Thursday, October 20, 2022

कब मिटेंगे यह अंधेरे?

    इन खबरों को पढ़-सुनकर किसे गुस्सा नहीं आता होगा। मन भी दहल जाता होगा। मस्तिष्क में यह सवाल भी तीर चलाता होगा कि क्या यह वही दुनिया है, जहां हम रह रहे हैं? गुजरात के जुनागढ़ में एक पिता को अपनी बेटी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। इस अंधविश्वासी शैतान ने पुत्र प्राप्ति की लालसा में नवरात्र अष्टमी की रात बेटी की बलि चढ़ा दी। बिटिया मात्र 14 बरस की थी। उसे अपने पिता पर बहुत भरोसा था। वह तो उसे अपना भाग्य विधाता और भगवान मानती थी, लेकिन इसी भगवान को इस बात का मलाल था कि उसके यहां बेटा पैदा क्यों नहीं हुआ? यह बेटी किस काम की। यह तो पराया धन है। एक न एक दिन दूसरे के यहां विदा हो जाएगी। बेटे ही पिता की विरासत के वारिस होते हैं। उन्हीं से वंश चलता है। पहचान होती है।
जब इंसान के अंदर का मतलबी शैतान जाग जाता है, तो उसके लिए खून के रिश्ते अपनी अहमियत खोने लगते हैं। गांव के स्कूल में नौवीं कक्षा में पढ़ रही यह बिटिया जब बाप को खटकने लगी तो उसे उसमें कई दोष नज़र आने लगे। उसे यह सच याद नहीं रहा कि बेटियों को तो कलेजे से लगा कर रखा जाता है, लेकिन उसके दिल का घेरा तो बहुत संकीर्ण था। उस पर किसी तांत्रिक ने उसके कान भर दिये कि बेटी में तो ‘बुरी शक्ति का साया है’ जो उसे भी तबाह करके छोड़ेगा। कहीं का नहीं रहने देगा। हाथ में कटोरा पकड़वाकर ही दम लेगा। बस फिर क्या था। जन्मदाता राक्षस बन गया। दिन-रात बेटी को मारने-पीटने लगा। सात दिन तक उसे न खाना दिया गया और ना ही पीने को पानी। भूख-प्यास से अधमरी हो चुकी बच्ची की बलि चढ़ाने के बाद हैवान बाप फिर से उसके जिंदा होने के लिए चार दिन तक तांत्रिक क्रियाएं करता रहा। मर चुकी बच्ची आखिर कैसे जीवित होती? पांचवें दिन बेटी का अंतिम संस्कार कर दानव को लगा कि अब वह चैन की नींद सोयेगा, लेकिन पाप का घड़ा तो फूट कर ही रहता है। जब लोगों को पता चला तो उनका गुस्सा फूट पड़ा। उनका बस चलता तो वे उसका खात्मा ही कर देते, लेकिन पुलिस के रोकने और समझाने पर हत्यारे बाप की हत्या होते-होते रह गयी।
    केरल के पथनाम थिट्टा जिले के एलंधूर गांव में रहने वाले एक अधेड़ पति-पत्नी पर फिर से जवान होने का ऐसा भूत सवार हुआ कि वे उन तांत्रिकों की शरण में जा पहुंचे, जिनका दावा था कि वे बूढ़ों को जवान बना सकते हैं। गरीब को अमीर बनाना भी उन्हें बखूब आता है। इस उपलब्धि को पाने के लिए तांत्रिक ने उन्हें दो महिलाओं की बलि देकर भगवान को खुश करने की बात कही तो यौन सुख के भूखे पति-पत्नी सहर्ष तैयार ही नहीं हुए, बल्कि तांत्रिक के मार्गदर्शन में दो महिलाओं को अपने मायावी जाल में फंसाकर उनको मौत के घाट भी उतार दिया। इस हैवानियत को ‘बलि’ का नाम दिया गया। दोनों निर्दोष महिलाओं की नृशंस हत्या करने के बाद उन्होंने उनके शरीर से निकले रक्त को दिवारों पर छिड़का। एक महिला के शव के 56 टुकड़े किए और उन्हें पका कर खाया। दोनों दरिंदों ने महिलाओं के स्तन भी काटकर रख लिए।
    अपने महान भारत देश में न जाने कितनी कुरीतियां और पुरातन परंपराएं हैं। विचार धाराएं जो औरतों के शोषण और अपमान की शर्मनाक दास्तान का निर्लज्ज दस्तावेज हैं। इज्जत और धर्म के नाम पर नारियों को प्रताड़ित करने और उनका देह शोषण की वर्षों पुरानी देवदासी प्रथा को इस आधुनिक काल में भी बड़ी बेशर्मी से खाद-पानी दिया जा रहा है। देवदासी यानी देवों की कथित दासियां, गुलाम... जिनका पग-पग पर देह शोषण किया जाता है, बचपन और जवानी छीनकर बुढ़ापे में दर-दर भीख मांगने और दिवारों से सिर पटकने के लिए असहाय छोड़ दिया जाता है। नारी जाति का घोर अपमान करने वाले इस नीच कर्म में मां-बाप भी सहभागी होते हैं। रमाबाई जब मात्र दस साल की थी, तभी उसके माता-पिता उसे देवदासी बनाने के लिए मंदिर ले गए और उसे पुरोहित को भेंट स्वरूप सौंप दिया, जैसे वह कोई खरीदी और बेची जाने वाली कोई वस्तु हो। उम्रदराज पुरोहित उसे देवता से मिलवाने के नाम पर वर्षों तक उसकी देह से खेलता रहा। इस दौरान वह दो बेटियों और एक बेटे की मां बनी और देखते ही देखते उसकी उम्र भी ढल गई।
    होना तो यह चाहिए था कि नारी की पूजा करने वाले देश में यह जालिम प्रथा जन्म ही नहीं लेती। किन्हीं दुष्टों ने नारियों की भावनाओं को रोंदने, उनके जिस्म को भोगने के लिए हजारों साल पहले इसके बीज बोए और कालांतर में यह बीज पेड़ बन गये। उन्हें काटा ही नहीं गया! मंदिरों में नारी के देह शोषण की कल्पना करने से ही चिंता, दहशत और घबराहट होने लगती है, लेकिन आखिर यह सच तो है ही। नारी के देह शोषण की यह परंपरा आज भी जिन्दा है। उत्तर भारत में भी कहीं-कहीं यह अंगद के पांव की तरह टिकी हुई है। सरकारों ने इस कुप्रथा बनाम नर्कप्रथा पर बंदिश लगाने की बहुतेरी कोशिशें कीं, लेकिन धर्म की आड़ में चलने वाले इस अंधी वासना के कुचक्र पर धर्म के सौदागरों ने विराम नहीं लगने दिया। 1982 में कर्नाटक सरकार और 1988 में आंध्रप्रदेश सरकार नारियों के साथ खिलवाड़ करने वाली इस देवदासी प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर चुकी है। फिर भी एक अनुमान के अनुसार कर्नाटक में देवदासियों की संख्या सत्तर हजार, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में अस्सी हजार के पार है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि देवदासियों को ओडिसा में महारी यानी ‘महान नारी’ कहा जाता है। जो अपनी देह को काबू में रखना जानती हैं। महाराष्ट्र एवं अन्य प्रदेशों में उनके लिए अलग-अलग संबोधन हैं।
    विभिन्न उत्सवों और महोत्सवों के विशालतम देश में अंधविश्वास, नारी शोषण, व्याभिचार, बलात्कार, नृशंस हत्याएं और कट्टरवाद को देखकर मन मस्तिष्क में कई-कई प्रश्न खड़े होते हैं। क्या हमारे यहां त्योहार मात्र दिखावा और तमाशाबाजी हैं। दशहरा, दीपावली जैसे उत्सव मात्र मन बहलाने का जरिया हैं? इन त्योहारों पर सदियों से अपने घर-आंगन की सफाई करते और दीप जलाकर अंधेरे को भगाते देशवासी कुरीतियों, अपराधों के घने अंधेरे से अभी तक मुक्त क्यों नहीं हो पाए? उत्सवों की सार्थकता तो उनके अर्थ और मर्म को समझते हुए उनका अनुसरण करने में है। सदियों दर सदियां बीत गईं। हम इक्कसवीं सदी में भी पहुंच गये, लेकिन उन अंधेरों को पूरी तरह से दूर करने का साहस नहीं जुटा पाए, जो देश के माथे पर कलंक समान विद्यमान हैं।

