Thursday, June 11, 2026

फोटो गैलरी

 अपने नाम का डंका बजवाना किसे अच्छा नहीं लगता? यह हकीकत दीगर है कि कोई अपराध कार्य कर तो कोई सद्कार्य कर चर्चा में आता है। कुछ लोगों को कुख्याति भी सुख और संतुष्टि देती है। गुजरे जमाने को जाने देते हैं। बात आज की करते हैं। सोशल मीडिया के इस अच्छे-बुरे काल ने क्या गलत और क्या सही के निर्णय को ही असमंजस में डाल दिया है। अब जिसे देखो वही वास्तविक दुनिया में कम और आभासी दुनिया में ज्यादा खोया नज़र आता है। वर्चुअल दुनिया में मिलने वाली तारीफों के समक्ष असल दुनिया के सभी रंग फीके लगते हैं। तभी तो दूर और पास के रिश्तेदारों से तो दुरियां बढ़ ही चुकी हैं। एक ही घर में रहने के बावजूद भाई-बहन, माता-पिता, चाचा-चाची और उनके बच्चे अपने-अपने मोबाइल स्क्रीन से चिपके और उलझे दिखायी देते हैं। यहां तक कि खाने की मेज पर भी अधिकांश पारिवारिक सदस्यों की निगाहें फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम, रील्स और वीडियों से हटती नहीं। वो जमाना लगभग लुप्त होता जा रहा है, जब किसी मेहमान के आगमन पर घर के बड़े-बुजुर्ग का इशारा पाते ही बच्चे सादर प्रणाम और उनकी चरणवंदना करते थे। अब तो सोशल फोबिया के रोगी बच्चे तब तक अपने कमरों में कैद रहते है जब तक मेहमान रुखसत नहीं हो जाते और मां-बाप भी कुछ नहीं कर पाते। उलटे उन्हें भी पहले की तरह अब मेहमानों का घर आना कम भाता-सुहाता है!

हाल ही किया गया एक गंभीर सर्वे बताता है कि शहर हों या गांव लगभग सभी जगहों पर पंद्रह से बीस प्रतिशत बच्चे सोशल मीडिया की जबरदस्त गिरफ्त में हैं। उन्हें मोबाइल रोगी भी कहा जा सकता है। अधिकांश बच्चे एकांत प्रेमी हो रहे हैं। किसी के सामने नहीं आते। अजनबियों से बात करने की बजाय नजरें चुराते हैं। बातचीत करते-करते उनके घबराने और हकलाने के लक्षण दर्शाते हैं कि वे अंदर से कितने भयभीत हैं। सच तो यह है कि अधिकांश युवा भी असंमजस की जकड़न में हैं। अनजानों से करीबी और उनके लाइक्स और कमेट्ंस पाने के चक्कर में अपने आसपास के लोगों से कटते युवा भी एक-दूसरे से घुलना-मिलना भूलते जा रहे हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त की है कि आज लगभग हर मोबाइल फोन एक आभासी जुए का अड्डा बन चुका है। पैसों के लिए खेले जाने वाले ऑनलाइन खेलों से तंगी, कलह और आत्महत्या जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन गई हैं। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर पैनी नज़र गढ़ाते-गढ़ाते मेरी आंखों के सामने उन बदनसीब पिताओं का गमगीन चेहरा घूमने लगा जिनकी औलादों ने क्रिकेट सट्टे और ऑनलाइन जुए में लाखों-करोड़ों रुपए लुटाकर उन्हें बर्बाद कर दिया है। उनकी अच्छी-खासी चलती दुकानोें, घरों तथा कारखानों पर ताले लग गए या हमेशा-हमेशा के लिए बंद करने और बेचने की नौबत आ चुकी है। अपने खून-पसीने की कमायी की जमापूंजी लुटने के बाद अब वे किसी को अपना मुंह दिखाने से कतराने लगे हैं, जैसे उन्होंने ही कोई गंभीर अपराध किया हो। ऐसी नालायक संतानों को जन्म देने का अपराध तो उनसे हुआ ही है। यह हम नहीं वो खुद माथा पीटते-पीटते बेहाल होकर कहते हैं। सड़कों, चौराहों, बाग-बगीचों और भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर आपकी भी उन युवकों और युवतियों पर नज़र तो पड़ती ही होगी और कुछ पल के लिए विचार भी आता होगा कि यह कैसा बेहुदा तमाशा है? हाथ में स्मार्ट फोन और कानों में ईयर बड्स ठूंसकर चलते लड़के-लड़की को कोई होश नहीं, खबर नहीं कि उनके आसपास क्या हो रहा है। कौन उन्हें कैसे घूर रहा है? उनकी अंगुलियां तो बस फोन स्क्रीन पर अठखेलियां कर रही हैं। भीड़ में जबरन खुद को अकेला करने और दिखाने वाली आज की इस पीढ़ी ने चिंतकों को गहन चिंता में डाल दिया है। शिकागो यूनिवर्सिटी के व्यवहार वैज्ञानिक निकोलस एप्ले और जुलियाना श्रोएडर के शोध के मुताबिक ऐसी आदतें बेहद खतरनाक साबित हो रही हैं।

