Monday, May 22, 2023

सोशल मीडिया का दानवी चेहरा

    इंटरनेट पर सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफार्म बन चुका है, जहां एक से एक अच्छी और बुरी कलाकारियां देखने को मिल रही हैं। अभी हाल में दो ऐसे वीडियो देखने में आए, जिनका बिलकुल अलग मिजाज है। एक सकारात्मक तो दूसरा नकारात्मक। इसी से पता चलता है कि सोशल मीडिया को किस राह पर ले जाया जा रहा है। पहले वीडियो में अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में दूल्हा-दुल्हन स्टेज पर खड़े हैं। दोनों के हाथ में वरमाला है। मेहमानों के चेहरे से भी खुशी बरस रही है, जैसा कि अक्सर होता है, दूल्हे के दोस्त मजाकिया मूड में हैं। दुल्हन ने सामने खड़े दूल्हे के गले में वरमाला डाल दी है, लेकिन जैसे ही दूल्हे की बारी आती है तो वरमाला टूट जाती है, जिससे दुल्हन के चेहरे की चमक फीकी पड़ जाती है। ऐसे में मेहमान भी हैरान परेशान ऩजर आते हैं, लेकिन दूल्हे के चेहरे पर हल्की-हल्की मुस्कराहट है। वह तुरंत वरमाला के दोनों सिरे पकड़ गांठ मारता है और दुल्हन के गले में डाल देता है। आसपास मौजूद सभी मेहमान प्रफुल्लित हो जोर-जोर से तालियां बजाते हैं। दुल्हन का चेहरा फिर से चमकने-दमकने लगता है। सोशल मीडिया पर वायरल इस वीडियो को लोगों ने बार-बार देखा और दूल्हे की जमकर तारीफ भी की। 

    दूसरे वायरल वीडियो में एक महिला जमीन पर पड़ी एक फोटो पर लातें बरसा रही है। उसका चेहरा गुस्से से तमतमाया है। चप्पलें खाती यह फोटो उसके उस पति की है, जो सात फेरे लेने के पश्चात बरसों उसके साथ रहा, लेकिन अब दोनों में तलाक हो गया है। इस वीडियो को देखकर लोगों को अच्छा कम और बुरा ज्यादा लगा। जिस पति के साथ इस गुस्सैल महिला ने कभी जीने-मरने की कसमें खाई होंगी उसके ऐसे अपमान पर कई लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी। यह कैसी अभागी महिला है, जो अपने पति के साथ बिताए सुंदर पलों की यादों को सहेज नहीं पाई और कितना निकम्मा और कमजोरियों का मारा होगा वह पति, जो इसके दिल में ़जरा भी जगह नहीं बना पाया! दरअसल रिश्तों में कब और क्यों विषैली खटास और दूरियां आ जाएं इसका पता लगाना आसान नहीं। तलाक होने पर खुश होना कोई गुनाह नहीं, लेकिन ऐसा हिंसक प्रदर्शन! यह भी सच है कि सोशल मीडिया पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कौन गलत है और कौन सही, लेकिन फिर भी ऐसा हो रहा है। लोग अपने-अपने हिसाब से तीर और तलवारें चला रहे हैं। बिना इसकी फिक्र और परवाह किए कि किस-किस का सीना छलनी हो रहा है। कौन-कैसे तनाव और बदले की आग में तप रहा है। अब तो कई विद्वान यह कहते नहीं थक रहे हैं कि, सोशल मीडिया पर चल रही अफवाहों की आंधी और फर्जी खबरों की भीड़ देश को अराजकता की तरफ ले जा रही है। 

    यह पंक्तियां लिखते-लिखते कोविड काल का स्मरण हो आया है। जब महामारी की वजह से भारतीय हैरान-परेशान थे। कोविड के शिकारों को अस्पतालों में बिस्तर उपलब्ध नहीं हो रहे थे। वेंटिलेटर, रेमडिसिवर एवं अन्य आवश्यक दवाओं की कमी से बुरी तरह से जूझना पड़ रहा था। तब पीड़ितों के परिजन अपनी मजबूरियों, समस्याओं और जरूरतों की जानकारी सोशल मीडिया पर साझा कर रहे थे। अस्पतालों में आक्सीजन की कमी से तड़पते मरीजों के वीडियो कोविड-19 की दिल दहलाने वाली हकीकत पेश कर रहे थे और जाने-अनजाने मित्र बिना किसी भेदभाव के एक दूसरे की सहायता और मार्गदर्शन कर रहे थे। जो लोग इंटरनेट और सोशल मीडिया से दूर थे, उन्होंने भी इसके महत्व को समझा और अपनाया। यह कहना गलत नहीं होगा कि सोशल मीडिया के कारण लाखों लोग मौत के मुंंह में समाने से बच गए। 

    कोरोना काल में जो सोशल मीडिया एक दूसरे को जोड़ने का सशक्त सर्वहितकारी माध्यम बना, आज दूरियां बढ़ाने और नफरत फैलाने के लांछन क्यों झेल रहा है? आखिर वो कौन लोग हैं, जिन्होंने इसे फेक न्यूज और हेटस्पीच का प्लेटफार्म बना कर रख दिया है? कहीं न कहीं इसकी जानकारी हर सजग भारतवासी को है। जिस तरह से घृणा और नफरत की आंधी चलाई जा रही है और धर्म को खतरे में बताया जा रहा है। उससे शोधकर्ता तो यहां तक कह रहे हैं कि भारत में सोशल मीडिया का स्वरूप स्वार्थी और राक्षसी होता चला जा रहा है। सद्भाव की भावना को जागृत करने वाली सोच पर नफरत फैलाने और दंगे भड़काने की क्रूर शब्दावली हावी होती चली जा रही है। साम्प्रदायिक सद्भाव रखने के पक्षधरों को चुन-चुन कर निशाना बनाया जा रहा है। एक बार किसी का विरोध करने का मन बना लेने के बाद उसकी तारीफ करने में तकलीफ होने लगी है। भले ही उसने कितना भी अच्छा काम क्यों न किया हो। 

    दिल्ली के मुख्यमंत्री ने हाल ही में ट्वीट करते हुए लिखा, वे मनीष सिसोदिया की बीमार पत्नी का हालचाल जानने के लिए अस्पताल गए थे। सीमा भाभी को मल्टीपल सोरायसिस की बीमारी है। यह बहुत गंदी बीमारी है। मैं उनके शीघ्र स्वस्थ होने की ईश्वर से प्रार्थना करता हूं। होना तो ये चाहिए था कि, बीमारी से जूझ रही महिला के शीघ्र स्वस्थ होने की मनोकामना की जाती, लेकिन बद्दिमाग दानवी सोचवालों ने अरविंद केजरीवाल को चरित्रहीन घोषित करने वाली अभद्र, शर्मनाक कमेंट्स की झड़ी लगा दी। सोशल मीडिया पर प्रतिष्ठित हस्तियों को शर्मनाक शब्दावली से अपमानित करने का जो सिलसिला जोर पकड़ रहा है उससे देश के खास तथा आमजनों को अत्यंत पीड़ा हो रही है। कुछ शैतान तो ऐसे हैं, जो इज़्जतदार महिलाओं पर कीचड़ उछालने की हिम्मत ऐसे दिखा रहे हैं, जैसे देश में कानून का नहीं गुंडागर्दी और मनमानी का राज चल रहा हो। देश के सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी चिन्ता जतायी है। इस इक्कीसवीं सदी में हम कहां जा रहे हैं? हमें एक धर्मनिरपेक्ष और सहिष्णु समाज होना चाहिए, लेकिन आज घृणा का माहौल है। समाज का ताना-बाना बिखरा जा रहा है। हमने ईश्वर को कितना छोटा कर दिया है। किसी का धर्म खतरे में नहीं है।

