Thursday, January 8, 2026

उफ़! ...अन्नदाता का इतना-कितना शोषण!!

महाराष्ट्र में स्थित चंद्रपुर जिले की नागभीड़ तहसील। यहीं के एक किसान रोशन शिवदास कुले ने एक साहूकार से एक लाख का कर्ज ले रखा था। इस बीच रोशन की दादी का निधन हो गया। किसान रोशन का पूरा परिवार शोक में डूबा था। तभी सुबह-सुबह साहूकार प्रदीप बावनकुले का रोशन को पैसों के लिए संदेश आया तो उसने दादी की मृत्यु की जानकारी देते हुए कुछ दिन की मोहलत मांगी, लेकिन निर्दयी बेसब्रा साहूकार नहीं माना। जब घर परिवार के सभी लोग अंत्येष्टि की तैयारी में लगे थे, तब वह वहां आ धमका और रोशन को धमकाते हुए कहने लगा कि मुझे तो अभी मेरे पैसे चाहिए। तुम्हारी दादी चल बसी है। इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं। यह तो तुम्हारा व्यक्तिगत मामला है। इससे तुम ही निबटो। वहां पर उपस्थित कुछ लोगों ने क्रूर साहूकार को हाथ जोड़कर शांत रहने की विनती की तो वह बड़ी मुश्किल से चीखते-चिल्लाते हुए वहां से खिसका। उद्दंड साहूकार के ऐसे आतंकी बर्ताव से कोई भी यह सोच सकता है कि रोशन ने उससे काफी बड़ी रकम कर्ज में ली होगी, जिसे वापस देने में वह आनाकानी कर रहा होगा। मैंने भी ऐसा ही कुछ अनुमान लगाया था, लेकिन जब पूरी हकीकत पता चली तो मेरी सोच का अंग-अंग दंग रह गया। विचार शक्ति को लकवा मारता चला गया। 

हमारे इर्द-गिर्द अभी भी ऐसे बेरहम, अन्यायी, शोषक शैतान धनपशु सक्रिय हैं, जिनकी क्रूरता की सच्चाई रूह को कंपा देती है। पैंतीस वर्षीय मेहनतकश किसान रोशन ने कुछ वर्ष पूर्व बार-बार खराब फसल होने के कारण अपनी आर्थिक हालत सुधारने के लिए दूध का कारोबार करने की सोची थी। इसके लिए उसने दो तंदुरूस्त गायों के खरीदने के लिए अवैध साहूकार से ब्याज पर एक लाख का कर्ज लिया। उसे यकीन था कि दूध बेचकर वह घर का जरूरी खर्चा तथा साहूकार का कर्जा भी निर्धारित समय पर चुकाने में अवश्य कामयाब होगा। उसे अपनी मेहनत पर पूरा भरोसा था। जोश-जोश में रोशन ने साहूकार से ब्याज की दर के बारे में कोई जानकारी नहीं ली थी। यह उसकी बदकिस्मती ही कहेंगे कि उसने जो सोचा था वो नहीं हो