Thursday, May 4, 2023

चरैवति... चरैवति

    महाराष्ट्र प्रदेश और देश के जनप्रिय साप्ताहिक, ‘राष्ट्र पत्रिका’ के सफलतापूर्वक 15वें वर्ष में प्रवेश करने पर हमें वैसी ही अनुभूति और खुशी हो रही है, जैसी हर किसी को अपने जन्मदिन पर होती है। किसी का भी जन्मदिन वो सुखद अवसर होता है, जो अतीत की यादों की खिड़कियां और दरवाजे खोल देता है। हम अपनी यात्रा में कितने सफल और असफल रहे, जाने-अनजाने में कैसी-कैसी भूलें तथा गलतियां हुईं इसका भी शोध और आकलन करने का अवसर होता है हर जन्मोत्सव। अपने प्रकाशन के प्रारंभ काल से ही लाखों सजग पाठकों के मन-मस्तिष्क में बस जाने में कामयाब रहे समाचार पत्र ‘राष्ट्र पत्रिका’ का तब भी यही उद्देश्य था और आज भी यही एकमात्र लक्ष्य है, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता। किसी भी खबर को प्रकाशित करने से पूर्व उसकी गहराई तक जाना हम अपना कर्तव्य समझते हैं। अपने पाठकों को अधूरे नहीं, पूरे सच से अवगत कराना हमारा मूलभूत दायित्व है। चुनौतियां कल भी थीं और आज भी हैं। अपनी बात को खुलकर कहने के लिए मैं शायर सुरजीत भोला दानिश हिंगणघाटी की गजल की इन पंक्तियों का सहारा ले रहा हूँ,

गुजरते लम्हों में सदियां तलाश करता हूँ

ये मेरी प्यास है, मैं नदियां तलाश करता हूँ।

यहां गिनाता है हर कोई खूबियां अपनी,

मैं अपने आप में कमियां तलाश करता हूँ।

भारतीय प्रेस का अपना एक अत्यंत बुलंद इतिहास है। इस देश में अखबारों, संपादकों, पत्रकारों का हर काल में सम्मान होता आया है, लेकिन आजकल हालात कुछ बदले-बदले से हैं। कहने वाले तो यह भी कहने से नहीं सकुचाते कि, वो गुजरे ज़माने की बात है, जब अखबारों को हाथोंहाथ लिया जाता था। उनकी सुर्खियां पाठकों को आकर्षित करती थीं और गहन चर्चा का विषय बना करती थीं। लोग यह भी कहते नहीं थकते थे कि जो अखबार में छपा है, वो एकदम सही है। शंका की कहीं कोई गुंजाइश हो ही नहीं सकती। अब कई अखबार, पत्रकार और संपादक कटघरे में हैं। उन पर उंगलियां उठाने वालों में गैर ही नहीं अपने भी शामिल हैं। 

हमारे पत्रकारिता के शीर्ष बलिदानी संपादकों और पत्रकारों ने यही तो बताया और समझाया है कि लक्ष्यहीन पत्रकारिता के कोई मायने नहीं हैं। हिंदी के पहले अखबार ‘उदन्त मार्तंड’ का ध्येय वाक्य था, ‘‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत।’’ इस जीवंत, प्रभावी अखबार में प्रकाशित होने वाली खबरें अंगे्रजों को शूल की तरह चुभती थीं। निर्भीक और ज्ञानवान पत्रकार, संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी के कुशल संपादन में निकले अखबार ‘प्रताप’ का ध्येय वाक्य था, ‘‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है। वह नर नहीं नरपशु निरा है और मृतक समान है।’’ आततायी अंग्रेजों के पैरों तले की जमीन खिसकाने और सतत उनकी नींद उड़ाने वाले विद्यार्थीजी को बेखौफ होकर कलम चलाने के दंड स्वरूप पांच बार जेल की यात्रा करनी पड़ी, लेकिन फिर भी उनकी कलम की आग कभी भी ठंडी नहीं पड़ी। ‘प्रताप’ जनता का प्रिय अखबार होने के साथ-साथ आजादी के दिवानों का भी पसंदीदा अखबार था। अमर शहीद भगत सिंह और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, उनकी मशाल-सी लेखनी के जबरदस्त प्रशंसक थे। हिंदुस्तान के क्रांतिकारी यशस्वी कवि श्री माखनलाल चतुर्वेदी की कालजयी कविता, पुष्प की अभिलाषा, 

‘चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,

चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ।

चाह नहीं, सम्राटों के शव पर हे हरि, डाला जाऊँ, 

चाह नहीं, देवों के सिर पर चढ़ूँ, भाग्य पर इठलाऊँ।

मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक।

सबसे पहले ‘प्रताप’ में ही प्रकाशित हुई थी। इस कविता ने लाखों युवाओं के दिल में देशभक्ति की मशाल जलाकर अंग्रेजों के खिलाफ सड़कों पर उतरने की प्रेरणा दी थी। 1907 में इलाहाबाद से प्रकाशित ‘स्वराज’ नामक अखबार का घोष वाक्य था, ‘‘हिंदुस्तान के हम हैं, हिंदुस्तान हमारा है।’’ इन शब्दों में अंग्रेजों के लिए सीधे-सीधे धमकी और चेतावनी थी कि तुम तुरंत हमारे देश को छोड़कर चलते बनो। इस पर तुम्हारा कोई हक नहीं। इसके जर्रे-जर्रे पर हम हिंदुस्तानियों का अधिकार है। क्रांति का बिगुल फूंकने वाला यह अखबार मात्र ढाई वर्ष तक प्रकाशित हो सका, लेकिन इसने भी भारत की जीवंत पत्रकारिता के इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज करवा दिया। गौरतलब है कि अंग्रेजों की नींद उड़ा देने वाले ‘स्वराज’ में उसी विद्वान को संपादक के लायक समझा जाता था, जो अंग्रेजों की तकलीफदायक जेलों में खुशी-खुशी रहने और आजादी के लिए संघर्ष करने से कभी भी पीछे न हटे। ‘स्वराज’ के कुल आठ संपादक हुए। अपने अखबार में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का संदेश देने वाले इन सभी संपादकों को कुल मिलाकर 95 वर्ष की कठोर सज़ा अंग्रेजों ने दी। अंधे-बहरे जुल्मी अंग्रेजों के कानों तक अक्षरों के बारूदों के धमाकों को पहुंचाने के लिए और भी कई अखबार और पत्रकार, संपादक अपनी जान हथेली पर लेकर चला करते थे। जालिम अंग्रेज एक अखबार को बंद करवाते तो तीन-चार और अखबार फौरन छपने लगते। अपने देश की पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास से प्रभावित होकर ही ‘राष्ट्र पत्रिका’ का प्रकाशन महाराष्ट्र की सांस्कृतिक नगरी नागपुर से प्रारंभ किया गया। हमें दूसरों से कोई लेना-देना नहीं। समाचार पत्र हमारे लिए तेल, साबुन, कुर्सी, मेज, जूता, चाकू, तलवार जैसा बेचने का सामान नहीं, बल्कि देशवासियों तक बेखौफ होकर खबरें और जनहित लेख, जानकारियां पहुंचाने का सशक्त माध्यम है। सिर्फ विरोध की पत्रकारिता करने के लिए ‘राष्ट्र पत्रिका’ का प्रकाशन नहीं किया जाता। यदि सरकार अच्छे कार्य करती है तो खुलकर तारीफ तथा गलत राह पर चलने पर आलोचना करने से हम कतई नहीं घबराते। हिंदू-मुसलमान का राग अलापने की बजाय आपसी सद्भाव बढ़ाने का प्रारंभ से ही हमारा लक्ष्य और कर्तव्य रहा है। देश विरोधी ताकतों की अनदेखी करना और अपराधियों का महिमामंडन ‘राष्ट्र पत्रिका’ में किसी भी हाल में संभव नहीं। सनसनी फैलाने वाली खबरों से दूरी बनाये रखने के लिए हम कटिबद्ध हैं। हमें जितनी अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चिंता है उतनी ही दूसरों की भी है। 

आज हम सब देशवासी अमृत महोत्सव मना रहे हैं। भारतवर्ष के शीर्ष पत्रकार, संपादक और चिंतक डॉ. संजय द्विवेदी के इस कथन से भला कौन सहमत नहीं होगा, ‘भारत के समक्ष अपनी एकता को बचाये रखने के लिए एक ही मंत्र है, सबसे पहले राष्ट्र। विरोधी ताकतें तोड़ने के सूत्र खोज रही हैं, लेकिन हमें हर हाल में समाज को जोड़ने के सूत्र खोजने होंगे।’ सत्य की पत्रकारिता का सफर कभी भी नहीं थमता। अभी तो हमने चलना प्रारंभ किया है। हमें बिना थके बहुत लम्बी यात्रा तय करनी है। इस ऊबड़-खाबड़ सफर में जब आप सब हमारे साथ हैं तो भय और चिंता कैसी? श्रमिक दिवस और ‘राष्ट्र पत्रिका’ की वर्षगांठ पर सभी पाठकों, संवाददाताओं, लेखकों, एजेंट बंधुओं, बुक स्टॉल संचालकों, विज्ञापन दाताओं एवं सभी शुभचिंतकों को बार-बार धन्यवाद, शुभकामनाएं और अपार बधाई।

Thursday, April 27, 2023

शोहरत पाने की कैसी ललक?