Thursday, October 13, 2022

राहुल गांधी की यात्रा

    मेरा राजनेताओं पर लिखने का बहुत कम मन होता है। जब किसी नेता की दक्षता, कार्यप्रणाली, जिद्द, जुनून और आम जनता से जुड़ने की ललक बहुत अधिक प्रभावित करती है तो यह कलम खुद-ब-खुद चल भी जाती है। देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी और सोनिया गांधी के पुत्र राहुल गांधी वर्षों से राजनीति में झंडे गाड़ने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं, लेकिन दाल नहीं गल रही। भारतीय राजनीति के लिए उन्हें नाकाबिल मानने वालों की अच्छी-खासी तादाद है। वे उनकी बहन प्रियंका गांधी को उनसे बेहतर मानते हैं। उन्हें प्रियंका गांधी में उनकी दादी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का चेहरा नज़र आता है, जिन्होंने कई वर्षों तक भारत की सत्ता संभालते हुए अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी। गांधी परिवार ने देश की जो सतत सेवा की है और अपना सबकुछ कुर्बान करते हुए राष्ट्रप्रेम के पवित्र जज़्बे को बरकरार रखा है, उसे देशवासी कभी भी नहीं भूल सकते। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस पार्टी को मजबूत बनाये रखने में भी गांधी परिवार का अभूतपूर्व योगदान रहा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि गांधी परिवार ही कांग्रेस के शरीर की रीढ़ की हड्डी है, लेकिन आज यह हड्डी कमजोरी की गिरफ्त में है। पार्टी लगातार पतन की ओर जा रही है। कभी देश के हर प्रदेश में इसका शासन हुआ करता था, लेकिन आज उसकी जो हालत है वह किसी से छिपी नहीं है।
    कांग्रेस की दशा को सुधारने के लिए गांधी परिवार ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। फिलहाल हम बात राहुल गांधी की करना चाहते हैं, जो कांग्रेस को फिर से पटरी पर लाने के लिए कमर कसे हुए हैं। नेताओं की खिल्ली उड़ाना, मीम बनाना, व्यंग्य बाण चलाना और चुटकलेबाजी करना कोई नई बात नहीं है, लेकिन यह भी सच है कि, पिछले कई वर्षों से राहुल गांधी को उपहास का पात्र बना कर रख दिया गया है। उनकी पप्पू की जो छवि बनायी गई है, उससे हर कोई वाकिफ है। आलू से सोना बनाने, बाइस रुपये लीटर में आटा लाने जैसे पचासों जोक हैं, जो सोशल मीडिया में भरे पड़े हैं। मनोरंजन प्रेमी इन्हें सुन-सुन कर मनोरंजित होते हैं। अपना दिल बहलाते हैं और उनकी खिल्ली उड़ाते हैं। जिनकी गंभीरता से देखने-सोचने की आदत है उन्हें बड़ी चिंता और पीड़ा होती है। राहुल उन्हें इतने अज्ञानी तो नहीं लगते, जितने प्रचारित होते चले आ रहे है। सबसे ज्यादा तकलीफ, पीड़ा और शर्मिंदगी तो उन कांग्रेसियों को होती है, जिनकी दाल-रोटी ही पार्टी के दम पर चलती है। कुछ को छोड़ दें तो अधिकांश कांग्रेसी ऐसे है, जिनकी अपनी कोई कभी दमदार छवि नहीं रही। येन-केन-प्रकारेण कांग्रेस की टिकट पाना और गांधी परिवार के गीत गाते हुए चुनाव जीत जाना उनका मुकद्दर रहा है। वे तो बस यही चाहते हैं कि कांग्रेस की कमान हमेशा गांधी परिवार के हाथों में ही रहे। कोई दूसरा इस पार्टी का अध्यक्ष बनने की सोचे भी नहीं। किसी नेता के बोले तथा कहे गये शब्दों के अर्थ का अनर्थ करना राजनीतिक विरोधियों की आदत है, लेकिन क्या मीडिया ने भी बिना विचारे यही राह पकड़ ली है? बड़े से बड़े भाषा के धुरंधर अक्सर बोलते-बोलते नियंत्रण छूट जाने से बहक जाते हैं। फिर राहुल कोई हिंदी के पारंगत विद्वान भी नहीं हैं। राहुल को भी अपनी कमियों, भूलों और त्रुटियों का भान तो होगा ही...। देश और दुनिया में उनकी कैसी बौनी छवि बना दी गई है, इसकी भी उन्हें खबर न हो ऐसा तो हर्गिज नहीं हो सकता।
