Thursday, July 16, 2026

महामंत्र

 हजारों साल बीत गये। कई हस्तियां जन्मीं और चल बसीं। बहुत को विस्मृत कर दिया गया। नाममात्र के नाम लोगों को याद रहे। श्रीकृष्ण और श्रीराम की हस्ती सदियां-सदियां गुजर जाने के बाद भी जस की तस बनी हुई है। सच तो यह है कि समय गुजरने के साथ-साथ उनकी आराधना करने वालों की तादाद में इजाफा ही हो रहा है। दोनों ने मनुष्य को ईमानदारी से कर्तव्य पथ पर चलने की सीख दी। परिश्रम के मार्ग में आनेवाले व्यवधानों से भी कभी भी न घबराने का पाठ पढ़ाया। उन्हीं के सुझाये रास्तों का अनुसरण कर न जाने कितने-कितने इंसानों का उद्धार हो गया। श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘‘सब कुछ संभव है अगर तुम्हें खुद पर पूर्ण विश्वास है। मन ही हमारा मित्र है और मन ही शत्रु। यहां मन का मतलब है विचारों का निरंतर प्रवाह। आत्म सुधार के लिए अत्यंत आवश्यक है कि हम अपने मन और उसमें उठने वाले विचारों को शुद्ध बनाए रखें। आध्यात्मिक जीवनचर्या अपनाने से मन को विषय भोगों से दूर रखने में सहायता मिलती है। दरअसल, मन और इंद्रियों की प्रवृत्ति ऐसी होती है कि अगर हम उन्हें एक इंच भी ढील देते हैं तो वे एक मील तक फैल जाती हैं। लेकिन यदि हम दृढ़ निश्चय के साथ उन्हें काबू में लाने का अभ्यास करें तो वे शांत हो जाती हैं और हम आसानी से बेहतर इंसान बन सकते हैं।’’ जिस महान धरा पर श्रीकृष्ण और श्रीराम अवतरित हुए वहीं आप और हम जन्मे हैं, इससे बड़े भाग्य और खुशनसीबी की और क्या उपलब्धि हो सकती है। इन दोनों आराध्यों का संपूर्ण जीवन अपने आप में जीवन प्रबंधन की सार्थक और सशक्त किताब है। इस किताब के पन्ने-पन्ने में लिखा है, चुनौतियों का डट कर सामना करें। अन्यायी से बिलकुल न डरें। अनुशासन और परिश्रम से कभी भी मुंह न मोड़ें। रिश्तों के मान-सम्मान में कभी कोई कमी न आने दें। यह किताब यह भी बताती है कि गुरु, साधु, धर्मगुरु, नेता और राजा का आचरण कैसा होना चाहिए। जिस प्रकार संतान को सुधारने की जिम्मेदारी माता-पिता पर होती है, औलाद के पथभ्रष्ट होेने पर अभिभावकों को भी कोसा जाता है। उसी प्रकार प्रजा की भलाई, बुराई का सारा भार राजा के ऊपर होता है। इसलिए कहा गया है, ‘‘यथा राजा तथा प्रजा’’ यदि देश का राजा, सदाचारी, न्यायप्रिय और धर्म कर्म वाला होता है तो प्रजा में सारे गुण क्रमश: उतर आते हैं। इसके विपरीत यदि राजा दुराचारी है, अन्यायी और प्रजा के साथ भेदभाव करने वाला होता है तो प्रजा में भी उच्छृंखलता, अनाचार पापाचार एवं प्रतिहिंसा के भाव फैलने में देरी नहीं लगती। ऐसे में राजा और प्रजा दोनों ही अधोगति को प्राप्त होते हैं। आनंदमूर्ति गुरु मां कहती हैं कि कृष्ण के नाम का अर्थ है-चैतन्य। कृष्ण का अर्थ है चुम्बकीय शक्ति रखने वाला। श्रीकृष्ण का आकर्षण बीते आने वाले कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा। कुरुक्षेत्र में दो सेनाओं के बीच खड़े होकर भारी तनाव के समय श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया, वो दुनिया का सर्वोत्तम ज्ञान है। महाभारत के युद्ध के आरंभ में जब अर्जुन अपने परिजनों के मोह में पड़कर लड़ने में आनाकानी कर रहे थे तब श्रीकृष्ण ने उन्हें श्रीमद्भागवत कथा का उपदेश दिया। उन्होंने अर्जुन को आत्मा की अमरता (अर्थात शरीर नश्वर है, आत्मा नहीं) और क्षत्रिय धर्म का बिना फल की चिंता किए पालने की शिक्षा दी। उन्होंने यह भी समझाया कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके परिणाम (फल) पर नहीं। 