पाया। कुछ ही हफ्तों के बाद दोनों गायों की किसी गंभीर बीमारी के चलते मौत हो गई। ऐसे में साहूकार को जैसे ही खबर लगी तो वह कर्ज वसूली के लिए उसके सर पर आकर खड़ा हुआ। रोशन ने उसके पैर पकड़ लिए। फिर भी साहूकार के तकादे का दबाव बढ़ता चला गया। दरअसल, जालिम साहूकार की नीयत में ही जबरदस्त खोट घर कर चुकी थी। उसने सीधे-सादे रोशन को एक लाख की मूल रकम पर प्रतिदिन 10 हजार रुपए ब्याज चुकाने का फरमान सुना दिया। दाने-दाने को मोहताज रोशन पर तो अब जैसे बिजली ही गिर पड़ी। तुरंत उसके मन में आया कि वह भी दूसरे मजबूर लुटे-पिटे किसानों की तरह आत्महत्या कर ले, लेकिन हिम्मत नहीं कर पाया। धीरे-धीरे महीने और साल गुजरते गये। ब्याज पर ब्याज के कारण एक लाख का कर्ज 74 लाख में तब्दील हो गया। इस दौरान रोशन ने पहले अपनी खेत की जमीन बेची, फिर धीरे-धीरे अपना घर, मवेशी, ट्रैक्टर और मोटर साइकिल तक बेचकर मिली रकम साहूकार के हवाले कर दी, लेकिन फिर भी कर्ज जस का तस बना रहा। रोशन ने लाख हाथ-पैर जोड़े। रहम की भीख मांगी, लेकिन साहूकार का बिलकुल दिल नहीं पसीजा। वह येन-केन-प्रकारेण और... और वसूली के लिए प्रताड़ना का चाबुक बरसाता रहा। इसी दौरान एक दिन रोशन साहूकार के यहां गया और उससे हाथ जोड़कर बोला कि, अब जब मेरे पास आपको देने के लिए कुछ भी नहीं है। मेरा सब कुछ बिक चुका है, तब ऐसी हालत में अब मैं क्या करूं? साहूकार ने उसे अपने पास बिठाकर कहा कि, तुम्हें पता नहीं, तुम्हारे जिस्म का एक-एक अंग बहुत कीमती है। अब तुम्हें इन्हें बेचकर अपना कर्जा चुकाना होगा। फिलहाल तुम अपनी किडनी को बेचकर काफी हद तक कर्ज मुक्त हो सकते हो। यह सुनते ही तन-मन से लहूलुहान हतप्रभ रोशन काफी देर तक साहूकार के चेहरे को ताकता रहा। रोशन को नागपुर से कोलकाता ले जाया गया। वहां से किडनी रैकेट के सरगनाओं ने उसे कंबोडिया पहुंचा दिया। वहां पर अत्यंत सुनियोजित तरीके से उसकी किडनी निकालकर 8 लाख रुपए उसके  हाथ में थमा दिए गए। इन रुपयों को भी रोशन ने साहूकार को सौंप दिया। किडनी के निकाले जाने के बाद रोशन की शारीरिक हालत बिगड़ती चली गई और उसने बिस्तर पकड़ लिया। 