    राहुल की मां सोनिया गांधी का सपना है, बेटा भारत देश का प्रधानमंत्री बने। बेटा भी हर चुनाव पर मेहनत करता है। खून पसीना बहाता है, फिर भी सफलता हाथ नहीं लगती। बहन प्रियंका वाड्रा की भी भाई को पीएम बनते देखने की तीव्र लालसा है। मोदी सरकार ने उनके ‘कमाऊ’ पति राबर्ट वाड्रा का जीना हराम कर रखा है। भाई सत्ता पाये तो सभी को चैन आए। हर कांग्रेसी के सपने को साकार करने तथा अपनी छवि बदलने के लिए राहुल की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ बड़े जोरों-शोरों से चल रही है। उनके साथ चल रहे यात्रियों के हाथों में जो तख्तियां हैं उनमें लिखा है, ‘यह यात्रा देश में फैली नफरत के खिलाफ एक आगाज़ है। अब न डरेंगे, न झुकेंगे, न रूकेंगे।’ महात्मा गांधी की दांडी यात्रा से प्रभावित... प्रेरित भारत को जोड़ने की इस पैदल यात्रा का मज़ाक उड़ाने वालों के अपने-अपने तर्क हैं। उन्हें यात्रा के दौरान राहुल का एक बूढ़ी औरत को अपने हाथों से पानी देना और एक छोटी बच्ची के जूते बांधना मीडिया में छाने का तमाशा लगता है। यात्रा के ही दौरान राहुल गांधी का जमीन पर बैठकर मां सोनिया के ढीले जूते के फीते कसना भी उनके लिए महज नाटक-नौटंकी है।
    राहुल का आम लोगों से मिलना, बोलना-बतियाना, यात्रा में शामिल साथी नेताओं से हंसी ठिठोली करना, रास्ते में मिलने वाले बच्चों को गोद में उठाना, गले लगाना और बेफिक्री के साथ पकोड़े, समोसे खाते और गन्ना चूसते हुए मुस्कराना जन समर्थन में बढ़ोत्तरी कर रहा है। राहुल लोगों को बता रहे हैं कि किस तरह से उनकी छवि को बिगाड़ने के लिए हजारों करोड़ रुपये फूंके जा रहे हैं। भाजपा पर उनके लगातार तीर चल रहे हैं। लोग देख और सुन रहे हैं। वे बार-बार कहते हैं कि उनकी यह पैदल यात्रा भाजपा व आरएसएस द्वारा फैलाई गई हिंसा के खिलाफ है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में नदारद रहे लोग आज नायक बनने का षड़यंत्र रच रहे हैं। उन्हें कामयाबी भी मिल रही है। कांग्रेस और उनके नेताओं ने आजादी की लड़ाई लड़ी। महात्मा गांधी, सरदार पटेल, जवाहरलाल नेहरू ने देश के लिए अपनी जान दे दी, लेकिन इन्होंने क्या किया? तब आरएसएस अंग्रेजों की सहायता और सावरकर उनसे धनसुख पा रहे थे। कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा से पहले भी राहुल भाजपा, संघ और वीर सावरकर को अपने तीखे निशानों पर लेते रहे हैं। वे डटकर सामना भी कर रहे हैं। भाजपा के लोगों ने उन पर कई बार माफी मांगने का दबाव डाला, लेकिन उनका बस यही जवाब आया कि मैं कभी भी माफी नहीं मांगूंगा। मेरा नाम राहुल सावरकर नहीं, राहुल गांधी है। नेहरू-इंदिरा की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए संघर्षरत राहुल से देशभर के तमाम कांग्रेसियों को बहुत उम्मीदें है। वे उन्हें हमेशा उग्र तेवरों के साथ सधे हुए अंदाज में अपनी बात रखते हुए देखना चाहते हैं। राहुल को महात्मा गांधी का वारिस मानने वाले इन चेहरों को तब-तब बड़ा अच्छा लगता है, जब वे संघ को गांधी का हत्यारा कहकर चुनावी सभाओं की भीड़ बढ़ाते हैं। भाजपा और नरेंद्र मोदी के कट्टर विरोधी राहुल गांधी यह भी कह चुके हैं कि मेरी सत्ता और दलगत राजनीति में किंचित भी दिलचस्पी नहीं। मैं जिस देश भारत से प्यार करता हूं उसे पूरी तरह से जानना और समझना चाहता हूं। देश के लोगों और देश की धरती को करीब से देखने के लिए भारत जोड़ो यात्रा पर निकले राहुल गांधी कहते हैं कि वो इस यात्रा के नेतृत्वकर्ता नहीं, हिस्सा भर हैं। कांग्रेसियों के लाख अनुरोध के बावजूद कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी के प्रति अरूचि दिखाने वाले राहुल गांधी अपने मकसद में कितने कामयाब होते हैं, यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा, लेकिन राहुल की यात्रा के कुछ वीडियो इस कलमकार ने बड़ी एकाग्रता से देखे हैं। एक वीडियों में अपने सहयात्रियों को बताते नज़र आते हैं कि जब मैं खुद को थका हुआ पाता हूं, तो मेरी निगाह अपने साथियों पर जाती हैं, जो घुटनों के दर्द से परेशान है, पांव में छाले पड़ गये हैं, बीमार हो रहे हैं, फिर भी बेपरवाह चलते चले जा रहे हैं। उनकी लगन और हिम्मत मुझे बहुत प्रेरित करती है। जिस तरह से राहुल उनसे प्रेरणा पाते हैं, वैसे ही साथी पदयात्री भी तो उन्हें देखकर नयी ऊर्जा से सराबोर हो रहे होंगे। राहुल का यह अंदाज और नया चेहरा नयी उम्मीद तो जगाता ही है...।