हम बचपन से ही रामकथा और श्रीमद्भागवत कथा को सुनते आये हैं। रामकथा में प्रभु श्रीराम के आदर्श जीवन और मर्यादा का वर्णन तो श्रीमद्भागवत कथा में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और भक्तिरस का वर्णन अलौकिक सुखदायी है। इन्हें सुनने से मन को शांति और आध्यात्मिक ज्ञान की मधुर प्राप्ति होती है। भगवान श्रीराम ने अपने श्रद्धेय पिताश्री की आज्ञा का पालन करते हुए सहर्ष 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया। उनके साथ उनकी अर्धांगिनी माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण भी महलों के सुख त्याग कर जंगल-जंगल भटके। बड़ों की आज्ञा का पालन और रिश्तों के सम्मान का इससे बड़ा उदाहरण इतिहास में और कहीं मिलना दुर्लभ है। हर तरह की मुश्किलों में धैर्य रखना, सबको साथ लेकर चलना, श्रीराम ने अपने कर्मों से पूरी सृष्टि को सिखाया। उन्होंने कहा, इस धरती पर जन्मे सभी मनुष्य एक समान है। उन्होंने खुशी-खुशी शबरी के जूठे बेर खाए और वानरों से मित्रता की। दुष्ट रावण का संहार करने वाले श्रीराम का संपूर्ण जीवन ही प्रेरणादायक है। तभी तो श्रीकृष्ण और श्रीराम के सार्थक संदेश हिंदुओं के साथ-साथ अन्य धर्मों के लोगों के लिए भी आकर्षक और मार्गदर्शक बने हुए हैं। हमारे देश में समय-समय पर रामकथा और श्रीमद्भागवत कथा कहने वाले कई सच्चे महान संत हुए हैं। ये विद्वान संत अपनी मधुर वाणी और प्रभावी कथावाचन के माध्यम से समाज में ज्ञान, भक्ति और अच्छे संस्कार का उजाला फैलाते चले आ रहे हैं। पूज्य श्री मोरारी बापू संपूर्ण देश और दुनिया में सत्य और प्रेम पर आधारित रामकथा के लिए विख्यात हैं। पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (बागेश्वरधाम) का रामकथा और हनुमंत कथा प्रस्तुत करने का प्रभावी अंदाज युवाओं को भी आकर्षित कर रहा है। हालांकि कुछ विवाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ते। श्री रमेश भाई ओझा, रामकथा और श्रीमद्भागवत कथा वाचन कर बड़ी सहजता से लाखों श्रद्धालुओं का मन जीत लेते हैं। वृंदावन के अनोखे संत श्री अनिरुद्धाचार्य जी महाराज बहुत ही सरल और हास्य विनोद की प्रभावी शैली में जब श्रीमद्भागवत कथा का प्रस्तुतिकरण करते हैं तो युवक-युवतियों का अपार हुजूम भी मंत्रमुग्ध हो बस सुनता ही रह जाता है। श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज की भागवत और रामकथा प्रस्तुत करने की शैली भी लाजवाब है। सामाजिक समस्याओं के समाधान और सनातन धर्म की रक्षा का संदेश देने वाले इन महाराज की तरह कृष्ण भक्ति और भागवत कथा के लिए देश और दुनिया में जानी जा रहीं जयाकिशोरी, देवी चित्रलेखा, स्वामी अविचलदास, संत विजय कौशल जी आदि कुछ सात्विक हस्तियां हैं, जिन्होंने प्रवचन के माध्यम से धर्म के प्रचार की मशाल को बुलंदी के साथ थामा हुआ है। इनमें एक नाम कुमार विश्वास का भी जुड़ गया है, जो कवि के तौर पर डंका बजाने के पश्चात प्रवचन के क्षेत्र में भी छाये हुए हैं। श्रीकृष्ण और श्रीराम के प्रेरक जीवन चरित्र को भक्तों तथा श्रद्धालुओं तक पहुंचाने वाले सभी कथावाचक मालामाल हैं। कार्यक्रम के आयोजक पांच-दस लाख तो आसानी से दे देते हैं। अथाह धन के साथ-साथ कथावाचन का क्षेत्र पुरस्कारों से भी उनकी झोली भरता चला आ रहा है। अपराधियों को भी यह पवित्र क्षेत्र आकर्षित करने लगा है। चिंताजनक तथ्य यह भी है कि कुछ संगीन नकाबपोश अपराधी अपने मकसद में कामयाब भी हुए हैं।