इतना सब कुछ होने के बाद भी साहूकार ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। आखिरकार उसने किसी तरह से स्थानीय विधायक से मेल-मुलाकात कर उन्हें अपनी आपबीती बतायी। जैसे ही नरपिशाच साहूकार के लूटकांड की दिल दहलाने वाली हकीकत की अखबारों में विस्तार से खबर छपी तो उसके बाद तो और भी कई किसान अपना दुखड़ा सुनाने के लिए सामने आने लगे, जिन्हें साहूकारों ने बेतहाशा ब्याज वसूल कर तन-मन और धन से कंगाल बनाया गया था। उनके घर, जमीनें और अन्य सामान अपने नाम लिखवा लिये गए थे। इस शर्मनाक किडनी कांड की जब दूर-दूर तक गूंज गूंजी तो आंखें और कान बंद कर नींद लेती पुलिस को भी मजबूरन सक्रिय होना पड़ा। सघन जांच में पता चला कि इस शैतानी कुकर्म में कुछ डॉक्टरों की भी अहम भूमिका है, जिनके बारे में अधिकांश भारतीयों ने धरती के भगवान होने का भ्रम पाल रखा है। यह भी सच सामने आया कि और भी कई किसानों को दुर्जन साहूकारों की साजिश में फंस कर कंबोडिया में जाकर अपनी किडनी बेचने को विवश होना पड़ा है। कुदरत और इंसानी-शैतानी के मारे गरीब और मजबूर किसानों की किडनियां सिर्फ कंबोडिया ही नहीं चीन में भी प्रत्यारोपित की जा रही हैं। पूरे विदर्भ में कई वर्षों से किडनी तस्करों का खतरनाक रैकेट सक्रिय है। ग्रामीण इलाकों के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों में भी कई सफेदपोश अवैध साहूकारी करते हुए मनमाना ब्याज लगाकर अपने शिकार को भिखारी और लाचार-बीमार बना रहे हैं। यह भी काबिलेगौर है कि, मानव अंगों के सौदागर मजबूर शख्स की किडनी को बेचकर पाते तो सत्तर-अस्सी लाख रुपये हैं, लेकिन उनके हाथ में मात्र पांच-सात लाख रुपए थमाते हैं। अपने शिकार को फांसने के लिए दलाल सोशल मीडिया का सहारा लेते हैं। कुछ किडनी के सौदागर तो ऐसे भी हैं जिन्होंने पहले अपनी किडनी बेची या बेचनी पड़ी लेकिन अब स्वयं इस भयावह कारोबार में शामिल हो गये हैं। महाराष्ट्र और विदर्भ के किसानों की खुदकुशी करने की खबरें वर्षों से देश और दुनिया का ध्यान आकर्षित करती आ रही हैं, लेकिन फिर भी सिलसिला थमता नजर नहीं आता। गैरकानूनी साहूकारों की हत्यारी साहूकारी के खिलाफ कभी-कभार नारे भी गूंजते हैं, लेकिन कानूनी शिकंजा कहीं न कहीं अंतत: ढीला पड़ जाता है। अथाह कर्ज में डूबे लाचार किसानों को सरकारी मदद पहुंचाने की खबरें भी सुनी-सुनायी जाती हैं, लेकिन फिर भी धूप, गर्मी, सर्दी और बरसात में अन्न उपजा कर सभी का पेट भरने वाला अन्नदाता जहां भूखा रह जाता है, वहीं तकलीफों से भी बाहर नहीं निकल पाता है। उसकी खुदकुशी के आंकड़े बढ़ते ही चले जाते हैं। अपनी किडनी को बेचने को विवश होने वाले किसान रोशन ने यदि अपना मुंह खोलने की पहल और हिम्मत नहीं की होती तो मानव अंगों के शैतान सौदागरों का शर्मनाक सच दबा का दबा रह जाता। किसानों का खुदकुशी करना या अपने शरीर के अंगों को बेचने के लिए मजबूर होना यही दर्शाता है कि अन्नदाता के लिए खेती-बाड़ी अत्यंत घाटे का सौदा है। उसकी सारी मेहनत धरी की धरी रह जाती है। देश की अर्थव्यवस्था में सुधार किए बिना किसानों का उद्धार नहीं हो सकता। अरबपति-खरबपति धन्नासेठों के कर्ज माफ करने वाली सरकार किसानों की खुदकुशी और उनकी कर्जमाफी जैसी गंभीर समस्या की अनदेखी कर रही है। विपक्ष ही नहीं पक्ष के भी कुछ सजग नेता मानते हैं कि किसानों के विकास के लिए सरकार ने कोई ठोस उपाय योजना नहीं बनाई है। राज्य सरकार के आश्वासन साबुन की झाग की तरह गायब हो जाते हैं। एक सच यह भी कि हम और आप किसान की मेहनत की उपज की कतई कद्र नहीं करते। सोना-चांदी के दाम आसमान को छूते चले जाएं, लेकिन गेहूं, चावल, दाल की कीमतों का बढ़ना सभी की नींद उड़ा देता है। आलू हमें महंगा लगता है। आलू से बनने वाली चिप्स, वेफर्स, कुरकुरे और अन्य चटपटे व्यंजन भले ही कितने महंगे हों, सभी खुशी-खुशी खरीद लेते हैं। यही इंसानी सोच कृषि की सम्मानजनक आमदनी की शत्रु बनी हुई है। अदने से प्याज की कीमतें बढ़ने से सरकारें अलटी-पलटी कर दी जाती हैं। यही वजह है कि अधिकांश युवा खेती से सतत दूरी बना रहे हैं। वैसे भी ऐसे घाटे का धंधा कौन करना चाहेगा, जिसमें लागत निकलना ही मुश्किल हो रहा हो। आकाश छूती महंगाई और तंगी के इस दौर में किसानों की फसलों के समुचित दाम दिलाने के लिए हमने तो कभी देश की आम जनता को सड़कों पर उतरते नहीं देखा...।

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