Thursday, October 6, 2022

अपनों को खोने की पीड़ा

    आकांक्षा फिल्मी पर्दे और टीवी पर चमकना चाहती थी। लोगों की नजरों में आने-छाने के लिए उसने मॉडलिंग के क्षेत्र में कदम रख दिए थे। अपने सारे सपनों को साकार करने के लिए उसमें शायद हौसले की कमी थी। यदि ऐसा नहीं होता तो मुंबई के अंधेरी में स्थित होटल के कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या नहीं करती। अचानक खुदकुशी कर इस जहां से विदा होने वाली आकांक्षा ने अपने सुसाइड नोट में लिखा है कि ‘मुझे माफ करना, कोई भी इस घटना के लिए जिम्मेदार नहीं है। मैं खुश नहीं हूं। मुझे शांति चाहिए।’ खुशी और शांति के लिए आत्महत्या! यह उपलब्धि तो जिन्दा रहकर ही हासिल होती है। मरने पर तो सारा खेल ही खत्म हो जाता है। आकांक्षा को यह सच किसी ने नहीं बताया होगा। पढ़ने-सुनने से भी दूर रही होगी। संघर्षों और मुश्किलों से छुटकारा पाने के लिए मौत को गले लगाने वाली इस तीस वर्षीय युवती की तरह ही नागपुर के बाइस वर्षीय युवक सोहन सिंह ने भी लेनदारों के तकादों से परेशान होकर ज़हर खा लिया। महत्वाकांक्षी सोहन ऑनलाइन फ्रूट डिलिवरी का काम करता था। वह भरपूर मेहनती था। धनवान बनने की उसकी प्रबल इच्छा थी। इसीलिए अपनी दोस्त के साथ भागीदारी में केक की छोटी-सी दुकान भी खोल ली थी। सोहन ने साहूकारों से जो कर्ज लिया था उसका समय पर भुगतान नहीं कर पा रहा था। अपनी रकम की वसूली के लिए जब लेनदारों का दबाव बढ़ा और धमकियां-चमकियां मिलने लगीं तो वह घबरा गया। कामधंधे में मन लगना भी कम हो गया। युवती से भी अनबन होने लगी।
    बिगड़े हालातों को शांत मन से सुधारने की बजाय उसने बिना कुछ ज्यादा सोचे-विचारे ज़हर तो निगल लिया, लेकिन बाद में उसे बहुत पछतावा हुआ। जब ज़हर का तेजी से असर होने लगा तो उसने किसी तरह से अपने भाई को फोन कर अपने पास बुलाया और हाथ जोड़ते हुए फरियाद की, ‘भाई किसी भी तरह से मुझे बचा लो। मैंने ज़हर खा लिया है, लेकिन मैं मरना नहीं, जीना चाहता हूं।’ सोहन के भाई के तो होश ही उड़ गये। उसने तुरंत अपनी पगड़ी उतारी। भाई को बाइक के पीछे बिठाया और उससे खुद को बांधा और तेजी से बाइक को दौड़ाते हुए अस्पताल पहुंचा। डॉक्टरों ने सोहन को बचाने के सभी उपाय किए, लेकिन जिद्दी मौत अंतत: उसे अपने साथ लेकर चलती बनी। उसकी जेब से ज़हर के दो पाउच भी मिले। देखते ही देखते लाश में बदल चुके छोटे भाई को बड़ा भाई बस देखे जा रहा था। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि जिसे सुबह एकदम ठीक-ठाक देखा था, रात को उसके प्राण पखेरू उड़ चुके हैं। बेबसी और गम की आंधी आंसू बन टपके जा रही थी और माथा पकड़े वह बस यही सोचे जा रहा था कि छोटे भाई ने यह क्या कर डाला! कोई तकलीफ थी तो बता देता। मिलजुलकर हल निकाल लेते। अभी तो उसने दुनिया ही कहां देखी थी। एक ही झटकें में सबको दुखी कर विदा हो गया। भाई की लाश को घर ले जाने का भी उसमें साहस नहीं था। मां-बाप पर क्या गुजरेगी। खून के रिश्ते ऐसे होते हैं, जिनके टूटने का गम होश उड़ा देता है। उस पर हमेशा-हमेशा के लिए बिछड़ने की पीड़ा तो इंसान को पूरी तरह से निचोड़कर रख देती है। उसे अंधेरे के सिवाय और कुछ दिखायी ही नहीं देता।
    मुंबई में गरबा खेलते समय दिल का दौरा पड़ने से युवा पुत्र की मौत हो गई। पिता भी वहीं थे। अपनी आंखों के सामने बेटे की मौत का सदमा उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ और उनकी भी दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। कानपुर में एक परिवार के 35 वर्षीय बेटे विमलेश को कोरोना की दूसरी लहर ने झपट्ठा मारकर छीन लिया। घरवाले किंचित भी यकीन नहीं कर पा रहे थे कि विमलेश का अब केवल निर्जीव शरीर उनके सामने है। अस्पताल प्रशासन ने मृत्यु प्रमाणपत्र जारी कर शव को दाह संस्कार के लिए परिजनों के हवाले कर दिया। कुछ ही घंटों के बाद जब मृतक के अंतिम संस्कार की तैयारी की जा रही तभी मां ने यह कहकर सभी को चौंका दिया कि अभी भी मेरे दुलारे बेटे की धड़कने चल रही हैं। ऐसे में मैं उसकी अंत्येष्टि नहीं होने दूंगी। मां की जिद के सामने सभी ने हार मान ली और अंतिम संस्कार रद्द कर शव को घर में लाकर रख दिया गया। विमलेश की शिक्षित बैंक अधिकारी पत्नी, पिता, मां और भाई दिन-रात उसकी ऐसे सेवा करने लगे, जैसे बिस्तर पकड़ चुके किसी गंभीर रोगी का पल-पल ध्यान रखा जाता है और भूले से भी कोई भी भूल-चूक नहीं होने दी जाती। सुबह-शाम नियमित शव की गंगाजल और डेटॉल से साफ-सफाई, सुगंधित तेल से मालिश करने के साथ-साथ कमरे का एसी भी चौबीस घंटे चालू रखने का परिवार ने पक्का नियम बना लिया। बाहरी लोगों की घर के भीतर आने पर बंदिश लगा दी गई। रिश्तेदारों से भी दूरियां बना ली गईं। आसपास के लोगों में परिवार के इस अजब-गजब व्यवहार को लेकर तरह-तरह की बातें होने लगीं। सभी उन्हें मानसिक रोगी तो पुत्र मोह के कैदी मानकर दूरियां बनाते चले गये। लगभग डेढ़ साल तक बिस्तर पर पड़े निर्जीव शरीर के फिर से उठ खड़े होने का इंतजार परिवार के सभी सदस्य सतत करते रहे। पूजा-पाठ भी होता रहा। विमलेश का पांच वर्षीय बेटा प्रतिदिन शव के सामने खड़ा होकर ईश्वर से प्रार्थना करता कि उसके पिता को कोमा के चंगुल से निकालकर शीघ्र पूरी तरह से भला चंगा कर दें। परिजनों को विमलेश के फिर से जीवित हो उठने का कितना भरोसा था उसे इस सच से समझा जा सकता है कि वे कई महीनों तक ऑक्सीजन सिलेंडर लाते रहे और शव को आक्सीजन देते रहे। मां आखिर तक कहती रही कि मेरा बेटा बहुत थक गया था इसलिए गहरी नींद में सोया है। विमलेश की पत्नी तख्त पर पड़े पति के नियमित कपड़े बदलती और घर से बाहर निकलने से पहले उसका माथा चूमती। बाहर क्या हो रहा है, कौन-सा त्योहार आया-गया है, इससे वे पूरी तरह से बेखबर रहे। उन्हें तो बस विमलेश की चिंता थी। विमलेश को ठीक करने के लिए कुछ नामी डॉक्टरों को भी घर में इलाज के लिए बुलाते रहते। झोलाछाप डॉक्टरों ने भी जमकर चांदी काटी। लगभग चालीस लाख खर्च कर चुके परिवार ने तो अपने बेटे को चलता-फिरता देखने के लिए अपनी करोड़ों रुपये की पुश्तैनी जमीन-जायदाद तक बेचने की पक्की तैयारी कर ली थी, लेकिन इससे पहले किसी की शिकायत पर पुलिस घर पहुंच गई। समाजसेवकों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों के बहुत समझाने के बाद परिवार डेढ़ साल बाद बेटे का दाह संस्कार करने के लिए बेमन से माना।

