Thursday, November 6, 2025

मासूम पौधा...छायादार पेड़!

नवरात्रि का पर्व निकट था। शहर के कलाकार देवी की मूर्तियां बनाने में तल्लीन थे। अत्यंत परिश्रम और भक्तिभाव से मूर्तिकार को देवी मां की मूर्ति गढ़ते देख मेरा वहां कुछ पल ठहरने को मन हो आया। इस कुशल और अनुभवी मूर्तिकार का शहर ही नहीं प्रदेश में भी बड़ा नाम है। अपनी कला में बेजोड़ मूर्तिकार का मानना है कि उसके लिए सबसे पवित्र-अनमोल और सुखद पल वो होते हैं, जब वह मां दुर्गा की आंखों में रंग भरता है। रात-दिन के अथक परिश्रम से बनायी और सजायी गई मिट्टी की प्रतिमाएं नास्तिकों में भी श्रद्धा और आस्था के भाव जगा देती हैं। बच्चे, किशोर, युवा और बुजुर्ग नवरात्रि के जगमगाते पंडालों की ओर बरबस खिंचे चले आते हैं और नतमस्तक हो जाते हैं। मूर्ति कला के प्रति जी-जान से समर्पित सिद्धहस्त कलाकार का बस चले तो वह मिट्टी में ही सांस फूंक दे, जान डाल दे, बिल्कुल वैसे ही जैसे ममत्व से परिपूर्ण कई माताएं विपरीत हालातों में भी अपनी संतानों के जीवन को खुशनुमा बनाने और उन्हें शीर्ष तक पहुंचाने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करते हुए खुद जीना भूल जाती हैं। इसके साथ ही यह संदेश भी देती चली जाती हैं, जिद ही इंसान की जीत का महामंत्र है। दिल्ली के रानीखेड़ा में जन्मी आयुषी वसंत विहार की एसडीएम यानी सब डिविजनल मजिस्ट्रेट हैं। प्रशासन, कानून व्यवस्था और राजस्व में संबंधित दायित्वों को अच्छी तरह से संभाल रही हैं। सभी लोग उनकी कार्यशैली से अति संतुष्ट और प्रभावित हैं। गौरतलब है कि आईएएस अधिकारी भारत की प्रशासनिक व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। देश और समाज में उनकी उल्लेखनीय भूमिका होती है। कहने को तो देश में असंख्य आईएएस अधिकारी हैं, लेकिन यहां कलमकार आयुषी की कहानी इसलिए पेश कर रहा है, क्योंकि वह देख नहीं सकती। जब वह मात्र एक साल की थी, तब उसके माता-पिता को पता चला था कि उनकी मासूम लाडली बिटिया पूरी तरह से दृष्टिहीन यानी अंधी है। उसके लिए सूरज की रोशनी और अंधेरा एक समान है। लाल, हरे, नीले, काले, पीले, सफेद, जामुनी, कत्थे आदि सभी रंगों के उसके लिए एक से मायने हैं। दिल को आहत करने वाले इस कटु सच को जान-समझकर पहले तो माता-पिता काफी देर तक चुपचाप एक दूसरे को अश्रुपूरित आंखों से देखते रहे। दोनों को निराशा की आंधी ने बहुत चिंतित और परेशान किया। तरह-तरह के विचार मन-मस्तिष्क में आते-जाते रहे। ऐसे में हमारी इकलौती बिटिया के भविष्य का क्या होगा? बेटे तो जैसे-तैसे अंधेरे से लड़ लेते हैं, लेकिन बेटी की जीवन नैया कैसे पार होगी? 

आयुषी की मां आशारानी सीनियर नर्सिंग ऑफिसर थीं। उन्होंने सुख-दु:ख के हर चेहरे को करीब से देखा था। कई किताबें पढ़ी थीं। साधु-संतों के प्रवचन सुने थे। उन्होंने किसी तरह से खुद को संभाला। पति को भी इस विपरीत परिस्थिति का हिम्मत के साथ सामना करने के लिए प्रेरित किया। रिश्तेदारों तथा आसपास के लोगों की तरह-तरह की भयावह शंकाओं से परिपूर्ण बोलती को बंद करने के लिए डंके की चोट पर कहा कि हमारी बिटिया की आंखों में रोशनी नहीं है तो क्या हुआ? हम उसे ज्ञान का ऐसा उजाला देंगे कि सभी देखते रह जाएंगे। ममतामयी मां ने बेटी की भविष्य की राह में उजाला ही उजाला लाने के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर अपनी पूरी ताकत झोंकते हुए अच्छे से अच्छे स्कूल, कॉलेज से शिक्षित-दीक्षित किया कि लोग वाकई देखते ही रह गए। आयुषी ने भी मेहनत में कोई कसर बाकी नहीं रखी। अटूट लगन, अथाह जुनून की बदौलत उसने 2021 में यूपीएससी में ऑल इंडिया में 48 रैंक हासिल कर दिखा दिया कि पौधे को यदि जागरूक माली, बेहतर खाद पानी, हवा मिले तो उसे दुनिया की कोई भी ताकत उसे मजबूत छायादार पेड़ बनने से नहीं रोक सकती। आईएएस बनने से पहले आयुषी ने दस साल तक प्राइमरी स्कूल में शिक्षिका के तौर पर काम किया। उसी दौरान ठान लिया कि चाहे कितनी भी मेहनत क्यों न करनी पड़े, लेकिन आईएएस बनकर दिखाना है। आयुषी के सपने को साकार करने वाली मां वर्षों तक बड़ी मुश्किल से आधी-अधूरी नींद ले पाईं। आयुषी बताती हैं कि मां पहले तो बोल-बोल कर, फिर रिकॉर्डर के जरिए यूपीएससी के कोर्स सुनाती थीं। वर्ष 2016, 17, 18 तक इन तीनों साल प्रिलिम्स निकाला, लेकिन मैंस क्लियर नहीं कर पा रही थी। लेकिन फिर भी हिम्मत नहीं हारी। हर कमी या गलती से सबक लिया। उस मिस्टेक को रिपीट नहीं होने दिया। किताबे डाउनलोड कीं। यूट्यूब पर वीडियो सुने। कुछ इस तरह यूपीएससी की तैयारी की। अपनी दिव्यांगता के लिए टेक्नोलॉजी का सहारा लिया। 2021 में यूपीएससी रिजल्ट में ऑल इंडिया रैंक 48 थी। 2022 में यूपीएससी ट्रेनिंग करने के बाद एजीएमयूटी कैडर के तहत पहली पोस्टिंग बतौर ट्रेनी गोवा में असिस्टेंट कलेक्टर हुईं।

आयुषी की मां की हार्दिक ख्वाहिश थी कि उनकी बेटी देश-दुनिया के विख्यात शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में प्रतिभागी बने। साहसी और जुनूनी बेटी ने मां के इस सपने को भी पूरा कर दिखाया है। आयुषी कवयित्री भी हैं। अपने अनुभवों और अहसासों को शब्दों में पिरोना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। वह अभी तक 50 से अधिक कविताएं लिख चुकी हैं। अनेकों किताबें पढ़ चुकी इस अनूठी, प्रेरक प्रशासनिक अधिकारी को मूवी भी साउंड सुनकर विजुलाइज करके देखना बहुत सुकून देता है। 

