खुद को कमजोर नहीं होने दिया। उन्होंने तो बस तकलीफों और परेशानियों के समंदर को तैर कर पार करने की ठान ली। इस दौरान कैंसर से जूझ रही मां चल बसी, लेकिन उनकी सीख बेटे के खून में दौड़ रही थी, ‘तुम भले ही दुनिया न देख सको, लेकिन दुनिया तुम्हें देखे।’ भावुक और संवेदनशील भावेश की कला के प्रति बचपन से ही दिलचस्पी थी। तीन-चार वर्षों तक घूम-घूमकर मोमबतियां बेचीं। उसके पश्चात कुछ बड़ा करने की ठानी। नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड में एक साल रहकर कैंडल मेकिंग सहित अपनी अभिरुचि के कुछ और भी कई कोर्स किए। 1994 में महाबलेश्वर में सनराइज कैंडल की स्थापना की। कुछ समय के पश्चात अलग-अलग शहरों में मोमबती के स्टॉल लगाने प्रारंभ कर दिए। 2007 में पुणे में आयोजित विशाल प्रदर्शनी में एक साथ 12 हजार मोमबतियां प्रदर्शित कर भावेश ने लाखों की संख्या में आये लोगों का दिल जीत लिया। यही वो शानदार मौका था, जिसने भावेश की किस्मत ही बदल दी। आज भावेश मोमबती व्यवसाय के अत्यंत प्रेरक सम्राट हैं। अरबपति हैं। रोशनी देने वाले व्यवसाय से कई घरों में उजाला करते भावेश लगभग दस हजार लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने का कीर्तिमान रच चुके हैं। उनकी जिंदगी का यही उद्देश्य है, उम्मीद का हमेशा दामन थामे रहो, सब मिलकर आगे बढ़ो और आसपास ही अवसर खोजते रहो। उनके माध्यम से हजारों लोगों ने मोमबती बनाने का हुनर सीखकर अपनी जिन्दगी संवारी है और संवार रहे हैं। ध्यान रहे कि वर्तमान में एक हजार से ज्यादा मल्टीनेशनल कंपनियां सनराइज कैंडल्स की ग्राहक हैं। अपनी अटूट मेहनत और जुनून की बदौलत सफलता के शिखर को छूने वाले कर्मवीर भाटिया आज हर किसी के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं।
बीते दिनों देश भर में अखबारों और न्यूज चैनलों पर यह खबर छायी रही, ‘गुजरात के जूनागढ़ निवासी सोलंकी परिवार ने पांच घंटे में दो स्वजनों को खोने के बाद भी ‘मृत्यु को महोत्सव’ में तब्दील कर दिया। सोलंकी परिवार की गर्भवती पुत्रवधू मोनिका बेन की अचानक तबीयत खराब हो गई थी। अस्पताल में ले जाते समय रास्ते में उन्हें मिर्गी का तेज दौरा पड़ा। मोनिका तो इलाज के दौरान चल बसीं, लेकिन गर्भस्थ शिशु जीवित था। परिवारजनों की सहमति पर डॉक्टरों ने सीजर कर प्रसव करवाया, लेकिन कुछ देर के बाद नवजात बालिका ने भी दम तोड़ दिया। मात्र पांच घण्टों में दो स्वजनों को खोने की पीड़ा से जूझते सोलंकी परिवार को मोनिका बेन के नेत्रदान के संकल्प की याद थी। उनकी आंखों से कोई और भी ये संसार देख सके इसलिए नेत्रदान और फिर बाद में बैंडबाजे के साथ अंतिम संस्कार किया।