Thursday, September 29, 2022

जय भारत देश

    जब सातवीं-आठवीं में था तभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक के बारे में जानने और सुनने लगा था। बंटवारे के बाद किसी तरह से जान बचाकर पहले अमृतसर फिर पानीपत के शरणार्थी शिविर में महीनों रहे पिता और चाचा ने बताया था कि किस तरह से राष्ट्रीय संघ से जुड़े युवकों ने दिन-रात उनकी सहायता की थी। बेसहारों का सहारा बन भूखे-प्यासे स्त्री-पुरूषों, बच्चों, युवकों तथा वृद्धों की तन-मन से सेवा कर उनका दिल जीत लिया था। वो 1947 का काल था। तब आजादी की खुशी भी थी, भारत के विभाजन की पीड़ा भी थी। अपने बसे-बसाये घरों से बेघर कर दिये गए करोड़ों लोगों को नये ठिकाने की तलाश थी। वक्त के पास हर जख्म का इलाज है। धीरे-धीरे उसने जख्मों को भर दिया।
    आजादी के बाद के वर्षों में भी निरंतर हम आरएसएस के कर्मठ, जूनूनी कार्यकर्ताओं की सहायता और सेवाभावना से अवगत होते चले आ रहे हैं। देश में कहीं भी अकाल पड़ा हो, बाढ़ आयी हो या फिर कोई बड़ी आपदा और दुर्घटना ने कहर ढाया हो तो आरएसएस के हिम्मती सैनिक बिना किसी भेदभाव के तन-मन और धन से मानव सेवा कर इंसानियत का धर्म निभाते नजर आते हैं। संघ को कभी भी प्रचार की भूख नहीं रही। चुपचाप मानव सेवा करते हुए इसने अपने कद को बढ़ाया है और विरोधियों को अपनी सुनी-सुनायी राय बदलने के लिए प्रेरित किया है। राष्ट्रीय सेवक संघ की स्थापना वर्ष 1925 में, विजयादशमी के शुभ दिन हुई थी। इस संगठन की नींव रखी थी प्रखर राष्ट्रभक्त डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने, जिनका बस यही सपना था कि भारत एक ऐसा मजबूत राष्ट्र बने, जहां सभी बराबर हों। कहीं कोई ऊंच-नीच का भाव न हो। सभी के मन में राष्ट्र की एकता व अखंडता के पवित्र विचार कूट-कूट कर भरे हों। हर कोई भारत माता के लिए अपना सबकुछ न्यौछावर करने के लिए हमेशा कमर कस कर तैयार रहे। डॉ. हेडगेवार ने 97 वर्ष पूर्व जो बीज बोया था वह आज वटवृक्ष बन चुका है। यह सच जगजाहिर है कि इस वटवृक्ष के जहां बेशुमार प्रशंसक हैं, वहीं इसके कई आलोचक भी हैं, जिन्हें इसकी बुराई करते रहने के अतिरिक्त और कुछ नहीं सूझता। कुछ बुद्धिजीवियों ने तो आरएसएस की आलोचना करते रहने की कसम खा रखी है। मीडिया के कई चेहरों को भी भारतीय जनता पार्टी तथा आरएसएस मुसलमानों को शत्रु प्रतीत होती है। आरएसएस को भाजपा का संरक्षक भी कहा जाता है, लेकिन उसने हमेशा खुद को विशुद्ध सांस्कृतिक संगठन कहलवाना पसंद किया है। किसने किसके कंधे पर बंदूक रख रखी है इसका जवाब आसान भी है और मुश्किल भी।
    आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में अखिल भारतीय इमाम संगठन के प्रमुख इमाम उमर अहमद इलियासी से मुलाकात की तो ऐसा हंगामा और शोर मचा जैसे कोई अकल्पनीय कांड घट गया हो। मोहन भागवत ने इमाम उमर इलियासी के पिता जमील इलियासी की पुण्यतिथि पर उनकी मजार पर जियारत की और एक मदरसे का दौरा भी किया। वहां पर उन्होंने बच्चों से उनकी पढ़ाई के बारे में जानकारी लेते हुए पूछा कि वे अपने जीवन में क्या हासिल करना चाहते हैं। बच्चों ने पढ़-लिखकर डॉक्टर और इंजीनियर बनने की प्रबल इच्छा व्यक्त की। संघ प्रमुख के मस्जिद में कदम रखने से देश में यकीनन एक अच्छा सकारात्मक संदेश गया है। कुछ अमन के शत्रुओं को भागवत की इस पहल से जबर्दस्त धक्का लगा है। हिंदुओं और मुसलमानों में ऐसे कुछ लोग भरे पड़े हैं, जिनकी एकता, आपसी सद्भाव और शांति के मार्ग से कट्टर दुश्मनी है। मार-काट और खून-खराबा पसंद करने वाले इन अमन के दुश्मनों को आपसी मेलमिलाप की कोई भी कोशिश और मुलाकात रास नहीं आती। इस ऐतिहासिक मुलाकात के दौरान इमाम इलियासी का मोहन भागवत को राष्ट्रपिता और राष्ट्रऋषी कहना भी ऐसे विघ्न संतोषियों को शूल की तरह चुभा है। निमंत्रित मेहमान को आदर सूचक शब्दों से नवाजना इस देश की सदियों से चली आ रही पुरातन आदर्श परंपरा है।
यहां पर लिखना और बताना भी जरूरी है कि भारत के अधिकांश हिंदुओं और मुसलमानों में सद्भाव और भाईचारा यथावत बरकरार है। हाल के वर्षों में जो प्रचारित किया जा रहा है उसमें अतिशयोक्ति काफी ज्यादा है। भारत भूमि पर रहने वाले हर सजग हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन यहूदी और पारसी के मन में एक-दूसरे के धर्म के प्रति अपार सम्मान है। एक-दूसरे के पूजा स्थलों पर माथा टेकने में उन्हें खुशी और संतुष्टि मिलती है। मुंबई की हाजी अली दरगाह हो या नागपुर में स्थित ताजुद्दीन बाबा की दरगाह... यहां आपको सभी धर्मों के लोग चादर चढ़ाते और इबादत करते मिल जाएंगे। राजस्थान के अजमेर शरीफ में यह जान पाना मुश्किल होता है कि किसका किस धर्म से वास्ता है। सभी मानवता के रंग और खूशबू में महकते नज़र आते हैं। लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर पटरियों के बीच खम्मन पीर बाबा की दरगाह पर हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई... सभी पूरी आस्था के साथ शीश नवाते हैं। आंध्रप्रदेश के कडप्पी में श्री लक्ष्मी वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में रोज मुस्लिम एवं अन्य धर्मों के लोग एक जैसी पवित्र सोच के साथ आते हैं। अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर में भी किसी एक धर्म के नहीं सभी धर्मों के लोग माथा टेकने जाते हैं और छक कर पवित्र लंगर का सात्विक आनंद उठाते हैं। तामिलनाडु के वेलंकनी चर्च में सैकड़ों किमी की पैदल यात्रा कर पहुंचने वालों में भी हर धर्म के लोगों का समावेश रहता है। यह तो नाम मात्र के उदाहरण हैं। भारतवासियों की एक दूसरे के धर्म के प्रति आदर-सम्मान और आस्था की हकीकतों असंख्य रंग और जीवंत तस्वीरें हैं, जिन्हें देखने के बाद पक्का यकीन होता है कि सभी भारतवासी एक सूत्र में बंधे हैं, भले ही पूजा-पद्धति अलग-अलग है। भारत का हर आम आदमी आपसी प्रेम-प्यार, अटूट सद्भाव और एकता के साथ रहने का प्रबल अभिलाषी रहा है। कुछ स्वार्थी दुष्ट लोगों की तोड़क सोच और अंधी राजनीति देश की फिज़ा को बदरंग करने की साजिशें जरूर रचती रहती है, लेकिन लाख सिर पटकने के बाद यदि वे असफल हैं तो उन आम भारतीयो की वजह से जो किसी दुष्चक्र में कभी भी नहीं फंसते।