यदि नारी ठान ले तो उसके लिए कोई भी काम मुश्किल नहीं है। परिवार की रोजी-रोटी की गाड़ी चलाने के लिए हमारे इर्द-गिर्द कई महिलाएं पुरुषों की तरह खून-पसीना बहाती देखी जा सकती हैं। उन्हीं में शामिल हैं लक्ष्मी अगदारी, जो कोयला खदान में बड़ी सावधानी से जमीन से सौ मीटर नीचे जाकर बारूद लगाती हैं। यहीं से कोयला मिलता है। यहां पहुंचने और विस्फोटक लगाने में तीन घंटे से ज्यादा लगते हैं। विस्फोट के बाद कोयला टूटता है और उसे निकालने का काम शुरू होता है, खदान में हर पल घना अंधेरा छाया रहता है। दम घोटू घने अंधकार में एक बारगी पुरुष भी घबरा जाते हैं। पहले लक्ष्मी के पति कोयला खदान में काम करते थे। अचानक उनके चल बसने के बाद लक्ष्मी ने सफाईकर्मी या चपरासी का आसान काम करने की बजाय कोयला खदानों में विस्फोटक लगाने (ओपन माइन ब्लास्टिंग) के जोखिम वाले काम को चुना। उन्हें कुछ पुरुषों ने चेताया और समझाया भी कि महिलाओं के लिए यह काम कतई आसान नहीं, लेकिन लक्ष्मी ने इस खतरनाक कार्य को इसलिए प्राथमिकता दी कि दूसरी औरतें भी कोयला खदानों में काम करने के लिए आगे आएं। इसे करने में उन्हें किंचित भी भय न लगे। 

पुलिस वालों के प्रति अधिकांश लोग अच्छी राय नहीं रखते। उनकी परछाई से भी दूर रहने में भलाई समझते हैं। यह भी सच है क कुछ खाकी वर्दीधारियों ने पुलिस महकमे की आन-बान और शान को निरंतर बचाये और बनाए रखा है। यह बहुत अच्छी बात है कि अब महिलाएं भी पुलिस विभाग में बड़े दमखम के साथ अपनी चमक बिखेरते हुए, ईमानदारी, दृढ़ता और संवदेनशीलता के साथ अपने कर्तव्य को निभा रही हैं और खाकी वर्दी की गरिमा बढ़ा रही हैं। उन्हीं में से एक नाम है दिल्ली पुलिस की कांस्टेबल सोनिका यादव का, जिन्होंने अपने दृढ़ आत्मबल का सार्थक प्रदर्शन कर उन लोगों को अपना मुंह बंद रखने को विवश कर दिया, जो नारी को अभी भी कमजोर मानते हैं। खेलकूद में हमेशा आगे रहीं सोनिका को उसके माता-पिता ने बचपन में ही हर चुनौती का भयमुक्त होकर सामना करने का पाठ पढ़ा दिया था। बेटी ने भी उन्हें कभी निराश नहीं किया। नारी के प्रति समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों और सदियों से चली आ रही परंपराओं और धारणाओं को तोड़ते हुए नारी के भीतर छिपी ताकत का प्रतिनिधित्व करती सोनिका ने गर्भवती होने के बावजूद वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में भाग लेकर न केवल पदक जीता, बल्कि यह संदेश भी दिया कि गर्भवती महिलाएं सिर्फ विश्राम और देखभाल के लिए नहीं होती हैं। सोनिका जब मां बनने वाली थीं, तभी उनसे कुछ लोगों ने बड़ी गंभीरता और सहानुभूति से कहा कि अब खेल से दूरी बना लो। घर में पूरी तरह से आराम करो, लेकिन सोनिका ने डॉक्टरों की निगरानी में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता के लिए प्रशिक्षण जारी रखा। बहादुर सोनिका ने दूसरे देश की महिलाओं के बारे में खूब पढ़ा, जाना और ठाना था कि वे प्रेग्नेंसी के दौरान भी अपनी विभिन्न गतिविधियों को सतत जारी रखती हैं। यहां तक कि कड़ी से कड़ी कसरत और खेलने-कूदने से भी नहीं घबरातीं। यदि वे ऐसा कर सकती हैं तो वह क्यों नहीं? भारतीय नारियां न तो विदेशी नारियों से कहीं कम हैं और न ही कमजोर। प्रतियोगिता के दिन गर्भवती सोनिका को मंच पर उतरते देख लोग स्तब्ध रह गए थे। कहीं कोई चिंता और भय नहीं। सिर्फ और सिर्फ आत्मविश्वास से उनका चेहरा दमक रहा था। जैसे ही 145 किलोग्राम के वजन को बड़ी आसानी से उठाया तो पूरा हॉल प्रशंसा, शाबाशी और आदर से परिपूर्ण तालियों से गूंज उठा...।

Saturday, November 1, 2025

उत्सव की महक

रोशनी के महाउत्सव दीपावली का हम सभी को हमेशा इंतजार रहता है। वैसे भी हम भारतीय जगजाहिर उत्सव प्रेमी हैं। कोई भी त्योहार ऐसा नहीं है जिससे कोई न कोई उद्देश्य न जुड़ा हो। हमारे बुजुर्गों ने त्योहारों की परिपाटी की नींव यूं ही नहीं रखी। दीपोत्सव उमंग-तरंग, ऊर्जा के साथ-साथ नई सोच की प्रेरक धारा की जगमगाहट का जन्मदाता है। दरअसल स्वयं को जानने-पहचानने और खोजने का नाम ही दीपावली है। अधिकांश लोग इस पुरातन उत्सव को रस्में अदायगी की तरह मनाते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो वास्तव में इस सुअवसर पर प्रकाश, सेवा और सहयोग का दीपक प्रज्वलित कर महाउत्सव को सार्थकता का जामा पहनाते हैं। वर्ष 2025 की दीपावली को ऐसे ही अनूठे भारतीयों ने और...और प्रेरणास्पद और यादगार बना दिया। महाराष्ट्र के अमरावती में इस वर्ष भी ‘वंदे मातरम’ समूह से जुड़े वकीलों, डॉक्टरों, इंजीनियरों तथा विभिन्न कारोबारियों ने मेलघाट के दो गांवों के हर घर में जाकर नये कपड़े, किताबें, साइकल और मिठाइयां वितरित कीं। लगभग 800 लोगों का यह समूह सोलह साल से हर दिवाली पर किसी ने किसी गांव का सर्वे करता है और असहायों तथा जरूरतमंदों के जीवन में मिठास घोलता है। बीमारों की दवाएं देने के साथ-साथ उनका इलाज भी किया जाता है। अब तक इन्होंने 27 लोगों की सर्जरी अपने खर्चे से कराकर उन्हें नयी जिन्दगी दी है। जिन किसानों ने आत्महत्या कर ली है उनके परिवारों के बच्चों की पढ़ाई का खर्च भी इनके द्वारा उठाया जाता है। यह भी गौरतलब है कि ऐसे परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए उद्योग लगाने की तैयारी भी की जा रही है। 

इस बार की दिवाली के मौके पर बेंगलुरू शहर में सैकड़ों परोपकारी लोगों ने ऐसे बीमारों के साथ दिवाली मनाई, जो कैंसर के अंतिम पड़ाव पर हैं। अभावों से जूझते दुखियारों की देखरेख और सेवा के लिए वालेंटियर बन करीब 200 युवाओं ने अनाथ बच्चों के साथ-साथ ट्रांसजेंडर, एसिड अटैक सवाईवर तथा दृष्टिबाधितों के साथ रंगारंग दिवाली मनाते हुए उसे नीरस जीवन में आत्मविश्वास के साथ-साथ अपार खुशियां भर दीं। अनाथ बच्चों ने स्टेज पर अपने भीतर छिपी कलाओं का खुलकर प्रदर्शन कर तालियां पायीं। वृद्धाश्रमों तथा गरीब बच्चों के बीच जाकर दीये जलाने वाले युवाओं की इस पहल का हर किसी ने वंदन...अभिनंदन किया।

