Thursday, November 16, 2017

फरिश्तों की पहचान

जो सपने खुली आंखों से देखे जाते हैं उनकी कभी मौत नहीं होती। परोपकार करने वाले कहीं न कहीं सदैव जिन्दा रहते हैं। कुछ अलग हटकर करने वालों को आसानी से भुलाया नहीं जा सकता। यह जरूरी नहीं दूसरों के लिए खुद को समर्पित कर देने वाले फरिश्तों को लाखों-करोडों लोग जानें और जय-जयकार करें। उनको जानने-समझने वालो की संख्या भले ही कम हो, लेकिन वो अपने कर्मों की बदौलत अमर तो हो ही जाते हैं। मुकुलचंद जोशी। हम जानते हैं कि इस नाम से हर कोई वाकिफ नहीं है, लेकिन जिस तरह से उन्होंने अपना जीवन जीया और दुनिया से विदायी लेने के बाद भी परोपकार का परचम लहराया उससे कई लोगों के लिए उन्हें भुला पाना नामुमकिन है। १४ वर्षों तक नोएडा में लोगों को यातायात नियमों के प्रति जागरूक करने वाले मुकुलचंद का बीते सप्ताह ८३ वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनकी इच्छा के अनुसार उनकी दोनों आंखें दान कर दी गयीं। अपने जीते जी लोगों को यातायात नियमों के प्रति सतर्क करने वाले मुकुलचंद उर्फ 'ट्रैफिक बाबा' की आंखें अब दूसरे के जीवन को रोशन कर रही हैं। लगभग १४ वर्ष पूर्व उनके मामा का बेटा बिना हेलमेट लगाए स्कूटर लेकर निकला था और सडक हादसे में उसकी मौत हो गई। इस घटना ने उन्हें झकझोर दिया। उसके बाद से ही वे लोगों को यातायात नियमों का पाठ पढाने में लग गए। १९९३ में आगरा से फ्लाइट इंजिनियर के पद से सेवा निवृत हुए मुकुलचंद के परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटे हैं। बडे बेटे कैप्टन नीरज जोशी मर्चेंट नेवी सिंगापुर में जबकि छोटे बेटे राजीव जोशी एयरफोर्स बेंगलुरु में कार्यरत हैं। ८३ वर्ष की उम्र में भी लोगों को सडक दुर्घटनाओं में मौत से बचाने के लिए जागरूक करने वाले इस सजग भारतीय की तमन्ना शीघ्र ही अपने बेटे के पास बंगलुरू शिफ्ट होने की थी। वहां पर भी वे ट्राफिक जागरूकता अभियान के काम को जारी रखना चाहते थे, लेकिन वक्त को यह मंजूर नहीं था।
उनकी यही अंतिम इच्छा थी कि मृत्यु के बाद शरीर का जो भी अंग दूसरे के काम आ सके, उसे दान कर दिया जाए। उनकी मौत के बाद पत्नी ने बच्चों के आने से पहले ही सभी औपचारिकताएं पूरी कर पति की दोनों आंखें दान कर दीं।
पहाडों और जंगलों में रहने वाले गरीब ग्रामीणों का जीवन संग्रामों का पर्यायवाची है। न जाने कितनी समस्याओं से उन्हें रोज जूझना पडता है। पहाडी इलाकों में जंगल की आग और जानवरों के हमले से अक्सर ग्रामीण जलते और बुरी तरह से घायल होते रहते हैं। कितनों का चेहरा बिगड जाता है और शरीर विकृत हो जाता है। जिनके घर में कभी-कभार चूल्हा  जलता है उनके तो जख्म कभी भर ही नहीं पाते। अथाह पीडा उनकी उम्रभर की साथी बन जाती है। प्लास्टिक सर्जरी करवा पाना तो उनके लिए असंभव होता है। ऐसे में उत्तराखंड में दून के एक ८० वर्षीय प्लास्टिक सर्जन ऐसे विपदा के मारे लोगों के लिए आसमान से उतरे देवदूत की भूमिका निभाते दिखायी देते हैं। कभी अमेरिका में प्लास्टिक सर्जन रह चुके इस फरिश्ते ने पिछले ११ वर्षों से खुद को असहायों और बेबसों की सेवा में समर्पित कर दिया है। उन्होंने अब तक चार हजार से अधिक दुखियारों की प्लास्टिक सर्जरी कर इंसानियत के महाधर्म को निभाया है। गौरतलब है कि वे इतने काबिल प्लास्टिक सर्जन हैं कि अगर किसी बडे शहर में अपनी सेवाएं देते तो अपार धन-दौलत कमा सकते थे और दुनियाभर की सुख-सुविधाओं का आनंद ले सकते थे, लेकिन उन्होंने तो अपने जीवन को गरीबों के लिए समर्पित करने की प्रतिज्ञा कर रखी है। देहरादून-मसूरी रोड पर उनकी अपनी पुश्तैनी जमीन है जहां पर उन्होंने क्लिनिक बनाया है और जंगल की आग और जानवरों के हमले के शिकार लोगों की नि:शुल्क सर्जरी करते हैं। डॉ. योगी कहते हैं कि जलने या जानवर के हमले से घायल होने के कारण शारीरिक विकृति से जूझ रहे लोगों को दोबारा वही काया पाकर न सिर्फ नया जीवन, बल्कि सामान्य जीवन जीने का एक हौसला भी मिलता है। इस उम्र में मुझे धन-दौलत की नहीं बल्कि आत्मिक शांति और सुकून की जरूरत है। विपदाग्रस्त लोगों की मुस्कान और दुआ के रूप में मुझे यह भरपूर मिल रहा है। डॉ. योगी का एक बेटा उत्तराखंड में डॉक्टर है, लेकिन वे उस पर निर्भर नहीं हैं। अपना खर्च चलाने के लिए निजी अस्पतालों में पार्ट टाइम प्लास्टिक सर्जरी करते हैं। कितना भी जटिल ऑपरेशन क्यों न हो, डॉ. योगी कभी ना नहीं बोलते।
 "जब आप कोई अच्छा काम करते हैं तो अन्य लोग भी खुद-ब-खुद जुडते चले जाते हैं।" यह कहना है आपदा पीडित बेसहारा बच्चों का सहारा बनी रागिनी मंड्रेले का। रागिनी तब बहुत विचलित हो उठी थीं जब उत्तराखंड में दिल को दहला देने वाली आपदा के चलते कई बच्चों ने अपने मां-बाप को खो दिया था। उन्हें कोई आश्रय देने वाला नहीं था। कितने अनाथ बच्चे हाथ में भीख का कटोरा थामे सडकों पर भटकने को विवश हो गए थे। तभी रागिनी ने फैसला किया था कि वे बेसहारा बच्चों की जिंदगी को संवार कर अपने जीवन को सार्थकता प्रदान करेंगी। उन्हें पांच बच्चों की जानकारी मिली जिन्हें आश्रय की सख्त जरूरत थी। पांच बच्चों से शुरू हुआ उनका सफर आज कई बच्चों तक पहुंच गया है। वे निराश्रित बच्चों के रहने से लेकर खाने-पीने और पढने-लिखने की संपूर्ण व्यवस्था करती हैं। इस मानव सेवा के कार्य में उनकी बेटी का भी पूरा साथ मिलता है। वे सभी बच्चों को अपनी संतान मानती हैं। कुछ समाजसेवी संस्थाएं भी उनको सलाह-सुझाव और सहयोग प्रदान करती हैं। वे चाहती हैं कि दूसरे लोग भी बेसहारा बच्चों की सहायता करने के लिए आगे आएं। देश के न जाने कितने बेसहारा बच्चों को हमारी सख्त जरूरत है।