आध्यात्मिक गुरू और लेखक (स्वामी मुक्तानंद) का कथन है कि हम सब सुखी और सफल जीवन जीना चाहते हैं, किंतु हमसे अधिकांश लोग या तो ऐसा जीवन जीने के लिए आवश्यक जरिए नहीं जानते या फिर हमें उसके लिए आवश्यक कीमत पता नहीं होती अथवा इस विषय में गलत अवधारणाएं होती हैं। हमारी किसी भी उपलब्धि के पीछे एक चीज़ है हमारे विचार। हम जीवन में जो कुछ भी करते हैं उसके प्रणेता हमारे ही विचार होते हैं। जहां चाह होती है, वहां राह निकल ही आती है। हौसले की उड़ान को कोई नहीं रोक सकता। कहने को तो ये शब्द हैं, लेकिन इनके अर्थ को सार्थक करने वालों को हमेशा सम्मानित और याद किया जाता है।
स्वतंत्र भारत में हर भारतीय को अपने मन की करने की पूर्ण आजादी है। इस हक को कोई भी नहीं छीन सकता। अपनी सुख-सुविधाओं और खुशियों के साथ-साथ दूसरों की तमन्ना और प्रसन्नता में खलल डालने का किसी को कोई अधिकार नहीं है। यह अटल हकीकत है कि ओछी और गिरी हरकतें हमेशा नापसंद की जाती हैं। स्वार्थी लोगों से भी दूरी बनाने का जगजाहिर चलन है। यहां उसी को इज्जत मिलती है जो अपने स्वाभिमान को जिन्दा रखता है और कभी किसी को आहत नहीं करता। हमेशा संघर्षरत रहना जिन्दा इंसान की ही पहचान है। अच्छी साख और मान-मर्यादा ही तो हम सभी कि एकमात्र दौलत है...। 15 अगस्त...स्वतंत्रता दिवस, अमृत महोत्सव की हर सजग देशवासी को अपार शुभकामनाएं...ढेरों बधाइयां।
Thursday, August 4, 2022
शराबी की खराबी
Thursday, July 28, 2022
लेनी है तो बस अपनी जान लो...
संतरा नगरी नागपुर में स्थित है वर्धा रोड। यह सड़क अहिंसा के सच्चे पुजारी महात्मा गांधी की कर्मभूमि वर्धा तक ले जाती है। इसी सड़क के खापरी नाके पर भरी दोपहर लोगों ने एक मारुति 800 कार जलती देखी। देखने वालों का तो तन-बदन कांप गया। पूरे ज़िस्म के रोंगटे खड़े हो गए। तरह-तरह की अटकलें लगायी जाने लगीं। आजकल चलती कारों में अचानक आग लगना कोई नयी बात नहीं है। दमकल वाहन के घटनास्थल पर पहुंचते-पहुंचते कार पूरी तरह से आग की चपेट में आ चुकी थी। तब तक कार चालक की मौत हो चुकी थी। गंभीर रूप से झुलस चुकी महिला और युवक ने कार से उतर कर सड़क किनारे जमा हुए पानी में लेटकर अपने बदन की आग बुझायी। दोनों को तुरंत अस्पताल ले जाया गया है। दूसरे दिन जब शहर के दैनिक अखबारों में कार के साथ पूरी तरह से जलने के बाद मौत के हवाले हुए पुरुष और किसी तरह से बचने में कामयाब रहे युवक और उसकी मां के बारे में खबरें छपीं तो यह कहानी सामने आयी। 63 वर्षीय रामराज भट कभी खुशहाल जिन्दगी जी रहे थे। शहर में स्थित एमआइर्डीसी परिसर में नट-बोल्ट बनाने का उसका कारखाना था, लेकिन कोविड काल में कारोबार पर जो गहरी चोट लगी उससे रामराज का मनोबल लस्त-पस्त हो गया। मस्तिष्क ने काम करना ही बंद कर दिया। धीरे-धीरे आर्थिक संकट ने ऐसा घेरा कि उससे बाहर निकलना मुश्किल हो गया। दरअसल रामराज व्यापारी तो था, लेकिन आसान राह पर चलने का आदी था। अपने कारखाने के लिए उसने किसी फाइनेंस कंपनी से 10-12 लाख का कर्जा ले रखा था। समय पर किस्तें नहीं भरने की वजह से जब कंपनी के तकादे के नुकीले तीर चलने शुरू हुए तो वह बुरी तरह से घबरा गया। दिन-रात इज्ज़त लुटने का भय सताने लगा। रामराज के बेटे नंदन ने इंजीनियरिंग की डिग्री तो ले ली थी, लेकिन नौकरी करने की बजाय