मुंबई से लगे वसई में एक शख्स ने अपने जवान बेटे की आसामायिक मौत के बाद जो साहसी फैसला लिया उसकी तारीफ करने के लिए कलमकार के पास शब्द नहीं हैं। अपने माता-पिता की 24 वर्षीय इकलौती संतान सत्यम दिवाली के अवसर पर वापी में हुई भीषण सड़क दुर्घटना में इस कदर बुरी तरह से घायल हुआ कि सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों ने अंतत: उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया। फिर भी सत्यम के माता-पिता की आस की डोर नहीं टूटी। उन्होंने तुरंत अपने लाडले बेटे को निजी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया, लेकिन वहां पर कोई सुधार नहीं हुआ। आखिरकार उन्होंने अपने लाडले को दूसरों में देखने और बनाए रखने के लिए उसके अंगों को दान करने का हिम्मती फैसला लेते हुए उसे साकार भी कर दिया। सत्यम की किडनी, लिवर, टिश्यू और कार्निया के महादान से जिन्दगी और मौत से लड़ रहे कई अनजान लोगों को नया जीवन मिला है। उनके लिए सत्यम के माता-पिता पूज्य देवता से कम नहीं। यहां यह भी काबिलेगौर है कि दिवाली के त्योहार के कारण मुंबई में भीड़ भड़ाका होने की वजह से हर जगह ट्रैफिक जाम था। ऐसे में मुंबई ट्रैफिक पुलिस ने भी अपनी मुस्तैदी, इंसानियत और लाजवाब समन्यवय की आदर्श मिसाल पेश करते हुए घंटों की दूरी मिनटोंं में पूर्ण करते हुए लाइव लिवर को उस अस्पताल तक पहुंचाया जहां जरूरतमंद इंतजार कर रहे थे। इस पूरी फुर्तीली कवायद के दौरान एक पुलिस पायलट वाहन रास्ते को पूरी तरह से साफ रखने के लिए एंबुलेंस के आगे चल रहा था। 

बिहार के शहर गयाजी की स्कूल शिक्षक रीता रानी महज तीन फीट की हैं। रीता का कद भले ही छोटा है, लेकिन सोच बहुत ऊंची है। छात्र-छात्राओं को अपनी शैली में शिक्षित करती रीता छात्रों की अत्यंत प्रिय हैं। लोगों की सेवा में सदैव तत्पर रहने का गुण उन्हें ‘बिहार गौरव अवार्ड’ दिलवा चुका है। पितृपक्ष मेले के दौरान दिव्यांगों तथा वृद्धों के लिए व्हीलचेयर की अपने पैसों से व्यवस्था करने वाली रीता की मुस्कुराहट दिवाली के दीप की तरह हरदम जगमगाती रहती है। तमिलनाडु के मदुरे में रहते हैं, डॉक्टर, स्वामीनाथन चंद्रमौली। उनकी वैन में ऑक्सीजन, अल्ट्रासाउंड, ईसीजी जैसी तमाम सुविधाएं हैं। परोपकारी चंद्रमौली रोज सुबह अपनी वैन में बैठकर बुजुर्ग मरीजों के इलाज के लिए घर से निकल जाते हैं। बिना किसी प्रचार और शोर-शराबे के पच्चीस हजार से ज्यादा मरीजों का इलाज कर चुके ये अनूठे डॉक्टर साहब गरीबों, असहायों तथा जरूरतमंदों से फीस नहीं लेते। महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के चिंचणी गांव में चाहे दिवाली हो या किसी का जन्मदिन और शादी-ब्याह, लेकिन पटाखे बिलकुल नहीं फोड़े जाते। लगभग दस वर्ष पूर्व इस गांव में पटाखों के धमाकों की तीव्र आवाजों से एक कुत्ता इस कदर भयभीत हो गया था कि वह गांव से भागकर जंगल में चला गया और गड्ढा खोदकर वहां हमेशा के लिए सो गया। इस हैरतअंगेज घटना के बाद सजग ग्राम वासियों ने आपस में मिल-बैठकर सोचा-विचारा कि पटाखों की आवाज से गांव के बुजुर्गों तथा रोगियों को बहुत अशांति का सामना करना पड़ता है तथा गाय-भैंस भी भय तथा सदमे का शिकार होे जाती हैं। इस वजह से दूध भी कम देती हैं। ऐसा विस्फोटक जश्न भी किस काम काम का जो किसी के लिए परेशानी का कारण बने। उसके बाद गांव में पटाखे फोड़ने पर जो विराम लगा वो अभी तक कायम है। दिवाली की छुट्टियों में गांव के बच्चे भी पटाखे जलाने की नहीं सोचते। वे खुशी-खुशी मिल-जुलकर किले बनाते हैं और कठपुतली का मनोरंजक खेल खेलते हैं।

छत्तीसगढ़ के अत्यंत मेल-मिलाप वाले सांस्कृतिक शहर बिलासपुर में दिवाली की रात जब 9 साल की काव्या का परिवार पूजा की तैयारी कर रहा था। तभी मासूम काव्या पटाखे जलाने के लिए दौड़ी तो एकाएक वहीं पर रखी घंटी पर मुंह के बल गिर पड़ी। घंटी का ऊपरी नुकीला सिरा जो कि लगभग चार-पांच सेंटीमीटर लंबा था, उसकी आंख से होते हुए दिमाग में धंस गया। डॉक्टरों की सलाह पर काव्या को इलाज के लिए रायपुर ले जाया गया। दिवाली होने के कारण अस्पताल के अधिकांश डॉक्टर छुट्टी पर थे। फिर भी जैसे ही डॉक्टरों को खबर लगी तो वे दौड़े-दौड़े चले आए। लगभग चार घंटों तक डॉक्टरों की सजग कुशल टीम ने सघन सर्जरी कर बच्ची की आंख की रोशनी लौटाने का चमत्कार कर दिखाया और उसके बाद ही अपने-अपने घर जाकर उन्होंने दीप जलाकर खुशी-खुशी दीपावली मनायी।

Thursday, September 25, 2025

Thursday, September 18, 2025

चलती-फिरती किताबें

कुछ लोग ऐसे होते है जिनका जीवन किसी ऐसी किताब से कम नहीं होता जिसे पढ़ने का हर किसी का मन होता है। 

‘‘मेरा जन्म 1991 में आंध्रप्रदेश के सीतारामपुरम गांव में हुआ। माता-पिता को तब आघात लगा, जब उन्हें पता चला कि उनका बच्चा तो अंधा है। रिश्तेदारों, अड़ोसी, पड़ोसियों ने भी उन्हें घोर बदकिस्मत करार दे डाला। सभी ने उन्हें सलाह दी कि ऐसे बच्चे का होना न होना एक बराबर है। वैसे भी लड़के तो मां-बाप की सेवा और उनका नाम रोशन करने के लिए जन्मते हैं। मां-बाप के सपने अपनी अच्छी औलाद की बदौलत ही साकार होते हैं। यह अंधा तो उनके लिए फंदा है। ऐसे फंदों से मुक्ति पाना ही अक्लमंदी है। जैसे दूसरे समझदार मां-बाप करते हैं, तुम भी इसका गला घोंट दो। चुपचाप कहीं दफना दो। यह नहीं कर सकते तो अनाथालय में ले जाकर छोड़ दो। वही इसे खिलाएंगे, पिलायेंगे और जो उनकी मर्जी होगी, करेंगे। अनाथालय की शरण में पल-बढ़कर भीख मांगना तो सीख ही लेगा। तुम लोगों का तो इसे पालते-पालते ही दम निकल जायेगा। घर के बर्तन तक बिक जायेंगे और हाथ में कटोरा पकड़कर भीख मांगने की नौबत आ जाएगी।’’