    फटाफट शोहरत पाने के लिए अपहरण, हफ्ता वसूली, हत्याएं, आतंक, लूटमारी और नशे का सैलाब। अपराधियों की उम्र मात्र पन्द्रह से बीस-बाइस साल। इस उम्र में तो उनके हाथ में कापी और किताबें होनी चाहिए। तो फिर इस अनहोनी के लिए कौन हैं असली कसूरवार? और कड़ी से कड़ी सज़ा के भी हकदार...। एक होटल के मालिक को बीते दिनों एक पर्ची मिली, जिसमें लिखा था कि यदि तुमने शीघ्र एक करोड़ रुपये नहीं पहुंचाए तो तुम्हें गोलियों से भून दिया जाएगा। और हां, पुलिस के पास जाने की चालाकी की तो तुम्हारा वो अंजाम होगा, जिसे तुम्हारी कई पीढ़ियां याद रखेंगी। होटल मालिक ने इस पर्ची को नजरअंदाज करना बेहतर समझा। ऐसी धमकियों-चमकियों का आना उनके लिए रोजमर्रा की बात हो चुकी थी। कुछ दिन बाद उनके मोबाइल की फिर घंटी बजी और धमकी भरे अंदाज में कहा गया कि, ‘मैं लारेंस विश्नोई बोल रहा हूं। लगता है तुम पर कुछ ज्यादा ही चर्बी चढ़ गई है। तुमने हमारे खासमखास रोहित गोदारा को कोई चिल्लर गुंडा बदमाश समझ लिया है। तुम्हें पता तो होगा ही मैं बहुत से लोगों को टपका चुका हूं। पंजाब के नामी गायक सिद्धू मुसेवाला को सरेराह टपकाने की खबर तुम ने भी जरूर सुनी होगी। अगर तुम्हें अपनी जान प्यारी है तो वही करो जो तुम से करने के लिए कहा गया है।’ गैंगस्टर विश्नोई तिहाड़ जेल में कैद है। रोहित गोदारा फिलहाल यूरोप में रहता है। उसी ने होटल मालिक को मोबाइल कर खुद को विश्नोई बता कर दहशत का जाल फेंका था। होटल मालिक के अब तो होश उड़ने ही थे। उनके रात-दिन खौफ में कटने लगे। नींद पूरी तरह से छिन गई। देश में ऐसे कई हत्यारे, माफिया हैं, जो खुद तो पर्दे में रहते हैं, लेकिन उनके गुर्गे रईसों को धमका-चमका कर मनचाही वसूली करते रहते हैं। महाराष्ट्र की आर्थिक नगरी, जिसे मायानगरी भी कहा जाता है, वहां पर बीते दौर में माफिया डॉन दाऊद इब्राहिम, अरुण गवली जैसे का ऐसा आतंक था कि बिल्डर, उद्योगपति, फिल्म निर्माता, फिल्म स्टार आदि उनका इशारा पाते ही नोटों की गड्डियां पहुंचा देते थे। बिहार और उत्तर प्रदेश में धन वसूलने के लिए अपहरण तथा हत्याओं का सिलसिला भी सभी ने देखा है। रेतीला प्रदेश राजस्थान इस रोग से दूर था, लेकिन अब इसने वहां पर महामारी की शक्ल अख्तियार कर ली है। यहां पर जबरन धन वसूली और फिरौती वसूलने वाले नये-नये गिरोह सामने आ रहे हैं। कुछ दिन पूर्व पुलिस ने किसी नाइट क्लब में गोलीबारी करने वाले तीन अपराधियों को गिरफ्तार किया। उनके बारे में अखबारों तथा मुंहजुबानी यह धुआंधार प्रचार किया गया था कि यह खूंखार अपराधी हैं, जबकि हकीकत में तीनों नाबालिग हैं। उनमें से एक डीजे चलाता था, जिसकी उम्र मात्र पंद्रह वर्ष है। गलत संगत में छोटी-सी उम्र में ही वह भटक गया। दूसरा सोलह साल का है, जिसने 11वीं तक पढ़ाई करने के बाद सरकारी नौकरी की तलाश में भटकते-भटकते अपराध की राह पकड़ ली। तीसरे के चेहरे-मोहरे में मासूमियत टपकती है, लेकिन उसके कारनामें अत्यंत क्रूर हैं। बहुत ही छोटी उम्र में बड़े-बड़े अपराध कर गुजरने वाला रोहित गोदारा दाऊद को अपना गुरू मानता है। अनेक युवा उसे अपना आदर्श मानते हैं। उसी की तरह खून-खराबा शोहरत कर आसमान को छूना चाहते हैं। रोहित के माता-पिता को अपने अपराधी बेटे के नाम से ही नफरत हो गई है। वे उसे जन्म देने के अपराध में दिन-रात घुटते रहते हैं। रोहित के गरीब किसान पिता को उसकी करनी का फल भुगतना पड़ रहा है। बुढ़ापे में भी थानों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। कभी जो लोग इज्जत करते थे उन्होंने दूरियां बना ली हैं। रोहित जब पैदा हुआ था तब उन्होंने मिठाई बांटी थी। सीधे और सरल पिता ने बेटे के साधु-संत बनने की कामना की थी। इसलिए उसका नाम रावतदास स्वामी रखा था। संतों जैसे नाम वाले बेटे के कुख्यात अपराधी बनने पर पिता की रातों की नींद उड़ चुकी है। खाकी वर्दी वालों ने भी कह दिया है अपने इस बेटे को अब मरा समझ लो। जब भी वह भारत लौटेगा तो गोलियों से भून दिया जाएगा। 

