Thursday, January 25, 2024

कलंक

चित्र-1 : 2024 के जनवरी माह ने अपनी आंखें अभी पूरी तरह से खोली भी नहीं थीं कि मन-तन को कंपकंपाने और सोच पर हथौड़े बरसाने वाली खबरें आने लगीं। रक्षकों के भीतर कैद भक्षक बाहर निकलकर तांडव मचाने लगे। फिर अंधश्रद्धा भारी पड़ी और भरोसे के परखच्चे उड़ गये। बेटे की चाहत में बेटियों की हत्या की खबरें तो हम सबने बहुतों बार पढ़ी-सुनीं, लेकिन मध्यप्रदेश के बैतूल शहर के एक पिता ने बेटी की चाह में बेटे को गला दबाकर मार डाला। इस क्रूर बाप के दो बेटे हैं। बड़ा सात साल तो छोटा पांच साल का। उसकी पत्नी तीसरी बार गर्भवती हुई थी। निर्दयी पति को यकीन था कि इस बार जरूर बेटी होगी, लेकिन जैसे ही बेटे का जन्म हुआ तो उसका खून खौल उठा। वह पत्नी को डांटने-फटकारने लगा। तुमने बेटी पैदा क्यों नहीं की? पत्नी क्या जवाब देती! उसकी चुप्पी बेवकूफ पति को शूल-सी चुभी। अंधाधुंध शराब पीकर उसने पत्नी को जीभरकर पीटा। पत्नी यह सोचकर घर से बाहर निकल गई कि थोड़ी देर में उसका गुस्सा ठंडा हो जाएगा। लगभग पौन घंटे के बाद वह वापस लौटी तो उसने अपने बारह दिन के नवजात को मृत पाया। 

चित्र-2 : मां तो ममत्व से परिपूर्ण होती है। अपनी संतान उसे जान से भी प्यारी होती है। उसके लिए अपना सब कुछ कुर्बान करने से कभी पीछे नहीं हटती। शास्त्रों में कहा भी गया है कि माता कुमाता नहीं होती। बच्चे भले ही कैसे हों। पढ़ी-लिखी खूबसूरत नज़र आने वाली लगभग चालीस वर्षीय हावर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च फेलो रह चुकी नामी कंपनी की सीईओ सूचना सेठ ने गोवा के एक होटल में अपने चार साल के मासूम बेटे को तड़पा-तड़पा कर मार डाला। बैंगलुरू की रहने वाली सूचना की पति से बिलकुल नहीं निभती थी। दोनों के बीच तलाक का केस चल रहा था। अदालत ने आदेश दिया था कि वह हर रविवार को बेटे को पिता से मिलवाएगी, लेकिन सूचना नहीं चाहती थी उसका पति बच्चे से मिले। वह उसे अपने पिता से दूर रखना चाहती थी। अहंकारी और क्रोधी पत्नी की सोच थी कि बच्चे के कारण ही उसे अपने पति का चेहरा देखना पड़ता है। उसके मन में इस सच को लेकर भी गुस्सा भरा था कि बेटे का चेहरा उसके पिता से मिलता है। जिसे वह देखना नहीं चाहती। बेटे को उसके पिता से हमेशा-हमेशा के लिए अलग करने के लिए ईर्ष्यालु सूचना बेंगलुरु से गोवा चली गई। वहां पर उसने अपने ही हाथों अपनी कोख उजाड़ दी। उसे भ्रम था कि उसका अपराधी चेहरा कभी भी दुनिया के सामने उजागर नहीं होगा। हर शातिर अपराधी की यही सोच होती है। ममता के रिश्ते को तार-तार करने वाली इस हत्यारिन मां की सारी जिंदगी अब जेल की सलाखों में ही कटेगी। कोई भी दांवपेच उसे बचा नहीं सकता। 

चित्र-3 : अपने करीबी रिश्तेदार की मौत किसे गमगीन नहीं करती? मां-बाप-भाई-बहन के जुदा होने की कल्पना ही चिंताग्रस्त कर देती है। मन उदास हो जाता है। परमपिता परमेश्वर से बस यही प्रार्थना की जाती है कि खून के रिश्तों की डोर हमेशा सलामत रहे। उनमें ज़रा-सी भी आंच न आए, लेकिन...! उत्तरप्रदेश की धार्मिक नगरी मथुरा में धन संपत्ति को पाने के लालच में तीन बेटियों ने श्मशान घाट पर जो तमाशा किया उसे देख सभी स्तब्ध रह गये। यह बात किसी से छिपी नहीं कि महिलाएं श्मशान घाट पर नहीं के बराबर जाती हैं। मथुरा में एक उम्रदराज मां की मौत के बाद श्मशान घाट पर उसकी चिता को जलाने की तैयारी चल रही थी तभी भागते-भागते उसकी दो बेटियां वहां आ पहुंचीं। तीसरी पहले से ही वहां उपस्थित थी। पहले तो तीनों बहनों ने मां की जमीन-जायदाद को लेकर आपस में बातचीत की। फिर देखते ही देखते लड़ने-झगड़ने लगीं। अंतिम संस्कार कराने के लिए पहुंचे पंडित ने उनसे झगड़े की वजह पूछी तो पता चला कि मृतका का कोई बेटा नहीं है। सिर्फ तीन बेटियां हैं। बड़ी बेटी मां के कुछ ज्यादा ही करीब थी। बीमार मां की उसने भरपूर देखभाल और सेवा भी की थी। इसी वजह से मां ने अपनी जायदाद का बड़ा हिस्सा उसके नाम कर दिया था। अस्पताल में इलाज के दौरान मां चल बसी। बड़ी बेटी ने मां के शव को रिश्तेदारों के सहयोग से मोक्षधाम पहुंचाया। दोनों छोटी बहनों को जैसे ही मां के चल बसने की खबर मिली तो वे भी भागती-दौड़तीं मोक्षधाम पहुंचकर तमाशा करने लगीं। रिश्तेदारों ने उन्हें शांत रहने को कहा तो वे और भड़क उठीं। दोनों ने जिद पकड़ ली कि जब तक संपत्ति उनके नाम नहीं होगी, तब तक वे अंतिम संस्कार नहीं होने देंगी। चाहे कुछ भी हो जाए। किसी ने पुलिस को खबर पहुंचा दी, लेकिन पुलिस की भी लालची बेटियों ने एक नहीं सुनी! अपनी जिद पर अड़ी रहीं। शव आठ से नौ घंटे तक श्मशान घाट पर पड़ा रहा। तमाशा देखने के लिए बाहर से भी लोग अंदर आकर जमा हो गये। कई लोगों ने उन्हें मनाने-समझाने की कोशिशें कीं, लेकिन वे अंतत: तब जाकर मानीं जब स्टाम्प पेपर पर लिखित समझौता हुआ, जिसमें लिखा गया कि, मां की बची हुई जमीन-जायदाद पर इन दोनों बहनों का ही हक होगा। बड़ी की कोई भी दखलअंदाजी नहीं चलेगी। उसने पहले ही मां को बहला-फुसलाकर अपना हिस्सा ले लिया है...।