कई दिन तक तो मां हर किसी के सुझावों को मजबूरन सुनती रहीं। लेकिन जब उनके चुभने वाले बोल वचनों की अति हो गई वह उन पर बिफर पड़ीं। उन्हें आसपास फटकने तक से मना कर दिया। मां के अंतिम फैसले के तौर पर कहे गये इन शब्दों ने तो सभी की जुबानें बंद कर दीं, ‘‘तुम लोग कान खोलकर सुन लो, जब तक मैं जिन्दा हूं, अपने बच्चे पर आंच नहीं आने दूंगी। खुद को बेचकर भी इसकी इतनी अच्छी तरह से परवरिश करूंगी कि दुनिया भी हतप्रभ देखती रह जाएगी। मैं चार साल का हुआ तो मां ने गांव के स्कूल में दाखिला करवा तो दिया, लेकिन घर से अकेले बाहर निकलना मेरे लिए आसान नहीं था। कभी पिता स्कूल छोड़ने जाते तो कभी मां छोड़ आतीं और लेने भी पहुंच जातीं। स्कूल में मेरे साथ पढ़ने वाले बच्चे मुझ से दूरी बनाये रखते। जब मैं तीसरी कक्षा में पहुंचा तो प्रिंसिपल ने मेरे लिए फरमान जारी कर दिया कि हमें ऐसे बच्चे की जरूरत नहीं, जिसके लिए हमें जरूरत से ज्यादा दिमाग खपाना और अपना कीमती समय बरबाद करना पड़े। मां के जुनून ने मुझे हैदराबाद के ब्लाइंड स्कूल में पहुंचा दिया, लेकिन वहां भी मुझे कुछ भी सुझायी नहीं देता था। चौबीस घंटे बस घबराया-घबराया रहता। एक रात मैंने स्कूल से भागने की कोशिश की तो वार्डन की मुझ पर निगाह पड़ गई। उन्होंने मेरे इरादे को भांप लिया था। गुस्से में उन्होंने मुझे अपने पास खींचा और पांच-सात तमाचे जड़ते हुए कहा कि कहां-कहां भागोगे? ऐसे भागने से तुम्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा। अपना नहीं तो उस मां का ख्याल करो, जिसने कई सपने पाल रखे हैं। ईश्वर ने तुम्हें किसी चमत्कार के लिए इस धरती पर भेजा है। डरो नहीं, बस लड़ो...लड़ते ही रहो। वार्डन के चांटों और शब्दों का ही असर था कि उस दिन मुझे लगा कि मैं तो देख सकता हूं। मुझे हर चुनौती का डटकर सामना करते हुए खुशी-खुशी जीना है। मेरे अंदर साहस की रोशनी की तरंगें दौड़ने लगीं। मैं दसवीं तक टॉपर रहा, लेकिन मेरे मनोबल को तोड़ने वाली ताकतें तब भी मेरे पीछे पड़ी रहीं। 

दसवीं के बाद आईआईटी की कोचिंग के लिए एक कोचिंग सेंटर गया तो वहां के संचालक ने तीखे थप्पड़-सा शब्द-बाण मारा कि तुम जैसे पौधे कभी पेड़ नहीं बन सकते, क्योंकि उनमें तेज बारिश और आंधियों को सहने की ताकत नहीं होती। हमेशा-हमेशा के लिए फौरन धराशायी हो जाते हैं और साथियों के तेजी से दौड़ते कदमों से रौंद दिये जाते हैं। साइंस में एडमिशन पाने के लिए अंतत: मुझे कोर्ट की शरण लेनी पड़ी। मां के हाथ और साथ के दम पर वो लड़ाई भी मैंने डट कर लड़ी और जीत हासिल की। आंध्रप्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड में साइंस लेकर 92 प्रतिशत नंबर के साथ पास होने वाला मैं पहला नेत्रहीन छात्र बना। उसके बाद तो बड़ी आसानी से अमेरिका के एमआईटी में प्रवेश मिल गया और यहां भी तब तक किसी दृष्टिहीन छात्र को प्रवेश नहीं मिला था। अमेरिका से पढ़ाई कर लौटा तो तकदीर मेरे स्वागत के लिए सभी दरवाजे खोले खड़ी थी। मैं हौसले से लबालब था। मां खुशी से फूली नहीं समा रही थी। मैंने अपने दम पर हैदराबाद में कंज्यूमर फूड पैकेजिंग कंपनी शुरू की। 

23 की उम्र में बोलैंट कंपनी का सीईओ बना। आज जब छत्तीस साल का होने जा रहा हूं। मेरी कंपनी 600 करोड़ के आंकड़े को छू चुकी है, जहां चार सौ कर्मचारी काम करते हैं, जिनमें 70 प्रतिशत दिव्यांग हैं। जिन्दगी ने मुझे एक ही पाठ पढ़ाया है कि ऊपर वाला भी तभी साथ देता है, जब हम हिम्मत और योजना के साथ चलते रहते हैं। चाहे कितनी भी मुश्किल भरी राहें हों, जुनूनी संघर्ष की बदौलत अंतत: आसान हो ही जाती हैं और मंजिल खुद-ब-खुद गले लगाती है। अब मेरे कदम सतत ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहे हैं। आने वाले वक्त में मेरी तिजोरी में हो सकता है पांच-दस हजार करोड़ रुपये हों, लेकिन वो धन मेरी मां और उनकी कुर्बानी से बढ़कर तो नहीं हो सकता। मेरी सबसे बड़ी दौलत तो मेरी मां हैं, जिन्होंने मुझे यहां तक पहुंचाया है।’’ यह आत्मकथन है श्रीकांत बोला का जो जन्म से दृष्टि बाधित हैं। अपनी हिम्मत के दम पर सफलताओं का परचम लहराते हुए लोगों को अचंभित करते रहे हैं। वर्तमान में देश के प्रतिष्ठित उद्योगपतियों में शुमार श्रीकांत बोला की संघर्ष भरी यात्रा पर एक चर्चित फिल्म भी बन चुकी है। ‘श्रीकांत’ नाम की 2024 में रिलीज हुई इस फिल्म ने करोड़ों दर्शकों को प्रभावित किया है। 

एक सवाल कि एक रुपये में क्या होता है, क्या मिलता है? हलकी सी चाकलेट और संतरे के स्वाद वाली गोली जरूर मिल जाती है, जिसे आज के बच्चे भी पसंद नहीं करते। भिखारी भी एक रुपये के सिक्के को लेने से कतराते हैं। कागज़ के नोट तो वैसे भी आजकल कम नज़र आते हैं, जो हैं भी, वो शादी, ब्याह या किसी अन्य शुभ कार्य में दस को ग्यारह, सौ को एक सौ एक और पांच सौ को पांच सौ एक के शुभ आंकड़े बनाने... दर्शाने के काम आते हैं। महंगाई भी कितनी बढ़ा दी गई है। कुछ भी सस्ता नहीं मिलता। अनाज, दूध, सब्जियां, दवाएं सब महंगी होती चली जा रही हैं। पीने के पानी तक की कीमत चुकानी पड़ रही है। गरीब आदमी यदि किसी गंभीर बीमारी का शिकार हो जाए तो उसका बचना मुश्किल है। डॉक्टरी के पेशे की इंसानियत भी जाती रही है, लेकिन फिर भी सच्चे इंसानों के अंदर का इंसान जिन्दा है इसे साबित कर दिखाया है ओडिशा के संबलपुर जिले के युवा डॉक्टर शंकर रामचंदानी ने। उन्होंने गरीबों और वंचितों के इलाज के लिए ‘एक रुपया’ क्लिनिक खोला है। किराये के मकान में खोले गये इस अस्पताल में मरीजों की भीड़ लगी रहती है। गरीबों से एक रुपया फीस भी इसलिए लेते हैं, ताकि उन्हें यह न लगे कि वे मुफ्त में इलाज करा रहे हैं। वे लंबे समय से चाह रहे थे कि ऐसे चिकित्सालय की स्थापना करें, जहां गरीब और बेसहारा लोग आसानी से पहुंचकर मुफ्त में इलाज करवा सकें। उनका मानना है बड़े-बड़े अस्पतालों में बड़े निवेश की आवश्यकता होती है, इसलिए वहां पर इलाज भी महंगा हो जाता है। इसलिए उन्होंने आलीशान अस्पताल खोलने की बजाय साधारण अस्पताल खोला है, जहां पर उनकी कोशिश है कि जिनकी जेबें खाली हैं वे भी गर्व के साथ बीमारी से छुटकारा पा सकें। चालीस वर्षीय डॉक्टर की पत्नी भी डॉक्टर हैं। दोनों विभिन्न अस्पतालों में कई वर्षों तक कार्यरत रहे हैं। दोनों अधिकांश डॉक्टरों की धनलोलुपता से वाकिफ है।

