Thursday, September 24, 2026

असंभव-संभव

 कुछ लोगों को चुप रहना नहीं आता। खुद तो कुछ करते-धरते नहीं, दूसरों को ही बस उपदेश देते हुए उन्हें भयभीत करते रहते हैं। जबरन की राय और तानों की विषैली बरसात से हैरान-परेशान करने वालों से यदि सफलता पाने वाले चेहरे घबराकर ठहर जाते तो यकीनन विघ्न संतोषियों की जीत हो जाती, ऐसे में असफलता का मलाल जीवनभर उनका पीछा करता रहता। देश की पहली महिला फायर फाइटर बनी हर्षिणी तो कहती हैं कि तानों ने उनके हौसले का और और मजबूती दी। जब उन्होंने नागपुर में स्थित फायर सर्विसेज कॉलेज में पहला कदम रखा तो लड़के चौंक गए। कुछ लड़कों ने उन्हें रोककर कहा कि यह जगह तुम्हारे लिए नहीं है। यहां सिर्फ लड़के ही पढ़ते हैं। रिस्की काम तो वही कर सकते हैं। लड़कियों को तो आसान कार्य करने के लिए ऊपर वाले ने धरती पर भेजा है। हर्षिणी को लड़कों की यह बात बहुत चुभी। हर्षिणी में तभी दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह परंपरा को तोड़ते हुए सच्ची योद्धा बनकर दिखायेगी। कुछ अड़चने आईं लेकिन अंतत: उन्हें एडमिशन मिल गया। जैसे ही क्लास शुरू हुई तो उन्हें देखने के लिए पूरा ब्वाइज हॉस्टल जमा हो गया। उन्हें लगा था कि लड़की असहज होते हुए अपना निर्णय बदल लेगी। ट्रेनिंग के दौरान भारी सामान के साथ दौड़ लगानी होती तो लड़के पलटकर देखते कि वह गिरी है या नहीं। उन्हें हर्षिणी के गिरने-फिसलने का बेसब्री से इंतजार रहता। हर्षिणी ने साढ़े तीन साल कड़ी ट्रेनिंग के दौरान एक भी छुट्टी नहीं ली, जबकि लड़कों के साथ उलटा था। जब तब छुट्टी लेते रहते थे। हर्षिणी की मेहनत रंग लाई उन्हें ओएनजीसी में फायर फाइटर पद की नौकरी भी मिल गई। पहली पोस्टिंग गुजरात के मेहसाणा में हुई। हर्षिणी वर्तमान में कोलकाता में डीजीएम फायर सेफ्टी के पद पर कार्यरत हैं। घर से बाहर निकलकर काम कर रही महिलाओं के लिए उनका संदेश है कि अपने महिला होने को कभी भी ढाल न बनाएं। मैं अकेली कैसे करूंगी, कैसे जाऊंगी, घरवालों को कैसे मनाऊंगी आदि बातों को अपने करियर की ग्रोथ की राह में किसी भी हालत में आड़े न आने दें। 

देश की पहली लाइन वुमन बब्बुरी सिरीशा ने जब दसवीं के बाद अपने मामा की सलाह पर आईटीआई में इलेक्ट्रिकल ट्रेड चुना तो उनसे कहा गया कि कोई और आसान सी राह पकड़ लो। क्लास में 27 लड़के हैं, अकेली लड़की हो। तुम्हें परेशान करके रख देंगे। इतना ही नहीं दो साल की पढ़ाई के बाद परीक्षा से पहले फरमान सुनाया गया कि तुम एलिजिबल यानी सक्षम नहीं हो। यह तो पुरुषों का क्षेत्र है। बब्बुरी की तो जिद थी कि उन्हें डटे रहना है। वे अदालत पहुंची केस किया, तीन साल तक लड़ाई चली। 18 फीट के खंभे पर फुर्ती से चढ़कर दिखाया। तब कहीं जाकर परीक्षा की अनुमति मिली। फिजिकल टेस्ट के लिए सिरीशा रोज एक्सरसाइज और खंभे पर चढ़ने की प्रैक्टिस करतीं। लोग घूरते, सवाल करते, पर वे कहती, ‘अपने काम पर ध्यान दो। मेरे हौसले को कमजोर करना तुम लोगों की बस की बात नहीं।’ टेस्ट चार तरह के खंभों पर था, उन्होंने रफ पोल पर अभ्यास किया था। एक दिन पहले पता चला कि सेंटर पर स्मूथ पोल है। घबराहट हुई, फिर संभली और टेस्ट पास किया। 2022 में सिरीशा ने बतौर लाइन वर्कर जॉइन किया। कंपनी में उनसे पहले कोई महिला इस पद पर नहीं थी। फील्ड में जातीं तो लोग पूछते कि आप सच में लाइन वर्कर हो? फिलहाल उनके पास ऑफिस वर्क है। लेकिन अगले ट्रांसफर में फील्ड में जाना चाहती है।

