Thursday, January 22, 2026

इनसे जरूर करें मुलाकात

यह फिल्मी नहीं, जीते-जागते नायक हैं। इन्हें किसी दबे-छिपे पुरातन ग्रंथों या धूल में दबी-सिमटी किताबों से नहीं खोजा गया है। ये तो उन अखबारों की प्रेरक देन हैं जिन्हें सुबह पढ़कर शाम तक रद्दी के ढेर के हवाले कर दिया जाता है। इन नायक-नायिकाओं ने हर चुनौती से लड़-भिड़कर अपनी तथा औरों की तक़दीर को पलटा है। इनका हौसला ही इनकी पहचान है। इन्होंने बाहरी नहीं, अपने भीतर की आवाज सुनी है। हर डर और चिंता को भगाया है और इसी संदेश का परचम लहराया है कि बदलाव तभी शुरू होता है जब हम काम की शुरुआत करते हैं। महज सपने देखने और सोचने से कुछ नहीं होता। 

बिहार के एक छोटे से गांव की बेटी रूपम शीघ्र ही डॉक्टर बनने जा रही है। कोई भी कह और सोच सकता है कि यह कौन सी अनोखी बात है। देश में हजारों बेटे-बेटियां पढ़-लिखकर डॉक्टर बनते हैं। सच तो यह है कि रूपम की कहानी औरों से बहुत जुदा है। जब वह मां की कोख से जन्मी तभी उसके दोनों हाथ नदारद थे। माता-पिता के लिए यह दु:खद हकीकत किसी भारी सदमे से कम नहीं थी। फिर भी उन्होंने उसकी परवरिश में कोई भी कमी नहीं करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। रिश्तेदारों और आसपास के लोगों ने तो जैसे भविष्यवाणी ही कर दी थी कि अपनी दिनचर्या की चुनौतियों से जूझती यह दिव्यांग लड़की किसी भी हालत में पढ़-लिख नहीं पाएगी। उम्र भर मां-बाप के लिए बोझ बनी रहेगी। लेकिन रूपम ने तो कमाल ही कर दिया। वह अपने पैरों को हाथ बनाते हुए तमाम मुश्किलों का सामना करने की कला में पारंगत होती चली गई। मां-बाप भी उसके हौसले को देखते ही रह गए। देखते ही देखते उसने अपने पैरों से लिखना भी प्रारंभ कर दिया। 2009 में दसवीं और उसके बाद कॉलेज की पढ़ाई पूर्ण करने वाली यह बिटिया अब डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही है। अब वो दिन दूर नहीं जब वह मरीजों का इलाज करती नज़र आएगी। 

विश्वजीत भी दोनों हाथों से दिव्यांग है। उसने भी बचपन से ही अपने पैरों से लिखने की आदत डाल ली। शुरू-शुरू में उसे और उसके मां-बाप को काफी दिक्कतों से दो-चार होना पड़ा। लेकिन कालांतर में उसने अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना लिया। बिना किसी की मदद के उसने अपने पैरों से पैंसिल पकड़ने और लिखने की प्रैक्टिस करनी प्रारंभ कर दी। विश्वजीत के दो भाई हैं। दोनों ही एकदम सामान्य हैं। उसने बचपन में ही अपने मन में यह बात बिठा ली थी कि वह किसी से कम नहीं। मोबाइल पर कुछ सर्च करना हों किताबें पढ़नी हों या किसी और भारी-भरकम काम करना हो विश्वजीत उसे अपने पैरों से ऐसे अंजाम देता है जैसे दूसरे लोग अपने हाथों से करते देखे जाते हैैं। कुछ दिनों पहले नागपुर में आयोजित विदर्भ विज्ञान उत्सव में विश्वजीत के बनाये पोस्टर को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी। पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने वाला यह पोस्टर था ही ऐसा जानदार, जिसने भी देखा बस प्रशंसा करता ही रह गया। गणित विश्वजीत का मनपसंद विषय है। वह प्रशासकीय अधिकारी बन समाज के लिए बहुत कुछ करना चाहता है। उसकी एक से एक बनाई पेंटिंग को कई बार पुरस्कृत किया जा चुका है। 