महाराष्ट्र के प्रगतिशील नगर पुणे में एक डॉक्टर हैं जिन्होंने बेटियों के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। गणेश राख है इनका नाम। तेरह साल में 2500 बेटियों की नि:शुल्क डिलीवरी कराने का कीर्तिमान रच चुके डॉ.गणेश बताते हैं कि 29 दिसंबर 2011 को उनके अस्पताल में एक गरीब दिहाड़ी श्रमिक अपनी पत्नी की डिलीवरी के लिये आया था। उसने बड़े दुखी और बुझे स्वर में बताया था कि उसे पहले दो बेटियां हैं, दोनों ही सीजेरियन से हुई हैं लेकिन अब वह खर्च वहन नहीं कर सकेगा। लेकिन अगर लड़का हुआ तो वह अपना घर गिरवी रखकर भी अस्पताल का खुशी-खुशी बिल चुकाएगा। मुझे यह बात बहुत खटक गई। मैंने उससे कहा कि यदि तुम्हारे यहां बेटी पैदा हुई तो मैं फीस नहीं लूंगा। संयोग से इस बार भी उसके यहां बेटी जन्मी तो वह बहुत निराश हो गया। फिर भी उसने पूछा कि आपकी फीस कितनी हुई? जब मैंने कहा शून्य तो उसकी आंखें भीग गईं। उसके चेहरे पर उभरे राहत के भाव को देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा। उसी पल से मैंने ठान लिया कि मेरे अस्पताल में जब भी लड़की पैदा होगी तो परिजनों से कोई फीस नहीं ली जाएगी। यह भी निर्णय किया गया कि जैसे लड़के के जन्मने पर उनके परिजन जश्न मनाते हैं, स्वागत करते हैं, वैसे ही हम लड़की के आगमन पर केक और मिठाइयां बांटकर जश्न मनाएंगे। डॉ.गणेश राख की इस पहल की सभी तारीफ कर रहे हैं। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने भी जमकर उनकी सराहना की है। डॉक्टर साहब का सपना है, शीघ्र ही सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल खोलें जहां पर महिलाओं की सभी प्रकार की बीमारियों का इलाज एकदम मुफ्त में कर सकें।

Thursday, September 11, 2025

रेत की सत्ता

राजनेताओं और नौकरशाहों के बीच मनमुटाव और टकराव कोई नई बात नहीं है। दोनों अपने-अपने अहंकार और जिद के गुलाम हैं। उन्हें करनी तो जनसेवा चाहिए, लेकिन वे जनता को जीरो और खुद को हीरो समझते हैं। किसी को कुछ भी न समझने की तांडवी मनोवृत्ति के शिकार कुछ मंत्री, विधायक तो अक्सर अपने कपड़े उतारकर बेशर्मी की सुर्खियां बटोरते दिख जाते हैं। मध्यप्रदेश के भिंड जिले में विधायक नरेंद्र सिंह कुशवाह और कलेक्टर संजीव श्रीवास्तव कुत्ते बिल्ली की तरह आपस में भिड़ गए। कलेक्टर ने विधायक की ओर उंगली उठाई तो विधायक ने उनके मुंह की रंगत बिगाड़ने के इरादे से मुक्का तान लिया। विधायक और कलेक्टर को तीखे आवेश में तू...तू, मैं...मैं करते देख वहां पर उपस्थित लोग आनंदित होते रहे और लड़ाई के और उग्र रूप धारण करने की बेसब्री से राह देखते रहे। गुस्सैल विधायक कुशवाह वर्ष 2012 में तत्कालीन एसपी जयनंदन को थप्पड़ जड़ने के आरोप के भी दागी हैं। उन्हें खामोश रहकर आज्ञा पालन करने वाले अधिकारी सुहाते हैं। जो प्रशासनिक अधिकारी सिर उठा कर बात करता है उसका तो बैंड बजाने में कोई कसर नहीं छोड़ते, लेकिन इस बार  अपनी टक्कर के नौकरशाह से उनका पाला पड़ गया। कलेक्टर श्रीवास्तव को विधायक का तल्ख लहजे में बात करना बर्दाश्त नहीं हुआ तो उन्होंने उनकी विधायकी का लिहाज न करते हुए भड़कते हुए आक्रामक शब्दों की गोली दागी, ‘‘औकात में रहकर बात करो।’’ ऐसे में विधायक को तैश में आना ही था, उन्होंने चीखते हुए कहा, ‘‘औकात किसे बता रहे हो, तू हमें नहीं जानता?’’, ‘‘अच्छी तरह से जानता हूं। बहुत हो चुका। अब मैं तेरी रेत चोरी बिलकुल नहीं चलने दूंगा।’’ विधायक का प्रतिउत्तर आया, ‘‘सबसे बड़ा चोर तो तू हैं...’’ 

किसानों की खेती-बाड़ी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण जरूरत खाद से शुरू हुई जंग उस रेत तक आ पहुंची जिसकी वजह से बार-बार देश के लगभग सभी प्रदेशों में धमाके होते रहते हैं। कोई भी प्रदेश हो, रेत की लूट हर कहीं छायी रहती है। यही रेत ही है जो कई मंत्रियों, विधायकों तथा उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं की अंधाधुंध काली कमायी का आसान जरिया है, तो वहीं तहसीलदार, कलेक्टर और उनके अधीनस्थ कर्मचारियों की जेब भरायी का सहज सुलभ साधन है। यह लिखना सरासर गलत होगा कि अपने देश में सिर्फ भ्रष्टों का ही जमावड़ा है। बेइमानों की अपार भीड़ में कुछ ईमानदार भी हैं, जिनकी चोर-लुटेरों से अक्सर मुठभेड़ होती रहती है। एक पुख्ता निष्कर्ष यह भी है कि, अधिकांश सत्ताधीशों को ईमानदार अधिकारी शूल की तरह चुभते हैं। उत्तरप्रदेश में एक आईएएस अधिकारी रही हैं दुर्गा नागपाल। इस कर्तव्य परायण अधिकारी ने कई बार भूमाफियाओं, खनिज माफियाओं और स्मगलरों को दबोच कर उन्हें जेल पहुंचाया। इसी पकड़ा-धकड़ी में प्रदेश के एक बलवान मंत्री के करीबी रिश्तेदार और कार्यकर्ता भी नहीं बच पाए। ऐसे में एक दिन मंत्री ने अधिकारी दुर्गा नागपाल को तुरंत अपनी कोठी में हाजिर होने का फरमान सुनाया। दुर्गा को लगा था कि तारीफ करते हुए उनकी पीठ थपथपायी जाएगी, लेकिन बौखलाये मंत्री उन्हें देखते ही धमकाते हुए गरजे कि तुम्हारी यह हिम्मत कि तुम हमारे लोगों को रेत चोरी करने से रोको। तुम्हारी इस हिटलरशाही से तो हमारा चुनाव जीतना भी मुश्किल हो जाएगा। अपने इन्हीं खास कार्यकर्ताओं तथा शुभचिंतकों की भाग-दौड़ की बदौलत ही तो हम हर चुनाव में विजय की पताका लहराते चले आ रहे हैं। उसूलों की पक्की दुर्गा नागपाल ने जब मंत्री के आदेश को मानने से इंकार कर दिया तो उन्हें तुरंत निलंबित कर दिया गया। 

