Thursday, August 20, 2026

सांप और सपेरे

 जनहित के लिए शासन के द्वारा अनेकों योजनाएं चलायी जाती हैं, लेकिन कुछ नेता, मंत्री, भ्रष्टाचारी प्रशासनिक अधिकारी, कर्मचारी अपनी करतूतों से बाज नहीं आते। सरकार की सारी मेहनत को अपने लालच की भेंट चढ़ा देते हैं। बहुत कम होता है जब अखबारों तथा न्यूज चैनलों में राजनीतिज्ञों तथा ऊंचे ओहदों पर विराजमान अफसरों के बेलगाम भ्रष्टाचार की खबरें धमाचौकड़ी न मचाती दिखाई देती हों। ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ की कहावत को निर्लज्जता से साकार करते यह ऐसे बेरहम कफन चोर लुटेरे हैं, जिनमें किंचित भी इंसानियत नहीं बची। इनका ज़मीर पूरी तरह से मर-खप चुका है। महाराष्ट्र सरकार ने नवजात शिशुओं को कुपोषण से मुक्त तथा स्वस्थ रखने के उद्देश्य से कई योजनाएं बनायी हैं।

उन्हीं में से ही एक सुविधाजनक योजना है, जिसके अंतर्गत सरकार ने कामकाजी तथा यात्रा करने वाली माताओं को सार्वजनिक स्थानों पर अत्यंत सुरक्षित, स्वच्छ और एकांत स्थान प्रदान कराने के उद्देश्य से ‘हिरकणी कक्ष’ अर्थात स्तनपान कक्ष निर्मित करवाने का निश्चय किया, जहां माताएं सुरक्षित तरीके से नवजातों को स्तनपान करा सकें या भविष्य के उपयोग के लिए स्तन के दूध को निकालकर संग्रहित कर सकें। मातृ एवं शिशु संरक्षण की इस सरकारी योजना को एक क्रांतिकारी कदम मानते हुए सभी ने सराहना की थी लेकिन जन्मजात भ्रष्टाचारियों ने इस पवित्र सेवा कार्य में भी घोर बेइमानी कर शैतान होने का पक्का सबूत दे दिया। महाराष्ट्र में स्थित गोंदिया जिले में 18 स्थानों पर हिरकणी कक्ष स्थापित करने का निर्णय लिया गया। इन कक्षों में माताओं को किसी तरह की असुविधा न हो, इसी उद्देश्य से बेहतरीन साज-सज्जा के साथ आरामदायक सुविधाएं प्रदान करने क निर्णय लिया गया। लेकिन यहां भी भ्रष्टाचार की बेखौफ होकर परंपरा निभायी गई। अनाड़ी से अनाड़ी आदमी को भी पता है कि प्लास्टिक की अच्छी से अच्छी कुर्सी हजार, डेढ़ हजार में आ जाती है लेकिन सरकारी ठगों ने एक कुर्सी की खरीदी की कीमत चौंतीस हजार, लोहे के तीन से पांच हजार रुपए में मिलने वाले पलंग पंद्रह हजार, चार-पांच हजार की कीमत वाले वॉशबेसिन नब्बे हजार तो बीस से पच्चीस हजार में आसानी से मिलने वाले वातानुकूलित यंत्र का एक लाख रुपये का बोगस खरीदी मूल्य दर्शाया। इतना ही नहीं कॉटन के पर्दों, टीवी, बच्चों के खिलौनों आदि की भी कई गुणा अधिक कीमत दर्शा कर जो महाघोटाला किया, उससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि  प्रशासनिक क्षेत्र में कितनीऔर कैसी-कैसी धांधली और लूटमार मची है।