कहते हैं आंखें हैं तो दुनिया की रोशनी और रंगीनियां हैं। यही आंखें पूरी सृष्टि कर दीदार करवाती हैं। अपनों तथा बेगानों को देखने का आत्मिक सुख दिलाती हैं। प्रश्न है कि जो दृष्टिहीन हैं उनका क्या? कुदरत की बेइंसाफी उन पर क्या असर डालती है और उनकी जीवन यात्रा कैसे चलती है, इसका अनुमान लगाना मुश्किल तो नहीं। लेकिन फिर भी हमारी दुनिया में कुछ दृष्टिहीन ऐसे हैं, जो इस कमी को भी अपनी ताकत बनाने की हिम्मत रखते हुए आशा की ऐसी नई रोशनी फैला रहे हैं, जो आंखों वालों को भी स्तब्ध करती है। बहुतों ने तान्या बलसारा का नाम ही नहीं सुना होगा। तान्या जन्म से ही दृष्टिहीन हैं लेकिन उनके मनोबल ने उन्हें ऐसी अलौकिक आंतरिक दृष्टि उपहार में दे दी जिससे वह पास और दूर की आबोहवा को तीव्रता से महसूस करने लगीं। दरअसल, यह भी उस कुदरत का करिश्मा है जिसे बार-बार कोसा जाता है। वो भी उनके द्वारा जिन्हें सबकुछ मिला है। तान्या ने पहले खुद कम्प्यूटर में दक्षता हासिल की और अब कम्प्यूटर साक्षरता के जरिए दृष्टिहीन युवाओं को मुफ्त में प्रशिक्षित कर रही हैं। अब तक 300 से ज्यादा दृष्टिहीनों को प्रशिक्षण देकर उनके जीवन में खुशी के रंग भरने वाली तान्या का कहना है कि अपनी मुश्किलों ने उन्हें दूसरे दृष्टिहीनों के दर्द को समझने के लिए प्रेरित किया। भारत में लाखों दृष्टिहीन नागरिकों को कम्प्यूटर साक्षर बनते देखना उनका सपना है। कई विद्यार्थी उनके द्वारा प्रशिक्षित होने के पश्चात अच्छी-खासी  नौकरियों कर रहे हैं। दृष्टिहीनों को नि:शुल्क कम्प्यूटर शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ तान्या अंग्रेजी भाषा में प्रशिक्षण, व्यक्तित्व विकास एवं एक्सेसिविलिटी टेस्टिंग के क्षेत्र में भी मार्गदर्शन कराती हैं। यहां छात्रों को ‘स्पर्श किताबें’ दी जाती हैं। ‘ब्रेल ऑडियो’ अथवा बड़े प्रिंट में नोट भी दिए जाते हैं। तान्या को कोई भी काम कल पर टालना या आधा-अधूरा कर गुजरना बिलकुल पसंद नहीं। इसलिए किसी निश्चित अवधि में आधे-अधूरे ढंग से प्रशिक्षण पूरा करवा देने की बजाय उनके यहां तब तक सिखाया जाता है, जब तक कि विद्यार्थी का आत्मविश्वास पूरी तरह से सुदृढ़ न हो जाए और वह कम्प्यूटर पर सरलतापूर्वक काम न करने लगे। तान्या ने 2006 में कम्प्यूटर सेंटर की शुरुआत की। वर्तमान में देश के कई राज्यों के बड़े तथा छोटे शहरों में उनके कम्प्यूटर सेंटर सफलता पूर्वक चल रहे हैं और कई युवक-युवतियों की किस्मत मानसिक और खुशहाली को बदलते हुए प्रदान कर रहे हैं। 

कोल्हापुर में स्थित एक विशाल फार्म हाउस में डॉ.प्रिया भारती और राहुल नामक युवक की धूमधाम से शादी हो रही थी। मेहमान नाचते-गाते हुए खूबसूरत आकर्षक युवा जोड़े के एक होने का आनंद ले रहे थे। कुछ मित्र और रिश्तेदार अपने-अपने मोबाइल और कैमरों से इन दिलकश लम्हों की तस्वीरें लेते हुए उमंगित-तरंगित हो रहे थे। पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरों की रस्म चल रही थी कि तभी अचानक एक महिला का सिर चकराने लगा और वह धड़ाम से स्टेज पर गिर पड़ी। चमकते-दमकते आलीशान वेशभूषा में सजी-धजी डॉ.प्रिया की जैसे ही बेहोश पड़ी महिला पर नज़र पड़ी तो वह तुरंत सजग डॉक्टर की भूमिका में आते हुए फेरे रोककर उसके प्राथमिक उपचार में लग गईं। जब तक महिला को पूरी तरह से होश नहीं आया, तब तक डॉ.प्रिया वहां से नहीं हिलीं। उनकी इस कर्तव्यपरायणता की तारीफ करने के लिए मेहमानों के पास शब्द नहीं थे। अपनी शादी से ज्यादा मरीज को अहमियत देने वाली खूबसूरत दुल्हन की सोशल मीडिया पर भी लाखों लोगों ने दिल खोलकर तारीफें कीं और बार-बार सराहा।

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