हमारे देश, दुनिया और समाज में क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है और उसका लोगों पर क्या असर पड़ रहा है इसकी वास्तविक तस्वीर सिर्फ सजग पत्रकार ही नहीं प्रस्तुत करते। कवियों, शायरों, गज़लकारों को भी अन्याय, असमानता, अराजकता, बेइंसाफी और इंसानियत की हत्या, क्रोधित और आक्रोशित करती है। सच का आईना दिखाने और जागृति लाने का दायित्व जितनी शिद्दत के साथ कुछ साहित्यकार निभा रहे हैं और सतत निभाते आये हैं, इसके लिए उन्हें कई बार दंडित और अपमानित भी होना पड़ा है। कितनी अजीब और चिंतनीय हकीकत है कि आज के वक्त में अगर किसी की कीमत सबसे ज्यादा घटी है तो वह मनुष्य ही है। हर धर्म के संतों, महात्माओं, ज्ञानी-ध्यानियों को अपने-अपने धर्म के संकट में पड़ने की चिंता सता रही है। कुछ कलमकार बार-बार लिखते चले आ रहे हैं कि धर्म को विभाजन का औज़ार बनाना बंद करो। धर्म जोड़ता है, तोड़ता नहीं। इंसान पहले, बाकी सबकुछ बाद में। हमारे समय के सजग शायर राजीव रेड्डी लिखते हैं,
‘‘गीता हूं कुरआन हूं मैं,
मुझको पढ़ इंसान हूं मैं।
जिन्दा हूं सच बोलके भी,
देख के खुद हैरान हूं मैं।’’
‘‘ये सारे शहर में दहशत सी क्यों है,
यकीनन कल कोई त्यौहार होगा।’’
जिस तरह से देश और दुनिया में दहशत का माहौल बन चुका है। कब कोई पीठ पर छूरा मार दे। भाई को अपने भाई पर भरोसा नहीं। राजेश रेड्डी की चिंता निरर्थक तो नहीं। रिश्ते लहुलूहान हैं,
‘‘मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा,
बड़ों की देखकर दुनिया बड़ा होने से डरता है।’’
साहित्य, कला और चिंतन से वास्ता रखने वाला शायद ही ऐसा कोई भारतवासी होगा जिसने हिंदी गज़ल को पठनीय और सारगर्भित तस्वीर के साथ पेश करने वाले गज़लकार दुष्यंत कुमार का नाम नहीं सुना होगा। गज़ल को प्यार मोहब्बत, आशिकी दिवानगी के चक्रव्यूह से बाहर निकालने वाले दुष्यंत कुमार ने वर्षों पहले जो गज़ल लिखी थी, उसी की कुछ पंक्तियां,
‘‘हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।’’
गौरतलब है कि उपरोक्त गज़ल वर्षों पहले लिखी गई थी। इसका शब्द-शब्द आम लोगों के साथ-साथ शासकों तक भी बार-बार पहुंचता रहा, लेकिन आम आदमी की समस्याओं, पीड़ाओं, दुख दर्द तथा चिंताओं का अंत नहीं हो पाया। धनवान और...और धनपति होते चले गए, गरीबों के हाथों में भीख के कटोरे देखे जाने लगे। गरीबी, अशिक्षा, शोषण और भेदभाव का पहाड़ आकाश तक जा पहुंचा। लेकिन अधिकांश शासक अंधे और बहरे बने रहे। नेताओं की भ्रमित करने वाली नारेबाजी के स्वर और बुलंद होते चले गये। न जाने कितने शासकों, चतुर-चालाक नेताओं ने क्रांतिकारी सोच वाले दुष्यंत कुमार की पंक्तियों को बिना उनका नाम लिए दोहराया और लोगों को भरमाया।
यह सच अपनी जगह है दुष्यंत कुमार एवं अन्य नामी गज़लकारों की कुछ गज़लों का मंत्रियों, नेताओं, पत्रकारों तथा संपादकों ने अपनी बात में वजन लाने के लिए जी भरकर इस्तेमाल किया और करते हैं। मंत्री-संत्री ही नहीं, प्रधानमंत्री तक दुष्यंत कुमार एवं अन्य कुछ शायरों के शेरों के जरिए अपनी बात कहते देखे गये हैं। दरअसल, यह सिलसिला कभी टूटने वाला नहीं है, क्योंकि जब शब्दों का अभाव होता है तब जागृति का बिगुल बजाने और क्रांति का आह्वान करने के लिए कालजयी गज़लों और कविताओं को ही अपने भाषणों में सम्मानजनक जगह देनी ही पड़ती है।
‘‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।’’
‘‘हम तो दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।’’
‘‘दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे जब हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।’’
ऐसे और भी अनेकों शेर हैं जो मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र की गज़लों के अनेकों गुलदस्तों में सजे हैं। डॉ. बशीर बद्र का हाल ही में 91 वर्ष की उम्र में देहावसान हो गया। देश और दुनिया को प्यार, मोहब्बत, एकता और भाईचारे का संदेश देने वाले शायर का 1987 में मेरठ में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान भरा पूरा घर आग के हवाले कर दिया गया तो उन्होंने लिखा था कि,
‘‘लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में!’’
