कभी न कभी आपने यह कहावत जरूर सुनी होगी, ‘लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सज़ा पाई। गुस्से और क्षणिक आवेग में अच्छा भला इंसान ऐसा कोई अपराध, भूल, भटकाव और अक्षम्य गलती कर जाता है, जिससे उसकी सारी ज़िन्दगी की तपस्या तार-तार हो जाती है। मुंबई के पश्चिम उपनगर दहिसर क्षेत्र के निवासी निकेश ने अपनी प्रिय 40 वर्षीय पत्नी निर्मला की इसलिए गला दबाकर नृशंस हत्या कर दी, क्योंकि उसने साबूदाने की खिचड़ी में ज्यादा नमक डालने की भूल कर दी थी। निकेश अपने मन को शांत रखने के लिए पिछले कई वर्षों से शुक्रवार का व्रत रखता चला आ रहा था। अब निकेश जेल में है। उनका बारह वर्षीय बेटा जो इस हत्या का प्रत्यक्ष गवाह है अकेले जीने को विवश है।
मुंबई के 76 वर्षीय काशीराम पाटील को निर्धारित समय पर नाश्ता नहीं मिला तो वे तिलमिला गये। उनका यह क्रोध उतरा अपने बेटे की पत्नी पर, जिसने अपने ससुर को दिन के 11 बज जाने के बाद भी नाश्ते से वंचित रखा था। नाश्ता देने में हुई देरी की वजह जानने की बजाय उम्रदराज ससुर ने अपनी कमर में खोंसी रिवॉल्वर निकाली और बहू के सीने में अंधाधुंध गोलियां उतार दीं। इन महाशय की भी बाकी बची उम्र जेल में ही गुजर रही है। देहसुख के लिए साथी और बिस्तर बदलने वाली इंद्राणी मुखर्जी साढ़े छह वर्ष तक जेल में कैद रहने के बाद जब जमानत पर बाहर आई तो एक बार फिर से लोगों को उसकी खूनी कहानी की याद हो आई। भोग विलास को ही सब कुछ मानती रही इंद्राणी अपनी जेल यात्रा पर किताब लिखने की सोच रही है। पता नहीं उसे किसने कह दिया है कि अपनी ही बेटी की हत्यारी के लिखे शब्दों को लोग पढ़ने को आतुर हैं। इंद्राणी की बेटी शीना की 2012 में हत्या हुई थी। हाई प्रोफाइल जीवन जीने वाली इंद्राणी शीना को अपनी बहन बताती थी। वह नहीं चाहती थी कि कोई उसे इतनी बड़ी बेटी की मां समझे। उसने अपनी ही पुत्री को इसलिए मौत के घाट उतार दिया, क्योंकि वह अपने ही सौतेले भाई से प्यार करने लगी थी। शीना हत्याकांड के अथाह सनसनीखेज खुलासों ने देश और दुनिया को चौंका दिया था। न्यूज चैनल वाले उसके काले इतिहास को महीनों दिखाते और दोहराते रहे थे। बेटी की ये हत्यारी जानी-मानी मीडिया की हस्ती होने के साथ देश में प्राइवेट टीवी चैनलों को कामयाबी का स्वाद चखाने वाले प्रतिष्ठित चेहरे पीटर मुखर्जी की फैशनेबल पत्नी भी थी। वर्षों तक जेल की काली कोठरी में बंद रही इंद्राणी अपने जिस्म के जलवे दिखाने को लेकर अतीत में कितनी सतर्क रही होगी उसका पता इससे चलता है कि जब वह कैदी थी तो उसके बाल पूरी तरह से सफेद हो चुके थे, लेकिन जब वह बाहर निकली तो उसने अपने बाल रंग रखे थे। उसकी यह रंगत यह भी कह रही थी कि उसे अपनी बेटी की हत्या करने का कोई दुख नहीं है। वह तो बस अब फिर से रंगरेलियां मनाने को आतुर है। रईसों का अपने गुनाहों पर प्रायश्चित करने का यह भी एक तरीका है।
नवजोत सिंह सिद्धू ने 27 दिसंबर 1988 में पटियाला में कार पार्किंग को लेकर उम्रदराज गुरनाम सिंह को इतनी जोर का मुक्का मारा, जिससे उसके प्राण पखेरू उड़ गये थे। क्रिकेटर से नेता बने सिद्धू का यकीनन हत्या करने का इरादा नहीं रहा होगा, लेकिन क्रोध में आकर की गई भूल अभी तक उसका पीछा कर रही है। पंजाब के विधानसभा चुनाव में उसे बुरी तरह से हार का मुंह देखना पड़ा। उसके बड़बोलेपन ने उसे वो धूल चटायी, जिसकी शर्मिंदगी उसके चेहरे पर चस्पा हो गई। सिद्धू जब बोलते हैं तो लोग सुनते हैं। मज़ाक उड़ाने वाले भी कम नहीं। अपने आप को हमेशा दमखम वाला दर्शाता यह नेता पहले भी अदालती सज़ा के झटके झेल चुका है, लेकिन इस बार की एक साल की सश्रम कारावास ने उस पर चिंता और गम की ऐसी चादर ओढ़ा दी है, जिसे आसानी से उतार पाना संभव नहीं। वर्षों पहले की गई उन्मादी भूल आज भी सन्नाटे भरी रातों में उसकी नींद उड़ाती होगी। मन में कहीं न कहीं यह विचार भी आता ही होगा कि काश! तब खुद को क्रोध के चंगुल से बचा लिया होता तो ये काले दिन और डरावनी रातें न देखनी पड़तीं।
कुछ दिन पहले अखबार में खबर पड़ी कि मुंबई में एक दुल्हे ने इसलिए शादी ही तोड़ दी, क्योंकि वधु पक्ष ने जो निमंत्रण पत्रिका छपवायी उसमें उसकी डिग्री नहीं छापी गई थी। अपने भावी पति की जिद्दी कारस्तानी ने वधु को इतनी जबरदस्त ठेस पहुंचायी कि उसने खुदकुशी करने की ठान ली। उसे किसी तरह से घरवालों ने मनाया, समझाया-बुझाया, लेकिन शादी टूटने की शर्मिंदगी से वह अभी तक नहीं उबर पाई है। दुल्हे मियां फरार हैं। पुलिस दिन-रात उसे दबोचने की कसरत में लगी है। यह अहंकारी और क्रोधी इंसान जहां भी होगा, चैन से तो नहीं होगा। अपनी क्षणिक गलती पर माथा भी पीट रहा होगा।
अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सोशल मीडिया यकीनन एक बेहतर और सशक्त माध्यम है, लेकिन कुछ लोग एक-दूसरे को नीचा दिखाते हुए अरे-तुरे में लगे हैं। यहां-वहां के आवेश में आकर आपत्तिजनक टिप्पणियां कर खुद के लिए मुसीबत खड़े कर रहे हैं। अभी हाल ही में मराठी फिल्म अभिनेत्री केतकी चितले को देश के प्रतिष्ठित राजनेता शरद पवार के खिलाफ बेहूदी टिप्पणी करने के आरोप में हिरासत में लिया गया। केतकी संविधान निर्माता डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के अनुयायियों पर भी घटिया शब्दों की बौछार कर चुकी है। अपने विचारों पर नियंत्रण न रख पाने वाले ऐसे ढेरों लोग हैं, जो कड़ी सज़ा के हकदार हैं। सतही प्रचार और मनोरंजन के लिए दूसरों को अपमानित करने और पीड़ा पहुंचाने का यह खेल सोशल मीडिया के सुलभ हो जाने के बाद कुछ ऐसा बढ़ा है, जो भले लोगों के लिए चिंता, परेशानी का सबब बन गया है। समाज में जानबूझकर द्वेष व क्रोध का वातावरण बनाने वालों की वजह से एक अच्छे-खासे आपसी समन्वय कायम करने वाले माध्यम को कटुता और वैमनस्य का मंच बनाने की तो जैसे चालें ही चली जा रही हैं। उन्माद और गुस्से पर काबू पाने के लिए जानकार डॉक्टर कई उपाय सुझाते हैं, जिनका अनुसरण कर अपनी ज़िन्दगी को तबाह होने से बचाया जा सकता है। क्रोध के कारण शरीर को भी नुकसान होता है। ब्लडप्रेशर से लेकर हृदयरोग तक होना संभव हैं। किसी ने आपका फोन नहीं उठाया, कोई बेअदबी पर उतर आया या किसी ने आपका आदेश नहीं माना तो अपना पारा नहीं बढ़ाना कई संकटों से बचाता है।
Thursday, May 26, 2022
लम्हों की खताएं, दिलाएं लंबी सज़ाएं
Thursday, May 19, 2022
...और आदमी मर जाता है
आसिफ और साक्षी के घरवालों को भी खबर लग गई थी कि कुछ हिंदूवादी संगठन उनके पवित्र रिश्ते के खिलाफ हैं। दोनों गांव के एक ही स्कूल में पढ़ते थे। वर्षों पहले उनमें प्यार हो गया था। जब साक्षी के घरवालों ने उसकी शादी की बात कहीं और चलायी तो उसने साफ-साफ कह दिया कि वह आसिफ के सिवा किसी और से ब्याह करने की सोच भी नहीं सकती। मां और भाई ने फिर पुराना राग अलापा। हम हिंदू हैं, आसिफ, मुसलमान। क्यों हिंदू-मुस्लिम दंगे करवाने पर तुली हो? जिद्दी साक्षी नहीं मानी तो उसके घरवालों ने उसके बाहर निकलने पर कड़ी बंदिशें लगा दीं। पढ़ना भी बंद करवा दिया गया। साक्षी ने आसिफ तक अपना संदेश भी भिजवाने में देरी नहीं की, कि यदि हम दोनों एक नहीं हो पाए तो मैं अपनी जान ही दे दूंगी। मेरे लिए तुम्हारे बिना जीना मुमकिन नहीं। साक्षी को मनाने के लिए उसके घरवालों ने इलाके के तांत्रिक से झाड़-फूंक करवायी, लेकिन यह इलाज भी प्यार के तीव्र बुखार पर बेअसर रहा। अंतत: दोनों ने भागकर अपने गांव से लगभग पांच सौ किलोमीटर दूर मंदिर में जाकर सात फेरे ले लिए।
उन्होंने शादी तो कर ली, लेकिन हमले का खतरा नहीं टला। भागमभाग के बीच किसी दिन साक्षी ने वीडियो जारी कर बताया कि मैं अपनी मर्जी से आसिफ के साथ परिणय सूत्र में बंधी हूं। हम दोनों सच्चे प्रेमी हैं, इसलिए हमें अपने अंदाज में जीने दिया जाए, लेकिन साक्षी के परिजनों ने आसिफ पर बेटी को बरगला कर भगा ले जाने की थाने में रिपोर्ट दर्ज करवायी और पुलिस तो बस अब दोनों के पीछे ही पड़ गई। कई मोहब्बत के दुश्मन भी पुलिस पर गिरफ्तारी का दबाव बनाने लगे। आपसी खिंचाव और तनाव बढ़ता देख प्रशासन ने आसिफ के परिवार की दुकान और घर को बुलडोजर चलाकर जमींदोज कर दिया। कारण बताया कि अवैध निर्माण था, इसलिए धराशायी करने की वीरता दिखायी। इस खबर को पढ़ने-सुनने के बाद मेरे मन में बार-बार विचार आया कि यदि ये दोनों प्रेमी सच्चे प्यार के अटूट सूत्र में नहीं बंधे होते तो यह अवैध निर्माण ध्वस्त ही नहीं होता। यानी असली गुनहगार तो गैर धर्म में पनपा जुड़ाव है। ऐसे और भी न जाने कितने अनाधिकृत कच्चे-पक्के घर होंगे, जो सीना ताने खड़े हैं, लेकिन जिनकी तरफ कभी किसी कि निगाह नहीं जाती। जाएगी भी नहीं। रसूखदारों के असंख्य अवैध निर्माण भी अनदेखे कर दिये गये हैं। उन्हें कसूरवार नहीं माना जाता। गरीबों और असहायो पर ही किसी न किसी वजह से गाज गिरती रहती है। उन्हीं की इज्जत का बार-बार चीरहरण किया जाता है। उन्हें खुलेआम पीटा जाता है। प्यार करने के जुर्म में जिंदा तक जला दिया जाता है।
प्रेम करने के अपराधी आसिफ के घर और धंधे का मटियामेट करने वाला प्रशासन इस सच को क्यों नजरअंदाज कर गया कि वर्षों की खून-पसीने की कमायी पर बने घर-दुकान पर उनके पूरे परिवार का हक था। यह संपत्ति अकेले तथाकथित अपराधी आसिफ की तो नहीं थी। ऐसी ही कई दुकानों और घरों को नेस्तनाबूत करने का जो निर्दयी सिलसिला बुलडोजर से चलाया जा रहा है उस पर चिंतन-मनन की जरूरत है। अंधे बुलडोजरों से जिनके घरों, घरौंदो को उजाड़ा जा रहा है, बेरोजगार कर उनके सपनों को मिट्टी में मिलाया जा रहा है, सभी वही वोटर हैं, जिन्होंने किसी न किसी पार्टी को अपना वोट दिया होगा। अवैध निर्माण खड़ा करने के लिए नेताओं और सरकारी नौकरों ने भी शह दी होगी, लेकिन आज उनकी फरियाद को सुनने वाला कोई भी नहीं। अवैध कब्जे को हटाने से पहले कम अज़ कम नोटिस... चेतावनी तो दे देते। तब भी धोखा, अब भी धोखा। पहले बनाने की छूट दी। अब तोड़ने में नादिरशाही। एक ही झटके में बेघर और बेरोजगारी की ज़हरीली सौगात!
