Thursday, June 15, 2023

चुप रहने वालों को चिल्लाना भी आता है...

     देश के नागरिकों के आपसी व्यवहार से ही देश की अच्छी और बुरी छवि बनती है। एक-दूसरे के प्रति सद्भाव, आदर-सम्मान और समानता की सोच देश ही नहीं वहां के रहनेवालों का भी सम्मान बढ़ाती है। इससे देश की एकता का भी पता चलता है। हम देशवासी जब अमृत महोत्सव मना रहे हैं, भारत की तरक्की के गीत गा रहे हैं, तब धड़ाधड़ सुर्खियां पातीं दलितों पर अत्याचारों की खबरें उत्सव, महोत्सव की गरिमा को कमतर करते हुए यह भी कहे जा रही हैं कि, जब तक हर भारतवासी को अपने अंदाज से जीने, रहने, खाने, पीने और उत्सव मनाने की आजादी नहीं, तब तक कोई भी महोत्सव अधूरा है। बेहतरीन आकर्षक परिधान धारण करने, खाने-पीने, रहने, पाने-भोगने तथा देश में कहीं भी आने-जाने की सभी को आजादी है, लेकिन कुछ लोगों को सिर्फ अपनी खुशी सुहाती है। दूसरों को हंसते-मुस्कराते देखना भी उन्हें हर्गिज गवारा नहीं। वे इस सच को पूरी तरह से भूल गये हैं कि मनुष्य जन्म से नहीं, बल्कि कर्म से ऊंचा या नीचा होता है। 

    गुजरात के एक गांव में तथाकथित ‘उच्च जाति’ के कुछ लोगों ने एक दलित युवक को जब धूप के चश्मे और नये परिधान में देखा तो वे उसपर यह कहते हुए भूखे शेर की तरह टूट पड़े कि, तू आजकल बहुत ऊंची उड़ान भर रहा है। तेरे पर काटने ही पड़ेंगे। उनके हाथ में लाठियां थीं और जुबान पर गंदी-गंदी गालियां। अपने बेटे को पिटता देख मां बचाने के लिए दौड़ी-दौड़ी आई तो उसे भी निर्दयता से मर्यादाहीन होकर मारा गया तथा जिस्म से कपड़े तार-तार कर दिए गए।

    उत्तर प्रदेश के शहर अमेठी में दलित समाज के तीन नाबालिग बच्चों को बिजली के खम्भे से बांधकर कू्ररता के साथ पीटा गया। बच्चों को बचाने-छुड़वाने की बजाय वहां मौजूद लोग तमाशबीन बन म़जा लेते रहे। किसी को भी बच्चों पर किंचित रहम नहीं आया। बिजली के खंभे का करंट बच्चों की जान भी ले सकता था। इन बच्चों पर एसीसी सीमेंट फैक्टरी से स्क्रैप चोरी करने का आरोप था। 13 से 15 वर्ष के इन बच्चों को पुलिस के हवाले करने की बजाय उनपर ऐसी तालीबानी क्रूरता और गुंडागर्दी इसलिए बरपी, क्यूंकि वे गरीब, दलित और शोषित हैं? बच्चों के मां-बाप ने अपने बच्चों की गलती स्वीकार कर माफी भी मांग ली, लेकिन ठेकेदार के लठैतों का मन नहीं पसीजा। महाराष्ट्र के एक गांव में एक 24 वर्षीय दलित युवक को पीट-पीटकर मार डाला गया। हत्यारे गांव में उसके द्वारा बढ़-चढ़करअंबेडकर जयंती का आयोजन करने से गुस्साये थे। इसी तरह से मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड के छतरपुर इलाके में शादी के अवसर पर घोड़े पर सवार एक दलित युवक पर पथराव करने की खबर ने हमारे यहां के समाज का बदरंग चेहरा दिखा दिया। यूं तो देशभर में दलितों पर अमानवीय कहर ढाने की खबरें आती रहती हैं, लेकिन उत्तरप्रदेश, राजस्थान और बिहार तो इस मामले में खासे बदनाम हैं, जहां कुछ शैतान जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देते हुए सतत अशांति फैलाने में लगे रहते हैं। इन मदमस्त घमंडियों को दलितों का शानो-शौकत के साथ रहना, चलना, गाना, तरक्की कर सीना तानकर चलना बिलकुल अच्छा नहीं लगता। कई पढ़े-लिखे विद्वान किस्म के लोग भी दलितों को अपनी जूती के नीचे रखने की नीच हरकतें करते देखे जा सकते हैं। उत्तरप्रदेश के महोबा गांव में एक दलित छात्रा ने विद्यालय में रखे घड़े का पानी क्या पी लिया कि उसे अपमानित कर स्कूल से भगा दिया गया। रोती-बिलखती छात्रा ने घर जाकर जब पिता को शिक्षक की बदसलूकी की जानकारी दी तो पिता विद्यालय पहुंचे तो शिक्षक ने उनसे भी अभद्रता करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्हें जातिसूचक गालियां देकर वहां से भगा दिया गया। स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के मन-मस्तिष्क में इन ऊंचे लोगों के द्वारा कैसे-कैसे विष बोए जा रहे हैं उसकी जीती जागती हकीकत है यह खबर, जिसमें बताया गया है उच्च जाति के बच्चों ने स्कूल में खाना बनाने वाली दलित औरत के हाथ का बना खाना खाने से स्पष्ट इनकार कर दिया। यह खबर भी बहुतों ने जरूर पढ़ी होगी कि तामिलनाडु में एक ग्राम परिषद की बैठक के दौरान दलित महिला पंचायत अध्यक्ष और ग्राम परिषद की वार्ड सदस्य को जमीन पर बैठने के लिए मजबूर कर दिया गया, जबकि अन्य सदस्यों के लिए आन-बान और शान के साथ कुर्सियां उपलब्ध थीं।

    आजादी के इतने वर्षों के बाद भी अपने देश में कई गांव, कस्बे ऐसे हैं, जहां पर दलितों को सार्वजनिक कुंओं पर पानी नहीं भरने दिया जाता। देश के कई मंदिरों में उनके लिए जाना सख्त मना है। उन्हें सम्मानजनक नौकरी देने में भी आना-कानी की जाती है। भारतवर्ष के प्रधानमंत्री ने बड़े आहत मन से कहा है कि हमारे दलित भाई-बहनों पर हो रहे अत्याचार के मामलों के चलते उनका सिर शर्म से झुक जाता है। दरअसल, कुछ ऊंची जाति के लोग बदलते वक्त को स्वीकारने को तैयार नहीं। अब उन्हें कौन बताये और समझाये कि जमाना बड़ी तेजी से बदल रहा है, जिन्हें सहना आता है, उन्हें सीना तानकर कहना और विरोध करना भी आता है। इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। दलित चिंतक चंद्रभान प्रसाद दलितों पर हो रहे हमलों को लेकर कहते हैं कि दलितों में आ रही जागरुकता और मजबूती कुछ लोगों को बर्दाश्त नहीं हो रही। पहले दलितों पर हिंसक हमले नहीं होते थे। छोटी-मोटी मारपीट की घटनाएं होती रहती थीं, लेकिन पिछले 10-15 सालों से हिंसक वारदातें बेतहाशा बढ़ी हैं। जैसे-जैसे दलितों की तरक्की हो रही है, वैसे-वैसे उनपर हमले बढ़ रहे हैं। यह कानूनी समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक समस्या है। समाज के लोगों को खुले मन के साथ इस पर चिंतन-मनन करना चाहिए।