Thursday, September 22, 2022

जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं

यह भारतीय खाकी वर्दीधारियों, पुलिस थानों और अधिकांश जेलों का वास्तविक चेहरा है, जिसे उन्हीं ने अच्छी तरह से जाना और पहचाना है, जिनका इससे वास्ता पड़ा है। फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने और पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाने पहुंची किसी नारी की अस्मत लुटने और उसे अपमानित करने की खबरें पुरानी पड़ चुकी हैं। कुछ अपराध ऐसे हैं, जो पुलिसवाले सत्ताधीशों के इशारे पर करते चले आ रहे हैं। पुरस्कार तथा पदोन्नति का लालच तो लगभग सभी को रहता है। फर्जी मुठभेड़ के साथ भी कहीं न कहीं यह सच जुड़ा हुआ है। कल भी अधिकांश औरते थाने जाने में घबराती थीं। आज भी घिनौने से घिनौने दुष्कर्म का शिकार होने के बाद भी वहां की चौखट पर पैर रखने से कतराती हैं। पुलिस के लालची और पक्षपाती चलन के चलते कई बार बेकसूर ही अपराधी घोषित कर दिये जाते हैं। उन्हें न्याय के फूलों की बजाय कांटे ही कांटे मिलते हैं।
    भारतीय जेलों के भी बड़े बुरे हाल हैं। कहने को तो पुलिस आम लोगों की सुरक्षा और जेलें अपराधियों को सज़ा और उनके जीवन में बदलाव लाने के लिए हैं, लेकिन जो सच सामने है वह बड़ा चिंतनीय तथा डरावना है। निर्दोष लोगों के सिर काटकर हत्याएं करने और पूरी दिल्ली में दहशत फैलाने वाले एक सीरियल किलर ने खुद के अपराधी बनने का जो कारण बताया उससे तो अदालत के दिमाग की चूलें ही हिल गईं। वह अपनी कह रहा था और स्तब्ध जज साहब बस सुन रहे थे, साहब, मैं तो यहां मेहनत मजदूरी कर अपने परिवार वालों के लिए दो वक्त की रोटी कमाने के लिए आया था। राजधानी के कई इलाकों में कई काम किए। भरपूर मेहनत-मजदूरी करने के बाद दो पैसे हाथ में नहीं लगने पर आदर्शनगर में सड़क के किनारे की खाली जमीन पर सब्जी बेचने लगा। हमारे गांव में तो सरकारी जगह पर ठेला, रेहडी लगाने की पूरी आज़ादी थी। महानगर के दस्तूर का मुझे पता नहीं था। सब्जी की दुकान लगाये अभी पांच-छह दिन ही बीते थे कि गुंडे-बदमाशों ने पैसों के लिए तंग करना प्रारंभ कर दिया। मेहनत मेरी थी, लेकिन वे अपना हिस्सा मांग रहे थे। मैंने उन्हें कुछ दे-दुआकर किसी तरह शांत किया, तो पुलिस वालों ने अपनी हिस्सेदारी मांगनी प्रारंभ कर दी। एक बीट कांस्टेबल तो मेरे पीछे ही पड़ गया। मनचाही रिश्वत नहीं मिलने पर उस धूर्त ने तो मेरी सब्जी की टोकरियां नष्ट करने के साथ-साथ मेरे खिलाफ मुकदमें दर्ज करवाने प्रारंभ कर दिये। एक जगह से दूसरी जगह पर जा-जाकर मैंने अपनी दुकान लगायी, लेकिन हर बार लुटेरे वर्दीवालों ने चैन से जीने नहीं दिया। बेकसूर होने के बावजूद कई बार मुझे जेल जाना पड़ा। जेल यात्रा के दौरान ही मन में पुलिस वालों को सबक सिखाने और उनकी नींद उड़ाने का विचार आया तो निर्दोषों की चुन-चुन कर हत्याएं करने लगा। ऐसा भी नहीं कि आम आदमी से मित्रवत व्यवहार करनेवाले खाकी वर्दीधारियों का अकाल पड़ गया है, लेकिन जो हैं, वे गिने-चुने हैं। अपराधी सोचवाले उन पर भारी पड़ रहे हैं।
    देहरादून की जेल में हत्या के आरोप में आजीवन कारावास भोग रहे रामप्रसाद को दाएं गुर्दे में पथरी की शिकायत थी। पथरी के ऑप्रेशन के लिए उसे अस्पताल में भर्ती किया गया, जहां जेल प्रशासन की मिलीभगत से पथरी का ऑप्रेशन करने की बजाय उसकी बायीं किडनी ही निकाल ली गई। कुछ महीनों के बाद रामप्रसाद को फिर दर्द हुआ तो इलाज के नाम पर की गई धोखाधड़ी का पता चला। जेल में बंद खूंखार कैदी जेल में कुछ भी हासिल कर सकते हैं। बिकाऊ जेल प्रशासन को मोटी रिश्वत थमा कर जन्मजात चोर, लुटेरे, वसूलीबाज कैदी हर वो सुविधा पा रहे हैं, जो वे चाहते हैं। पैसे वाले कैदी जेल में मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं। अपना जन्मदिन और हर खुशी का जश्न मनाने के लिए शराब, गांजा आदि उन्हें पीने को मिल रहा है। जेल में वर्षों तक बंद रहे एक अपराधी ने बताया कि उसने अपनी आंखों से कैदियों को पेटीएम व फोन-पे के माध्यम से पैसे मंगवा कर अधिकारियों की रिश्वत की अंधी भूख को पूरा करते देखा है। यही भ्रष्टाचारी जेल अधिकारी रिश्वत देने वाले कैदियों के लिए दारू, चिकन-मटन पार्टी से लेकर अन्य और सभी मौज-मजों के इंतजाम कर रहे हैं। कुछ कैदियों को मिल रही सुविधाओ को देखकर लगता ही नहीं कि वे किसी संगीन जुर्म के कारण सींखचो में डाले गये हैं। नागपुर की सेंट्रल जेल में कई खूंखार हत्यारे, बलात्कारी, डॉन, माफिया कैद हैं। जेल के कुछ अधिकारी इन पर बड़े मेहरबान हैं। अभी हाल ही में कुछ कैदियों को मोबाइल तथा गांजा उपलब्ध कराने की शर्मनाक हकीकत ने सुर्खियां पायीं। जेल में विशाल प्रवेश द्वार पर कड़ी जांच की जाती है। यहां तक कि बाहरी व्यक्तियों के मोबाइल व अन्य इलेक्ट्रानिक्स सामान काउंटर पर जमा कर लिए जाते हैं। तो फिर ऐसे में जेल के भीतर नशे के लिए गांजा तथा बातचीत के लिए मोबाइल कैसे पहुंचा होगा? इसका उत्तर तो कोई बच्चा भी दे सकता है। तिहाड़ जेल में कैद रहकर भी ठगराज सुकेश चंद्रशेखरन ने एक शीर्ष उद्योगपति की बीवी से 200 करोड़ झटक लिए। तगड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बिकने का इससे खतरनाक सच भला और कौन सा हो सकता है। लोग अक्सर सवाल करते हैं कि देश में अपराधियों को नकेल कसने के लिए जब इतने कानून हैं, तो अपराधों का आंकड़ा जस का तस और अपराधियों का बाल भी बांका क्यों नहीं हो रहा? हां, यह सच है कि देश में कानूनों की तो भरमार है, रोज नये-नये कानून बनते भी रहते हैं, लेकिन रक्षक के भक्षक बनने, उसके बिक जाने और सत्ता तथा व्यवस्था के भेदभाव करने के कारण कानून असहाय और बौना बनकर रह गया है...।