अजय कुमार रस्तोगी सरकारी कॉलेज में पच्चीस साल तक लेक्चरर की नौकरी करने के बाद रिटायर हुए तो उलझन के शिकार हो गये। क्या करें, कहां जाएं? बच्चे विदेश में हैं। बीवी रहीं नहीं। अकेले रहने के अलावा कोई और चारा नहीं था। एक रात लिमिट से ज्यादा शराब पीकर घर लौट रहे थे तो पुलिस के लपेटे में आ गए। सारी रात पुलिस स्टेशन बैठना पड़ा। वहीं उन्हें अपनी मां की याद हो गई जिन्हें उन्होंने वर्षों पहले अपने पास रखने की बजाय वृद्धाश्रम में रखना बेहतर समझा था। कई सालों से अपनी जननी से मिलने का समय ही नहीं निकाल पाये थे। पुलिस थाने में उन्हें काफी शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ा। जब खाकी वर्दीधारियों को पता चला कि महाशय कॉलेज में पढ़ा चुके हैं तो उन्होंने उनका खूब मजाक उड़ाया। रस्तोगी शर्म के मारे पानी-पानी हो गये। उन्होंने वहीं बैठे-बैठे अब शराब नहीं पीने की कसम खा ली। कोर्ट-कचहरी के चक्कर से बचने के लिए दरोगा की जेब गर्म की और सीधे मां को लेने वृद्धाश्रम चल दिये। तब तक उनकी माताश्री 87 वर्ष की हो चुकी थीं। रस्तोगी ने सब कुछ भूलभालकर अपनी उम्रदराज माताजी की तन्मयता से सेवा करनी प्रारंभ करते हुए अपना अधिक से अधिक समय उनके साथ व्यतीत करना प्रारंभ कर दिया। उन्हें बार-बार खुद पर गुस्सा भी आता कि अपनी संकीर्ण सोच और स्वार्थ की वजह से अपनी मां को अपने पास नहीं रख पाये। बेचारी वृद्धाश्रम में ही बूढ़ी हो गईं। अच्छे-भले बेटे के होने के बावजूद उन पर क्या गुजरी होगी? छह साल तक उन्होंने तन-मन-धन से मां की देखरेख की। उनकी बची-खुची चाहतों को पूरा किया। इधर-उधर घुमाया फिराया। वर्षों तक बेटे से दूर रहीं उम्रदराज मां ने अपने बेटे को भरपूर आशीषें दीं और छह साल बाद यानी 93 की उम्र में दुनिया से विदा हो गईं। रस्तोगी साहब को झटका लगा। मां के चल देने से एक अजीब से खालीपन ने फिर उन्हें घेर लिया। ऐसे में उनको याद आया कि बचपन में कभी उनकी लेखक बनने की प्रबल इच्छा थी, जो नौकरी और घर परिवार चलाने की जद्दोजहद में ठंडे बस्ते में चली गई। इसके बाद उन्होंने लेखन प्रारंभ कर दिया। आठ-दस वर्षों में कहानी, कविता और व्यंग्य की रचनाओं के दस संग्रह प्रकाशित हो गये। साहित्य जगत में डंका बजने लगा। उनकी दो कृतियां राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर पुरस्कृत भी हो चुकी हैं। अब तो उन्होंने अपने घर के बाहर एक अलमारी बनवा कर लाइब्रेरी भी बना दी है, जहां विभिन्न विषयों की सैकड़ों किताबें उपलब्ध है। पढ़ने-लिखने के शौकीन लड़के-लड़कियां, बुजुर्ग बिना किसी झिझक के लाइब्रेरी में आते हैं और अपनी मनपसंद किताब को खोलकर पढ़ने बैठ जाते हैं। अजय कुमार रस्तोगी का भी बचपन का शौक पूरा हो गया है और अब उनका समय भी बड़ी आसानी से कट रहा है।

अमेरिका के शहर डेलावेयर में रहती हैं 108 वर्षीय सुसान यंग ब्राउन। किसान परिवार में पली बढ़ी सुसान ने तीस वर्ष तक बच्चों को पढ़ाया। पूरे मन से नौकरी बजाने के बाद 1977 में रिटायर होने के पश्चात चिंताग्रस्त हो गईं कि खाली रहकर क्या करेंगी? उनके लिए तो एक-एक मिनट काटना मुश्किल हो जाएगा। अधिकांश करीबी रिश्तेदार स्वर्ग सिधार चुके थे। पति भी कब के चल बसे थे। ऐसे में उन्होंने अपने घर में ही आसपास के बच्चों को पढ़ाना प्रारंभ कर खुद को व्यस्त कर लिया। ऐसे में उनका समय अच्छी तरह से व्यतीत होने लगा। वर्तमान में वे 108 साल की है, अभी भी जवान हैं। तन से भी और मन से भी। रोज जल्दी उठकर व्यायाम करती हैं। घंटों पैदल चलती हैं और खुद ही कार चलाते हुए बाजार खरीदी करने जाती हैं। उनकी जिन्दगी के तीन बड़े सबक हैं, पहला उम्र बढ़ने के साथ शरीर को बिल्कुल निष्क्रिय कर देना सही नहीं। अपनी क्षमता के अनुसार रोज कुछ न कुछ शारीरिक गतिविधि करते रहें। दूसरा, सीखना कभी बंद मत करें । तीसरा, अपने पैरों पर खड़े रहने की कोशिश कीजिए। अपना काम स्वयं करने की आदत को हमेशा बरकरार रखें। उन्होंने एक प्रेरक किताब भी लिखी है, जो बेस्ट सेलर में शुमार है। उसमें वे लिखती हैं कि दिमाग को लंबे समय तक स्वस्थ रखने के लिए अनुशासित जीवन शैली, संतुलित खान-पान और मानसिक सक्रियता आवश्यक है। अपनी नींद को दवा जैसा महत्व दीजिए। रोज लगभग एक ही समय पर सोएं-जागें। रात में मोबाइल या अन्य स्क्रीन लंबे समय तक देखना बंद करें। ब्रेन की हेल्थ के लिए अपनी थाली को सभी आहारों से भरपूर रखिए। थाली में हरी सब्जियां, फल डालें, साबुत अनाज, मेवे और पर्याप्त प्रोटीन रखें। ज्यादा प्रोस्टेड खाना खाने से परहेज करें। 