इंसानियत, दया, धर्म की दहाड लगाने वाले भी कहीं दुबक गये हैं। देश के समक्ष एक से एक विकराल समस्याएं सीना ताने खड़ी हैं, लेकिन सत्ताधीश और प्रशासन उन्हें दूर करने अक्षम और बौना साबित हो रहा है। आस्था के नाम पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने की आंधी चल रही है। लाउडस्पीकर, हनुमान चालीसा के साथ-साथ मंदिर, मस्जिद, मजारों के मुद्दों के शोर में असली जरूरतों के लिए कराहते देशवासियों की खबर लेने वाला कोई नजर नहीं आ रहा। जहां-तहां ताजमहल और ज्ञानवापी छाये हैं। कुतुबमीनार के अंदर के रहस्यों को उजागर करने की होड़ है। हाड़-मांस के आदमी के अंदर कैसी आंधी चल रही है उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं। इंसानों की कम, मंदिर, मस्जिद, भगवानों की चिंता का जबरदस्त सैलाब उमड़ रहा है। सैकड़ों वर्ष पूर्व की गयी किन्हीं मुस्लिम शासकों की तथाकथित मनमानी का दंड वर्तमान को झेलना पड़ रहा है। मुसलमानों को लग रहा है धार्मिक स्थानों को निशाना बनाकर उन्हें ऐसे कसूर की सज़ा दी जा रही है, जो उन्होंने किया ही नहीं। देश की बिगड़ती आर्थिक हालत पर कोई बात नहीं हो रही। रुपया रेत की तरह फिसल रहा है। पेट्रोल ने सौ का आंकड़ा पार कर लिया है। डीजल भी दिल तोड़ चुका है। घरेलू ईंधन हजार तक तो दालें आसमान पर हैं। खाने का तेल भी महंगा हो चुका है। बेरोजगारी भूख और अपराध पैदा कर रही है। न्यूज चैनल वालों ने आम आदमी की चिंता करनी छोड़ दी है। उसके लिए भी धर्म पहले और इंसान बाद का विषय है। देश में आतंकी फिर सिर उठाने की फिराक में हैं। देशवासियों को खौफ और अलगाव के साये में जीना पड़ रहा है।
हाल ही में कश्मीर में आतंकियों ने कश्मीरी पंडित राहुल भट्ट की हत्या कर अपने इरादे स्पष्ट कर दिये हैं। सरकारी स्तर पर सुरक्षा की कमी के चलते कश्मीरी पंडितों को फिर से 1990 की याद आने लगी है। देश की सीमा पर डटे जवान भी तनाव में जीने को विवश हैं। इस सच को महज खबर मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि विगत तीन वर्षों में लगभग 350 जवानों ने तनाव और असंतोष की वजह से खुदकुशी कर ली और 47 हजार से अधिक जवानों ने नौकरी से ही इस्तीफा दे दिया है। हताशा और निराशा की यह पराकाष्टा ही है कि सैनिक अपने ही साथियों को गोलियों से छलनी करने से नहीं सकुचा रहे हैं। अब ऐसे में प्रश्न यह है कि हम और आप आखिर कब जागेंगे और सीना तान कर अन्याय और मनमानी के खिलाफ बोलेंगे? देश के जागरूक कवि उदय प्रकाश ने अपनी कविता भी यही चिंता व्यक्त की है...,
‘‘आदमी
मरने के बाद
कुछ नहीं सोचता
आदमी मरने के बाद
कुछ नहीं बोलता
कुछ नहीं सोचने
और कुछ नहीं बोलने पर
आदमी
मर जाता है...।’’
Thursday, May 12, 2022
जिनका कोई एतबार नहीं
कोई महंगाई का रोना नहीं। रोजगार के लिए भी शोर नहीं। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग भी भूले। बस याद है तो भेदभाव, हिंसा और मनमुटाव। महिलाओं पर हो रहे बेलगाम अत्याचारों को भी अनदेखा किया जा रहा है। वर्षों से चली आ रही सात्विक परंपराओं की खुलेआम हत्याएं हो रही हैं। इस बार तो हिंदू-मुस्लिम समुदाय के पवित्र त्योहारों में भी खलल डालने वालों ने अपना आतंकी चेहरा दिखाया। तलवारें चमकीं व पत्थर बरसे और चिंताग्रस्त कर देने वाला खौफ देखने में आया। शासन और प्रशासन को कई जगहों पर बुलडोजर चलाना पड़ा। खाकी वर्दी वाले भी कहीं असहाय तो कहीं मूकदर्शक बने रहे। अन्याय, अत्याचार और अपराधों के खिलाफ गूंजने वाली आवाजें धीमी पड़ चुकी हैं। अगल-बगल में बहू-बेटी की अस्मत लुटती है तो लुटती रहे, लेकिन सभी को अपना घर बचाने की पड़ी है। इस सच को तो बिसरा ही दिया गया है कि कल हम पर भी गाज गिर सकती है। मानवता के शत्रु बहुत सोच-समझकर आपसी फूट डालने के षडयंत्रों के बीज बो रहे हैं, जिन्हें विषैले पेड़ बनने में देरी नहीं लगेगी। देश के सबसे सुरक्षित और मजहबी एकता के प्रतीक, अमन पसंद शहर नागपुर के रेलवे स्टेशन पर विस्फोटो का मिलना और पंजाब के खुफिया मुख्यालय में धमाके का होना बहुत कुछ कह रहा है कि देश के शत्रु, आतंकी सिर उठाने को आतुर हैं।
नेताओं को तो बस सत्ता की पड़ी है। सत्ताधीश भी मदहोश हैं। अधिकांश न्यूज चैनलों पर समाचारों की जगह अनर्गल बहसबाजी सिरदर्द बढ़ा रही है। अब तो कई जागरूक नागरिक न्यूज चैनल के करीब भी नहीं जाना चाहते। लगभग सभी चैनल वाले ऊटपटांग एकपक्षीय तर्कों का पिटारा खोलने वालों को अपने कार्यक्रमों में ला बिठाते हैं और ऊल-जलूल तमाशा दिखाते हैं। अखबारों के प्रति भी लोगों का पहले जैसा भरोसा और रुझान नहीं रहा। विज्ञापनों के लिए लोकतंत्र के सशक्त प्रहरी को निर्वस्त्र बाज़ार बना दिया गया है। पैसा फेंको, तमाशा देखो। विभिन्न धर्मों के सच्चे प्रेमियों की हत्याएं की जा रही हैं। दुकानें और घर फूंके जा रहे हैं। तथाकथित सेक्युलरों ने चुप्पी ओढ़ ली है। अपने जीवनकाल में मैंने ऐसे बुरे मंज़र पहले कभी नहीं देखे।
अपने इस भारत देश में मुसलमानों और हिंदुओं के बीच वैमनस्य फैलाने वालों की जमात के साथ-साथ कई ऐसे और भी नफरती लोग पनप रहे हैं, जिन्हें सिख, सिंधी, पंजाबी, मारवाड़ी, जैन, ब्राह्मण, बनिया, सिख, ईसाई और बौद्धों में भी खतरे, कमियां और बुराइयां दिखती हैं। वे इन्हें भी आपस में लड़ाना और खून-खराबा करवाना चाहते हैं। खाली दिमाग के शैतानों के तो अब बस यही मंसूबे हैं कि सभी भारतीय एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते रहें। सतत खून की नदियां बहती रहें। आपसी सद्भाव और एकता की सोच फांसी के फंदे पर चढ़ती रहे।