Thursday, November 9, 2017

मौत के फंदे

यह हमारा देश है हिन्दुस्तान जहां पर सबसे ज्यादा गरीब हैं किसान जो खून-पसीना बहाकर १२५ करोड देशवासियों के लिए अन्न उगाते हैं और खुद भूखे पेट सोते हैं। अपने यहां किसानों की अनदेखी की ऐसी भयावह परिपाटी है जो वर्षों से चली आ रही है। सभी सरकारें किसानों की भरपूर सहायता का ढोल पीटती हैं फिर भी किसानों की आत्महत्याओं का आंकडा कम होने का नाम नहीं लेता। सत्ताधीश ही नहीं हम और आप भी किसानों की उपज का सही दाम देने में हैरतअंगेज तरीके से आनाकानी करते हैं। भारतीय किसानों के जीवन में खुशहाली और बदलाव लाने के लिए नेता, बुद्धिजीवी और तमाम किस्म के विद्वान आपस में बैठकर चिन्तन-मनन तो ऐसे करते हैं कि किसानों का उनसे ब‹डा और कोई हितकारी न हो। सबका हित करने वाला किसान व्यापारियों, धनलोभियों, नेताओं के लालच का शिकार हो जाता है और लोगों के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आती। जिन दवाओं से फसलों पर लगने वाले कीडों का खात्मा होना चाहिए वही कीटनाशक दवाएं किसानों की जान ले लेती हैं। किसानों के मरने की खबर मीडिया में कुछ दिन तक नजर आती है, लेकिन होता-जाता कुछ नहीं। बलशाली धंधेबाज शातिर हत्यारे कहीं दूर सुरक्षित बैठे मुस्कराते रहते हैं। शासन और प्रशासन भी उनकी चौखट पर नतमस्तक नज़र आता है। पिछले दिनों विदर्भ के यवतमाल, अकोला, बुलढाना, वर्धा, गोंदिया और भंडारा जिलों में लगभग ४५ किसानों-श्रमिकों की मौत विषैले कीटनाशकों के छिडकाव के कारण हो गई। पांच सौ से ज्यादा किसानों को अस्पताल में भर्ती होना पडा और लगभग २५ किसान अपनी नेत्रज्योति खो बैठे। गौरतलब है कि यवतमाल एक ऐसा बदनसीब जिला है जहां पर सर्वाधिक किसान कर्ज से त्रस्त होकर आत्महत्या कर चुके हैं। विगत वर्ष भी विदर्भ के इन क्षेत्रों में १५० से अधिक किसानों, श्रमिकों को विषैले कीटनाशकों ने मौत के आगोश में सुला दिया था। अगर सरकार जागृत होती तो इस वर्ष जहरीले कीटनाशकों के चलते किसानों का नरसंहार नहीं होने पाता। विदर्भ में कई कृषि केन्द्र ऐसे हैं जो बिना लायसेंस के कीटनाशक दवाएं बेचकर किसानों से धोखाधडी कर अपनी तिजोरियां भरते हैं। जिन कीटनाशकों के छिडकाव से विदर्भ के किसानों की दर्दनाक मौतें हुई उन्हें गुजरात और मुंबई की कंपनियों से बुलाया गया था। शेतकरी स्वावलंबी मिशन के अध्यक्ष ने इन मौतों को 'किसान हत्या काण्ड' और 'नरसंहार' का नाम देते हुए स्पष्ट कहा कि इस हत्याकाण्ड के लिए जितने दोषी कृषि विभाग के अधिकारी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं उतनी ही सरकार भी है।
यह हैरतनाक जानकारी भी सामने आयी कि खरीफ सीजन में विदर्भ में कम से कम २०० करोड से अधिक की कीटनाशकों की बिक्री हुई। इनमें से अकेले यवतमाल जिले के विभिन्न कृषि केन्द्रों से पूरे ४० करोड रुपये मूल्य के कीटनाशकों की बिक्री की गई। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि इनमें से ज्यादातर कीटनाशक अनाधिकृत (अवैध) थे। यवतमाल जिले में सरकार के अनुसार खरीफ फसल का क्षेत्र साढे नौ लाख हेक्टर है। इसमें से ४ लाख ७० हजार हेक्टर क्षेत्र में कपास की फसल लगाई गई है। इनमें से लगभग तीन लाख हेक्टर क्षेत्र में जहरीले कीटनाशकों का छिडकाव किया जा चुका है। विदर्भ में ३५ कंपनियों के २० प्रकार के कीटनाशक और २५-३० प्रकार के बीज बेचे जाते हैं। इनमें से कई अवैध भी होते हैं। इस प्रकार विदर्भ में कीटनाशकों का काला बाजार भी सरकार के कृषि विभाग के नाक के नीचे चल रहा है। इनकी मिलीभगत के कारण ही इतनी मौतें हो रही हैं और सरकार कुंभकर्णी नींद से जागने का नाम ही नहीं लेती। सवाल यह भी है कि कृषि अधिकारियों की जानकारी के बिना ऐसे जहरीले कीटनाशक कृषि सेवा केन्द्रों तक पहुंचते कैसे हैं? सवाल यह भी है कि विदर्भ में हुई किसानों की इन मौतोें के लिए अब जिम्मेदार किसे माना-समझा या ठहराया जाए! क्योंकि सब के सब हाथ खडे कर रहे हैं।
नागपुर से लगभग एक घण्टे के सफर की दूरी पर स्थित है रामटेक नगर। यहां पर आत्महत्या करने वाले किसानों की याद में एक यात्रा निकाली गई। इस यात्रा में एक युवक किसानों की बेबसी और पीडा का प्रदर्शन करने के लिए ट्रेक्टर पर सवार होकर फांसी के फंदे पर झूलने का अभिनय कर रहा था। ट्रेक्टर चलता चला जा रहा था और युवक के फांसी पर झूलने के अभिनय को देखकर लोग तालियां पीट रहे थे। सभी अपनी मस्ती में थे। अचानक रस्सी गले में कस गई और युवक तडपने लगा। उसकी तडपन को भी लोगों ने अभिनय समझा। कुछ देर बाद जब ट्रेक्टर रूका तो लोगों ने युवक को बेसुध पाया। ट्रेक्टर के ऊबड-खाबड कच्ची सडक पर दौडने के कारण हुई डगमगाहट के चलते फांसी का फंदा उसके गले में कस गया और उसकी मौत हो गयी। ऐसी ही एक मौत २०१५ में देश की राजधानी में हुई थी जिसकी गूंज दूर-दूर तक सुनाई दी थी। विभिन्न रैलियों और अनशनों के लिए विख्यात जंतर-मंतर में आम आदमी पार्टी ने किसानों की बदहाली पर सत्ताधीशों का ध्यान आकर्षित करने के लिए विशाल रैली का आयोजन किया था। राजस्थान के दौसर से चलकर गजेंद्र सिंह नामक एक किसान भी यहां पहुंचा था। मंच पर केंद्र सरकार को कोसा जा रहा था तभी एकाएक राजस्थानी वेशभूषा में भीड का ध्यान आकर्षित करता गजेंद्र सिंह मंच के निकट के नीम के पेड पर चढ गया। उसके हाथ में झाडू और गमछा था। जंतर-मंतर में जुटे न्यूज चैनल वाले जैसे गजेंद्र की ही राह देख रहे थे। देखते ही देखते दो मंच बन गये। एक पर थे अरविंद केजरीवाल और उसके साथी और दूसरे पर आम आदमी के चुनाव चिन्ह झाडू को लहराता किसान। न्यूज चैनल वालों के चमकते कैमरों को देखकर किसान के लहू में करंट दौडने लगा था। उसने अचानक गमछे को अपनी गर्दन में फंदे की तरह डाल लिया था और फांसी लगाने का अभिनय करने लगा था। सभी चैनलवालों ने किसान के फांसी के अभिनय को लाइव दिखाना शुरू कर दिया था। भीड का ध्यान भी मंच से हट गया था। इसी बीच किसान ने फंदे की तरह डाले गमछे को थोडा जोर से कसा और तब वह हो गया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। संतुलन बिगड जाने के कारण गमछा वास्तव में फांसी का फंदा बन गया और किसान के प्राण पखेरू उड गये। एक हंसता-खेलता किसान इस दुनिया से विदा हो गया। आरोप-प्रत्यारोप और सहानुभूति का सैलाब उमडता रहा। नेताओं ने किसान को शहीद का दर्जा देकर तालियां भरपूर बटोरीं थीं। इस घटना को घटे दो साल से ज्यादा हो चुके हैं। लेकिन उस शहीद की किसी भी नेता और न्यूज चैनल वालों को याद नहीं आयी!