लंबी उम्र के लिए मशहूर जापान के वृद्धों ने तो नया रिकॉर्ड बना दिया है। देश में 100 साल और उससे ज्यादा उम्र के लोगों की आबादी एक लाख के पार पहुंच गई है। इनमें महिलाओं की संख्या करीब 88 प्रतिशत है। देश की सबसे ज्यादा उम्र की महिला का नाम किशिमोटो फुयो है। उनकी उम्र करीब 114 साल है। वो राजधानी क्योटो में रहती हैं। इसके अलावा सबसे ज्यादा उम्र के पुरुष का नाम कुमामोटो है, जो 112 साल के हैं। कुमामोटो हिकारू में रहते हैं। जापान के एक उम्रदराज चिकित्सक मानते हैं जापानी लोगों की लंबी उम्र के लिए कई चीजों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इनमें हेल्दी डाइट और एक्टिव लाइफस्टाइल से जुड़ी चीजें शामिल हैं। जापान में लोगों के खान-पान में मुख्य तौर पर मछलियां, सब्जियां और चावल शामिल होते हैं। कई पश्चिमी देशों की तुलना में यहां के खाने में सैचुरेटेड फैट कम होता है। बुजुर्गों की लंबी उम्र होने में और भी कई फैक्टर शामिल हैं। इनमें रोजाना पैदल वॉक करना, पब्लिक ट्रांसपोर्ट्स का इस्तेमाल करना और रोजाना साइकिल चलाने जैसी चीजें शामिल हैं।

Thursday, September 17, 2026

जहां चाहें... वहीं राहें

 बहुत से लोगों की यही धारणा है कि पढ़ने-लिखने और कुछ नया करने की एक तयशुदा उम्र होती है उसके बाद तो खुद को रोजी-रोटी के लिए नौकरी और कामधंधे में लगाना-खपाना होता है। यह मानने वाले भी भरे पड़े हैं कि विधाता ने जिन्हें शारीरिक तौर पर अपंग बनाया है, उनके लिए हर काम कर पाना संभव नहीं। ऐसे विद्वानों का निष्कर्ष है कि जीवन कोई प्रयोगशाला तो नहीं कि नये-नये प्रयोगों की झड़ी लगाकर रखी जाए और अपनी खुशियों में व्यवधान डालने के साथ-साथ दूसरों को भी परेशान किया जाए। 

सबकी अपनी-अपनी सोच हैं, अपने-अपने विचार हैं। लेकिन अब समय का चेहरा बदल रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमता का दौर प्रारंभ हो चुका है। कई लोगों की नौकरियां खतरे में हैं। खुद को बदलेंगे नहीं तो पाये हुए को खोने का डर सिर पर तलवार ताने खड़ा रहेगा। वैसे भी सभी के लिए सफलता के एक जैसे रास्ते नहीं हैं। हर किसी की जिन्दगी में ऐसे दौर आते हैं जब सब धीमा पड़ जाता है। योजनाएं रुक जाती है, उत्साह ठंडा पड़ जाता है और लगने लगता है कि लोग आगे बढ़ रहे हैं और हम वहीं खड़े हैं। जो इस ठहराव और परिवर्तन को नहीं समझ पाते उन्हें कई अकल्पनीय परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। यह भी सच है कि वर्षों से जिस राह पर चलने की आदत पड़ चुकी हो उसे बदलना या छोड़ना आसान नहीं। 

लेकिन जब और कोई चारा नहीं हो तब? सात समंदर पार वाशिंगटन में अब कई लोग 40 की उम्र पार करने के बावजूद दोबारा पढ़ने-समझने के लिए क्लासरूम में लौट रहे हैं। कोई शेफ से सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन रहा है तो कोई नई डिग्री लेकर खुद को और ज्यादा कुशल साबित करना चाहता है। इनमें कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो स्कूल के बाद कॉलेज नहीं गये थे वे भी अब पढ़ाई की ओर लौट रहे हैं, ताकि डिग्री हासिल कर अच्छी नौकरी प्राप्त कर सकें। नेशनल सेंटर फॉर एजुकेशन स्टैटीस्टिक्स के मुताबिक अमेरिका में 40 की उम्र के 10 लाख से ज्यादा लोग अंडर ग्रेजुएट या ग्रेजुएट प्रोग्राम में पढ़ रहे हैं। इनमें से कई लोग वाइट कॉलर जॉब्स से ज्यादा सैलरी और जॉब सिक्योरिटी चाहते हैं। वहीं युवा पीढ़ी डिग्री की वैल्यू पर सवाल उठा रही है। 

टेक्सास यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर सिंडी वुडी ने 41 की उम्र में मास्टर्स और 47 में पीएचडी की। वे कहती हैं कि, मैं एक अच्छा इन्वेस्टमेंट हूं। उन्होंने पढ़ाई के दौरान टीवी देखना छोड़ दिया, घर के काम परिवार को सौंप दिए और रात व वीकेंड पर क्लास अटेंड की। कम खर्च वाले ट्रेड और अप्रेंटिसशिप प्रोग्राम भी लोकप्रिय हो रहे हैं। इनकी सालाना फीस करीब 3 हजार डॉलर होती है। इन क्षेत्रों को एआई और ऑटोमेशन से कम खतरा माना जाता है। जैसे-पाइप लीक होने पर प्लंबर की जरूरत तो होगी ही। पेंसिलवेनिया के एक जॉब ट्रेनिंग प्रोग्राम में 108 छात्रों में से एक चौथाई 40 की उम्र के हैं। वे प्लंबिंग, कारपेंट्री, कंस्ट्रक्शन और हेल्थकेयर जैसे स्किल्स सीख रहे हैं। इनमें से कई ने अपनी पुरानी नौकरी खो दी या बेहतर सैलरी की तलाश में हैं।