आगे पढ़ना चाहता था। रामराज चाहता था कि बेटा तुरंत नौकरी का दामन थाम ले, जिससे उसकी आर्थिक दिक्कतें कम हो जाएं। रामराज उन लोगों में शामिल था, जो सोचते ज्यादा हैं, लेकिन समस्याओं से जूझते कम हैं। वक्त के बीतने के साथ-साथ उसे हर पल बस यही चिन्ता सताने लगी कि उसका आने वाला कल कैसा होगा। इस चक्कर मेें एक दिन वह बाज़ार गया और ज़हर की एक बोतल खरीद लाया। रामराज ने सोचा था कि वह पत्नी और बेटे को बड़ी आसानी से जहर पीकर मरने के लिए राजी कर लेगा, लेकिन जब पत्नी संगीता और बेटे नंदन को धोखे में रखते हुए उसने पेय पदार्थ पीने को कहा तो उन्होंने उसे नहीं पिया। शायद उन्हें संदेह हो गया था कि कोई न कोई गड़बड़ तो जरूर है। रामराज ने अपनी दूसरी योजना को साकार करने की तैयारी प्रारंभ कर दी। मंगलवार की दोपहर उसने पत्नी और बेटे से कहा कि बहुत दिन हो गये हैं, हम कहीं बाहर खाना खाने नहीं गये। आज मेरा छुट्टी मनाने का मन है। आप दोनों साथ होंगे तो बहुत मज़ा आयेगा। दोनों से रामराज की हालत छिपी नहीं थी। वे भी हर हाल में उसकी खुशी चाहते थे। तीनों किसी शानदार बड़े होटल में खाना खाने के लिए कार से निकल पड़े। कार रामराज ही चला रहे था। कुछ किमी की दूरी तय करने के बाद उसने लघुशंका के बहाने कार रोकी। फिर बड़ी सावधानी से पॉलिथीन के अंदर सुसाइड नोट को रखकर बाहर फेंक दिया। दोबारा कार में बैठने के कुछ पलों के बाद उसने पेट्रोल छिड़क कर कार में आग लगा दी। मां और बेटा किसी तरह से कार से उतर कर भागे, लेकिन वह नहीं बच पाया। पांच दिन बाद आग से बुरी तरह झुलसी उसकी पत्नी भी अस्पताल में इलाज के दौरान चल बसी। बेटा भी जन्मदाता की करनी पर आंसू बहाते-बहाते मां के देहावसान के दो दिन बाद इस दुनिया से रूख्सत हो गया।
देश की राजधानी दिल्ली में 1 जुलाई, 2018 को एक ही घर में 11 लोगों ने आत्महत्या कर ली थी। मृतकों के हाथ-पैर बंधे थे और आंखों पर काली पट्टी बंधी थी। काला जादू, टोने-टोटके और मोक्ष पाने के चक्कर में हुई इन आत्महत्याओं के पीछे घर के मुखिया की बहुत बड़ी भूमिका थी। उन्होंने अपनी मां, पत्नी, बहन और बच्चों तथा खुद की बड़ी निर्दयतापूर्वक इस दुनिया से विदायी करवायी थी। महाराष्ट्र के सांगली जिले में भी एक ही परिवार के 9 सदस्यों के द्वारा ज़हर खाकर की गई खुदकुशी ने पूरे देश को चौंकाया था। घर के मुखिया के सुझाव और निर्देश पर ही यह मौत का रास्ता चुना गया। दरअसल, साहूकारों और बैंकों का कर्ज जीवन पर भारी पड़ गया। बीते साल मध्यप्रदेश के ग्वालियर से सटे एक गांव में स्थित एक घर में चार लाशें मिलने से सनसनी फैल गई। घर के मुखिया ने पहले तो पत्नी तथा दो साल की बेटी को जहर देकर मारा फिर बाद में अपने मासूम बेटे को फांसी पर लटकाने के बाद खुद भी आत्महत्या कर ली।
