Wednesday, January 25, 2023

भोग और योग की तस्वीर

    चित्र - 1 : सुकेश चंद्रशेखर। जैकलीन फर्नाडींस। पहला इस धरती का अत्यंत शातिर कुख्यात ठग और लुटेरा। दूसरी भारत देश की चर्चित खूबसूरत फिल्म अभिनेत्री। दोनों में दूर-दूर तक कोई रिश्तेदारी नहीं। एक हकीकत यह भी कि करोड़ों रुपये की ठगी करने वाला चोर-लुटेरा सुकेश जेल में है। अभिनेत्री आजाद पंछी की तरह उड़ती रही है। ऐसे में दोनों में किसी किस्म की करीबी...यारी की कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन फिर भी दोनों में खिंचाव, जुड़ाव और लगाव हो गया। इन दो विपरीत ध्रुवों के मिलन का माध्यम बना वो अपार धन, रुपया, पैसा जो हमेशा अपना चमत्कार दिखाता आया है...। अनहोनी को होनी बनाता आया है। दोनों में एक और समानता है। दोनों को ऐशो-आराम की लत है। इस लत के लिए किसी भी हद तक गिरने में कोई संकोच नहीं। हर अय्याश ठगी और लूटमारी के धन को शाही अंदाज से लुटाता है। सुकेश ने भी यही किया। नेताओं की झोली भरने के साथ-साथ हुस्नपरियों को भी खुश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 200 करोड़ की ठगी के मामले में जेल में कैद इस ठगराज ने जैकलीन को जो उपहार दिए उनमें शामिल हैं पांच महंगी घड़ियां, जिनकी कीमत लगभग एक करोड़ रुपये है। इसके साथ ही उसने जैकलीन को 32 डिजाइनर बैग गिफ्ट किए, जिनकी कीमत 50 हजार से लेकर 9 लाख तक की है। तकरीबन बीस ज्वेलरी आइटम, जिनमें अंगूठी से लेकर चार महंगे सनग्लासेज, तीन मसाज चेयर, डिश वॉशर, कई बेल्ट, डिनर सेट एवं पेंटिंग्स उपहार में दीं, जिनकी कीमत भी करोड़ों में है। खूबसूरती के पीछे पगलाये शातिर अपराधी ने एक ही साल में 47 डिजाइनर कपड़े, 62 जूते और सैंडल्स भी गिफ्ट किए। चार्जशीट के मुताबिक जैकलीन और उसके परिवार को 7 करोड़ 62 लाख 78 हजार के उपहार दिये गए। 

    ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि जब ठग जेल में बंद था तो यह चमत्कार कैसे संभव हो पाया? दावा तो यह भी किया जाता है कि जैकलीन फर्नांडीस के अलावा दो और अभिनेत्रियां भी महाठग के उपहारों के मोहपाश में बंध कर पतन के गर्त में समाती रहीं। तिहाड़ जेल जहां हर तरह की चौकसी और सुरक्षा व्यवस्था का दावा किया जाता है, वहां पर सुकेश से मिलने-जुलने के लिए धन की भूखी अभिनेत्रियां टहलते और मटकते हुए बड़ी आसानी से पहुंच जाया करती थीं। सुकेश ने जेल के उच्च अधिकारियों को मोटी रिश्वत देकर खरीद रखा था। जब भी कोई हीरोइन उससे मिलने के लिए आती, तो उसे एक खास कमरे में बड़े आदर-सत्कार के साथ ले जाकर बैठा दिया जाता था। वहां पर सोफासेट, टीवी, एसी, फ्रिज और भोग विलास के अन्य सभी सामान सजे रहते थे। आलीशान कमरे के एकांत में घण्टों सुकेश और नायिकाओं की मिलन-मस्ती चलती रहती थी। जब वे सुकेश को ‘तृप्त’ कर जेल से जाती थीं, तो कभी खाली हाथ नहीं होती थीं। हर आनंददायक मुलाकात के ऐवज में उन्हें लाखों रुपये दिए जाते थे। फिल्मी परी जैकलीन के अनुसार सुकेश चंद्रशेखर से उसकी पहली पहचान उसके मेकअप आर्टिस्ट के जरिए हुई थी। उसे बताया गया था कि वह दक्षिण भारत के एक बड़े न्यूज चैनल का सर्वेसर्वा होने के साथ-साथ फिल्म इंडस्ट्री का बहुत नामी-गिरामी प्रोड्यूसर है। दरअसल, यह तो खुद को भोली-भाली तथा अनाड़ी दर्शाने की अभिनेत्री की चाल है। अखबारों तथा न्यूज चैनलों के माध्यम से कुख्यात ठग सुकेश चंद्रशेखर की काली दास्तान का देश के बच्चे-बच्चे को पता चल चुका था। मुफ्तखोरी की रोगी अभिनेत्री की हर बहानेबाजी धरी की धरी रह गई है। अब उसे वकीलों को महंगी फीस देते हुए अदालतों के चक्कर पर चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

    चित्र-2 : देश के रेतीले प्रदेश राजस्थान के गुलाबी शहर जयपुर में स्थित त्रिवेणी नगर के एक श्मशान घाट में बने दो छोटे से कमरों में रहती हैं मायादेवी बंजारा। वर्तमान में उनकी उम्र है लगभग पचपन वर्ष। मायादेवी श्मशान घाट की देखरेख करने के साथ-साथ यहां आने वाले शवों का अंतिम संस्कार भी करवाती हैं। मेहनत की कमायी पर गुजर बसर करती चली आ रही मायादेवी की दो बेटियों की शादी हो चुकी है। दो बेटियां और एक बेटा स्कूल में पढ़ता है। एक बेटी अच्छी तरह से पढ़-लिखकर कलेक्टर बनना चाहती है। मायादेवी की मां भी श्मशान घाट पर शवों का अंतिम संस्कार कर घर चलाया करती थीं। मायादेवी जब मात्र 10 वर्ष की थीं तभी अपनी मां के काम में हाथ बंटाने लगी थीं। तभी से उसने अपनी परिश्रमी मां की कही यह बात गांठ बांध ली थी कि कभी भी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना और मेहनत करने में भी कभी नहीं शर्माना। खून-पसीने से कमाया पैसा ही असली खुशी तथा सम्मान का अधिकारी बनाता है। कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं होता। किसी की दया पर जीने से अच्छा है, मर जाना। 

    शुरू-शुरू में तो मायादेवी और उसके बच्चों को श्मशान घाट पर देखकर लोग हतप्रभ रह जाते थे, लेकिन अब लोग उन्हें पहचानने लगे हैं। उनकी कर्तव्यपरायणता की सराहना भी करते हैं। जैसे ही शव श्मशान घाट पर पहुंचता है तो मायादेवी अपने काम में लग जाती हैं। अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां नीचे बिछवा कर चिता तैयार करती हैं। जो लोग शव के अंतिम संस्कार की रीति से अनभिज्ञ होते हैं, उन्हें स्वयं सभी क्रियाएं बताती और समझाती हैं। परिजनों के चले जाने के बाद भी पचपन वर्षीय मायादेवी चिता की लकड़ियों को ठीक करती रहती हैं। वह तब तक वहां से नहीं उठतीं जब तक चिता पूरी तरह से जल नहीं जाती। मायादेवी की बेटियां भी स्कूल से लौटने के बाद उनकी मदद करती हैं। कोई उनसे जब पूछता है कि चौबीस घण्टे श्मशान घाट पर रहने पर तुम्हें भय नहीं लगता तो उनका साहस और आत्मविश्वास से भरा यही जवाब होता है कि श्मशान घाट तो एक पवित्र स्थान है। हमें यहां रहने या शवों के दाह संस्कार से कोई भय नहीं लगता, बल्कि सुकून मिलता है। फिर भयभीत तो जिन्दा इंसानों से होना चाहिए, मुर्दों से क्या घबराना।

    चित्र-3 : छत्तीसगढ़ के गांव चरमुड़िया की स्मारिका ने बड़ी मेहनत और लगन के साथ कम्प्यूटर साइंस में बीई करने के बाद एमबीए किया। उसे एक मल्टीनेशनल कंपनी में दस लाख रुपये सालाना की प्रभावी नौकरी भी मिल गई, लेकिन जब उसका ध्यान अपने पिता की लिवर ट्रांसप्लांट के पश्चात बिगड़ती सेहत पर गया, तो उसने नौकरी छोड़ी और खेती करने की जिम्मेदारी ले ली। पिता घर में आराम करने लगे। स्मारिका को शुरुआत में थोड़ी परेशानी हुई। आसपास के लोगों के तंज भी झेलने पड़े कि खेती तो पुरुषों के बस की बात है। महिलाएं इस कठिन काम के लिए नहीं बनी हैं। स्मारिका ने अपने 23 एकड़ के खेत में खेती के नये-नये प्रयोग करते हुए नई-नई फसलें उपजानी प्रारंभ कर दीं। बेहतरीन खाद और बीजों की बदौलत ऐसी अच्छी-अच्छी फसलें मिलने लगीं, जिन्हें देख बोलने और हतोत्साहित करने की कोशिश करने वाले सभी चेहरे स्तब्ध रह गये। आज स्मारिका के खेत की पोषक सब्जियों की दूर-दूर तक मांग है। विशेष गुणवत्ता के चलते दिल्ली, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, बिहार, ओडिसा तथा कोलकाता तक में इन सब्जियों ने अपनी पैठ जमा ली है। अब तो स्मारिका ने अपने खेत की विभिन्न पैदावारों को विदेश में भी भेजना प्रारंभ कर दिया है। 