विख्यात रिटेल स्टोर चेन डीमार्ट का नाम आपने भी सुना ही होगा। इसके कर्ताधर्ता हैं राधाकिशन दामानी बहुत ही सहज और सरल इंसान हैं। दामानी जी के देश के 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लगभग 500 स्टोर हैं। फोर्ब्स द्वारा जारी दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची में उनका नाम शामिल है। उनका डीमार्ट ग्राहकों को रोजमर्रा की जरूरत का सामान बाजार से कम कीमत पर उपलब्ध कराने का दावा करता है। ग्राहकों को उन पर भरोसा है, इसलिए उनके सभी स्टोर में भीड़ लगी रहती है। दामानी हमेशा सफेद शर्ट और सफेद पतलून पहनते हैं, इसलिए लोग उन्हें प्यार से ‘मिस्टर व्हाइट एंड व्हाइट’ भी कहते हैं। आम लोगों से जुड़े रहने के पक्षधर, सादगी पसंद दामानी को जब लोग मुंबई के चर्चगेट या इंडस्ट्री हाउस के पास बनी पान दुकान पर पान खाते देखते हैं तो उनकी सरलता के मुरीद हो जाते हैं। दरअसल, उन्हें लंच के बाद पान खाना बहुत पसंद है। इसी बहाने अपने पुराने जान-पहचान वालों से मिलना-मिलाना भी हो जाता है। बीकानेर के मारवाड़ी परिवार में जन्मे राधाकिशन के पिता शिवकिशन का जीवन भी अत्यंत संघर्षमय रहा। मुंबई में एक कमरे के घर में रहकर उन्होने दलाल स्ट्रीट में ब्रोकर का काम करते हुए कई उतार-चढ़ाव देखें। जब राधाकिशन 12वीं में थे तब उनके पिता शिवकिशन का निधन हो गया तो पूरे परिवार को संभालने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। ऐसे में उन्होंने पढ़ाई छोड़कर व्यवसाय और परिवार की देखरेख को प्राथमिकता देते हुए कम दाम में अच्छी कंपनियों के शेयर खरीदे और खूब कमाई की। साल 1992 में देश के शेयर बाजार में हाहाकार मचाने वाला हर्षद मेहता कांड सामने आया। तब जहां सैकड़ों निवेशक डूबे। वहीं दूसरी ओर धैर्यवान राधाकिशन थे जिन्होंने गिरते बाजार में खूब कमाई की। उनकी व्यावसायिक यात्रा धीमे-धीमे चलती रही। इधर-उधर के कुछ और काम भी किए। बाजार की नब्ज़ पर गहरी नज़र रखते हुए 2002 में मुंबई के पवई में डीमार्ट का पहला स्टोर खोला और जो सफलता हासिल की उससे अब देश के छठे सबसे अमीर कारोबारी कहलाते हैं। वे ऐसे व्यापारी नहीं जो परिवार और खुद की सुख-सुविधाओं के लिए ही मेहनत करते हैं। उनके ट्रस्ट के द्वारा 56 लाइब्रेरी बनाई गई हैं, जिनसे 50 हजार से अधिक विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे हैं। गरीब बच्चों की कम्प्यूटर शिक्षा के लिए 70 से ज्यादा लैब बनवाई गई हैं। पीएम केयर फंड में 100 करोड़ और कोरोना काल में 55 करोड़ का दान कर चुके दामानी हर कुंभ के दौरान डुबकी लगाने के लिए जरूर जाते हैं। 

बीस साल के मयूरेश का डॉक्टर बनने का सपना अब पूरा होने जा रहा है। केईएम मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस में दाखिला पाने के लिए उसे खासी मशक्कत और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उसकी मानसिक और शारीरिक कमजोरी को देखते हुए माता-पिता ने उसे बहुतेरा कहा-समझाया कि डॉक्टर बनने की जिद छोड़ दो, बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। लेकिन वह नहीं माना। उसके मन-मस्तिष्क से डॉ.आदिल चागला कभी ओझल ही नहीं हो पाए। हां, वही डॉ. चागला जिन्होंने उसका पूरी तन्मयता और आत्मीयता के साथ तब इलाज किया था जब वह मात्र दस वर्ष का था और उसके मस्तिष्क में ब्रेन ट्यूमर होने से सभी ने उसके बचने की उम्मीद ही छोड़ दी थी, कुछ डॉक्टरों ने भी साफ कह दिया था कि वह शायद ही अधिक समय तक जिन्दा रह पाए। मौत धीरे-धीरे उसकी तरफ खिंची चली आ रही है। केईएम अस्पताल के पूर्व न्यूरोसर्जन डॉ.आदिल चागला पहले डॉक्टर थे, जिन्होंने उसे हिम्मत का दामन छोड़ने की बजाय चुनौती का डटकर सामना करने की सीख दी थी। साथ ही भरपूर भरोसा दिलाया था कि वह वक्त शीघ्र आयेगा, जब वह अस्पताल से पूरी तरह से स्वस्थ होकर अपने घर जायेगा। मयूरेश की ब्रेन ट्यूमर की सर्जरी सफल रही लेकिन शरीर का बायां हिस्सा पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाया। कई महीनों के इलाज के दौरान मयूरेश ने डॉ.चागला की गतिविधियों को बहुत करीब से देखा। उनका मरीजों के प्रति अपनत्व भरा बर्ताव, उनके परिवारों को आश्वस्त करने का प्रभावी तौर तरीका मयूरेश को इस कदर प्रभावित कर गया कि उसने तभी डॉ.चागला को अपना आदर्श मानते हुए दृढ़ निश्चय कर लिया कि वह भी बड़ा होकर डॉक्टर ही बनेगा और मरीजों की ऐसे ही समर्पण भाव से सेवा करेगा। अस्पताल से लौटने के पश्चात मयूरेश ने अपनी चाहत की आंच कभी भी धीमी नहीं होने दी। यह हकीकत अपनी जगह है कि उसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। शारीरिक कमजोरी और शासकीय नियमों के कारण 2024 में नीट परीक्षा में 480 से अधिक अंक पाने के बावजूद मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला। वर्ष 2026 वह दोबारा नीट परीक्षा में शामिल हुआ और उसे 440 अंक मिले, जिससे दिव्यांग कोटा में उसे केईएम अस्पताल व मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल गया। वह दिन दूर नहीं, जब वह सफेद एप्रन धारण कर बीमारों को भला चंगा करते हुए उनके जीवन को नई दिशा देगा। 