चित्र-4 : नागपुर में स्थित पोस्टमार्टम गृह में बीते सोलह वर्षों से मृत शरीरों की चीरफाड़ करते चले आ रहे अरविंद पाटिल का कहना है कि उन्हें मुर्दों से नहीं, जीवित इंसानों से ही डर लगता है। अरविंद अभी तक पैंतीस हजार से अधिक मुर्दों का पोस्टमार्टम कर चुके हैं। पोस्टमार्टम गृह में जाने से अधिकांश लोग कतराते और घबराते हैं। यह भी कहा जाता है कि अस्पतालों में पोस्टमार्टम करने वाले कर्मचारी बिना शराब पिये निर्जीव जिस्म को हाथ तक नहीं लगाते, लेकिन अरविंद इसके अपवाद हैं, जिन्हें पोस्टमार्टम करने से पहले कोई नशा-वशा नहीं करना पड़ता। जब पहली बार अरविंद ने डॉक्टर के निर्देश पर मृत देह का पोस्टमार्टम किया था तब उन्हें जरूर परेशानी हुई थी। पूरी रात आंखों के सामने वही दृष्य आता रहा था। अब तो मृतक शरीर के अंगों को अलग करने, चीर-फाड़ करने, जिस्म को फिर से सिलने की आदत हो गई है। किसी की क्षत-विक्षत लाश देखने के बाद जब उसकी मौत की वजह का पता चलता है तो जरूर रातों की नींद गायब हो जाती है। ट्रेन के सामने कूदकर, गले में फांसी का फंदा लगाकर, जहर खाकर खुदकुशी करने वाले काश! ऐसा घातक कदम उठाने से पहले अपने माता-पिता, पत्नी, पति, भाई, बहनों आदि के बारे में सोचते-विचारते, धैर्य का दामन थामे रहते, किसी करीबी को अपने गम से अवगत करा देते तो यह नौबत टल जाती। अपनों की हत्या करने वालों पर तो रह-रहकर गुस्सा आता है। अभिभावक यह क्यों भूल जाते हैं कि औलाद तो पालन-पोषण के लिए होती है। मां-बाप का तो दायित्व ही है, अपने बच्चों के भविष्य को संवारना। उनकी हत्या करना दुनिया का सबसे घृणित पाप है। अक्षम्य अपराध है...।

Thursday, January 18, 2024

सबके हैं राम...

    ‘‘राम आएंगे तो अंगना सजाऊंगी, दीप जला के दिवाली मनाऊंगी। मेरे जन्मों के सारे पाप मिट जाएंगे, राम आएंगे, मेरी झोपड़ी के भाग आज खुल जाएंगे...।’’ ऐसा कोई भी इंसान नहीं होगा, जिन्हें भजन की इन पंक्तियों ने मंत्रमुग्ध नहीं किया होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जब इस भजन को सुना तो भाव विभोर हो गये। तहेदिल से की गई उनकी सराहना ने इस भजन की गायिका को रातों-रात प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचा दिया। सभी के मन में इस मनभावन भजन की गायिका स्वाति मिश्रा के बारे में जानने की उत्सुकता जाग उठी। बिहार के छपरा की रहने वाली स्वाति मिश्रा इन दिनों मुंबई वासी हो चुकी हैं। स्वाति 22 जनवरी, को अयोध्या में श्रीराम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में यह भक्ति गीत गाना चाहती हैं,

‘‘मेरी चौखट पर चलकर आज 

चारों धाम आए हैं

बजाओ ढोल स्वागत में

मेरे घर राम आये हैं

कथा शबरी की जैसे

जुड़ गई मेरी कहानी से

ना रोको आज धोने दो चरण

आंखों के पानी से

बहुत खुश हैं मेरे आँसू

की प्रभु के काम आए हैं

बजाओ ढोल स्वागत में

मेरे घर राम आए हैं।

तुमको पा के क्या पाया है,

सृष्टि के कण-कण से पूछो

तुमको खोने का दु:ख क्या है,

कौशल्या के मन से पूछो

द्वार मेरे ये अभागे,

आज इनके भाग जागे, 

बड़ी लंबी इंतजारी हुई रघुवर तुम्हारी

तब आई है सवारी

संदेशे आज खुशियों के

हमारे नाम आये हैं, 

बजाओ ढोल स्वागत में

मेरे घर राम आये हैं...।’’

    भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के करीब से दर्शन करने के लिए हर भारतीय लालायित है। सरयू तट पर बसी श्री रामजन्म भूमि अयोध्या का कायांतरण किया जा चुका है। रामभक्तों के स्वागत के लिए अयोध्या के चौक-चौबारे और तमाम रास्ते सज-धज चुके हैं। धर्मनगरी की साफ-सफाई, सजावट और रंगबिरंगी रोशनाई गहराई तक लुभा रही है। देश और विदेश में रहने वाले कई श्रीराम भक्तों को रामोत्सव में शामिल होने के लिए निमंत्रित किया गया है। इस पावन अवसर पर देशभर के संत-महात्मा और गणमान्य हस्तियां उमंग-तरंग के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने जा रही हैं। देश ही नहीं, विदेशों के पर्यटकों व श्रद्धालुओं के लिए अत्याधुनिक टाउन शिप में आलीशान होटल, रिवरसाइड, बहुमंजिला इमारतें, आवासीय कॉलोनी, मॉल, रेस्टारेंट निर्मित हो चुके हैं। आश्रम और गुरूकुल बनाए जाने वाले हैं। श्रीराम नगरी के सभी होटल तथा गेस्ट हाऊस बुक हो चुके हैं। सुरक्षा के तगड़े इंतजाम किये गए हैं। देश के एक शीर्ष उद्योगपति का कहना है कि, हमें इस आयोजन का बेसब्री से इंतजार है। यह सभी हिंदुओं और भारतीयों के लिए बड़ा दिन है। सच तो यह है कि हमारे लिए यह एक आध्यात्मिक यात्रा है।  भगवान राम ने सबको आत्मसात किया था। श्रीराम सही मायनों में उच्चतम आदर्शों को स्थापित करने वाले नायक हैं। आत्मियता, करुणा, आदर-सत्कार, सर्व मंगलकामना, क्षमा, धैर्य, सौंदर्य और शक्ति के पर्याय मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम सबके हैं। सभी को उनसे सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। रिश्तों को कुशलतापूर्वक निभाने की सीख मिलती है। भौतिक सुखों के जाल से बचते हुए अपने कर्तव्यों का दृढ़ता से पालन करने का उत्साह और मनोबल मिलता है। एक आदर्श पुत्र, भ्राता, पति और न्यायप्रिय नायक हैं श्रीराम। कोई भी व्यक्ति सतत साधना और परिश्रम का श्रीराम के गुणों को अंगीकार कर सकता है और प्रतिष्ठा के शीर्ष पर पहुंच सकता है। श्रीराम के जन्मस्थली अयोध्या का अर्थ ही है, अमन और शांति की ऐसी पवित्र धरा, जहां कभी युद्ध न हुआ हो। इस अलौकिक धर्म नगरी क्षेत्र में आठ मस्जिदें और चार कब्रिस्तान मौजूद हैं। यहां कुछ मस्जिदें ऐसी भी हैं, जो राम जन्म भूमि अधिग्रहित परिसर से महज सौ मीटर की दूरी पर हैं। इन पर बाकायदा लाउडस्पीकर बंधे हुए हैं, जिनसे पांचों टाइम अजान दी जाती है। इस धर्म क्षेत्र में चार गुरुद्वारे और दो जैन मंदिर भी हैं। यहां पर सभी धर्मों के लोगों का आपसी मेल-मिलाप और सद्भाव देखते बनता है। वैसे तो भारत का जन-जन सदियों से रामायण और गीता के बहुत करीब रहा है, लेकिन राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह की तारीख की घोषणा के बाद लोगों में धार्मिक ग्रंथों के प्रति रुझान और सम्मान काफी ज्यादा देखा जा रहा है। देश में धार्मिक पुस्तकें प्रकाशित करने वाली गीता प्रेस को रामचरितमानस की मांग को पूरा करने के लिए दिन-रात परिश्रम करना पड़ रहा है। देश और विदेश के आस्थावान लोगों की मांग के कारण रामचरितमानस को गीता प्रेस की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है, जिसे मुफ्त में डाउनलोड किया जा सकता है। सच तो यही है कि पूरे देश का वातावरण राममय हो गया है। बाजारों में श्रीराम की सोने-चांदी की मूर्तियों, सिक्कों, आभूषणों, वस्त्रों आदि को खरीदने के लिए बढ़ती भीड़ से व्यापारी खुश और उत्साहित हैं। बाग-बगीचों तथा गली-मोहल्लों में श्रीराम, जय राम की मधुर धुनों से लेकर विविध भक्ति गीतों की मधुर स्वर लहरियां आत्मिक सुख से रूबरू करा रही हैं। अब तो बुजुर्गों की देखादेखी युवा भी ‘गुड मार्निंग’ को किनारे कर राम...राम और जय श्रीराम के उच्चारण से एक दूसरे का अभिवादन करने लगे हैं। भारत की कई गर्भवती महिलाएं 22 जनवरी के शुभ दिन मां बनने को आतुर हैं। अकेले मध्यप्रदेश के शहर इन्दौर की लगभग साठ गर्भवती महिलाओं ने अस्पताल के चिकित्सकों से अनुरोध किया है कि उनकी प्रसूति 22 जनवरी को करवाएं ताकि उनका मातृत्व राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के शुभ संयोग से जुड़ जाए। विदेशों में भी 22 जनवरी के ऐतिहासिक क्षण को लेकर जबरदस्त उत्साह है। अमेरिका में तो पूरे एक सप्ताह तक प्राण प्रतिष्ठा उत्सव मनाने के लिए बड़े पैमाने पर तैयारी है...। किसी शायर ने क्या खूब कहा है, 