इसी तरह से हरियाणा में अनिल विज नाम के भाजपा के पुराने नेता हैं। मंत्री बने बिना उन्हें चैन नहीं आता। मुख्यमंत्री बनने के लिए हाथ-पैर पटकते रहते हैं, लेकिन अभी तक दाल नहीं गली। उन्हें भी अपने प्रदेश की आईपीएस अफसर संगीता वालिया का कर्तव्यपरायण होना कभी रास नहीं आया। अनिल विज तब स्वास्थ्य मंत्री थे। उन्होंने जिला शिकायत एवं लोक मामलों की समिति की बैठक बुलायी थी। उसी दौरान इस मंत्री ने एक एनजीओ की शिकायत का हवाला देते हुए एसपी संगीता पर शराब बिकवाने का संगीन आरोप जड़ दिया। ईमानदार अधिकारी संगीता के लिए यह आरोप किसी तमाचे से कम नहीं था। मंत्री जब सारी हदें पार करते हुए संगीता को अपमानित करने पर तुल गए और वर्दी उतरवाने की धौंस देने लगे तो स्वाभिमानी संगीता बगावत की मुद्रा अख्तियार करते हुए उन्हें खरी-खोटी सुनाने लगीं। उन्होंने एक-एक सवाल का जवाब देकर सबके सामने मंत्री की बोलती बंद कर दी। मंत्री हैरान-परेशान संगीता का मुंह ताकते रह गए। अभी तक उनका ऐसे अफसरों से ही वास्ता पड़ा था, जो उनकी डांट-फटकार चुपचाप सुन अपराधी की तरह अपना सिर झुका लेते थे। स्वच्छ छवि की परिश्रमी इस खाकी वर्दी धारी नारी को जब गेट आउट कहा गया तो उसने ललकारने वाले तेवरों के साथ कहा, ‘‘श्रीमानजी इस वर्ष ढाई हजार से अधिक अवैध शराब विक्रेताओं को हमने पकड़ा था। दुख इस बात का है कि हम मेहनत करते हैं, लेकिन अधिकारियों को आसानी से कोर्ट से जमानत मिल जाती है। जब देखो तब आप लोगों का भी फोन आ जाता है कि जिन्हें पकड़ा गया है, वे हमारे आदमी हैं, उन्हें तुरंत छोड़ दो। पिछले महीने भाग-दौड़ी कर मैंने कुछ रेत माफियाओं पर हाथ डाला था। उन्हें किसी भी हालत में जेल भिजवाने की ठान चुकी थी, लेकिन आपका फोन आ गया कि, यह तो मेरे समर्पित कार्यकर्ता हैं, इन्हें कुछ भी नहीं होना चाहिए। ऐसे में बहुत से अधिकारियों को समझ  में ही नहीं आता कि कानून का पालन करें या गुलामों की तरह आपके आज्ञाकारी बने रहें, लेकिन मैं औरों की तरह नहीं जो अपने मूल फर्ज़ से नाता तोड़ आपकी जी हजूरी करती रहूं। मैं आपको बताये देती हूं कि आपका बर्ताव अशोभनीय होने के साथ-साथ  पद के प्रतिकूल भी है और बेहद शर्मनाक भी।’’ हरियाणा के सनकी मंत्री अनिल विज की तरह महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार भी तू...तड़ाक और गुस्सा दिखाने के मामले में आम लोगों में कुख्यात तो अपने प्रशंसकों और चम्मचों के आदर के पात्र हैं। सोच समझकर बोलने से परहेज रखने वाले अजित पवार और प्रदेश की आईपीएस अधिकारी अंजना कृष्णा के बीच की बातचीत के वीडियो ने एक बार फिर से अजित पवार को चर्चित कर दिया। महाराष्ट्र के सोलापुर जिले में अंधाधुंध रेत खुदाई की पुख्ता जानकारी मिलने के पश्चात अंजना कृष्णा ने दल-बल के साथ वहां पहुंचने में देरी नहीं लगायी, जहां रेत की डकैती को बेखौफ अंजाम दिया जा रहा था। नदी में रेत यानी मरूम की खुदाई करने में लगे रेत माफियाओं को उन्होंने काम रोकने को कहा तो वे अपनी ऊंची पहुंच की आवाज बुलंद करते हुए उन्हें ही धमकाने लगे। कर्तव्य परायण महिला पुलिस अधिकारी ने जब कानून का डंडा चलाते हुए कड़ी कार्रवाई करने की घोषणा कीे तो किसी ने अपने आका से बात करते-करते अपना मोबाइल महिला अधिकारी के हाथ में थमा दिया। उधर से कहा गया, ‘‘मैं डिप्टी चीफ मिनिस्टर बोल रहा हूं, तुरंत एक्शन रोको।’’ अधिकारी उपमुख्यमंत्री की आवाज को नहीं पहचानती थीं, इसलिए उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया। यह भी हो सकता है उनके मन में विचार आया हो कि रेती की अवैध खुदाई करने वाले शातिर ने उन पर दबाव बनाने के लिए किसी ऐरे-गैरे को फोन लगाकर उन्हें पकड़ाया हो, लेकिन दूसरी तरफ मंत्री महोदय का तो तन-बदन सुलग उठा। एक महिला अधिकारी की इतनी हिम्मत! मंत्री ने फौरन महिला पुलिस अधिकारी से वीडियो कॉल पर बातचीत करते हुए पूछा, ‘‘क्या वे अब उनका चेहरा पहचान रही हैैं?’’ जवाब में वे बोलीं, ‘‘उन्होंने तुरंत समझा नहीं कि वह उपमुख्यमंत्री से बात कर रही हैैं...।’’ यह पूरा माजरा यह तो स्पष्ट कर ही रहा है कि इस देश के नेता अपने चहेते कार्यकर्ताओं के कमाने-धमाने की कितनी चिंता और ध्यान रखते हैं।

Thursday, September 4, 2025

पतन दर पतन

राजनीति के मैदान में चुनावी योद्धा एक दूसरे को नीचा दिखाते-दिखाते नीचता की हर हद को लांघ रहे हैं। देश में जब भी कहीं चुनाव होने होते हैं, तो विपक्षी दल और नेता सत्तासीन होने के सपने देखने लगते हैं। सपने देखना गलत नहीं। वर्षों से यही होता आया है। चुनाव प्रचार के दौरान पक्ष और विपक्ष के नेताओं से शालीनता और मर्यादा के पालन की उम्मीद की जाती है, लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं रही। तब विरोध में भी शिष्टाचार समाहित रहता था। उम्र और पद की गरिमा का पूरा-पूरा ध्यान रखते हुए अपनी जुबान पर नियंत्रण रखा जाता था, लेकिन अब कई नेता घटिया से घटिया भाषा का इस्तेमाल कर अपने घोर पतित और चरित्रहीन होने के भी सबूत पेश कर रहे हैं। उनकी यह गिरावट उनकी पार्टी को भी कठघरे में खड़ा कर रही है। सत्ता की चाहत के लिए ऐसे पतन की यकीनन कल्पना नहीं की गई थी। सत्ताधीशों की कार्यप्रणाली से नाखुश होने पर उनके खिलाफ जनजागरण करने की बजाय गालीगलौच करने की प्रवृत्ति अक्षम्य होने के साथ-साथ खुद के लिए मौत का कुआं खोदने वाली बेवकूफी है।