    कुख्यात हत्यारे, लुटेरे, माफिया और नेता अतीक अहमद के जिस बेटे असद को पुलिस ने गोलियों से भून कर मौत की नींद सुलाया उसकी पैदाइश 2003 की थी। जब उसे ढेर किया गया तब वह मात्र 19 साल का था। अपने बेटे असद को अपने पदचिन्हों पर चलाने के लिए अतीक अहमद ने उसके बचपन से तरह-तरह कोशिशें प्रारंभ कर दी थीं। जिस उम्र में बच्चे खिलौने से खेलते हैं असद हथियारों से खेलने लगा था। अपराधी पिता को शादी-ब्याह में अपने नादान मासूम बेटे से हवाई फायरिंग करवाने में बड़ी खुशी तथा तसल्ली मिलती थी। उसका भरोसा मजबूत होता था कि यह बेटा उसकी विरासत को दमखम के साथ आगे ले जाएगा। असद की स्कूली पढ़ाई लखनऊ के एक स्कूल में पूरी हुई। उसकी वकील बनने की प्रबल चाहत थी। इसके लिए उसे विदेश जाना था। यह भी सच है कि बड़ा वकील बनकर उसे न्याय के पथ पर नहीं चलना था। उसे अपने बाप के फिरौती, लूटमार, हेराफेरी, राजनीतिक डकैती से खड़े किये गए खरबों के साम्राज्य को बचाना और बढ़ाना था। पुलिस सत्यापन में निगेटिव रिपोर्ट आने के कारण पासपोर्ट नहीं बना। बेटे के काला कोट नहीं पहन पाने के सपने के धराशायी होने पर अतीक को बड़ा झटका लगा था। फरवरी के अंत में राजू पाल मर्डर केस के गवाह और दो पुलिस कर्मियों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस हत्याकांड में अतीक और उसके बेटे असद के साथ-साथ अशरफ और सात अन्य लोग आरोपी थे। घटना के तुरंत बाद उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बड़े तीखे अंदाज में माफिया को मिट्टी में मिला देने की घोषणा की थी। अप्रैल का तीसरा हफ्ता आते-आते छह लोग मिट्टी में मिला दिये गए। उमेश पाल पर गोली चलाने वालों में सात की पहचान हुई थी, जिसमें से असद अहमद सहित चार लोगों को पुलिस ने मुठभेड़ में ढेर कर दिया। अतीक व अशरफ को तीन शूटरों ने तब मार गिराया, जब वे पुलिस हिरासत में थे। आत्म समर्पण करने के बाद तीनों हत्यारों ने कहा कि, अपराध जगत में विख्यात होने के लिए उन्होंने इन दुर्दांत अपराधियों को कुत्ते की नींद सुलाया है। कई छोटे-मोटे अपराधों में हाथ आजमा चुके इन हत्यारों की उम्र भी ज्यादा नहीं है। अतीक अहमद और उसके भाई की तो एक न एक दिन कुत्ते की मौत होनी ही थी। अतीक की पत्नी शाइस्ता परवीन भी कानून से भाग रही है। बेटे, पति और देवर के मरने के बाद भी उसने सामने आने की हिम्मत नहीं दिखाई। अपराधियों का जीवन ऐसे ही गुजरता है। उन्हें कब पछतावा होता होगा, कौन जानें, लेकिन ऐसा जीना, जीना तो नहीं। कम-अज़-कम उन्हें जरूर सबक लेना चाहिए, जिन्हें लगता है कि अपराध की राह पकड़ कर सुख-शांति से रह लेंगे...।

Thursday, April 20, 2023

सोशल मीडिया के सबल पक्ष की एक झलक

    इंटरनेट की विशालतम दुनिया में सोशल मीडिया एक ऐसा मंच बन चुका है, जिसने हर उम्र के लोगों को अपने मोहपाश में जकड़ लिया है। आज की आपाधापी में अधिकांश लोगों के पास इतना वक्त नहीं कि वे मोटी-मोटी किताबें पढ़ सकें। अखबार और पत्रिकाएं भी हर जगह सुलभ नहीं। सिनेमा हॉल में जाकर फिल्में देखने की भी लोगों में पहले-सी अभिरूचि या फिर वक्त नहीं। लगभग हर हाथ में स्मार्टफोन है, जो अच्छी-बुरी खबरों से फटाफट मिलवा रहा है। किस्म-किस्म की शेर-ओ शायरी के साथ-साथ स्तब्ध, जागृत और भावुक कर देने वाले शब्द-संसार से अवगत करा रहा है। नये-नये लेखक और विचारक सामने आ रहे हैं। यहां पर एक से एक विद्वानों के अनुभवों, विचारों, सुझावों, लेखांशों, कविताओं, गजलों का भी अद्भुत खजाना भरा पड़ा है, जिन्हें पढ़े-समझे बिना मन नहीं मानता। गंदी राजनीति तथा भाई-चारे के दुश्मनों ने भले ही सोशल मीडिया को अपना औजार बना लिया हो, लेकिन यह कहना और मानना कहीं भी गलत या अतिश्योक्ति नहीं कि सोशल मीडिया सकारात्मक विचार-सोच को बलवति बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है। अपने नाम-काम की चाह से मुक्त दिन-रात एक से एक अद्भुत रोचक जानकारियों और सुलगते विचारों को फैलाते मानवता के हितैषियों को इस कलम का सलाम...।

* एक कुम्हार जब घड़ा बनाता है तो घड़े के 

बाहरी भाग को तेजी से थपथपाता है, लेकिन 

भीतरी भाग को प्यार से सहलाता है। 

आप भी सुंदर और मजबूत 

इंसान बनेंगे, अपने कुम्हार

पर भरोसा रखिए, वह हमें 

टूटने नहीं देगा। 

अगर आपका कुछ जलाने का मन करे 

तो अपना क्रोध जला देना।

* क्यों न खुशी से जीने के बहाने ढूंढे,

गम तो किसी भी बहाने मिल जाता है...

* मनुष्य जन्म लेता है, बिना मुहुर्त के और बगैर 

मुहुर्त के देह त्याग देता है! 

लेकिन, सारी उम्र शुभ मुहुर्त के पीछे 

भागता रहता है!

* सबसे बड़ा मूर्ख तो वो है, 

जो एक पत्थर से 

दोबारा चोट खाये।

* जूते-चप्पल भले पहने रहें, पर

जात-पात 

धार्मिक भेदभाव 

ऊंच-नीच 

छुआ-छूत 

लिंग भेद 

जैसी मानसिकताएं कृपया यहीं उतार दें, 

स्वागत है...। 

(हर घर के दरवाजे पर 

यह पोस्टर होना चाहिए।)

* जब जेब में हैं पैसे 

लोग पूछते हैं, 

आप हैं कैसे? 

जब हो जाओगे आप 

कंगाल 

तो कोई नहीं पूछने आएगा 

क्या है आपका हाल?

* याद रखें... 

सारा ज्ञान किताबों से 

नहीं मिलता। 

कुछ ज्ञान 

मतलबी लोगों 

से भी 

मिलता है...।

* जमाने में आये हो तो जीने का भी हुनर रखना...

दुश्मनों से कोई खतरा नहीं, बस अपनों पर नज़र रखना। 

* अपने काम और कर्तव्य के प्रति 

अगर आपको लगाव नहीं है 

तो आप कभी भी 

सफल नहीं हो सकते।

* ज़रा-सा ऊपर उठने को 

न जाने कितना गिर जाते हैं लोग 

पर नजरों से गिरकर कोई 

कहां उठ पाया है 

यह अक्सर भूल जाते हैं लोग।

* अदाकारी नहीं करते, 

मक्कारी नहीं करते। 

जिन्हें मेहनत से है मतलब, 

वो मक्कारी नहीं करते।

* जब पढ़े-लिखे लोग भी 

गलत बातों का समर्थन 

करने लगें तो यह समाज 

की सबसे बड़ी समस्या है। 

(डॉ. भीमराव आंबेडकर)

* तुम्हारा खुद का मन ही तुम्हारी 

नहीं सुनता और तुम निकल 

पड़ते हो दूसरों को नसीहत देने के लिए। 

(ओशो) 

* बात 

करने से ही 

बात बनती है, 

बात न करने से 

अक्सर 

बातें बनती हैं।

* खुशी का पहला... 

उपाय... 

पुरानी बातों को

ज्यादा न सोचा जाए। 

* सच कड़वा नहीं

होता है, बल्कि

हमारी जीभ को

मीठे झूठ की

लत लग गई है...

* किसी ने पूछा 

कि प्यार क्या है

हमने कहा

प्यार तो वो है

जो हद में रहकर

बेहद हो जाए...।

* आपकी अच्छाइयां,

भले ही अदृश्य

हो सकती हैं,

लेकिन

इसकी छाप हमेशा

दूसरों के हृदय में

विराजमान रहती है

* रिश्तों के बाजार में थोड़ा 

सोच समझकर रहना जनाब

यहां लोग वफादार कम,

अदाकार ज्यादा हो गए हैं।

* बुरे साथी के साथ बैठकर 

आप बुरे नहीं हो सकते, लेकिन

आप दागी जरूर

हो जाएंगे। इससे

साफ पता चलता है कि

संगत का भी प्रभाव पड़ता है।

* हाथों ने पैरों से पूछा

सब तुम्हें ही प्रणाम

करते हैं,

मुझे क्यों नहीं,

पैर बोला, उसके लिए

जमीन पर रहना

पड़ता है,

हवा में नहीं।

* अगर नशा करना है तो

मेहनत का करें

यकीन मानें,

बीमारी भी

सफलता वाली ही आएगी।

* मुकम्मल कहां हुई

जिन्दगी किसी की

आदमी कुछ खोता ही रहा

कुछ पाने के लिए।

* बुरे वक्त में कंधे पर रखा

गया हाथ कामयाबी पर बजायी

तालियों से ज्यादा

कीमती होता है।

* कामयाबी का बीज

हर किसी के अंदर

मौजूद है, बस

मेहनत और ज्ञान

से उसे

सीचना पड़ता है।

* इंसान कितना ही अमीर क्यों

न बन जाए...