Thursday, November 2, 2017

अतिथि देवो भव:?

यह कोई नई बात नहीं है। मायानगरी मुंबई को कुछ नेता अपनी जागीर समझते हैं। उन्हें बाहर से लोगों का यहां आना कतई नहीं सुहाता। यही वजह है कि कभी टैक्सी वाले तो कभी फेरी वाले उनका निशाना बनते रहते हैं। सरकारी नौकरी की आस में इस नगरी में मेहमान बन आने वाले पढे-लिखे युवाओं पर भी लाठी-डंडे बरसाने से परहेज नहीं किया जाता। यह 'पुण्य' कभी शिवसेना वाले कमाते हैं तो कभी महाराष्ट्र निर्माण सेना वाले। उग्र नेताओं को लगता है कि देश के अन्य प्रदेशों से मुंबई में कमाने-खाने के लिए आने वाले भारतीयों को सबक सिखाये बिना प्रदेश का उद्धार और विकास नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी मान लिया है कि कानून सही समय पर अपना काम नहीं करता इसलिए उसे अपने हाथ में लेने में कोई बुराई नहीं है। चुनावी हार और विरोधियों के दांवपेचों से पराजित होने वाले नेताओं की बौखलाहट बार-बार सामने आती है। पिछले दिनों मनसे के सुप्रीमों राज ठाकरे ने मुंबई के फेरीवालों के खिलाफ फिर से हिंसक अभियान छेड दिया। उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने परप्रांतीय लोगों को चुन-चुनकर निशाना बनाया और जमकर मारपीट की। मारपीट करने वाले इस सच को भूल गए कि फेरीवालों में मराठी मानुष भी शामिल हैं। मनसे वाले बेखौफ होकर फेरीवालों पर आतंकी जुल्म ढाते रहे और पुलिस लगभग मूकदर्शक बनी रही। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने मनसे के खिलाफ रोष जताते हुए उसे कानून को अपने हाथ में नहीं लेने की नसीहत दी तो भी उसे कोई फर्क नहीं पडा।
मुंबई कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष संजय निरुपम ने खुद को उत्तर भारतीयों का मसीहा साबित करने और अपनी ठंडी पडी दुकान को चर्चा में लाने के लिए फेरीवालों के हौसले बुलंद करने के लिए कहा कि खुद की जान बचाने के लिए अगर कानून हाथ में लेना पडे तो किंचित भी देरी मत करो। गुंडों की मार खाने से बेहतर है उनसे भिडना और लडना। संजय के भडकाऊ भाषण का असर होने में देरी नहीं हुई। संजय की सभा खत्म होने के बाद जब फिर मनसे के कार्यकर्ता फेरीवालों को खदेडने के लिए पहुंचे तो उन्होंने भी उनका जमकर प्रतिरोध किया और जमकर मारपीट हुई। कइयों को गंभीर चोटें आयीं। कुछ को अस्पताल में भी भर्ती करना पडा। इस बार पुलिस ने भी खासी फुर्ती दिखाई। दंगा भडकाने के आरोप में निरुपम के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश और बिहार के लाखों लोग मुंबई एवं आसपास मेहनत मजदूरी करने के लिए आते हैं। कई लोग यहां स्थायी तौर बस चुके हैं। मेहनतकश लोग बरसात, धूप, आंधी-तूफान की परवाह किये बिना फुटपाथ पर अपनी अस्थायी दुकानें लगाकर किसी तरह से अपने घर चलाते हैं। नियम तो यह कहता है कि यदि फेरीवालों के पास लाइसेंस नहीं है तो महानगरपालिका को ही उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन वर्षों से यही देखा जा रहा है कि कभी शिवसेना तो कभी मनसे के बहादुर कार्यकर्ता कानून को अपने हाथ में लेकर उनके साथ मारपीट करते हैं। ठेलों में विक्रय के लिए रखे गए सामानों को नुकसान पहुंचाते हैं। कांग्रेसी संजय निरुपम के भडकाऊ सुझाव को किसी भी हालत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। यह भी हकीकत है कि संजय निरुपम की राजनीति की शुरुआत शिवसेना से हुई थी। जब वे शिवसेना के मंच पर छाती तानकर भाषणबाजी किया करते थे तब भी उत्तर भारतीय शिवसैनिकों के हाथों प्रताडित होते थे। तब उनका कभी मुंह खुलते नहीं देखा गया। उन्हें राजनीति में अपने पैर जमाने थे इसलिए चुप्पी साधे रहे। दरअसल मतलबपरस्ती ऐसे नेताओं के खून में समायी है। आज वे कांग्रेस में हैं, लेकिन उनकी सुनी नहीं जा रही। इसलिए उन्होंने हिंसक तेवर दिखाकर यह दर्शाने की कोशिश की है कि अकेले वे ही ऐसे कांग्रेसी हैं जो परप्रांतीयों के लिए ढाल बनने का दम रखते हैं। इस चक्कर में उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि देश में सक्षम कानून है जो गुंडे बदमाशों के होश ठिकाने लगाने में सक्षम है। फेरीवालों को कानून को अपने हाथ में लेने की उनकी सीख से कहीं न कहीं यह भी लगता है कि वे भी उसी गुंडागर्दी में प्रबल यकीन रखते हैं जिसमें दूसरे नेता पारांगत हैं और वर्षों से आतंक मचाते चले आ रहे हैं। यह कैसी विडंबना है कि एक ओर जहां देश में आपसी सद्भाव के नारे लगाये जाते हैं वहीं दूसरी तरफ अपनों के हाथों अपनों का अपमान होता है, खून बहाया जाता है। यकीनन यह देश के अच्छे भविष्य के संकेत नहीं हैं। पिछले दिनों विदेशी पर्यटकों के साथ जो बदसलूकी हुई उसने भी देश को कलंकित किया है। मेहमान देशी हों या विदेशी... उनके साथ दुर्व्यवहार का होना बेहद दु:खद, शर्मनाक और निंदनीय है। देश के विभिन्न पर्यटन स्थलों पर देशी और विदेशी सैलानियों के साथ होने वाली बदसलूकी हमारी सभ्यता और संस्कृति को कटघरे में खडा करती है। लगता है कि 'अतिथि देवो भव:' कहना अब मात्र दिखावा रह गया है। इसकी मूल भावना की हत्या का अनवरत सिलसिला जारी है। उत्तर प्रदेश के फतेहपुर सीकरी में जिन दो विदेशी पर्यटकों को मारा-पीटा गया वे तो भारतवर्ष को मेहमान नवाजी के मामले में एक आदर्श देश मानकर पर्यटन के लिए आए थे। इस विदेशी दंपति को देखते ही कुछ लोगों ने उन पर अभद्र टिप्पणियां करने के साथ-साथ लाठियों और पत्थरों से भी हमला किया। अगर ऐसी घटनाएं नहीं थमीं तो सोचिए कि विदेशी पर्यटक हिन्दुस्तान के बारे में क्या सोचेंगे और क्यों आएंगे? यह भी काबिले गौर है कि देश में आने वाले विदेशी प्रयटकों की संख्या में धीरे-धीरे कमी आती जा रही है...।