‘‘दया अगर लिखने बैठूँ, होते हैं अनुवादित राम

रावण को भी नमन किया, ऐसे थे मर्यादित राम...।’’

Thursday, January 11, 2024

नकाब

    नारंगी नगर नागपुर में सीबीआई ने पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव सेफ्टी ऑर्गनाइजेशन (पेसो) के दो अधिकारियों को दस लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ने में सफलता पायी। राजस्थान की एक केमिकल कंपनी को अतिरिक्त डिटोनेटर बनाने की अनुमति देने के लिए इस जगजाहिर सहज-सुलभ भ्रष्टाचारी राह को चुना गया था। देशभर में विस्फोटक उत्पादन करने वाली कंपनियों पर नियंत्रण और नज़र रखने वाले पेसो का मुख्यालय नागपुर के सेमिनरी हिल्स पर स्थित है। पुलिस तथा सीबीआई कार्यालय को लगातार शिकायतें मिल रहीं थीं कि इस कार्यालय के अधिकारी विस्फोटक निर्माता कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करने और उनके विस्फोटक निर्माण लाइसेंस रद्द करने की धमकी देकर लाखों रुपये की रिश्वत लेते हैं। बिना देखे-जांचे किसी भी कंपनी को मनचाहा उत्पादन करने की छूट देते हैं। राजस्थान की केमिकल कंपनी को उसकी इच्छा के अनुसार डिटोनेटर बनाने की अनुमति देने की ऐवज में भ्रष्ट अधिकारियों ने दस लाख रुपये की घूस मांगी थी, लेकिन अंतत: सीबीआई के बिछाये जाल से बच नहीं पाये। राजनेताओं, सत्ताधीशों और नौकरशाही को हर तरह से संतुष्ट कर देश में कई लोगों ने गोला-बारूद और हथियार बनाने के लायसेंस लेकर चंद वर्षों में करोड़ों-अरबों की धन दौलत जमा कर ली है। गोला-बारूद बनाने वाले अधिकांश उद्योगपति सुरक्षा नियमों का पालन नहीं करते। कई बार उन्हीं के कारखानों से विस्फोटक सामग्री अराजक तत्वों तक पहुंच जाती है और उन्हें पता ही नहीं चल पाता? जब कहीं धमाके होते हैं तब भी उन पर आंच नहीं आती! 

    अपने यहां नाम मात्र के ही उद्योगपति हैं, जो अपने बारूद कारखानों में सुरक्षा नियमों का सतर्कता के साथ पालन करते हैं। अधिकांश धन्नासेठों के लिए मेहनतकश मजदूर कीड़े-मकोडे हैं। नागपुर के इस रिश्वत कांड के उजागर होने से कुछ दिन पहले नागपुर में स्थित दुनिया की सबसे बड़ी विस्फोटक निर्माता कंपनी में हुए भयानक विस्फोट में छह महिलाओं सहित नौ श्रमिकों के परखच्चे उड़ गये। उनके परिजन अपनों के शवों को देखने के लिए तरसते रहे। उनके हाथ आए बस चीथड़े ही चीथड़े। जिनका रोते-कलपते हुए उन्होंने अंतिम संस्कार तो कर दिया, लेकिन उनके आंसू थम नहीं पाये। हथियारों के कारखाने के स्वामी की नज़र में भले ही हादसा हो, लेकिन मृतकों के परिजनों के लिए तो यह हत्या ही है। अंधाधुंध धन कमाने के लिए किया गया अक्षम्य संगीन अपराध है। इस बारूद के कारखाने में पहले भी कई बार जानलेवा विस्फोट हो चुके हैं, लेकिन इस बार के भयानक धमाके के बाद का मंजर इतना दर्दनाक था कि देखने वालों की रूह कांप गयी। आंखों से आंसू ही आंसू झरते रहे। लोगों ने धमाके की आवाज कई किलोमीटर दूर तक सुनी। सभी मृतकों के टुकड़ों-टुकड़ों में बंटे शवों को बड़ी मुश्किल से समेट कर पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। प्रतिवर्ष हजारों-हजारों टन विस्फोटक बनाने वाली इस इंडस्ट्रीज में भारतीय सेना के उपयोग में आने वाले गोला-बारूद और विभिन्न हथियारों का निर्माण किया जाता है। 1984 में भारतीय स्टेट बैंक से साठ लाख रुपये का कर्ज लेकर विस्फोटकों के निर्माण क्षेत्र में पदापर्ण करने वाली कंपनी के निर्माता आज की तारीख में पंद्रह हजार करोड़ रुपये से अधिक की धन-दौलत के स्वामी हैं। देश के शीर्ष धनाढ्यों में अपना नाम शुमार करा चुके इस कंपनी के सर्वेसर्वा का एक से एक ऊंचे लोगों के बीच उठना-बैठना है। उनकी छाती पर दानवीर का तमगा भी लगा है। विख्यात पत्रिका फोर्ब्स के कवर पेज पर उनकी तस्वीर शोभायमान हो चुकी है। 

    कुछ दिन पहले एक अंतराष्ट्रीय जांच एजेंसी की बड़ी ही चौंकाने वाली रिपोर्ट पढ़ने में आयी कि भ्रष्टाचार के मामले में हमारा महान भारत देश पांचवें नंबर पर आ गया है। इसी रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि पृथ्वी का स्वर्ग कहलाने को बेताब हिंदुस्तान में सरकारी स्तर पर भ्रष्टाचार आम भ्रष्टाचार के मुकाबले सर्वाधिक है, जिसे राजनीति और राजनेताओं का भरपूर साथ और आशीर्वाद मिलता चला आ रहा है। सरकारी भ्रष्टाचारियों की बदौलत कई काले-पीले उद्योगपति देखते ही देखते टाटा-बिरला और अंबानी के समक्ष खड़े नज़र आने लगे हैं। देश के जाने-माने कुछ उद्योगपति अपनी आत्मकथाओं में लिख चुके हैं कि यदि भ्रष्ट अफसरशाही नहीं होती तो वे यहां तक पहुंच ही नहीं पाते। कंगाली और गरीबी के चक्रव्यूह में ही फंसे रह जाते। देश में नकाबपोश अफसरों की भरमार है। यही धुरंधर कारोबारियों को भ्रष्टाचार के मार्ग सुझाते हैं। जब तक यह गठजोड़ रहेगा तब तक इस देश का ईमानदार आदमी गरीबी और भुखमरी के शिकंजे में जकड़ा रहेगा। अधिकांश भ्रष्टाचारियों के चेहरों के नकाब उतर ही नहीं पाते। अब तो बेइमान धंधेबाज सीनाजोरी करते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), आयकर तथा विभिन्न सरकारी जांच एजेंसियों के कार्य में विघ्न डालते हुए उन पर हमले भी करने लगे हैं। अभी हाल ही में प.बंगाल के उत्तरी परगना जिले में तृणमूल कांग्रेस नेता के यहां ईडी ने छापा मारी की तो अधिकारियों पर जानलेवा हमला कर उन्हें लहुलूहान किया गया। छत्तीसगढ़ के भिलाई में भी ईडी के अधिकारियों पर ऐसा ही हमला हो चुका है। पटना तथा मेरठ में शराब माफियाओं के यहां जांच करने गये अधिकारियों के पिटने की खबरों के साथ-साथ और भी ऐसी मार-ठुकायी की वारदातें सुनने-पढ़ने में आती रहती हैं। कुछ राजनेता और सत्ताधीश तो ईडी और आयकर विभाग को जरा भी अहमियत ही नहीं देते। उनकी निगाह में यह सरकारी संस्थान कठपुतली भर हैं। इनसे काहे को डरना। डरने का काम तो आम जनता का है। हम तो खास हैं...।