Thursday, May 11, 2023

सबकुछ मनोबल

चित्र : 1 - सविता प्रधान आज आईएएस अधिकारी हैं। सभी झुक-झुक कर उन्हें बड़ी अदब के साथ सलाम करते हैं। मध्यप्रदेश के मंडी के एक आदिवासी परिवार में जन्मी सविता की संघर्ष गाथा से जो भी अवगत होता है, वह बस सोचता रह जाता है। पूरी तरह से बिखरने के बाद खुद को जोड़ने और संभालने की शक्ति और हिम्मत इस नारी ने कहां से पायी? अपने माता-पिता की इस तीसरी संतान की पढ़ाई में बचपन से ही जबरदस्त अभिरुचि थी, लेकिन घर के हालात अच्छे नहीं थे। हमेशा आर्थिक तंगी सिर ताने रहती थी। यह तो उसकी किस्मत अच्छी थी कि स्कॉलरशिप मिल गई और आगे की पढ़ाई संभव हो पायी। वह रोज सात किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाती और थककर घर लौटने पर भी कलेक्टर बनने की प्रबल चाह के साथ किताबों में खो जाती थी। चंचल और खूबसूरत सविता किसी के साथ घुलने-मिलने में देरी नहीं लगाती थी। यही वजह थी, सभी उसे पसंद करते थे। सविता को पढ़ाई के अलावा और कुछ नहीं सूझता था, लेकिन गरीब माता-पिता को उसकी शादी की चिन्ता खाये रहती थी। इसी दौरान एक अच्छे-खासे रईस घराने से उसके लिए रिश्ता आया तो माता-पिता ने हामी भरने में देरी नहीं की। दरअसल, लड़के ने सविता को कहीं देखा था और उसकी खूबसूरती पर मर मिटा था। उसने अपने मां-बाप को सविता से शादी करने के लिए बड़ी मुश्किल से मनाया था। सविता रोती-गाती समझाती रही कि अभी उसकी शादी करने की उम्र नहीं। अभी तो उसे अपने सपने को साकार करना है, लेकिन जिद्दी घरवाले नहीं माने। उसको तसल्ली देने के लिए उन्होंने उसके समक्ष उन लड़कियों के उदाहरण भी पेश कर दिए, जिन्होंने ब्याह के बाद भी पढ़ाई-लिखाई जारी रखी और अपने सपने पूरे कर दिखाए। शादी के बाद सविता अपनी ससुराल पहुंची। शुरू-शुरू के दिन अच्छे बीते। सास-ससुर भी ठीक-ठाक लगे। पति ने भी प्यार बरसाया, लेकिन कालांतर में सास-ससुर का रंग बदलने लगा। गरीब माता-पिता की बेटी होना मुसीबत बन गया। माता-पिता के इशारे पर नाचने वाले पति ने अपनी असली औकात दिखानी प्रारंभ कर दी। जब सविता ने अपनी पढ़ाई जारी रखने की मंशा जतायी तो उसे डांटा-फटकारा गया। दरअसल, वो ऐसा सर्वसम्पन्न धनवान परिवार था, जिनके लिए अपनी बेटियां तो अनमोल थीं, लेकिन बहुओं का कोई मोल न था। बेटियों को किसी के साथ भी बोलने-बतियाने, हंसने, मुस्कराने और कहीं भी आने-जाने की खुली छूट थी, लेकिन बहुओं पर हजारों पाबंदियां थीं। सविता किसी के साथ हंस बोल लेती तो उससे सवाल किये जाने लगते। घर के सभी सदस्य उससे दूरी बनाये रहते। सभी के खा-पी लेने के बाद उसे खाना नसीब होता। कई बार तो खाना खत्म हो जाता और सविता को भूखे पेट सोना पड़ता। भूख तो भूख होती है। रसोई में खाना बनाते-बनाते वह दो-चार रोटियां छिपाकर रख लेती और मौका मिलने पर खा लेती। कई बार तो उसे बाथरूम में जाकर सूखी रोटी निगलनी पड़ी और पानी पीकर जैसे-तैसे सोना पड़ा। जब वह पहली बार गर्भवती हुई तो उसके मन में यह उम्मीद जागी कि अब उसके प्रति उनका व्यवहार बदलेगा, लेकिन यह उसका भ्रम था। दो बच्चों के जन्म के बाद भी सास-ससुर कटु बोलों की बरसात करने से बाज नहीं आए। शराबी पति ने भी मारना-पीटना नहीं छोड़ा। ऐसे में सविता ने खुदकुशी करने का पक्का मन बना लिया। एक रात फांसी के फंदे पर झूलने के लिए वह अपने कमरे में पहुंची तो उसने देखा कि खुली खिड़की से सास उसे देख रही है। उसे उम्मीद थी कि सास उसे रोकेगी, लेकिन उसे फांसी के फंदे के करीब देखकर भी जिस तरह से सास खुद को बेखबर, बेपरवाह दर्शाती रही उससे सविता को बहुत झटका लगा। वह समझ गई कि उसके मरने का ही इंतजार किया जा रहा है। तब एकाएक उसके मन में विचार आया कि वह खुद को किस कसूर की सज़ा देने पर उतारू है? सज़ा तो इन्हें मिलनी चाहिए जो बाहरी लोगों के लिए भद्र और शालीन हैं, लेकिन अपनी बहू के लिए किसी राक्षस से कम नहीं। सुबह-सुबह सविता कभी न लौटने की कसम के साथ दोनों बच्चों के संग नए संघर्ष के पथ पर चल पड़ी। एक पार्लर में काम करने के साथ-साथ इंदौर यूनिवर्सिटी से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स किया। पहले ही प्रयास में यूपीएससी क्लियर कर अपनी किस्मत ही बदल डाली। आज सविता का नाम बड़े गर्व के साथ मध्यप्रदेश के शीर्ष अधिकारियों में लिया जाता है...।

चित्र : 2 - कोरोना काल की याद आज भी उन कई लोगों को डरा देती है, जिन्होंने अपनो को खोने के साथ-साथ अनेक कष्ट भोगे। ऐसे लोगों की अथाह भीड़ में कुछ लोग ऐसे भी रहे, जिनकी कोविड-19 ने जिन्दगी ही बदल दी। रेशमा को पीने की लत थी। जंकफूड के बिना उसका एक दिन भी गुजारा नहीं था। दोस्तों को नशे की पार्टियां देने का भी उसे खर्चीला शौक था। उसका जिस शख्स से ब्याह हुआ था वह दिन-रात पीने का लती था। मिलन की पहली रात में ही उसने रेशमा को शराब का स्वाद चखा दिया। बाद में एक समय ऐसा आया जब पत्नी अपने शराबी पति को मात देने लगी। अत्याधिक नशा करने के कारण पति की कोरोना काल से पहले हमेशा-हमेशा के लिए रवानगी हो गई। हमेशा नशे में टुन्न रहने वाली रेशमा को पता ही नहीं चला कि वह कब उच्च रक्तचाप तथा डायबिटीज की गंभीर रोगी हो गई। एक दिन ऐसा भी आया जब उसने बिस्तर पकड़ लिया और फिर कोमा में चली गई। तभी कोरोना के भयंकर तांडव के चलते लॉकडाउन लग गया। महंगे डॉक्टरों के इलाज से रेशमा जैसे-तैसे चलने-फिरने लगी। स्वस्थ होने के कुछ दिनों बाद फिर से उसकी पीने की इच्छा जागी, लेकिन लॉकडाउन की वजह से बार, पब और शराब दुकानों पर ताले लगे थे। रेशमा को किसी और ने नहीं, अपने ही मन-मस्तिष्क ने चेताया कि इतने दिनों तक कोमा में रहने के बाद बड़ी मुश्किल से बची हो, अब तो खुद पर रहम करो और हमेशा-हमेशा के लिए अंधाधुंध पीने से तौबा कर लो। अपने पति को खो चुकी रेशमा का जीने के प्रति मोह जाग उठा। शराब को पानी की तरह पीने वाली नारी ग्रीन टी, नींबू पानी पीने लगी। कसरत को भी जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लिया। आज रेशमा नशा विरोधी अभियान की मुखिया हैं और कई लोगों की शराब छुड़वा चुकी हैं। 