Thursday, October 26, 2017

इस रोग का क्या है इलाज?

२०१७ की दिवाली की शाम। नागपुर में फिर एक युवक अंधश्रद्धा की बलि चढा दिया गया। कुणाल खेरे नामक छत्तीसगढी १९ वर्षीय युवक अपने घर के होम थियेटर पर गौरा-गौरी के गानों का आनंद ले रहा था। नागपुर के डिप्टी सिगनल इलाके में काफी बडी संख्या में रोजी-रोटी की तलाश में छत्तीसगढ के लोग आकर बसे हैं। छत्तीसगढ की तर्ज में नागपुर में भी गौरा-गौरी उत्सव बडी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। उत्सव की तैयारियों के उत्साह में कुणाल भजनों भरे गीत जोर-शोर से बजाने में तल्लीन था। गीतों की तेज आवाज उसके पडोसी को खल रही थी। उसे गुस्सा आ रहा था। जब उसने देखा कि शोर थमने का नाम नहीं ले रहा है तो उसने कुणाल के घर के सामने खडे होकर अपना तीव्र विरोध जताना शुरू कर दिया। पडोसी का कहना था कि भजनों को सुनने से उसकी पत्नी के शरीर में देवी आ जाती है और वह बेकाबू हो जाती है। कुणाल और उसके परिवार के लोगों ने पडोसी के विरोध को नजरअंदाज कर दिया। इससे पडोसी आग बबूला हो गया और देखते ही देखते दोनों परिवारों में गाली-गलोच और मारपीट होने लगी। इसी दरम्यान कुणाल और उसके पिता पर तीक्ष्ण हत्यारों से हमला कर दिया गया। कुणाल की घटनास्थल पर मृत्यु हो गई।
अंधविश्वास, अंधभक्ति और अंधश्रद्धा ने इस सृष्टि में कितना कहर ढाया है इसका हिसाब-किताब किसी के पास नहीं है। यह वो रोग है जो कहीं न कहीं सदियों से जिन्दा है। इसके खात्मे की न जाने कितनी कोशिशें की गर्इं, लेकिन पूरी तरह सफलता नहीं मिली। गांव तो गांव प्रगतिशील शहर भी इसके प्रभाव से अछूते नहीं हैं। वैसे यह भी सच है कि शहर हों या गांव आखिर बनते तो लोगों की वजह से ही हैं। हमारे ही समाज में ऐसे लोगों की अच्छी-खासी तादाद है जो अंधविश्वास से मुक्त नहीं होना चाहते। इन्हीं की वजह से नये-नये बाबा जन्मते रहते हैं और अपना मायाजाल फैलाकर अंधेरगर्दी का अंधकार फैलाकर अपने आर्थिक साम्राज्य का अकल्पनीय विस्तार करते चले जाते हैं। मायावी साधु-संतों ने समाज को दिया कम और वसूला ज्यादा है। हमारे देश में जिस तादाद में साधु-संत-प्रवचनकार हैं उससे तो होना यह चाहिए था कि आम लोगों में संयम, शालीनता का वास होता और गुस्से की जगह नम्रता और शालीनता की धारा बह रही होती। लेकिन ऐसा दिखता नहीं है। बडे तो बडे बच्चे भी हत्यारों की भूमिका में नजर आने लगे हैं। जो मंजर सामने आ रहे हैं वे बेहद डराते हैं।
नागपुर से ज्यादा दूर नहीं है यवतमाल शहर। इस शहर में ऐन दिवाली के दिन छठवीं कक्षा के एक बारह वर्षीय छात्र की हत्या कर दी गई। हत्यारे थे उसी के तीन हमउम्र साथी। पतंग को लेकर आपसी विवाद हुआ था। तीनों नाबालिगों ने पुलिसिया पूछताछ में बताया कि शाम को ट्यूशन से लौटते समय अभीजित ने पतंग लूट ली थी जिसे उन तीनों ने छीन लिया। अभीजित ने उनकी इस हरकत का पुरजोर विरोध किया और गाली-गलोच पर उतर आया। इसपर वे भी अपना आपा खोकर उसकी तब तक धुनायी करते रहे जब तक वह बेहोश नहीं हो गया। उसे बेहोश देखकर उन्हें शंका हुई कि कहीं वह मर तो नहीं गया। ऐसे में उन्होंने उसका पूरी तरह से काम तमाम करने के लिए पत्थर उठाया और कुचल कर उसे पूरी तरह से मुर्दा कर लाश झाडियों में छुपा दी। जब तीनों नाबालिगों ने इस भयावह वारदात को अंजाम दिया उस समय वे नशे में थे। जहां लाश मिली वहां पर नशेडियों का जमावडा लगा रहता है। नशा करने वालों की वह मनपसंद जगह है।
लोग तरह-तरह का नशा करते हैं। कहते हैं कि सत्ता और धन का नशा सबसे खतरनाक होता है। इसके नशे में चूर इंसान को भी हैवान बनते देरी नहीं लगती। अपने देश में सत्ता के नशे के गुलामों का अहंकार देखते बनता है। देश के विशालतम प्रदेश बिहार के एक गांव में पंचायत के मुखिया दयानंद मांझी की उपस्थिति में दर्जनभर दबंगों ने एक गरीब को जबरन थूक चटवायी और चप्पलों से पिटायी कर अपने अहंकार की पीठ थपथपायी। उस बुजुर्ग गरीब का कसूर यह था कि वह खैनी (तम्बाकू) की चाह में बिना अनुमति लिए एक दबंग के घर चला गया था। दरवाजे पर कोई नहीं था। गांव में शहरों की तरह दिखावटी औपचारिकता निभाने और दिखाने का चलन नहीं है। भारतीय ग्रामों में एक-दूसरे के घरों में बिना पूछे चले जाना आम है। लेकिन दबंग को उस गरीब का घर में प्रवेश करना रास नहीं आया। कोई धनवान होता तो उसे कोई फर्क नहीं पडता, लेकिन गरीब का बिना पूछे घर में प्रवेश करना उसे बुरी तरह से चुभ गया। उसके घर की महिलाओं ने उस पर छेडखानी का आरोप जड दिया। दिवाली के दिन दबंग के घर गांव के मुखिया की अगुवाई में पंचायत बुलाई गई। पंचायत ने जमीन पर थूक फेंककर गरीब बुजुर्ग को चाटने का आदेश दिया जिसे उसे मानना ही पडा। इसके साथ ही महिलाओं ने भी उसकी चप्पलों से पिटायी की। उससे यह शपथ भी दिलाई गई कि वह बिना पूछे किसी के घर में नहीं जाएगा। दबंगों ने तो उसके चेहरे पर कालिख पोत गधे पर बिठाकर पूरे गांव में घुमाने की तैयारी भी कर ली थी। इतनी प्रताडना सहने के बाद भी पीडित थाने में जाकर शिकायत करने की हिम्मत नहीं कर पाया। पंचायत और रईसों की सामंती सोच का विडियो जब वायरल हुआ तो तब कहीं जाकर पुलिस हरकत में आयी। गांव वालों का रवैय्या भी कम शर्मनाक नहीं रहा। गरीब की इज्जत लुटती रही और वे तमाशा देखते रहे। वैसे भी तमाशा देखने के मामले में हम भारतवासियों का जवाब नहीं। विशाखापटनम में एक नशेडी स्थानीय रेलवे स्टेशन के पास के फुटपाथ पर एक विक्षिप्त महिला के साथ बेखौफ होकर बलात्कार करता रहा और लोग अनदेखी कर आते-जाते रहे। कुछ अति उत्साही तमाशबीनो ने तस्वीरें खींची और वीडियो भी बनाया, लेकिन किसी ने भी उस वहशी बलात्कारी को रोकने का साहस नहीं दिखाया।