Thursday, January 4, 2024

गारंटी

    बीते सालों से अलग है। 2023 के गर्भ से निकला 2024 का यह साल। इस वर्ष में क्या-क्या होगा उसका अनुमान लगाना आसान भी है और थोड़ा मुश्किल भी। वक्त की नब्ज़ को पूरी तरह से जांचने और परखने वाला डॉक्टर अभी तक तो पैदा नहीं हुआ है। इसे लेकर अपने-अपने अनुमान होते हैं। अपनी-अपनी सोच होती है। वक्त से बड़ा बलवान और कोई नहीं। कब किसी अर्श से फर्श पर पटक दे। राजा को फकीर बना दे, बताना मुश्किल है। बीते सालों में इस कहावत को हमने बार-बार साकार होते देखा है। धर्म और राजनीति का घालमेल भी हमारे सामने है। ऐसा भी लगता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की गाड़ी धर्म और राजनीति की पटरी पर ही चल रही है। नामी-गिरामी बाबाओं, स्थापित नेताओं की नैया डूबने और किस्मत के चमकने के अटूट सिलसिले भी किसी से छिपे नहीं हैं।

    चार दशक तक राम मंदिर के निर्माण को लेकर संशय की स्थिति बनी रही। करोड़ों भारतीयों का स्वप्न अब शीघ्र ही साकार होने को है। 22 जनवरी को रामलला की भव्य मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। वर्षों से राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र रहे अयोध्या को सर्व सुविधायुक्त बनाने तथा श्रीराम मंदिर के उद्घाटन समारोह को यादगार बनाने के लिए कोई भी कसर नहीं छोड़ी जा रही है। अयोध्यावासियों ने भी देश और दुनिया के अतिथियों के स्वागत-सत्कार के लिए पूरी तैयारियां कर ली हैं। श्रीराम मंदिर के अलौकिक स्वरूप और उसकी भव्यता की खबरों को सुनने और के पश्चात करोड़ों भारतीय 22 जनवरी को ही अयोध्या पहुंचने को लालायित हैं। यह स्वाभाविक भी है, लेकिन इस जल्दबाजी से खतरे भी जुड़े हैं। इसीलिए माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए सभी से प्रार्थना की है कि मुझे पता है कि हर किसी की 22 जनवरी को अयोध्या आने की प्रबल तमन्ना है, लेकिन सभी राम भक्तों के एक साथ पहुंचने से सुरक्षा और व्यवस्था की गंभीर समस्या खड़ी हो सकती है। इसलिए मेरी आप सबसे बार-बार प्रार्थना है कि जिस तरह से आपने 500 साल तक इंतजार किया है, तो कुछ दिन तक और इंतजार कर लें। अयोध्या का भव्य, दिव्य मंदिर आने वाली सदियों-सदियों तक दर्शन के लिए उपलब्ध है। 22 जनवरी को जब अयोध्या में प्रभु श्रीराम विराजमान हों तब अपने घरों में श्रीराम ज्योति जलाएं। दीपावली मनाएं। इस दिन की शाम पूरे हिंदुस्तान में जगमग-जगमग होनी चाहिए। 

    गौरतलब है कि देश के कुछ मंदिरों, धार्मिक स्थलों में अनियंत्रित भीड़ की बेसब्री की वजह से भगदड़ मचती रही है, जिसमें कई लोगों की जान जाने तथा बुरी तरह से घायल होने की सुर्खियां पाती रही हैं। 2024 में ही आम चुनाव होने हैं। भाजपा ने ‘अबकी बार 400 पार, तीसरी बार मोदी सरकार’ के नारे को जोर-शोर से गुंजायमान करना प्रारंभ कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी श्रीराम मंदिर को अपनी उपलब्धि दर्शाने पर तुले हैं। बीते महीने सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में राम मंदिर के चित्र और नारे वाले चुनावी होर्डिंग लगाये थे तो कांग्रेस ने इसे आदर्श आचार संहिता का खुला उल्लंघन बताकर आपत्ति दर्शायी थी। भाजपा के नेताओं का दावा था कि राम मंदिर का चित्र कोई धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता की पहचान है। इसलिए इसके इस्तेमाल में आदर्श आचार संहिता आड़े नहीं आती। सभी जानते हैं कि भगवान श्रीराम और अयोध्या में मंदिर निर्माण के आश्वासन की बदौलत ही भारतीय जनता पार्टी की गाड़ी यहां तक पहुंची है। अब तो उसने अपना वादा भी पूरा कर दिया है। सफलता का श्रेय लेने का चलन तो तब से चला आ रहा है जब से देश आजाद हुआ है। कम अज़ कम भारत में तो इसके बिना राजनीति चलने से रही। 22 जनवरी को अयोध्या में ही नहीं पूरे देश में भगवान श्रीराम के चित्र के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरें नज़र आएंगी। यह सिलसिला लोकसभा चुनाव तथा उसके बाद भी बना रहेगा। विपक्षी बस देखते और खौलते रह जाएंगे। स्किल डेवलपमेंट, डिजिटल इंडिया, मेक-इन-इंडिया और सबसे महत्वपूर्ण स्टार्ट-अप के पूरे इकोसिस्टम को बढ़ावा देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने नाम की गारंटी देकर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान में भाजपा की जीत का झंडा फहराया है। यकीनन मोदी का कद भाजपा से बहुत बढ़ा हो चुका है। सिर पर खड़े लोकसभा चुनावों में भी वे मतदाताओं से यह कह कर वोट मांगेंगे कि आप सभी बस मुझ पर यकीन करें। हर वादा जरूर पूरा होगा। मतदाताओं को यदि उन पर यकीन नहीं होता तो विधानसभा के चुनावों में भाजपा को चौंकाने वाली जीत नहीं मिलती। वैसे यह भी सच है कि मतदाताओं के मन को पूरी तरह से जान और पढ़ पाना कभी भी आसान नहीं रहा। उन्होंने बड़ी खामोशी के साथ कई बार सत्ताधीशों के होश ठिकाने लगाये हैं। कई बार छले जा चुके देशवासी शाब्दिक गारंटी नहीं चाहते। वादों को धरातल पर साकार होते देखना चाहते हैं। हर भारतवासी आपसी सद्भाव, सर्वधर्म समभाव के व्यवहार की गारंटी चाहता है। वह भारत में राम राज्य के मूल्यों को पूर्णतया स्थापित होते देखना चाहता है। महिलाओं तथा दबे-कुचले भारतीयों की सुरक्षा की गारंटी के साथ-साथ वह इस बात की भी पूरी-पूरी गारंटी चाहता है कि भाजपा का कोई भी राजनेता भड़काऊ भाषणबाजी न करे। किसी के साथ अन्याय न हो। सभी के धर्म-कर्म और आस्था के मान-सम्मान के साथ शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दी जाए।

