Thursday, August 13, 2026

आत्म मंथन

 कहने को तो लघुकथा के मायने हैं, छोटी कहानी। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि छोटी कथा में लेखक अपनी पूरी बात कैसे रख सकता है। निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए तो बहुतेरा शब्दजाल भी बुनना पड़ता है? इसका उत्तर देती हैं ऐसी कई लघुकथाएं, जिनमें विस्तार, फैलाव और इधर-उधर की बातों में बिना उलझे मानव के जीवन में समय-समय पर सर उठाकर खड़े हो जाने वाले अवरोधों, पीड़ा, चिंताओं और तनावों के गहरे सत्य की अत्यंत प्रभावी तस्वीर पेश की गई है। 

लघु कथा लेखन में वर्षों से लगे एक प्राध्यापक साहित्यकार का मानना है कि लघुकथा लिखने में अनेकों चुनौतियां होती हैं। बहुत कम स्पेस में बहुत कुछ कहना होता है। इन दोनों के समीकरण को साध लेने का ही परिणाम होती है, पूर्णता प्राप्त लघु कथा। आकार में छोटी लेकिन अत्यंत असरकारी  लघुकथाओं को पढ़ते-पढ़ते पाठक लेखक की पैनी निगाह और यथार्थ को व्यक्त करने के अंदाज से हतप्रभ होने के साथ चौकन्ना भी होता चला जाता है। हमारे देश में इनदिनों सत्ता और राजनीति की तरह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी कटघरे में है। अधिकांश न्यूज चैनलों से सजग भारतीयों ने इसलिए दूरी बना ली है, क्यूंकि उनमें सार्थक खबरों को अहमियत ही नहीं दी जाती। वैसे तो इसके कई कारण है। लेकिन गजेंद्र रावत की लिखी लघुकथा ‘कवरेज’ को पढ़ते ही काफी हद तक जवाब तो मिल ही जाता है, 

‘‘सुबह से करते-करते बारह बजे उसका नंबर आया। अब वो एक टी.वी. चैनल के वातानुकूलित ऑफिस में इंटरव्यू बोर्ड के समक्ष बैठा हुआ था। बोर्ड के एक सदस्य ने धीरे से कहा, ‘‘पढ़ाई तो ठीक-ठाक है मगर अनुभव है क्या?’’ ‘‘जी हां, मैं पिछले पांच साल से एक ग्लोबल टी.वी. चैनल में संवाददाता था।’’ ‘‘ग्लोबल चैनल! तो फिर जॉब क्यों छोड़ी?’’ बोर्ड के दूसरे सदस्य ने आश्चर्य से पूछा। ‘‘दरअसल, एक सड़क दुर्घटना की कवरेज के लिए मुझे भेजा गया था, लेकिन सड़क पर बुरी तरह घायल नौजवान का तड़पना मुझसे नहीं देखा गया...और घटनास्थल की कवरेज के बजाय मैंने उसे अस्पताल पहुंचा दिया। इस प्रकार मुझ पर आरोप लगा कि मैंने एक सनसनीखेज़ ख़बर का सत्यानाश कर दिया। लिहाजा मुझे चैनल से निकाल दिया गया।’’ उसने बड़े ही भोलेपन से अपनी बात रख दी।

‘‘ठीक है, आप जा सकते हैं, आपको हफ्ते के भीतर सूचित कर दिया जाएगा।’’ बीच की बड़ी कुर्सी पर बैठा चेयरमैन बोला। दो दिन बाद उसके फोन पर मैसेज़ था-फिलहाल आपको यह जॉब नहीं दी जाती, भविष्य के लिए शुभकामनाओं सहित-चेयरमैन। 

लोग सच का सामना करने से कैसे घबराते हैं और आहत हो जाते हैं इसका चित्रण लेखिका सीमा जैन ने अपनी लघुकथा ‘कुछ नया’ में बखूबी किया है...