ऐसा कतई नहीं है कि हम और आप बाहर और अंदर के गद्दारों से अंजान हैं। यह कितनी हैरत की बात है कि अब कुछ लोगों को मस्जिद, मंदिर, चर्च, गुरुद्वारों एवं अन्य पूजास्थलों में होने वाली मधुर प्रेरक आराधनाएं और प्रार्थनाएं अप्रिय लगने लगी हैं। जिस तरह से मस्जिदों में अजान के लिए लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल के विरोध में मंदिरों में हनुमान चालीसा का पाठ किया जा रहा है उस पर अपनी-अपनी राय है, लेकिन यह लेखक मानता है कि यह मसला उतना बड़ा नहीं, जितना बना दिया गया है। हां, ध्वनि प्रदूषण फैलाना कतई उचित नहीं। एक-दूसरे की इच्छा और भावनाओं की अनदेखी अक्षम्य है। देश के आपसी सद्भाव और पवित्र भाईचारे के हत्यारों को तो मैं सर्वनाशी मानता हूं, जो खुद के भी मित्र नहीं हैं। अभी भी वक्त है... सोचिए... यदि इनकी साजिशें कामयाब हो जाती हैं तो भारत देश का कौन-सा चेहरा विश्व के सामने होगा? इस धरती के तमाम समाज सुधारकों, विचारकों ने अमन शांति का पैगाम फैलाने में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया और ये हैं कि उनके दिखाये और सुझाये मार्ग पर बम-बारूद बिछा रहे हैं। अभी भी वक्त है, संभल जाएं। कोई भी मजहब धर्मांध बनाने के मार्ग पर जाने की सीख नहीं देता। इक्कीसवीं सदी में भी हिंदू-मुसलमान युवक-युवती आपस में प्यार नहीं कर सकते! उनके एक होने पर इतना गुस्सा कि उन्हें दिया जा रहा है मौत का उपहार! इस नये दौर में ऐसी गुंडागर्दी! प्यार और शादी सिर्फ अपने ही धर्म के साथी के साथ करो। नहीं तो मरने को तैयार रहो। यह समय बहुत सोचने का है। यदि ज़रा भी चूक हो गई तो इतिहास हमें मुर्दा मानते हुए हमीं पर थू-थू करेगा। हमने देश के बंटवारे के अथाह दर्द को झेला है। भारत माता ने अपने सपूतों की लाशें गिरती देखी हैं। भारत माता अब और हिंसा, पीड़ा और खून-खराबा बर्दाश्त नहीं कर सकती। इस सच को भी जान लें कि जब तक हिंदू-मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी एकजुट होकर नहीं रहेंगे तब तक बरबादी के खूनी मंजर सामने आते रहेंगे और भारत माता कराहती रहेगी। सच्चा सुख-चैन देशवासियों के हिस्से में भी नहीं आ पायेगा। जब तक यह मंज़र रहेगा तब तक इंसानियत महज आत्माहीन शब्द बना रहेगा। हिंदुस्तान के और टुकड़े करने के सपने देख रही जो सांप्रदायिक एवं दंगाई साजिशें ज़हर घोलने पर आमादा हैं उनका कतई भरोसा नहीं। कोई एतबार नहीं। यदि भारत की सभी कौमें ठान लें कि भाईचारे के अटूट बंधन के धागों को कमजोर नहीं होने देना है तो कोई भी माई के लाल भारत धरा पर बम-बारूद बिछाने की जुर्रत नहीं कर सकता...।
Thursday, April 28, 2022
जिद की चमक
75 साल के होने जा रहे हैं रमन। तपती धूप में बेंगलुरुकी सड़कों पर ऑटो रिक्शा चलाते आप उन्हें देख सकते हैं। पिछले 14 वर्षों में कोई भी ऐसा दिन नहीं आया जब रमन ऑटो रिक्शा चलाते नहीं देखे गये हों। ऑटो रिक्शा पर दिन भर सवारियां ढोने वाले रमन ने एमए और एम.एड की डिग्री हासिल कर रखी है। सवारियों से जब वे सधी हुई अंग्रेजी में बतियाते हैं तो उन्हें भी बेहद हैरत होती है। रमन बचपन में ही बड़े सपने देखने लगे थे। इसी चाहत की उड़ान ने पढ़ाई के बाद मायानगरी मुंबई पहुंचा दिया। तब के जमाने में इतने पढ़े-लिखे लोग कहां थे फिर भी उनका लग्गा नहीं लग पाया। मुंबई के पवई में एक निजी इंस्टिट्यूट में लेक्चरर तो बन गये, लेकिन तनख्वाह मात्र बारह-पंद्रह हजार ही थी। अपने देश में सरकारी नौकरी और प्रायवेट नौकरी में बहुत फर्क होता आया है। सरकारी शिक्षण संस्थानों में अदना-सा शिक्षक लाखों की पगार पाता है और रिटायर होने के बाद अच्छी-खासी पेंशन का भी हकदार होता है, लेकिन निजी शिक्षण संस्थाओं में अपार शोषण का व्याभिचार होता है। उसी बेइंसाफी के वर्षों तक शिकार होते रहे रमन ने कभी कोई शिकायत नहीं की। मस्तमौला बने रहे। नौकरी बजाते रहे। वर्षों तक नौकरी करने के बाद पेंशन नहीं मिली। अपने सपनों के शहर में जवानी बिताने के बाद 62 वर्ष की उम्र में अपने शहर बंगलुरु वापस आये और ऑटो रिक्शा चलाने लगे। रमन खुद को बूढ़ा नहीं मानते। उनकी चुस्ती-दुरुस्ती ही बता देती है कि इस शख्स पर उम्र बढ़ने का कोई खास असर नहीं पड़ा। अभी तो ढेरों ख्वाहिशों को पूरा करने की उनकी तमन्ना है। रमन सिर्फ आज की सोचते हैं। कल की चिंता उन्होंने कभी भी नहीं की। जिंदादिली के साथ जीने का ही उनका एकमात्र मकसद है। नकारात्मक सोच को तो कभी अपने आसपास आने ही नहीं देते। ऑटो रिक्शा चलाकर प्रतिदिन रमन पांच-सात सौ रुपये कमा कर खुश हैं। किसी से कोई गिला नहीं है। उनके बच्चे अलग रहकर अपनी दुनिया में मस्त हैं। तकलीफों में भी खुशियों की तलाश करते रमन अपनी पत्नी को अपनी सबसे अच्छी दोस्त मानते हैं। कलमकार से बातचीत करते हुए उन्होंने बताया कि वे अपनी पत्नी को गर्लफ्रेंड कहकर बुलाते हैं और दोनों अपने संसार में बेहद खुश और संतुष्ट हैं। श्रीमती को वाइफ कहने से उन्हें गुलाम वाली फीलिंग आती है। एक पत्नी ही तो होती है, जो पति के बहुत करीब होती है। उसके सम्मान में कभी कोई कमी करने की भूल नहीं करनी चाहिए। खुशमिजाज रमन ने अपने ऑटोरिक्शा में स्वामी शिवानंद की तस्वीर लगा रखी है। स्वामी शिवानंद वही महान हस्ती हैं, जिन्हें कुछ दिनों पूर्व देश के राष्ट्रपति के हस्ते पद्मश्री अलंकरण अर्पित किया गया था। 126 वर्षीय स्वामी ने युवकों जैसी फुर्ती के साथ चलते हुए जब सम्मान हासिल किया तो सभी दंग रह गये थे। उनका प्रधानमंत्री के समक्ष दण्डवत होना हमेशा याद रखा जाएगा। प्रतिदिन योग और प्राणायम करने वाले शिवानंद को जो भी देखता है, नतमस्तक हो जाता है। हर मौसम में सिर्फ एक धोती में रहने वाले उम्रदराज पद्मश्री स्वामी की तड़के तीन बजे से दिनचर्या शुरू हो जाती है। वे कभी भी बीमार नहीं पड़े। अपने सभी काम खुद करते हैं। बाल ब्रह्मचारी शिवानंद किशोर अवस्था से ही योग करते चले आ रहे हैं। स्कूल का उन्होंने मुंह नहीं देखा, लेकिन हिंदी, अंग्रेजी और बांग्ला अच्छी तरह से बोल लेते हैं। रमन के रिश्तेदार और जानने वाले ऑटो रिक्शा चलाने के कारण उनका मजाक उड़ाते हैं, लेकिन वे उसकी कतई परवाह नहीं करते। ऊपर वाले ने हर इंसान को जीने का एक मौका दिया है। उस मौके को गंवाने से बड़ी चूक और भूल कोई हो ही नहीं सकती। यह सच किताबों में ही नहीं, हमारे सामने भी है। यह जीते-जागते किरदार यदि हमें प्रेरित नहीं कर पाते तो हमारा जीना ही बेकार है।