Thursday, June 8, 2023

बदलाव की मशाल

    एक खबर पढ़ी। दुनिया इन दिनों अकेलेपन से लड़ रही है। सच्चे दोस्त नदारद हैं। इंसान का इस तरह से खुद को अकेला महसूस करना बड़ा खतरनाक है। किसी अमेरिकन संस्था का सर्वे है कि अकेलापन एक दिन में 15 सिगरेट पीने के बराबर नुकसान करता है। यानी अकेलेपन से कैंसर एवं अन्य गंभीर रोगों का खतरा! कोरोना महामारी ने इंसानों को एकांतजीवी बनाने की नींव रखी। अपनों से भी पहले-सा लगाव नहीं रहा। बस एक ही भय कि कौन जाने कब यह दुनिया खत्म हो जाए। अपने हिस्से का जीवन जी लें। भरपूर मौजमस्ती कर ली जाए। सबकुछ समेट लिया जाए। दहशत, मतलबपरस्ती और भागम-भाग के ऩजारों के बीच कुछ खबरें ऐसी भी, जो बता रही हैं कि सुखद बदलाव के लिए कुछ लोग दूसरों की खुशी के लिए कोई भी कुर्बानी देने को तत्पर हैं। यह लोग अतीत में नहीं, वर्तमान में जीने के पक्षधर हैं। इनका मानना है कि वर्तमान ही भविष्य बदल सकता है। इसलिए वे रूढ़िवादी सोच, कुप्रथाओं और बौद्धिक पिछड़ेपन से समाज को मुक्ति दिलाने की लड़ाई में अकेले ही बेखौफ अग्रसर हैं। 

    इस आधुनिक दौर में भी कुछ कुरीतियों और विष-सी पुरातन परंपराओं ने भारतीय स्त्रियों का पीछा नहीं छोड़ा है। धर्म, इज्जत, मान-मर्यादा और संस्कारों के नाम पर जुल्म ढाने की प्रवृति आज भी कहर ढा रही है। पति की मौत के पश्चात गमगीन महिला की मांग का सिंदूर और उसकी चूड़ियों को तोड़ने के दृष्य कभी न कभी आपने भी जरूर देखे होंगे। विधवा होते ही अच्छी-खासी नारियों को सफेद लिबास पहनने को विवश करने का चलन कहीं कम तो कहीं ज्यादा आज भी बना हुआ है। उनकी आजादी पर अंकुश लगाने वाले कई परिवार आज भी संस्कारों के गीत गाते नहीं थकते। उनका मानना है कि पति को खोने के बाद पत्नी के लिए कुछ भी नहीं बचता। हंसी-खुशी, बोलना-बतियाना खत्म हो जाता है। परिवार और समाज से दूर सफेद परिधान में गम की काली चादर ओड़े रहना हर विधवा का मुकद्दर है। इसमें कहीं न कहीं ऊपर वाले की मर्जी भी है। इस निर्दयी परिपाटी को देखकर भी अक्सर यह सोच कर अनदेखा कर दिया जाता है कि यह तो सदियों से चली आ रही परंपरा है, जो सुहागन के विधवा होने की पहचान है। महाराष्ट्र के पुणे जिले की हवेली तहसील के मांजरी खुर्द की ग्राम सभा में एक ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है कि उनके गांव में अब पति की मौत के बाद महिला का न तो सिंदूर पोंछा जाएगा और न ही मंगलसूत्र तथा चूड़ियों को तोड़ा जाएगा। दरअसल हुआ यूं कि गांव के एक परिवार के युवक की आकस्मिक मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार के दौरान उसकी पत्नी के शरीर से गहने निकालने के दस्तूर को निभाने की तैयारी चल रही थी, तभी सामाजिक कार्यकर्ता अशोक आव्हाले ने उनके परिवार के सदस्यों से इस प्रथा को बंद करने का आग्रह करते हुए कहा कि अपने जीवनसाथी की मृत्यु से दुखी और निराश महिला का सिंदूर पोंछना, मंगलसूत्र और चूड़ियां तोड़ना, पैर की बिछिया उतारना एक तरह से उसको असहाय-अलग-थलग और नीचा दिखाना-दर्शाना है। वर्षों से चली आ रही इस अमानवीय कुप्रथा को खत्म करने के लिए हम सभी को आज और अभी पहल करनी होगी। उनके इस सुझाव को सभी ग्रामीणों ने तुरंत स्वीकृति दे दी। 

    जब हर तरफ तरक्की और बदलाव की लहर चल रही है तब अपने देश में तंत्र-मंत्र, अंधविश्वास और भूतप्रेत के शक की बीमारी का सीना ताने रहना चिंतित करने के साथ-साथ शर्मिन्दगी के दंश भी चुभोता है। सामंती सोच और अंधविश्वास की जंजीरों में जकड़े लोगों को दबे-कुचले पुरुषों तथा गरीब, असहाय महिलाओं को प्रताड़ित करने के बहानों की सतत तलाश रहती है। उनके खेतों की फसलें सूख जाएं, उजड़ जाएं, कुंओं का पानी नदारद हो जाए या फिर किसी को कोई जानलेवा बीमारी जकड़ ले तो दबंगों का ध्यान गरीबी, बदहाली से लड़ती अकेली औरत पर सबसे पहले जाता है। अभी हाल ही में झारखंड के एक गांव में कुछ लोगों ने डायन होने के शक में एक महिला को घर से जबरन उठाया और चौराहे पर लाकर मारपीट करने के बाद गांवभर में निर्वस्त्र घुमाया। उनकी मंशा तो उसे मौत के घाट उतार देने की थी, लेकिन कुछ समझदार लोगों के विरोध के चलते उनकी नहीं चल पाई। 

    वर्षों पहले ऐसा ही कुछ हुआ था बीरबांस गांव की छुटनी महतो के साथ, लेकिन उसने भाग खड़े होने की बजाय तंत्र-मंत्र और अंधश्रद्धा की जंजीरों में जकड़े अंधे-बहरे जुल्मियों का डट कर सामना करने की ठानी थी। छुटनी 12 साल की थी तभी घरवालों ने उसका ब्याह कर दिया था। वो वर्ष 1995 का कोई दिन था, जब उसके पड़ोसी की बेटी बीमार हो गई थी। कुछ लोगों ने तुरंत छुटनी पर शक की उंगलियां ताननी शुरू कर दीं कि इसी ने बच्ची पर कोई टोना-टोटका किया है, जिससे उसने एकाएक बिस्तर पकड़ लिया है। पंचायत ने भी छुटनी को डायन घोषित करने में देरी नहीं लगायी थी। उस पर पांच सौ रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। छुटनी ने जुर्माना भर दिया, लेकिन ग्रामीणों का उसके प्रति संदेह और रोष यथावत बना रहा। इसी दौरान एक सुबह छुटनी के मन में विचार आया कि उसने जब कुछ गलत किया ही नहीं तो सज़ा क्यों भुगती। किस गुनाह के लिए उसने तुरंत जुर्माना भर दिया? उसी दिन छुटनी ने कसम खाई कि अब वह शांत नहीं बैठेगी। बेकसूर औरतों को डायन घोषित कर प्रताड़ित करने वाले लोगों के खिलाफ खुलकर लड़ाई लड़ेगी। भले ही इसके लिए उसे कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। तब अपने ही समाज के अंधविश्वासी पुरुषों तथा स्त्रियों के खिलाफ लड़ाई लड़ना कोई आसान काम नहीं था। छुटनी को जैसे ही किसी महिला को डायन करार देने की खबर मिलती तो वह उसके पक्ष में डटकर खड़ी हो जाती और उस महिला को सहारा देकर उसका हौसला बढ़ाती। छुटनी की इस क्रांतिकारी पहल का जहां शुरू-शुरू में कई ग्रामीणों ने विरोध किया, लेकिन आज सभी उसके साथ खड़े नजर आते हैं। अकेली छुटनी अब तक 200 से ज्यादा महिलाओं को दबंगों की प्रताड़ना से बचाकर उनका पुनर्वास कर चुकी है। दुखियारी महिलाओं को जागृत कर उनकी हिम्मत बढ़ाने का कीर्तिमान रच रही छुटनी को 2021 में भारत सरकार के द्वारा ‘पद्मश्री’ सम्मान से नवाजा जा चुका है। आज छुटनी जहां से भी गुजरती है, वहां पर उसे सम्मानित करने वालों की कतार लग जाती है। दूर और आसपास के गांवों के आम और खास लोग भी उसे अपने यहां निमंत्रित कर फूले नहीं समाते। वे भी चाहते हैं कि उनके यहां भी कोई हिम्मती छुटनी सामने आए जो कुप्रथाओं के खिलाफ जंग लड़ने की पहल की मशाल जलाए।