    इसी तरह से छत्तीसगढ़ में महासमुंद के कमरौद गांव की 32 वर्षीय वल्लरी का भी खूब डंका बज रहा है। उन्होंने भी कृषि के क्षेत्र में अभूतपूर्व क्रांति कर दिखायी है। छह साल पहले 15 एकड़ के खेत में खेती शुरू करने वाली वल्लरी अब एक साथ तीन गांवों में खेती कर रही हैं। एमटेक करने के बाद किसी मोटी पगार वाली नौकरी से लाखों रुपये की तनख्वाह हासिल कर दिखावटी सुख-सुविधाओं भरी जिन्दगी जीने की बजाय खेती को चुनने वाली वल्लरी को भी शुरू में हतोत्साहित और निराश करने का अभियान चलाया गया, पर अब महासमुंद के हर गांव के पुरुष एवं महिला समूह उनसे उन्नत किस्म की खेती करने के तरीके सीख कर मोटी कमायी कर रहे हैं। कमरौद में 24 एकड़ जमीन में मिर्च, अमरूद, बांस, पपीता, नारियल, स्ट्राबेरी आदि से लाखों की कमाई कर रही इस जूझारू महिला ने भी बोलने वालों की सोच को बदलकर रख दिया है। वल्लरी खेती के नये-नये तरीकों का सतत अध्ययन करती रहती हैं। जब प्रयोग सफल हो जाते हैं तो दूसरे किसानों को भी साझा कर उनके लिए भी विकास के मार्ग खोलती चली जाती हैं। यही भारत का वास्तविक चित्र है, जहां के श्रमजीवी स्त्री-पुरूष खून पसीना बहाकर कमाये गए धन का उपभोग करने में यकीन रखते हैं। उनके लिए परिश्रम ही वास्तविक योग साधना है।

Thursday, January 19, 2023

पर्दे की चीर-फाड़

     भूख तो हर किसी को लगती है। छत के बिना भी जिन्दगी नहीं कटती। सभी को सुख-चैन से रहना अच्छा लगता है। हर कोई चाहता है कि उसकी रोजी-रोटी पर कभी कोई खतरा न आए। अपनी हाड़तोड़ मेहनत से बनाये घर, ऑफिस, दूकान, होटल और दरो-दीवार पर कोई दरार और आंच भी ना आए। इस धरा के हर इंसान की हमेशा यही तमन्ना रहती है, कि हम और हमारा परिवार हर हाल में सुरक्षित रहे। यह भी सच है कि इंसान के चाहने और सोचने के बावजूद कभी-कभी स्थितियां और परिस्थितियां अनुकूल नहीं रहतीं। इंसानी दुष्टता के साथ-साथ कुदरत का कहर भी ऐसा बरपा हो जाता है कि अच्छा भला आदमी माथा पकड़ कर रह जाता है। 

    पहले बात करते हैं पड़ोसी देश पाकिस्तान की, जहां पर इन दिनों लोगों को अपने सामने मौत नाचती दिखायी दे रही है। जनता हुक्मरान को दिन-रात कोस रही है, जिनकी गलत नीतियों की वजह से उसे दिन-रात भूख से लड़ते हुए दाने-दाने को मोहताज होना पड़ रहा है। पाकिस्तान में आटे के दाम आसमान के भी पार जा पहुंचे हैं। 160 रुपये किलो में आटा और 60 रुपये किलो में नमक खरीद पाना आम आदमी के लिए आसमान के तारे तोड़ने जैसा है, फिर भी हर मां-बाप अपने बच्चों के लिए यह भी करने को तैयार हैं। प्रतिदिन दुकानों के सामने लम्बी-लम्बी कतारें लगती हैं और कुछ के हिस्से में खाने-पीने का नाममात्र सामान आता है तो अधिकांश को निराश खाली हाथ घर लौट जाना पड़ता है। इस जद्दोजहद में न जाने कितने लोग कुचले जा चुके हैं। कुछ की तो भीड़ में धक्का-मुक्की और दम घुटने की वजह से मौत भी हो चुकी है। साल भर पहले जो प्याज तीस-बत्तीस रुपये किलो बिकती थी अब उसकी कीमत दो सौ रुपये किलो के पार जा पहुंची है। गैस सिलेंडर 10 हजार में तो चिकन छह सौ रुपये तथा दालों तथा सब्जियों के दाम भी गरीबों के मुंह पर तमाचे जड़ रहे हैं। पांच-सात हजार रुपये महीने की कमायी करने वाले परिवारों को एक वक्त की रोटी भी नसीब हो जाए तो बहुत बड़ी बात है। बीमार होने पर लोगों के लिए दवाएं खरीद पाना भी आसमान से तारे तोड़ने जैसा ही है। डॉक्टरों ने भी अपनी फीस बढ़ा दी है। जमाखोरों के लालच तथा जमाखोरी की कोई सीमा नहीं रही। मौत के सौदागरों के यहां धड़ाधड़ नोट बरस रहे हैं। भ्रष्ट व्यापारी नेता, अधिकारी, कर्मचारी बस हाथ आये मौके का फायदा उठाने में लगे हैं। अपने घरों और गोदामों में खाने-पीने तथा सभी सुख-सुविधाओं के सामान का अंबार लगाकर धनवान बड़ी बेरहमी के साथ तमाशा देख रहे हैं। 

    पाकिस्तान और हिंदुस्तान एक ही उम्र के देश हैं। दोनों एक ही साथ आजाद हुए थे, लेकिन कौन कहां पहुंचा यह बताने की जरूरत नहीं। हिंदुस्तान में लोकतंत्र की जड़ें भी अत्यंत मजबूत हैं। कोई भी ताकत उन्हें हिला-डुला नहीं सकती। दूसरी तरफ पड़ोसी देश में तो जनतंत्र का बार-बार जनाजा उठता रहता है। पाकिस्तान के शासक आवाम की खुशहाली के लिए मेहनत करने की बजाय अपने पड़ोसी भारत देश की तरक्की से ही जलते आए हैं। उन्होंने वसुधैव कुटंबकम की संस्कृति और मनोभावना के साथ आगे बढ़ने वाले भारत को तबाह करके रख देने की धमकियां भी दीं, लेकिन अंतत: खुद ही बरबादी और कंगाली के कगार पर जा पहुंचे। अब जब उनका पूरा मुल्क दाल रोटी मांग रहा है, तब वहां के प्रधानमंत्री के होश ठिकाने आये हैं। अपने जन्मजात अहंकार और ऐंठन को अपनी भूल और नासमझी मानते हुए उसने अंतरराष्ट्रीय मीडिया के समक्ष कहा है, ‘भारत के साथ हमने तीन युद्ध लड़े और इससे हमारे लोगों को दु:ख, गरीबी और बेरोजगारी के सिवाय कुछ हाथ नहीं लगा। अब हम शांति से रहना चाहते हैं।’ 

    जहां पाकिस्तान में आटा-दाल-चावल को लेकर हाहाकार मचा है, वहीं भारत में पहाड़ों पर भूस्खलन, पानी के रिसाव तथा दरारों ने हजारों लोगों को बेघर होने को विवश कर दिया है। आप कल्पना करें। जरा सोच कर भी देखें। जिस घर... झोपड़ी, महल, दुकान, होटल, कार्यालय आदि को आपने खूब मेहनत कर बनाया... खड़ा किया हो, उसे एकाएक छोड़कर कहीं और रहने और कमाने खाने को जाना पड़े तो आप पर क्या बीतेगी? उत्तराखंड में स्थित शहर जोशीमठ तथा उसके आसपास के गांवों-कस्बों में स्थित घरों की दीवारों तथा सड़कों में दिल दहलाते भूधंसाव तथा दरारों के आने से यहां रहने वाले हजारों लोग बेघर और बेरोजगार होने के संकट से जूझ रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि किसी ने उनकी गर्दन पर नंगी तलवार रख दी है। प्रशासन के द्वारा लगभग आठ सौ घरों पर खतरे का लाल निशान लगा दिये गए हैं। कुछ लोग अपनी जमीन से जुदा होने को हर्गिज तैयार नहीं। अपनी जान की परवाह न करने वाले इन लोगों की यह मांग भी है कि जब तक उन्हें पर्याप्त मुआवजा नहीं मिलेगा तब तक वे कहीं और नहीं जाएंगे। अंतत: वे यहीं मर खप जाएंगे। बिना रुपयों के नया बसेरा कैसे बनेगा और रोजगार के प्रबंध भी कैसे होंगे? उन्हें क्या पता था कि उन पर ऐसा आफत का पहाड़ टूट पड़ेगा? 