पंडवानी की साम्राज्ञी तीजनबाई किसी परिचय की मोहताज नहीं। कुछ दिन पहले ही उनका निधन हुआ है। पंडवानी यानी पांडवों की कथा को मंच पर घूम-घूमकर सुनाती रहीं तीजनबाई जब महाभारत के विभिन्न प्रसंगों, विशेषकर भीम और अर्जुन की वीरता का बखान करती थीं तो दर्शकों में अथाह जोश भर जाता था। छत्तीसगढ़ में जन्मी तीजनबाई लोकगीत-नाटय की पहली महिला कलाकार थीं, जिन्होंने विदेशों में भी अपने नाम तथा कला की पताका फहराई। उनका विवाह मात्र 12 वर्ष की उम्र में हो गया था। पंडवानी गायन के लिए उन्होंने समाज की परंपराओं को तोड़ते हुए अपना संघर्ष जारी रखा। उनके पति को अपनी पत्नी तीजन का मंच पर जाना कतई पसंद नहीं था। घर में रोज-रोज कलह-क्लेश होने लगा। तीजनबाई को रूढ़िवादी पति के हाथों कई बार पिटना भी पड़ा और अंतत: विवाह टूट गया। परिवार तथा समाज ने भी बहिष्कृत कर दिया। दूसरी शादी भी हुई, लेकिन दूसरे पति ने भी विरोध किया कि यह तो पुरुषों वाला काम है। घर की औरतों का मंच पर नाचना-गाना शोभा नहीं देता। लोग मजाक उड़ाते हैं लेकिन तब तक तीजनबाई के अंदर का कृष्ण जाग चुका था। भीम और अर्जुन की साहस कथा में रच-बस चुकी तीजनबाई विरोधियों का डटकर सामना करना सीख चुकी थीं। उन्हें  पता चल चुका था कि कुछ भी नया करने वालों की राह में रोड़े डालने वालों को सिर्फ और सिर्फ अपने अटल जुनून और अथक परिश्रम से पटकनी दी जा सकती है। एक बार पति महोदय कुछ ज्यादा ही मर्दांनगी दिखाने के चक्कर में मंच पर चढ़कर गाली-गलौच करने लगे और पत्नी पर चुपचाप मंच से उतरने का दबाव डालने लगे। तब तीजनबाई ने आव देखा न ताव तंबूरे को लहराते हुए उसे जोर से फटकारा, जिससे उसके होश उड़ गये और वह चुपचाप चलता बना। उसके बाद की संघर्ष की यात्रा की दास्तां अनंत है। जिसने यह सिद्ध कर दिखाया कि कर्मवीर मंजिल पर पहुंचकर ही दम लेते है। उन पर किसी के विरोध का तंत्र-मंत्र नहीं चलता। बेखौफ चलते-बढ़ते जाना ही मंजिल तक पहुंचने का एकमात्र ‘महामंत्र’ है। जो बचपन में कभी स्कूल की सीढ़ी नहीं चढ़ी थी उसने साक्षरता अभियान के सहारे बमुश्किल पांचवी पास की लेकिन अपनी कला के प्रदर्शन के बलबूते पर 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्मभूषण और 2019 में देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण हासिल कर अपना लोहा मनवाते हुए दिखा दिया कि जब कुछ करने की जिद हो तो सफलता मिलती ही है। 

किसी अच्छे काम में विघ्न डालने, छलकपट करने वालों की नस्ल कभी भी नहीं मरती। श्रीराम के नाम की आड़ में लूटपाट और शैतानी करने वाले रावण के रूप और प्रतिरूप आज भी हमारे समाज में जिन्दा हैं। अयोध्या में बने भगवान श्रीराम के पवित्र मंदिर में चढ़ावे में आने वाले रुपयों की चोरी और सोने, चांदी, हीरे के दान के गबन की खबरों ने तो सभी देशवासियों को झकझोर कर रख दिया। राम भक्तों के दान और चढ़ावे में सेंध लगाने वाले चोरों और डकैतों की जालसाजी और नीचता तो देखिए कि श्रीराम की अपार आस्था से सराबोर सात्विक धन को शराबखोरी में भी उड़ाया गया। किसी ने कारें खरीदीं तो किसी ने बंगले ताने तो कोई साहूकार बनकर लूट की मोटी रकम को ब्याज पर देकर धन्ना सेठ बन गया। इन लुटेरों में ज़रा भी इंसानियत होती तो इतने अंधे नहीं बन जाते। वर्षों के संघर्ष के बाद बने दिव्य राम मंदिर में लूटपाट करने से पहले जरूर सोचते-विचारते। लेकिन उनकी आत्मा और विवेक का ही सत्यानाश हो चुका था। अब जब इन निर्लज्ज जन्मजात बेईमानों का पर्दाफाश हो चुका है तो कम अज़ कम हमें और आपको नकाबपोशों से सतर्क और सावधान हो जाना चाहिए।

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