कई लोग घुट-घुट कर ऐसे जीते हैं, जैसे किसी जुर्म की सजा काट रहे हों। नारियों पर तो हजारों बंधन सर्वाविदित हैं, लेकिन हमारी इसी दुनिया में महानंदा जैसी बेटियां भी हैं, जो अपने मां-बाप को बेटे की कमी का अहसास ही नहीं होने देतीं। भारत देश के प्रदेश महाराष्ट्र का यवतमाल जिला किसानों की आत्महत्या के लिए बदनाम है। खुदकुशी कायरता की निशानी मानी जाती है। अपनी जान देने को विवश होने वालों की मजबूरियों की कम ही बात की जाती है, लेकिन यह भी सच है कि यदि उन्हें कोई सशक्त साथी और सहारा मिल जाए तो उनकी जान बच भी सकती है। गांव की माटी में जन्मी महानंदा ने जब देखा और जाना कि उसके इलाके में सिंचाई सुविधाओं के अभाव और कर्ज के चलते माटीपुत्रों को आत्महत्या करने की राह चुननी पड़ रही है तो उसने अपने परिवार का मजबूत सहारा बनने की ठान ली। यहां यह बताना भी जरूरी है कि अपने 75 वर्षीय वृद्ध पिता और 70 वर्षीय मां की यह देहातन बेटी ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है। दरअसल, मां-बाप की आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर होने के कारण वह पढ़-लिख नहीं पायी। शादी भी हुई तो नकारा और शराबी पति मिला, जिससे निभने का सवाल ही नहीं था। सो अपने मायके वापस लौट आयी और खुद को बेटे की भूमिका में ढालते हुए खेती-बाड़ी में व्यस्त कर लिया। परिवार की बारह एकड़ की जमीन से कोई कमायी नहीं थी। उल्टे कर्ज का बोझ मां-बाप की नींद हराम किये रहता था। पिता ने तो खुदकुशी करने का भी मन बना लिया था। महानंदा ने खुद को खेती-बाड़ी में ऐसे रमा दिया, जैसे वह इसी के लिए पैदा हुई हो। गांव के पुरुष महानंदा को तपती गर्मी और कंपाकंपा देने वाली ठंड में जमीन जोतते देख हैरान रह जाते थे। खेत में बुआई, सिंचाई, कीटनाशक छिड़काव, वन्य प्राणियों से खेती की रक्षा के लिए रात-रात भर जागने का दायित्व इस जुनूनी युवती ने इस कर्मठता के साथ निभाया कि प्रतिवर्ष सात से आठ लाख रुपये की कमायी होने लगी। यह तो शुरू-शुरू के शुद्ध मुनाफे का आकड़ा है अब तो इसमें निरंतर बढ़ोतरी हो रही है। महानंदा से कृषि के नवीनतम गुर सीखने के लिए आसपास के ही नहीं, दूर-दूर तक के किसान आते हैं। महानंदा के नवीनतम कृषि साधनों तथा कर्मठता से प्रेरित होकर हजारों किसानों के जीवन में खुशहाली आ रही है। कभी जो लोग उसका यह कहकर मजाक उड़ाते थे कि जिस खेती को करने में हट्टे-कट्टे पुरुषों के छक्के छूट जाते हैं, दिन-रात पसीना बहाने के बाद भी अक्सर निराशा ही हाथ लगती है वहां एक दुबली-पतली लड़की कौन से झंडे गाड़ पायेगी? कुछ दिन की तमाशेबाजी के बाद चुपचाप घर में बैठ जाएगी। आज वे सभी तंजबाज महानंदा की जुनूनी हिम्मत के किस्से सुनाते नहीं थकते।
वैसे मजाक तो शीशपाल और निशा लांबा का भी लोग खूब उड़ाया करते थे। निशा और शीश पति-पत्नी हैं। देश के विख्यात पैरा एथलिट। अब तक 23 गरिमामय पदकों से नवाजे जा चुके हैं। शीशपाल तीन फीट दो इंच तो निशा तीन फीट 1 इंच के हैं। इतने छोटे कद के कारण गांव के लोग उन्हें छोटू और ठिग्गू कहकर चिढ़ाते थे। बच्चे तो उनके पीछे पड़ जाते थे। कद से बौने दोनों पति-पत्नी ने बहुत ऊंचा कर दिखाने की सोची, जिसे करने में बड़े-बड़ों के पसीने छूट जाते हैं और अंदर और बाहर की सारी हिम्मत जवाब दे जाती है। शीश और निशा ने सफल एथलिट बनने के लिए जब गांव में दौड़ लगानी प्रारंभ की तो इंसानों के साथ-साथ कुत्ते भी उनके पीछे पड़ गये। बीती 28 से 30 मार्च, 2022 को भुवनेश्वर में आयोजित पैरा एथलिटिक्स प्रतियोगिता में इस दंपत्ति ने आन, बान और शान के साथ भाग लिया। निशा ने डिस्कस थ्रो में एक गोल्ड व एक कांस्य पदक अपने नाम कर राजस्थान का नाम रोशन किया। 2022 में ही जयपुर में 11वीं पैरालिपिंक स्पर्धा में शॉटपुट व डिस्कस थ्रो में गोल्ड मेडल जीत चुकीं निशा 2018 में नेशनल प्रतियोगिता में डिस्कस थ्रो व शॉट पुल में ब्रांज मैडल जीत चुकी हैं। 2017 में उदयपुर में 8वीं स्टेट पैराओलिंपिक में शीशपाल ने शॉट पुट डिस्कस थ्रो व जैवलिन थ्रो में स्वर्ण पदक हासिल कर अपना लोहा मनवाया। वहीं निशा ने 100 एवं 200 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक प्राप्त कर उन लोगों की बोलती बंद कर दी, जो दोनों को उपेक्षित भाव से देखते थे और जीभर कर तिरस्कार करते थे।
Thursday, April 21, 2022
राजनीति का बुलडोजर
कुछ हफ्तों पहले तक बुलडोजर का नाम सुनते ही भगवाधारी आदित्यनाथ योगी का चेहरा आंखों के सामने घूमने लगता था। अपने पहले कार्यकाल में भगवाधारी ने कई गुंडे, बदमाशों, बेलगाम माफियाओं, काले कारोबारियों की छाती तान कर खड़ी ऊंची-ऊंची इमारतों और व्यवसायिक प्रतिष्ठानों पर जो अंधाधुंध बुलडोजर चलाया था वो आमजन को बहुत पसंद आया था। योगी ने यूपी में दूसरी बार सत्ता भी बुलडोजर का नाम जप-जप कर पायी है। उनके विरोधी जनता के मन में योगी और बुलडोजर के अंधे आतंक का खौफ पैदा कर वोट पाना चाहते थे, लेकिन उसमें वे नाकामयाब रहे। यूपी के वोटरों को बुलडोजर और योगी की जोड़ी में अपनी भलाई नज़र आयी, इसलिए उन्होंने फिर से पूरे ताम-झाम के साथ उनकी सरकार बनवायी। विधानसभा चुनाव के दौरान बुलडोजर के नाम पर सीना तान कर वोट मांगने वाले आदित्यनाथ ‘बुलडोजर बाबा’ की पदवी पाकर गद्गद् हैं। तभी तो दोबारा मुख्यमंत्री बनते ही पहले से ज्यादा तेजी के साथ बुलडोजर चलाते हुए उन्होंने अपने भावी इरादे स्पष्ट कर दिये हैं। आम और खास दोनों के अवैध अतिक्रमण धड़ाधड़ ढहाये जा रहे हैं। विवाद और आरोप तब भी लगे थे, अब भी लग रहे हैं। इस कलमकार के मन-मस्तिष्क के दरवाजे पर एक सवाल बार-बार ठक-ठक कर रहा है कि यह सभी अतिक्रमण, अवैध निर्माण रातोंरात तो खड़े नहीं किये गए होंगे?