सामूहिक आत्महत्याओं का सिलसिला अनंत है। इन आत्महत्याओं में परिवार के मुखिया की जबरदस्ती, मनमानी और भारी दबाव का बहुत बड़ा हाथ स्पष्ट दिखाई देता है। खुद के साथ दूसरों की जान ले लेने वाले ये प्राणी नकारात्मक सोच से बाहर ही नहीं निकल पाते। तकलीफें तो लगभग हर इंसान के हिस्से में आती हैं, लेकिन सभी तो आत्मघाती राह नहीं चुनते जो नागपुर के रामराज ने चुनी। रामराज जैसे लोग बिना जोखिम उठाये हर खेल में जीतना चाहते हैं, जो कि संभव नहीं। ऐसे कायर भगौड़े किस्म के लोगों से यह तो पूछा ही जाना चाहिए कि असफलता और हार के असली जिम्मेदार तो तुम खुद ही हो। ऐसे में तुम्हें यह हक किसने दे दिया कि तुम अपने सारे परिवार को ही मार डालने पर तुल जाओ। उन्हें खुदकुशी करने को विवश कर दो। माना कि पत्नी के साथ तुमने सात फेरे लिए हैं, लेकिन वो तुम्हारी गुलाम नहीं। बेटा भी तुम्हारी सम्पत्ति नहीं। उसे भी अपनी जिन्दगी जीने का पूरा हक है। मरना ही है तो तुम अकेले मरो। खुद को सही ठहराने का यह सरासर बचकाना बहाना है कि मेरे मरने के बाद मेरी पत्नी, बच्चे कहीं के नहीं रहेंगे। मेरे जाने के बाद कर्जदार उनका जीना हराम कर देंगे। सारा जमाना उन्हें नोच-नोच कर खा जायेगा। अभी हाल ही में अमरावती की रहने वाली स्नेहल ने रेलगाड़ी के सामने कूदकर अपने जिस्म के परखच्चे उड़वा दिए। वह अपने पति के अत्याचारों से परेशान थी। उसके जुल्म सहते-सहते थक गई थी। उसका एक बेटा और बेटी है, जिन्हें अकेला छोड़कर वह इस जहां से चलती बनी। यह अत्यंत राहत और संतुष्टि की बात है कि उसने अपने बच्चों को बख्श दिया। वक्त के बीतने के बाद बच्चे सच जान जाएंगे। अपनी कायर जननी के प्रति सहानुभूति का भाव तो उनके मन में भी नहीं उपजेगा। कोई भी खुदकुशी प्रशंसा की हकदार नहीं होती। वो मां-बाप जो हमेशा बच्चों की चिंता में खुद को परेशान रखते हैं। सुकून की नींद नहीं ले पाते उन्हीं के लिए पेश हैं किसी कवि की लिखी यह पंक्तियां...
वो खुद ही जान जाते हैं
बुलंदी आसमानों की
परिंदो को नहीं दी जाती
तालीम उड़ानों की।
Thursday, July 21, 2022
कुत्तों से सावधान!
पंजाब में एक युवा विख्यात गायक की उनके दुश्मनों ने गोलियों से भून कर हत्या कर दी। गमगीन माता-पिता, रिश्तेदारों के साथ-साथ उनके लाखों प्रशसकों ने आंसू बहाए और कई दिन तक शोक मनाया। जनप्रिय गायक को बड़ी निर्दयता से इस दुनिया से विदा कर दिये जाने से उनके पालतू कुत्ते ने भी अपनी सुध-बुध खो दी। उसने भी कई दिन तक खाना नहीं खाया। भूखा-प्यासा बस उस कुर्सी के इर्द-गिर्द मंडराता रहा जहां गायक बैठकर नये-नये गीत रचता और गाता था। कोरोना काल में जब अचानक हमारे मित्र अवध प्रकाश की मौत हुई तो उनके प्रिय पालतू कुत्ते ने मातम मनाने के मामले में इंसानों को मात दे दी थी। इंसानों की इस दुनिया में कुत्तों को इंसानों का सबसे वफादार साथी माना जाता है। कुत्तों की समझदारी और स्वामी भक्ति की कई ऐसी दास्तानें हैं जो उनके प्रति प्रेम की भावना जगाती और उपजाती हैं।
