Thursday, July 23, 2026

आप भी सोचिए...

 देश की राजधानी दिल्ली में स्थित आदर्शनगर मजलिस पार्क मेट्रो स्टेशन के पास एक तेज रफ्तार स्कूल बस ने स्कूली बच्चों से भरे ई-रिक्शा को जोरदार टक्कर मार दी। इस भीषण हादसे में ई-रिक्शा में सवार बारह वर्षीय छात्रा प्रियांशी औंधे मुंह सड़क पर गिर गई और बस के पहिए की चपेट में आने से लहुलूहान हो गई। मासूम बच्ची सड़क पर खून से लथपथ तड़प रही थी, तब कुछ लोग उसकी जान बचाने की बजाय अपने मोबाइल से वीडियो बना रहे थे। वहीं अधिकांश लोगों को उसकी तरफ देखने की फुर्सत ही नहीं थी। उन्हें तो अपने घर, ऑफिस, दुकान जाकर काम में लग जाने की जल्दी थी। महानगरों के लोग दुर्घटनाएं देखने के अभ्यरत हो चुके हैं। उनकी मानवीय भावना-संवेदना गायब हो चुकी है। ई-रिक्शा में सवार बच्चों की प्रियांशी को अस्पताल ले जाने और किसी तरह से बचाने की मिन्नतें उनके लिए अर्थहीन थीं। दस-पंद्रह मिनट ऐसे ही गुजर जाने के बाद जिम में काम करने वाले गोविंदा नामक युवक की घायल बच्ची पर नज़र पड़ी तो उसने उसे तुरंत अपनी गोद में उठाया और भागते-भागते बाबू जगजीवनराम अस्पताल पहुंचा। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। डॉक्टर ने देखते ही उसे मृत घोषित कर दिया।

बच्ची तो चल बसी। उसकी मौत के बाद उसके परिवार में जो कोहराम मचा उसे भी आसपास के लोगों ने देखा। उन्होंने शोकाकुल माता-पिता को सांत्वना भी दी लेकिन उनका क्या, जिन्होंने हादसे के बाद घटनास्थल पर मौजूद रहने के बावजूद अपने अंदर के जिन्दा इंसान को दफना दिया, बस तमाशबीन और पत्थर दिल बने रहे। यही संवेदनहीनता समाज को कटघरे में खड़ा कर अपराधी साबित करती है। खून से लथपथ पड़े इंसान को बचाने की पहल करने की बजाय धड़ाधड़ वीडियो बनाने वाले निर्मोही और निर्लज्ज कहते हैं कि क्यों पुलिस की पूछा-पूछी और अस्पताल के चक्कर में अपना वक्त गवाएं। हमें और भी बहुतेरे काम है। हमने समाजसेवा का ठेका थोड़े ही ले रखा है।

जौनपुर में एक डॉक्टर हैं जो पिछले छह दशकों से मरीजों का मुफ्त इलाज करते चले आ रहे हैं। बीमार, लाचार और बेबसों की सुबह से ही उनके दरवाजे के बाहर लंबी कतार लग जाती है। महंगाई के इस काल में हलका सा पेट दर्द और अन्य छोटी-मोटी शारीरिक तकलीफ होने पर जहां डॉक्टर विभिन्न अंदरूनी जांच के लिए पर्चे पर पर्चे लिख कर मरीज के हजारों रुपए खर्च करवा देते हैं, वहीं 92 वर्षीय डॉ.द्विवेदी की अनुभवी, जादुई उंगलियां कलाई छूकर बीमारी का एकदम सटीक पता लगा लेती हैं। मरीज के ब्लड प्रेशर, यूरीन टेस्ट और खान-पान के इतिहास की जानकारी के आधार पर अत्यंत प्रभावी दवाएं देने वाले गरीबों के यह मसीहा केवल दवाओं की वास्तविक लागत लेने के स्वर्निर्मित कड़े नियम से बंधे हैं। 1960 के दशक में जब हमारे देश भारत में काबिल डॉक्टरों की अत्यंत कमी थी तब शिवसूरत द्विवेदी ने उत्तरप्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की। डिग्री मिलते ही उन्हें पहले वाराणसी और उसके बाद चुनार में सरकारी डॉक्टर के पद पर नियुक्ति मिल गई। चुनार तब पिछड़ा इलाका था, जहां न बिजली थी और न ही अन्य मूलभूत सुविधाओं का अता-पता था। स्थानीय डॉक्टर बिना मोटी फीस के मरीज को देखने से मना कर देते थे। सरकारी नौकरी करते-करते डॉ.द्विवेदी को किसी सगे-संबंधी से जानकारी मिली कि जौनपुर, जहां उनका जन्म हुआ, वहां पर भी गरीब लोग समुचित इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। वे शानदार सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर जौनपुर चले गए। परिवारजन तथा रिश्तेदार हतप्रभ सोचते रह गये। कैसा आदमी है जो बेहतरीन सरकारी नौकरी को लात मारकर ऐसी जगह आ गया है, जहां कोई कमाई-धमाई नहीं होने वाली है! लेकिन डॉ.द्विवेदी पर तो अपनी माटी का कर्ज चुकाने का जुनून सवार था। 