‘बुलडोजर बाबा’ की देखादेखी देश के एक और प्रदेश मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी बुलडोजर से एकाएक भीषण यारी कर ली है और उनकी फुर्ती ने उन्हें ‘बुलडोजर मामा’ की पदवी दिलवा दी है। जब मुख्यमंत्री जोश में हो तो मंत्रियों और संत्रियों की भुजाएं खुद-ब-खुद फड़कने लगती हैं। किसी को भी धराशायी करने के लिए उन्हें बस इशारे का इंतजार रहता है। इसी बहाने अपने शत्रुओं को भी सबक सिखा दिया जाता है। व्यक्तिगत दुश्मनियां भुना ली जाती हैं। इस बार की रामनवमी की शोभायात्रा में देश के कई शहरों में हिंसा और आगजनी हुई। मध्यप्रदेश के शहर खरगोन में रामनवमी की चहकती खुशी पर चिंता और भय की चादर डाल दी गयी। उपद्रवियों ने ठान लिया कि प्रसन्नता, उत्साह और आपसी मेल-मिलाप की निर्मम हत्या करके ही दम लेना है। कई घर और दुकानों को आग के हवाले कर दिया गया। घरों के बाहर खड़े वाहन फूंक दिये गए। तलवारें, पत्थर, लाठी-डंडे और तरह-तरह के उत्तेजक नारे लहराये गये। नंगी हिंसा ने शहर के अमन-चैन की हत्या कर दी। अंतत: कर्फ्यू लगाना पड़ा और इस बीच गृहमंत्री ने चेतावनी के लहजे में यह कहने में देरी नहीं लगायी कि जिन घरों से पत्थर बरसाये गए, उन्हें पत्थरों में तब्दील करने में देरी नहीं लगायी जाएगी। उनका खुला इशारा कोई भी समझ सकता है। किसी एक धर्म के लोगों के त्योहार पर दूसरे धर्म के चंद लोगों का हमलावर होना यकीनन गलत है, लेकिन जिस तरह से खरगोन में कुछ विशेष धर्म के लोगों की दुकानों और घरों पर बुलडोजर चलाया गया वो इस कलमकार को न्याय से ओतप्रोत नहीं लगा। गरीबों को तो मजबूरी में अवैध झोपड़े तानने पड़ते हैं। इसके लिए भी उन्हें अपने इलाके के नेता, अफसर और गुंडों को तरह-तरह की रिश्वत देनी पड़ती है। धनबलियों और बाहुबलियों के सामने तो सत्ता और व्यवस्था हमेशा नतमस्तक रहती है। उनके पास रहने के एक नहीं कई ठिकाने होते हैं। उनके अवैध निर्माणों को धराशायी करने की मर्दानगी देश देखना चाहता है। यह सिलसिला कुछ प्रदेशों में नहीं, बल्कि पूरे देश में बना रहना चाहिए। इस शुभ कर्म के लिए किसी राजनीतिक रंजिश और दंगों की राह भी नहीं देखी जानी चाहिए।
गरीबों के पास तो एक ही छत होती है, जिसमें बड़े भी रहते हैं और बच्चे भी। उनके कच्चे-पक्के घरों और रोजगार के ठिकानों को इतनी तेजी से नेस्तनाबूत करने के यही मायने हैं कि बुलडोजर चलाने तथा चलवाने वाले विवेक शून्य हैं। कानून नाम की कोई व्यवस्था है इस देश में? अवैध निर्माण के दौरान तब अंधे बने रहने वालों को ज़रा यह भी तो विचारना चाहिए कि भरी गर्मी में बेघर कर दिये गये गरीब भारतीय जाएंगे कहां, रहेंगे कहां? उन्हें वक्त तो दिया ही जाना चाहिए। उनकी बात को भी सुना और समझा ही जाना चाहिए। वे बताएंगे इस देश के नेता और शासन-प्रशासन किस कदर बिकाऊ हैं। इसी बिकाऊ व्यवस्था की जेबें भरकर ही उन्होंने अवैध निर्माण का अपराध किया है, इसलिए अकेले वही दोषी और अपराधी नहीं। पहले उन्हें सज़ा दो, जिन्होंने खुद को बाजार बनाया। इस सारे सच की तह में जाने पर बुलडोजर की जल्दबाजी और उसे चलाने और चलवाने वालों के गुनाह की किताब के पन्ने एक-एक कर खुलते चले जाएंगे। रामनवमी के दिन गुजरात, झारखंड, गोवा, पश्चिमी बंगाल में भी हिंसा हुई, लेकिन खरगोन में हुई पत्थरबाजी और तोड़फोड़ की घटनाओं को जिस कदर सुर्खियां मिलीं उनसे यह शंका भी बलवती हुई कि राजनीति भी अपना स्वार्थ साधने के खेल में पीछे नहीं है। इस कलम को यह कहने और मानने में संकोच नहीं कि बुलडोजर की माया का बखान कर जिस तरह फिर से योगी यूपी में अपना झंडा फहराने में कामयाब हुए हैं उसी इरादे और चाहत के साथ बुलडोजर मामा भी आगे बढ़ रहे हैं। गुजरात में भी बुलडोजर का ‘खेल’ दिखने लगा है। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते चले जाएंगे उनके बुलडोजर की रफ्तार भी तेज होती चली जाएगी। कुछ लोगों को भी ऐसे विध्वंस देखने में मज़ा आता है और इस खेल के खिलाड़ियों के वोटों की फसल भी पकती चली जाती है। भविष्य में यह फसल कितनी विषैली साबित होगी, इसकी चिंता शासक और राजनेता न कल करते थे न आज करने को तैयार हैं। वो लोग भी सुधरने की मंशा नहीं रखते, जिनकी बस एक ही इच्छा है भारत दंगों की आग से जलता रहे। हर तरफ खून-खराबा होता रहे। रामनवमी के तुरंत बाद हनुमान जयंती की शोभायात्रा में भी तनाव पूर्ण वातावरण बनाया गया। वो भी उस दिल्ली में जो कि देश की राजधानी है। राजधानी के जहांगीरपुरी में शोभायात्रा के दौरान दो समुदायों के बीच हुई हिंसक झड़पों में आठ पुलिस वालों को भी घायल कर दिया गया। देश में धार्मिक आयोजनों और शोभायात्राओं की बड़ी पुरातन परंपरा है, लेकिन इन दिनों एकाएक इनमें विघ्न डालने के षड़यंत्र हो रहे हैं। हिंदू-मुसलमान के बीच दीवारें खड़ी करने के ताने-बाने बुने जा रहे हैं। देश को दीमक की तरह खोखला कर रहे भ्रष्टाचारी बड़े मजे में हैं। कानून के रखवालों की उनकी तरफ नज़र ही नहीं है। देश की जागृत जनता शासकों और प्रशासकों से चीख-चीख कर कह रही है कि जितनी तूफानी रफ्तार से अतिक्रमण ढहाये जाने का जोश है, उसी उत्साह से देश को खोखला करती बेइमानी, रिश्वतखोरी और दिन-ब-दिन ऊंचे होते भ्रष्टाचार के पहाड़ पर भी तो बुलडोजर चलाओ। हां, जुलूसों और शोभायात्राओं में लाठी, डंडे, तमंचे, पेट्रोल बम और बदनीयत का ज़हर लेकर चलने वालों पर भी जी-जान से पाबंदी लगाओ। सच्चे भक्तिभाव से निकाले जाने वाले जुलूसों पर पत्थर बरसाने वालों को बिना किसी राजनीति और भेदभाव के ऐसा सबक सिखाओ कि उनकी आनेवाली पीढ़ियां भी ऐसी भूल करने की जुर्रत न कर पाएं। देश के विख्यात साहित्यकार सागर खादीवाला की कविता की इन पंक्तियों को भी पढ़ो और समझो जिन्हें उन्होंने बहुत सोच-समझ और देखभाल कर लिखा है,
‘‘अभी तो...राजनीति का मदमस्त स्टेरिंग
जिधर मोड़ता है बुलडोजर उधर ही
मुड़ता है, उधर ही तोड़ता है।
जिस दिन बुलडोजर का रुख।
भ्रष्टाचार के महलों की तरफ।
मोड़ने वाला पैदा हो जाएगा,
उस दिन क्रांतिकारियों के लहू का
एक और कर्ज़ अदा हो जाएगा।’’
Thursday, April 14, 2022
दुष्टनीति-राजनीति