एक जमाना था जब स्कूलों के आठवीं-दसवीं के छात्रों को गाय, हाथी, शेर हिरण आदि पर निबंध लिखने को कहा जाता था। इस नये दौर में उन्हें अपने घर के प्यारे-दुलारे कुत्ते पर अपने विचार व्यक्त करने को कहा जाता है। छात्र-छात्राएं भी बड़े ज्ञानी की तरह अपने पालतू डॉगी की शान में बहुत कुछ लिखने में देरी नहीं लगाते। जैसे...हमारा डॉगी तोे सारी दुनिया से निराला है। उसका सफेद रंग, चमकती आंखें और लोटपोट होने का तरीका हमारा ही नहीं, मेहमानों का भी दिल जीत लेता है। डैडी-मम्मी, दीदी और मैं अक्सर शाम को उसे सैर कराने को निकलते हैं तो उसे देखने के लिए कई लोगों के कदम रुक जाते हैं। हमारा डॉगी मेरी ही तरह फुटबॉल खेलना पसंद करता है। जब हम शुरू-शुरू में उसे अपने घर लाये थे तब वह काफी कमजोर था, लेकिन हमने उसे मांस-मटन खिला-खिलाकर अत्यंत बलशाली बना दिया है। गली के आवारा कुत्ते भी अब उससे खौफ खाते हैं। वह जब सड़क पर चलता है तो वे उसके लिए रास्ता छोड़ देते हैं। हमारा दुलारा डॉगी किसी भी अनजान आदमी को घर में आते देख शेर की तरह गुर्राने लगता है। इसकी पहचानने और सूंघने की अपार क्षमता का जवाब नहीं। उसी के कारण हम सुरक्षा और बेफिक्री की नींद सोते हैं।’’
अमेरिका के शोधकर्ताओं ने अपने विशेष सर्वे में पाया है कि जिन गली-मोहल्लों में ज्यादा कुत्ते होते हैं वहां अपराधी पैर रखने से घबराते हैं। डकैतियों तथा चोरियों में काफी कमी आ जाती है। ऐसे रहवासी इलाकों को सुरक्षित माना जाता है जहां कुत्तों को पालने वालों की तादाद ज्यादा होती है। इसलिए कहा गया है कि अगर आप सुरक्षित पड़ोस चाहते हैं और किसी भी तरह की लूटपाट से बचना चाहते हैं तो ऐसा इलाका चुनें जहां बहुत सारे लोगों ने कुत्ते पाल रखे हों। यह भी सच है कि अमेरिका और भारत में बहुत फर्क है। कोई भी भुक्तभोगी बता देगा कि अपने यहां तो गली-मोहल्लों में सुबह-शाम आवारा घूमने वाले कुत्ते और उनके पिल्ले लोगों का जीना हाराम कर देते हैं। कब कोई पगलाया कुत्ता किसी बच्चे, बूढ़े और युवा को काट खाए और उसे इंजेक्शन लगवाने की नौबत आ जाए... कुछ कहा नहीं जा सकता। अबोध बच्चे-बच्चियों को आवारा कुत्ते के द्वारा घर में घुसकर नोच-नोच कर खा जाने की खबरें अक्सर हमारा दिल दहलाती रहती हैं। कई देशी और विदेशी नस्ल के ऐसे कुत्ते हैं जो शेर और चीते से भी खतरनाक हैं। जर्मन शेफर्ड ब्रीड के कुत्ते पुलिस के लिए बड़े काम के होते हैं। इनमें अपराधियों की गंध की शिनाख्त करने की अपार क्षमता होती है। डाबरमैन पिन्सचर भी पुलिस के लिए खासा उपयोगी माना जाता है। इसकी खासियत है कि अजनबियों को देखते ही भड़क जाता है और मालिक पर नज़र पड़ते ही शांत हो जाता है। पिटबुल कुत्ते को बहुत खतरनाक माना जाता है। इसका वजन आमतौर पर 16 से 30 किलो के बीच होता है। दुनिया के कई देशों में इस नस्ल के कुत्ते को पालना मना है। गुस्सा आने पर ये किसी को नहीं छोड़ते। भले ही मालिक ही क्यों न हो। बीते वर्ष जयपुर में पिटबुल डॉग ने एक 11 साल के बच्चे के जिस्म को नोच-नोच कर बुरी तरह से जख्मी कर दिया था। इस वर्ष यानी 12 जुलाई, 2022 को एक पिटबुल ने तो कू्ररता की हर सीमा लांघते हुए देश और दुनिया