तकलीफ बेच नहीं सकता

और सुकून खरीद नहीं सकता...

* फितूर होता है, हर उम्र में जुदा...

खिलौने, माशूका, रूतबा...

फिर खुदा...

* मेरे पास वक्त नहीं है, 

नफरत करने का उन लोगों से

जो मुझसे नफरत करते हैं...

क्योंकि मैं व्यस्त हूं

उन लोगों में 

जो मुझसे प्यार करते हैं।

* हमारी आखिरी उम्मीद

हम खुद हैं...

और जब तक हम हैं,

उम्मीद कायम है।

* आया था कोई 

पत्थरों के पास 

उन्हें देखा, 

और बोला 

मनुष्य बनो। 

पत्थरों ने भी देखा उसे 

और उसे दिया उत्तर 

हम नहीं हो पाये 

उतने अभी कठोर। 

(जर्मन कवि एरिक फ्रायड की लघु कविता)

मेरे दोस्त...

तुम कहा करते थे -

कि दुनिया इसलिए बची है

क्योंकि दुनिया में आज भी कुछ ईमानदार

बचे हुए है...

तो बुरा मत मानना मेरे दोस्त 

यह तुम्हारा भ्रम नहीं

अंधविश्वास था।

मेरे दोस्त...

ईमानदार तो आज खुद को भी नहीं

बचा सकते

बेचारे दुनिया को 

क्या बचाएंगे?

(चंद्र विद की छोटी कविता)

अंत में...

* थोड़े ठंडे दिमाग से सोचियेगा-गलती सबकी है। जिस फूलपुर सीट से कभी जवाहरलाल नेहरू चुनाव जीतते थे, वहां से जनता ने अतीक अहमद को चुना।

    जिन घरों की दीवारों पर गांधी, नेहरू, लोहिया, जयप्रकाश मौलाना, बाबा साहब जैसों की तस्वीरें सजती थीं, उन घरों में अब क्या है, सब जानते हैं। जिन फिल्मों में ‘न हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा’ जैसे गाने बजते थे, वहां भेजे में गोली मारी गई। एनकाउंटर स्पेशलिस्ट यानी हत्यारे को हीरो बनाया गया। सबने देखा, तालियां बजाईं। सवाल करने वालों को पुरातनपंथी कहा जाता है। पहले राजनीति का अपराधीकरण हुआ फिर अपराध का राजनीतिकरण। अपने धर्म जाति के गुंडे हीरो बने। किसने बनाये? सोचियेगा। सोचियेगा... कुछ मुझे सूझ रहा है। कुछ आपको सूझेगा। शायद कहीं बात पहुंचे।... वरना एक गुंडा मरेगा दूसरा पैदा होगा... होता रहेगा।

Thursday, April 13, 2023

पुरस्कार-तिरस्कार

    अन्न, पानी और हवा के बिना जीवन नहीं चलता। स्वास्थ्य, शिक्षा और धन का होना भी नितांत जरूरी है। इन सभी जरूरतों के पूरा होने के पश्चात भी इंसान का मन नहीं भरता। उसका बस चले तो वह क्या न कर दे। प्रशंसा, मान-सम्मान और नाम की भूख सदैव उसे बेचैन किए रहती है। उसे यह भी पता है कि प्रतिभावान अपने आप इज्जत पाते हैं। उन्हें कोई जोड़-जुगाड़ नहीं करना पड़ता, लेकिन पुरस्कार की भूख में पगलाये कुछ चेहरे खुद को महान मानते हुए दूसरों की आंख में धूल झोंकने में लगे रहते हैं। खूब हवा में उड़ते रहते हैं। जब कुछ हाथ नहीं लगता तो ईर्ष्या की भट्टी बन सुलगने लगते हैं। कहावत यह भी है कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। सच पर डाला गया पर्दा एक न एक दिन हटता या फटता ही है। नकली नोट ज्यादा दिन तक बाजार में नहीं चल पाते। असली नोट ही तिजोरियों में जगह पाते हैं और मेहनतकशों की इज्जत को बढ़ाते हैं। यही सच इंसानों पर भी चरितार्थ होता है। वास्तविक, विद्धानों, चरित्रवानों, मेहनतकशों और परोपकारियों का हर जगह सम्मान होता है। सच्चे समाजसेवक, नेता, अभिनेता, साहित्यकार, चित्रकार, पत्रकार, संपादक, उद्योगपति आदि को मान-सम्मान तथा प्रशंसा के लिए भटकना नहीं पड़ता। उनके कद्रदान उनकी शिनाख्त कर उन तक पहुंच ही जाते हैं। 

    विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाली शख्सियतों की मानवंदना करने वाली देशभर में ढेरों संस्थाएं हैं। समाज, शहर, प्रदेश और देश के दूरदर्शी पारखियों के द्वारा पुरस्कृत, सम्मानित करने की परिपाटी की नींव रखने का यकीनन यही ध्येय रहा होगा कि अंधेरे से लड़कर रोशनी फैलाने वाली हस्तियों के बारे में दूसरों को भी पता चले। वे उनसे प्रेरित हों। हर पुरस्कार और सम्मान में प्राप्तकर्ता के प्रति श्रद्धा और आस्था के साथ यह संदेश भी होता है कि उसे और कर्मठ होना है। उन सभी आशाओं और उम्मीदों पर पूरी तरह से सतत खरा उतरते रहना है, जो उससे लगाई गई हैं। अब तो न्यूज चैनल तथा नामी-गिरामी धनवान अखबार मालिकों ने भी विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को पुरस्कृत करना प्रारंभ कर दिया है, लेकिन यह सच भी अपनी जगह विराजमान है कि इनके पुरस्कृत करने का अपना-अपना स्वार्थ और तरीका है। अधिकांश चैनलों तथा अखबार मालिकों के कर्ताधर्ता अपने मनपसंद चेहरों को ढोल-नगाड़े बजाते हुए मंचों पर बिठाने के साथ-साथ पुरस्कृत करने का शानदार अभिनय करते हैं। इनके प्रायोजित भव्य कार्यक्रमों में शामिल होते हैं बड़े-बड़े उद्योगपति, नेता, चलते-फिरते समाज सेवक, अभिनेता और मंत्री-संत्री। यहां तक की केंद्रीय मंत्रियों तथा मुख्यमंत्रियों को भी सम्मानित करने परंपरा चला दी गई है। बड़े-बड़े मीडियावाले संबंध बनाने और मोटे विज्ञापन पाने के लिए एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने पर उतर आये हैं। 