चित्र : 3 - इस भागम-भाग वाले समय में किसी के पास किसी का हालचाल जानने की फुर्सत नहीं। सभी के अपने-अपने दर्द और समस्याएं हैं। उन्हीं को सुलझाने में उनकी जिन्दगी कट जाती है। ऐसे में दूसरों से सहारे की आशा करना खुद को धोखा देने जैसा है। आधुनिक शहर चंडीगढ़ में एक महिला व्हीलचेयर पर प्रतिदिन फूड डिलीवरी करती नजर आती हैं। अपार इच्छाशक्ति और मनोबल वाली इस महिला का नाम है, विद्या। अपने नाम के अनुरूप संघर्ष करती विद्या का जन्म बिहार के समस्तीपुर के छोटे से गांव में हुआ। 2007 में साइकल चलाते वक्त वह पुल के नीचे गिर गई। रीढ़ की हड्डी टूट जाने के कारण 11 साल तक बिस्तर पर पड़े रहने के दौरान एक दिन उसने अपने शरीर की कमी और कमजोरी को मात देने का द़ृढ़ निश्चय कर डाला। आत्मनिर्भर बनने के अपने इरादे के बारे में उसने जब अपने करीबियों को बताया तो उन्होंने उसका खूब म़जाक उड़ाया। किसी शुभचिंतक की सलाह पर उसने 2017 में चंडीगढ़ स्पाइनल रिहेव सेंटर में किसी तरह से जाकर बेडसोल का ऑप्रेशन करवाया। वहीं पर अन्य जुनूनी, उत्साही विकलांगों को देखकर उसकी जीने की इच्छा और बलवति हुई और वह चुस्त-दुरुस्त होकर अस्पताल से बाहर निकली। फिर उसने दिव्यांग श्रेणी में राष्ट्रीय स्तर पर बास्केट बॉल खेलकर लोगों को चौंकाया। इतना ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर टेबल टेनिस और स्विमिंग में नाम कमाकर तानें कसने वालों की तो बोलती बंद कर दी...। 

Thursday, May 4, 2023

चरैवति... चरैवति

    महाराष्ट्र प्रदेश और देश के जनप्रिय साप्ताहिक, ‘राष्ट्र पत्रिका’ के सफलतापूर्वक 15वें वर्ष में प्रवेश करने पर हमें वैसी ही अनुभूति और खुशी हो रही है, जैसी हर किसी को अपने जन्मदिन पर होती है। किसी का भी जन्मदिन वो सुखद अवसर होता है, जो अतीत की यादों की खिड़कियां और दरवाजे खोल देता है। हम अपनी यात्रा में कितने सफल और असफल रहे, जाने-अनजाने में कैसी-कैसी भूलें तथा गलतियां हुईं इसका भी शोध और आकलन करने का अवसर होता है हर जन्मोत्सव। अपने प्रकाशन के प्रारंभ काल से ही लाखों सजग पाठकों के मन-मस्तिष्क में बस जाने में कामयाब रहे समाचार पत्र ‘राष्ट्र पत्रिका’ का तब भी यही उद्देश्य था और आज भी यही एकमात्र लक्ष्य है, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता। किसी भी खबर को प्रकाशित करने से पूर्व उसकी गहराई तक जाना हम अपना कर्तव्य समझते हैं। अपने पाठकों को अधूरे नहीं, पूरे सच से अवगत कराना हमारा मूलभूत दायित्व है। चुनौतियां कल भी थीं और आज भी हैं। अपनी बात को खुलकर कहने के लिए मैं शायर सुरजीत भोला दानिश हिंगणघाटी की गजल की इन पंक्तियों का सहारा ले रहा हूँ,

गुजरते लम्हों में सदियां तलाश करता हूँ

ये मेरी प्यास है, मैं नदियां तलाश करता हूँ।

यहां गिनाता है हर कोई खूबियां अपनी,

मैं अपने आप में कमियां तलाश करता हूँ।

भारतीय प्रेस का अपना एक अत्यंत बुलंद इतिहास है। इस देश में अखबारों, संपादकों, पत्रकारों का हर काल में सम्मान होता आया है, लेकिन आजकल हालात कुछ बदले-बदले से हैं। कहने वाले तो यह भी कहने से नहीं सकुचाते कि, वो गुजरे ज़माने की बात है, जब अखबारों को हाथोंहाथ लिया जाता था। उनकी सुर्खियां पाठकों को आकर्षित करती थीं और गहन चर्चा का विषय बना करती थीं। लोग यह भी कहते नहीं थकते थे कि जो अखबार में छपा है, वो एकदम सही है। शंका की कहीं कोई गुंजाइश हो ही नहीं सकती। अब कई अखबार, पत्रकार और संपादक कटघरे में हैं। उन पर उंगलियां उठाने वालों में गैर ही नहीं अपने भी शामिल हैं। 

हमारे पत्रकारिता के शीर्ष बलिदानी संपादकों और पत्रकारों ने यही तो बताया और समझाया है कि लक्ष्यहीन पत्रकारिता के कोई मायने नहीं हैं। हिंदी के पहले अखबार ‘उदन्त मार्तंड’ का ध्येय वाक्य था, ‘‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत।’’ इस जीवंत, प्रभावी अखबार में प्रकाशित होने वाली खबरें अंगे्रजों को शूल की तरह चुभती थीं। निर्भीक और ज्ञानवान पत्रकार, संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी के कुशल संपादन में निकले अखबार ‘प्रताप’ का ध्येय वाक्य था, ‘‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है। वह नर नहीं नरपशु निरा है और मृतक समान है।’’ आततायी अंग्रेजों के पैरों तले की जमीन खिसकाने और सतत उनकी नींद उड़ाने वाले विद्यार्थीजी को बेखौफ होकर कलम चलाने के दंड स्वरूप पांच बार जेल की यात्रा करनी पड़ी, लेकिन फिर भी उनकी कलम की आग कभी भी ठंडी नहीं पड़ी। ‘प्रताप’ जनता का प्रिय अखबार होने के साथ-साथ आजादी के दिवानों का भी पसंदीदा अखबार था। अमर शहीद भगत सिंह और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, उनकी मशाल-सी लेखनी के जबरदस्त प्रशंसक थे। हिंदुस्तान के क्रांतिकारी यशस्वी कवि श्री माखनलाल चतुर्वेदी की कालजयी कविता, पुष्प की अभिलाषा, 