महर्षि दयानंद विश्व विद्यालय रोहतक में एक कोने में खड़े रंग-बिरंगे फूड ट्रक ‘डैफेटेरिया’ को आप देखते ही रह जाएंगे। खूब हैरान भी होंगे। क्योंकि यह भारत का पहला अनोखा डबल डेकर बस फूड ट्रक कैफे है। जहां पर आधे से ज्यादा स्टाफ मूक-बधिर है। मूक-बधिर यानी वो लोग जो बोल और सुन नहीं सकते। जिन्हें कई बार सक्षम लोगों की अवहेलना और तिरस्कार से अपमानित होेना पड़ता है। शेफ और सर्विस स्टाफ में विशेष रूप से दिव्यांगों को शामिल करने का मात्र यही मकसद है कि वे मान-सम्मान के साथ आजीविका कमाते हुए अपने हुनर को दुनिया तक पहुंचा सकें। वे भी अपनी श्रेष्ठता साबित करने में कहीं पीछे नहीं हैं। यहां मिलने वाला शाकाहारी भोजन और अन्य व्यंजन लाजवाब हैं। विद्यार्थियों और आगंतुकों की भीड़ देखते बनती है। नितांत खामोशी भरी इस दुनिया में कोई चिल्लाकर आर्डर नहीं देता। सिर्फ और सिर्फ इशारों और हावभाव से बातें होती हैं। इस प्रभावी पहल को धरातल पर उतारने वाले युवा संदीप और साहिल अपनी टीम के साथ व्यस्त रहते हैं। ऑर्डर पर ऑर्डर मिलते रहते हैं और ग्राहकों तक लजीज खाना और अन्य बेहतरीन व्यंजन पहुंचते रहते हैं, जो एकदम किफायती भी हैं। काबिलेगौर यह भी कि दो मूक-बधिर युवाओं का यह स्टार्टअप अब इग्नू के स्लेबस में शामिल हो गया है। मैनेजमेंट के विद्यार्थी इस मॉडल की सफलता को समझ नए आइडिया विकसित करेंगे। ‘डैफेटेरिया’ के मेन्यू कार्ड पर व्यंजनों के नाम के साथ-साथ उनके साइन लैग्वेज बने हुए हैं। जब कोई छात्र या अन्य यहां ऑर्डर देता है, तो वह केवल पैसे नहीं चुकाता, बल्कि अपनी अंगुलियों को मोड़कर ‘थैंक यू’ या ‘वेलकम’ कहना भी सीखता है। काउंटर पर खड़े मूक-बधिर युवा ग्राहकों के इशारों को पलक झपकते समझते हैं और चेहरे पर एक आत्मीय मुस्कान बिखेरते हुए खाना परोसते हैं। इस फूड ट्रक स्टार्टअप के अनोखे मॉडल को इतनी लोकप्रियता मिली है कि इसे राष्ट्रपति भवन में आयोजित पर्पल फेस्ट में भी देश के सामने प्रदर्शित होने का गौरव मिल चुका है।

Thursday, September 10, 2026

वक्त जब बदले अपना मिज़ाज

 नेपाल में भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने लगभग तेरह सौ लोगों की जान ले ली और हजारों लोग लापता हो गये, नेपाल-तिब्बत के हिमालयी इलाकों में प्रकृति ने जो तबाही का तांडव मचाया उससे प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते मनुष्य को भी फिर से एक बार चेताया कि यदि वक्त रहते नहीं सुधरे तो आनेवाले समय में इससे भी अधिक विनाश का सामना करना पड़ सकता है। 2026 की छब्बीस जुलाई को कम अज़ कम नेपाल के लोग तो कभी भी नहीं भूल पायेंगे। चारों तरफ कीचड़ और मलबा। पानी ही पानी और अपनी जान बचाने के लिए जद्दोजहद करते स्त्री, पुरुष और बच्चे। जानवरों का तो भगवान ही मालिक था। इस खौफनाक मंजर की तस्वीरें, खबरें जब दूर-दराज बैठे लोगों ने सुनी और देखीं तो हाथ जोड़कर परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करने लगे कि हम पर दया बनाये रखना और ऐसी कोई भी आपदा न आने देना। जिस तरह से ग्लेशियर फटने से नेपाल में तबाही हुई वैसे ही खतरे की आहटें भारत में भी सुनाई देने लगी हैं। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की मानें तो भारत की 40 जगहों पर काल मंडरा रहा है। नेपाल-तिब्बत बॉर्डर से सटे भारतीय इलाकों में बनी 7 झीलें तो इतने अधिक खतरे में हैं कि लोगों की जानों पर कभी भी बड़ा संकट आ सकता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि, हम भले ही अलग-अलग देशों में रहते हों लेकिन प्रकृति में होने वाले बदलाव के असर से अछूते नहीं हैं। पर्यावरण के क्षेत्र में वर्षों से काम कर रहे विद्वानों के अनुसार, दरअसल, शुरुआती खबरों के बाद लोगों को लगा था कि भूकंप के झटकों से नेपाल में जमीन खिसकी होगी और भूस्खलन के कारण ही यह भीषण बाढ़ आई। बाद में साफ हुआ कि आपदा की शुरुआत बर्फ व चट्टानों के बड़े पैमाने पर खिसकने से हुई। इससे अचानक तेज बाढ़ आई और भारी मात्रा में मलबा मौत बन नीचे की ओर बह निकला। वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि बर्फ, चट्टान और तलछट का यह बड़ा हिस्सा समुद्र तल से करीब 5,000 मीटर की ऊंचाई से 1.2 किलोमीटर नीचे गिरा। इससे नीचे बह रही नदी कुछ समय के लिए बंध गई और वहां एक झील बन गई। जब गलेशियर से आया पानी इस झील में भरा, तो अस्थायी बांध टूट गया और पानी का तेज बहाव सीमा के दोनों ओर बसे गांव तक पहुंचकर विनाशकारी गाथा लिख गया। 