    ऐसा भी नहीं है कि पहाड़ों पर पड़ने वाली दरारों एवं भूस्खलन का शासन और प्रशासन को पहले से कोई अंदेशा नहीं था। 1976 में ही मिश्रा समिति ने जोशीमठ के आसपास भारी निर्माण पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश कर दी थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि जोशीमठ रेत और पत्थर के जमाव पर स्थित है, यह मुख्य चट्टान पर नहीं है। यह एक प्राचीन भूस्खलन पर स्थित है। अलकनंदा और धौलीगंगा की नदी धाराओं द्वारा कटाव भी भूस्खलन लाने में अपनी भूमिका निभा रहा है। शासन और प्रशासन को सचेत करते हुए यह भी सुझाया गया था कि पेड़ और घास लगाने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जाए। ढलानों पर कृषि से बचा जाए, पक्की नाली प्रणाली का निर्माण किया जाए, ताकि गड्ढों को बंद किया जा सके और सीवरलाइन के माध्यम से सीवेज का पानी बह सके। इसके अलावा रिसाव से बचने के लिए पानी को जमा नहीं होने देना चाहिए और इसे सुरक्षित क्षेत्र में ले जाने के लिए नालियों का निर्माण किया जाना चाहिए और सभी दरारों को चूने, स्थानीय मिट्टी और रेती से भरा जाना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। दरअसल, शासन और प्रशासन की नींद तो तभी खुल जानी चाहिए थी, जब 2013 में केदारनाथ में प्रलय जैसे हालात बने थे और अनेकों मौतें हो गई थीं। 

    सच कहें तो अपने देश हिंदुस्तान में अतीत से सबक लेने की परिपाटी नहीं है। बहुत कुछ भगवान भरोसे चलता रहता है। जब दुर्घटना घटती है, तब शासन-प्रशासन की नींद खुलती है। भगवान न करे भारत के कभी भी पाकिस्तान जैसे भयावह हालात बनें, लेकिन यहां की अमीरी के नीचे दबती और कराहती गरीबी को छिपाने और नजरअंदाज करने का षडयंत्र-सा चल रहा है। देश के पास संसाधनों की कहीं कोई कमी नहीं, लेकिन अधिकांश साधन-संसाधन धनवानों के हाथों में सिमट कर रह गये हैं। एक प्रतिशत अमीरों की जेब में देश का चालीस प्रतिशत धन कैद होकर रहा गया है। वर्तमान में देश के 81 करोड़ लोगों को गरीब होने के कारण पांच किलो अनाज लगभग मुफ्त में देना पड़ रहा है। सरकार की इस मेहरबानी से देश की गरीबी और बदहाली का कटु सच तो नहीं बदलने वाला। अब प्रश्न तो यह भी है कि हकीकत को कब तक छिपाया जाता रहेगा? एक न एक दिन तो पर्दा फटेगा या फिर उसे किन्हीं हाथों के द्वारा चीर-फाड़ दिया जाएगा...।

Thursday, January 12, 2023

आत्मघाती मदमस्ती

    यह तो बदमाशी की इंतेहा है। जन्मजात गुंडे और सफेदपोश बदमाश लड़कियों तथा औरतों को जमीन पर भी निशाना बना रहे हैं और आसमान पर भी खून के आंसू रुला रहे हैं। उनकी इस जबरदस्ती की गुंदागर्दी में शराब भी खासी भूमिका निभा रही है। देश के प्रदेश हरियाणा के चमकते उद्योगनगर गुरुग्राम में एक नौकरीपेशा लड़की रात को ऑटो से घर लौट रही थी तब नशे में धुत बाइक सवार युवक की उस पर नजर पड़ी तो उसने लड़की को धमकाते हुए कहा कि चुपचाप मेरे साथ मेरी बाइक पर बैठ जा। लड़की के मना करते ही नशे में लड़खड़ाते युवक ने गंदी-गंदी गालियां देते हुए लड़की पर हेलमेट से इतनी जोर से वार किया, जिससे वह लहूलुहान हो गई। घोर हैरानी भरा सच यह भी है कि लड़की की बहन के 112 नंबर पर कॉल करने पर पुलिस जिप्सी में जो खाकी वर्दीधारी घटनास्थल पर पहुंचे वे भी शराब के नशे में चूर थे। उनकी जुबान बुरी तरह से लड़खड़ा रही थी। घायल लड़की को अस्पताल ले जाया गया, जहां उसके सिर पर 20 से ज्यादा टांके लगाने पड़े। 

    उत्तरप्रदेश के शहर सुलतानपुर के निकट स्थित एक गांव में नशे में धुत दो शराबियों ने आधी रात को चाय की दुकान चलाने वाले उम्रदराज पति-पत्नी से नमकीन की मांग की। उनके यह बताने पर कि फिलहाल उनके यहां खाने का कोई सामान नहीं है तो वे इस कदर आगबबूला हुए कि दोनों के सीने में गोलियां दाग कर बुरी तरह से घायल कर डाला। न्यूयार्क से दिल्ली आ रही एयरइंडिया की फ्लाइट में शराब के नशे में धुत एक यात्री ने शौचालय में न जाकर एक बुजुर्ग महिला यात्री पर ही धार छोड़कर उनके कंबल, बैग और अन्य सामान को गीला और गंदा कर दिया। इस घोर अमानवीय और शर्मनाक घटना को अंजाम तो दिया गया 26 नवंबर 2022 की रात, लेकिन देश और दुनिया तक इसकी खबर उड़ते-उड़ते पहुंची 4 जनवरी 2023 के दिन। आराम से सफर करने की अभिलाषा लिए बिजनेस क्लास में यात्रा करती उम्रदराज महिला के साथ अशोभनीय हरकत करने वाले शराबी के सहयात्री ने बताया कि नशे में डोलते अभियुक्त ने लंच में ही सिंगल मॉल्ट के चार गिलास गटकने में देरी नहीं लगायी। वह बार-बार मुझसे यही पूछ रहा था कि आपके कितने बच्चे हैं। मदमस्त हो चुके शराबी की यही पहचान होती है। इतनी अधिक पीने के बाद भी वह पैग पर पैग खाली करने में लगा था। उसकी पीने की यह रफ्तार मुझे भी डराने लगी थी। इसलिए मैंने तुरंत एयरलाइन के स्टाफ से निवेदन किया कि मेरे सहयात्री को बहुत चढ़ गई है। उन्हें कृपया अब और शराब ना दें, लेकिन उनकी नहीं सुनी गई। वे अंधाधुंध पीते चले गये। हम बिजनेस क्लास कैबिन की पहली पंक्ति में बैठे थे। शौचालय चार पंक्ति पीछे था। जब उसे पेशाब लगी तो उसने शौचालय न जाते हुए पीछे की पंक्ति पर जाकर विंडो सीट की 72 वर्षीय महिला पर पेशाब कर दिया। इतना संगीन अपराध करने के पश्चात वह चुपचाप अपनी सीट पर जाकर सो गया। इसी दौरान ऊपर से नीचे तक भीग चुकी महिला बहुत चिंतित व घबराई हुई थी। उसके कपड़े, जूते और बैग पेशाब से भीग चुके थे। बैग में ही पासपोर्ट, यात्रा संबंधी दस्तावेज और रुपये-पैसे थे। वह काफी देर तक शराबी को कोसती रहीं। पहले तो क्रू मेंबर्स ने उसे छूने से ही इनकार कर दिया। कुछ देर के बाद उनके सामान को शौचालय में ले जाकर धोया गया तथा उन्हें भी पहनने को एयरलाइन का पाजामा और मौजे दिए गये। अच्छी-खासी नींद लेने के बाद 34 वर्षीय पेशाबबाज यात्री जागा और थोड़ा संभला तो मेरी तरफ देखते हुए बोला, ‘‘भाई शायद मैं मुसीबत में पड़ गया हूं।’’ तब मैंने कहा, ‘हां, बिलकुल। आपने गलती ही बहुत बड़ी की है।’ शराब पीकर हद से ज्यादा नशे के गर्त में समाने वाले इस शराबी के करियर और जिंदगी की ऐसी-तैसी होने में देरी नहीं लगी। कल तक नामी-गिरामी कंपनी की ‘महाराजा चेयर’ पर बैठकर लाखों रुपये महीने की पगार पाने वाला आज बदनाम और बदहाल होकर सड़क पर आ चुका है।