Thursday, December 28, 2023

लम्हों की खता की सज़ा

    ‘‘लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।’’ कभी न कभी आपने यह कहावत जरूर सुनी होगी। ऐसी और भी कई कहावतें हैं, जो इंसान की जल्दबाजी, अधीरता, गुस्से, नादानी, बेवकूफी और बेचारगी को बयां करती हैं। अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना और अपने मुंह मियां मिट्ठू बनना कोई अच्छी बात नहीं मानी जाती। ऐसे चरित्रधारी अंतत: हंसी के पात्र होते हैं। क्षणिक आवेश और नादानी के चलते इनकी जीवनभर की तपस्या भी तार-तार होकर रह जाती है। मुंबई के पश्चिम उपनगर दहिसर क्षेत्र के निवासी निकेश ने अपनी प्रिय 40 वर्षीय पत्नी निर्मला की सिर्फ इसलिए गला दबाकर नृशंस हत्या कर दी, क्योंकि उसने साबूदाने की खिचड़ी में ज्यादा नमक डालने की भूल कर दी थी। निकेश अपने मन को शांत रखने के लिए पिछले कई वर्षों से शुक्रवार का व्रत रखता चला आ रहा था, लेकिन अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं रख पाया। अब निकेश जेल में है। उसका बारह वर्षीय बेटा जो इस हत्या का प्रत्यक्ष गवाह है, अकेले जीने को विवश है। 

    मुंबई के 76 वर्षीय काशीराम पाटील को निर्धारित समय पर नाश्ता नहीं मिला तो वे तिलमिला गये। उनकी बौखलाहट उतरी अपने बेटे की पत्नी पर, जिसने अपने ससुर को दिन के 11 बज जाने के बाद भी नाश्ते से वंचित रखा था। नाश्ता देने में हुई देरी की वजह जानने की बजाय उम्रदराज ससुर ने अपनी कमर में खोंसी रिवॉल्वर निकाली और बहू के सीने में अंधाधुंध गोलियां उतार दीं। इन महाशय की भी बाकी बची-खुची उम्र जेल में ही गुजर रही है। कुछ दिन पहले अखबार में खबर पढ़ी कि मुंबई में एक युवक ने इसलिए शादी ही तोड़ दी, क्योंकि वधू पक्ष ने जो निमंत्रण पत्रिका छपवायी थी, उसमें उसकी डिग्री का उल्लेख नहीं था। अपने भावी पति की जिद्दी कारस्तानी ने वधू को इतनी जबरदस्त ठेस पहुंचायी कि उसने खुदकुशी करने की ठान ली। उसे किसी तरह से घरवालों ने मनाया, समझाया-बुझाया, लेकिन शादी टूटने की शर्मिंदगी से वह अभी तक नहीं उबर पाई है। दुल्हे मियां फरार हैं। पुलिस दिन-रात उसे दबोचने की कसरत में लगी है। यह अहंकारी और क्रोधी इंसान जहां भी होगा, चैन से तो नहीं होगा। अपनी गलती पर माथा भी पीट रहा होगा। 

    ये देश के निहायत ही आम लोग हैं। इनकी अपनी सीमित दुनिया है। इन्हें भीड़ नहीं घेरती। ज्यादा लोग भी नहीं जानते, लेकिन यह चेहरे तो खास हैं। जहां जाते हैं, पहचान में आ जाते हैं। भीड़ उन्हें घेर लेती है। अखबारों, न्यूज चैनलों तथा सोशल मीडिया से वास्ता रखने वालों ने मोटिवेशनल स्पीकर विवेक बिंद्रा का नाम अवश्य सुना होगा। उनके शीर्ष पर पहुंचने की संघर्ष गाथाएं भी सुनी होंगी। उनकी प्रेरक स्पीच के वीडियो भी जरूर देखे होंगे। इस महान हस्ती पर अभी हाल में अपनी नई-नवेली पत्नी की पिटायी करने का संगीन आरोप लगा है। कारण भी बेहद हैरान करने वाला है। विवेक अपनी मां प्रभादेवी से अपमानजनक तरीके से झगड़ा कर रहे थे। पत्नी यानिका ने विवेक को मां के साथ बदसलूकी करने से रोका तो विवेक का खून खौल गया। यह कौन होती है, मुझ पर हुक्म चलाने और रोक-टोक करने वाली? इसे पता होना चाहिए कि मैं अपनी मर्जी का मालिक हूं। किसी की सुनने की मेरी आदत नहीं है। इसे यदि आज सबक नहीं सिखाया गया तो कल ये मेरे सिर पर चढ़कर नाचेगी। विवेक ने विवेकशून्य होने में किंचित भी देरी नहीं लगायी। पत्नी को गंदी-गंदी गालियां दीं। फिर सिर के बाल खींचते हुए जिस्म पर थप्पड़ों की बरसात कर दी। असहाय पत्नी रहम की भीख मांगती रही, लेकिन विवेक का गुस्सा शांत नहीं हुआ। राक्षसी तरीके से की गयी पिटायी से पत्नी यानिका के कान के पर्दे फट गये। अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। थाने में रिपोर्ट भी दर्ज हुई। विवेक का पहली पत्नी गीतिका के साथ अदालत में मुकदमा चल रहा है। लाखों रुपये की फीस लेकर लोगों को अनुशासन, सम्मान, धैर्य, संयम का पाठ पढ़ाने वाले विवेक के यू-ट्यूब पर दो करोड़ से भी अधिक सब्सक्राइबर्स हैं। लोगों को मान-सम्मान और धनवान बनकर जीवन जीने की कला से अवगत कराने वाले बिंद्रा की नींद उड़ चुकी है। पुराने दबे-छिपे गुनाहों के पिटारे भी खुलने लगे हैं। चेहरे का नकाब उतरने लगा है। अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने के अपराधबोध में जीने को विवश मोटिवेटर को पछतावा भी हो रहा है। यह मैंने क्या कर डाला? हमेशा नारी शक्ति के सम्मान का राग गाता रहा। दूसरों को गुस्से पर नियंत्रण रखने का पाठ पढ़ाता रहा और खुद पर काबू नहीं रख पाया! 

    हंसी के पिटारे नवजोत सिंह सिद्धू को कौन नहीं जानता। एक दौर था, जब भारतीय जनता पार्टी में उनकी तूती बोलती थी, उनके चटपटे भाषण सुनने के लिए भीड़ जुटती थी। कपिल शर्मा के कॉमेडी शो की भी कभी जान हुआ करते थे नवजोत। दर्शकों को हंसा-हंसा कर लोटपोट कर दिया करते थे। ठहाके पर ठहाके लगाने के करोड़ों रुपये पाते थे। इस बहुरंगी कलाकार, नेता को उनकी एक छोटी-सी गलती ले डूबी। 27 दिसंबर, 1988 में पटियाला में कार पार्किंग को लेकर उम्रदराज शख्स को नवजोत ने गुस्से में इतनी जोर का मुक्का मारा, जिससे उसके प्राण पखेरू उड़ गये। क्रिकेटर से नेता बने सिद्धू का यकीनन हत्या करने का इरादा नहीं था, लेकिन क्षणिक आवेश ने उन्हें हत्यारा बना दिया। 35 वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़े। बार-बार जेल भी जाना पड़ा। पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान की तरफदारी करने के कारण कपिल शर्मा के शो से भी बेआबरू होकर बाहर होना पड़ा। राजनीति भी मंदी पड़ गयी। बिना सोचे-समझे जल्दबाजी में लिये गये कुछ निर्णयों के कारण सिद्धू आज अकेले पड़ गये हैं। सन्नाटे भरी रातों ने उनकी नींद उड़ा दी है। मन में बार-बार यही विचार आता है कि काश! क्रोध और बड़बोलेपन के चंगुल से बचा रहता तो इतने बुरे दिन न देखने पड़ते, लेकिन सच तो यह है कि अब चिड़िया खेत चुग कर बहुत दूर जा चुकी है। 