जिनके घर कच्चे थे उन्हें तो बाढ़ अपने साथ बहा कर ले गई। भूस्खलन से मची तबाही ने अनेकों अच्छे-भले मकानों को भी नहीं छोड़ा। कई घरों में नीचे वाले फ्लोर पर पानी भर चुका था और पहली, दूसरी मंजिल पर बैठे और खड़े लोगों को मौत एकदम सामने दिखायी दे रही थी। उनकी सांसें अटकी की अटकी थीं। अनेकों उम्रदराज स्त्री-पुरुषों को जब विनाशकारी बाढ़ के बीच से बाहर निकाला गया तो उनके हाथ, पैर कांप रहे थे। आवाज़ थरथरा रही थी और आंखों में अनंत खौफ भरा था। मौत के मुंह से निकलने के सात-आठ दिन बीतने के बाद भी उस पल को भूल नहीं पाये थे। कई उम्रदराज लस्त-पस्त जो ओल्डहोम के ग्राउंडफ्लोर में रहते थे उन्हें बचाया नहीं जा सका। कई लोगों ने डूब चुकी बस्तियों से भाग कर पहाड़ियों की शरण ली तो कहीं उनकी जान बच पाई। बाढ़ के बीच फंसकर ईश्वर की लीला को हतप्रभ देखते अनेकों वृद्धों तथा बच्चों की आपबीती की असंख्य दिलदहलाने वाली बाढ़ दास्तानों के बीच कीचड़ से लथपथ संतानवें वर्षीय मायाबोहरा को बचाव दल ने काफी मेहनत के बाद जीवित बाहर निकाला। बचाव अभियान को कई घटों से मलबे में फंसी महिला के बचे होने की दूर-दूर तक कोई उम्मीद ही नहीं थी।

छह साल की मासूम मनीषा 60 घंटे तक कीचड़ और मलबे में दबी रही। यहां भी ईश्वरीय चमत्कार सभी को चमत्कृत कर गया। भारी बारिश के कारण जब घर का ढांचा गिरा तो लकड़ी के मलबे का एक हिस्सा मनीषा के सिर के ठीक ऊपर इस तरह टिक गया कि वहां हवा की आवाजाही के लिए एक छोटा सा एयर पॉकेट बन गया। इस छोटे से गैप की वजह से भारी कीचड़ और मलबा उसके चेहरे और नाक को पूरी तरह से ढक नहीं पाया, जिससे उसे लगातार ऑक्सीजन मिलती रही। लगातार 60 घंटों यानी ढाई दिनों तक उसने दमघोटू अंधेरे और भीषण गर्मी को झेला, वो भी बिना भोजन और पानी के यह चमत्कार नहीं तो क्या है? इलाज के दौरान अस्पताल के बिस्तर पर लेटी मनीषा ने अत्यंत भोलेपन के साथ पिता से कहा, ‘‘मैं जिन्दा हूं, मम्मी पापा। लेकिन आप मुझे बचाने क्यों नहीं आए?’’ कुदरत के भीषण कहर से संघर्ष करते-करते किसी तरह से बच निकले माता-पिता की आंखों से बस आंसू बहते रहे और नेपाल सशस्त्र पुलिस बल और नेपाली सेना की टीम का मन ही मन शुक्रिया अदा करते हुए नतमस्तक होते रहे। 28 अगस्त की शाम जब कर्मठ जवान मलबे के ढेर में फंसे लोगों की खोजबीन कर रहे थे तब एक सतर्क जवान को किसी बच्चे के रोने की बहुत धीमी-धीमी आवाज सुनायी दी। मशीनों का इंतजार करने की बजाय जवान बड़ी सावधानी से  कीचड़ और पत्थरों को हटाने में लग गए। ज़रा सी चूक होने पर मलबा धंस सकता था। इसलिए अत्यंत सावधानी से एक-एक लकड़ी और पत्थरों को हटाकर मनीषा को सुरक्षित बाहर निकाला गया। बाहर निकालते ही जवानों ने उसे प्राथमिक उपचार दिलाया तथा पानी पिलाया। 