अपने देश के बुद्धिजीवी भी कम करतब नहीं दिखाते। कुछ तो नीचता पर ही उतर आते हैं। अपने यहां एक नामी शायर हैं, मुनव्वर राणा। उन जैसे कुछ और भी हैं, जो अपनी वर्षों की कमायी इज्जत की ऐसी-तैसी करने पर तुले हैं। कल तक जो मुनव्वर गजलों-गीतों के बादशाह कहलाते थे, आज फकीर बनकर रह गये हैं। उन्हें राजनीतिक दलों का मुंह ताकना पड़ रहा है, जिनके सीने में भी योगी और मोदी के सत्तासीन होने पर ईर्ष्या की आग धधक रही है। फिर भी राणा का कटोरा खाली का खाली है। उलटे फटकार और गालियां मिल रही हैं। उनकी रचित गज़लों की किताब ‘मां’ ने लाखों पाठक बनाये और अब बदजुबानी ने शत्रुओं की कतार खड़ी कर ली है। बात-बात पर राजनीति के गली-कूचों के चक्कर काट कर जिस-तिस को कोसने वाला गज़लकार भूल गया कि खुदा ने उसे कलम बख्शी है, जिससे वह अपनी बात देश-दुनिया तक पहुंचा सकते हैं, लेकिन अब उसे अपनी कलम पर ही भरोसा नहीं। उसे देश के लोकतंत्र पर भी भरोसा कम है। शायर जिन्हें चाहता है, वे ही सत्ता पाएं तो ठीक... बाकी सब गलत। स्वार्थ और नफरत में डूब चुके मुनव्वर ने अपनी पुरानी खुजली के चलते बैठे-बैठाये कह दिया था कि, यदि उत्तरप्रदेश में योगी फिर से सत्ता पर काबिज होंगे तो मैं यूपी ही छोड़कर चला जाऊंगा। इनकी लाख दुआओं और प्रार्थनाओं के बावजूद योगी की नैया तो नहीं डूबी, लेकिन इनकी बची-खुच्ची इज्जत की ऐसी-तैसी जरूर हो गयी। यूपी के चुनाव परिणाम आने के पश्चात लोगों ने उनसे पूछना प्रारंभ कर दिया कि शायर महाराज आप अपना वायदा कब पूरा करने जा रहे हैं? अगर आपके पास नोट-पानी न हों तो हम टिकट का इंतजाम करा देते हैं। नफरत के शोले उगलने वाले उपद्रवी कलमकार की तो बोलती ही बंद हो गयी है। दरअसल किसी के दिमाग खपाने और सोचने से कुछ नहीं होता। लोकतंत्र में वही होता है, जो जनता चाहती है।
पटक दो। ठोक दो। नंगा कर दो। दबोच लो। इज्जत लूट लो। होश ठिकाने लगा दो। बदतमीजी करते चले जाओ। क्या आपको नहीं लगता कि ऐसी सोच रखने वाले आजकल खूब उछल-कूद रहे हैं! नंगे भी हो रहे हैं। जो बलशाली हैं, कानून का पालन करने और करवाने की जिनकी जिम्मेदारी हैं वही कानून की तौहीन कर रहे हैं। लोकतंत्र का मज़ाक उड़ा और उड़वा रहे हैं। ऐसा भी नहीं कि उन्हें पता नहीं कि उनकी कारस्तानियां देश का सिर झुकाने का गुनाह कर रही हैं। उत्तरप्रदेश के शहर बरेली में कामरान नाम के मुस्लिम युवक को उसी के मोहल्ले के लोगों ने अंधाधुंध धुन कर लहुलूहान कर दिया। भारतीय जनता पार्टी के प्रशंसक कामरान ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को राम तो यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी को कृष्ण कहते हुए तारीफों के जो पुल बांधे वे कुछ कट्टरपंथियों को शूल की तरह चुभ गये और उन्होंने उसे घेर कर डंडे और लाठियों से मारा-पीटा, जिससे उसे अस्पताल पहुंचाने की नौबत आ गयी। कामरान से पहले उत्तरप्रदेश के कटघरही गांव के बाबर को तो उसी के पड़ोसियों तथा रिश्तेदारों ने योगी की जीत पर मिठाई बांटने के अपराध में परलोक पहुंचा दिया था। 10 मार्च, 2022 को यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजे आए थे, तब खुशी से फूले नहीं समाये बाबर ने गांव भर में मिठाई बंटवाई थी। तभी से कट्टरपंथी हिंसक सोच वाले लोगों का मुंह फूल गया था और उन्होंने उसके जीवन पर फुलस्टाप लगाने की ठान ली थी। बाबर की बर्बरता से पिटायी करने वालों में मुस्लिम महिलाएं भी शामिल थीं। बाबर ने खुद को बचाने की बहुतेरी कोशिश की। वह तो अपने घर की छत पर यह सोचकर जा चढ़ा था कि शातिर जुल्मी वहां तक पहुंचने का साहस नहीं करेंगे, लेकिन योगी और मोदी को अपना घोर शत्रु मानने वालों ने बिना कोई लिहाज किये उसे छत से नीचे ऐसे फेंका, जैसे वह कोई इंसान नहीं, बेकार का सामान हो। अस्पताल में लाख कोशिशों के बाद भी बाबर को बचाया नहीं जा सका। ईश्वर ने भी ईर्ष्यालू और नफरती शैतानों की मंशा पूरी कर दी! इन हत्यारों और शायर मुनव्वर राणा के बीच जो समानता है वह बारूद के ढेर जमा करने में लगी है। देख और सुनकर हैरत होती है कि नफरत, हिंसा और बदले की आग है कि बुझने का नाम ही नहीं ले रही है। सच लिखना, कहना और करना जैसे अक्षम्य अपराध होता चला जा रहा है। इन दिनों तो इस धधकती ज्वाला ने पद-पदवी की गरिमा और मान-मर्यादा को जला कर राख करने की अंधी कोशिशें शुरू कर दी हैं। पत्रकारों का काम तो आईना दिखाना और दबे-छिपे सच को सामने लाना है। उनका यही दायित्व उन्हें रास नहीं आता, जिनका काम ही भाई-भाई को आपस में लड़ाना और समाज में वैमनस्य का गंद फैलाना है। अराजक तत्वों, भष्टाचारियों, रिश्वतखोरों को सजग पत्रकारों से बड़ी चिढ़ है। भ्रष्ट नेताओं का बस चले तो एक-एक कर खात्मा कर दें। ईमानदार पत्रकार, संपादकों के पिटने और मौत के हवाले कर दिये जाने के समाचार अब आम हो गये हैं। इस हिंसक दुष्कृत्य में नेताओं, हत्यारों, गुंडे, बदमाशों का जब पुलिस साथ देने लगे तो मानिये न मानिये हर सजग भारतीय का खून खौल जाता है। यह सच अलग है कि वह खुद को असहाय पाता है, बिलकुल वैसे ही जैसे मध्यप्रदेश के सीधी में शांति भंग करने की आशंका के चलते यू-ट्यूबर और न्यूजनेशन के पत्रकार कनिष्क तिवारी और दस आरटीआई कार्यकर्ता और रंगकर्मियों को पुलिस ने जबरन जेल में डाल दिया। इतना ही नहीं उनके कपड़े भी उतरवा दिये। उनकी अर्धनग्न तस्वीरें भी धड़ाधड़ सोशल मीडिया में वायरल कर दीं। विधायक की दादागिरी के खिलाफ खड़े होने की सजा पाने वाले कनिष्क तिवारी की अखबार में छपी अर्धनग्न तस्वीर पर जब उनकी दस वर्षीय बेटी की नज़र पड़ी तो उसने पिता को अश्रुभरी निगाहों से देखते हुए पूछा, ‘पापा आपने ऐसा क्या कर डाला कि आपको वस्त्रहीन होना पड़ा?’ एक पिता... एक पत्रकार क्या जवाब देता! फिर भी उसने अपनी बिटिया को सबकुछ बता तो दिया, लेकिन बेटी शर्मिंदगी की उस काली स्याही में डूबी-डूबी रही, जो पड़ोसियों, रिश्तेदारों और सहेलियों ने सवाल पूछ-पूछ कर उसके मुंह पर पोती थी। जब पत्रकार और उनके साथियों की नग्न तस्वीरें सोशल मीडिया पर छायीं थीं तभी एक और वायरल फोटो ने सभी का ध्यान अपनी तरफ खींचा। इस वायरल फोटो में एक पुलिस कॉन्सटेबल, जिसका नाम नेत्रेश शर्मा है, वह एक बच्ची को जलते हुए घर से निकाल कर भागा चला जा रहा है। शर्मा की इस बहादुरी की सभी ने भरपूर तारीफ की। शर्मा ने कहा कि उन्होंने तो अपना फर्ज निभाया है। पुलिस मैन का यही तो काम है...। काश! भ्रष्ट और बिकाऊ खाकी वर्दी वाले नेत्रेश शर्मा से कुछ तो सीख ले पाते...।
Thursday, April 7, 2022
दहशत