    अभी हाल ही में 146 विपक्षी सांसदों के निलंबन ने विपक्षी दलों की नींद उड़ा दी। इस निलंबन को लोकतंत्र की हत्या करार दिया गया। यह पहली बार नहीं था जब सांसदों को विरोध प्रदर्शन के लिए यह सज़ा दी गयी। सदन के बाहर सांसदों की नारेबाजी और धरना प्रदर्शन के बीच तृणमूल पार्टी के एक सांसद ने देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को अपमानित करने के इरादे से उनकी मिमिक्री करनी प्रारंभ कर दी। वहां पर मौजूद सांसद तालियां बजाकर असभ्य मिमिक्रीबाज की हौसला अफजाई करने लगे। देश के सम्मानित उपराष्ट्रपति की चालढाल और बोलचाल का जब बेहूदा मज़ाक उड़ाया जा रहा था, तब वहां पर मौजूद कई मान्यवर आनंदित होकर ठहाके लगा रहे थे। तालियां पीटकर सांसद का हौसला बढ़ा रहे थे। उन्हीं में शामिल थे, कांग्रेस के नेता राहुल गांधी जो वर्तमान में सांसद भी हैं। उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार भी माना जाता है। राहुल ने भी उपराष्ट्रपति की मानहानि करते असभ्य मिमिक्रीबाज को फटकारना जरूरी नहीं समझा। वे खुद मिमिक्री की धड़ाधड़ वीडियो बनाते रहे। उनकी यह हरकत सजग देशवासियों को बहुत चुभी। राहुल का यही बचकानापन उन्हें हर बार आसमान से जमीन पर पटक देता है। भारत जोड़ो यात्रा के जरिए अपने कद को बढ़ाने की भरपूर कसरत कर चुके राहुल को मानहानि के मामले में दोषी पाये जाने के बाद अपनी लोकसभा की सदस्यता खोनी पड़ी थी।

Thursday, December 14, 2023

नतमस्तक

    उन्होंने अपने चेहरे पर जमी खौफ की परछाइयों पर नकाब डाल रखा था। वे किसी भी हालत में अपने अंदर के भय को उजागर नहीं करना चाहते थे। उन्हें अपने से ज्यादा अपने साथियों की चिंता थी। वे उनके हौंसले को किसी भी हालत में पस्त होते नहीं देखना चाहते थे। उत्तराखंड के उत्तराकाशी में निर्माणाधीन सुरंग का हिस्सा ढहने के कारण उन पर जानलेवा विपदा आ पड़ी थी। देश और दुनिया को भी खबर हो गई थी कि सुरंग में फंसे मजदूरों की जिन्दगी दांव पर लग चुकी है। वो दिवाली का दिन था। 12 नवंबर। सुबह साढ़े पांच बजे यह स्तब्ध और सन्न करने वाला हादसा हुआ था। सुरंग में फंसे सभी मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए बचाव दल तुरंत सक्रिय हो गये थे। देश और विदेश के न्यूज चैनलों ने भी पल-पल की खबर को कवर करना प्रारंभ कर दिया था। सभी को उम्मीद थी कि मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकालने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा। जब देश चांद पर जा पहुुंचा है, तब पहाड़ का सीना चीरना कौन-सी बड़ी बात है। कुछ ही घण्टों के बाद मजदूर अपने घर-परिवार के साथ बोल-बतिया रहे होंगे और अपनी आपबीती सुना रहे होंगे। अंधी सुरंग में कैद मजदूरों के बारे में तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे थे। सुरंग से मलबा हटाते-हटाते जब पूरा दिन बीत गया, तो श्रमिकों के परिजनों की धड़कनें बेकाबू होने लगीं। दूसरे दिन राहत और बचाव कार्य में तूफानी तेजी लायी गई। उनसे बात कर आक्सीजन और पानी उपलब्ध कराया गया। 60 मीटर तक फैले मलबे को हटाने में कई दिक्कतें आने लगीं। इधर बचाव कर्मी नीचे से मलबा हटाते उधर ऊपर से मलबा गिरने लगता। दो दिन में बड़ी मुश्किल से पंद्रह से बीस मीटर तक मलबा हटाने में कामयाबी मिली। श्रमिकों के परिजनों के साथ-साथ संवेदनशील देशवासियों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंचने लगीं। सभी के चेहरे बुझने लगे। मन-मस्तिष्क में तरह-तरह के सवाल भी कौंधते चले गए। भूखे-प्यासे श्रमिक किस हाल में होंगे। अंधेरे में जरूर उनका दम घुट रहा होगा। कोई चल तो नहीं बसा होगा? तीसरे दिन भी बचाव अभियान युद्ध स्तर पर जारी रहा। 

    बड़ी मुश्किल से 25 मीटर तक मलबा हटाया तो गया, लेकिन जितना हटाया गया उतना और गिर गया। इसी दौरान वॉकी-टॉकी के माध्यम से परिजनों से श्रमिकों की बातचीत करवाकर राहत और तसल्ली का अहसास दिलाने की कोशिश की गई। बचाव टीमों की सफलता-असफलता की खबरें सतत आती और डराती रहीं। श्रमिकों के घर-परिवार के लोग कभी खुशी, कभी गम की स्थिति के झूले में झूलते रहे। 11वें दिन पाइप के जरिए रोटी, सब्जी, खिचड़ी, दलिया, केले, संतरे श्रमिकों तक पहुंचाये गए। इसके साथ ही टीशर्ट, अंडरगारमेंट, टूथपेस्ट और ब्रश के साथ साबुन भी भेजा गया। तब कहीं जाकर उन्होंने मुंह हाथ धोया, दांत साफ किये और अपने-अपने हिसाब से खाना खाया। दिन पर दिन बीतते गये। असमंजस के साथ आशा के दीप भी जलते रहे। 17 दिनों के लंबे इंतजार के बाद जिस दिन सभी श्रमिक सुरक्षित बाहर लाये गए उस दिन अपनों तथा बेगानों ने दिवाली मनायी। सभी के श्रमिकों का सकुशल लौटना किसी दैवीय चमत्कार से कम नहीं था। मजदूर भी बेहद प्रफुल्लित थे। सभी ने कहा कि सुरंग में फंसे रहने के दौरान कई बार उन्हें लगा कि मौत उनसे ज्यादा दूर नहीं है। जब उन्हें पता चला कि अमेरिकी ऑगर मशीन ने हार मान ली है तो वे बुरी तरह से घबरा गये। अब क्या होगा? यह चमत्कार ही था कि तुरंत रैट माइनर्स ने अपनी करामात दिखायी और सभी की जान में जान आयी। रैट-होल माइनिंग खदानों में संकरे रास्तों से कोयला निकालने की एक काफी पुरानी तकनीक है। इसे गैरकानूनी माना जाता है, लेकिन इंसानी हाथों की इस अवैध तकनीक ने तो करोड़ों की बड़ी-बड़ी मशीनों को मात दे दी। रैट-होल का मतलब है- जमीन के अंदर संकरे रास्ते खोदना, जिसमें एक व्यक्ति जाकर कोयला निकाल सके। इसका नाम चूहों द्वारा संकरे बिल बनाने से मेल खाने के कारण रैट-होल माइनिंग पड़ा है। 