    भारत सरकार के द्वारा प्रतिवर्ष भारतीय नागरिकों को उनकी विशेष उपलब्धियों और उल्लेखनीय कार्यों के लिए प्रदत्त किये जाने वाले पद्म पुरस्कारों को लेकर भी कई तरह की बातें और शंकाएं व्यक्त की जाती रही हैं। अभी हाल ही में भारत वर्ष की माननीय राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने जिन हस्तियों को पद्म सम्मानों से विभुषित किया उन्हीं में कर्नाटक के बिदरी शिल्प के कलाकार शाह रशीद अहमद कादरी का भी समावेश है। पद्मश्री सम्मान समारोह के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह सभी सम्मानितो से मिले और बधाई तथा शुभकामनाएं दीं। मंजे हुए खिलाड़ी, सिद्धहस्त कलाकार कादरी ने प्रधानमंत्री के समक्ष नतमस्तक होकर अपने दिल की बात कहने में देरी नहीं लगाई, ‘मैंने तो कभी सोचा ही नहीं था कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार मुझे इस गौरवशाली सम्मान के लायक समझेगी। मैंने इस पद्म अवार्ड के लिए निरंतर दस साल हाथ पैर मारे। हर साल अपनी प्रोफाइल बनाने में 12 हजार रुपये की आहूति दी, लेकिन अंतत: निराशा ही हाथ लगी। केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद तो यह सोचकर मैंने प्रोफाइल बनानी ही छोड़ दी कि, जब मुसलमानों की हितैषी कही जाने वाली कांग्रेस सरकार ने मेरी कद्र नहीं की तो उस भाजपा से क्यों उम्मीद रखना, जिसे मुसलमानों का कट्टर शत्रु माना जाता है, लेकिन घोर आश्चर्य... मेरी पूर्वाग्रह से ओतप्रोत सोच को मोदी सरकार ने पूरी तरह से गलत साबित कर दिया है। पद्मश्री कादरी इतने गदगद हुए कि उन्होंने तमाम न्यूज चैनलों पर यह कहने में जरा भी देरी नहीं लगायी अब तो कांग्रेस से मेरा हमेशा-हमेशा के लिए मोहभंग हो गया है। भाजपा ही मेरी माई-बाप है। मेरे साथ-साथ मेरे स्वजनों के वोट भाजपा के लिए पक्के हो गए हैं। अब मेरी दिली तमन्ना है कि पूरे देश और दुनिया में सिर्फ नरेंद्र मोदी की ही जय-जयकार हो।  

    सरकारें भी साहित्यकारों तथा पत्रकारों को भी समय-समय पर पुरस्कृत करती रहती हैं। बात जब साहित्य की होती है तो यह जान लेना भी अत्यंत आवश्यक है कि अच्छे अनुभवी, संस्कारित लेखकों के अभाव के चलते पाठकों ने भी पढ़ने-पढ़ाने से दूरी बनानी प्रारंभ कर दी है। फिर भी अपने यहां हर वर्ष असंख्य नई-नई पुस्तकों का प्रकाशन होता है। अधिकांश कविता संग्रह, गीत संग्रह, गजल संग्रह, निबंध संग्रह, कहानी संग्रह छपवाने के लिए रचनाकारों को अपनी जेब ढीली करनी पड़ती हैं। आत्ममुग्ध लेखक-लेखिकाएं अपनी कृतियों को मित्रों, रिश्तेदारों को भेंट स्वरूप देकर गदगद होते रहते हैं यह भी सच है कि- मुफ्त में मिली किताबों को कोई नहीं पढ़ता। अंतत: रद्दी की टोकरी के हवाले हो जाती हैं। कुछ सुलझे हुए कवि, कहानीकार, उपन्यासकार हैं, जिनको प्रकाशक खुशी-खुशी छापते हैं। कुछ न कुछ रायल्टी भी देते रहते हैं। प्रशंसा पाने को लालायित कुछेक रचनाकार पुरस्कार के लिए पगलाये रहते हैं। देशभर में जहां-तहां फैली कई संस्थाएं हैं, जो उन्हें पुरस्कार देकर खुश करती रहती हैं। इनमें से कुछ ईमानदारी से नवाजती हैं तो कुछ लेन-देन से बाज नहीं आतीं। अब तो देश के प्रकाशक गुलशन नंदा, वेदप्रकाश शर्मा, प्रेम वाजपेयी, परशुराम शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक, केशव पंडित आदि की पुरानी किताबों को धड़ाधड़ छापने और बेचने की तैयारी में हैं। यह वो कलमकार हैं, जिनपर लुगदी साहित्य रचने और प्रकाशित करवाने के आरोप लगा करते थे। फिर भी इनके पाठकों की संख्या लाखों में थी। ऐसे में अब उन लेखकों का क्या होगा, जिनसे धन लेकर मुश्किल से दो-तीन सौ पुस्तकें प्रकाशित की जाती हैं, जो पाठकों तक पहुंच ही नहीं पातीं हैं। ऐसा भी नहीं कि सभी लेखक बदकिस्मत हैं। अच्छी रचनाओं को पढ़ने वाले पाठक आज भी हैं। भले ही यह राग अलापा जाता रहे कि छपे शब्दों की कोई कीमत नहीं रही। सोशल मीडिया ने सब कबाड़ा कर दिया है। कुछ लेखक अपनी ऐसी-वैसी पुस्तकें धड़ाधड़ छपवाते ही इसलिए हैं कि उन्हें कोई न कोई सरकारी पुरस्कार मिल जाए। लेकिन, जब उनकी मंशा पूरी नहीं होती तो पुरस्कृत होने वाली हस्तियों के बारे में ऊल-जलूल बकवास करते हुए ईर्ष्या की आग की भट्टी में जलने लगते हैं। विद्वान चयनकर्ताओं पर भेदभाव और पक्षपात के आरोपों की झड़ी लगाने वालों को इस बात की भी चिंता नहीं रहती कि अपनी बेहूदा अमर्यादित भड़ास की वजह से वे हंसी का पात्र बनते हुए खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं।

Thursday, April 6, 2023

गुनाह की खौफनाक लकीर

    कई बार पढ़ा और सुना है। खुद देखा और अच्छी तरह से महसूसा भी है। पिता और बेटी के पवित्र रिश्ते को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। इतनी बड़ी सृष्टि में जन्म लेने के बाद बेटियां सिर्फ पिता के ही करीब होती हैं। बचपन में उन्हें अपने जन्मदाता की गोद में ही सुकून मिलता है। पिता की निकटता उनके लिए हर तरह की सुरक्षा का आश्वासन होती है। पिता को भी बेटी को अपनी पलकों में बिठाए रखने में जो खुशी मिलती है उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मनोवैज्ञानिक तो यह भी कहते हैं कि पिता ही बेटी का पहला ऐसा नायक और सच्चा मित्र होता है, जो कभी भी नहीं बदलता। बेटियां चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाएं, लेकिन पिता के प्रति उनका यकीन अटल रहता है कि उनका यह ताकतवर आदर्श हीरो उन्हें हर संकट से बचा ले जाएगा। दरअसल, माता-पिता अपने बच्चों की सिर्फ परवरिश ही नहीं करते, उन्हें बेहतर संस्कार देने में भी कोई कमी नहीं करते। उन्हें सतत सही और गलत से अवगत कराते रहते हैं। 

    यह जगजाहिर सच है कि बच्चों को पालने-पोसने में मां की अहम भूमिका होती है। बेटियों का भले ही शुरू से ही पिता के प्रति लगाव और झुकाव रहता है, लेकिन इससे उदार माताओं को कोई आपत्ति नहीं होती। बेटे उनकी इस कमी को पूरा कर ही देते हैं। सच तो यह भी है कि मां और बेटी का रिश्ता भी बड़ा अनमोल तथा प्यारा होता है। मां-बाप को यदि मैं ऐसी रेलगाड़ी कहूं, जो अपनी संतानों को अपनी अंतिम सांस तक सुरक्षित यात्रा करवाते हैं तो गलत नहीं होगा। यह मां-बाप ही हैं, जो बच्चों के लिए कोई भी कुर्बानी देने को हमेशा तत्पर रहते हैं। ऐसे में ऐसा सच...! ऐसी भयावह खबरें? 

    महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में अपनी ही मासूम अबोध बच्ची से दुष्कर्म कर उसको मौत के घाट उतारने वाले हत्यारे पिता को 20 साल की कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई है। विशेष सत्र न्यायालय के न्यायाधीश को भी जन्मदाता के इस निर्दयी, राक्षसी अपराध ने झिंझोड़ कर रख दिया। फैसला सुनाते वक्त उनके पूरे बदन में कंपकपी-सी छूटने लगी। अपनी जन्मदाता की अंधी वासना की शिकार हुई मात्र पांच साल की बच्ची के दादा-दादी एक शादी समारोह में शामिल होने के लिए शहर से बाहर गये थे। घर में मां, बड़ा भाई और यह नराधम बाप था, जिसने काफी शराब चढ़ा रखी थी। रोज की तरह नशे में उसने पत्नी को अंधाधुुंध मारा-पीटा। बच्चे रोते-गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन शैतान की गंदी जुबान और हाथ चलते रहे। लिहाजा त्रस्त मां को हमेशा की तरह पड़ोसी के घर शरण लेनी पड़ी। उसके बाद रात करीब 12 बजे जब राक्षस का नशा कुछ कम हुआ तो वह पत्नी और बच्चों को मनाने के लिए पड़ोसी के घर जा पहुंचा, लेकिन पत्नी ने वापस आने से इनकार कर दिया। उसे बड़ा गुस्सा आया। गुस्से-गुस्से में उसने बच्ची को उठाया और घर ले आया। पत्नी पहले तो जैसे-तैसे मान जाती थी, लेकिन इस बार उसके नहीं लौटने की जिद ने उसे गहन संशय और अचम्भे में डाल दिया। इसका कहीं न कहीं किसी के साथ जरूर कोई चक्कर चल रहा है। साली मुझे बेवकूफ समझती है। कुछ देर तक उसने उसकी राह देखी, लेकिन जब वह नहीं लौटी तो गुस्से के साथ-साथ उस पर वासना का भूत सवार हो गया। मासूम बच्ची पिता का यह अकल्पनीय शैतानी रूप देखकर चीखती-चिल्लाती रही, लेकिन बेखौफ जानवर ने उस पर नृशंस बलात्कार कर ही डाला। अगले दिन की सुबह मां ने जब बच्ची को बेसुध हालत में लहूलुहान फर्श पर पड़े देखा तो वह उसे डॉक्टर के पास ले गई। डॉक्टर से भी बच्ची की हालत नहीं देखी गई। बलात्कारी पिता के पास कोई जवाब नहीं था। हालांकि उसने भटकाने की बहुतेरी कोशिशें कीं, लेकिन सच तो अपनी जगह पर कायम था...। 

    मेरठ में एक मां ने तंत्र-मंत्र और प्रेम प्रसंग के फेर में अपने दस साल के बेटे और छह साल की बेटी का खात्मा कर डाला। जननी की हवस और अंधविश्वास की बलि चढ़े दोनों मासूम अपनी मां को दिलो जान से चाहते थे। निशा नामक इस दुराचारिनी की छह साल की बेटी अक्सर डायरी में कुछ न कुछ लिखा करती थी। एक पन्ने पर उसने लिखा, माई मदर इज सो...सो... ब्युटीफुल। उसे कहां पता था कि मां के खूबसूरत चेहरे के पीछे एक और चेहरा छिपा है, जो बेहद क्रूर और घिनौना है। यह हत्यारिन जाने-अनजाने लोगों के कष्ट दूर करने के लिए दुआ कर उन्हें पानी देती थी। उसे यकीन था कि उसकी दुआ से लोगों की तकलीफें दूर होती हैं, उनके बिगड़े काम बन जाते हैं। मनचाही मुरादें भी पूरी हो जाती हैं। दूसरों के उपकार में अंधी हुई निशा के मन में किसी ने यह बात बिठा दी थी कि अगर वह अपने बच्चों की बलि दे देगी तो उसकी रूहानी ताकत में और भी जबरदस्त इजाफा हो जाएगा। उसके दुआओं वाले पानी को पाने के लिए दूर-दूर से लोग आएंगे और चारों तरफ उसके नाम का डंका बजने लगेगा। अंधी वासना के दलदल में धंस कर मां के ममत्व को कलंकित करने वाली निशा को अदालत क्या सज़ा देगी यह तो आने वाला वक्त बतायेगा, लेकिन उसके पति ने कब्रिस्तान में ही तीन तलाक बोल कर उसे हमेशा-हमेशा के लिए अपनी जिन्दगी से दूर कर दिया है। पति के इस निर्णय से वहां पर मौजूद सभी लोग सन्न रह गए। कब्रिस्तान में तलाक बोलने का शायद यह पहला मामला हो सकता है। अमूमन देखा और सुना जाता है कि संगीन से संगीन अपराधी को बचाने के लिए परिजन पूरी तरह से अंधे हो जाते हैं। उन्हें उसके अपराध की जानकारी तो होती है, लेकिन वे उसे बचाने के लिए मजबूत कवच बन एकजुट हो जाते हैं। लेकिन कातिल निशा के मायके वालों का गुस्सा तो ऐसा फूटा कि उन्होंने उससे हमेशा-हमेशा के लिए नाता तोड़ने का ऐलान कर दिया। सभी ने एक स्वर में यही कहा कि, हम इसकी कोई मदद नहीं करेंगे। निशा के भाई ने उसके मुंह पर थूकते हुए कहा कि सरकार तुरंत इसे फांसी की सजा सुना दे तो मैं खुद इसे फांसी पर लटकाऊंगा। मुझे जल्लाद बनने में कोई हिचक नहीं होगी।

Thursday, March 30, 2023

महामानव का अवसान

    कोरोना की महामारी ने ऐसे-ऐसे महामानवों को अपना निवाला बनाया, जिनका अनेकों लोग अनुसरण करते थे। उनके क्रियाकलापों, संकल्पों, सद्भाव और मानवता से अपार जुड़ाव के निस्वार्थ भाव से बार-बार प्रेरित होते थे। उन्हीं में से एक थे श्री हरीश अड्यालकर। एक ऐसी हस्ती, जिनके व्यक्तित्व और कृतित्व को शब्दों की सीमा में नहीं बांधा जा सकता। एकदम सरल, सहज और मिलनसार। जो भी उनसे मिलता उन्हीं का होकर रह जाता। बीती 19 मार्च, 2023 की शाम नागपुर में अड्यालकर जी की जयंती पर अड्यालकर स्मृति विशेषांक का लोकापर्ण संपन्न हुआ, जिसमें शहर, प्रदेश तथा देश के दिग्गज नेता, साहित्यकार, पत्रकार और तमाम बुद्धिजीवी सम्मिलित हुए। इस गरिमामय स्मृति विशेषांक को पढ़ने के पश्चात पता चलता है कि उनके चाहने वालों की कितनी विस्तृत दुनिया थी। समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों के प्रति अपार समर्पण और निष्ठा रखने वाले श्री हरीश अड्यालकर जी के नाम से परिचित तो मैं बहुत पहले से था, लेकिन उनसे रूबरू मिलना हुआ था वर्ष 2002 में। इस यादगार मुलाकात के माध्यम बने थे देश के वरिष्ठ पत्रकार, संपादक श्री रमेश नैय्यर। आदरणीय श्री रमेश नैय्यर जी भी अब हमारे बीच नहीं रहे। बीते वर्ष अचानक उनका स्वर्गवास हो गया। किसी कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए वे रायपुर से नागपुर आये थे। उन्होंने मुझे पहले ही बता दिया था कि निर्धारित कार्यक्रम के समापन के पश्चात लोहिया अध्ययन केंद्र जाना है। डॉ. राम मनोहर लोहिया की प्रेरक समाजवादी सोच को जन-जन तक पहुंचाने के लिए लगभग साढ़े चार दशक पूर्व अड्यालकर जी ने नागपुर में लोहिया अध्ययन केंद्र की स्थापना की थी और अंतिम समय तक डॉ. लोहिया तथा महात्मा गांधी के सर्वधर्म समभाव के विचारों के प्रति समर्पित रहे। 1990 से पूर्व जब मैं छत्तीसगढ़ में था तब भी बिलासपुर तथा रायपुर के पत्रकार तथा साहित्यिक मित्र अड्यालकर जी की निस्वार्थ समाजसेवा तथा लोहिया अध्ययन केंद्र की चर्चा करते रहते थे। हमेशा ऊर्जावान, तरोताजा रहने वाले अड्यालकर जी अपने सिद्धांतों और उसूलों के बड़े पक्के थे। जो एक बार ठान लेते उसे पूरा करके ही दम लेते। डॉ. लोहिया की जन्म शताब्दी पर उन्होंने ‘लोहिया : तब और अब’ का प्रकाशन किया और सतत एक वर्ष तक देशभर के अतिथि विद्वानों को आमंत्रित किया। वे लोहिया अध्ययन केंद्र में सदैव ऐसे विद्वान वक्ताओं को आमंत्रित करते, जो वास्तव में निर्धारित विषय में जानकार होते थे। सच्चे समाजवादी रघु ठाकुर के प्रति उनके हृदय में जो स्नेह, सम्मान था वह भी देखते बनता था। रघु ठाकुर भी उनसे दिल से जुड़े थे। अड्यालकर जी के हिंदी प्रेम और सार्थक साहित्य के प्रति अपार लगाव का जीवंत उदाहरण है, ‘सामान्य जनसंदेश’ पत्रिका, जिसे उन्होंने आर्थिक संकटों को झेलते हुए भी निरंतर प्रकाशित किया। 