‘चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,

चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ।

चाह नहीं, सम्राटों के शव पर हे हरि, डाला जाऊँ, 

चाह नहीं, देवों के सिर पर चढ़ूँ, भाग्य पर इठलाऊँ।

मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक।

सबसे पहले ‘प्रताप’ में ही प्रकाशित हुई थी। इस कविता ने लाखों युवाओं के दिल में देशभक्ति की मशाल जलाकर अंग्रेजों के खिलाफ सड़कों पर उतरने की प्रेरणा दी थी। 1907 में इलाहाबाद से प्रकाशित ‘स्वराज’ नामक अखबार का घोष वाक्य था, ‘‘हिंदुस्तान के हम हैं, हिंदुस्तान हमारा है।’’ इन शब्दों में अंग्रेजों के लिए सीधे-सीधे धमकी और चेतावनी थी कि तुम तुरंत हमारे देश को छोड़कर चलते बनो। इस पर तुम्हारा कोई हक नहीं। इसके जर्रे-जर्रे पर हम हिंदुस्तानियों का अधिकार है। क्रांति का बिगुल फूंकने वाला यह अखबार मात्र ढाई वर्ष तक प्रकाशित हो सका, लेकिन इसने भी भारत की जीवंत पत्रकारिता के इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज करवा दिया। गौरतलब है कि अंग्रेजों की नींद उड़ा देने वाले ‘स्वराज’ में उसी विद्वान को संपादक के लायक समझा जाता था, जो अंग्रेजों की तकलीफदायक जेलों में खुशी-खुशी रहने और आजादी के लिए संघर्ष करने से कभी भी पीछे न हटे। ‘स्वराज’ के कुल आठ संपादक हुए। अपने अखबार में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का संदेश देने वाले इन सभी संपादकों को कुल मिलाकर 95 वर्ष की कठोर सज़ा अंग्रेजों ने दी। अंधे-बहरे जुल्मी अंग्रेजों के कानों तक अक्षरों के बारूदों के धमाकों को पहुंचाने के लिए और भी कई अखबार और पत्रकार, संपादक अपनी जान हथेली पर लेकर चला करते थे। जालिम अंग्रेज एक अखबार को बंद करवाते तो तीन-चार और अखबार फौरन छपने लगते। अपने देश की पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास से प्रभावित होकर ही ‘राष्ट्र पत्रिका’ का प्रकाशन महाराष्ट्र की सांस्कृतिक नगरी नागपुर से प्रारंभ किया गया। हमें दूसरों से कोई लेना-देना नहीं। समाचार पत्र हमारे लिए तेल, साबुन, कुर्सी, मेज, जूता, चाकू, तलवार जैसा बेचने का सामान नहीं, बल्कि देशवासियों तक बेखौफ होकर खबरें और जनहित लेख, जानकारियां पहुंचाने का सशक्त माध्यम है। सिर्फ विरोध की पत्रकारिता करने के लिए ‘राष्ट्र पत्रिका’ का प्रकाशन नहीं किया जाता। यदि सरकार अच्छे कार्य करती है तो खुलकर तारीफ तथा गलत राह पर चलने पर आलोचना करने से हम कतई नहीं घबराते। हिंदू-मुसलमान का राग अलापने की बजाय आपसी सद्भाव बढ़ाने का प्रारंभ से ही हमारा लक्ष्य और कर्तव्य रहा है। देश विरोधी ताकतों की अनदेखी करना और अपराधियों का महिमामंडन ‘राष्ट्र पत्रिका’ में किसी भी हाल में संभव नहीं। सनसनी फैलाने वाली खबरों से दूरी बनाये रखने के लिए हम कटिबद्ध हैं। हमें जितनी अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चिंता है उतनी ही दूसरों की भी है। 

आज हम सब देशवासी अमृत महोत्सव मना रहे हैं। भारतवर्ष के शीर्ष पत्रकार, संपादक और चिंतक डॉ. संजय द्विवेदी के इस कथन से भला कौन सहमत नहीं होगा, ‘भारत के समक्ष अपनी एकता को बचाये रखने के लिए एक ही मंत्र है, सबसे पहले राष्ट्र। विरोधी ताकतें तोड़ने के सूत्र खोज रही हैं, लेकिन हमें हर हाल में समाज को जोड़ने के सूत्र खोजने होंगे।’ सत्य की पत्रकारिता का सफर कभी भी नहीं थमता। अभी तो हमने चलना प्रारंभ किया है। हमें बिना थके बहुत लम्बी यात्रा तय करनी है। इस ऊबड़-खाबड़ सफर में जब आप सब हमारे साथ हैं तो भय और चिंता कैसी? श्रमिक दिवस और ‘राष्ट्र पत्रिका’ की वर्षगांठ पर सभी पाठकों, संवाददाताओं, लेखकों, एजेंट बंधुओं, बुक स्टॉल संचालकों, विज्ञापन दाताओं एवं सभी शुभचिंतकों को बार-बार धन्यवाद, शुभकामनाएं और अपार बधाई।

Thursday, April 27, 2023

शोहरत पाने की कैसी ललक?

    फटाफट शोहरत पाने के लिए अपहरण, हफ्ता वसूली, हत्याएं, आतंक, लूटमारी और नशे का सैलाब। अपराधियों की उम्र मात्र पन्द्रह से बीस-बाइस साल। इस उम्र में तो उनके हाथ में कापी और किताबें होनी चाहिए। तो फिर इस अनहोनी के लिए कौन हैं असली कसूरवार? और कड़ी से कड़ी सज़ा के भी हकदार...। एक होटल के मालिक को बीते दिनों एक पर्ची मिली, जिसमें लिखा था कि यदि तुमने शीघ्र एक करोड़ रुपये नहीं पहुंचाए तो तुम्हें गोलियों से भून दिया जाएगा। और हां, पुलिस के पास जाने की चालाकी की तो तुम्हारा वो अंजाम होगा, जिसे तुम्हारी कई पीढ़ियां याद रखेंगी। होटल मालिक ने इस पर्ची को नजरअंदाज करना बेहतर समझा। ऐसी धमकियों-चमकियों का आना उनके लिए रोजमर्रा की बात हो चुकी थी। कुछ दिन बाद उनके मोबाइल की फिर घंटी बजी और धमकी भरे अंदाज में कहा गया कि, ‘मैं लारेंस विश्नोई बोल रहा हूं। लगता है तुम पर कुछ ज्यादा ही चर्बी चढ़ गई है। तुमने हमारे खासमखास रोहित गोदारा को कोई चिल्लर गुंडा बदमाश समझ लिया है। तुम्हें पता तो होगा ही मैं बहुत से लोगों को टपका चुका हूं। पंजाब के नामी गायक सिद्धू मुसेवाला को सरेराह टपकाने की खबर तुम ने भी जरूर सुनी होगी। अगर तुम्हें अपनी जान प्यारी है तो वही करो जो तुम से करने के लिए कहा गया है।’ गैंगस्टर विश्नोई तिहाड़ जेल में कैद है। रोहित गोदारा फिलहाल यूरोप में रहता है। उसी ने होटल मालिक को मोबाइल कर खुद को विश्नोई बता कर दहशत का जाल फेंका था। होटल मालिक के अब तो होश उड़ने ही थे। उनके रात-दिन खौफ में कटने लगे। नींद पूरी तरह से छिन गई। देश में ऐसे कई हत्यारे, माफिया हैं, जो खुद तो पर्दे में रहते हैं, लेकिन उनके गुर्गे रईसों को धमका-चमका कर मनचाही वसूली करते रहते हैं। महाराष्ट्र की आर्थिक नगरी, जिसे मायानगरी भी कहा जाता है, वहां पर बीते दौर में माफिया डॉन दाऊद इब्राहिम, अरुण गवली जैसे का ऐसा आतंक था कि बिल्डर, उद्योगपति, फिल्म निर्माता, फिल्म स्टार आदि उनका इशारा पाते ही नोटों की गड्डियां पहुंचा देते थे। बिहार और उत्तर प्रदेश में धन वसूलने के लिए अपहरण तथा हत्याओं का सिलसिला भी सभी ने देखा है। रेतीला प्रदेश राजस्थान इस रोग से दूर था, लेकिन अब इसने वहां पर महामारी की शक्ल अख्तियार कर ली है। यहां पर जबरन धन वसूली और फिरौती वसूलने वाले नये-नये गिरोह सामने आ रहे हैं। कुछ दिन पूर्व पुलिस ने किसी नाइट क्लब में गोलीबारी करने वाले तीन अपराधियों को गिरफ्तार किया। उनके बारे में अखबारों तथा मुंहजुबानी यह धुआंधार प्रचार किया गया था कि यह खूंखार अपराधी हैं, जबकि हकीकत में तीनों नाबालिग हैं। उनमें से एक डीजे चलाता था, जिसकी उम्र मात्र पंद्रह वर्ष है। गलत संगत में छोटी-सी उम्र में ही वह भटक गया। दूसरा सोलह साल का है, जिसने 11वीं तक पढ़ाई करने के बाद सरकारी नौकरी की तलाश में भटकते-भटकते अपराध की राह पकड़ ली। तीसरे के चेहरे-मोहरे में मासूमियत टपकती है, लेकिन उसके कारनामें अत्यंत क्रूर हैं। बहुत ही छोटी उम्र में बड़े-बड़े अपराध कर गुजरने वाला रोहित गोदारा दाऊद को अपना गुरू मानता है। अनेक युवा उसे अपना आदर्श मानते हैं। उसी की तरह खून-खराबा शोहरत कर आसमान को छूना चाहते हैं। रोहित के माता-पिता को अपने अपराधी बेटे के नाम से ही नफरत हो गई है। वे उसे जन्म देने के अपराध में दिन-रात घुटते रहते हैं। रोहित के गरीब किसान पिता को उसकी करनी का फल भुगतना पड़ रहा है। बुढ़ापे में भी थानों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। कभी जो लोग इज्जत करते थे उन्होंने दूरियां बना ली हैं। रोहित जब पैदा हुआ था तब उन्होंने मिठाई बांटी थी। सीधे और सरल पिता ने बेटे के साधु-संत बनने की कामना की थी। इसलिए उसका नाम रावतदास स्वामी रखा था। संतों जैसे नाम वाले बेटे के कुख्यात अपराधी बनने पर पिता की रातों की नींद उड़ चुकी है। खाकी वर्दी वालों ने भी कह दिया है अपने इस बेटे को अब मरा समझ लो। जब भी वह भारत लौटेगा तो गोलियों से भून दिया जाएगा। 