जब से नरेंद्र मोदी भारत वर्ष के प्रधानमंत्री बने हैं, तब से कुछ नेता, पत्रकार, संपादक, उम्रदराज वकील तथा खास किस्म के बुद्धिजीवी पानी से बाहर फेंक दी गई मछली की तरह छटपटा और फड़फड़ा रहे हैं। मोदी की हर अच्छी बात में खोट निकालने की जिद में जोकर बने नज़र आ रहे हैं। साफ-साफ दिखाई दे रहा है कि नरेंद्र मोदी पर वोटों की हेराफेरी कर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने के आरोप वो ‘मंडली’ लगा रही है, जो वर्षों से येन-केन प्रकारेण सत्ता हथियाने के लिए बौखलायी और पगलायी है। यह मंडली जब कहीं से चुनाव जीतती है तो जोर-शोर से अपनी पीठ थपथपाती है, लेकिन शर्मनाक पराजय होने पर ईवीएम यानी इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में हुई वोटों की हेराफेरी के राग अलापने लगती है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को पीएम बनने की बहुत जल्दी है। जिस तरह से राहुल धैर्य खोकर आक्रामक हो गये हैं, उससे भाजपा ही नहीं सजग देशवासी भी हैरान हैं। राजनीति में एक दूसरे पर बयानों की तोप चलाना, खामियां गिनाना भी कोई नई बात नहीं। ये तो सतर्कता की पहचान है, लेकिन ओछेपन पर उतर आना तो अज्ञानी और नालायक होने की निशानी है। कुछ वर्ष पहले तक भाजपा के कुछ नेताओं ने राहुल गांधी का खूब मजाक उड़ाया। उन्हें शहजादे कहकर प्रधानमंत्री ने भी उन पर तंज कसे। उन्हें नासमझ ‘पप्पू’ साबित करने का भरपूर अभियान भी भाजपा वालों ने चलाया। अब राहुल खुद को परिपक्व दिखाने के चक्कर में बार-बार आपा खोते नज़र आते है। उनके कार्यकर्ता और नेता भी अपने नायक का अनुसरण कर रहे हैं। उनकी वोट अधिकार यात्रा के दौरान दरभंगा के मंच से एक कांग्रेसी ने विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के प्रधानमंत्री को मां की गाली देकर अपने मुंह पर कालिख पोत ली। राहुल गांधी को लोकसभा चुनावों में आंशिक सफलता क्या मिली कि उनके तेवर ही बदल गये। उनकी देखा-देखी कांग्रेस के अदने से कार्यकर्ता और नेता भी तू-तड़ाक करते हुए बेहूदगी और निर्लज्जता के काले परचम लहराने लगे। दरभंगा में जिस मंच पर माननीय प्रधानमंत्री और उनकी आदरणीय माताजी के लिए अपमानजनक शब्द उगले गये, वहां हालांकि स्वयं राहुल गांधी मौजूद नहीं थे, लेकिन उनका अनुसरण कर जहर उगलने वालों का हौसला बुलंद था। लगता है अब राहुल गांधी एंड कंपनी के पास और कोई रास्ता नहीं बचा है। पिछले एक दशक से कांग्रेस को  देश और प्रदेशों में लगातार चुनावी हार झेलनी पड़ रही है। आज केवल हिमाचल, तेलंगाना और कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है। साउथ और नॉर्थ मेें भी कांग्रेस अकेले दम पर सरकार बनाने की हैसियत में नहीं है। जाहिर है कि ऐसे में निराशा और हताशा स्वाभाविक है, लेकिन एटम बम और हाइड्रोजन बम फोड़ने की धमकी देने के क्या मायने हैं? आपको सच्चाई बताने से कौन रोक रहा है, लेकिन बम और बारूद की भाषा तो मत बोलिए। लगता है कि जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए कांग्रेस के नायक को खलनायक बनने में संकोच नहीं हो रहा है तथा उनकी पार्टी के छोटे-मोटे नेताओं को अपमानजनक और आक्रामक भाषा के जरिए विषैले तीर चलाने की आदत पड़ती जा रही है। कांग्रेस के अधिकांश प्रवक्ता भी हर उस शख्स को अपना शत्रु मानने लगे हैं, जो भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी के प्रति श्रद्धा तथा सॉफ्ट कार्नर रखता है। यह लाइलाज बीमारी तो कुछ चुनिंदा पत्रकारों को भी अपनी गिरफ्त में ले चुकी है। उन्होंने भाजपा और मोदी की बुराई करने की शपथ ले रखी है। ऐसा तो नहीं है कि मोदी सरकार ने जनहित के कोई कार्य ही न किए हों, लेकिन इन्होंने तो अपनी आंख पर पट्टी और मुंह पर ताले लगा रखे हैं। इन्होंने कसम खा रखी है कि ये ताले तभी खुलेंगे, जब कांग्रेस सत्ता पायेगी और राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे। 

हाल ही में इंडिया टुडे ग्रुप की ओर से मूड ऑफ नेशन सर्वे कराया गया है। इस सर्वे का मकसद यह जानना है अगर आज लोकसभा चुनाव हो जाएं तो क्या नतीजे बदलेंगे या वही रहेंगे। यह सर्वे कहता है कि अभी चुनाव होने पर सरकार तो एनडीए की ही बनेगी! सीटों की संख्या में भी मामूली बदलाव हो सकते हैं। 2024 में 293 सीटें जीतने वाली एनडीए 324 सीटें जीत सकती है, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन की सीटें 234 से घटकर 208 में सिमट जाने का अनुमान है। यानी विपक्ष अभी इस लायक नहीं कि अपनी छाती तान सके। आम जनता की सोच एक पक्षीय सोच वाले मीडिया जैसी नहीं है। वह यह भी जानती है कि नरेंद्र मोदी का विकल्प देश में अभी तो दूर-दूर तक दिखायी नहीं दे रहा है। अब बात करते हैं नरेंद्र मोदी के अपनी उम्र के 75 साल पूर्ण करने के पश्चात रिटायर होने की। वैसे तो अनुमान तो संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के रिटायर होने के भी लगाये जा रहे थे। 11 सितंबर को 75 साल के होने जा रहे मोहन भागवत ने स्पष्ट कर दिया है कि, उनका रिटायर होने का कोई इरादा नहीं। एक कार्यक्रम के मंच पर उन्होंने स्पष्ट किया कि, मैंने यह नहीं कहा था कि मैं रिटायर हो जाऊंगा या किसी और को 75 साल के होने पर रिटायर हो जाना चाहिए। मैं 80 की उम्र तक शाखा लगाऊंगा। तय है कि विरोधी कितना भी सिर पटक लें, आरोपों के हाइड्रोजन बम फेंक लें, लेकिन 17 सितंबर को 75 साल के होने जा रहे नरेंद्र मोदी भी गद्दी नहीं छोड़ने वाले। उनमें कम अज़ कम 85 साल की उम्र तक देश की सेवा करने का पूरा दमखम है। विरोधी उनके रिटायर होने के दिन-रात सपने देखने और धड़ाधड़ गालियां देने के लिए स्वतंत्र हैं।

Monday, September 1, 2025

कितनी लाचार और नादान हैं बेचारी!

