मध्यप्रदेश के स्वच्छ और सर्वोत्तम शहर के तमगे वाले इंदौर में स्थित एक घर में छह माह के बच्चे का शव पड़ा था। मृत मासूम के पास बैठी उसकी वृद्ध दादी विलाप करते-करते कहे जा रही थी, ‘‘दस साल बाद भगवान ने खुशी दी थी और भगवान ने ही छीन ली!’’
मां तो बस अपने सामने दम तोड़ चुके लाडले को अपलक देखती और सोचती जा रही थी। ईश्वर भी कितना अन्यायी है। उससे भी मेरी खुशी देखी नहीं गई। मैं भी कितनी बदनसीब हूं जो अपने जाये को अपना दूध पिलाने में असमर्थ रही। उसे दूध नहीं आता था। ऐसे में डॉक्टर की सलाह पर वह बाहर के दूध में पानी मिलाकर बच्चे को पिलाती थी। दो दिन पहले बच्चे को एकाएक तेज बुखार और दस्त शुरू हो गए। तुरंत अस्पताल जाकर दिखाया तो डॉक्टर ने उसे दवा के साथ इंजेक्शन लगाया। लेकिन घर लाते-लाते रास्ते में हमेशा-हमेशा के लिए लाडले की सांसें थम गईं। दुनिया छोड़ चुके भाई की बहन की खामोशी से दर्द का दरिया बहता रहा। उसकी निगाहें बता रही थी कि कुछ ऐसा टूट गया है जिसे अब जोड़ा नहीं जा सकता। यह हकीकत सिर्फ एक घर-परिवार की नहीं थी। कइयों के साथ जुल्म हुआ था। उनके हंसते-खेलते बच्चों और बड़ों को दूषित पानी ने दर्दनाक मौत दे दी थी। परिवार के अनेकों सदस्य अस्पताल के बिस्तरों पर पड़े सोच रहे थे यह कैसे हो गया? यह भगवान की नहीं इंसान की गलती थी। उसकी लापरवाही और लालच ने मौत का यह तांडव मचाया था। शासन और प्रशासन की घोर लापरवाही और निकम्मेपन की इस दिल दहलाने वाली हत्यारी देन को वो लोग तो कभी नहीं भूल पायेंगे, जिनके अपने उनसे बिछड़ गए। वो शहर जिसे लगातार देश का सबसे स्वच्छ और आदर्श शहर घोषित किया गया। वहीं शौचालय की सीवर लाइन और पेयजल पाइप के जानलेवा मिलन से पानी विषैला हो गया और निर्दोषों को मौत की नींद सुलाता चला गया। डायरिया, उल्टी, दस्त और संक्रमण से त्रस्त होकर लोगों का हुजूम डॉक्टरों के यहां पहुंचने लगा फिर भी प्रशासन अपनी आंखें मूंदे रहा। कई इलाकों में नलों से काला बदबूदार पानी आने की शिकायतें अनसुनी करने वाले जनप्रतिनिधियों तथा अधिकारियों को तब किंचित होश आया, जब बच्चों तथा बुजुर्गों की मौतों की खबरें मीडिया में सुर्खियां पाने और देशवासियों को चौंकाने लगीं। अपने देश में भले ही बोतलबंद पानी का चलन हो गया है, लेकिन फिर भी अधिकांश आम भारतवासी नलों और हैंडपंपों के पानी पर आश्रित हैं। जिनके लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर पाना आसान नहीं उनके लिए विभिन्न कंपनियों का महंगा बोतलबंद पानी खरीद पाना यकीनन मुश्किल है। लापरवाह अधिकारी, नगरसेवक कहीं न कहीं यह मान चुके हैं कि, इस तरह से नागरिकों का जान गंवाना आम बात है। उन्हें इंसानी गम और पीड़ा को गंभीरता से पढ़ने की समझ ही नहीं है। जिस परिवार में दस साल की मन्नतों के बाद बच्चा जन्मा उसने मौत के मुआवजे को लेने से इंकार कर दिया। उनकी तरह और कुछ परिवारों ने भी यही कहा कि जब हमारा बच्चा ही चला गया, अब सरकारी मुआवजा ले भी लें तो क्या वह वापस आ जाएगा? अपनी औलाद से बढ़कर पैसा थोड़े ही है। यदि हमें पता होता कि सरकार हमें पानी नहीं जहर पिला रही है तो हम सावधान हो जाते। किसी भी तरह से बोतलबंद पानी खरीद लाते। शहर में दूषित पानी पीने के बाद कितनी मौतें हुई और कितनों को डॉक्टरों के पास इलाज के लिए जाना पड़ा, महंगे, सस्ते अस्पतालों में इलाज के लिए भर्ती होना पड़ा इसका सही आंकड़ा भी छुपाया गया।