    कुख्यात हत्यारे, लुटेरे, माफिया और नेता अतीक अहमद के जिस बेटे असद को पुलिस ने गोलियों से भून कर मौत की नींद सुलाया उसकी पैदाइश 2003 की थी। जब उसे ढेर किया गया तब वह मात्र 19 साल का था। अपने बेटे असद को अपने पदचिन्हों पर चलाने के लिए अतीक अहमद ने उसके बचपन से तरह-तरह कोशिशें प्रारंभ कर दी थीं। जिस उम्र में बच्चे खिलौने से खेलते हैं असद हथियारों से खेलने लगा था। अपराधी पिता को शादी-ब्याह में अपने नादान मासूम बेटे से हवाई फायरिंग करवाने में बड़ी खुशी तथा तसल्ली मिलती थी। उसका भरोसा मजबूत होता था कि यह बेटा उसकी विरासत को दमखम के साथ आगे ले जाएगा। असद की स्कूली पढ़ाई लखनऊ के एक स्कूल में पूरी हुई। उसकी वकील बनने की प्रबल चाहत थी। इसके लिए उसे विदेश जाना था। यह भी सच है कि बड़ा वकील बनकर उसे न्याय के पथ पर नहीं चलना था। उसे अपने बाप के फिरौती, लूटमार, हेराफेरी, राजनीतिक डकैती से खड़े किये गए खरबों के साम्राज्य को बचाना और बढ़ाना था। पुलिस सत्यापन में निगेटिव रिपोर्ट आने के कारण पासपोर्ट नहीं बना। बेटे के काला कोट नहीं पहन पाने के सपने के धराशायी होने पर अतीक को बड़ा झटका लगा था। फरवरी के अंत में राजू पाल मर्डर केस के गवाह और दो पुलिस कर्मियों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस हत्याकांड में अतीक और उसके बेटे असद के साथ-साथ अशरफ और सात अन्य लोग आरोपी थे। घटना के तुरंत बाद उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बड़े तीखे अंदाज में माफिया को मिट्टी में मिला देने की घोषणा की थी। अप्रैल का तीसरा हफ्ता आते-आते छह लोग मिट्टी में मिला दिये गए। उमेश पाल पर गोली चलाने वालों में सात की पहचान हुई थी, जिसमें से असद अहमद सहित चार लोगों को पुलिस ने मुठभेड़ में ढेर कर दिया। अतीक व अशरफ को तीन शूटरों ने तब मार गिराया, जब वे पुलिस हिरासत में थे। आत्म समर्पण करने के बाद तीनों हत्यारों ने कहा कि, अपराध जगत में विख्यात होने के लिए उन्होंने इन दुर्दांत अपराधियों को कुत्ते की नींद सुलाया है। कई छोटे-मोटे अपराधों में हाथ आजमा चुके इन हत्यारों की उम्र भी ज्यादा नहीं है। अतीक अहमद और उसके भाई की तो एक न एक दिन कुत्ते की मौत होनी ही थी। अतीक की पत्नी शाइस्ता परवीन भी कानून से भाग रही है। बेटे, पति और देवर के मरने के बाद भी उसने सामने आने की हिम्मत नहीं दिखाई। अपराधियों का जीवन ऐसे ही गुजरता है। उन्हें कब पछतावा होता होगा, कौन जानें, लेकिन ऐसा जीना, जीना तो नहीं। कम-अज़-कम उन्हें जरूर सबक लेना चाहिए, जिन्हें लगता है कि अपराध की राह पकड़ कर सुख-शांति से रह लेंगे...।

Thursday, April 20, 2023

सोशल मीडिया के सबल पक्ष की एक झलक

    इंटरनेट की विशालतम दुनिया में सोशल मीडिया एक ऐसा मंच बन चुका है, जिसने हर उम्र के लोगों को अपने मोहपाश में जकड़ लिया है। आज की आपाधापी में अधिकांश लोगों के पास इतना वक्त नहीं कि वे मोटी-मोटी किताबें पढ़ सकें। अखबार और पत्रिकाएं भी हर जगह सुलभ नहीं। सिनेमा हॉल में जाकर फिल्में देखने की भी लोगों में पहले-सी अभिरूचि या फिर वक्त नहीं। लगभग हर हाथ में स्मार्टफोन है, जो अच्छी-बुरी खबरों से फटाफट मिलवा रहा है। किस्म-किस्म की शेर-ओ शायरी के साथ-साथ स्तब्ध, जागृत और भावुक कर देने वाले शब्द-संसार से अवगत करा रहा है। नये-नये लेखक और विचारक सामने आ रहे हैं। यहां पर एक से एक विद्वानों के अनुभवों, विचारों, सुझावों, लेखांशों, कविताओं, गजलों का भी अद्भुत खजाना भरा पड़ा है, जिन्हें पढ़े-समझे बिना मन नहीं मानता। गंदी राजनीति तथा भाई-चारे के दुश्मनों ने भले ही सोशल मीडिया को अपना औजार बना लिया हो, लेकिन यह कहना और मानना कहीं भी गलत या अतिश्योक्ति नहीं कि सोशल मीडिया सकारात्मक विचार-सोच को बलवति बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है। अपने नाम-काम की चाह से मुक्त दिन-रात एक से एक अद्भुत रोचक जानकारियों और सुलगते विचारों को फैलाते मानवता के हितैषियों को इस कलम का सलाम...।

* एक कुम्हार जब घड़ा बनाता है तो घड़े के 

बाहरी भाग को तेजी से थपथपाता है, लेकिन 

भीतरी भाग को प्यार से सहलाता है। 

आप भी सुंदर और मजबूत 

इंसान बनेंगे, अपने कुम्हार

पर भरोसा रखिए, वह हमें 

टूटने नहीं देगा। 

अगर आपका कुछ जलाने का मन करे 

तो अपना क्रोध जला देना।

* क्यों न खुशी से जीने के बहाने ढूंढे,

गम तो किसी भी बहाने मिल जाता है...

* मनुष्य जन्म लेता है, बिना मुहुर्त के और बगैर 

मुहुर्त के देह त्याग देता है! 

लेकिन, सारी उम्र शुभ मुहुर्त के पीछे 

भागता रहता है!

* सबसे बड़ा मूर्ख तो वो है, 

जो एक पत्थर से 

दोबारा चोट खाये।

* जूते-चप्पल भले पहने रहें, पर

जात-पात 

धार्मिक भेदभाव 

ऊंच-नीच 

छुआ-छूत 

लिंग भेद 

जैसी मानसिकताएं कृपया यहीं उतार दें, 

स्वागत है...। 

(हर घर के दरवाजे पर 

यह पोस्टर होना चाहिए।)

* जब जेब में हैं पैसे 

लोग पूछते हैं, 

आप हैं कैसे? 