Thursday, September 15, 2022

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इस वीडियो को देखने के बाद सबसे पहला विचार आया कि क्या भारतीय महिलाओं की सोच बदल रही है? वो अपनत्व और ममत्व जो इस पवित्र धरा की नारी की वास्तविक पहचान है, कहां मरखप गयी है। यकीनन जो सच सामने था, वो दिल को दुखाने, तड़पाने और दहलाने वाला था। इतनी संवेदनहीनता संकीर्णता और शर्मनाक निष्ठुरता! गाजियाबाद की रइसों और पढ़े-लिखों की सोसाइटी में एक महिला अपने पालतू कुत्ते के साथ लिफ्ट में सवार होती है। कुत्ता एक बच्चे को झपट्टा मार काट खाता है, लेकिन महिला देखकर भी अनदेखा कर देती है। जैसे कुछ हुआ ही न हो। बच्चा दर्द से कराहता रहता है, लेकिन निर्दयी महिला की इंसानियत नहीं जागती। वह तो बस तब तक चुपचाप लिफ्ट में खड़ी रहती है, जब तक उसका फ्लोर नहीं आ जाता। चौथी क्लास में पढ़ रहा यह बच्चा ट्यूशन से भूखा-प्यासा लिफ्ट से अपने फ्लैट लौट रहा था। जैसे ही उसे खूंखार कुत्ते ने काटा तो वह दर्द के मारे हाथ-पैर पटकने लगा। उसके लिए खड़े रहना मुश्किल हो गय। वीडियो में स्पष्ट दिखायी दे रहा है कि कुत्ते के काटने से घायल हुए बच्चे को संभालने की बजाय महिला अपनी अकड़ और मस्ती में गुम है। उसके चेहरे से जो अहंकार टपक रहा है, वो उसके नारीत्व की गरिमा के पतन की दास्तान कह रहा है...।
    झारखंड की बीजेपी की अच्छी-खासी रंगदार नेत्री रहीं हैं सीमा पात्रा। पतिदेव भी पूर्व आईपीएस अधिकारी रहे हैं। अमूमन नेता और नेत्रियां अनपढ़ होते हैं, लेकिन सीमा पढ़ी-लिखी हैं, लेकिन घमंड ने उसे जाहिल, गंवार से भी बदतर बना दिया है। उनकी नजर में गरीब की औकात शुन्य भी नहीं। सच का साथ देने वाले अपने ही बेटे को पागलखाने भिजवा चुकी सीमा पात्रा को अपने घर की आदिवासी नौकरानी का रहन-सहन तथा चेहरा-मोहरा पसंद नहीं था। वह जैसा चाहती थी नौकरानी सुनीता खाखा वैसा कर नहीं पाती थी। होना तो यह चाहिए था कि असंतुष्ट मालकिन नौकरानी की छुट्टी कर देती, लेकिन उसने तो हिंसक पशु की तरह उस पर जुल्म ढाने प्रारंभ कर दिए। उसे गरम सलाखों से जगह-जगह दागा गया। खाना-पीना तक बंद कर घर के अंधेरे कमरे में कैद करके रखने की दुष्टता के साथ-साथ बेहोश होने तक उसकी पिटायी तथा जीभ से मैला-कुचैला फर्श चटवाया गया। एक दिन तो डंडे से पीटते-पीटते उसके दांत तक तोड़ डाले। सीमा के बेटे ने अपनी मां के जंगलीपन का विरोध जताया, तो पागलखाने जाने की सज़ा पायी। सीमा पात्रा के संवेदनशील बेटे के दोस्त ने यदि लाठी, डंडों और लोहे की रॉड से बार-बार लहूलुहान की जाती रही सुनीता को अस्पताल में नहीं पहुंचाया होता तो इस नेत्री की वहशी दरिंदगी उजागर ही नहीं हो पाती। कालांतर में हो सकता है कि वह पार्टी में कोई उच्च पद पाते हुए विधायक और सांसद भी बन जाती। ऐसे कई मुखौटेधारी चेहरे राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ बनाये हुए हैं और अपनी मनमानी कर रहे हैं।  
    पूरे विश्व में प्रसिद्ध अमृतसर में स्थित स्वर्ण मंदिर के निकट के बाजार में निहंगों ने एक युवक की किरपाण से काटकर हत्या कर दी। स्वर्ण मंदिर के पास एक अनजान युवक को तंबाखू का सेवन करते देख निहंग आग-बबूला हो गये और उसे मौत की सौगात दे दी। ध्यान रहे कि सिख समुदाय के बीच स्वभाव से आक्रमक और हथियार रखने वाले इस विशेष तबके के सिखों को निहंग सिख कहा जाता है। यौद्धा के रूप में भी इनकी विशेष पहचान रही है। युवक का नाम हरमनजीत सिंह है। अपना आपा खो चुके निहंगों ने स्वर्ण मंदिर के नजदीक नशा करने पर आपत्ति जतायी तो वाद-विवाद होने लगा। बात बढ़ती-बढ़ती हाथापाई तक जा पहुंची। युवक भी हट्टा-कट्टा था। उसके भारी पड़ने पर एक निहंग की पगड़ी भी उतर गई। फिर तो जैसे आग में पेट्रोल का छिड़काव हो गया। दहलाने वाले तलवारों के आतंकी हमले के बाद युवक छह घंटे तक सड़क किनारे पड़ा रहा। किसी राहगीर को उस पर रहम नहीं आया। अंतत: उसने वहीं पड़े-पड़े ही दम तोड़ दिया। यह हमारे आज के समाज का असली चेहरा है, जो देखकर भी अंधा बना रहना चाहता है। नाटक-नौटंकी करने में भी उसने महारत हासिल कर ली है। आंखें होने के बावजूद भी अंधे हुए लोगों को सचमुच के अंधों से इंसानियत का पाठ सीखने का वक्त आ गया है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में स्थित है काली बाड़ी चौक। इस चौराहे पर हमेशा भीड़ का सैलाब उमड़ता दिखायी देता है। इसी सैलाब में अक्सर दिख जाती हैं, एक दूसरे की मददगार वो तीन हिम्मती लड़कियां जो कॉलेज की छात्राएं हैं। इन तीनों के साथ कुदरत ने बड़ी बेइंसाफी की है। राधिका यादव जो हिस्ट्री में एमए कर रही है, वह तो पूरी तरह से नेत्रहीन है। राजनीति में एमए कर रही भूमिका को सिर्फ 20 प्रतिशत ही दिखता है। शुक्री डिग्री गर्ल्स कॉलेज में बीए फर्स्ट ईयर की छात्रा है उसकी भी दोनों आंखें अंधेरे की भेंट चढ़ चुकी हैं। तीनों नियमित साथ-साथ बस से काली बाड़ी चौक आती हैं और एक-दूसरे का हाथ थामे सड़क और चौराहा पार कर कॉलेज जाती हैं। उनके अपनत्व भरे जुड़ाव को देखकर अक्सर लोग उन्हें देखने के लिए खड़े हो जाते हैं। सवाल करने पर वे कहती हैं कि खून के रिश्ते ही सबकुछ नहीं होते। मन की आंखें अपने और बेगाने की पहचान कर लेती हैं। हम तीनों नेत्रहीन हैं, लेकिन कुदरत ने हमें एक-दूसरे से मिलाकर अटूट रिश्ते में बांध दिया है, जो इस जन्म में तो नहीं टूट सकता। हां, एक सच और जो हमारी समझ में आया है... वो है, इंसान के लिए आंखें ही सबकुछ नहीं होतीं। हमने भीड़ भरी इस दुनिया में बहुत से आंखों वाले ऐसे-ऐसे अंधे देखे हैं, जो दूसरों की मां-बहन की आबरू को लूटने के लिए हर मर्यादा को सूली पर लटका देते हैं। कई बार तो वासना के अंधेपन में अपनी बहू-बेटी तक को शिकार बनाने में भी संकोच नहीं करते।