नेपाल की पहली महिला पायलट प्रिया अधिकारी ने बाढ़ और भूस्खलन की जानलेवा पीड़ा से जूझते लोगों को राहत पहुंचाने के लिए अपनी रातों की नींद की कतई परवाह नहीं की। प्रिया ने छह दिनों में करीब 160 बचाव मिशन पूरे किए। वह दिन-रात भूखी-प्यासी हिमालय के बेहद कठिन इलाकों में हेलीकॉप्टर उड़ाकर लोगों को सुरक्षित निकालने और शवों को बरामद करने के अभियान में जुटी रहीं। बाढ़ से प्रभावितों की मदद के लिए कई स्कूली बच्चों ने अपनी गुल्लकों में जमा रकम और जेब खर्च से बचाए रुपयों को दान देकर मानवता और समझदारी का परिचय दिया। काबिलेगौर यह भी है कि, इनमें कई बच्चे ऐसे भी हैं जिन्होंने बाढ़ में अपने माता-पिता को खोया है। रोंगटे खड़े कर देने वाली त्रासदी को जिन लोगों ने अपनी आंखों से देखा और जिंदा बच गए उनके लिए तो यकीनन यह किसी चमत्कार से कम नहीं। हमारे देश भारत के भी कई लोग प्रलयकारी बाढ़ में फंसकर हैरान-परेशान होते रहे। भारत सरकार ने उन्हें सुरक्षित लाने में अपनी संपूर्ण ताकत लगा दी फिर भी कुछ की मौत हो गई और कुछ का कोई अता-पता नहीं! भीषण बाढ़ से बचकर निकले वेलाचेरी के मुरुगु नगर के एक दंपत्ति ने बताया कि बच निकलने के बाद उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे उनका पुनर्जन्म हुआ हो। नावू कबीरदास और उनकी पत्नी विजया भुवनेश्वरी उन 21 लोगों में शामिल थे, जो गत दिनों नेपाल के काठमांडू से चेन्नई पहुंचे। कुंभकोणम की एक एजेंसी के ज़रिए यात्रा कर रहे 57 लोगों का एक समूह तीन बसों में सवार होकर रासुवा इलाके से गुज़र रहा था, जो बाढ़ की चपेट में आ गया। वे दो पहाड़ों के बीच घुमावदार सड़क पर यात्रा करते हुए आस-पास के खूबसूरत नज़ारों का आनंद ले रहे थे। इस सड़क मार्ग के नीचे एक नदी बह रही थी। अचानक, कुछ ही सेकंड में रासुवा का इलाका आपदा क्षेत्र में बदल गया-तेज़ आवाज़, गिरते पत्थर-चट्टानें, कीचड़ और मलबे के साथ तेज़ी से बहता बाढ़ का पानी।

तीनों बसों में से स़िर्फ दूसरी बस ही बाढ़ की चपेट में आने से बची। विजया भुवनेश्वरी कहती हैं, कुछ मिनटों तक तो हमें समझ ही नहीं आया कि क्या हो रहा है। मैंने देखा कि हमारे पीछे वाली बस झुक रही थी। मैं वह नज़ारा और ज़्यादा देर तक नहीं देख सकी; तभी मुझे स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ। उस पल को याद करते हुए नावू कबीरदास बोले कि अचानक धमाके जैसी तेज़ आवाज़ हुई और गाड़ी पर पत्थर गिरने लगे। फिर, बाढ़ का पानी तेज़ी से अंदर आने लगा, जैसे कोई बांध खोल दिया गया हो। बाढ़ आने से पहले, उस इलाके से गुज़र रही उनकी बस कीचड़ में फंस जाने के कारण कुछ देर रुकी। उन्हीं कुछ मिनटों ने हमारी जान बचाई। उनका ड्राइवर नेपाल का रहने वाला एक स्थानीय व्यक्ति था। यह पहाड़ी इलाका था जहां अक्सर भूस्खलन और हिमस्खलन होते रहते थे। बाढ़ का पानी देखते ही उसे ख़तरे का अंदाज़ा हो गया। उसने सबसे कहा कि वैन से बाहर निकलें और ऊंची जगह पर जाना ही सबसे सुरक्षित विकल्प है, फिर वह खुद भी सुरक्षित जगह की ओर भागा। हम भी उसी रास्ते पर गए। उस समय हमारे दिमाग में स़िर्फ हमारे बच्चे ही थे। बचने के लिए उन्हें ऊंची जगह पर चढ़ना पड़ा। कुछ लोगों को छोड़कर, बचे हुए 21 लोगों में से ज़्यादातर की उम्र 50 साल से ज़्यादा थी। अपनी जान बचाने के लिए उन्हें किसी तरह कीचड़ और गाद से ढंकी ढलान पर चढ़ना पड़ा। विजया भुवनेश्वरी की बोलते-बोलते सांस फूलने लगी फिर भी उनका बताना जारी रहा, ‘‘एक और महिला और मैंने चढ़ना शुरू किया, लेकिन आधे रास्ते में ही फिसलकर गिर गईं। मैं दो बार फिसली। मेरे पैर कीचड़ से सने हुए थे और पकड़ने के लिए कुछ भी नहीं था। आखिरकार, वह एक दूसरी महिला की साड़ी को मज़बूती से पकड़कर ऊपर पहुंच पाईं-वह महिला पहले ही ऊपर पहुंच चुकी थी और उसने अपनी साड़ी उतारकर नीचे की ओर बढ़ाई थी। वह बताती हैं, मेरी रिश्तेदार, पूंगोडी, पहले ही ऊपर पहुंच चुकी थीं। उस दिन स़िर्फ वही साड़ी पहने हुए थीं। उसने स्वेटर पहना, अपनी साड़ी उतारी और हमारे लिए नीचे लटका दी। हमने उस साड़ी और पास के एक केबल को पकड़कर खुद को ऊपर खींचा। वह आगे कहती हैं, मिट्टी के एक ऐसे टीले पर चढ़ने में हमें डेढ़ घंटा लग गया, जो एक इमारत जितना ऊंचा था। एक बार तो, मैंने जिस पेड़ की टहनी को पकड़ा, वह टूट गई। उसके बाद, पेड़ों को पकड़ने के बजाय, हमने ऊपर चढ़ने के लिए साड़ियों को पकड़ा। आखिर में एक महिला ऊपर नहीं पहुंच पा रही थी; हमने उससे कहा कि वह अपनी कमर के चारों ओर साड़ी बांध ले और हमारे ग्रुप के सदस्यों ने उसे पकड़कर ऊपर खींच लिया। ऊपर पहुंचने पर उन्हें एक आपदा राहत केंद्र मिला। वहां मौजूद कुछ लोगों ने उन्हें ठीक होने में मदद के लिए पानी और बिस्किट दिए। जिन लोगों के मोबाइल में सिग्नल था, उनके ज़रिए उन्होंने तमिलनाडु में ख़बर भेजी कि वे सुरक्षित हैं। विजया भुवनेश्वरी ने बताया कि, हमारे ग्रुप के एक सदस्य के रिश्तेदार सचिवालय में काम करते हैं। उनके ज़रिए हम सरकार से संपर्क कर पाए। हमने सबूत के तौर पर एक फ़ोटो भेजी कि हम सुरक्षित हैं। ऊपर चढ़ते समय, उन्होंने कीचड़ में फंसे एक व्यक्ति को हाथ हिलाते हुए देखा। विजया भुवनेश्वरी की बोलते-बोलते आंखें भीग गईं, ‘‘उसे देखने के बाद, न तो हम और ऊपर चढ़ सकते थे और न ही वहां रुक सकते थे। बचाव दल को सूचना दी गई और बाद में उस व्यक्ति को बचा लिया गया।’’ ऊपर चढ़ने के बाद ही हमने उस बस को ढूंढ़ा जिससे हम आए थे। हमें स़िर्फ अपनी बस दिखाई दी, उसके आगे कई गाड़ियां पलटी हुई थीं। एक गाड़ी का स़िर्फ टायर दिख रहा था। तभी हमें कीचड़ धसने की गंभीरता का एहसास हुआ।