Thursday, June 1, 2023

आइए इनसे मिलें

    कठिन परिश्रम और लक्ष्य के प्रति अटूट समर्पण हो तो हर मुश्किल और अड़चन को मात देकर मनचाही सफलता और मंजिल पाई जा सकती है। इसे सिद्ध कर दिखाया है उन जूनूनी छात्रों ने, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों से डटकर जंग लड़ी और उस बुलंदी को छुआ जो दूसरों के लिए अकल्पनीय थी। उनकी आकाशी सफलता में उनके माता-पिता के योगदान के बारे में जानकर बस यही कहने को मन होता है कि ऐसे जन्मदाता अपनी संतान के लिए भगवान से कम नहीं। यह भी सच है कि प्रत्येक माता-पिता अपने बेटे-बेटी की लगभग हर चाहत को पूरा करने की कोशिश करते हैं। उन्हें उच्च शिक्षित करने के लिए रात-दिन खून पसीना बहाते हैं। कई संतानें सभी सुख-सुविधाओं में पलने-बढ़ने के बाद भी अपने माता-पिता के सपनों को पूरा नहीं कर पातीं। अत्याधिक धन उन्हें बिगाड़ देता है, लेकिन कुछ गरीबों के बच्चे वो कर दिखाते हैं, जिसकी किसी को उम्मीद नहीं होती। शारीरिक कमजोरी को भी मात देने का उनका जिद्दी जज़्बा हर किसी को हतप्रभ कर देता है।

    सूरज तिवारी ने तो वाकई सभी को स्तब्ध कर दिया है। किसी को ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि वह यूपीएससी यानी यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा इतने अच्छे नंबरों से पास कर दिखायेगा। सूरज के प्रति लोगों की सोच और धारणा का कारण था, उसका अत्याधिक अपंग होना। 26 वर्षीय सूरज को 2017 में गाजियाबाद के दादरी में एक रेल दुर्घटना में अपने दोनों पैरों के साथ-साथ अपने दाहिने हाथ और बाएं हाथ की दो अंगुलियों को सदा-सदा के लिए खोना पड़ा था। कुछ माह पूर्व ही सूरज के बड़े भाई की मौत हुई थी। इन दोनों सदमों ने माता-पिता को अथाह दु:ख के समंदर में डुबो दिया था। दरअसल पूरे परिवार के लिए यह अत्याधिक चिंता, पीड़ा भरा वो काल था, जिससे बाहर निकलना आसान नहीं था। सूरज के पिता अदने से दर्जी हैं। तय है कि कमाई सीमित है। जैसे-तैसे दाल रोटी का ही इंतजाम हो पाता है। सूरज के दो अन्य भाई-बहन भी हैं। इस दुर्घटना के बाद सूरज के दिमाग ने तो काम करना ही बंद कर दिया था। हमेशा-हमेशा के लिए व्हील चेयर पर होने को मजबूर सूरज ने परिस्थितियों के समक्ष घुटने टेकने की साची,  लेकिन तब मां-बाप के साथ-साथ और भी कोई था जो अंदर से उसेे प्रेरित कर रहा था... ‘‘तुम अगर ठान लो तो कुछ भी असंभव नहीं। कब तक मां-बाप पर बोझ बने रहोगे? ऐसा जीना भी कोई जीना है?’’ सूरज ने बड़े दमखम के साथ खुद को डिप्रेशन के दौर से बाहर निकाला। टूटे-फूटे लस्त-पस्त शरीर की चिन्ता करने की बजाय दिमाग से काम लेते हुए यूपीएससी की परीक्षा की सघन तैयारियां प्रारंभ कर दीं। अपने पहले प्रयास में उसे असफलता मिली, लेकिन फिर भी हौसले का दामन नहीं छोड़ा। पिता भी दिन-रात अधिक से अधिक मेहनत कर धन कमाने और उसका मनोबल बढ़ाने में लगे रहते। अपने पिता की आशा पर खरा उतरने के लिए सूरज ने अध्ययन में दिन-रात एक कर दिया और अपने दूसरे प्रयास में यूपीएससी परीक्षा में शानदार सफलता हासिल कर दिखा दिया है कि सच्ची लगन और मेहनत इंसान की हर इच्छा को पूरा करती है। शारीरिक कमी और कमजोरी कोई मायने नहीं रखती। 

    सिविल सेवा परीक्षा का इम्तिहान पास कर आईएएस अधिकारी बनने का सपना तो न जाने कितने लड़के-लड़कियां देखते हैं, लेकिन सभी की मंशा पूरी नहीं होती। दरअसल मात्र सपने देखने से कुछ नहीं होता। उन्हें हकीकत में बदलने के लिए पूरी ताकत लगानी पड़ती है। हार कर बैठने की भूल से हर पल बचना होता है। सिविल सर्विस परीक्षा 2021 में 46वीं रैंक प्राप्त करने वाली राम्या को अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए असफलताओं का भी मुंह देखना पड़ा। राम्या का यूपीएससी का सफर भी मुश्किलों भरा रहा, लेकिन जिद थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, लेकिन हार नहीं माननी है। तंज कसने वालों को सफल होकर दिखाना है। राम्या का छठा प्रयास अंतत: रंग लाया। राम्या की मां भी बेटी के साथ डटकर साथ खड़ी रहीं। उन्होंने अपनी पुत्री का मनोबल कभी भी कमतर नहीं होने दिया। 

    नागपुर शहर के पवित्र स्थल दीक्षाभूमि स्थित डॉ. आंबेडकर कॉलेज की मेघावी छात्रा भूमिका बोदले के पिता ऑटो चालक हैं। उन्होंने अपनी बेटी को पढ़ाने-लिखाने का जो संकल्प लिया था, उस पर डटे रहे। बेटी ने भी कला संकाय में 80 प्रतिशत से अधिक नंबर लेकर उनके भरोसे को और बलवति बनाने का कीर्तिमान रच कर दिखा दिया है कि जिनकी कुछ बनने की चाह होती है उनके लिए कोई भी व्यवधान अवरोध नहीं बन सकता। भूमिका की मां दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा लगाती हैं। भूमिका को कालेज की पढ़ाई के साथ-साथ घर की जिम्मेदारी भी संभालनी होती थी, लेकिन फिर भी उसने पढ़ने-लिखने में कभी कोई कमी नहीं की।