लोगों को आज भी अस्सी के दशक की वो घटना अच्छी तरह से याद है। जौनपुर के निकट स्थित गांव के एक अत्यंत गरीब मरीज को जब लोग इलाज के लिए उनके पास लाए, तो उसकी नब्ज डूब रही थी और सांसें थमने की कगार पर थीं। पूरे गांव ने उसकी मृत्यु को निश्चित मान लिया था। लेकिन डॉ.द्विवेदी ने हार नहीं मानी और उन्होंने रातभर बिना पलक झपकाए उसकी देखरेख और सेवा करते हुए पुरानी चिकित्सा पद्धतियों और अपने जादुई तजुर्बे से ऐसा इलाज किया कि सुबह होते-होते वह मरणासन्न मरीज अपने पैरों पर उठ खड़ा हो गया। पूरे इलाके में इसे किसी चमत्कार की तरह देखा गया। इस घटना के बाद उनके पास मरीजों की बाढ़ आ गई, जिसे संभालने के लिए उन्होंने अपने ही घर के कमरों को ‘नि:शुल्क अस्पताल वार्ड’ में तब्दील कर दिया। उनके मरीजों के प्रति जुड़ाव ने उन्हें देवता का दर्जा दिला दिया है। सभी बस यही चाहते हैं कि वे हमसे कभी दूर न हों। ईश्वर हमेशा उन पर मेहरबान रहें।