    हवाई यात्रा के दौरान नशे में धुत यात्रियों के लड़ने-भिड़ने की खबरें इन दिनों कुछ ज्यादा ही आने और चिंता में डालने लगी हैं। धरती का रोग हवा को भी दहलाने लगा है। 27 दिसंबर 2022 के दिन बैंकाक से कोलकाता की फ्लाइट में यात्री जानवरों की तरह आपस में ही भिड़ गये। उनकी मारकुटायी का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ। दो यात्रियों के बीच सीट को लेकर शुरू हुई मामूली कहा-सुनी देखते ही देखते हाथापायी में बदल गई। क्रू मेंबरों के रोकने और समझाने का भी उन पर कोई असर नहीं पड़ा। उलटे दूसरे व्यक्ति के कुछ साथी भी अकेले पड़ चुके यात्री की अंधाधुंध धुनाई करने लगे। इसी तरह से इंडिगो की इंस्ताबुल से दिल्ली आ रही फ्लाइट में एक यात्री कू्र मेंबर पर बेतहाशा भड़क कर गालीगलौज करने लगा। उसे खाने का स्वाद अच्छा नहीं लगा था। एयर होस्टेस ने यात्री को विनम्रता से अपनी बात कहने का अनुरोध किया तो वह और अभद्र तेवर दिखाते हुए एयर होस्टेस को धमकाने लगा, ‘‘तुम नौकर हो, इसलिए अपना मुंह बंद रखो।’’ एयर होस्टेस भी तैश में आ गई। उसने फौरन जवाब दिया, ‘‘पहले तो आप बोलने की तमीज सीखें और यह भी जान लें कि मैं आपकी नौकरानी नहीं।’’ अब तो यात्री के गुस्से का पारा और भी चढ़ गया...। बड़ी मुश्किल से समझा-बुझा कर उसे ठंडा किया गया। 

    नव वर्ष 2023 के जनवरी महीने के दूसरे हफ्ते दिल्ली-पटना इंडिगो फ्लाइट में नशे में धुत तीन युवकों ने जमकर हंगामा किया। इस दौरान जब एयर होस्टेस ने उन्हें समझाने की कोशिश की तो वे उसी के साथ छेड़खानी और बदसलूकी करने लगे। तीनों फ्लाइट में बैठते ही हंगामा करने लगे थे। तय है कि यात्रा करने से पहले ही उन्होंने चढ़ा ली थी। देश के चुनिंदा हवाई अड्डों पर यात्रियों को मदमस्त करने के लिए बीयरबार खोले ही जा चुके हैं। नशे में पियक्कड़ अपना आपा खो देते हैं। उन्हें समय, जगह और परिस्थिति का भी भान नहीं रहता। उनमें एक अजीब किस्म का अहंकार भी रहता है। इंटरनेशनल फ्लाइट में यह जो ‘पेशाब कांड’ हुआ उस पर कुछ लोग बोले कि शराब के नशे में होने के कारण ही यह निंदनीय अपराध हो गया। नशे में धुत शराबी को कहां पता होता है कि वह क्या बोल, कह और कर रहा है। यह गलती तो शराब की है, जो अच्छे भले इंसान को बहकाती है, लेकिन किसी के कुछ कहने से इतने बड़े तूफानी अपराध और अपराधी को यूं ही तो क्षमा नहीं किया जा सकता। उम्रदराज महिला के हवाई सफर को बदरंग तथा नर्क बनाने वाले शख्स को इतनी तो समझ होनी ही चाहिए थी कि पानी और शराब में फर्क होता है तथा पीने की भी कोई मर्यादा होती है। आप जब पचा नहीं सकते तो इतनी अधिक पीते क्यों हैं कि बुरी तरह से बहक जाएं। उपद्रव और उल्टियां करने लगें। लंबी उबाऊ उड़ानों में थकावट से बचाये रखने के लिए यात्रियों की शराब से मेहमान नवाजी की बहुत पुरानी परिपाटी है, लेकिन इस बात का भी तो ध्यान रखा जाना चाहिए कि मेहमान ने कहीं ज्यादा तो नहीं पी ली है। जब सहयात्रियों को उसके विनाशकारी कगार पर होने का होने का पता चल जाता है तो एयरलाइंस में कार्यरत सेवक और सेविकाओं की आंखें क्यों बंद रहती हैं?

Thursday, January 5, 2023

सच्चे कर्मयोगी ... नरेंद्र मोदी

    भारतवर्ष के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आदरणीय माताश्री हीरा बेन का शुक्रवार को तड़के साढ़े तीन बजे निधन हो गया। उनके देहावसान पर पूरा देश शोक में डूब गया। उनके सुपुत्र नरेंद्र मोदी तुरंत पुत्रधर्म निभाने में जुट गए। गमगीन बेटे को अपनी आराध्य मां की अर्थी को कंधा देते देख सभी की आंखें बार-बार भीगती रहीं। मां की चिता पंचतत्व में विलीन हो रही थी और अपने असीम दर्द को अपने भीतर समेटे बेटा चुपचाप खड़ा था। दाह संस्कार की लपटें उसे अतीत की तरफ बहाकर ले जाने को आतुर थीं, लेकिन वह अपने वर्तमान के कर्तव्यबोध से बंधा था। वह अपने बड़े भाई को सांत्वना दे रहा था। उसके आंसू पोंछ रहा था। अपनी जान से भी प्रिय अपनी मां की अंत्येष्टि के फौरन बाद बेटा राजधर्म के पथ पर चल पड़ा। देशवासियों ने ऐसा कर्मठ प्रधानमंत्री पहली बार देखा, जिसने अपनी पीड़ा को अपने कर्तव्य पथ के आड़े नहीं आने दिया। उन्होंने वीडियो कॉन्फेंसिंग के माध्यम से पूर्व निर्धारित सभी कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गांधीनगर में अपनी मां की अंतिम संस्कार की तैयारियों में लगे थे, तभी उन्होंने देशवासियों से अपील कर दी थी कि अपने पूर्व निर्धारित किसी भी काम को न रोकें। अपने दायित्व का पालन करना ही हीरा बा के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इस अपील का उन्होंने खुद भी पूरे समर्पण भाव से अमल करते हुए पश्चिम बंगाल में 7,800 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन और लोकार्पण किया। इसी दौरान उन्होंने पश्चिम बंगाल की पहली वंदे मातरम ट्रेन को हरी झंडी दिखायी। वे जब कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे, तब उनकी जुबान लड़खड़ाने को बेताब थी, लेकिन मुश्किल की हर घड़ी में खुद पर नियंत्रण रखने में दक्ष इस कर्मवीर ने खुद को संभाले रखा और दिखा दिया कि निजी पीड़ा राष्ट्रधर्म के समक्ष कोई मायने नहीं रखती। प्रधानमंत्री के भर्राये स्वर और नम होती आंखों की भाषा को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तुरंत भांप लिया। वह प्रधानमंत्री की कर्तव्य परायणता के प्रति नतमस्तक होकर रह गईं। उन्होंने मोदी जी की माताश्री हीरा बेन के निधन पर गहरा दुख जताते हुए कहा कि आपकी मां हमारी भी मां हैं। दु:ख की इस घड़ी में हम सब आपके साथ हैं। आप सीधे मां की अंत्येष्टि से आए हैं। मैं चाहती हूं कि आप अभी आराम करें। 