    नागपुर में स्थित एलएडी की छात्रा सलोनी दृष्टिहीन है। उसने बारहवीं कक्षा में कला शाखा में 80 प्रतिशत अंक प्राप्त कर दिखा दिया कि जहां चाह होती है वहीं राह होती है। अंदर का उजाला हर अंधेरे का खात्मा कर देता है। दृष्टिहीनता कोई मायने नहीं रखती। सलोनी के पिता गांव में एक छोटी सी दुकान चलाते हैं। सलोनी नागपुर में अपने किसी रिश्तेदार के यहां रहकर अध्ययन करती है। उसने दिन-रात आडियो रिकॉर्डिंग सुनकर बारहवीं की पढ़ाई कर सफलता का परचम लहराया। सलोनी प्रशासकीय सेवा में जाकर देश की सेवा करने की अभिलाषी है। 

    गिरीश डोंगरे ने 69 प्रतिशत अंक प्राप्त किए। आप कहेंगे यह कौन सी बड़ी बात है। आजकल तो विद्यार्थी नब्बे-पंचानवें प्रतिशत नंबर तो चुटकियां बजाते ही पा जाते हैं। गिरीश यदि एकदम स्वस्थ होता तो उसका यहां जिक्र ही नहीं किया जाता। दरअसल, गिरीश को बचपन से सिकलसेल जैसी गंभीर बीमारी है। इस बीमारी के शिकार को जानलेवा पीड़ा से गुजरना पड़ता है। इसके अधिकांश मरीज बिस्तर ही पकड़ लेते हैं। इस कष्टदायक बीमारी के कारण गिरीश के लिए परीक्षा केंद्र में बैठना ही अत्यंत मुश्किल था, लेकिन उसने जबरदस्त पीड़ा को झेलते हुए भी परीक्षा दी और इतने नंबर हासिल कर दिखाए, जो अधिकांश लोगों के लिए नगण्य हैं, लेकिन वह और उसके परिजन इतने में ही खुश और संतुष्ट हैं। गिरीश की ग्रेजुएशन की पढ़ाई के बाद एक प्रभावी चित्रकार बनने की तमन्ना है। इंदौर के मृदुल पाल ने हाईस्कूल की परीक्षा में प्रदेश में शीर्ष स्थान हासिल किया हैै। मृदुल के परिवार की आर्थिक स्थिति कतई अच्छी नहीं। मां सिलाई का काम तो पिता स्विमिंग पूल के इंचार्ज हैं। उसका बड़ा भाई भी पढ़ाई कर रहा है। यानी खर्चों की तुलना में आमदनी नगण्य है। मृदुल को बचपन में ही समझ में आ गया था कि उसके जीवन का आगामी सफर संकटों और कंटकों भरा रहने वाला है। उसने इस स्थिति को खुशी-खुशी स्वीकारा। उसके साथ के छात्रों ने कोचिंग में लाखों रुपये खर्च किए, लेकिन मृदुल ने अपने दम पर यह सफलता हासिल की है। स्कूल में पढ़ाई करने के पश्चात घर में भी वह किताबों में डूबा रहता था। पढ़ाई के सिवाय उसका और कोई खास दोस्त नहीं। अपने काम से काम रखने वाला मृदुल खूब पढ़-लिखकर बड़ा आदमी तथा अपने माता-पिता का सहारा बनना चाहता है।

Thursday, May 25, 2023

हम गवाह हैं...

    इस दुनिया में कौन है, जिसे बच्चों का हंसना-मुस्कराना न भाता हो। नवजात के आगमन पर किसका चेहरा न खिल जाता हो। बेटा हो या बेटी, मां-बाप के लिए तो दोनों दुलारे और दिलो-जान से प्यारे होते हैं। दादा-दादी, नाना-नानी उनमें अपना चेहरा देखते हैं। माता-पिता के साथ-साथ उन्हें भी यही लगता है कि उन्होंने इनके रूप-स्वरूप में फिर से धरा पर जन्म ले लिया है। फ्रेम में सजी अपने बच्चे की तस्वीर जिस खुशी से रूबरू करवाती है उसका शब्दांकन करना मुश्किल है। दरअसल, बच्चे फूल होते हैं, तितली होते हैं, मनमोहक बाग के हरे-भरे नाजुक पत्ते और टहनियां होते हैं, जिनके निरंतर फलने-फूलने का हर माली को इंतजार रहता है। कोई भी संवेदनशील इंसान उन्हें तोड़ने, बिखेरने और मसलने के पाप का भागीदार नहीं बनना चाहता, लेकिन अपवादों का क्या? उनकी बेरहमी के किस्से हर दिन अखबारों, न्यूज चैनलों तथा सोशल मीडिया में आ-आकर डराते और चौंकाते रहते हैं। दरअसल ऐसे शैतान हमारे आसपास के ही वासी हैं। यह दिखते कुछ हैं और होते कुछ और हैं। नकली और दिखावटी जिन्दगी जीने वालों में अनपढ़ भी हैं, पढ़े-लिखे भी। हैरानी भरा सच यह भी है कि इन्हें दूर से देखो तो कभी-कभी यह भी लगता है कि यह तो शरीफों की औलाद हैं। इस धरती के भगवान हैं, लेकिन जब इनकी असलियत सामने आती है तो शैतानियत भी पानी-पानी हो जाती है। देखने और सुनने वालों की रूह कांप जाती है। 

    अदालत, सीआईडी, क्राइम अलर्ट तथा सावधान इंडिया जैसे चर्चित धारावाहिकों में जानदार अभिनय कर लाखों दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ-साथ सतर्कता और जागरुकता का पैगाम देने वाली खूबसूरत अभिनेत्री चंद्रिका साहा के पति अमन मिश्रा ने अपने 15 माह के बेटे को बेडरूम में पटक-पटक कर अधमरा कर दिया। अमन को बच्चों से नफरत थी। जब से उसकी पत्नी ने गर्भ धारण किया तभी से वह बौखलाया रहता था। दोनों में अक्सर लड़ाई-झगड़ा होना आम बात थी। इक्कीस वर्षीय अमन की इक्तालीस वर्षीय पत्नी चंद्रिका को वर्षों से मां बनने की प्रबल चाह थी। चंद्रिका का 2020 में अपने पहले पति से तलाक हो गया था। हट्टे-कट्टे आकर्षक जवान अमन से किसी पार्टी में मुलाकात हुई और फटाफट प्यार भी हो गया। शादी करने में भी देरी नहीं लगायी, लेकिन जो प्रतिफल मिला उसके दंशों से छुटकारा पाने में अभिनेत्री की तो उम्र बीत जाएगी...। 

    छत्तीसगढ़ के भिलाई में स्थित शंकरा मेडिकल कॉलेज में धरती के भगवान कहलाने वाले डॉक्टरों ने अपना जो शैतानी चेहरा दिखाया उससे तो मानवता भी कराहने को विवश हो गई। बेमेतरा के पथरी गांव निवासी एक महिला की डिलीवरी के दौरान मौत हो गई। नवजात की भी हालत अत्यंत नाजुक थी। उसे सांस लेने में अत्यंत तकलीफ हो रही थी। डॉक्टरों ने बच्चे का इलाज करने से पहले तुरंत परिजनों से दस हजार रुपये की मांग की, लेकिन उनके पास इतने रुपये नहीं थे, इसलिए उन्होंने हाथ जोड़ते हुए डॉक्टरों से कुछ घंटे का समय मांगा, लेकिन धनप्रेमी डॉक्टर नहीं माने। उन्होंने तुरंत नवजात को यह कहते हुए वेंटिलेटर से हटाकर उनके हाथ में रख दिया कि यहां उधारी में किसी का इलाज नहीं होता। कुछ ही घंटों के बाद नवजात ने तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। इस नृशंस हत्या की खबर को दबाने-छिपाने के लिए डॉक्टरों ने भरसक प्रयास किए। मीडिया को भी सेट करने की कोशिशें कीं, लेकिन सच उजागर हो ही गया। 