देश में कुछ ऐसे सरकारी अधिकारी हैं, जो अपनी ड्यूटी इस कदर ईमानदारी से निभाते हैं कि उनके समक्ष बार-बार नतमस्तक होने को जी चाहता है। महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन आयुक्त तुकाराम मुंढे भी उन्हीं फरिश्तों में शामिल हैं। किसी फिल्मी नायक की तरह अत्यंत लोकप्रिय तुकाराम मुंढे का नाम सुनते ही भ्रष्टाचारियों का पसीना छूटने लगता है। उन्हें जिस विभाग में नियुक्त किया जाता है, आंधी-तूफान की तरह वहां की गंदगी की सफाई में लग जाते हैं। उनका मानना है कि वे वातानुकूलित कमरे में कुर्सी पर बैठकर महज आर्डर देने के लिए उच्च अधिकारी नहीं बनेे हैं। महाराष्ट्र कैडर के 2005 बैच के इस आईएएस ने कभी यह नहीं देखा कि सामने वाले का कैसा रूतबा पहुंच और मान-सम्मान है। उनकी पैनी नज़र उसके नाम पर नहीं, अपराध कर्म पर रहती है, जिसका पर्दाफाश करना वे अपना एकमात्र कर्तव्य मानते हैं। बिना किसी भेदभाव के नियमों का सख्ती से पालन करवाने को कटिबद्ध तुकाराम को जहां आमजान सिंघम और रियल लाइफ का हीरो मानते हैं, वहीं नेताओं को उनकी समझौता नहीं करने की जिद हमेशा परेशान किये रहती है। बिना किसी पूर्व सूचना के कारखानों, दफ्तरों और अस्पतालों का निरीक्षण करने के लिए पहुंच जानेवाले इस कर्मवीर को मिलावटखोर और मुनाफाखोर अपना शत्रु मानते हैं। उनकी निर्भीक कार्यशैली ने उन्हें ईनाम कम और तबादले ज्यादा दिलवाये हैं। 21 साल के करियर में लगभग 25 स्थानांतरण ईनाम के तौर पर उनके हिस्से में आ चुके हैं। 2026 के मई महीने में मुंढे को महाराष्ट्र के अन्न और औषधि प्रशासन का जैसे ही कमिश्नर नियुक्त किया गया, उन्होंने मिलावटखोरों की नींद हराम कर दी। अवैध खाद्य और औषधि निर्माताओं और विभिन्न माफियाओं के यहां छापामारी के साथ-साथ वर्षों से स्थापित मिठाई बनाने वाली फैक्ट्रियों, रेस्तरां आदि का एकाएक निरीक्षण और पर्दाफाश कर लोगों की आंखें खोल दीं कि किस तरह से उनके जीवन के साथ धनपशु खिलवाड़ कर रहे हैं। उन्हें सिंथेटिक दूध, नकली पनीर, गुटखा-तंबाखू और नकली दवाइयों के जरिए खोखला और बीमार बनाया जा रहा है। ध्यान रहे कि नकली दवाएं बनाने, खाद्य पदार्थों में मिलावट करने, प्रतिबंधित गुटखा-तंबाखू बनाने और बेचने-बिकवाने वाले एक ही दिन में आसानी से पैदा नहीं होते। उन्हें भ्रष्ट अफसरों का भी साथ और सहयोग मिलता है, तभी उनकी जड़ें मजबूत होती चली जाती हैं और फिर देखते ही देखते चोर-चोर मौसेरे भाई बन जाते हैं। मुंढे जैसे उसूलों के पक्के ईमानदार अधिकारी के छापों से अवैध धंधेबाजों, मिलावट माफियाओं आदि की कमाई पर तो चोट पड़ती ही है, वहीं रिश्वतखोर अधिकारियों और कर्मचारियों की आवक पर भी लगाम लग जाती है। यही कारण है कि तुकाराम मुंढे जहां भी जाते हैं, वहां उनके नीचे कार्यरत अधिकांश अधिकारी उनसे नाखुश रहते हैं और ईश्वर से उनके स्थानांतरण की प्रार्थना के साथ-साथ अपने खास नेताओं, विधायकों, मंत्रियों के दरबार में थैलियां लेकर इस फरियाद के साथ पहुंच जाते हैं कि कृपया, इनसे शीघ्र मुक्ति दिलाओ। यह जब तक डटे रहेंगे तब तक हमारी ऊपरी कमाई बंद रहेगी तो ऐसे में हम आपकी सेवा कैसे कर पायेंगे! यह हकीकत भी काबिलेगौर है कि जैसे ही तेज तर्रार, कड़क छवि वाले तुकाराम मुंढे ने अन्न व औषधि प्रशासन की कमान संभाली है तो उनके नीचे कार्यरत कुछ पुराने बदनाम ‘वसूली’ करने वाले अधिकारी साहब के नाम के डंडे का खौफ दिखाते हुए पहले से भी अधिक ‘मोटी वसूली’ करने लगे हैं। यह भी सच है कि सत्ताधीशों के साथ और सहयोग के बिना ‘वसूली सिंडिकेट’ इतनी हिम्मत नहीं कर सकता। इस कर्तव्यपरायण आदर्श अधिकारी का जब-जब कहीं से तबादला होता है तब-तबवहां की आम जनता उनके तबादले के विरोध में सड़कों पर उतर आती है। मजबूरन नम आंखों से विदा करती तो है लेकिन दिल और दिमाग में बड़े आदर के साथ हमेशा बसाये रखती है।

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