जहां सजग पत्रकारों और अखबारों ने विषैला पानी पीने से 20 लोगों की मौत का दावा किया। दूसरी तरफ सरकार ने 18 परिवारों को दो-दो लाख रुपए का मुआवजा देकर अपने कर्तव्य परायण होने का ढोल पीटा लेकिन अदालत में कहा गया कि, सिर्फ चार मौतें हुई हैं। सच तो यही है कि अधिकांश शासक सच कहना और सुनना ही नहीं चाहते। उन्हें तो चापलूसी और वाहवाही ही रास आती है। इंदौर शहर में जब बच्चों के एक-एक कर मरने की खबरें दिल दहला रही थीं, तभी अनुराग द्वारी नामक सजग पत्रकार ने मध्यप्रदेश के एक बदतमीज और मुंह फट मंत्री को हकीकत से अवगत करवाते हुए अव्यवस्था को लेकर सवाल पूछे तो वे आगबबूला होकर ‘गाली’ देने के अंदाज में आक्रामक मुद्रा में आ गए। मंत्री के अहंकारी बोल और शर्मनाक हावभाव को जब शहरवासियों ने विभिन्न न्यूज चैनलों पर देखा-सुना और तो उन्हें भी बेहद शर्मिंदगी और अपनी गलती का एहसास भी हुआ कि उन्होंने कैसे घटिया नेता को अपना कीमती वोट देकर विधायक बनाया और वह मंत्री बनकर अब उन्हीं की छाती पर मूंग दल रहा है।
इस जानलेवा कांड के बाद जब कुछ पत्रकार तथाकथित स्वच्छ शहर की हकीकत जानने के लिए कुछ इलाकों में गये तो गंदे पानी और बदहाल सफाई व्यवस्था की परतें तेजी से खुलती चली गईं। जगह-जगह कचरे के अंबार बदबू फैला रहे थे और बिना ढक्कन वाले सीवर के चेम्बर किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार करते प्रतीत हो रहे थे। स्थानीय निवासियों ने बड़े दुखी मन से बताया कि सफाई कर्मी मुख्य सड़क पर झाडू लगाकर चलते बनते हैं। अंदर की गलियों में हफ्तों साफ-सफाई नहीं की जाती। कुछ दिन पहले स्कूल के मास्टर जी का पांच साल का लड़का घर के पास के खुले पड़े सीवर में धड़ाम से जा गिरा। अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया! बच्चों की एक पाठशाला तो गंदगी के पहाड़ के एकदम बगल में लगती है। जब-तब बच्चे बीमार होते रहते हैं। बेचारे शिक्षक भी दमघोटू बदबू, कीचड़ के बीच मासूम बच्चों को क, ख, ग सिखाते-सिखाते सिर पकड़कर बैठ जाते हैं।
इंदौर की आहत करने वाली खबर की आंच अभी धीमी नहीं पड़ी थी कि गुजरात, ओडिशा, राजधानी दिल्ली तथा कर्नाटक में भी पीने के पानी की सप्लाई में सीवेज का पानी मिश्रित होने से बच्चों और बुजुर्गों के बीमार पड़ने की खबरों ने तो जैसे देशवासियों को और...और भयभीत और चिंतित कर दिया। मध्यप्रदेश के इंदौर, गुजरात के गांधीनगर की तरह ही बेंगलुरू भी स्मार्ट सिटी है लेकिन कितनी शर्म की बात है कि लोग दूषित पानी पीने से बीमार हो रहे हैं। अच्छे-खासे स्वस्थ नागरिकों पर मरने की नौबत आ रही है। सरकार स्मार्ट सिटी, स्वच्छता अभियान, शौचालय निर्माण में हजारों करोड़ रुपए खर्च कर रही है तब भी यह दुर्गति है। मैंने स्वयं दिल्ली में अनेकों इलाकों में लोगों को खुले में शौच करते देखा है। सरकार ने हर घर नल पहुंचाने की जोर-जोर से डफली तो बजायी लेकिन सच तो यह है कि कई नगरों, महानगरों के लोगों की शिकायत है कि उन्हें पानी दो-तीन दिन में एक बार मिलता है। उस पर भी अन्याय यह है कि कई बार वो पीने के योग्य नहीं होता। कई सोसाइटियों में काले, बदबूदार पानी का बार-बार आना प्रशासनिक व्यवस्था की विफलता का पर्दाफाश करता है। सेफ्टी एडवाइजरी देने वाली ग्लोबल रेस्क्यू नामक संस्था ने भारत को उन देशों की सूची में रखा है, जहां नल का पानी असुरक्षित माना जाता है। हम ये भी न भूलें कि भारत आनेवाले विदेशियों को पहले से हिदायत देकर सतर्क कर दिया जाता है कि वे यहां पर केवल और केवल बोतलबंद मिनरल वाटर ही पिएं। जापान, सिंगापुर, स्विटजरलैंड जैसे देशों के नागरिक नल का पानी इसलिए बेहिचक पीते हैं, क्योंकि वहां पर सिस्टम के कठोर स्टैंडर्ड हैं। लगातार टेस्टिंग और निगरानी बनी रहती है। भारत में पाइप लाइनें बिछाने पर तो जोर दिया जाता है लेकिन पानी की गुणवत्ता की अनदेखी होती रहती है। इस जानलेवा लापरवाही के कारण ही अधिकांश सजग भारतीयों का सरकारी तंत्र पर भरोसा नहीं है।

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