    जिस संयम और धैर्य के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी निजी पीड़ा को दबाते हुए अपने फर्ज़ को प्राथमिकता दी उसे हमेशा याद रखा जाएगा। मां हीरा बेन की 99 वर्ष की जीवन यात्रा भी काफी संघर्षमय रही। अपने बच्चों को पालने-पोसने-पढ़ाने-लिखाने तथा अच्छी तरह से संस्कारित करने के लिए उन्हें लोगों के घरों में बर्तन मांजने और झाडू-पोछा तक भी करना पड़ा। फिर भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी। बेटे नरेंद्र पर अपनी मां के अटूट परिश्रम और सद्विचारों का इतना अधिक प्रभाव रहा कि उन्होंने सबकुछ छोड़छाड़ कर देश की सेवा करने का संकल्प ले लिया। गुजरात के मुख्यमंत्री बनने से लेकर देश के प्रधानमंत्री बनने तक की उनकी यात्रा के पन्ने-पन्ने से सभी सजग देशवासी अच्छी तरह से वाकिफ हैं। देशवासी इस सच से भी अनजान नहीं हैं कि नरेंद्र मोदी ने कभी भी खुद को परिवार के मोह का कैदी नहीं बनने दिया। उनके परिवार के सदस्यों ने भी उनके सीएम और पीएम होने का लाभ उठाने की चेष्टा नहीं की, जबकि अमूमन होता यह है कि किसी भी विधायक सांसद के मंत्री बनते ही उनके परिवार वालों की हर रोज दिवाली मनती है। कभी जिनके पास साइकिल नहीं होती है, वे कारों के मालिक बन जाते हैं। मंत्रियो की औलादें और रिश्तेदार मंत्री के सरकारी निवास पर डेरा जमाये रहते हैं। मंत्री भी जश्न मनाने में लीन हो जाते हैं। सरकारी खर्चे पर देश और विदेश के पर्यटन स्थलों पर बार-बार जाते हैं। उन्हें छुट्टी मनाने के दिनों का बेसब्री से इंतजार रहता है। भारत के अधिकांश पूर्व प्रधानमंत्री किसी न किसी बहाने देश के हिल स्टेशनों तथा विदेश यात्राओं पर जाने के लिए विख्यात रहे हैं, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी कोई छुट्टी नहीं ली। हर उत्सव देश के वीर सैनिकों के साथ मनाया।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बड़े भाई सोमभाई मोदी स्वास्थ्य विभाग में अपनी सेवाएं देने के बाद रिटायर हो चुके हैं। अब वह अहमदाबाद में वृद्धाश्रम चलाते हुए समाजसेवा कर रहे हैं। किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि मेरे और प्रधानमंत्री के बीच एक परदा है। मैं नरेंद्र मोदी का भाई हूं, न कि प्रधानमंत्री का। प्रधानमंत्री के लिए वे करोड़ों भारतीयों में से एक हैं। प्रधानमंत्री जी के दूसरे भाई अमृत भाई एक प्राइवेट कंपनी में फिटर के पद से रिटायर होने के बाद अहमदाबाद में अपने चार कमरों के मकान में आम भारतीयों की तरह रह रहे हैं। उनके बेटे यानी नरेंद्र मोदी के भतीजे 47 वर्षीय संजय मोदी, जो कि अपनी लेथमशीन संचालित कर गुजर बसर कर रहे हैं, का कहना है कि उनका पीएम मोदी से बहुत ही कम मिलना-जुलना होता है। उनके बारह साल तक गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान भी यही स्थिति थी। पीएम नरेंद्र मोदी के तीसरे भाई प्रहलाद मोदी अहमदाबाद में एक किराने की दुकान चलाते हुए सहज और सरल तरीके से जीवनयापन कर रहे हैं। सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेने वाले प्रहलाद मोदी को इस बात का कतई अहंकार नहीं कि वे देश के प्रधानमंत्री के भाई हैं। नरेंद्र मोदी के सबसे छोटे भाई पंकज सूचना विभाग से रिटायर हुए हैं। वह गांधीनगर में रहते हैं। इन्हीं के साथ ही मां हीरा बेन रहती थीं। मां से जब भी नरेंद्र मोदी मिलने आते तो ही उनकी मुलाकात अपने बड़े भाई से होती थी। माताश्री हीरा बेन ने भी कभी किसी को नहीं जताया कि वह देश के प्रधानमंत्री की मां हैं। एक-दो बार प्रधानमंत्री निवास पर चंद दिन पुत्र के अनुरोध पर रहीं जरूर, लेकिन तुरंत गांधी नगर के अपने छोटे से घर में लौट आईं। उन्होंने हमेशा नरेंद्र मोदी को अपने बेटे की तरह देखा, सीएम या पीएम के रूप में तो कभी भी नहीं। यही सच उनके आदर्श और पवित्र मातृत्व को दर्शाता है। अपने कर्म को ही धर्म मानने वाले नरेंद्र मोदी को बचपन में अपनी मां से जो संस्कार मिले उनसे उन्होंने कभी भी मुंह नहीं मोड़ा। आराम करना तो उन्होंने कभी सीखा ही नहीं। वर्षों से ही उनकी ब्रह्म मुहूर्त में उठने की आदत है। इतनी सुबह जागकर वे नियमित ध्यान में बैठते हैं, योग और कसरत करते हैं। इसी से उनकी एकाग्रता, स्फूर्ति, धैर्य और ताजगी बनी रहती है, जो उनके विरोधियों को भी चौंकाती है।

Thursday, December 29, 2022

विजय-पराजय

चित्र-1 : आजकल कुछ लोगों को देश के महापुरुषों की बुराई करने का रोग लग गया है। वे दिन-रात बस इसी काम में लगे रहते हैं। उनके इस दुष्ट कर्म से न जाने कितने भारतीयों को तकलीफ और पीड़ा होती है, बेहद गुस्सा भी आता है, लेकिन बकवासियों को कोई फर्क नहीं पड़ता। कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली के एक युवक को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रति दुर्भावना तथा उनके हत्यारे नाथू राम गोडसे के प्रति अपार सद्भावना दर्शाने वाले चंद लोगों पर इतना गुस्सा आया था कि वह मरने-मारने पर उतर आया था। सोशल मीडिया के इस जमाने में ऐसी घृणित शर्मनाक करतबबाजी बहुत उफान पर है। बीते शुक्रवार की दोपहर कविता चव्हाण नामक एक 28 वर्षीय युवती हाथ में केरोसिन से भरी बोतल और माचिस लेकर विधानभवन के सामने पहुंची। वहीं खड़े-खड़े उसने खुद पर केरोसिन उंड़ेला और तीली जलाकर खुद को आग के हवाले करने जा ही रही थी कि तभी अचानक पुलिस वालों की उस पर नजर पड़ गई। उन्होंने फौरन उसके हाथ से माचिस और केरोसीन की बोतल झपटी और उसे अपने कब्जे में लिया। यदि थोड़ी सी भी देरी हो जाती तो विधानभवन की छाती पर दिल दहलाने वाला आत्मदाह हो जाता, जिसकी गूंज दूर-दूर तक सुनायी देती। अपने शरीर को जलाकर खुदकुशी करने के इरादे के साथ लगभग 685 कि.मी. की दूरी तय कर सोलापुर से नागपुर पहुंची कविता चव्हाण सामाजिक कार्यकर्ता के साथ-साथ पत्रकार भी है। पिछले कुछ दिनों से देश के महापुरुषों के बारे में अपमानजनक शब्दावली पढ़ और सुन-सुन कर उसका मन बहुत आहत हो चुका था। राजनीति के बड़बोले खिलाड़ियों के द्वारा जानबूझकर संविधान के शिल्पकार डॉ. बाबासाहब आंबेडकर, महात्मा फुले, शिवाजी महाराज आदि की, की जा रही  अवमानना से उसे बहुत गहरी चोट पहुंची थी। उसे लगने लगा था कि गेंडे की सी मोटी चमड़ी वाले बेशर्म, बदजुबान नेताओं पर उसकी कलम की तलवार कोई असर नहीं डाल पा रही है तो उसने खुद को ही सज़ा देने की ठान ली और मौत का सामान लेकर वहां जा पहुंची, जहां मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ तमाम मंत्रियों तथा विधायकों का मेला लगा था।

चित्र-2 : मात्र 14 बरस की उम्र में ‘भारत का वीर महाराणा प्रताप’ धारावाहिक तथा कालांतर में कुछ फिल्मों में अपने अभिनय से प्रभावित करने वाली 21 वर्षीय अभिनेत्री तुनिशा शर्मा ने पंखे से लटक कर खुदकुशी कर ली। तुनिशा ने फांसी लगाने से करीब पांच घण्टे पूर्व इंस्टाग्राम पर अपनी मुस्कराती फोटो शेयर करते हुए लिखा था, जो जुनून से आगे बढ़ते हैं, वो रुकते नहीं। ऐसी सोच के साथ जीने वाली युवती का मौत की बांहों में झूल जाना अचम्भे में डाल देता है। संजना सातपुते। उम्र 20 वर्ष। यह उम्र जोशोखरोश के साथ जीने और हर विपत्ति से लड़ने के लिए होती है। सिक्के के दो पहलुओं की तरह हार-जीत तो लगी रहती है। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के बावजूद दसवीं में 85 प्रतिशत और बारहवीं में भी अच्छे खासे नंबर पाने वाली संजना ने बीएससी में दाखिला ले लिया था, लेकिन कोविड काल में पढ़ाई के ऑनलाइन हो जाने की वजह से सबकुछ गड़बड़ होता चला गया। तब पढ़ाई के ऑनलाइन हो जाने की वजह से वह बीएससी की शिक्षा पूर्ण नहीं कर सकी। उसके बाद उसने कम्प्यूटर क्लास में भी प्रवेश लिया। आर्थिक बाधाएं और अन्य मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं, लेकिन फिर भी संजना को देखकर यही लगता था कि वह टूटेगी नहीं। अपने सपनों को साकार करके ही दम लेगी। माता-पिता को भी अपनी परिश्रमी बेटी पर पूरा यकीन था। 15 दिसंबर, 2022 को अपने सभी प्रमाणपत्रों और दस्तावेजों को आग में राख करने के बाद जब उसने खुदकुशी की तो सभी हैरत में पड़ गये। इतनी साहसी और हिम्मती लड़की ने यह क्या कर डाला? उससे तो ऐसी कतई उम्मीद नहीं थी। सभी को वो दिन याद हो आए जब संजना ने एसटी का पास बनवाने तथा ऑनलाइन पढ़ाई के लिए मोबाइल खरीदने के लिए हफ्तों अपना खून-पसीना बहाकर रुपये जमा किये थे। अपने साथ पढ़ने वाली एक छात्रा पर अभद्र छींटाकशी करने वाले सड़क छाप मजनू की भरे चौराहे पर धुनायी तक कर दी थी। हर चुनौती का डटकर सामना करने वाली इस लड़की की खुदकुशी हर विचारवान भारतीय को तो चिंतित करने वाली है ही तथा बेटियों को शिक्षित करने के लिए तरह-तरह की योजनाएं शुरू करने की घोषणाएं करने वाली सरकार की घोर असफलता का प्रमाण तथा जीवंत दस्तावेज है संजना की आत्महत्या। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे सरकारी प्रचार और नारे के खोखलेपन का भी जीता-जागता सबूत है।