    भारत में अमीरी चंद लोगों की जागीर है। गरीबी और बदहाली अधिकांश भारतीयों की तकदीर है। मैंने जब यह खबर पड़ी कि पश्चिम बंगाल में एक गरीब असहाय बाप को एम्बुलेंस का किराया नहीं होने के कारण पांच महीने के अपने बच्चे का शव बैग में डालकर बस से 200 किलोमीटर की पीड़ादायक यात्रा तय करनी पड़ी तो मेरे दिमाग की नसें हिलने लगीं और पूरा वजूद सन्नाटे के ठंडे समंदर में समा-सा गया। आशीम देवशर्मा के पांच महीने के बच्चे की सिलीगुड़ी नार्थ बंगाल मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में इलाज के दौरान मौत हो गई थी। गरीब, बदहाल बाप ने अपने बच्चे को किसी भी तरह से बचाने के लिए इधर-उधर से 16 हजार रुपये जुटाकर डॉक्टरों की जेब के हवाले किए थे, लेकिन अब उसकी लाश उसके सामने थी। बेटे को खोने के गम में डूबे खस्ताहाल पिता से अस्पताल के संचालकों ने एम्बुलेंस के लिए आठ हजार रुपये की मांग कर दी तो असहाय जन्मदाता ने बच्चे के शव को बैग में डाला और चुपचाप बस में बैठ गया। इस दौरान इस बदनसीब बाप ने किसी यात्री को भनक तक नहीं लगने दी कि बैग में उसके मृत दुलारे की लाश है। दरअसल उसे भय था कि यदि किसी को पता चल गया तो उसे फौरन बस से उतार दिया जाएगा। 

    नारंगी नगर नागपुर के अस्पताल में कार्यरत नर्स मायरा गुप्ता बिना किसी स्वार्थ के मरीजों की सेवा, सहायता और देखभाल में तल्लीन रहती हैं। अधिकांश नर्सें और डॉक्टर जहां घड़ी देखकर ड्यूटी बजाते हैं, वहीं मायरा को समय का कतई ध्यान नहीं रहता। मायरा देश की पहली ट्रांसवुमन हैं। हंसमुख और मिलनसार स्वभाव की मायरा को कुछ वर्ष पूर्व तक विक्रम गुप्ता के नाम से जाना जाता था। पुरुष से स्त्री बनने के बाद उसने नर्सिंग का प्रशिक्षण लिया ही इसलिए ताकि बिना किसी स्वार्थ के मरीजों की सेवा कर सके। मायरा के मन-मस्तिष्क में आज भी वो पल कैद हैं, जब एक नन्हें से बच्चे की आंख का आप्रेशन होने के बाद उसकी पट्टी निकाली गई थी। तब बच्चे के घर के लोग उसे घेर कर खड़े थे, लेकिन आंख खुलते ही बच्चा अपने परिजनों के पास जाने की बजाय मायरा के गले में हाथ डालकर बड़े प्यार से लिपट गया। उस नन्हें से बच्चे के इस तरह से गले लगने के बाद मायरा को लगा कि उसकी तपस्या सफल हो गई है। वह उन सुखद पलों को अपने जीवन की सबसे महान उपलब्धि और अनमोल उपहार मानती हैं।

Monday, May 22, 2023

सोशल मीडिया का दानवी चेहरा

    इंटरनेट पर सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफार्म बन चुका है, जहां एक से एक अच्छी और बुरी कलाकारियां देखने को मिल रही हैं। अभी हाल में दो ऐसे वीडियो देखने में आए, जिनका बिलकुल अलग मिजाज है। एक सकारात्मक तो दूसरा नकारात्मक। इसी से पता चलता है कि सोशल मीडिया को किस राह पर ले जाया जा रहा है। पहले वीडियो में अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में दूल्हा-दुल्हन स्टेज पर खड़े हैं। दोनों के हाथ में वरमाला है। मेहमानों के चेहरे से भी खुशी बरस रही है, जैसा कि अक्सर होता है, दूल्हे के दोस्त मजाकिया मूड में हैं। दुल्हन ने सामने खड़े दूल्हे के गले में वरमाला डाल दी है, लेकिन जैसे ही दूल्हे की बारी आती है तो वरमाला टूट जाती है, जिससे दुल्हन के चेहरे की चमक फीकी पड़ जाती है। ऐसे में मेहमान भी हैरान परेशान ऩजर आते हैं, लेकिन दूल्हे के चेहरे पर हल्की-हल्की मुस्कराहट है। वह तुरंत वरमाला के दोनों सिरे पकड़ गांठ मारता है और दुल्हन के गले में डाल देता है। आसपास मौजूद सभी मेहमान प्रफुल्लित हो जोर-जोर से तालियां बजाते हैं। दुल्हन का चेहरा फिर से चमकने-दमकने लगता है। सोशल मीडिया पर वायरल इस वीडियो को लोगों ने बार-बार देखा और दूल्हे की जमकर तारीफ भी की। 

    दूसरे वायरल वीडियो में एक महिला जमीन पर पड़ी एक फोटो पर लातें बरसा रही है। उसका चेहरा गुस्से से तमतमाया है। चप्पलें खाती यह फोटो उसके उस पति की है, जो सात फेरे लेने के पश्चात बरसों उसके साथ रहा, लेकिन अब दोनों में तलाक हो गया है। इस वीडियो को देखकर लोगों को अच्छा कम और बुरा ज्यादा लगा। जिस पति के साथ इस गुस्सैल महिला ने कभी जीने-मरने की कसमें खाई होंगी उसके ऐसे अपमान पर कई लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी। यह कैसी अभागी महिला है, जो अपने पति के साथ बिताए सुंदर पलों की यादों को सहेज नहीं पाई और कितना निकम्मा और कमजोरियों का मारा होगा वह पति, जो इसके दिल में ़जरा भी जगह नहीं बना पाया! दरअसल रिश्तों में कब और क्यों विषैली खटास और दूरियां आ जाएं इसका पता लगाना आसान नहीं। तलाक होने पर खुश होना कोई गुनाह नहीं, लेकिन ऐसा हिंसक प्रदर्शन! यह भी सच है कि सोशल मीडिया पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कौन गलत है और कौन सही, लेकिन फिर भी ऐसा हो रहा है। लोग अपने-अपने हिसाब से तीर और तलवारें चला रहे हैं। बिना इसकी फिक्र और परवाह किए कि किस-किस का सीना छलनी हो रहा है। कौन-कैसे तनाव और बदले की आग में तप रहा है। अब तो कई विद्वान यह कहते नहीं थक रहे हैं कि, सोशल मीडिया पर चल रही अफवाहों की आंधी और फर्जी खबरों की भीड़ देश को अराजकता की तरफ ले जा रही है। 

    यह पंक्तियां लिखते-लिखते कोविड काल का स्मरण हो आया है। जब महामारी की वजह से भारतीय हैरान-परेशान थे। कोविड के शिकारों को अस्पतालों में बिस्तर उपलब्ध नहीं हो रहे थे। वेंटिलेटर, रेमडिसिवर एवं अन्य आवश्यक दवाओं की कमी से बुरी तरह से जूझना पड़ रहा था। तब पीड़ितों के परिजन अपनी मजबूरियों, समस्याओं और जरूरतों की जानकारी सोशल मीडिया पर साझा कर रहे थे। अस्पतालों में आक्सीजन की कमी से तड़पते मरीजों के वीडियो कोविड-19 की दिल दहलाने वाली हकीकत पेश कर रहे थे और जाने-अनजाने मित्र बिना किसी भेदभाव के एक दूसरे की सहायता और मार्गदर्शन कर रहे थे। जो लोग इंटरनेट और सोशल मीडिया से दूर थे, उन्होंने भी इसके महत्व को समझा और अपनाया। यह कहना गलत नहीं होगा कि सोशल मीडिया के कारण लाखों लोग मौत के मुंंह में समाने से बच गए। 