यह हमारे युग की सच्चाइयां हैं, जो दिन-ब-दिन और भयावह होती चली जा रही हैं। इंसान जन्म लेता है, पूरी उम्र, पूरी जिन्दगी जीने के लिए, लेकिन यह जो हो रहा है वह मुझे दिन-रात हैरान और परेशान किये है। पता नहीं कितनी और ऐसी मौतें देखनी हैं, जो नहीं होनी चाहिए थीं, लेकिन हो रही हैं। बार-बार हो रही हैं। इन भयावह, चिंताजनक मौतों को आत्महत्या का नाम दे दिया गया है। आत्महत्या... यानी अपनी हत्या अपने ही हाथों! आत्महत्याओं का यह सिलसिला पता नहीं कब से चला आ रहा है और यह सवाल भी सतत बना हुआ है कि क्यों... आखिर क्यों? बीते हफ्ते महाराष्ट्र के जिंदा दिल शहर नागपुर में बारहवी कक्षा के एक छात्र ने अपने घर में खिड़की से रस्सी बांधकर फांसी लगा ली। आत्महत्या करने से पहले उसने बाकायदा एक पत्र लिखा, ‘अब मेरी जीने की इच्छा नहीं रही। इसलिए मौत का दामन थाम रहा हूं।’ आदित्य नाम के इस लड़के की खुदकुशी ने उसके माता-पिता को जो सदमा दिया है, उससे वे जीते जी तो उबर ही नहीं पायेंगे। अपने बेटे का चेहरा उनकी आंखों के सामने ताउम्र घूमता रहेगा। आदित्य के मन में दसवीं के बाद भी फांसी के फंदे पर झूलने का विचार आया था, लेकिन तब उसने खुद को संभाल लिया था, लेकिन तभी से उसके मन-मस्तिष्क में अपनी जान लेने के विचार आते रहते थे। अपनों को उम्रभर का गम देकर इस दुनिया से चल बसे आदित्य ने अपने सुसाइट नोट में सभी से माफी मांगी है। घरवालों को संदेह है कि कम अंक मिलने के कारण उसने एकाएक मौत को गले लगाया है।
राजस्थान में दौसा जिले के लालपोट की रहने वाली डॉक्टर अर्चना शर्मा की आत्महत्या करने की वजह दिल दुखाने और उन दुष्टों पर गुस्सा दिलाने वाली है, जिनकी वजह से उन्हें यह आत्मघाती कदम उठाने को विवश होना पड़ा। डॉक्टर तो दूसरों की जान बचाने के लिए होते हैं। अर्चना शर्मा ने भी अपने निजी अस्पताल में आशा बैरवा की जान बचाने के लिए अपनी पूरी जान लगा दी थी, लेकिन प्रसव के बाद हुई ब्लीडींग से उनकी मौत हो गई। देश और दुनिया के बड़े से बड़े अस्पतालों में इलाज के दौरान यदाकदा ऐसी मौतें होती रहती हैं, लेकिन डॉक्टरों को हत्यारा करार नहीं दे दिया जाता। उनको धमकाया-चमकाया नहीं जाता। जिस औरत की इलाज के दौरान मौत हुई उसके परिजनों ने इसे ईश्वर की मर्जी माना और अस्पताल द्वारा प्रदत्त एंबुलेंस से शव को घर ले आए थे। अंत्येष्टि की तैयारी की जा रही थी कि भाजपा के दो नेता वहां आ पहुंचे। वे अस्पताल से मुआवजा दिलाने की बात कहते हुए शव को फिर से अस्पताल ले आये। उनके साथ अच्छी-खासी भीड़ भी थी। उन लोगों ने शव को अस्पताल के बाहर रखकर नारे लगाने प्रारंभ कर दिये, ‘डॉक्टर को गिरफ्तार करो। हत्या का मामला दर्ज करो। अस्पताल पर हमेशा-हमेशा के लिए ताले लगवा दो।’ तीव्र नारे बाजी के साथ-साथ डॉक्टर अर्चना शर्मा और उनके पति को गंदी-गंदी गालियां भी दी जाती रहीं। पुलिस वाले मूकदर्शक बन गुंडेनुमा नेताओं का सुनियोजित खेल देखते रहे। ब्लैकमेलरों की दादागिरी चलती रही। कोई कुछ नहीं बोला। हैरानी की बात तो यह रही कि जिस महिला मरीज की मौत हुई उसके पति ने किसी भी तरह की रिपोर्ट पुलिस थाने में दर्ज नहीं करवायी। वह तो अदना-सा श्रमिक है, जो लिखना तक नहीं जानता। भीड़ के शातिर, चालाक और लुटेरे चेहरों ने जबरन कागज पर हस्ताक्षर करवा लिए। अंतत: धूर्त नेता और उनके कपटी चेले-चपाटे पुलिस पर दबाव बनाने में सफल रहे, जिससे पुलिस ने भी सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन की अनदेखी कर गायकोलॉजिस्ट डॉ. अर्चना शर्मा के खिलाफ धारा 302 (हत्या) के तहत मुकदमा दर्ज करने में अभूतपूर्व फुर्ती दिखायी। बिक चुकी खाकी वर्दी, लुंजपुंज कानून व्यवस्था तथा बद और बदमाश नेताओं ने एक होनहार डॉक्टर को इस कदर भयभीत कर दिया कि वह डिप्रेशन में चली गई। उन्होंने कभी भी ऐसे अपमान और तमाशे की कल्पना नहीं की थी। उनके मन में बस यही विचार आते रहे कि अब तो उनकी डॉक्टरी पर कलंक लग गया है। वर्षों की मेहनत पर पानी फेर दिया गया है। उनके कारण पति और बच्चों को भी अपराधी समझा जा रहा है। वह खुद तो हत्यारी घोषित की ही जा चुकी हैं, ऐसे में जीना किस काम का! बुरी तरह आहत डॉक्टर अर्चना शर्मा ने मौत का दामन थामने से पहले एक पत्र लिखा, ‘मैं अपने पति और बच्चों से बहुत प्यार करती हूं। प्लीज मेरे मरने के बाद इन्हें परेशान नहीं करना। मैंने कोई गलती नहीं की, किसी को नहीं मारा। मैंने इलाज में कोई कमी नहीं की। डॉक्टर को इतना प्रताड़ित करना बंद करो। मेरा मरना शायद मेरी बेगुनाही साबित कर दे। डोंट हैरेस इनोसेंट डॉक्टर्स प्लीज।’ यह कितनी शर्मनाक और कायराना हकीकत है कि जब नेता, गुंडे, ब्लैकमेलर डॉक्टर अर्चना शर्मा के अस्पताल को घेरे खड़े थे, तब किसी ने उनकी खबर नहीं ली। कोई साथ नहीं खड़ा हुआ। किसी की जुबान नहीं खुली, लेकिन जब वह चल बसीं तो सभी हमदर्द बन गये। सड़कों पर उतरकर शैतानों के खिलाफ नारेबाजी करने लगे!
डॉक्टर अर्चना की खुदकुशी के चंद रोज बाद ही नागपुर की आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा आर्या ने फांसी लगा ली। मात्र 13 साल की इस बच्ची की जब नोटबुक खंगाली गई तो उसमें जगह-जगह ‘आई लव यू डेथ’, मुझे मौत से प्यार है, मुझे मरना अच्छा लगता है, जैसी नकारात्मक सोच वाली बातें लिखी मिलीं। स्कूल से लौटने के बाद लड़की ने यह आत्मघाती राह चुनी। सुसाइड नोट में ‘आई लव यू डेथ’ लिखकर दुनिया को सदा-सदा के लिए छोड़कर चल दी लड़की के मां-बाप और भाई उसकी आत्महत्या की वजह से अनजान और हतप्रभ हैं! लेकिन, हतप्रभ कर देने वाली बात यह भी है कि लड़की लगातार अपनी नोट बुक्स में ‘आई लव यू डेथ’ लिखकर इशारा करती रही और मां-बाप अनजान रहे! उसे समझाया-बुझाया नहीं!! इसी तरह से आदित्य पहले भी खुदकुशी की राह पर जाने के संकेत दे चुका था, लेकिन किसी ने भी उसका मानसिक उपचार नही कराया।
जब जिन्दगी अच्छी नहीं चल रही होती तो इंसान का विचलित और परेशान हो जाना स्वाभाविक है। यह भी सच है कि आदमी मौत से ही नहीं बात से भी मरता है, लेकिन वह यह क्यों भूल जाता है कि लोगों का तो काम ही है मीन-मेख निकालना। अच्छाइयों को नजरअंदाज कर कमियों और बुराइयों के ढोल पीटना। मरना तो एक न एक दिन हर किसी को है, लेकिन किन्हीं भी हालातों में तथा किसी भी उम्र में की गयी खुदकुशी उन्हें अथाह पीड़ा और बदनामी की सौगात दे देती हैं, जिन्हें उम्र भर के लिए रोने-बिलखने के लिए छोड़ दिया जाता है।