चित्र - 3 : हाथ-पैर और शरीर के सभी अंग सही सलामत हों तो किसी भी उपलब्धि को हासिल कर लेना सहज बात है, लेकिन दिव्यांग होते हुए भी लोगों की सहायता करना और प्रेरणास्त्रोत बनना बच्चों का खेल नहीं। 45 वर्षीय सोदामिनी पेठे खुद सुन नहीं सकतीं, फिर भी बधिरों का बुलंद स्वर बन चुकी हैं। सोदामिनी देश की पहली बधिर वकील हैं। फरीदाबाद के विधि और शोध संस्था से वकालत की पढ़ाई करने वाली सोदामिनी बधिरों को अदालतों में इंसाफ दिलाने के लिए कमर कस चुकी हैं। एडवोकेट सोदामिनी सांकेतिक भाषा में बताती हैं : बधिर होने की वजह से उन्हें पग-पग पर तकलीफें और परेशानियां झेलनी पड़ीं। इसी दौरान दिल्ली में वकालत पर हुई एक कार्यशाला के दौरान उन्होंने एक बधिर वकील को देखा, जो अमेरिका की नेशनल एसोसिएशन ऑफ डेफ के सीईओ थे। वे उनसे काफी प्रभावित हुईं। उनके लिए यह जानकारी भी अत्यंत चौंकाने वाली थी कि अमेरिका में पांच सौ से ज्यादा बधिर वकील हैं, जो दुभाषिए के माध्यम से अदालतों में अपने मामलों की बहस करते हैं। तब उसे कई उन बधिरों की याद हो आयी, जिन्हें अपनी अदालती समस्याएं सुलझाने के लिए वकील नहीं मिलते। कोई भी उनकी सांकेतिक भाषा को समझने के लिए अपना वक्त बर्बाद नहीं करना चाहता। तभी सोदामिनी ने पक्का निर्णय कर लिया कि मुझे भी कानून की पढ़ाई कर बधिरों की सहायता करनी है। सोदामिनी के माता-पिता और भाई-बहन सुन और बोल सकते हैं। उनके पति भी उन्हीं की तरह बधिर हैं और उनका 15 साल का बेटा भी सुन बोल सकता है। सोदामिनी भी नौ साल की उम्र तक अच्छी तरह से सुन-बोल सकती थीं, लेकिन दिमागी बुखार ने उनकी यह हालत बना दी, लेकिन तब तक वह शुरुआती भाषा सीख चुकी थीं, इसलिए उन्होंने बोलने और सुनने में सक्षम बच्चों के स्कूल में पढ़ाई की। हालांकि उस समय तक वह बधिरों के द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली सांकेतिक भाषा नहीं जानती थीं। उन्होंने बधिरों से जुड़ी संस्थाओं से संपर्क किया और नोएडा डेफ सोसायटी से जुड़ गईं। वहां पर सब लोग बिना बोले ही सांकेतिक भाषा में ढेर सारी बातें किया करते थे। इस माहौल ने उन्हें एक नई ऊर्जा से ओतप्रोत कर दिया। आज के मतलबपरस्त, आपाधापी और छलांगे मारते समय में हर कोई अपनी ही चिंता करता है। जो लोग हर तरह से तंदुरुस्त और सक्षम हैं, वे भी दूसरों की सहायता के लिए समय नहीं निकाल पाते या निकालना नहीं चाहते, लेकिन सोदामिनी ने खुद बधिर होने के बावजूद अन्य बधिरों की परेशानियों को जानने-समझने के बाद यह जो निर्णय लिया है वह यकीनन काबिले तारीफ और वंदनीय है।

Thursday, December 22, 2022

कैसे अंधे मुख्यमंत्री हैं आप?

     बिहार में जहरीली शराब ने फिर 80 से ज्यादा लोगों को मौत की नींद दे दी और कइयों को तड़पने और मरने के लिए अस्पताल पहुंचा दिया। फिर वही हुआ जो हमेशा होता आया है। आरोप-प्रत्यारोप की नाटक-नौटंकी और शोर शराबा। विपक्षी पार्टी भाजपा ने नीतीश सरकार को घेरने के लिए पूरी तरह से कमर कस ली। सवालों के गोले दागे जाने लगे। जब शराब बंदी है तो शराब पीकर लोगों की मौत कैसे हो गई? कहां से मिली उन्हें शराब? यह मौतें नहीं, नरसंहार है। सरकार को हर मृतक को चार लाख का मुआवजा देना ही होगा। नीतीश के एक मंत्री ने तुनकते और उछलते हुए कहा कि जहरीली शराब पीकर जो मरे हैं वे सरकार से पूछ कर तो नहीं पीने गए थे। उन्हें पता तो होगा ही कि प्रदेश में दारू पीने पर पूरी बंदिश है। जिनकी गलती है, वही भुगतें। आपा खो चुके मुख्यमंत्री ने चीख-चीख कर कहा, ‘‘पियोगे तो मरोगे ही। पियक्कड़ों को तो भगवान भी नहीं बचा सकता। मैं तो अदना-सा इंसान हूं। मैंने अपने बिहार की जनता के भले के लिए शराब बंदी लागू की है। शराब बंदी के बाद मेरे प्रदेश की मां-बहन, बेटियां सभी खुश हैं। डेढ़ करोड़ से ज्यादा लोगों ने शराब पीनी छोड़ दी है। जो मेहनत का पैसा कभी शराब की भेंट चढ़ जाता था अब वो बच्चों की शिक्षा, सेहत में खर्च हो रहा है। लोगों का रहन-सहन सुधरा है। अपराधों में कमी आयी है। हमारे विरोधी अक्ल और आंख के अंधे लगते हैं। मैं ही उन्हें बताये देता हूं कि देश के दूसरे प्रदेशों में भी ज़हरीली शराब पीकर लोग मरते रहते हैं। इसलिए वे मेरी सरकार के विरोध की नाटक-नौटंकी से बाज आएं। यही विरोधी जब हमारे साथ थे तब तो इन्होंने शराब बंदी का खुलकर समर्थन किया था। और हां, मेरे प्रदेश में शराब पीकर मरने वालों को किसी भी हालत में मुआवजा नहीं दिया जाएगा।’’ 

    बीते वर्ष भी जब देशवासी जगमग दिवाली की खुशियां मना रहे थे, तब भी शराब बंदी वाले प्रदेश बिहार में नकली शराब पीकर लगभग चालीस लोग परलोक सिधार गये थे। कई पियक्कड़ों की आंखों की रोशनी हमेशा-हमेशा के लिए छिन गई थी। बिहार सरकार ने पांच अप्रैल, 2016 में ही शराब के उत्पादन, व्यापार, भंडारण, परिवहन, विपणन और सेवन पर इस इरादे से रोक लगायी कि जो लोग शराब पीकर अपना बसा-बसाया घर उजाड़ देते हैं, उनके घर परिवार की औरतें और बच्चे अभावों और तकलीफों की मार झेलने को विवश हो जाते हैं, उन्हें जब शराब ही नहीं मिलेगी तो पैसा बचेगा और उनकी कंगाली दूर हो जाएगी। परिवार खुशहाल हो जाएंगे। शराब बंदी के बाद कई लोगों की जिन्दगी सुधर गई। उन्होंने सरकार का शुक्रिया और आभार भी माना, लेकिन जो अखंड पियक्कड़ थे वे खुद पर अंकुश नहीं लगा पाये। उनकी पीने की लत जस की तस बनी रही। होना तो यह चाहिए था कि शराब बंदी लागू होने के बाद पूरे बिहार प्रदेश में शराब का नामों-निशान ही नहीं रहता, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वैध शराब की दुकानों पर ताले लगते ही तस्करों ने शराब के कारोबार की कमान संभाल ली। पुलिस की नाक के नीचे शराब बनने और बिकने लगी। कहीं असली तो कहीं नकली। जहरीली शराब पीकर मौत के मुंह में समाने वालों की खबरें भी आने लगीं। इन मौतों के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा। साथ ही कई विद्वानों, बुद्धिजीवियों के बयान भी आने लगे कि सरकार कौन होती है शराब पर पाबंदी लगाने वाली? यह तो सीधे-सीधे नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर चोट है। घोर नाइंसाफी है। जो लोग वर्षों से शराब पीते चले आ रहे हैं उनसे आप यह कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वे एकाएक पीना छोड़ देंगे। शराब के पक्ष में अपने-अपने तर्क रखने वालों में ज्यादा संख्या उनकी थी, जो शराब बंदी के पक्ष में थे, लेकिन यह भी सच है कि सरकार ने शराब बंदी तो कर दी, लेकिन जगह-जगह अवैध शराब के बनने और बिकने-बिकवाने पर पूरी तरह बंदिश लगाने में असफल रही। तब भी मुख्यमंत्री महोदय का बयान आया था कि आखिर लोगों को शराब कैसे मिल जाती है? शराब बंदी कानून की समीक्षा की जाएगी। 