    कोरोना काल में जो सोशल मीडिया एक दूसरे को जोड़ने का सशक्त सर्वहितकारी माध्यम बना, आज दूरियां बढ़ाने और नफरत फैलाने के लांछन क्यों झेल रहा है? आखिर वो कौन लोग हैं, जिन्होंने इसे फेक न्यूज और हेटस्पीच का प्लेटफार्म बना कर रख दिया है? कहीं न कहीं इसकी जानकारी हर सजग भारतवासी को है। जिस तरह से घृणा और नफरत की आंधी चलाई जा रही है और धर्म को खतरे में बताया जा रहा है। उससे शोधकर्ता तो यहां तक कह रहे हैं कि भारत में सोशल मीडिया का स्वरूप स्वार्थी और राक्षसी होता चला जा रहा है। सद्भाव की भावना को जागृत करने वाली सोच पर नफरत फैलाने और दंगे भड़काने की क्रूर शब्दावली हावी होती चली जा रही है। साम्प्रदायिक सद्भाव रखने के पक्षधरों को चुन-चुन कर निशाना बनाया जा रहा है। एक बार किसी का विरोध करने का मन बना लेने के बाद उसकी तारीफ करने में तकलीफ होने लगी है। भले ही उसने कितना भी अच्छा काम क्यों न किया हो। 

    दिल्ली के मुख्यमंत्री ने हाल ही में ट्वीट करते हुए लिखा, वे मनीष सिसोदिया की बीमार पत्नी का हालचाल जानने के लिए अस्पताल गए थे। सीमा भाभी को मल्टीपल सोरायसिस की बीमारी है। यह बहुत गंदी बीमारी है। मैं उनके शीघ्र स्वस्थ होने की ईश्वर से प्रार्थना करता हूं। होना तो ये चाहिए था कि, बीमारी से जूझ रही महिला के शीघ्र स्वस्थ होने की मनोकामना की जाती, लेकिन बद्दिमाग दानवी सोचवालों ने अरविंद केजरीवाल को चरित्रहीन घोषित करने वाली अभद्र, शर्मनाक कमेंट्स की झड़ी लगा दी। सोशल मीडिया पर प्रतिष्ठित हस्तियों को शर्मनाक शब्दावली से अपमानित करने का जो सिलसिला जोर पकड़ रहा है उससे देश के खास तथा आमजनों को अत्यंत पीड़ा हो रही है। कुछ शैतान तो ऐसे हैं, जो इज़्जतदार महिलाओं पर कीचड़ उछालने की हिम्मत ऐसे दिखा रहे हैं, जैसे देश में कानून का नहीं गुंडागर्दी और मनमानी का राज चल रहा हो। देश के सुप्रीम कोर्ट ने भी अपनी चिन्ता जतायी है। इस इक्कीसवीं सदी में हम कहां जा रहे हैं? हमें एक धर्मनिरपेक्ष और सहिष्णु समाज होना चाहिए, लेकिन आज घृणा का माहौल है। समाज का ताना-बाना बिखरा जा रहा है। हमने ईश्वर को कितना छोटा कर दिया है। किसी का धर्म खतरे में नहीं है।

Thursday, May 11, 2023

सबकुछ मनोबल

चित्र : 1 - सविता प्रधान आज आईएएस अधिकारी हैं। सभी झुक-झुक कर उन्हें बड़ी अदब के साथ सलाम करते हैं। मध्यप्रदेश के मंडी के एक आदिवासी परिवार में जन्मी सविता की संघर्ष गाथा से जो भी अवगत होता है, वह बस सोचता रह जाता है। पूरी तरह से बिखरने के बाद खुद को जोड़ने और संभालने की शक्ति और हिम्मत इस नारी ने कहां से पायी? अपने माता-पिता की इस तीसरी संतान की पढ़ाई में बचपन से ही जबरदस्त अभिरुचि थी, लेकिन घर के हालात अच्छे नहीं थे। हमेशा आर्थिक तंगी सिर ताने रहती थी। यह तो उसकी किस्मत अच्छी थी कि स्कॉलरशिप मिल गई और आगे की पढ़ाई संभव हो पायी। वह रोज सात किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल जाती और थककर घर लौटने पर भी कलेक्टर बनने की प्रबल चाह के साथ किताबों में खो जाती थी। चंचल और खूबसूरत सविता किसी के साथ घुलने-मिलने में देरी नहीं लगाती थी। यही वजह थी, सभी उसे पसंद करते थे। सविता को पढ़ाई के अलावा और कुछ नहीं सूझता था, लेकिन गरीब माता-पिता को उसकी शादी की चिन्ता खाये रहती थी। इसी दौरान एक अच्छे-खासे रईस घराने से उसके लिए रिश्ता आया तो माता-पिता ने हामी भरने में देरी नहीं की। दरअसल, लड़के ने सविता को कहीं देखा था और उसकी खूबसूरती पर मर मिटा था। उसने अपने मां-बाप को सविता से शादी करने के लिए बड़ी मुश्किल से मनाया था। सविता रोती-गाती समझाती रही कि अभी उसकी शादी करने की उम्र नहीं। अभी तो उसे अपने सपने को साकार करना है, लेकिन जिद्दी घरवाले नहीं माने। उसको तसल्ली देने के लिए उन्होंने उसके समक्ष उन लड़कियों के उदाहरण भी पेश कर दिए, जिन्होंने ब्याह के बाद भी पढ़ाई-लिखाई जारी रखी और अपने सपने पूरे कर दिखाए। शादी के बाद सविता अपनी ससुराल पहुंची। शुरू-शुरू के दिन अच्छे बीते। सास-ससुर भी ठीक-ठाक लगे। पति ने भी प्यार बरसाया, लेकिन कालांतर में सास-ससुर का रंग बदलने लगा। गरीब माता-पिता की बेटी होना मुसीबत बन गया। माता-पिता के इशारे पर नाचने वाले पति ने अपनी असली औकात दिखानी प्रारंभ कर दी। जब सविता ने अपनी पढ़ाई जारी रखने की मंशा जतायी तो उसे डांटा-फटकारा गया। दरअसल, वो ऐसा सर्वसम्पन्न धनवान परिवार था, जिनके लिए अपनी बेटियां तो अनमोल थीं, लेकिन बहुओं का कोई मोल न था। बेटियों को किसी के साथ भी बोलने-बतियाने, हंसने, मुस्कराने और कहीं भी आने-जाने की खुली छूट थी, लेकिन बहुओं पर हजारों पाबंदियां थीं। सविता किसी के साथ हंस बोल लेती तो उससे सवाल किये जाने लगते। घर के सभी सदस्य उससे दूरी बनाये रहते। सभी के खा-पी लेने के बाद उसे खाना नसीब होता। कई बार तो खाना खत्म हो जाता और सविता को भूखे पेट सोना पड़ता। भूख तो भूख होती है। रसोई में खाना बनाते-बनाते वह दो-चार रोटियां छिपाकर रख लेती और मौका मिलने पर खा लेती। कई बार तो उसे बाथरूम में जाकर सूखी रोटी निगलनी पड़ी और पानी पीकर जैसे-तैसे सोना पड़ा। जब वह पहली बार गर्भवती हुई तो उसके मन में यह उम्मीद जागी कि अब उसके प्रति उनका व्यवहार बदलेगा, लेकिन यह उसका भ्रम था। दो बच्चों के जन्म के बाद भी सास-ससुर कटु बोलों की बरसात करने से बाज नहीं आए। शराबी पति ने भी मारना-पीटना नहीं छोड़ा। ऐसे में सविता ने खुदकुशी करने का पक्का मन बना लिया। एक रात फांसी के फंदे पर झूलने के लिए वह अपने कमरे में पहुंची तो उसने देखा कि खुली खिड़की से सास उसे देख रही है। उसे उम्मीद थी कि सास उसे रोकेगी, लेकिन उसे फांसी के फंदे के करीब देखकर भी जिस तरह से सास खुद को बेखबर, बेपरवाह दर्शाती रही उससे सविता को बहुत झटका लगा। वह समझ गई कि उसके मरने का ही इंतजार किया जा रहा है। तब एकाएक उसके मन में विचार आया कि वह खुद को किस कसूर की सज़ा देने पर उतारू है? सज़ा तो इन्हें मिलनी चाहिए जो बाहरी लोगों के लिए भद्र और शालीन हैं, लेकिन अपनी बहू के लिए किसी राक्षस से कम नहीं। सुबह-सुबह सविता कभी न लौटने की कसम के साथ दोनों बच्चों के संग नए संघर्ष के पथ पर चल पड़ी। एक पार्लर में काम करने के साथ-साथ इंदौर यूनिवर्सिटी से पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर्स किया। पहले ही प्रयास में यूपीएससी क्लियर कर अपनी किस्मत ही बदल डाली। आज सविता का नाम बड़े गर्व के साथ मध्यप्रदेश के शीर्ष अधिकारियों में लिया जाता है...।