Thursday, October 19, 2017

क्यों नहीं लेते सबक?


ज़िन्दगी अनमोल है। इसके साथ खिलवाड करना ठीक नहीं है। लोगों को इस बारे में आप लाख समझाते रहो, सतर्क होने का पाठ पढाते रहो, फिर भी कुछ लोग जानबूझकर भूलें करते ही चले जाते हैं। यह हकीकत कितनी हैरान करने वाली है कि भारतवर्ष में हर वर्ष लापरवाही से पटाखे जलाने के कारण लगभग छह हजार लोग अपनी आंखें गंवा देते हैं। 'ब्लू व्हेल' नामक जानलेवा ऑनलाइन सुसाइड गेम की वजह से भारत और दुनिया में कई बच्चों ने को मौत को गले लगा लिया। यह वो आत्मघाती खेल है जिसमें खिलाडी को ५० दिन के अंदर कई टास्क पूरे करने होते हैं और इसका आखिरी टास्क खिलाडी को आत्महत्या के लिए विवश कर देता है। ब्लू व्हेल से दूर रहने के लिए कितना कुछ लिखा और समझाया गया, लेकिन लत तो लत है जो पीछा नहीं छोडती। माना कि स्मार्ट फोन पर युवाओं को रोमांचक गेम खेलना बहुत लुभाता है, लेकिन जान दे देना कहां की अक्लमंदी है? कल ही एक खबर पढने में आयी कि चीन में इसी शौक की वजह से एक इक्कीस वर्षीय लडकी की आंख की रोशनी चली गई। गौरतलब है कि इस लडकी ने लगातार २४ घण्टे तक अपने स्मार्ट फोन पर 'ऑनर ऑफ किंग्स' नामक गेम खेला जिसके बाद उसकी आंख की रोशनी जाती रही। 'ऑनर ऑफ किंग्स' चीन का बेहद लोकप्रिय गेम है जो धीरे-धीरे भारत में भी अपने पांव पसार रहा है। इस गेम को चीन के लगभग २० करोड लोग प्रतिदिन खेलते हैं। अपनी आंखों की रोशनी गंवा चुकी लडकी इस गेम को खेलने के चक्कर में ८-१० घण्टे न कुछ खाती-पीती थी और न ही टायलेट जाती थी। यहां तक कि जिस दिन ऑफिस में छुट्टी होती थी उस दिन सुबह छह बजे उठकर नाश्ता करने के बाद शाम चार बजे तक वह गेम खेलती और नाम मात्र की नींद लेकर फिर रात १ बजे तक गेम खेलती थी।
जीते-जागते इंसानों की जान लेने के खेलों और साजिशों के इस दौर में धन की हद से ज्यादा अहमियत बढ गई है। हम भारतवासी हजारों वर्षों से दीपावली मनाते चले आ रहे हैं। यह महापर्व अंधकार पर प्रकाश की, बुराई पर अच्छाई की, दुर्गुणों पर सदगुणों की और दुर्जनों पर सज्जनों की विजय का प्रतीक है। फिर भी घोर अंधकाररूपी इन बुराइयों का अंत होता नजर नहीं आता। लगभग हर रोज कितनी धोखाधडी, लापरवाही और लूटमारी की खबरें अंधेरे की काली तस्वीर सामने लाकर रख देती हैं। देश की राजधानी दिल्ली में स्थित बाबू जगजीवन अस्पताल में डॉक्टरों की लापरवाही और लालची प्रवृति का बदरंग और बेहद भयावह चित्र देखने में आया है। दिल्ली की जहांपुरी इलाके की निवासी सलमा गर्भवती थीं। उन्हें ५ अक्टूबर को उक्त अस्पताल में भर्ती कराया गया था। सात अक्टूबर को जब सलमा का अल्ट्रासाउंड कराया गया तो डॉक्टरों ने जच्चा और बच्चा दोनों को स्वस्थ बताया, लेकिन सलमा दर्द के मारे बेहाल थी। उसकी चीखें अस्पताल के कमरे की दीवारों को हिला रही थीं। कुछ घण्टों के बाद उसके परिजनों ने सलमा की असहनीय तकलीफ के बारे में जब डॉक्टरों को बताया तो उन्होंने कहा गर्भावस्था में ऐसी पीडा का होना आम बात है। परिजनों के भारी दबाव के बाद जब सलमा का एक और अल्ट्रासाउंड कराया गया तो बहुत ही चौंकाने वाला सच सामने आया। रिपोर्ट के मुताबिक बच्चा दो दिन पहले ही गर्भ में मर चुका था। डॉक्टरों के पास इसका कोई जवाब नहीं था। जवाब देते भी कैसे? उनके अंदर बैठे डकैत ने उनकी मानवता का हरण जो कर लिया था। इन डाकुओं की घोर लापरवाही के कारण एक ममतामयी मां का शिशु इस दुनिया में आने से पहले ही दम तोड गया। ऐसे में वही हुआ जो अक्सर होता देखा जाता है। अस्पताल में ही मारपीट और गाली-गलौच की तमाशेबाजी शुरू हो गयी। डॉक्टर खुद को दोषी मानने को तैयार ही नहीं थे। पुलिस ने अस्पताल पहुंचकर परिजनों को शांत करने में बहुत बडी भूमिका निभायी। उसके बाद सलमा को दूसरे अस्पताल ले जाया गया जहां मृतभ्रूण को बाहर निकाला गया और संक्रमण फैलने की स्थिति टल पाई।
कई लोग कभी नहीं बदलते। स्वार्थ और लालच के पहिए पर उनकी जिन्दगी सतत दौडती रहती है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें उनके जीवन में आने वाले तूफान बदल कर रख देते हैं। ऐसा भी कह सकते हैं कि वे खुद में परिवर्तन लाने या दिखाने को मजबूर हो जाते हैं। इस हकीकत ने बहुत तसल्ली दी कि अपनी बेटी आरुषि की हत्या के मामले में जेल में लगभग चार साल तक बंद रहे तलवार दंपति ने कैदियों की सेवा में खुद को पूरी तरह से समर्पित कर दिया था। जब वे जेल में आए तो उन्हें जेल अधिकारियों ने कैदियों की सेवा में जुट जाने का अनुरोध किया। दांत की बीमारी को लेकर कई कैदी परेशान थे और दंत चिकित्सा विभाग बंद हो चुका था। कैदियों को इलाज के लिए बाहर भी नहीं भेजा जा सकता था। तलवार दंपति ने कैदियों की तकलीफों को समझते हुए फौरन स्वीकृति दे दी। नुपुर तलवार महिला कैदियों के इलाज तो राजेश तलवार पुरुष कैदियों के दर्द को दूर करने में इस कदर डूब गए कि जेल अधिकारी भी उनकी सेवा-भावना का अभिनंदन करने को विवश हो गए। दोनों ने १४१८ दिन जेल में काटे। उनकी रिहाई के फैसले से दस मिनट पहले जेल क्लीनिक से संदेश आया कि एक कैदी के दांतों में बहुत दर्द है तो राजेश तलवार तुरन्त क्लीनिक पर गए और उसका इलाज किया। उन्हें जेल में रोज महज ४० रुपये दिहाडी मिलती थी। दोनों ने ४९,५००-४९,५०० रुपये यानी कुल मिलाकर निन्यानवे हजार रुपये कमाए। इस रकम को भी उन्होंने दान कर दिया। जेल से रिहा होने के बाद तलवार दंपति ने यह निश्चय किया है कि वे कैदियों के इलाज के लिए हर १५ दिन में डासना जेल जाते रहेंगे।