Thursday, September 8, 2022

बदरंग बचपन और जवानी

    गुलाटी साहब पंद्रह दिन के बाद घर लौटे। उनका पालतू कुत्ता उन्हें देखते ही उनके इर्द-गिर्द घूमने और उनके पैरों को चाटने लगा। गुलाटी साहब ने देखा, कुते की आंखों से झर-झर आंसू छलक रहे थे। गुलाटी साहब ने उसे बड़े जोर से अपने गले से चिपटा लिया। जैसे उन्हीं का प्यारा-दुलारा बेटा हो। गुलाटी शहर के विख्यात कॉलेज में हिन्दी के व्याख्याता थेे। अपने छात्र-छात्राओं में खासे लोकप्रिय गुलाटी और उनकी पत्नी को उन्हीं के इकलौते कपूत ने गोलियों से भूनकर दर्दनाक मौत दे दी। यह खबर पढ़ते ही मुझे लगा किसी जालिम ने मेरे सीने का धड़कता दिल खींचकर बाहर निकाल लिया हो। मेरे हाथ-पैर सूखे पत्ते की तरह कांपने लगे। दिमाग कुछ भी सोचने के काबिल नहीं रहा। गुलाटी का नाबालिग बेटा शराब और गांजा के नशे की लती हो चुका था। मां-बाप समझा-समझा कर थकहार गये थे। पहले तो नशे के लिए घर के कीमती सामान बेचकर गांजा, शराब खरीदता था फिर यहां-वहां चोरी-चक्कारी करने लगा। सुबह-शाम हवाखोरी के लिए सैर पर निकलने वाली महिलाओं के गले की सोने की चेन उड़ाने के कारण जेल भी हो आया था। प्रोफेसर गुलाटी बेटे के कारण बदनामी के दंश झेलते-झेलते बीमार-बीमार से दिखने लगे थे। पत्नी ने तो बिस्तर ही पकड़ लिया था और अब यह शर्मनाक कांड जो हर किसी की जबान पर था...
गुलाटी ने जितना भी कमाया  और बनाया था, सब अपने बेटे के लिए ही तो जुटाया था। वे तो बस यही चाहते थे बेटा किसी तरह से सही राह पकड़ ले। उनके विरोधी तो उन्हीं को अपराधी और कसूरवार समझते थे। पीठ पीछे कहते नहीं थकते थे कि जो इंसान अपने इकलौते बेटे को सही संस्कार नहीं दे पाया उसका प्रोफेसर होना ढकोसला है। अगर उन्होंने बेटे पर शुरू से नज़र रखी होती तो बेटा कभी बेकाबू नहीं होता। अच्छे-बुरे हर मौके पर आलोचना करने का ठेका ले चुके लोगों को तो सदबुद्धि दे पाना ऊपर वाले के भी बस के बाहर है। मुझे पता है कि गुलाटी ने अपने बिगड़ैल बेटे को अच्छे विचारों से संस्कारित करने के लिए जी-जान से न जाने कितनी कोशिशें की थीं। यह बड़ी विचित्र विडंबना है कि गुलाटी जैसे विद्वान दुनिया को तो जीतने में कामयाब हो जाते हैं, लेकिन अपने ही घर में अक्सर मात खा जाते हैं।
    देश के विशाल प्रदेश उत्तरप्रदेश के शहर गाजियाबाद के उस पिता पर क्या बीत रही होगी जिसके नाबालिग बेटे ने पढ़ने-लिखने की उम्र में खुद पर हत्यारा होने के कलंक का ठप्पा लगवा लिया है। हर माता-पिता अपनी संतान के अच्छे भविष्य के लिए सतत चिंतित रहते हैं, लेकिन आज के दौर के बच्चे तो कहां से कहां अंधे घोड़े की तरह दौड़े चले जा रहे हैं। दसवीं में पढ़ने वाले इस लड़के का पढ़ाई से ऐसा मन उचटा कि उसने किताबों से छुटकारा पाने के उपाय तलाशने प्रारंभ कर दिए। घर से स्कूल जाने के लिए निकलता लेकिन यहां-वहां भटकता रहता। उसे इस आवारागर्दी में ही मज़ा आने लगा था। महीने में मात्र पांच-सात दिन स्कूल जाते हुए अपने पिता की मेहनत की कमायी की बरबादी करता रहा। पिता को जब खबर लगी तो डांट पड़ी जो उसे बिलकुल अच्छी नहीं लगी। फिर तो उसने जो काम किया उसे देख- सुनकर  सभी के रोंगटे खड़े हो गए। पढ़ाई के सिरदर्द से छुटकारा पाने के रास्ते तलाशते-तलाशते सोशल मीडिया से उसे पता चला जेल जाने पर पढ़ाई से छुटकारा हमेशा-हमेशा के लिए मिल सकता है। फिर तो उसके दिल-दिमाग में जेल जाने का भूत सवार हो गया, लेकिन उसके लिए कोई अपराध करना जरूरी थी। गूगल और अपराधियों को महिमामंडित करने वाले विभिन्न वीडियो से उसे प्रेरणा मिली कि किसी की हत्या कर दो तो जेल जाने से कोई नहीं रोक सकेगा। किसी कुत्ते-बिल्ली की हत्या कर तो जेल नहीं पहुंचा जा सकता था। इसके लिए तो किसी जीती-जागती इंसानी जान की कुर्बानी की जरूरत थी। शातिर लड़के ने अपने पड़ोस में रहने वाले तेरह साल के बच्चे से दोस्ती की। कुछ ही दिनों में उसने बच्चे को विश्वास दिला दिया कि वह उसका अच्छा दोस्त है। एक शाम वह घुमाने-फिराने और कुछ खिलाने के बहाने से उसे सुनसान इलाके में ले गया और वहीं अभ्यस्त हत्यारे की तरह गला दबाकर उसकी हत्या कर दी। पुलिस ने जब उसे दबोचा तो वह बस यही कहता रहा कि, मैं पढ़ना नहीं चाहता, मुझे जल्दी से जल्दी जेल भेज दो...। नाबालिग होने के कारण इस हत्यारे को जेल तो नहीं भेजा गया, लेकिन सुधारगृह में जरूर डाल दिया गया है।
    शिवकुमार धुर्वे उम्र 18 वर्ष। छह दिन में 4 निर्दोषों की हत्या कर सीरियल किलर का तमगा हासिल करने वाले इस किशोर की चाहत थी कि उसका किसी भी तरह से नाम हो। लोग उसकी चर्चा करें। उसका नाम सुनते ही लोग भयभीत हो जाएं। पुलिसिया पूछताछ में उसने बताया कि एक फिल्म के किरदार रॉकीभाई ने उसे इस कदर रोमांचित किया कि उसने हत्या दर हत्या कर अपनी इच्छा पूरी करने के साथ-साथ मीडिया की भी भरपूर सुर्खियां पा लीं। धुर्वे ने हत्याएं करने का वही तरीका अपनाया जो फिल्मी किरदार ने अपनाया। वह रात को घूम-घूमकर देखता कि कौन थका-हारा चौकीदार अपनी ड्यूटी के बाद मधुर नींद की आगोश में है। मौका पाते ही वह सिर पर पत्थर मारकर उसकी निर्मम हत्या कर नये शिकार के लिए आगे निकल जाता। उसका इरादा तो पच्चीस-पचास को टपकाने का था, लेकिन 4 की हत्या के बाद वह पकड़ में आ गया। यह सीरियल किलर पढ़ा-लिखा तो नहीं लेकिन, स्मार्टफोन चलाने का उसे जबर्दस्त शौक रहा है। कई-कई घंटों तक अपराधों से संबंधित वीडियो देखना और मसालेदार खाना खाने के शौकीन इस और अन्य सभी नृशंस हत्यारों की गिनती इंसानों में तो कतई नहीं की जा सकती...।