‘‘घर में घुसते ही पति ने कुर्ता उतारकर फेंका और चीखते हुए बोले-क्या ज़रूरत थी घर की बात बाहर बताने की, सच बोलकर क्या मिल गया तुझे?’’ मैंने ठंडी आवाज़ में कहा-‘‘झूठ के नुकसान आप नहीं समझ पायेंगे।’’ ‘‘ज्ञानी तो, तुम हो ही चुकी हो! किचन क्वीन जो बन गई हो, दिमाग घूम गया था तुम्हारा। टी.वी. पर जब पूरा देश देखे, तो पैर ज़मीन पर हो ही नहीं सकते हैं।’’‘‘इसमें घमंड जैसी कोई बात नहीं है, बस एक गलतफहमी दूर करना ज़रूरी था।’’ ‘‘यही कि तुम बहुत दुखियारी औरत हो।’’ ‘‘बिल्कुल नहीं, कुछ दुखियारी औरतों को ये कहना ज़रूरी था कि पति की मार खाकर, सास के ताने और जुल्म सहकर भी अपने हुनर के बल पर यहां तक पहुंचा जा सकता है।’’ ‘‘पूरी दुनिया के सामने मेरा और मेरी मां का अपमान करके मिल गई शांति? ’’ ‘‘मेरी तरह घुट-घुटकर जीने वाली हर औरत को शक्ति मिलेगी ये सुनकर कि हर औरत का साथ उसका पति नहीं कभी-कभी दु:ख भी देता है।’’ ‘‘घर में तो कभी ढंग का खाना बनाया नहीं, कभी नमक कम तो कभी शक्कर ज्यादा...’’ ‘‘ये इसी बात का जवाब था जो मुझे रोज़ सुनना पड़ता था। कुछ नया और ढंग का खाना बनाना मुझे नहीं आता है, तो आज मैंने ढंग के खाने का खिताब जीता साथ ही कुछ नया भी कर डाला, जो फोटो खिंचवाने के बाद कोई बताना पसन्द नहीं करता मैंने आज वो सबको बता दिया।’’

विख्यात व्यंग्यकार, उपन्यास लेखक डॉ. महेंद्र कुमार ठाकुर की व्यंग्य और हकीकत में रची-बसी लघुकथाओं को पढ़ने के बाद पाठक उन्हें भूल नहीं पाते। ठाकुर विक्रयकर विभाग में उच्च अधिकारी रहे हैं। उनकी लिखी कई लघुकथाओं का मंचन भी हो चुका है। ज्योतिष के क्षेत्र में भी दबदबा रखने वाले लेखक की ‘अफसर’ लघुकथा उनके साहस और यथार्थ लेखन की परिचायक है, 

वह पूरे अफसर थे, एकदम कड़क, रौबदार, उनकी आवाज में ही नहीं, चाल और हाव-भाव में भी अफसरी थी। उनका हर अंदाज एक अफसर का था। उन्हें अपनी कार में चढ़ना होता तो चमचा दरवाजा खोलता, ‘आइए सर, बैठिए’। वह जहां पहुंचते एक चमचा कार का दरवाजा खोलता, ‘नमस्कार सर, आइए।’ उन्हें हस्ताक्षर करना होता तो एक चमचा पेन खोलकर उनके हाथों में देता, ‘सर, लिजिए।’ एक चमचा फाइलें खोलकर दिखलाता, ‘‘सर यहा करने हैं हस्ताक्षर।’’ उनके हस्ताक्षर होते ही एक चमचा फाइलें वहां से हटाता जाता। सिगरेट पीनी हो तो एक चमचा पैकेट खोलकर उनके सामने कर देता, ‘‘सर ये रही सिगरेट, आपके पसंदीदा मारका की है।’’ दूसरा चमचा लाइटर चलाकर उनके मुंह के पास कर देता। वह उसके लाइटर से मुंह में रखी सिगरेट जलाते। एक दिन दोपहर को कार्यालय में फोन की घंटी बजी। उनके पी.ए. ने रिसिवर उठाया, ‘‘सर दिल्ली से छोटे भाई साहब का फोन है, लीजिए।’’ ‘‘हां, हैलो।’’, ‘‘हां भैया, मां का देहांत हो गया है।’’ उधर, से आवाज आई, ‘‘ठीक है, डेड बॉडी यहां भिजवाने की व्यवस्था करो। कार्यक्रम यही होगा। मेरे पास वहां आने का वक्त नहीं है।’’ अफसर ने कहा। 

श्मशान घाट पर भी अफसर अपनी पूरी शान में हैं। चिता के चारों ओर फेरे लग रहे हैं। जलती लकड़ी लेकर उनका सबसे खास चमचा उनके थोड़ा पीछे रहकर फेरे लगा रहा है। वे मायूस और गंभीर मुद्रा में अपनी मां की मृतदेह की परिक्रमा कर रहे हैं। उदास हैं, दुखी हैं, आंसू तक नहीं आ सकते थे। परिक्रमा पूरी हो चुकी है। पंडित की आवाज आई, ‘‘अब चिता को अग्नि दे दो।’’ चमचे  जलती लकड़ी उनके हाथ में दे दी, ‘‘लीजिए सर, चमचे ने उनके हाथों को सहारा देकर जलती लकड़ी का जलता हिस्सा मां के मुख तक पहुंचाया। चिता के लपटे फैल रही थी। चिता को अग्नि देकर उसे उन्होंने पुन: चमचे के हाथों में दे दिया। मां की मृतदेह अग्नि को समर्पित हो चुकी थी। उनका अफसरी अंदाज शान से अब भी मौजूद था। उनकी आंखों में आंसू नहीं आ सकते थे। वे अफसर थे। हां, उनके अधीनस्थ जरूर फूट-फूटकर रो रहे थे।’’

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