महाराष्ट्र के गड़चिरोली जिले में स्थित जपतलाई गांव में स्थित एक आदिवासी स्कूल में बिस्तर न होने के कारण ज़मीन पर सो रही छह छात्राओं को सांप ने काट लिया। तीन छात्राओं की मौत हो गई और तीन को गंभीर हालत में इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाया गया। सरकारी सहायता प्राप्त इस आवासीय स्कूल को कांग्रेस के नेता द्वारा चलाया जा रहा था। जब यह घटना घटी तब वहां पर कोई वॉर्डन मौजूद नहीं था। उस दिन सुबह ही ‘विश्व आदिवासी दिवस’ मनाया गया था और रात को यह जानलेवा कांड हो गया। छात्राओं की मौत के बाद प्रशासन नींद से जागा। लीपापोती भी शुरू हो गई। अभिभावक सांपों के खौफ से अपने बच्चों को घर लेकर चले गये। मात्र छह छात्र ही बचे रह गये। यह स्कूल 1992 में प्रारंभ हुआ था। लगभग ढाई सौ विद्यार्थियों वाले इस स्कूल के सभी बच्चे-बच्चियों के सोने के लिए पलंग का इंतजाम करना जरूरी नहीं समझा गया। स्कूल के एक शिक्षक ने मुंह खोला कि प्रिंसिपल महोदय के समक्ष उन्होंने इस समस्या को उठाया था लेकिन वे आनाकानी करते रहे। वैसे भी नेताजी का स्कूल होने के कारण वे बेफिक्र और मदमस्थ थे। नियमों का पालन करने की तरफ उनका ध्यान ही नहीं था। उन्हें तो बस सरकारी अनुदान की मोटी राशि को खाने-पचाने की जल्दी थी। रात को भी कमरे की खिड़की खुली रहती थी और इसी खिड़की से ही सांप अंदर आया। इससे पहले भी सरकारी आश्रम शालाओंं तथा अनुदान प्राप्त स्कूलों में सांप के काटने से कई छात्र-छात्राओं की मृत्यु हो चुकी है। लेकिन घटना से सबक लेने की पहल नहीं की गई और यह हत्याएं हो गईं। हां यह हत्याएं ही हैं। यदि संपन्न परिवारों के बच्चे ऐसी मौत मरें तो आसमान पर सिर पर उठा लिया जाता है। यह तो गरीब आदिवासियों के बच्चे हैं। गंभीर बीमारियों तथा चिकित्सा के अभाव में अनेकों बच्चे मारे जा चुके हैं। इनका किसी के लिए कोई मोल नहीं। सरकार ने हर बार की तरह मृत छात्राओं के परिवारों को पांच-पांच लाख रुपए की आर्थिक सहायता तथा मुख्यमंत्री राहत कोष से भी इतनी ही राशि देकर यह मान लिया कि उनकी पीड़ा का अंत हो गया, समस्या टल गई, लेकिन क्या यह संभव है? अब तो यह सवाल ही बेमानी है कि आदिवासियों के विकास के लिए सरकारें आश्रमशालाओं, अस्पतालों के लिए जो करोड़ों रुपये का अनुदान देती हैं, वह पैसा आखिर जाता कहा है? यह भी काबिलेगौर है कि इंसानी सांपों की दुष्टता, नीचता, भेदभाव और मारने-काटने की वजह से भी कई आदिवासी बच्चे खुदकुशी करने तक को मजबूर हो चुके हैं। कइयों ने तो बीच में ही पढ़ाई छोड़ी और अपने-अपने घर चल दिए। गरीब मां-बाप ने भी अपनी संतानों को असुरक्षा और अव्यवस्था के चंगुल से बाहर निकाल कर अनपढ़ रखने में ही भलाई समझी। सरकार तो यह मानकर चलती है कि राजनेता, मंत्री, समाजसेवक आदि जब आदिवासी इलाके में आश्रमशाला और अस्पताल चला रहे हैं तो ईमानदारी से अपना फर्ज निभायेंगे। वह तो अनुदान यानी आर्थिक सहायता करने में भी कोई कमी नहीं करती लेकिन भ्रष्टाचारी सांप और सपेरे-लुटेरे अपनी फितरत से बाज नहीं आते।  