    दिल्ली की एक कंपनी में कार्यरत मुन्ना कुरैशी वो पहले शख्स थे, जिन्होंने सुरंग के अंदर प्रवेश कर आखिरी चट्टान हटायी। श्रमिकों का अभिवादन किया। अपनी खुशी व्यक्त करने के लिए कुरैशी के पास शब्द नहीं थे। आखिर के दो मीटर में खुदाई करने वाले एक अन्य रैट-होल माइनर फिरोज खुशी के आंसू लिए सुरंग से बाहर निकले। सुरंग में फंसे मजदूरों को बाहर निकालने के लिए हिंदू-मुस्लिमों ने मिलकर अपनी जान लगा दी। उन्होंने देशवासियों को भी बिना किसी भेदभाव के मिलजुलकर रहने का संदेश दे दिया। सुरंग के अंदर भी सभी श्रमिक भाईचारे के गीत गाते रहे। एक दूसरे का हौसला बढ़ाते हुए आपसी सद्भाव और भाईचारे की पताका फहराते रहे। कई दिनों के बाद खुली हवा में आये मंजीत के उम्रदराज पिता के आंसू थमने को तैयार नहीं थे, वे बेटे के गले से मिलते हुए बोले, ‘आखिरकार मेरा बेटा बाहर आ ही गया। हमारे लिए आज ही दिवाली है। पहाड़ ने मेरे बच्चे तथा अन्य मेहनतकशों को अपने आगोश से रिहाई दे दी है। मैं कपड़े लेकर आया हूं ताकि उसे साफ कपड़ों में देख सकूं।’ इस पिता की उसी दिन से जान अटकी थी, जिस दिन सुरंग हादसा हुआ था। पिता बहुत भयभीत थे। बीते वर्ष उसके बड़े बेटे की मुंबई में एक निर्माण कंपनी में हुई दुर्घटना में जान चली गई थी। सुबोध वर्मा भी उन 41 मजदूरों में से एक हैं। झारखंड के रहने वाले इस जिन्दादिल इंसान के शब्द थे, ‘हमें अंदर खास दिक्कत नहीं हुई। शुरू-शुरू के 24 घण्टे ही तकलीफ में गुजरे। ऑक्सीजन और पानी के अभाव से जूझना पड़ा। बाद में तो पाइप के जरिए हमें काजू, किशमिश और अन्य खाने की चीजें मिलने लगीं। हमें लेकर बाहर भले ही हमारे परिजन और देशवासी परेशान और फिक्रमंद थे, लेकिन अंदर हम एक-दूसरे का पूरा ख्याल रख रहे थे। अंताक्षरी तथा गीत-गजलें गाते हुए वक्त गुजार रहे थे।’ 51 वर्षीय गब्बर सिंह नेगी की बहादुरी और जिंदादिली की जितनी तारीफ की जाए, कम होगी। गब्बर सिंह अपने साथी श्रमिकों का निरंतर मनोबल बढ़ाते हुए कहते और समझाते रहे कि बिलकुल मत घबराओ। धैर्य रखो। हमें शीघ्र ही सुरक्षित बाहर निकाल लिया जाएगा। बाहर पूरा देश हमारा इंतजार कर रहा है। उसी दौरान उन्होंने अपने साथियों से यह वादा भी किया कि तुम सभी के बाहर निकलने के बाद ही मैं बाहर कदम रखूंगा। नेगी अपने वादे को नहीं भूले। अंत में जब वे बाहर निकले तो उनका चेहरा मुस्कराहट से चमक रहा था। सभी साथी उनके प्रति नतमस्तक थे।


Thursday, December 7, 2023

बदलाव की दस्तक

    नशे के अंधेरे में पूरी तरह से खो गया था भूषण पासवान। वह रिक्शा चलाता था। खून-पसीना बहाकर जो कुछ भी कमाता शराब और जुए पर लुटा देता। परिवार भुखमरी के कगार पर जा पहुंचा था। मां कलावती देवी लोगों के घरों में बर्तन साफ कर कुछ रुपये कमाती तो ही चूल्हा जल पाता। कई बार तो भूषण मां से भी पैसे छीनकर नशाखोरी में उड़ा देता। पंजाब के लाखों नौजवान नशे के गुलाम हो चुके हैं। पूरे देश को यही चिंता खाए जा रही है कि नशे की अंधेरी दुनिया की तरफ भागते नौजवानों को कैसे सही रास्ते पर लाया जाए। नशे के गर्त में समा चुका भूषण अनपढ़ नहीं था। पानी की तरह शराब पीने से होने वाली तमाम तकलीफों और बीमारियों से वाकिफ था। फिर भी उसने नशे को अपना सच्चा साथी मान लिया था। वर्ष 2004 का एक दिन था जब संत बलबीर सिंह सीचेवाल उस झुग्गी बस्ती में पहुंचे जहां भूषण रहता था। उन्हें गांव के युवाओं के नशे के शिकार होने और बच्चों की शिक्षा के अभाव में हुई बदहाली की खबर मिल चुकी थी। वे जागृति का दीपक जलाकर घने अंधेरे को दूर करना चाहते थे। उन्होंने लोगों को अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने हेतु प्रेरित करने के लिए एक जगह पर एकत्रित किया। लोगों को नशे की बुराइयों से अवगत कराते हुए उससे मुक्ति पाने का संदेश दिया। संत को यह देखकर बहुत पीड़ा हुई कि झुग्गी बस्ती में रहने वाले बच्चे शिक्षा के अभाव में दिशाहीन होते चले जा रहे हैं। अशिक्षा और धनाभाव के चलते मां-बाप उन्हें स्कूल भेजने में असमर्थ हैं। उन्होंने बच्चों के जीवन का कायाकल्प करने के उद्देश्य से गांववासियों को प्रेरित करते हुए कहा कि अगर उनके बीच ही कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति हो तो यह काम आसानी से हो सकता है। भूषण मैट्रिक पास था, इसलिये सभी ने उसे यह दायित्व सौंपने का सुझाव दिया। भूषण को तो शराब और जुए से ही फुर्सत नहीं थी। उसने साफ इंकार कर दिया। गांव वालों ने उसे जोर देकर समझाया, लेकिन वह आनाकानी करता रहा। अंतत: मां के बहुत समझाने पर वह संत के पास पहुंचा।

    संत ने भूषण से सवाल किया, ‘क्या तुम अपनी जिन्दगी यूं ही बरबाद कर दोगे?... क्या तुम्हें पता है कि झुग्गी के बच्चे शिक्षा के अभाव में पिछड़ रहे हैं। उनका भविष्य अधर में लटका है। गलत आदतें उन्हें आकर्षित कर रही हैं। तुम भी पढ़े-लिखे होने के बावजूद नशे और जुए की लत के शिकार हो। मुझे कई गांव वालों ने बताया है कि कई बार तुम इतनी अधिक शराब पी लेते हो कि अपनी सुध-बुध खो बैठने के बाद गंदी नाली के कीचड़ में पड़े रहते हो और बच्चे शराबी...शराबी कहकर तुम पर पत्थर फेंकते हैं। राहगीर भी तुुम्हारा मज़ाक उड़ाते हैं। तुम जैसे पढ़े-लिखे युवक को क्या यह शोभा देता है? तुम्हें अपने जीवन को इस तरह से बर्बाद नहीं करना चाहिए। अभी भी अगर तुम चाहो तो सबकुछ बदल सकता है। जब आंख खुले तभी सबेरा।’ संत की भेदती आंखों और उनके समझाने के अंदाज ने भूषण पर कुछ ऐसा असर डाला कि वह बच्चों को पढ़ाने के लिए राज़ी हो गया। पेड़ के नीचे झुग्गी बस्ती के बारह बच्चों से क्लास की शुरुआत हुई। भूषण के लिए यह नया अनुभव था। शुरू-शुरू में शराब से दूरी बनाना उसे किसी मुसीबत से कम नहीं लगा, लेकिन धीरे-धीरे बच्चों को पढ़ाना उसे अच्छा लगने लगा। वो दिन भी आया जब उसने नशे से पूरी तरह से तौबा कर ली। 2006 में भूषण ने इंटरमीडियट किया, 2010 में बीए भी कर लिया। कभी रिक्शा चलाने वाला भूषण पासवान आज शानदार इमारत में चल रहे ननकाना चेरिटेबल स्कूल में प्रिंसीपल है। गरीब मां-बाप के बच्चों की जिंदगी संवारने में लगे भूषण की जिंदगी पूरी तरह से बदल चुकी है। अब गांव के लोग भी उससे इज्जत से पेश आते हैं। उसकी तारीफें करते नहीं थकते। बच्चे भी सम्मान देने में कोई कमी नहीं करते। दूर-दराज के गांव वाले भी विभिन्न कार्यक्रमों में बुलाते हैं और मंच पर बिठाकर सम्मानित करते हैं। अब तो प्रिंसिपल साहब ने नशे के खिलाफ भी अभियान चला दिया है। किसी को पीते देखते हैं तो बड़े सलीके से समझाते हैं और अपनी बीते कल की कहानी दोहराते हैं।