में दहशत फैला दी। लखनऊ की अस्सी वर्षीय रिटायर टीचर सुशीला त्रिपाठी को अपने पिटबुल पर बहुत भरोसा था। वह उसे किसी इंसानी बच्चे जैसा मासूम मानते हुए उस पर अपना सारा स्नेह उंड़ेलती थीं। उनके बेटे ने घर की सुरक्षा के लिए दो कुत्तों को पाला था। जिसमें एक लैब्राडोर तो दूसरा वही पिटबुल डॉग, जिसे उस दिन उम्रदराज सुशीला बड़े भरोसे तथा इत्मीनान के साथ अपने ही घर की छत पर टहला रहीं थीं। इसी दौरान अचानक पिटबुल के गले की चैन खुल गई और उसने भूखे शेर की तरह उसने अपनी मालकिन पर हमला कर दिया। अत्यंत बलशाली बौखलाए कुत्ते ने अपनी पूरी ताकत लगाते हुए उन्हें जमीन पर गिराने में देरी नहीं लगायी और फिर उनके शरीर को नोचने-खाने लगा। सुशीला की चीख-पुकार सुनकर पड़ोसी ईपने-अपने घरों से बाहर आए तो उन्होंने देखा कि उनकी पड़ोसन खून से लथपथ जमीन पर गिरी पड़ी हैं और कुत्ता उनके शरीर के मांस को नोच-नोचकर खा रहा है। कुत्ते के चंगुल से बचाने के लिए बरसाए लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ और बड़े मज़े से इंसानी मांस खाता रहा। इतना ही नहीं उसने कमजोर मालकिन के लहुलूहान शरीर को खींचा और अंदर ले गया। खूंखार हो चुके पालतू डॉग ने उनकी अंतड़ी बाहर तक निकाल दी। शरीर के खून का कतरा-कतरा बह जाने के कारण अतत: मालकिन ने दम तोड़ दिया।
घरों में किस नस्ल के कुत्ते पालने चाहिए इसकी जानकारी भी जानकर सुझाते रहते हैं। घर की रखवाली के लिए किन कुत्तों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए इसका पता बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है। लैब्राडोर, बुलडॉग और डाबरमैन जैसे कुछ कुत्ते हैं जिन्हें वफादार माना जाता है। नये वातावरण में भी ये आसानी से ढल जाते हैं, लेकिन कई शौकीनों तथा रईसों ने जब से बिना किसी जानकारी के महंगे से महंगे कुत्ते पालने प्रारंभ कर दिये हैं तब से स्थिति बिगड़ी है। लोग तो बुलमास्टिफ जैसे कुत्ते को भी घर ले आते हैं। पचास से साठ किलो के पिटबुल जैसे दिखने वाले ये कुत्ते ट्रेनिंग के बाद ही घरों में लाये जाने चाहिए, लेकिन लोग कहां मानते हैं। वे तो बड़ी शान से अपने-अपने घरों के बड़े-बड़े ‘महाराजा’ गेट पर ‘‘कुत्ते से सावधान’’ का बोर्ड टंगवा कर अपनी छाती ताने रहते हैं। उनका हिंसक कुत्ता बाहर वालों को तो डराता ही है। फिर किसी दिन अचानक जब वह आपा खो देता है तो घर वालों पर भी झपटा मार ही देता है और जान भी ले लेता है जहां इंसानों का भरोसा नहीं वहां जानवरों से पता नहीं क्यों ज्यादा वफादारी की उम्मीद लगा ली जाती है। कुत्ता पालने की नासमझी में उन खूंखार कुत्तों को भी जंजीर से बांधकर रखा जाता है, जो बंधन तो बिलकुल पसंद नहीं करते, लेकिन ऊंचे लोग सोचते हैं कि जब हम इसे मांस-मटन खिला रहे हैं, अपने ही कमरे के खास बिस्तर पर सुलाकर अपने बच्चों की तरह दुलार-पुचकार रहे हैं तो वह हमेशा हमारा ही बना रहेगा, लेकिन ऐसा सदा होता नहीं है...।
Thursday, July 14, 2022
अब नहीं तो कब?