इस आगजनी में उनकी कई ऐतिहासिक अप्रकाशित रचनाएं, गज़लें और कविताएं हमेशा के लिए राख हो गईं! इस दिल दहलाने वाले अन्याय और जुल्म के बाद उन्हें मेरठ से डर लगने लगा। भोपाल में जैसे-तैसे उन्होंने नया घर बसाया। बशीर बद्र ने देश के बंटवारे को भी बहुत करीब से देखा था। उनके लिखे इस शेर
‘‘दुश्मनी जमकर करो,
लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो
जाएं, तो शर्मिंदा न हों।’’
को शिमला समझौते के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भुट्टो को पूरे मन से सुनाया और कहीं न कही चेताया था कि हद से ज्यादा नीचे मत गिरो। लेकिन न उन्हें अक्ल आई और ना ही उनके बाद के पाकिस्तानी शासकों की सोच बदली। अपने देश को रसातल में ले जाने के बाद भी भारत की बरबादी के सपने देखना नहीं छोड़ते।
आधुनिक उर्दू साहित्य में अभूतपूर्व योगदान के लिए पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजे गए बशीर बद्र अपने आशियाने को राख किये जाने के दर्दनाक मंजर को कभी भी भूल नहीं पाए। फिर भी हर मंच पर वो श्रोताओं को आपसी भाईचारे के सूत्र में बंधे रहने का संदेश देते रहे। लेकिन धर्म को विभाजन का औज़ार बनाने वाले कम नहीं हुए।
दु:खभरी हकीकत तो यह भी है कि कुछ सत्ताधीश और सरकारें भी भेदभाव के रास्ते पर चलती दिखायी देती हैं। ऐसे-वैसे अपराधियोंको सबक सिखाने के लिए उनके वर्षों पुराने वैध-अवैध घरों को धराशायी करने लगी हैं। पिछले चार-पांच वर्षों से उनमें बुलडोजर के प्रति कुछ ऐसा लगाव और विश्वास जागा है कि उन घरोंं को भी नेस्तनाबूत करने में देरी नहीं की जाती, जो अपराधी के माता-पिता के नाम पर हैं। उनके दादा-परदादा ने अपनी खून-पसीने की कमाई से बनाया था। मैं अक्सर सोचता हूं कि जो भी अवैध अतिक्रमण हैं, उन पर तब क्यों नहीं बुलडोजर चलाया जाता है, जब उन्हें खड़ा किया जा रहा होता है। उसके अवैध होने की खबर प्रशासन के चेहरों को तो होती ही है, लेकिन रिश्वत लेकर तब तो मुंह बंद कर लिया जाता है। जब कोई संगीन अपराध करता है तभी ही उसके घरों पर हथौड़े चलना शंकित करता है। भेदभाव और बेइंसाफी का भी आभास कराता है। ऐसे में क्या यह मान लिया जाए कि यदि अपने अवैध कब्जों को बचाए रखना हो तो जुर्म करने के बाद भी पकड़ में न आएं। किसी भी तरह से खुद को बचाये और छुपाये रखें। यह भी तो देखने में आता है कि बुलडोजर के तांडव के शिकार कुछ आरोपी कुछ साल तक जेल में रहने के बाद बाइज्जत बरी हो जाते हैं, लेकिन तब तक सरकारी तानाशाही उनकी दुनिया उजड़ चुकी होती है। खूंखार अपराधियों, हत्यारों, आदतन बलात्कारियों, जगजाहिर आतंकवादियों की अवैध इमारतें, कारखाने और दुकानें गिराये जाने का तो सभी समर्थन करते हैं लेकिन जिनके परिवार का बेटा, भतीजा, भाई अराजकता करते पकड़ा जाता है, तो उनके परिवार के साथ किसी भी तरह की बेइंसाफी नहीं होनी चाहिए। उन बेकसूरों को बेघर करने के सिलसिले सजग भारतीयों को बहुत आहत करते हैं। करे कोई और भरे कोई का यह चलन कहीं न कहीं बेहद अन्यायकारी तो है ही...।

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