    दरअसल, अड्यालकर जी व्यक्ति नहीं, एक जीवंत संस्था थे। मैंने कई संस्थाओं को करीब से देखा और जाना है, जहां के संस्थापक, कर्ताधर्ता संस्था को अपनी जागीर समझते हैं। संस्था के मंच पर उन्हीं का एकाधिकार रहता है। अपने जान-पहचान वालों को निमंत्रित कर उनकी आरती गाने और गवाने का उन्हें जबरदस्त रोग होता है। उनका बस एक ही लक्ष्य होता है अपनी बनायी या हथियायी संस्था के माध्यम से अपनी तथा अपने चाटूकार मित्रों की छवि को चमकाना। अखबारों में बस अपनी ही फोटुएं तथा न्यूज छपवाकर उनकी एलबम बनाना। मंच से चिपके रहने की इनकी असाध्य बीमारी इन्हें हंसी का पात्र बनाती है, लेकिन छपास रोगियों को कभी कोई लज़्जा नहीं आती है। अड्यालकर जी तो लोहिया अध्ययन केंद्र के मंच से ही दूर रहते थे। अपनी वास्तविक प्रतिभा का लोहा मनवा चुके योग्यतम व्यक्ति को मंच पर आसीन करने में उन्हें अपार संतुष्टि और खुशी मिलती थी। वे सामने वाले का नाम, हैसियत और जैसे-तैसे पायी हवा-हवाई ऊंचाई को देखकर उसका मूल्यांकन नहीं करते थे। उन्होंने आसानी से किसी के प्रभाव में आना सीखा ही नहीं था। उनके द्वारा देशभर के ऐसे विद्वानों को लोहिया अध्ययन केंद्र में निमंत्रित किया जाता था, जो जोड़-तोड़ के धनी होने की बजाय वास्तव में प्रतिभावान हों। देश और प्रदेश के निष्पक्ष, सजग और निर्भीक पत्रकार तथा साहित्यकार स्वयं लोहिया अध्ययन केंद्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए लालायित रहते थे। उनके लिए यह केंद्र कभी किसी तीर्थ से कम नहीं रहा। नागपुर आने पर केंद्र तथा अड्यालकर जी से मिलना उनकी प्राथमिकता में शामिल होता था। स्थापित ही नहीं, नये पत्रकारों, कवियों, व्यंग्यकारों, कहानीकारों, समाजसेवकों को सम्मानित करने की उनमें अद्भुत लालसा रहती थी। उनका स्नेह और अपनत्व पाकर नये पत्रकार, लेखक, कवि खुद को खुशनसीब और सौभाग्यशाली मानते थे। उन्हीं में एक खुशनसीब मैं भी हूं, जिसे उनका भरपूर साथ, विश्वास और आशीर्वाद मिलता रहा।

    2018 में प्रकाशित मेरे कहानी संग्रह ‘चुप नहीं रहेंगी लड़कियां’ पर परिचर्चा आयोजित करने की उनकी जिद मुझे ताउम्र याद रहेगी। पुस्तक विमोचन तथा चर्चा के मामले में सुस्त तथा संकोची होने के कारण मैं टालमटोल करता चला आ रहा था। इसी दौरान एक दिन मुझे उनका फोन आया कि तुम्हारी कृति पर शनिवार, 23 नवंबर (2019) की शाम 5.30 बजे परिचर्चा एवं सम्मान का कार्यक्रम होने जा रहा है। देश के विख्यात साहित्यकार गिरीश पंकज रायपुर से विशेष रूप से पधार रहे हैं। पत्रकार मित्र टीकाराम शाहू ने जब मेरे हाथ में निमंत्रण पत्रिका थमायी तो स्तब्धता के साथ-साथ मेरे भीतर की नदी का पानी आंखों की कोरों तक उमड़ आया।

    कोरोना काल के दौरान उन्हें अपनी नवीन कृति ‘आईना तो देखो ज़रा’ जब भेंट स्वरूप सौंपी तो उन्होंने बधाई तथा शुभकामनाओं के साथ कहा कि कोरोना के खात्मे के फौरन बाद इस कृति पर भव्य कार्यक्रम आयोजित करेंगे। जिसमें दिल्ली से ‘दुनिया इन दिनों’ के यशस्वी संपादक सुधीर सक्सेना और रायपुर से वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार रमेश नैयर को जरूर बुलवायेंगे। तब उनसे बहुत देर तक इधर-उधर की बातें होती रहीं। उन्होंने मुझे ‘सामान्य जनसंदेश’ पत्रिका के कुछ पुराने अंकों के साथ श्रीरामवृक्ष बेनीपुरी तथा कुछ अन्य लेखकों की सात-आठ पुस्तकें भेंट स्वरूप दीं। स्पष्टवादी अड्यालकर जी का धन के प्रति कभी कोई मोह नहीं रहा। वे अक्सर कहते थे कि अवसरवादिता, जी-हजूरी और गुलामी कर जो सफलता मिलती है वह अस्थायी होती है। असली मज़ा तो अपनी मेहनत, ईमानदारी और दूरदर्शिता से पायी उपलब्धियों का होता है। 

    करनी और कथनी में सदैव एकरूपता रखने वाले इस महामानव को कई सम्मानों, पुरस्कारों से नवाजा गया। उन्हें जो भी सम्मान निधि भेंट स्वरूप प्रदान दी जाती थी उसे भी लोहिया अध्ययन केंद्र को समर्पित कर देते थे। तीन सितंबर 2020 की शाम कोरोना की चपेट में आने के कारण उनके निधन की खबर सुनी तो दिमाग सुन्न हो गया। दिल और दिमाग को हिला कर रख देने वाली इस अत्यंत दुखद खबर के दो दिन बाद ही उनके 52 वर्षीय पुत्र नितिन की भी कोरोना की वजह से हुई मौत पूरी तरह से अंतर्मन को थर्रा गयी। ईश्वर की इस निर्दयता ने मन को छलनी कर दिया। जो हमारे प्रेरणा स्त्रोत हों, जिनका स्नेह और साथ बल देता हो उन्हें एकाएक छीन लेना बेइंसाफी ही तो है। 

    ‘‘ईश्वर- हां... नहीं... तो।’’ लोहिया अध्ययन केंद्र में डॉ. सुधीर सक्सेना की इसी काव्यकृति के विमोचन और परिचर्चा कार्यक्रम में देश के विख्यात लेखक, समीक्षक ज्योतिश जोशी जी का विशेष रूप से दिल्ली से आगमन हुआ था। तभी उनका पहली बार अड्यालकर जी से रूबरू मिलना हुआ था। उनके जीवन चरित्र के बारे में जानकर जोशी जी तो उनके पूरी तरह से मुरीद हो गये थे। उन्होंने कहा था कि अड्यालकर जी किसी महाग्रंथ से कम नहीं। इसे हर उस देशवासी को पढ़ना और प्रेरित होना चाहिए, जिसे देश और समाज की चिंता है। दिल्ली पहुंचते ही उन्होंने दैनिक ‘जनसत्ता’ में सच्चे समाजवादी की जुनूनी संघर्ष गाथा पर विस्तार से लिखा था। स्पष्टवादी अड्यालकर जी मुखौटाधारियों को पहचानने की अद्भुत क्षमता रखते थे। विश्वासघाती तो उन्हें शूल की तरह चुभते थे। नागपुर शहर के एक लेखक, पत्रकार पर उन्हें कभी बहुत भरोसा था, लेकिन जब उसने अपना असली रंग दिखाया तो उन्हें बहुत गुस्सा आया और उन्होंने उससे दूरियां बना लीं। इसका उल्लेख स्वयं अड्यालकर जी अक्सर अंतरंग बातचीत में करना नहीं भूलते थे। वे ऐसे बुद्धिजीवी थे, जिनपर किसी बड़े मंत्री, नेता और नौकरशाह का रुतबा असर नहीं डालता था। लोहिया तथा गांधी के इस सच्चे अनुयायी के लिए तो सभी एक समान थे। न कोई बड़ा, न कोई छोटा।

Thursday, March 23, 2023

यह क्या है सरकार?