जब हो जाओगे आप 

कंगाल 

तो कोई नहीं पूछने आएगा 

क्या है आपका हाल?

* याद रखें... 

सारा ज्ञान किताबों से 

नहीं मिलता। 

कुछ ज्ञान 

मतलबी लोगों 

से भी 

मिलता है...।

* जमाने में आये हो तो जीने का भी हुनर रखना...

दुश्मनों से कोई खतरा नहीं, बस अपनों पर नज़र रखना। 

* अपने काम और कर्तव्य के प्रति 

अगर आपको लगाव नहीं है 

तो आप कभी भी 

सफल नहीं हो सकते।

* ज़रा-सा ऊपर उठने को 

न जाने कितना गिर जाते हैं लोग 

पर नजरों से गिरकर कोई 

कहां उठ पाया है 

यह अक्सर भूल जाते हैं लोग।

* अदाकारी नहीं करते, 

मक्कारी नहीं करते। 

जिन्हें मेहनत से है मतलब, 

वो मक्कारी नहीं करते।

* जब पढ़े-लिखे लोग भी 

गलत बातों का समर्थन 

करने लगें तो यह समाज 

की सबसे बड़ी समस्या है। 

(डॉ. भीमराव आंबेडकर)

* तुम्हारा खुद का मन ही तुम्हारी 

नहीं सुनता और तुम निकल 

पड़ते हो दूसरों को नसीहत देने के लिए। 

(ओशो) 

* बात 

करने से ही 

बात बनती है, 

बात न करने से 

अक्सर 

बातें बनती हैं।

* खुशी का पहला... 

उपाय... 

पुरानी बातों को

ज्यादा न सोचा जाए। 

* सच कड़वा नहीं

होता है, बल्कि

हमारी जीभ को

मीठे झूठ की

लत लग गई है...

* किसी ने पूछा 

कि प्यार क्या है

हमने कहा

प्यार तो वो है

जो हद में रहकर

बेहद हो जाए...।

* आपकी अच्छाइयां,

भले ही अदृश्य

हो सकती हैं,

लेकिन

इसकी छाप हमेशा

दूसरों के हृदय में

विराजमान रहती है

* रिश्तों के बाजार में थोड़ा 

सोच समझकर रहना जनाब

यहां लोग वफादार कम,

अदाकार ज्यादा हो गए हैं।

* बुरे साथी के साथ बैठकर 

आप बुरे नहीं हो सकते, लेकिन

आप दागी जरूर

हो जाएंगे। इससे

साफ पता चलता है कि

संगत का भी प्रभाव पड़ता है।

* हाथों ने पैरों से पूछा

सब तुम्हें ही प्रणाम

करते हैं,

मुझे क्यों नहीं,

पैर बोला, उसके लिए

जमीन पर रहना

पड़ता है,

हवा में नहीं।

* अगर नशा करना है तो

मेहनत का करें

यकीन मानें,

बीमारी भी

सफलता वाली ही आएगी।

* मुकम्मल कहां हुई

जिन्दगी किसी की

आदमी कुछ खोता ही रहा

कुछ पाने के लिए।

* बुरे वक्त में कंधे पर रखा

गया हाथ कामयाबी पर बजायी

तालियों से ज्यादा

कीमती होता है।

* कामयाबी का बीज

हर किसी के अंदर

मौजूद है, बस

मेहनत और ज्ञान

से उसे

सीचना पड़ता है।

* इंसान कितना ही अमीर क्यों

न बन जाए...

तकलीफ बेच नहीं सकता

और सुकून खरीद नहीं सकता...

* फितूर होता है, हर उम्र में जुदा...

खिलौने, माशूका, रूतबा...

फिर खुदा...

* मेरे पास वक्त नहीं है, 

नफरत करने का उन लोगों से

जो मुझसे नफरत करते हैं...

क्योंकि मैं व्यस्त हूं

उन लोगों में 

जो मुझसे प्यार करते हैं।

* हमारी आखिरी उम्मीद

हम खुद हैं...

और जब तक हम हैं,

उम्मीद कायम है।

* आया था कोई 

पत्थरों के पास 

उन्हें देखा, 

और बोला 

मनुष्य बनो। 

पत्थरों ने भी देखा उसे 

और उसे दिया उत्तर 

हम नहीं हो पाये 

उतने अभी कठोर। 

(जर्मन कवि एरिक फ्रायड की लघु कविता)

मेरे दोस्त...

तुम कहा करते थे -

कि दुनिया इसलिए बची है

क्योंकि दुनिया में आज भी कुछ ईमानदार

बचे हुए है...

तो बुरा मत मानना मेरे दोस्त 

यह तुम्हारा भ्रम नहीं

अंधविश्वास था।

मेरे दोस्त...

ईमानदार तो आज खुद को भी नहीं

बचा सकते

बेचारे दुनिया को 

क्या बचाएंगे?

(चंद्र विद की छोटी कविता)

अंत में...

* थोड़े ठंडे दिमाग से सोचियेगा-गलती सबकी है। जिस फूलपुर सीट से कभी जवाहरलाल नेहरू चुनाव जीतते थे, वहां से जनता ने अतीक अहमद को चुना।

    जिन घरों की दीवारों पर गांधी, नेहरू, लोहिया, जयप्रकाश मौलाना, बाबा साहब जैसों की तस्वीरें सजती थीं, उन घरों में अब क्या है, सब जानते हैं। जिन फिल्मों में ‘न हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा’ जैसे गाने बजते थे, वहां भेजे में गोली मारी गई। एनकाउंटर स्पेशलिस्ट यानी हत्यारे को हीरो बनाया गया। सबने देखा, तालियां बजाईं। सवाल करने वालों को पुरातनपंथी कहा जाता है। पहले राजनीति का अपराधीकरण हुआ फिर अपराध का राजनीतिकरण। अपने धर्म जाति के गुंडे हीरो बने। किसने बनाये? सोचियेगा। सोचियेगा... कुछ मुझे सूझ रहा है। कुछ आपको सूझेगा। शायद कहीं बात पहुंचे।... वरना एक गुंडा मरेगा दूसरा पैदा होगा... होता रहेगा।

Thursday, April 13, 2023

पुरस्कार-तिरस्कार

    अन्न, पानी और हवा के बिना जीवन नहीं चलता। स्वास्थ्य, शिक्षा और धन का होना भी नितांत जरूरी है। इन सभी जरूरतों के पूरा होने के पश्चात भी इंसान का मन नहीं भरता। उसका बस चले तो वह क्या न कर दे। प्रशंसा, मान-सम्मान और नाम की भूख सदैव उसे बेचैन किए रहती है। उसे यह भी पता है कि प्रतिभावान अपने आप इज्जत पाते हैं। उन्हें कोई जोड़-जुगाड़ नहीं करना पड़ता, लेकिन पुरस्कार की भूख में पगलाये कुछ चेहरे खुद को महान मानते हुए दूसरों की आंख में धूल झोंकने में लगे रहते हैं। खूब हवा में उड़ते रहते हैं। जब कुछ हाथ नहीं लगता तो ईर्ष्या की भट्टी बन सुलगने लगते हैं। कहावत यह भी है कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। सच पर डाला गया पर्दा एक न एक दिन हटता या फटता ही है। नकली नोट ज्यादा दिन तक बाजार में नहीं चल पाते। असली नोट ही तिजोरियों में जगह पाते हैं और मेहनतकशों की इज्जत को बढ़ाते हैं। यही सच इंसानों पर भी चरितार्थ होता है। वास्तविक, विद्धानों, चरित्रवानों, मेहनतकशों और परोपकारियों का हर जगह सम्मान होता है। सच्चे समाजसेवक, नेता, अभिनेता, साहित्यकार, चित्रकार, पत्रकार, संपादक, उद्योगपति आदि को मान-सम्मान तथा प्रशंसा के लिए भटकना नहीं पड़ता। उनके कद्रदान उनकी शिनाख्त कर उन तक पहुंच ही जाते हैं। 

    विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाली शख्सियतों की मानवंदना करने वाली देशभर में ढेरों संस्थाएं हैं। समाज, शहर, प्रदेश और देश के दूरदर्शी पारखियों के द्वारा पुरस्कृत, सम्मानित करने की परिपाटी की नींव रखने का यकीनन यही ध्येय रहा होगा कि अंधेरे से लड़कर रोशनी फैलाने वाली हस्तियों के बारे में दूसरों को भी पता चले। वे उनसे प्रेरित हों। हर पुरस्कार और सम्मान में प्राप्तकर्ता के प्रति श्रद्धा और आस्था के साथ यह संदेश भी होता है कि उसे और कर्मठ होना है। उन सभी आशाओं और उम्मीदों पर पूरी तरह से सतत खरा उतरते रहना है, जो उससे लगाई गई हैं। अब तो न्यूज चैनल तथा नामी-गिरामी धनवान अखबार मालिकों ने भी विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को पुरस्कृत करना प्रारंभ कर दिया है, लेकिन यह सच भी अपनी जगह विराजमान है कि इनके पुरस्कृत करने का अपना-अपना स्वार्थ और तरीका है। अधिकांश चैनलों तथा अखबार मालिकों के कर्ताधर्ता अपने मनपसंद चेहरों को ढोल-नगाड़े बजाते हुए मंचों पर बिठाने के साथ-साथ पुरस्कृत करने का शानदार अभिनय करते हैं। इनके प्रायोजित भव्य कार्यक्रमों में शामिल होते हैं बड़े-बड़े उद्योगपति, नेता, चलते-फिरते समाज सेवक, अभिनेता और मंत्री-संत्री। यहां तक की केंद्रीय मंत्रियों तथा मुख्यमंत्रियों को भी सम्मानित करने परंपरा चला दी गई है। बड़े-बड़े मीडियावाले संबंध बनाने और मोटे विज्ञापन पाने के लिए एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने पर उतर आये हैं। 

    भारत सरकार के द्वारा प्रतिवर्ष भारतीय नागरिकों को उनकी विशेष उपलब्धियों और उल्लेखनीय कार्यों के लिए प्रदत्त किये जाने वाले पद्म पुरस्कारों को लेकर भी कई तरह की बातें और शंकाएं व्यक्त की जाती रही हैं। अभी हाल ही में भारत वर्ष की माननीय राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने जिन हस्तियों को पद्म सम्मानों से विभुषित किया उन्हीं में कर्नाटक के बिदरी शिल्प के कलाकार शाह रशीद अहमद कादरी का भी समावेश है। पद्मश्री सम्मान समारोह के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह सभी सम्मानितो से मिले और बधाई तथा शुभकामनाएं दीं। मंजे हुए खिलाड़ी, सिद्धहस्त कलाकार कादरी ने प्रधानमंत्री के समक्ष नतमस्तक होकर अपने दिल की बात कहने में देरी नहीं लगाई, ‘मैंने तो कभी सोचा ही नहीं था कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार मुझे इस गौरवशाली सम्मान के लायक समझेगी। मैंने इस पद्म अवार्ड के लिए निरंतर दस साल हाथ पैर मारे। हर साल अपनी प्रोफाइल बनाने में 12 हजार रुपये की आहूति दी, लेकिन अंतत: निराशा ही हाथ लगी। केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद तो यह सोचकर मैंने प्रोफाइल बनानी ही छोड़ दी कि, जब मुसलमानों की हितैषी कही जाने वाली कांग्रेस सरकार ने मेरी कद्र नहीं की तो उस भाजपा से क्यों उम्मीद रखना, जिसे मुसलमानों का कट्टर शत्रु माना जाता है, लेकिन घोर आश्चर्य... मेरी पूर्वाग्रह से ओतप्रोत सोच को मोदी सरकार ने पूरी तरह से गलत साबित कर दिया है। पद्मश्री कादरी इतने गदगद हुए कि उन्होंने तमाम न्यूज चैनलों पर यह कहने में जरा भी देरी नहीं लगायी अब तो कांग्रेस से मेरा हमेशा-हमेशा के लिए मोहभंग हो गया है। भाजपा ही मेरी माई-बाप है। मेरे साथ-साथ मेरे स्वजनों के वोट भाजपा के लिए पक्के हो गए हैं। अब मेरी दिली तमन्ना है कि पूरे देश और दुनिया में सिर्फ नरेंद्र मोदी की ही जय-जयकार हो।  

    सरकारें भी साहित्यकारों तथा पत्रकारों को भी समय-समय पर पुरस्कृत करती रहती हैं। बात जब साहित्य की होती है तो यह जान लेना भी अत्यंत आवश्यक है कि अच्छे अनुभवी, संस्कारित लेखकों के अभाव के चलते पाठकों ने भी पढ़ने-पढ़ाने से दूरी बनानी प्रारंभ कर दी है। फिर भी अपने यहां हर वर्ष असंख्य नई-नई पुस्तकों का प्रकाशन होता है। अधिकांश कविता संग्रह, गीत संग्रह, गजल संग्रह, निबंध संग्रह, कहानी संग्रह छपवाने के लिए रचनाकारों को अपनी जेब ढीली करनी पड़ती हैं। आत्ममुग्ध लेखक-लेखिकाएं अपनी कृतियों को मित्रों, रिश्तेदारों को भेंट स्वरूप देकर गदगद होते रहते हैं यह भी सच है कि- मुफ्त में मिली किताबों को कोई नहीं पढ़ता। अंतत: रद्दी की टोकरी के हवाले हो जाती हैं। कुछ सुलझे हुए कवि, कहानीकार, उपन्यासकार हैं, जिनको प्रकाशक खुशी-खुशी छापते हैं। कुछ न कुछ रायल्टी भी देते रहते हैं। प्रशंसा पाने को लालायित कुछेक रचनाकार पुरस्कार के लिए पगलाये रहते हैं। देशभर में जहां-तहां फैली कई संस्थाएं हैं, जो उन्हें पुरस्कार देकर खुश करती रहती हैं। इनमें से कुछ ईमानदारी से नवाजती हैं तो कुछ लेन-देन से बाज नहीं आतीं। अब तो देश के प्रकाशक गुलशन नंदा, वेदप्रकाश शर्मा, प्रेम वाजपेयी, परशुराम शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक, केशव पंडित आदि की पुरानी किताबों को धड़ाधड़ छापने और बेचने की तैयारी में हैं। यह वो कलमकार हैं, जिनपर लुगदी साहित्य रचने और प्रकाशित करवाने के आरोप लगा करते थे। फिर भी इनके पाठकों की संख्या लाखों में थी। ऐसे में अब उन लेखकों का क्या होगा, जिनसे धन लेकर मुश्किल से दो-तीन सौ पुस्तकें प्रकाशित की जाती हैं, जो पाठकों तक पहुंच ही नहीं पातीं हैं। ऐसा भी नहीं कि सभी लेखक बदकिस्मत हैं। अच्छी रचनाओं को पढ़ने वाले पाठक आज भी हैं। भले ही यह राग अलापा जाता रहे कि छपे शब्दों की कोई कीमत नहीं रही। सोशल मीडिया ने सब कबाड़ा कर दिया है। कुछ लेखक अपनी ऐसी-वैसी पुस्तकें धड़ाधड़ छपवाते ही इसलिए हैं कि उन्हें कोई न कोई सरकारी पुरस्कार मिल जाए। लेकिन, जब उनकी मंशा पूरी नहीं होती तो पुरस्कृत होने वाली हस्तियों के बारे में ऊल-जलूल बकवास करते हुए ईर्ष्या की आग की भट्टी में जलने लगते हैं। विद्वान चयनकर्ताओं पर भेदभाव और पक्षपात के आरोपों की झड़ी लगाने वालों को इस बात की भी चिंता नहीं रहती कि अपनी बेहूदा अमर्यादित भड़ास की वजह से वे हंसी का पात्र बनते हुए खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे की कहावत को चरितार्थ कर रहे हैं।