    जहां पर प्रशासन और माफिया मिले हुए हों वहां मुख्यमंत्री का ऐसा खोखला और बनावटी बयान गुस्सा दिलाता है। आप किसे मूर्ख बना रहे हैं सीएम साहब! आप राजनीति के चाणक्य कहलाते हैं, दूरबीन के बिना भी आपको दूर-दूर तक दिखायी देता है। आपको सब पता है। आप जानते हैं कि आपकी अधिकांश पुलिस तथा आबकारी विभाग बिका हुआ है। कुछ मंत्री भी शराब माफियाओं से रिश्वत की थैलियां पा कर खुश और संतुष्ट हैं। बड़े-बड़े शराब माफियाओं, तस्करों और असली-नकली शराब के निर्माताओं तथा धंधेबाजों को तमाम ऊंचे लोगों का पूरा संरक्षण मिला हुआ है। तभी तो जब से प्रदेश में शराब बंदी हुई है, तभी से अखंड पियक्कड़ों को शराब मिलती चली आ रही है। जहरीली शराब पीकर हर बार गरीब ही मरते हैं। अमीरों को तो उनकी मनपसंद महंगी शराब उनके घर तक पहुंचा दी जाती है। आपका शराब बंदी का कानून भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाया। अवैध, नकली और सस्ती-कच्ची शराब, शराब बंदी से पहले भी नशेड़ियों को परलोक पहुंचाती थी और आज भी जान की दुश्मन बनी हुई है। 

जब शराब की दुकानों पर कानूनन ताले लग चुके हैं तब किसी को भी पीने के लिए शराब नहीं मिलनी चाहिए। यदि मिलती है, तो यह शासन और प्रशासन की घोर विफलता है। शराब के नशे के गुलामों को कहां पता होता है कि वे शराब के नाम पर जहर पीने जा रहे हैं। यह कहर तो अचानक टूटता है। तब पियक्कड़ों की भी नींद टूटती है। जब तक कोई बड़ा धमाका नहीं होता तब तक शासन और प्रशासन भी बेफिक्र रहता है। जहरीली शराब पीकर मरने वालों की कतारें लगते ही सरकारी बंदोबस्त की दौड़ धूप शुरू हो जाती है। खेतों, खलिहानों, जंगलों, नदियों तथा तालाबों के आसपास अवैध शराब बनाने की भट्टियां नजर आने लगती हैं। नकली शराब के कारखानों का भंडाफोड़ हो जाता है। तोड़फोड़ होती भी दिखती है, लेकिन उनका क्या जिनकी जहरीली शराब पीने से मौत हो चुकी होती है? उनके परिवारों का क्या कसूर जिन्होंने सरकार की अक्षमता और लापरवाही के चलते अपने पिता, भाई चाचा आदि को हमेशा-हमेशा के लिए खो दिया। क्या अब यह भूखे मर जाएं? हाथ में कटोरा लेकर भीख मांगने को निकल पड़ें? मुख्यमंत्री महोदय अब आप ही तय करें कि आपको क्या करना है। शराब बंदी कानून को यदि सफलतापूर्वक आप लागू नहीं करवा सकते तो यह आपकी घोर असफलता का ऐसा जीवंत दस्तावेज है, जिसके पन्ने तब-तब खोले जाते रहेंगे, जब-जब विषैली शराब पीने वालों की जान और उनकी आंखों की रोशनी छिनती रहेगी और उनके परिवार वाले रोते-कलपते रहेंगे। तब-तब आपको भी कसूरवार मानकर कोसा जाता रहेगा कि कैसे अंधे मुख्यमंत्री हैं आप?

Thursday, December 15, 2022

वो रक्त से सना मंज़र

     महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में विधानभवन के निकट 23 नवंबर 1994 की शाम जिस तरह से निर्दोषों का खून बहा और उन्हें मौत की नींद मिली, उसकी मिसाल इतिहास में कम ही देखने-पढ़ने को मिलती है। सत्ताधीशों के गैरजिम्मेदाराना व्यवहार और प्रशासकीय अव्यवस्था के कारण देश का लोकतंत्र पहले भी कई बार आहत हुआ है। तब शीत सत्र के दौरान गोवारी समाज का विशाल मोर्चा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरा था। उनकी प्रमुख मांग थी कि उन्हें अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाए। सुबह से भीड़ जुटने लगी थी, शाम होते-होते तक भीड़ बहुत बढ़ चुकी थी। तभी अचानक विधानभवन से कुछ ही दूर मॉरिस कॉलेज टी प्वॉइंट पर ऐसी भगदड़ मची कि लोग इधर-उधर भागने लगे। बेतहाशा शोर-शराबा होने लगा। शांत मोर्चा अशांति की गिरफ्त में आ गया। तब शाम के लगभग छह बजे थे। बेकाबू भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पहले तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया फिर गोलीबारी की, जिसमें 114 बेकसूर लोगों की मौत हो गयी और लगभग पांच सौ लोग बुरी तरह से जख्मी हो गए। मृतकों और जख्मी होने वालों में स्त्री-पुरूष, बच्चों, युवक, युवतियों तथा वृद्ध-वृद्धाओं का समावेश था। गोवारी नेता सुधाकर गजबे के नेतृत्व में अनुसूचित जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण एवं अन्य सुविधाओं की मांग को लेकर यह विशाल मोर्चा आयोजित किया गया था। 23 नवंबर की सुबह से ही ट्रकों, बसों एवं पैदल पूरे विदर्भ से बच्चे, बूढ़े, जवान नागपुर आने शुरू हो गये थे। सभी आशान्वित थे कि वे अपनी एकजुटता दर्शाकर सरकार को यह विश्वास दिलाने में सफल होंगे कि अब गोवारी समाज को अनदेखा करना संभव नहीं है। लोकतंत्र में अपनी बात कहने का सभी को हक है और फिर यह तो शासन से एक छोटी-सी गलती सुधारने की मांग के लिए एक शांतिपूर्ण मोर्चा था। ज्ञातव्य है कि महाराष्ट्र शासन के 24 अप्रैल 1985 के जी.आर. में गोंड गोवारी के बीच में मात्र एक कामा नहीं लगने से गोवारी समाज को अनुसूचित समाज में नहीं गिना गया। शासन से कई बार इस छोटी-सी गलती को सुधारने की मांग की गयी। पर शासन ने ध्यान देना कतई जरूरी नहीं समझा। शाम पांच बजे तक गोवारी समाज के लगभग पचास हजार स्त्री-पुरुष एवं बच्चों का यह मोर्चा पूरी तरह से नियंत्रित एवं शांत था। उत्साही भोलीभाली जनता की इस विशाल भीड़ को गोवारी नेता संबोधित कर रहे थे। गोवारी नेताओं के साथ-साथ मोर्चे में शामिल भूखी प्यासी भीड़ को पूरा यकीन था कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उनकी फरियाद सुनने के लिए उन तक अवश्य पहुंचेंगे। वक्त बीतता चला जा रहा था...। मोर्चे के नेताओं ने बार-बार पुलिस अधिकारियों से निवेदन किया कि वे अपनी बात मंत्रियों तक पहुंचाना चाहते हैं, चूंकि प्रदेश के लगभग सभी मंत्रीगण विधानसभा के शीतकालीन सत्र में भाग लेने के लिए नागपुर आये हुए हैं, यदि अब भी वे हमारे बीच न आ सकें तो फिर उनके यहां होने का क्या फायदा! मंत्रियों की राह देखते-देखते थक और निराश हो चुके मोर्चे में तनाव के लक्षण दिखायी देने लगे और फिर गोवारी नेताओं का आक्रोशभरा भाषण भी प्रारंभ हो गया। तनावपूर्ण वातावरण की गंभीरता को देखकर पुलिस अधिकारियों ने अपने अंतिम प्रयास के रूप में विधानसभा भवन में चर्चाओं में व्यस्त मंत्रियों के पास खबर भेजी कि स्थिति बिगड़ रही है इसलिए एक बार आंदोलनकारियों से आकर मिल लें। पर किसी भी मंत्री के कान पर जूं तक नहीं रेंगी, जबकि आदिवासी विकास मंत्री मधुकरराव पिचड़ का दायित्व था कि वे आदिवासी भाइयों की फरियाद सुनने के लिए दौड़े चले आते। पर वे तो अपनी ही मस्ती में डूबे थे। उनके चाटुकारों ने उन्हें घेर रखा था। चुटकलेबाजी चल रही थी। मंत्री जी के कमरे में ठहाके गूंज रहे थे। लगभग साढ़े पांच बजे के आसपास नेताओं ने महिलाओं एवं बच्चों को मोर्चे के आगे लाकर खड़ा कर दिया। देखते ही देखते चार हजार से अधिक महिलाएं, छोटी लड़कियां, लड़के तथा निरीह और मासूम बच्चे मोर्चे के आगे एकत्रित हो गये। इसी बीच अचानक भीड़ में से किसी सिरफिरे ने बैरिकेट उठाकर पुलिस कर्मचारियों पर फेंक दिया। इस घटना के तुरंत बाद पुलिस और एस.आर.पी. के जवानों ने बिना कुछ विचारे लाठीचार्ज करना प्रारंभ कर दिया। लाठीचार्ज शुरू होते ही ऐसी भगदड़ मची, जैसे कोई भूचाल आ गया हो। अनियंत्रित और घबरायी भीड़ को जहां रास्ता दिखा वहां भागने लगी। इस भागदौड़ में मोर्चे के आगे एकत्रित हुए छोटे-छोटे बच्चों एवं महिलाओं का बहुत बुरा हाल हुआ। हजारों की भीड़ उन्हें कुचलते-मसलते और रौंदते हुए भागने लगी और सामने चप्पे-चप्पे पर खड़ी पुलिस की गोलियों, लाठियों की मार और भय भी मौत का भयंकर कारण बना। 