     आजकल के युवा प्यार के भंवर में फंसने की जल्दी में हैं। प्यार, मोहब्बत ही क्यों, हर काम को फर्राटे से करने में उन्हें जिस रोमांच का स्वाद मिलता है, उससे वे वंचित नहीं होना चाहते। आज के अधिकांश लड़के-लड़कियों को परिणाम की भी चिंता नहीं रहती। जो होगा देखा जाएगा की मानसिकता के इस जमाने में करे कोई और भरे कोई की पुरातन कहावत बड़ी तीव्रता से चरितार्थ होती दिख रही है। सरकारें और स्वयंभू पंचायतें अपनी मनमानी कर रही हैं। जेबों से बलवान ऊंची पहुंच वालों का जबरदस्त बोलबाला है। असहायों और गरीबों की कोई सुनने को तैयार नहीं। गजब की मनमानी का दौर है। मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के छोटे से गांव में रहने वाले उधा अहिरवार के जवान बेटे को एक सजातीय लड़की से प्यार हो गया। जब उन्हें लगा कि परिवार और समाज उनके प्यार को स्वीकार करने की बजाय अवरोध खड़े करने से नहीं चूकने वाला तो दोनों घर-गांव छोड़ भाग गये। लड़की के माता-पिता को लगा कि किसी ने दिन-दहाड़े उनकी प्रतिष्ठा को रौंदते हुए उनकी भोली-भाली बेटी को बरगलाने की अक्षम्य दुष्टता की है। पुलिस थाने में अपनी शिकायत दर्ज करवाने की बजाय उन्होंने गांव की दबंगों की पंचायत का दरवाजा खटखटाया। पंचायत के शूरवीर कर्ता-धर्ता तुरंत काम में लग गये। उन्होंने लड़के के पिता उधा अहिरवार को तुरंत फरमान सुनाया कि वह कहीं से भी दोनों को ढूंढ़ कर लाए नहीं तो उसकी तथा उसकी पत्नी की ऐसी-तैसी करने में देरी नहीं की जाएगी। उन्हें ऐसा दंड दिया जाएगा, जिससे उनकी कई पीढ़ियां शर्म और दर्द से कराहती रहेंगी। लड़के के माता-पिता ने हाथ जोड़कर कहा कि उनका जवान बेटा अपनी मनमर्जी का मालिक है। उसके क्रियाकलापों की उन्हें कभी कोई जानकारी नहीं रहती। ऐसे में वे दोनों को कहां से पकड़कर लाएं? भगौड़े लड़के को पंचायत के समक्ष हाजिर करने में असमर्थता जताने पर पंचों के गुस्से का पारा बेकाबू हो गया। लड़की के परिजनों ने वृद्ध माता-पिता को अंधाधुंध पीटना प्रारंभ कर दिया। पंचों के हिटलरी आदेश पर लड़के के पिता के हाथ-पैर में कसकर रस्सी बांधने के पश्चात नीम के पेड़ से बांध दिया गया, ताकि सभी जान जाएं कि किसी संपन्न परिवार की लड़की को भगाने पर लड़के के गरीब माता-पिता की कैसी दुर्गति हो सकती है। दो दिन तक उन्हें जानवरों की तरह मारा-पीटा जाता रहा। पत्नी रोती-बिलखती रही। अपने हाथों से पति को खाना भी खिलाती रही। इसी दौरान किसी जागरूक सज्जन इंसान ने पुलिस को फोन लगाकर पूरा माजरा बताया, लेकिन वह नहीं आई। कई घंटों की मारपीट तथा जंजीरों में बंधे रहने के कारण उधा अहिरवार अधमरी हालत में जा पहुंचे। बड़ी मुश्किल से जंजीरों से मुक्त करवा पत्नी पति को घर ला पाई। कुछ देर के बाद उसे शौच के लिए बाहर जाना पड़ा। उसके जाते ही उधा ने आत्महत्या कर ली। बंधक बनाकर मारपीट का वीडियो सामने आने के बाद पुलिस की नींद टूटी। काश! वह तब जाग जाती जब जाति पंचायत बेटे की करनी की खौफनाक सज़ा पिता को देने पर तुली थी, लेकिन अपने देश में ऐसे किसी चमत्कार की आशा रसूखदार तो रख सकते हैं, लेकिन दलित, शोषित और गरीब तो बिलकुल नहीं। 

    अपनी गुंडागर्दी और मनमानी चलाने वाली खाप पंचायतों तथा जाति पंचायतों को सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा अमान्य घोषित किया जा चुका है, लेकिन फिर भी उनकी तानाशाही की खबरें मीडिया में सुर्खियां पाते हुए चौंकाती रहती हैं। उत्तर भारत में तो ये पंचायतें जाति, गोत्र और परिवार की इज्जत के नाम पर लड़के-लड़कियों के लिए भय तथा आतंक का प्रयाय बनी हुई हैं। प्यार, मोहब्बत एक ऐसी पवित्र भावना है, जिसका गरीबी, अमीरी, जाति धर्म और गोत्र से कोई लेना-देना नहीं होता। यह तो बस हो जाता है। इसलिए अंधा भी कहलाता है, लेकिन वो अंधे क्यों बन जाते हैं, जो मासूम प्रेमी-प्रेमिका के आड़े आते हैं! उन्हें कहीं दूर भाग जाने को विवश करते हैं? इन पंचायतों में महिलाओं को शामिल नहीं किया जाता। पुरुष ही सभी फैसले लेते हैं। इसी तरह से इन पंचायतों में दलितों के लिए भी कोई जगह नहीं। अगर कहीं होती भी है तो उनकी सुनी नहीं जाती। जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर चलने वाली इन पंचायतों की तानाशाही ने कितनी जानें ली हैं, इसका कोई हिसाब नहीं। 

    हैरत भरी हकीकत तो यह भी है कि, अब तो सरकारें भी खाप पंचायतों की तर्ज पर फैसले करने, सुनाने लगी हैं। अपनी अहंकारी इज्जत की खातिर बेकसूर पिता को जंजीरों में बांधने की खबर पढ़ते-पढ़ते मुझे आसिफ और साक्षी की याद हो आई। मध्यप्रदेश के छोटे से गांव में रहने वाले इस सच्चे प्रेमी जोड़े को धर्म के ठेकेदारों ने बार-बार चेताया कि तुम दोनों का अलग-अलग धर्म से वास्ता है, ऐसे में फौरन दूरियां बना लो। नहीं तो वो हश्र होगा कि दुनिया देखेगी। जिद्दी प्रेमी-प्रेमिका अंत तक नहीं माने। साक्षी के माता-पिता ने तो किसी तांत्रिक से झाड़फूंक भी करवायी फिर भी उनकी बेटी की अक्ल ठिकाने नहीं आयी। दोनों ने अपने गांव से पांच सौ किलोमीटर दूर भागकर शादी कर ली। प्रेम के शत्रुओं के डर से भागते फिर रहे जोड़े ने एक वीडियो भी बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया, जिसमें साक्षी बड़े साहस के साथ कहती दिखी कि मैं अपनी मर्जी से आसिफ के साथ शादी के बंधन में बंधी हूं। हमें आजादी से जीने दिया जाए। साक्षी के माता-पिता ने थाने में रिपोर्ट दर्ज करवा दी कि बदमाश आसिफ उनकी बेटी को बरगलाकर ले भागा है। पुलिस ने भी खूब चुस्ती दिखायी। वह दोनों के पीछे दौड़ पड़ी। समाज में आपसी तनाव और खिंचाव के मंजर देख प्रशासन भी ऐसे हरकत में आया कि जागरूक(?) प्रशासनिक अधिकारियों ने रातों-रात आसिफ के परिवार की दुकान और घर को बुलडोजर चलवा कर जमींदोज कर दिया। कारण भी बता दिया कि अवैध निर्माण था इसलिए गिरा दिया। मेरे मन में बार-बार यही विचार आता रहा कि खुद को सही दर्शाने के लिए तर्क और बहाने कितनी आसानी से तलाश लिए जाते हैं।