Thursday, April 6, 2023

गुनाह की खौफनाक लकीर

    कई बार पढ़ा और सुना है। खुद देखा और अच्छी तरह से महसूसा भी है। पिता और बेटी के पवित्र रिश्ते को शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। इतनी बड़ी सृष्टि में जन्म लेने के बाद बेटियां सिर्फ पिता के ही करीब होती हैं। बचपन में उन्हें अपने जन्मदाता की गोद में ही सुकून मिलता है। पिता की निकटता उनके लिए हर तरह की सुरक्षा का आश्वासन होती है। पिता को भी बेटी को अपनी पलकों में बिठाए रखने में जो खुशी मिलती है उसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मनोवैज्ञानिक तो यह भी कहते हैं कि पिता ही बेटी का पहला ऐसा नायक और सच्चा मित्र होता है, जो कभी भी नहीं बदलता। बेटियां चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाएं, लेकिन पिता के प्रति उनका यकीन अटल रहता है कि उनका यह ताकतवर आदर्श हीरो उन्हें हर संकट से बचा ले जाएगा। दरअसल, माता-पिता अपने बच्चों की सिर्फ परवरिश ही नहीं करते, उन्हें बेहतर संस्कार देने में भी कोई कमी नहीं करते। उन्हें सतत सही और गलत से अवगत कराते रहते हैं। 

    यह जगजाहिर सच है कि बच्चों को पालने-पोसने में मां की अहम भूमिका होती है। बेटियों का भले ही शुरू से ही पिता के प्रति लगाव और झुकाव रहता है, लेकिन इससे उदार माताओं को कोई आपत्ति नहीं होती। बेटे उनकी इस कमी को पूरा कर ही देते हैं। सच तो यह भी है कि मां और बेटी का रिश्ता भी बड़ा अनमोल तथा प्यारा होता है। मां-बाप को यदि मैं ऐसी रेलगाड़ी कहूं, जो अपनी संतानों को अपनी अंतिम सांस तक सुरक्षित यात्रा करवाते हैं तो गलत नहीं होगा। यह मां-बाप ही हैं, जो बच्चों के लिए कोई भी कुर्बानी देने को हमेशा तत्पर रहते हैं। ऐसे में ऐसा सच...! ऐसी भयावह खबरें? 

    महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में अपनी ही मासूम अबोध बच्ची से दुष्कर्म कर उसको मौत के घाट उतारने वाले हत्यारे पिता को 20 साल की कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई है। विशेष सत्र न्यायालय के न्यायाधीश को भी जन्मदाता के इस निर्दयी, राक्षसी अपराध ने झिंझोड़ कर रख दिया। फैसला सुनाते वक्त उनके पूरे बदन में कंपकपी-सी छूटने लगी। अपनी जन्मदाता की अंधी वासना की शिकार हुई मात्र पांच साल की बच्ची के दादा-दादी एक शादी समारोह में शामिल होने के लिए शहर से बाहर गये थे। घर में मां, बड़ा भाई और यह नराधम बाप था, जिसने काफी शराब चढ़ा रखी थी। रोज की तरह नशे में उसने पत्नी को अंधाधुुंध मारा-पीटा। बच्चे रोते-गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन शैतान की गंदी जुबान और हाथ चलते रहे। लिहाजा त्रस्त मां को हमेशा की तरह पड़ोसी के घर शरण लेनी पड़ी। उसके बाद रात करीब 12 बजे जब राक्षस का नशा कुछ कम हुआ तो वह पत्नी और बच्चों को मनाने के लिए पड़ोसी के घर जा पहुंचा, लेकिन पत्नी ने वापस आने से इनकार कर दिया। उसे बड़ा गुस्सा आया। गुस्से-गुस्से में उसने बच्ची को उठाया और घर ले आया। पत्नी पहले तो जैसे-तैसे मान जाती थी, लेकिन इस बार उसके नहीं लौटने की जिद ने उसे गहन संशय और अचम्भे में डाल दिया। इसका कहीं न कहीं किसी के साथ जरूर कोई चक्कर चल रहा है। साली मुझे बेवकूफ समझती है। कुछ देर तक उसने उसकी राह देखी, लेकिन जब वह नहीं लौटी तो गुस्से के साथ-साथ उस पर वासना का भूत सवार हो गया। मासूम बच्ची पिता का यह अकल्पनीय शैतानी रूप देखकर चीखती-चिल्लाती रही, लेकिन बेखौफ जानवर ने उस पर नृशंस बलात्कार कर ही डाला। अगले दिन की सुबह मां ने जब बच्ची को बेसुध हालत में लहूलुहान फर्श पर पड़े देखा तो वह उसे डॉक्टर के पास ले गई। डॉक्टर से भी बच्ची की हालत नहीं देखी गई। बलात्कारी पिता के पास कोई जवाब नहीं था। हालांकि उसने भटकाने की बहुतेरी कोशिशें कीं, लेकिन सच तो अपनी जगह पर कायम था...। 

    मेरठ में एक मां ने तंत्र-मंत्र और प्रेम प्रसंग के फेर में अपने दस साल के बेटे और छह साल की बेटी का खात्मा कर डाला। जननी की हवस और अंधविश्वास की बलि चढ़े दोनों मासूम अपनी मां को दिलो जान से चाहते थे। निशा नामक इस दुराचारिनी की छह साल की बेटी अक्सर डायरी में कुछ न कुछ लिखा करती थी। एक पन्ने पर उसने लिखा, माई मदर इज सो...सो... ब्युटीफुल। उसे कहां पता था कि मां के खूबसूरत चेहरे के पीछे एक और चेहरा छिपा है, जो बेहद क्रूर और घिनौना है। यह हत्यारिन जाने-अनजाने लोगों के कष्ट दूर करने के लिए दुआ कर उन्हें पानी देती थी। उसे यकीन था कि उसकी दुआ से लोगों की तकलीफें दूर होती हैं, उनके बिगड़े काम बन जाते हैं। मनचाही मुरादें भी पूरी हो जाती हैं। दूसरों के उपकार में अंधी हुई निशा के मन में किसी ने यह बात बिठा दी थी कि अगर वह अपने बच्चों की बलि दे देगी तो उसकी रूहानी ताकत में और भी जबरदस्त इजाफा हो जाएगा। उसके दुआओं वाले पानी को पाने के लिए दूर-दूर से लोग आएंगे और चारों तरफ उसके नाम का डंका बजने लगेगा। अंधी वासना के दलदल में धंस कर मां के ममत्व को कलंकित करने वाली निशा को अदालत क्या सज़ा देगी यह तो आने वाला वक्त बतायेगा, लेकिन उसके पति ने कब्रिस्तान में ही तीन तलाक बोल कर उसे हमेशा-हमेशा के लिए अपनी जिन्दगी से दूर कर दिया है। पति के इस निर्णय से वहां पर मौजूद सभी लोग सन्न रह गए। कब्रिस्तान में तलाक बोलने का शायद यह पहला मामला हो सकता है। अमूमन देखा और सुना जाता है कि संगीन से संगीन अपराधी को बचाने के लिए परिजन पूरी तरह से अंधे हो जाते हैं। उन्हें उसके अपराध की जानकारी तो होती है, लेकिन वे उसे बचाने के लिए मजबूत कवच बन एकजुट हो जाते हैं। लेकिन कातिल निशा के मायके वालों का गुस्सा तो ऐसा फूटा कि उन्होंने उससे हमेशा-हमेशा के लिए नाता तोड़ने का ऐलान कर दिया। सभी ने एक स्वर में यही कहा कि, हम इसकी कोई मदद नहीं करेंगे। निशा के भाई ने उसके मुंह पर थूकते हुए कहा कि सरकार तुरंत इसे फांसी की सजा सुना दे तो मैं खुद इसे फांसी पर लटकाऊंगा। मुझे जल्लाद बनने में कोई हिचक नहीं होगी।