2022 को किस रूप में याद रखा जाएगा? कितना... कितना उन्माद... हिंसा, भय और अशांति! जैसा चल रहा है, क्या वैसा ही चलता रहेगा? सत्ताधीश चुप हैं! देश में अशांति और अराजकता फैलाते आस्तीन के सांपों के होश कौन ठिकाने लगायेगा? विभिन्न धर्मों के अंगोछे, टोपी और भगवा, सफेद, काले, पीले चोलाधारी ऐसे ही अपनी जुबानों से ज़हर उगलते रहेंगे और आदमी ही आदमी से कब तक खौफ खाता रहेगा? और भी बहुतेरे सवाल हैं, जो नेताओं, सत्ताधीशों, समाजसेवकों और जागरूक जनता से जवाब मांग रहे हैं। रेतीले प्रदेश राजस्थान में आतंकियों ने एक सीधे-सादे दर्जी को बड़ी बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। अपने आकाओं के निर्देश पर नरसंहार करने वाले नराधमों ने हत्या का वीडियो बनाया, देश और दुनिया को दिखाया। इतना ही नहीं देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या तक की धमकी भी दे डाली। इतनी हिम्मत उन्होंने वहीं से पायी जहां से पहले भी धर्म के नाम पर खून-खराबा करने वाले जेहादी उन्मादी पाते चले आ रहे हैं। नूपुर शर्मा के समर्थन में सोशल मीडिया पर पोस्ट करने वाले अमरावती के दवा व्यापारी उमेश कोल्हे भी कट्टरपंथियों की खूनी हैवानियत से नहीं बच पाये। उनकी हत्या के लिए तो उन्हीं का एक दोस्त जिम्मेदार है। उसे जिगरी दोस्त (?) का नूपुर शर्मा के लिए समर्थन करना शूल की तरह चुभा और उसने खुद को आस्तीन का सांप साबित करते हुए आतंकियों के हाथों मित्र की हत्या करवा दी, जो उसकी सहायता करने के लिए हमेशा तत्पर रहता था। उमेश ने युसूफ के बच्चों को स्कूल से लेकर बहन की शादी तक में खुले हाथ से आर्थिक मदद की थी। युसूफ ने उसी हमदर्द दोस्त की पीठ में खंजर घोंप कर मानवता को शर्मिंदा किया है। इस खौफनाक षडयंत्र ने हर किसी को सतर्क कर दिया है। अब तो लोग किसी दोस्त की सहायता करने से पहले हजार बार सोचेंगे...विचारेंगे। फिर वह आसिफ हो या आनंद। राम हो या रहीम। भरोसे का कत्ल करने वाले दरिंदे इधर भी हैं और उधर भी हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो चिंताग्रस्त करने वाले रक्तिम मंज़रों की झड़ी न लगी होती। कोई भी धार्मिक स्थल हो, वहां से आपसी सद्भाव और एकता के स्वर सतत गूंजने चाहिए। मंदिर, मस्जिद, दरगाह, चर्च, गुरुद्वारा आदि की स्थापना का एक ही उद्देश्य होता है, अमन, शांति, आपसी भाईचारा और मानव कल्याण, लेकिन इन दिनों कुछ इबादत के पवित्र स्थलों में अपवित्र आतंकी सोच वाले चेहरे घुसपैठ कर चुके हैं।
अजमेर शरीफ दरगाह के नाम से हिंदू, मुसलमान, सिख, इसाई, बौद्ध आदि सभी वाकिफ हैं। देश और विदेशों से हर धर्म के लोग अजमेर शरीफ दरगाह में जाकर सिर झुकाते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं, चादर चढ़ाते हैं। खुले हाथों दान-दक्षिणा देने में कोई कमी नहीं करते। इसी अजमेर शरीफ को अपना ठिकाना बना चुके कुछ असामाजिक तत्व लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ करने से बाज नहीं आते। अजमेर शरीफ के खादिम सलमान चिश्ती ने तो नूपुर शर्मा की गर्दन उड़ाने वाले को अपना मकान तक देने का ऐलान कर अपने अंदर छुपे, बैठे शैतान के दीदार करवा दिए। यह उसकी नीचता, कू्ररता और हैवानियत ही तो है, जिसके वशीभूत होकर वह सोशल मीडिया पर वायरल किये गए वीडियो में बकता नज़र आया कि, ‘‘वक्त पहले जैसा नहीं रहा, वरना वह बोलता नहीं, कसम है मुझे पैदा करने वाली मेरी मां की, मैं उसे सरेआम गोली मार देता, मुझे मेरे बच्चों की कसम, मैं उसे गोली मार देता और आज भी सीना ठोककर कहता हूं, जो भी नूपुर शर्मा की गर्दन लाएगा मैं उसे अपना घर दे दूंगा और रास्ते पर निकल जाऊंगा, ये वादा करता है सलमान।’’ धर्म की बेहद नशीली अफीम चाट-चाटकर पगलाया यह शख्स कहीं से भी शरीफ आदमी नहीं लगता। उसके संगी-साथी भी जहरीली बोली बोलने में पीछे नहीं हैं।