चित्र : 2 - कोरोना काल की याद आज भी उन कई लोगों को डरा देती है, जिन्होंने अपनो को खोने के साथ-साथ अनेक कष्ट भोगे। ऐसे लोगों की अथाह भीड़ में कुछ लोग ऐसे भी रहे, जिनकी कोविड-19 ने जिन्दगी ही बदल दी। रेशमा को पीने की लत थी। जंकफूड के बिना उसका एक दिन भी गुजारा नहीं था। दोस्तों को नशे की पार्टियां देने का भी उसे खर्चीला शौक था। उसका जिस शख्स से ब्याह हुआ था वह दिन-रात पीने का लती था। मिलन की पहली रात में ही उसने रेशमा को शराब का स्वाद चखा दिया। बाद में एक समय ऐसा आया जब पत्नी अपने शराबी पति को मात देने लगी। अत्याधिक नशा करने के कारण पति की कोरोना काल से पहले हमेशा-हमेशा के लिए रवानगी हो गई। हमेशा नशे में टुन्न रहने वाली रेशमा को पता ही नहीं चला कि वह कब उच्च रक्तचाप तथा डायबिटीज की गंभीर रोगी हो गई। एक दिन ऐसा भी आया जब उसने बिस्तर पकड़ लिया और फिर कोमा में चली गई। तभी कोरोना के भयंकर तांडव के चलते लॉकडाउन लग गया। महंगे डॉक्टरों के इलाज से रेशमा जैसे-तैसे चलने-फिरने लगी। स्वस्थ होने के कुछ दिनों बाद फिर से उसकी पीने की इच्छा जागी, लेकिन लॉकडाउन की वजह से बार, पब और शराब दुकानों पर ताले लगे थे। रेशमा को किसी और ने नहीं, अपने ही मन-मस्तिष्क ने चेताया कि इतने दिनों तक कोमा में रहने के बाद बड़ी मुश्किल से बची हो, अब तो खुद पर रहम करो और हमेशा-हमेशा के लिए अंधाधुंध पीने से तौबा कर लो। अपने पति को खो चुकी रेशमा का जीने के प्रति मोह जाग उठा। शराब को पानी की तरह पीने वाली नारी ग्रीन टी, नींबू पानी पीने लगी। कसरत को भी जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लिया। आज रेशमा नशा विरोधी अभियान की मुखिया हैं और कई लोगों की शराब छुड़वा चुकी हैं। 

चित्र : 3 - इस भागम-भाग वाले समय में किसी के पास किसी का हालचाल जानने की फुर्सत नहीं। सभी के अपने-अपने दर्द और समस्याएं हैं। उन्हीं को सुलझाने में उनकी जिन्दगी कट जाती है। ऐसे में दूसरों से सहारे की आशा करना खुद को धोखा देने जैसा है। आधुनिक शहर चंडीगढ़ में एक महिला व्हीलचेयर पर प्रतिदिन फूड डिलीवरी करती नजर आती हैं। अपार इच्छाशक्ति और मनोबल वाली इस महिला का नाम है, विद्या। अपने नाम के अनुरूप संघर्ष करती विद्या का जन्म बिहार के समस्तीपुर के छोटे से गांव में हुआ। 2007 में साइकल चलाते वक्त वह पुल के नीचे गिर गई। रीढ़ की हड्डी टूट जाने के कारण 11 साल तक बिस्तर पर पड़े रहने के दौरान एक दिन उसने अपने शरीर की कमी और कमजोरी को मात देने का द़ृढ़ निश्चय कर डाला। आत्मनिर्भर बनने के अपने इरादे के बारे में उसने जब अपने करीबियों को बताया तो उन्होंने उसका खूब म़जाक उड़ाया। किसी शुभचिंतक की सलाह पर उसने 2017 में चंडीगढ़ स्पाइनल रिहेव सेंटर में किसी तरह से जाकर बेडसोल का ऑप्रेशन करवाया। वहीं पर अन्य जुनूनी, उत्साही विकलांगों को देखकर उसकी जीने की इच्छा और बलवति हुई और वह चुस्त-दुरुस्त होकर अस्पताल से बाहर निकली। फिर उसने दिव्यांग श्रेणी में राष्ट्रीय स्तर पर बास्केट बॉल खेलकर लोगों को चौंकाया। इतना ही नहीं राष्ट्रीय स्तर पर टेबल टेनिस और स्विमिंग में नाम कमाकर तानें कसने वालों की तो बोलती बंद कर दी...। 

Thursday, May 4, 2023

चरैवति... चरैवति

    महाराष्ट्र प्रदेश और देश के जनप्रिय साप्ताहिक, ‘राष्ट्र पत्रिका’ के सफलतापूर्वक 15वें वर्ष में प्रवेश करने पर हमें वैसी ही अनुभूति और खुशी हो रही है, जैसी हर किसी को अपने जन्मदिन पर होती है। किसी का भी जन्मदिन वो सुखद अवसर होता है, जो अतीत की यादों की खिड़कियां और दरवाजे खोल देता है। हम अपनी यात्रा में कितने सफल और असफल रहे, जाने-अनजाने में कैसी-कैसी भूलें तथा गलतियां हुईं इसका भी शोध और आकलन करने का अवसर होता है हर जन्मोत्सव। अपने प्रकाशन के प्रारंभ काल से ही लाखों सजग पाठकों के मन-मस्तिष्क में बस जाने में कामयाब रहे समाचार पत्र ‘राष्ट्र पत्रिका’ का तब भी यही उद्देश्य था और आज भी यही एकमात्र लक्ष्य है, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता। किसी भी खबर को प्रकाशित करने से पूर्व उसकी गहराई तक जाना हम अपना कर्तव्य समझते हैं। अपने पाठकों को अधूरे नहीं, पूरे सच से अवगत कराना हमारा मूलभूत दायित्व है। चुनौतियां कल भी थीं और आज भी हैं। अपनी बात को खुलकर कहने के लिए मैं शायर सुरजीत भोला दानिश हिंगणघाटी की गजल की इन पंक्तियों का सहारा ले रहा हूँ,