कोई दिन ऐसा नहीं जिस दिन ऐसी खबर नहीं। गंगा जमुना रेड एरिया में पुलिस का छापा। आठ लड़कियों को मुक्त कराया। इनमें पांच हैं नाबालिग। देह मंडी से पुलिस चौकी लगी हुई है। खाकी वर्दी वालों ने जानकारी होने के बावजूद आंखें मूंदे रखीं। बस जेब भरते रहे। संतरा नगरी में एक कुख्यात गैंगस्टर की छत्रछाया में चल रहे कॉपर सैलून में पुलिसिया छापे के दौरान सैक्स रैकेट का भंडाफोड़। पांच पीड़िताओंको पुलिस ने अपने कब्जे में लिया। इनमें दो छात्राओं का भी समावेश है। पिस्तौल की नोंक पर गैंगस्टर ने पहले इनसे बलात्कार किया, फिर देह के धंधे में झोंक दिया।

क्राइम ब्रांच के सामाजिक सुरक्षा दस्ते ने हुडकेश्वर इलाके में चल रहे देह व्यापार के अड्डे से छत्तीसगढ़ की रहने वाली एक महिला को मुक्त कराया। सुनीता और उसका बेटा यश इस अड्डे के संचालक हैं। दोनों ही लड़कियों को अच्छी कमायी का लालच देकर फांसते थे और बेखौफ होकर जिस्म फरोशी करवाते थे। छत्तीसगढ़ से रोजी-रोटी की तलाश में आई महिला को भी मां-बेटे ने मिलकर अपने जाल में फंसाया था। इसी तरह से रईसों के इलाके वाठोड़ा में स्थित एक होटल में गुप्त कमरे में चल रहे देह व्यापार में लिप्त दो पीड़ित महिलाओं को छुड़ाया गया। यह दोनों महिलाएं पहले भी कई बार ग्राहकों के जिस्म की भूख मिटाती पकड़ी जा चुकी हैं। शहर में बीयर बार की आड़ में चोरी-छिपे डांस बार की खबर लगने पर पुलिस ने जब छापा मारा तो पुलिस ने देखा कि तीन युवतियां आधे-अधूरे वस्त्रों में अश्लील नृत्य कर रही थीं। रात के डेढ़ बजे लगभग पचास से ज्यादा शौकीन बेशर्मी से सराबोर डांस का शराब पीते हुए मज़ा ले रहे थे। उनके द्वारा नशे में झूमती बालाओं पर धड़ाधड़ नोट भी बरसाये जा रहे थे। ‘शिव शक्ति’ नामक इस बार में अलग से एक कमरा भी था, जहां पर खासमखास ग्राहक मदहोशी की हालत में लोटपोट हो रहे थे। कुछ तो अपनी पसंद की युवतियों को अपनी गोद में बिठा  कर अश्लील हरकतें कर रहे थे। 

मायानगरी मुंबई की तर्ज पर नागपुर में भी ऐसे कई बार हैं, जहां पर आर्केस्ट्रा का लाइसेंस लेकर नये किस्म की वेश्यावृत्ति करवायी जाती है। नियमित आने वाले रईसों, अपराधियों को विशेष छूट देने का भी प्रावधान है। बार गर्ल पर नोटों की बरसात करने की जिसकी जितनी क्षमता होती है, उसकी उसी के अनुसार पूछ परख और इज्ज़त होती हैं। शहर में कुछ करोड़पति मतवाले ऐसे भी हैं जिनका इन महफिलों में पहुंचना रोज का काम है। उन्हें करारे नोट उड़ाने के अलावा बार गर्ल को नोटों के हार पहनाने में अलौकिक आनंद आता है। मुंबई की तर्ज पर नागपुर में भी ऐसे उद्योगपतियों, नेताओं और माफियाओं की भरमार है जिनके अधिकांश खाकी वर्दीधारियों से मधुर संबंध हैं और इन्हीं की बिरादरी के अधिकांश लोग ऐसे अय्याशी के अड्डों की जान, शान हैं। पुलिस कभी-कभार छापा मारने का नाटक कर अपने होने के निशानी छोड़ती रहती है। फिर गहरी नींद में लीन हो जाती है। जागरूक जनता लाख जगाने की कसरत करती रहे, लेकिन उसकी हर मेहनत धरी की धरी रह जाती है। एक सच जिस पर बहुत कम गौर किया जाता है, वो ये भी है कि ब्यूटी पार्लरों, मसाज के विभिन्न चमकते-दमकते ठिकानों, यूनी सेक्स सैलूनों, फार्म हाऊसों में अपना जिस्म बेचती जिन लड़कियों, औरतों की पकड़ा-धकड़ी की नौटंकी की जाती है उन्हें बड़े सम्मान और सहानुभूति के साथ पीड़िता दर्शाया जाता है। जबकि इनमें से अधिकांश बार-बार पकड़ में आती रहती हैं। फिर भी बेचारी, भोली-भाली और नादान पंछी घोषित कर आजाद उड़ने के लिए छोड़ दी जाती हैं। सच तो यह है कि हमारे यहां अपराध कर्म में पुुरुषों से प्रतिस्पर्धा करती महिलाओं को कुछ ज्यादा ही छूट दी जा रही है। कल तक स्त्रियां दहशत में थीं, आज पुरुष डरे-सहमे हैं। कभी किसी पति का शव नीले ड्रम में मिलता है तो कभी किसी अंधी गहरी खाई में उसका शव पाया जाता है। हर नारी अपना जीवनसाथी चुनने के लिए स्वतंत्र है। माता-पिता के चयन पर आपत्ति दर्शाने का हर युवती को पूरा-पूरा हक है। लेकिन गलत फैसले और नकाबपोशी उन्हें कलंकित करते हुए कठघरे में खड़ा कर देती है। अभी हाल ही में रेलगाड़ी से इंदौर से कटनी के लिए निकली एक 29 वर्षीय युवती अपनी मर्जी से बड़े शातिर अंदाज से अपने मित्र के साथ गायब हो गई। इस गुमशुदा युवती को खोजने के लिए पचासों पुलिस वाले जमीन-आसमान एक करते रहे लेकिन वह हाथ नहीं लगी। उसके गुम होने को लेकर कई तरह की शंकाएं जन्मती रहीं। कहीं चलती टे्रन से गिर तो नहीं पड़ी। किसी बदमाश ने अपहरण तो नहीं कर लिया। लोग युवती के प्रति सहानुभूति तो पुलिस को कोसते हुए उसे नालायक ठहराते रहे। पुलिस को गुमराह करने के लिए शातिर लड़की ने जंगल में अपना मोबाइल फेंक दिया था। अपना सामान तक ट्रेन में लावारिस छोड़ चलती बनी थी। यह युवती वकील है। जज बनने का सपना देख रही थी। घरवाले उसकी शादी के लिए योग्य साथी तलाश कर रहे थे लेकिन वह तो अपने यार के साथ जिन्दगी गुजारने की ठाने थी, इसलिए उसके साथ बीच रास्ते में उतरी और अपहरण का नाटक रचते हुए जा पहुंची नेपाल। पुलिस उसे तलाशने के लिए जहां-तहां नाचती रही। यह तो अच्छा हुआ कि गुमराह करने में माहिर शातिर वकीलन को तेरह दिन बाद काठमांडु से बरामद कर लिया। यदि नहीं मिलती तो हंगामा मचा रहता कि इस देश में औरतें बिल्कुल सुरक्षित नहीं हैं। चलती रेल गाड़ियों से उन्हें गायब करवा दिया जाता है। इसे आप नारी के आधुनिक और प्रगतिशील होने का प्रमाण कहेंगे या कुछ और? मैंने तो जब यह खबर पढ़ी तो सन्न रह गया। रामपुर जिले के एक गांव की महिला, जो शादीशुदा होने के बावजूद दस बार अपने पुराने आशिक के साथ भाग चुकी है। अपनी इस भगौड़ी पत्नी से परेशान पति ने अंतत: पंचायत की शरण ली। महिला  ने पंचों के सामने स्पष्ट कहा कि मैं पंद्रह दिन अपने प्रेमी के साथ तो पंद्रह दिन पति के साथ रहूंगी। यदि पति को मंजूर है तो ठीक नहीं तो मेरे लिए तो प्रेमी के घर के दरवाजे खुले हैं। जहां मैं मौज मजे के साथ रहने में देरी नहीं लगाऊंगी।