हिस्ट्रीशीटर सलमान को जब पुलिस ने दबोचा तब भी वह बड़ी बेशर्मी के साथ मुस्कुराता और खिलखिलाता नज़र आया। ऐसे दरिेंदे से नफरत करने की बजाय एक खाकी वर्दीधारी को उस पर रहम खाते और बचने के उपाय सुझाते देख लोग गुस्से की आग में धधक उठे। ‘‘यदि तुम यह कह दोगे कि मैंने शराब पी रखी थी उसी के नशे में अंट-शंट बक गया। वैसे मैं बहुत भला आदमी हूं। किसी की हत्या करने या करवाने की तो सोच भी नहीं सकता।’’ देशवासियों की भावनाओं को भड़काने के लिए इन दिनों एक से एक शैतानी सोचवाले चेहरे सामने आ रहे हैं। कनाडा में रह रही एक भारतीय नारी, मणिमेकलाई ने ‘काली’ नाम की फिल्म बनायी, जिसमें हिंदुओं की अराध्य देवी मां काली को सिगरेट पीते हुए दिखाया है। ये खेली-खायी औरत जानती थी कि उसकी इस धूर्तता का पूरे भारत में विरोध होगा। फिर भी उसने हिंदुओं की आस्था पर जबर्दस्त प्रहार किया और खुद को सही ठहराने के लिए कई कुतर्क भी पेश कर दिए। शर्म और आक्रोश भरी हकीकत ये भी है कि हिंदू देवी-देवताओं का उपहास उड़ाने वालों के पक्ष में भी कुछ असली-नकली नेता, सांसद, विधायक, लेखक, संपादक, पत्रकार तक तुरंत खड़े हो जाते हैं। आतंकवादियों अपराधी तत्वों के साथ भी ऐसे लोगों को खड़ा देखा जाता है। पुलिस जब कट्टर आतंकियों को गोलियों से भूनती है तो उनकी आंखों से ऐसे आंसू टपकने लगते हैं, जैसे वे इनके करीबी रिश्तेदार हों। दुष्ट और ओछी राजनीति करते चले आ रहे स्वार्थी नेताओं ने ही इस देश का बेड़ा गर्क करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इन्हीं की जहरीली सोच और साजिशों ने देश को अभूतपूर्व संकट के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। इतिहास गवाह है कि, अपने देश के कुछ टुच्चे नेता सत्ता के लिए किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं। गेंडे से भी अधिक मोटी चमड़ी वाले ये मतलबी अपने फायदे के लिए नीच से नीच हरकत कर सकते हैं। किसी का भी रक्त बहता देख सकते हैं। देश इन दिनों अग्निपरीक्षा से गुजर रहा है। साम्प्रदायिक सद्भाव को खत्म करने के बीज बोने वालों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई करना अत्यंत जरूरी है। कट्टर विचारधारा के हर शख्स से समाज को दूरियां बनानी होंगी। उन्हें अपने नजदीक भी नहीं आने देना होेगा। सरकार को भी मजबूर करना होगा कि उन पर भूलकर भी रहम न करे। उन्हें वोट देने के अधिकार से भी वंचित करने के साथ-साथ फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जिससे वे किसी भी हालत में अपने दुष्कर्मों की सज़ा भुगतते नजर आएं। और हां...शासन की किसी भी योजना का फायदा भी उन्हें न मिलने पाए। देश को अब तो केवल और केवल राष्ट्रप्रेमी जनता ही बचा सकती है। अराजकता तो अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच चुकी है। जनता यदि अभी भी नहीं जागी तो हालात और भी बदतर होने तय हैं।