गुजरते लम्हों में सदियां तलाश करता हूँ

ये मेरी प्यास है, मैं नदियां तलाश करता हूँ।

यहां गिनाता है हर कोई खूबियां अपनी,

मैं अपने आप में कमियां तलाश करता हूँ।

भारतीय प्रेस का अपना एक अत्यंत बुलंद इतिहास है। इस देश में अखबारों, संपादकों, पत्रकारों का हर काल में सम्मान होता आया है, लेकिन आजकल हालात कुछ बदले-बदले से हैं। कहने वाले तो यह भी कहने से नहीं सकुचाते कि, वो गुजरे ज़माने की बात है, जब अखबारों को हाथोंहाथ लिया जाता था। उनकी सुर्खियां पाठकों को आकर्षित करती थीं और गहन चर्चा का विषय बना करती थीं। लोग यह भी कहते नहीं थकते थे कि जो अखबार में छपा है, वो एकदम सही है। शंका की कहीं कोई गुंजाइश हो ही नहीं सकती। अब कई अखबार, पत्रकार और संपादक कटघरे में हैं। उन पर उंगलियां उठाने वालों में गैर ही नहीं अपने भी शामिल हैं। 

हमारे पत्रकारिता के शीर्ष बलिदानी संपादकों और पत्रकारों ने यही तो बताया और समझाया है कि लक्ष्यहीन पत्रकारिता के कोई मायने नहीं हैं। हिंदी के पहले अखबार ‘उदन्त मार्तंड’ का ध्येय वाक्य था, ‘‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत।’’ इस जीवंत, प्रभावी अखबार में प्रकाशित होने वाली खबरें अंगे्रजों को शूल की तरह चुभती थीं। निर्भीक और ज्ञानवान पत्रकार, संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी के कुशल संपादन में निकले अखबार ‘प्रताप’ का ध्येय वाक्य था, ‘‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है। वह नर नहीं नरपशु निरा है और मृतक समान है।’’ आततायी अंग्रेजों के पैरों तले की जमीन खिसकाने और सतत उनकी नींद उड़ाने वाले विद्यार्थीजी को बेखौफ होकर कलम चलाने के दंड स्वरूप पांच बार जेल की यात्रा करनी पड़ी, लेकिन फिर भी उनकी कलम की आग कभी भी ठंडी नहीं पड़ी। ‘प्रताप’ जनता का प्रिय अखबार होने के साथ-साथ आजादी के दिवानों का भी पसंदीदा अखबार था। अमर शहीद भगत सिंह और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, उनकी मशाल-सी लेखनी के जबरदस्त प्रशंसक थे। हिंदुस्तान के क्रांतिकारी यशस्वी कवि श्री माखनलाल चतुर्वेदी की कालजयी कविता, पुष्प की अभिलाषा, 

‘चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ,

चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ।

चाह नहीं, सम्राटों के शव पर हे हरि, डाला जाऊँ, 

चाह नहीं, देवों के सिर पर चढ़ूँ, भाग्य पर इठलाऊँ।

मुझे तोड़ लेना वनमाली उस पथ पर देना तुम फेंक

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक।

सबसे पहले ‘प्रताप’ में ही प्रकाशित हुई थी। इस कविता ने लाखों युवाओं के दिल में देशभक्ति की मशाल जलाकर अंग्रेजों के खिलाफ सड़कों पर उतरने की प्रेरणा दी थी। 1907 में इलाहाबाद से प्रकाशित ‘स्वराज’ नामक अखबार का घोष वाक्य था, ‘‘हिंदुस्तान के हम हैं, हिंदुस्तान हमारा है।’’ इन शब्दों में अंग्रेजों के लिए सीधे-सीधे धमकी और चेतावनी थी कि तुम तुरंत हमारे देश को छोड़कर चलते बनो। इस पर तुम्हारा कोई हक नहीं। इसके जर्रे-जर्रे पर हम हिंदुस्तानियों का अधिकार है। क्रांति का बिगुल फूंकने वाला यह अखबार मात्र ढाई वर्ष तक प्रकाशित हो सका, लेकिन इसने भी भारत की जीवंत पत्रकारिता के इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज करवा दिया। गौरतलब है कि अंग्रेजों की नींद उड़ा देने वाले ‘स्वराज’ में उसी विद्वान को संपादक के लायक समझा जाता था, जो अंग्रेजों की तकलीफदायक जेलों में खुशी-खुशी रहने और आजादी के लिए संघर्ष करने से कभी भी पीछे न हटे। ‘स्वराज’ के कुल आठ संपादक हुए। अपने अखबार में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का संदेश देने वाले इन सभी संपादकों को कुल मिलाकर 95 वर्ष की कठोर सज़ा अंग्रेजों ने दी। अंधे-बहरे जुल्मी अंग्रेजों के कानों तक अक्षरों के बारूदों के धमाकों को पहुंचाने के लिए और भी कई अखबार और पत्रकार, संपादक अपनी जान हथेली पर लेकर चला करते थे। जालिम अंग्रेज एक अखबार को बंद करवाते तो तीन-चार और अखबार फौरन छपने लगते। अपने देश की पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास से प्रभावित होकर ही ‘राष्ट्र पत्रिका’ का प्रकाशन महाराष्ट्र की सांस्कृतिक नगरी नागपुर से प्रारंभ किया गया। हमें दूसरों से कोई लेना-देना नहीं। समाचार पत्र हमारे लिए तेल, साबुन, कुर्सी, मेज, जूता, चाकू, तलवार जैसा बेचने का सामान नहीं, बल्कि देशवासियों तक बेखौफ होकर खबरें और जनहित लेख, जानकारियां पहुंचाने का सशक्त माध्यम है। सिर्फ विरोध की पत्रकारिता करने के लिए ‘राष्ट्र पत्रिका’ का प्रकाशन नहीं किया जाता। यदि सरकार अच्छे कार्य करती है तो खुलकर तारीफ तथा गलत राह पर चलने पर आलोचना करने से हम कतई नहीं घबराते। हिंदू-मुसलमान का राग अलापने की बजाय आपसी सद्भाव बढ़ाने का प्रारंभ से ही हमारा लक्ष्य और कर्तव्य रहा है। देश विरोधी ताकतों की अनदेखी करना और अपराधियों का महिमामंडन ‘राष्ट्र पत्रिका’ में किसी भी हाल में संभव नहीं। सनसनी फैलाने वाली खबरों से दूरी बनाये रखने के लिए हम कटिबद्ध हैं। हमें जितनी अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चिंता है उतनी ही दूसरों की भी है। 

आज हम सब देशवासी अमृत महोत्सव मना रहे हैं। भारतवर्ष के शीर्ष पत्रकार, संपादक और चिंतक डॉ. संजय द्विवेदी के इस कथन से भला कौन सहमत नहीं होगा, ‘भारत के समक्ष अपनी एकता को बचाये रखने के लिए एक ही मंत्र है, सबसे पहले राष्ट्र। विरोधी ताकतें तोड़ने के सूत्र खोज रही हैं, लेकिन हमें हर हाल में समाज को जोड़ने के सूत्र खोजने होंगे।’ सत्य की पत्रकारिता का सफर कभी भी नहीं थमता। अभी तो हमने चलना प्रारंभ किया है। हमें बिना थके बहुत लम्बी यात्रा तय करनी है। इस ऊबड़-खाबड़ सफर में जब आप सब हमारे साथ हैं तो भय और चिंता कैसी? श्रमिक दिवस और ‘राष्ट्र पत्रिका’ की वर्षगांठ पर सभी पाठकों, संवाददाताओं, लेखकों, एजेंट बंधुओं, बुक स्टॉल संचालकों, विज्ञापन दाताओं एवं सभी शुभचिंतकों को बार-बार धन्यवाद, शुभकामनाएं और अपार बधाई।