 जो लोग अपनों तथा बेगानों के साथ सतत मेलजोल रखते हैं। बाग-बगीचों, बसों, रेलगाड़ियों, होटलों, कॉफी हाऊसों में अजनबियों से भी बातचीत करने की पहल करते हैं, वे खुद को उन लोगों की बनिस्पत अधिक खुश, संतुष्ट और सकारात्मक पाते हैं, जो उस ऑनलाइन दुनिया से बाहर ही नहीं आना चाहते, जहां हिंसा, ईर्ष्या, भेदभाव और गुस्सा भरा पड़ा है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब एक व्यक्ति को धार्मिक नगरी हरिद्वार में स्थित हर की पौड़ी पर अपनी जीवित पत्नी का पिंडदान करते देखा गया। अपनी पत्नी का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार करने वाले इस पति ने गंगा नदी के बीच में खड़े होकर पहले तो पत्नी की फूलों से सजी तस्वीर पर जी भरकर थूका, फिर उसे मृत घोषित कर दिया। इसके बाद पारंपरिक हिंदू रीति रिवाज के अनुसार पिंडदान किया। ध्यान रहे कि हमारे देश में मृतक की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करने की परंपरा है। जैसे ही वह पत्नी की तस्वीर को गंगा में बहाकर बाहर निकला तो उसने टकटकी लगाकर देखते स्त्री-पुरुषों को बताया कि उसकी बीवी आपत्तिजनक और भड़काऊ वीडियो बनाने से बाज नहीं आ रही है। मैंने उसे कई बार समझाया लेकिन वह नहीं मानी। इंस्टाग्राम पर उसकी बनाई रील्स देख-देखकर लोगों ने मेरा जीना ही हराम कर दिया है। अब मैं घरवाली का मुंह ही नहीं देखना चाहता। वैसे तो मेरे लिए  वह बहुत पहले मर चुकी थी लेकिन जगजाहिर करना भी तो जरूरी था...

 फेसबुक पर एक लड़की की खूबसूरत और आकर्षक फोटो देखते ही एक युवक उस पर दिलोजान से मर मिटा। दोनों ने एक दूसरे का मोबाइल नंबर ले लिया। उनमें घंटों चैटिंग होेने लगी। कुछ ही हफ्तों में युवक ने उससे मिलने की ठानी। अपने शहर से सैकड़ों किलोमीटर दूर कार चलाते हुए वह लड़की के शहर जा पहुंचा। पहले से निर्धारित कॉफी हाऊस पर दोनों आमने-सामने थे। लड़की को देखते ही युवक के तो होश ही उड़ गए। फेसबुक में देखी जिस लड़की पर पहली नज़र में वह फिदा हुआ था, उससे लड़की का लुक, रंग और हुलिया कतई मेल नहीं खा रहा था। दोनों में कोई बातचीत हो पाती इससे पहले ही युवक ने फौरन कार स्टार्ट की, घुमाई और वापस अपने शहर की ओर चल पड़ा। दरअसल, लड़की ने अपनी फेसबुक पर जो खूबसूरत तस्वीरें डाली थीं, वे जबरदस्त एडिटिंग, फिल्टर, फोटोशॉप और मेकअप के जादू का कमाल थीं। सच तो यह भी है कि सोशल मीडिया फेक प्रोफाइल, कैटफिशिंग, छल, कपट और धोखाधड़ी का मायावी मंच बन चुका है। हों न हों, लेकिन अच्छा और आकर्षक दिखने की चाह सर्वव्यापी है। कुछ लोग उम्रदराज होने के बाद भी बचपन और जवानी की अपनी खूबसूरत तस्वीरों के मोहपाश में जकड़े रहते हैं। उन्हें कहीं विस्मृत न कर दिया जाए यह चिंता भी उन्हें सतत सताती रहती है।

 क्या आपको पता है कि ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे मध्य एशिया के देशों में मृत व्यक्तियों की कब्र पर बड़ी-बड़ी प्रोफाइल फोटो लगाई जाती है, बिल्कुल वैसे ही जैसे फेसबुक या इंस्टाग्राम में प्रोफाइल पिक होती हैै। सबसे अधिक हैरत भरी सच्चाई यह भी है कि कुछ लोग अपनी मौत से पहले ही तय कर लेते हैं और रिश्तेदारों को भी निर्देशित कर देते हैं कि उनकी कौन सी मनपसंद फोटो कब्र पर लगानी है। इसके लिए वे नये-नये आकर्षक वस्त्र धारण कर एक से एक मूड...हाव-भाव में पोज देकर किसी सिद्धहस्त फोटोग्राफर से फोटो खिंचवाते हैं। अत्याधिक बीमार और मौत के कगार पर खड़े शख्स से परिवार के सदस्य ही पूछ लेते हैं कि वह अपनी कब्र पर कौन सी फोटो लगवाना पसंद करेगा? अपनी शक्ल-सूरत और नाम को लोगों के दिलों-दिमाग में बसाये रखने के प्रबल आकांक्षी लोग तो अपनी जवानी में ही कई फोटो तैयार करवाकर रख लेते हैं, जिन्हें उनकी कब्र पर लगाया जाता है। इन देशों में कब्र बनवाने पर भी काफी खर्चा किया जाता है। इस सृष्टि से रुखसत हो जाने के बाद भी आन-बान और शान के साथ मृतकों की यादों को संजोए यहां के कब्रिस्तान किसी फोटो गैलरी से कम नहीं लगते, जहां पर मृतक के धनवान परिजन चमकते पत्थर पर नाम, जन्म तथा मृत्यु के साथ फोटो फ्रेम करवाकर लगवाते हैं। कई कब्रों पर तो एलईडी लाइट्स भी लगाई गई हैं, ताकि रात में भी तस्वीर एकदम स्पष्ट दिखायी देती रहे। कुछ रईस परिवार बड़ी स्क्रीन लगवाकर अपनी खुशी दोगुनी कर लेते हैं। पर्यटकों को ये कब्रिस्तान किसी प्रदर्शनी का भी सुखद और मोहक आभास कराते है।

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