Thursday, October 12, 2017

बदलाव के बीज

बाल मजदूरों, भीख मांगने और नशा करने वाले बच्चों पर लोगों का कम ही ध्यान जाता है। नेता उनकी कमजोरी, विवशता और मुश्किलों को अपने भाषणों में ही ज़ाहिर कर संतुष्ट हो जाते हैं। इस दुनिया में शायद ही ऐसे माता-पिता होंगे जो अपने बच्चों को पढा-लिखाकर बडा आदमी बनाने की ख्वाहिश नहीं रखते होंगे। गरीब से गरीब मां-बाप अपने बच्चों के स्वर्णिम भविष्य का सपना देखते हैं, लेकिन जिनके पास न रहने को घर होता है और न ही दो वक्त की रोटी का जुगाड, उनकी सभी चाहतें धरी की धरी रह जाती हैं। उनके बच्चों का बचपन उन्हीं के सामने दम तोड देता है और वे कुछ नहीं कर पाते। मेरे देश में ऐसे बेबस लोगों की संख्या करोडों में है। मेरे ही देश में ऐसे कुछ धर्मात्मा हैं जो सडक पर भीख मांगते और बाल मजदूरी करते बच्चों को देखकर विचलित हो जाते हैं और उनकी आंखें भीग जाती हैं।
मैंने कल ही एक खबर पढी : पंजाब में स्थित पटियाला के थापर इंजिनियरिंग के तीन छात्र अनोखे मिशन पर हैं। वे बाल मजदूरी कर रहे या भीख मांग रहे मासूम बच्चों को मुफ्त में पढाते हैं। उन्होंने बिना किसी सरकारी सहायता के कटोरा थामने को विवश हुए हाथों में कलम थमाकर उन राजनेताओं और शासकों के मुंह पर तमाचा जडा है जो देश के भविष्य को संवारने का झांसा देकर वोट हथियाते हैं और निर्लज्जता के साथ सत्ता पर काबिज होते चले जाते हैं। यह तीनों छात्र गांव-गांव जाकर लोगों को बाल मजदूरी न कराने के लिए जागरूक करते हैं। उनकी इस मुहिम से और भी कई लोग जुडते चले जा रहे हैं। उन्होंने अपनी इस मुहिम को 'हर हाथ कलम' नाम दिया है। हरीश कोठारी जो कि 'हाथ धरे कलम' के संरक्षक हैं, ने बताया कि तीन साल पहले वह अपने दो दोस्तों के साथ यूनिवर्सिटी के बाहर चाय पीने गए थे, तब वहां दीपक नामक छोटा बच्चा चाय के जूठे बर्तन धो रहा था। हमने बच्चे से पूछा कि तुम्हे इस छोटी-सी उम्र में मजदूरी क्यों करनी पड रही है तो उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी आंखों में तैरती उदासी और गहरी चुप्पी ने हमारे मन को झकझोर कर रख दिया। हमें पता चला कि उसके माता-पिता पास के ही गांव में रहते हैं। हम गांव गये और वहां जाकर हमने उन्हें बेटे को बालमजदूरी नहीं कराने के लिए किसी तरह से राजी किया। आज वह दस वर्षीय बच्चा रोजाना दूसरे बच्चों के साथ स्कूल पढने जाता है। उसके चेहरे की चमक देखते बनती है। दीपक की तरह कई बच्चों के हाथों से भीख का कटोरा छूट गया है। 'हाथ धरे कलम' के द्वारा गरीब बच्चों को कॉपी व किताबें मुहैय्या कराई जाती हैं। गौरतलब है कि भीख मांगना छोड चुके बच्चों को पढाने के लिए स्थान की जरूरत थी इसके लिए प्रशासन ने शहर के तीन नामी स्कूलों - रेयान इंटरनेशनल, सेंट पीटर्स एवं डीएवीवी पब्लिक स्कूल में बच्चों को पढाने की मंजूरी दिला दी है। यह तीनों परोपकारी छात्र करीब सत्तर बच्चों को शाम पांच बजे से सात बजे तक खुद पढाते हैं।
अभिषेक सिंह राठौर उच्च अधिकारी हैं। पिछले वर्ष उनकी नियुक्ति नैनीताल में हुई तो वे सहज ही शहर में घूमने के लिए निकले। उन्होंने सडक पर बच्चों को भीख मांगते देखा। कुछ बच्चे नशा करते भी नजर आए। ऐसे दृश्य हर शहर में देखने को मिल जाते हैं। शासन और प्रशासन के द्वारा इसे सामान्य घटना मान नजरअंदाज कर दिया जाता है। हालांकि भिखारियों के पुनर्वान के लिए सरकारें करोडो रुपये खर्च करने का दावा करती हैं। भिखारियों की पकडा-धकडी भी होती है फिर भी उनकी संख्या बढती चली जाती है। बच्चों को भीख मांगते देख राठौर के मन में विचार आया कि इन्हें भीख देने की बजाय किसी और तरीके से सहायता की जाए। भीख मांगना और भीख देना दोनों अपराध हैं। उन्होंने बच्चों से बात करने की कोशिश की। पहले तो वे राजी नहीं हुए। फिर जब एक दिन बच्चों को पैसों का लालच दिया तो वे यह बताने को राजी हो गए कि उन्होंने भीख मांगना कब और क्यों शुरू किया। कई बच्चे ऐसे थे जिन्हें परिवार की गरीबी के चलते भीख मांगनी पडती थी। कुछ के पिता नकारा थे और वे खुद बच्चों को भीख मांगने के लिए विवश करते थे। कुछ बच्चे ऐसे भी थे जो अनाथ थे। ऐसे मां-बाप की संख्या ज्यादा थी, जिन्होने अपने बच्चों को स्कूल को पढाने-लिखाने की कभी सोची ही नहीं थी। उनका यही मानना था कि अगर बच्चे भीख नहीं मांगेगे तो उनके पूरे परिवार को रात को भूखे पेट सोना पडेगा। राठौर ने संकल्प कर लिया कि भीख मांगने वाले और नशेडी बच्चों के भविष्य को किसी न किसी तरह से संवार कर ही दम लेना है। यकीनन यह काम आसान नहीं था। लेकिन राठौर एक जिद्दी और जूनूनी अधिकारी हैं जो ठान लेते हैं उसे अंजाम तक पहुंचा कर ही दम लेते हैं। राठौर ने बच्चों के मां-बाप से मिलने का निश्चय किया। सभी के घर गंदी बस्तियों में थे जहां हर कोई जाना पसंद नहीं करता। राठौर अफसर होते हुए भी उनके मां-बाप से मिले और उन्हें समझाया कि आप लोगों ने अपनी तो जिन्दगी तबाह कर दी पर अब बच्चों के साथ तो बेइंसाफी मत करो। इन्हें पढाओ-लिखाओ। इनका भविष्य बनाओ। पहले तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया। उनका कहना था कि ऐसा नहीं हो सकता। उनका परिवार भीख से ही चलता है। वर्षों से ऐसा होता चला आ रहा है। फिर बच्चों को पढाई-लिखाई में होने वाला खर्च भी तो उठा पाना भी उनके लिए आसान नहीं है। राठौर ने उन्हें आश्वस्त किया कि वे बच्चों की पढाई और छोटी-मोटी तमाम जरूरतों को पूरा करेंगे। माता-पिता को भी रोजगार और नौकरी दिलवाने में अपनी पूरी ताकत लगा देंगे। आखिरकार कई मां-बाप राजी हो ही गए। राठौर ने बच्चों को छावनी परिषद के एक स्कूल में दाखिल करा दिया। स्कूल संचालकों को मनाने के लिए भी उन्हें काफी पापड बेलने पडे। धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। कुछ बच्चों के माता-पिता जो खून-पसीना बहाने से नहीं कतराते थे उनके लिए भी नौकरी, रोजगार की व्यवस्था भी की। राठौर को इस बात का भी दु:ख सताता रहा कि कुछ परिवार वालों ने स्कूल के बाद शाम को बच्चों से भीख मंगवाने का सिलसिला बरकरार रखा। धीरे-धीरे अधिकांश बच्चों में सुधार देखने को मिलने लगा है। राठौर सतत अपने अभियान में लगे हैं। कोई भी बच्चा भीख मांगता दिखता है तो उसे स्कूल में दाखिल करवा देते हैं। बच्चों की पढाई अनवरत चलती रहे इसके लिए आर्ट आफ लिविंग की एक संस्था 'हैपीनेस ह्यूमन कलेक्टिव' की मदद भी ली जा रही है। बच्चों की माताओं को स्कूल में भोजन बनाने का रोजगार भी उपलब्ध कराया गया है। बच्चों को नशे से मुक्ति दिलाने के लिए भी कई संस्थाओं की मदद ली जा रही हैं। वे कहते हैं कि मेरी योजना इन बच्चों को पढा-लिखाकर ऐसा आदर्श उदाहरण बनाने की है जो अपने जैसे बच्चों के लिए खुद ब्राँड एम्बेसेडर का काम करें।