    इसी देश में एक गांव है, नानीदेवती। मात्र पैंतीस सौ के आसपास की जनसंख्या वाले इस छोटे से गांव में देसी शराब के दस अड्डे थे। सभी अड्डों पर जमकर शराबखोरी होती थी। सुबह, शाम गुलजार रहते थे सभी ठिकाने। अपने काम धंधे को छोड़कर युवक इन्हीं मयखानों पर जमे और रमे रहते थे। कुछ बुजुर्ग भी रसरंजन के लिए पहुंच जाते थे। अपराध भी बढ़ते चले जा रहे थे। चोरी और लूटपाट की घटनाएं आम हो गईं थीं। पांच साल के भीतर 100 से अधिक युवक शराब की लत के चलते चल बसे। युवा बेटों की मौत के सिलसिले ने मां-बाप को तो रुलाया ही, गांव के चिंतनशील तमाम बुजुर्गों को भी झकझोर कर रख दिया। आखिर ऐसा कब तक चलता रहेगा? शराब की लत के शिकार होकर उनके गांव के बच्चे यूं ही अपनी जान गंवाते रहेंगे! शराबखोरी से लगातार हो रही मौतों से शराब कारोबारी भी पूरी तरह से अवगत थे। बुजुर्ग पुरुषों और महिलाओं ने उनसे कई बार गांव से अपने शराब के अड्डे हटाने की फरियाद की। धनपशुओं में इंसानियत होती तो मानते! उनके लिए तो कमाई ही सबकुछ थी। युवकों की बरबादी और बदहाली उनके लिए कोई मायने नहीं रखती थी। जागरूक गांव वालों को समझ में आ गया कि धनलोभियों से किसी भी तरह की उम्मीद रखना बेकार है। इस समस्या का हल निकालने के लिए गांव वालों ने बैठक की। स्त्री-पुरुष सभी एकत्रित हुए। यही निष्कर्ष निकला कि गांव में शराब पीने पर प्रतिबंध लगाये बिना युवकों की मौत पर विराम नहीं लगाया जा सकता। सभी ने शराब को हाथ भी न लगाने की कसम खायी। यह भी तय किया गया कि जो भी व्यक्ति शराब पीता पाया गया उससे पांच हजार से लेकर दस हजार तक का जुर्माना वसूला जायेगा। बुजुर्गों की सीख और जुर्माने के भय का युवकों पर भरपूर असर पड़ा। उनकी आंखें खुल गयीं। अब नानीदेवती गांव शराब से मुक्ति पा चुका है। शराब के सभी अड्डे भी बंद हो चुके हैं।

    मुंबई की एक शराबी महिला को जेल की हवा खानी पड़ी। यह महिला एक नामी वकील हैं। नाम है जाहन्वी गडकर। रिलायंस की टॉप लीगल एग्जीक्यूटिव हैं। नशे ने उनकी जिन्दगी तबाह कर डाली। अच्छे-खासे भविष्य का सत्यानाश हो गया। जाहन्वी ने नशे में मदमस्त होकर पांच लोगों को कुचल दिया। दो की मौत हो गयी। अपनी आलीशान ऑडी कार को लिमिट से चार गुना अधिक शराब पीकर चलाने वाली यह मदहोश वकील यातायात के सभी नियमों को नजरअंदाज कर कार दौड़ा रही थी और खूनी दुर्घटना को अंजाम दे बैठी। एक जमाना था जब यह माना जाता था कि नशे पर पुरुषों का ही एकाधिकार है। अब तो नारियों ने भी बहकने में जबरदस्त बाजी मार ली है। पिछले दिनों मुंबई में ही यातायात पुलिस ने सड़क पर अंधाधुंध कार दौड़ाती एक पढ़ी-लिखी आधुनिक महिला को रोका। वह नशे में इतनी धुत थी कि उसने कार में बैठे-बैठे ही पुलिस वालों पर भद्दी-भद्दी गालियों की बौछार शुरू कर दी। पुरुषों की बेहूदगी के अभ्यस्त पुलिसवाले उसके अभद्र और बेहूदा व्यवहार से दंग रह गए। ऐसे नजारे अब आम होते चले जा रहे हैं। यह भी देखा-भाला सच है कि महिलाओं ने ही शराब पर पाबंदी लगवाने में सक्षम भूमिका निभायी है। 

    विदर्भ के शहर चंद्रपुर में कई सजग महिलाएं शराब बंदी की मांग करती चली आ रही थीं। सरकार सुनने को तैयार ही नहीं थी। सरकार को तो शराब की कमायी ललचाती है। उसे  शराब पीकर बरबाद होने और बेमौत मरने वालों से क्या लेना-देना! विधानसभा और लोकसभा के चुनाव आते-जाते रहे। हर चुनाव के समय शराब बंदी के वायदे तो किये जाते, लेकिन उन्हें पूरा करने का साहस गायब हो जाता। 2014 के विधानसभा चुनाव के दौरान महिलाओं ने उसी उम्मीदवार को जितवाने की कसम खायी जो चंद्रपुर जिले में जगह-जगह आबाद शराब दुकानों और बीयरबारों को बंद करवाने का दम रखता हो। वायदे का पक्का हो। वर्षों से जिले में शराब बंदी लागू करने की मांग करते चले आ रहे भाजपा नेता सुधीर मुनगंटीवार पर महिलाओं ने भरोसा किया। उन्होंने भी अपने वायदे पर खरा उतरने में जरा भी देरी नहीं लगायी। चंद्रपुर में शराब बंदी कर दी गई, लेकिन बाद में जो सरकार आयी उसके एक तिकड़मी मंत्री ने फिर से पियक्कड़ों के लिए सभी शराब की दुकानों के ताले खुलवा दिये। शराब विरोधी महिलाएं अपना माथा पीटते रह गईं। सच्ची भारतीय नारी तो देश के हर शहर और गांव को ‘कसही’ जैसा देखना चाहती है। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में स्थित है, गांव कसही। इस गांव का शराब और शराबियों से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। पूरी तरह से साक्षर यह गांव अपराधमुक्त है। आपसी भाईचारा भी देखते बनता है। यहां की बेटी उसी घर में ब्याही जाती है, जहां शराब को नफरत की निगाह से देखा जाता हो। यह सब हुआ है कसही गांव के रहने वालों की जागरुकता की वजह से! आसपास के शहरों और गांवों के लोग भी हैरत में पड़ जाते हैं जब उन्हें पता चलता है कि इस गांव में पिछले 100 सालों से किसी ने शराब नहीं चखी। कसही की आबादी छह सौ के आसपास है। पूरी तरह से शाकाहारियों के इस गांव में बहू लाने के पहले यह खोज-खबर ली जाती है कि कहीं समधियों के परिवार का कोई सदस्य मदिरा प्रेमी तो नहीं है। पूरी तरह से आश्वस्त होने के बाद ही रिश्ता जोड़ा जाता है। यानी इस गांव के निवासी ही नहीं, रिश्तेदार भी शराब से कोसों दूर रहते हैं।