    सात बजते-बजते तक कई लाशें बिछ चुकी थीं। लगभग डेढ़ घंटे तक कई घायल कराहते रहे और अंतत: वे मौत के मुंह में समा गये। अब तो खाकी वर्दीधारी भी बेबस नज़र आ रहे थे। कुछ देर के बाद उन्होंने लाशों को जानवरों की तरह एस.टी. की बसों में भरना शुरू कर दिया। एक के ऊपर दूसरी और तीसरी लाश बेरहमी से फेंकी जाने लगी, जिनमें थोड़ी-बहुत जान बची थी, उन्होंने भी मेडिकल कॉलेज पहुंचते-पहुंचते तक दम तोड़ दिया।  23 नवंबर बुधवार की उस रात मेडिकल कॉलेज के परिसर में बिखरी लाशों को देखकर पत्थर से पत्थर दिल इंसान के भी आंसू बहने लगे थे। कई लोगों की रुलाई थमने का नाम नहीं ले रही थी। मौत भी अपनी इस दुर्गति पर छाती पीट रही थी। हजारों रोते बिलखते स्त्री, पुरुषों और बच्चों के कारण पूरा अस्पताल श्मशानघाट लग रहा था। लोग अपने सगे संबंधियों की लाशें तलाश रहे थे और इस पीड़ादायक और रोंगटे खड़े कर देनेवाले मंजर ने साक्षात नरक को नागपुर में लाकर बैठा दिया था। इसी तरह से लाशों और घायलों को नागपुर के मेयो अस्पताल भी पहुंचाया गया। मरने वालों में अधिकांश संख्या महिलाओं एवं बच्चों की थी। पुलिस प्रशासन का कहना था कि नेताओं के उकसावे में आकर मोर्चा देखते ही देखते उग्र तथा अनियंत्रित हो गया था। इसीलिए लाठीचार्ज करने को विवश होना पड़ा। अगर पुलिस लाठियां नहीं चलाती तो स्थिति और भी खतरनाक रूप धारण कर सकती थी। मोर्चे में शामिल कुछ लोगों ने पुलिस पर पथराव किया, इससे भी स्थिति बिगड़ी। किसी तरह से मौत का निवाला बनने से बच गये भुक्तभोगियों का कहना था कि अगर मोर्चे में शामिल हुए लोगों को हुल्लड़बाजी या पथराव ही करना था तो वह शाम होने का इंतजार क्यों करते! दिन भर सब कुछ शांत रहा और शाम को पुलिस लाठीचार्ज के बाद ही ये दिल दहलाने वाला खूनी मं़जर सामने आया। नागपुर में हर साल दिसंबर के महीने में सरकारी सर्कस यानी शीतकालीन सत्र का आयोजन होता है। इस सत्र को कायदे से चलना तो तीन सप्ताह तक चाहिए पर आठ-दस दिन में ही इसके तंबू उखड़ने शुरू हो जाते हैं। हर वर्ष महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में सरकार का राजधानी मुंबई से आगमन होता है। सच तो यह है कि शीत सत्र के नाम पर विधायकों, मंत्रियों, अधिकारियों और छोटे-बड़े नेताओं का ‘मेला’ लगता है। करोड़ों रुपये फूंक दिये जाते हैं और अंतत: उस विदर्भ को ठेंगा मिलता है, जिसके भले के लिए इतना बड़ा तामझाम किया जाता है। नागपुर में हर वर्ष शीतकालीन सत्र आयोजित किये जाने के पीछे भी दिलचस्प किस्सा जुड़ा हुआ है। बात उन दिनों की है, जब विदर्भ का महाराष्ट्र में विलय नहीं हुआ था। तब विदर्भ के नेताओं के परामर्श से एक समझौता हुआ था कि नागपुर को उपराजधानी बनाया जाए। नागपुर को यह सम्मान देने के पीछे कई उद्देश्य थे। विदर्भ की विभिन्न समस्याओं पर चर्चा करने और उन्हें सुलझाने के लिए हर साल छह सप्ताह का सत्र आयोजित करने का निर्णय लिया गया था, जो घटते-घटते तीन सप्ताह तक जा पहुंचा। हर साल मुख्यमंत्री, मंत्रियों, विधायकों, अफसरों और कर्मचारियों का बंबई (मुंबई) से नागपुर आगमन होता है। विधानभवन के निकट ही सभी विधायकों के लिए दो कमरों के आवास बनाये गये हैं। हर वर्ष इन आवासों की साफ-सफाई और पुतायी की जाती है। नयी चादरें, गद्दे, तकिये, कंबल खरीदे जाते हैं। कम कीमत पर शाकाहारी तथा मांसाहारी लजीज से लजीज भोजन उपलब्ध कराया जाता है। विधानभवन के बाहर संतरे, मौसम्बी के जूस के स्टॉल भी लगाये जाते हैं। सैकड़ों अस्थायी कर्मचारियों को मंत्रियों, विधायकों की सेवा में झोंक दिया जाता है।

    114 गोवारियों की शहादत और अथाह संघर्ष के बाद मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ ने गोवारी ‘आदिवासी ही होने’ का फैसला सुनाया था, लेकिन लोकशाही आघाड़ी सरकार ने उच्च न्यायालय के इस फैसले के विरोध में उच्चतम न्यायालय में चुनौती दे दी। इस पर उच्चतम न्यायालय ने मुंबई उच्च न्यायालय के आदेश रद्द करने से गोवारियों के मुंह का निवाला छीनते हुए उन्हें फिर निराशा और चिंता में डाल दिया। शहादत और संघर्ष के 28 वर्ष बीत जाने के बाद भी वे न्याय पाने की राह ताक रहे हैं। गोवारियों की शहादत के बाद कई नये और पुराने जन्मजात मतलबी नेताओं को अपनी राजनीति की दुकानें चमकाने का सुअवसर मिल गया था। मृतकों को श्रद्धांजलि देने और उनके परिजनों को और अधिक मुआवजा राशि देने की मांग वाली प्रेस विज्ञप्तियां लेकर नये-नये चेहरे भी समाचार पत्रों के कार्यालयों में पहुंचने लगे थे। यह महारथी दो-चार किलो सेब, संतरे लेकर अपने फोटोग्राफर के साथ अस्पतालों में जाते और घायलों को मुस्कराते हुए फल प्रदान करते हुए फोटो खिंचवा अखबारों के दफ्तरों में पहुंच जाते थे। अपनी फोटो के साथ विज्ञप्ति छपवाने की उनमें होड़ लग गई थी। उनके लिए लोगों की निगाह में आने और छाने का यह सुनहरा मौका था। एक बार छपे तो फिर नाम और फोटो छपवाने का उन्हें रोग लग गया। कालांतर में यह छपास रोगी खुद को नेता समझने लगे। बड़े नेताओं के आगे-पीछे घूमने लगे। जो ज्यादा चतुर-चालाक थे वे पार्षद और विधायक भी बने। जिनमें लगन थी, जनहित का सच्चा जज़्बा था वे टिके रहे। बाकी अपनी जेबें भरने के बाद गायब हो गये। संतरा नगरी में कर्मठ नेताओं की कभी कमी नहीं रही। कुछ नाम तो ऐसे हैं, जिनका वर्षों से प्रदेश और देश की राजनीति में डंका बज रहा है। हां, कुछ गोवारी नेताओं ने भी कुर्सी का सुख भोगते हुए खूब चांदी काटी। आम गोवारी आज भी ठगे से वहीं के वहीं हैं। नागपुर के जीरो मॉइल परिसर में शहीदों की याद में बनाए गए शहीद स्मारक पर प्रति वर्ष 23 नवंबर को लाखों गोवारी श्रद्धासुमन अर्पित करने के लिए आते हैं। एक बार फिर से न्याय पाने की उम्मीद, आकांक्षा और अटूट संकल्प की भावना के साथ अपने-अपने गांव लौट जाते हैं... श्रद्धांजलि देने के लिए नेताओं का भी अच्छा-खासा जमावड़ा लगता है।