Thursday, October 5, 2017

घुटने न टेकने की जिद

कुछ नारियों से मिलने, उनके बारे में पढने और जानने के बाद मन में अपार सम्मान, श्रद्धा और नतमस्तक होने के भाव जाग उठते हैं। उनका धरा-सा धैर्य, सेवा भावना, अग्नि-सा तेज और नीर-सी मिलनसारिता खुद-ब-खुद उन्हें आदर्श नायिकाओं वाली वो पदवी दिला देती है जिस पर गर्व ही गर्व होता है। अपनी हिम्मत, ज़ज्बे और हौसले की बदौलत कुछ नया करने और विपरीत से विपरीत परिस्थितियों का डटकर सामना करने वाली वैसे तो भारतवर्ष में कई महिलाएं हैं, लेकिन कुछ महिलाओं के द्वारा उठाये गये नये कदम और जीवन संघर्ष पर मेरा लिखने को मन हो रहा है। बेटे के हत्यारों को अधिकतम सजा दिलाकर दम लेने वाली नीलम कटारा के अटूट साहस और विपरीत हालातों से टकराने की लम्बी कहानी है। उन जैसी हौसले वाली महिलाएं कम ही देखने में आती हैं। उनका एक जवान बेटा था जिसका नाम था- नीतीश कटारा। नीतीश ने मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी गाजियाबाद संस्थान से स्नातक की उपाधि ली थी। २५ वर्षीय नीतीश पढाई के दौरान अपनी सहपाठी भारती यादव से प्यार करने लगा था। भारती भी उसे दिलोजान से चाहती थी। भारती के परिवार वालों को दोनों के प्रेम और मिलने-जुलने पर घोर आपत्ति थी। १७ फरवरी २००२ को भारती के भाई विकास ने नीतीश की हत्या कर दी। विकास का पिता डीपी यादव कहने और दिखाने को राजनेता है, लेकिन दरअसल वह छंटा हुआ गुंडा और बदमाश है। नेतागिरी का नकाब ओढकर उसने अपार धन-दौलत कमायी है। दौलत और रसूख के गरूर में अंधे हो चुके पिता और बेटे को एक आम परिवार से ताल्लुक रखने वाले युवक से अपनी बेटी का रिश्ता जोडना गवारा नहीं था। हत्यारों ने नीतीश के शव को बुरी तरह से जलाकर फेंक दिया था ताकि उसकी शिनाख्त न हो सके। मां नीलम ने लगभग पूरी तरह जल चुके बेटे के शव को देखते ही पहचान लिया था। वे काफी देर तक बेटे के शव को निहारती रहीं। भीड को लगा कि युवा बेटे की मां खुद को संभाल नहीं पायेगी। लेकिन इस बहादुर मां ने फौरन ही खुद को संभाला और पुलिस वालों से जब यह पूछा कि शव का डीएनए टेस्ट कहां होगा तो लोग उनकी तरफ देखने लगे। अपने लाडले बेटे को खो चुकी मां ने तभी ठान लिया था कि अब इंसाफ की लडाई लडना ही उनके जीवन का एकमात्र मकसद है। न्याय की लडाई लडने के लिए उन्हें कई तकलीफों का सामना करना पडा। बार-बार धमकियां दी गयीं। धन लेकर चुपचाप बैठ जाने का दबाव भी डाला गया, लेकिन बहादुर मां ने हार नहीं मानी। बेटे के हत्यारों की हर चाल को नाकाम करते हुए उन्हें अधिकतम सजा दिलवा कर ही दम लिया। नीलम कटारा ने निर्बलों को न्याय दिलाना अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना लिया है। अनाचारी नेताओं और नकाबपोश समाज के ठेकेदारों के खिलाफ उनकी बुलंद आवाज गूंजती रहती है।
देश में जहां-तहां बेटियों पर तेजाब फेंककर उनकी जिन्दगी तबाह करने की खबरें सतत पढने और सुनने को मिलती रहती हैं। एकतरफा प्यार करने वाले बिगडैल युवकों को एसिड अटैक कर तसल्ली का आभास होता है। देखने में आ रहा हैं कि अधिकांश एसिड अटैक करने वाले कानूनी दांवपेच की बदौलत बच जाते हैं या फिर बहुत कम सजा मिलती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंक‹डों के अनुसार तेजाब फेंकने की सबसे अधिक घटनाएं पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में हो रही हैं। २०१५ में ही देशभर में ऐसे मामलों में ३०५ लोगों को गिरफ्तार किया गया। लेकिन हकीकत यह है कि मात्र १८ मामलों में ही दोष सिद्ध हो पाया। वास्तविकता यह भी है कि सभी तेजाबी हमलों की रिपोर्ट पुलिस थानों में दर्ज नहीं होती। इसलिए तेजाब से कितनी जिन्दगियां तबाह होती हैं इसके वास्तविक आंकडे सामने नहीं आते। यह भी सच है कि तेजाबी अत्याचार, शोषण, बलात्कार, हत्या से भी अधिक पीडा देता है। यह एक तरह से जीवन की सारी खुशियां और सपने छीन लेता है। लक्ष्मी अग्रवाल जैसी चंद नारियां ऐसी भी हैं जिन्होंने तेजाब के जानलेवा वार को झेलने के बाद संघर्ष की ऐसी मिसाल पेश की है जिसका यशगान देश और दुनिया में गूंज रहा है। देश की राजधानी दिल्ली में १९९० में जन्मी लक्ष्मी अग्रवाल जब पंद्रह वर्ष की थीं तब एक तरफा प्रेम में पडे ३२ वर्षीय सनकी युवक ने तेजाब