जब भी ऐसा कोई हत्याकांड सामने आता है तो राजनीति भी शुरू हो जाती है। पक्ष और विपक्ष के शातिर नेता अपने-अपने आदमी की पैरवी पर उतर आते हैं। कुछ भी समझ में नहीं आता है। यहां तो न्यायाधीशों तक के चेहरों पर शर्मनाक कालिख पुती है। दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आधिकारिक निवास, 30 तुगलक क्रीसेंट, नई दिल्ली के स्टोर रूम में 14 मार्च, 2025 की रात आग लगने के पश्चात जब दमकल विभाग के कर्मचारी पहुंचे तो उन्हें स्टोर रुम में बोरियों में भरे 500-500 रुपये के नोट मिले, जिनमें से काफी नोट जल गए थे। सोशल मीडिया पर धड़ाधड़ वायरल हुए वीडियो में भी बड़ी मात्रा में अधजली भारतीय करंसी नोट दिखायी दे रही थी, लेकिन भारत के इस महान न्यायाधीश ने एक स्वर में तन कर कहा कि इन बोरों में भरे करोड़ों रुपयों से मेरा कोई वास्ता नहीं! अखबारों, न्यूज चैनलों तथा सोशल मीडिया पर ‘दागी’ साहब बहादुर कई हफ्ते तक छाये रहे लेकिन क्या मजाल कि सच उगल देते। उन्हें लगा था मामला रफा-दफा हो जायेगा। कुछ महीनों के बाद लोग भूल-भाल जाएंगे, लेकिन सजग भारतवासी अड़ गये कि गहन जांच कर सच सामने लाया ही जाना चाहिए। अंतत: तीन न्यायाधीशों का एक जांच पैनल गठित किया गया, जिसने अनेकों प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही तथा अन्य जानकारियों के आधार पर यही निष्कर्ष पेश किया कि जज यशवंत वर्मा गुनहगार है। कानून तो कहता है कि, ऐसे अपराधी के साथ नरमी नहीं बरती जानी चाहिए। उसे कड़ी से कड़ी सज़ा मिलनी ही चाहिए। न्याय की कुर्सी पर विराजमान होने वाले सम्मानित शख्स के यहां नोटों से भरे बोरे रखे हों और उसको पता ही न हो, यह कैसे हो सकता है? अभी तक तो हम देखते और सुनते आये थे कि रिश्वत लिफाफों तथा अटैचियों में ली जाती है, लेकिन अब बोरों में भर-भरकर ली जाने लगी है! वो भी उस देश में जहां गरीबी, बदहाली, बेरोजगारी से करोड़ों देशवासी हैरान परेशान हैं। छात्रों को आंदोलन के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। अब देश के युवा पूरी तरह जाग गये हैं। उनकी समझ में आ गया है कि, व्यवस्था में कैसी धांधली चल रही है। नेताओं, अफसरों ने अपने बच्चों के हित को हमेशा प्राथमिकता दी है। गरीबों के बच्चों के लिए शिक्षा की सुविधा का घोर अभाव है। लाखों रुपये की फीस और डोनेशन होने के कारण उनके लिए डॉक्टर, इंजीनियर बनना आसमान से तारे तोड़कर लाने जैसा है। उनके लिए सरकारी नौकरियों के दरवाजे बंद हैं। किसे नौकरी देनी है, यह लगभग पहले से ही तय हो जाता है। सरकारी धन के लुटेरे अपने बच्चों की सुख-सुविधाओं का पूरा ध्यान रखते हैं, उन्हें लाखों-करोड़ों का खर्च कर देश के बाहर पढ़ाते हैं। इन मतलब परस्तों को कितना भी कोसा और लताड़ा जाए, गालियां दी जाएं, लेख लिखे जाएं, कोई फर्क नहीं पड़ता। बेशर्मों की चमड़ी बहुत मोटी है...

आप और हम भी बहुत गंभीरता से चिंतन मनन करें कि कोई अपराधी न्याय का पक्षधर कैसे हो सकता है? अपराधी तो अपराधी से दोस्ती निभाएगा। उसी का साथ देगा। पहले भी कुछ न्यायाधीश अपराध कर्म में लिप्त पाये गये हैं लेकिन उनका बाल भी बांका नहीं हुआ है। उल्टे पुरस्कारों से नवाजा गया है। दरअसल जिस तरह से अच्छी-खासी इमारत को दीमक अंदर ही अंदर खोखला कर देते हैं, वैसे ही नेताओं, मंत्रियों, उद्योगपतियों, अफसरों  की भ्रष्ट मंडली विभिन्न सरकारी योजनाओं के करोड़ों-अरबों रुपये अपनी तिजोरियों के अंदर कर  चुकी है, सतत कर रही है। धोखे से काटने और जान लेने वाले सांप तो फिर भी नज़र आ जाते हैं, लेकिन दूर बैठे सपेरे पर्दे के पीछे छिपे रहते हैं। यही सपेरे ही बीन बजाकर सांपों को नचाते और किसको कैसे और कब डसना है बताते और समझाते हैं... 

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