फेंक दिया। लक्ष्मी का दोष बस इतना था कि उसने शादी से इन्कार कर दिया था। सिर से पांव तक तेजाब में नहायी लक्ष्मी स‹डक पर तडप रही थी और लोग देखकर भी अनदेखा कर आगे बढते चले जा रहे थे। एक शख्स को दया आयी और उसने लक्ष्मी को अस्पताल पहुंचाया। पूरे दो महीने तक वह अस्पताल के बिस्तर पर बिलखती-तडपती, कराहती रही। डिस्चार्ज होने के बाद जब वह अपने घर पहुंची तो उसके मन में दर्पण देखने की इच्छा जागी। लेकिन घरवालों ने तो सभी दर्पण ही गायब कर दिए थे। अंतत: उसने पानी में अपनी सूरत देखी तो उसे पूरी दुनिया ही घूमती नजर आई। आत्महत्या के प्रबल विचार ने उसे जकड लिया। घर से बाहर निकलने पर आसपास के लोगों की तानाकशी ने भी लक्ष्मी को काफी आहत किया। लोग अजीब निगाह से देखते और यही जताते कि जैसे इस सबकी वह ही दोषी हो। यह तो लक्ष्मी के पिता ही थे जिन्होंने उसे लोगों की नुकीली निगाहों और तानों को नजरअंदाज कर नया जीवन जीने की सीख दी। पिता की सीख ने लक्ष्मी के मन-मस्तिष्क में नई ऊर्जा का संचार कर दिया। उसके बाद लक्ष्मी ने तेजाब फेंकने वाले बदमाश को अधिकतम सजा दिलवाने और जमाने को यह दिखाने की ठान ली कि चेहरे की सुंदरता तो दिखावटी है। इंसान को तो दिल से सुंदर होना चाहिए। लक्ष्मी अगर तब घुटने टेक देतीं तो उनका भी वही हश्र होता जो एसिड अटैक से तन-बदन जला कर अंधेरे के हवाले हो चुकी कई महिलाओं का हो चुका है। लक्ष्मी ने एसिड अटैक पीडित महिलाओं की सहायता करने की राह पकड ली। अनेक तेजाब पीडित महिलाओं के अंधेरे जीवन में उजाला भर लक्ष्मी ने अपने सभी गमों को बहुत पीछे छो‹ड दिया। उन्होंने ताज नगरी आगरा में ताजमहल से थो‹डी दूरी पर 'शीराज हैंगआउट' नामक कैफे शुरू किया जिसे एसिड अटैक पीडित महिलाएं चलाती हैं। ३०० से ज्यादा महिलाओं को प्रशिक्षित कर चुकी लक्ष्मी को २०१४ में यूएस की फस्र्ट लेडी मिशेल ओबामा के हाथों 'इन्टरनेशनल वाइल्ड ऑफ कौर्यज अवार्ड' से नवाजा जा चुका है। २०१४ में ही वह आलोक दीक्षित नाम के सामाजिक कार्यकर्ता के संपर्क में आयीं। दोनों एक-दूसरे को पसंद करने लगे और जीवनपर्यंत एक साथ रहने का फैसला कर लिया।
भयंकर गर्मी के दिन थे। एक युवती अपने दोस्तों के साथ मॉल में खरीदी और मौज-मज़ा करने के लिए गई थी। जब वह मॉल के बाहर निकली तो उसने ऐसे कुछ गरीब बच्चों को देखा जिनके पैरों में चप्पल नहीं थी। पेट की भूख की तडप उनके चेहरे से साफ-साफ झलक रही थी। उन्हें भीख मांगते देख उसके मन में कई तरह के विचार आने लगे। वह मॉल से घर लौट तो आई, लेकिन नंगे पैर, भीख मांगते बच्चों का चेहरा बार-बार उसके सामने आ जाता। उसके मन में विचारों की आंधी चलने लगी। उसने सोचा कि पांच-सात सौ रुपये तो वह यूं ही उडा देती है। इन बच्चों को पचास-सौ रुपये की चप्पल नसीब नहीं। नंगे पैर घूमने से बच्चों के पैरों में इन्फेक्शन और कई बीमारियां हो जाती हैं। इन रुपयों से दस-बारह बच्चों का खाना और पैरों में एक जोडी चप्पल तो जरूर आ सकती है। उसने सबसे पहले बच्चों के नंगे पैरों के लिए चप्पलें उपलब्ध कराने का निर्णय लिया। वह अपने दोस्तों से मिली। बच्चों की तकलीफ के बारे में उन्हें अवगत कराया। आपस में मिलकर पैसे जुटाये गए। इन पैसों से बच्चों के लिए चप्पलें खरीदी गयीं। युवती ने रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और गलियों में रहने वाले गरीब बच्चों को चप्पलें बांटनी शुरू कर दीं। उसका साथ देने वालों का कारवां बढता चला गया। आज उसकी टीम में डाक्टर, इंजिनियर और समाजसेवक शामिल हैं। जहां चप्पलें बांटनी होती हैं वहां पर उनकी टीम पहले जाकर सर्वेक्षण करती है फिर उन परिवारों को चप्पले बांटी जाती हैं जिन्हें इनकी वास्तविक जरूरत होती है। जयपुर से अपनी पढाई पूरी कर दिल्ली लौटी युवती ने यहां पर भी अपना काम जारी रखा है। सैकडों बच्चों को चप्पलें उपलब्ध करा इस सच्ची बालसेविका का अगला लक्ष्य गरीब बच्चों को एक फिटनेस किट मुहैया कराना हैं। वे चाहती हैं कि दूसरे लोग भी अपने स्तर पर अपने आसपास के गरीब बच्चों की मदद करें। ताकि कोई भी बच्चा नंगे पैर होने के कारण बीमार न पडे। बच्चों के नंगे पैरों में चप्पलें पहनाने वाली इस आदर्श युवती का नाम है डॉ. समर हुसैन। क्या आप उसका अभिनंदन नहीं करना चाहेंगे?