वे डेढ़ दिन तक आपदा राहत केंद्र में रहे। उनकी मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं; एक मंज़िल की ऊंचाई वाले मिट्टी के ढेर पर चढ़ने के बाद उन्हें अब 20 मंज़िला इमारत जितनी ऊंचाई वाले खड़ी ढलान वाले पहाड़ी इलाके से गुज़रना था। यह एक संकरा, एक कतार में चलने वाला रास्ता था। हमें तो यह भी नहीं पता कि हम उस पर कैसे चढ़ पाए। दोनों तरफ़ घनी झाड़ियां थीं। हम बस ज़िंदा रहने की ज़बरदस्त इच्छाशक्ति के दम पर ऊपर चढ़े। यह सफ़र बहुत मुश्किल था, क्योंकि उनमें से किसी को भी पर्वतारोहण का अनुभव नहीं था। ज़मीन कीचड़ और दलदल से भरी थी, जिससे हम बार-बार फिसल रहे थे। एक गलत क़दम का मतलब था 50 फ़ीट नीचे गिरना। एक जगह हमने गलत मोड़ ले लिया। एक नेपाली व्यक्ति ने हमें रास्ता दिखाया, हमें नीचे उतरना पड़ा और फिर दूसरी दिशा में ऊपर जाना पड़ा। ऊपर चढ़ने से ज़्यादा मुश्किल नीचे उतरना था, बार-बार बैठकर और धीरे-धीरे खिसकते हुए नीचे उतरना पड़ा। तीन घंटे बाद, वे तय पिकअप पॉइंट पर पहुंचे। वहां से उन्हें आर्मी के हेलीकॉप्टर से सुरक्षित जगह पहुंचाया गया। नेपाल में भारतीय दूतावास से संपर्क करने के बाद, वे अपने-अपने घर लौट आए। चेन्नई, कडलोर, मयिलादुथुराई, कृष्णगिरि और त्रिची जैसे इलाकों में फंसे 21 लोगों का तमिलनाडु सकुशल लौटना संभव हुआ। मंत्री राजमोहन के अनुसार, राज्य से 400 से ज़्यादा लोग नेपाल गए थे और उनमें से 90 लोगों से संपर्क नहीं हो पा रहा है।

महाविनाश और दिल दहलाने वाले सात-आठ दिन गुजर जाने के बाद भी जिन परिवारों के लापता लोगों की कोई खबर नहीं मिली उनमें से कई ने तो उनकी प्रतीकात्मक अंत्येष्टि भी कर दी। नदी किनारे चिताएं तो जलीं, लेकिन उनके शव नहीं थे। उनके स्थान पर उनकी तस्वीर या प्रतीक रख परिजनों ने अत्यंत दुखी मन से अंतिम रस्में निभाईं, ताकि  उनकी आत्मा को शांति मिल सके। कुछ ऐसे शव भी थे। जिनके अपनों का पता नहीं चलने के कारण सरकार ने सामूहिक अंतिम संस्कार किया। भारत सरकार ने बाढ़ से बुरी तरह से प्रभावितों के लिए कई-कई टन राहत सामग्री भेजने के साथ खोज और बचाव अभियानों के लिए विभिन्न उपकरण तथा चिकित्सकों को भेजा। भारत के लोकप्रिय फिल्म अभिनेता और जाने-माने समाजसेवी सोनू सूद तथा युवा संत बागेश्वर महाराज आदि ने कई ट्रक राहत सामग्री नेपाल में भेजकर मानवता का धर्म निभाया।

Thursday, September 3, 2026

मां बस मां

 चित्र-1 : ज़िन्दगी से हैरतअंगेज और कुछ भी नहीं। यहां हर कोई अपनी-अपनी ‘कभी खुशी कभी गम’ नामक फिल्म का निर्माता है। यथार्थ के ताने-बाने में बुनी यही फिल्म कभी उसे रूलाती है तो कभी खुश कर जाती है। गरीबी अमीरी और खून के रिश्ते अपनी जगह। इनके वजन के समक्ष और कुछ भी नहीं। सब हवा-हवाई है। नितांत खोखला है। वो अस्सी के दशक का दौर था। अब की तरह तब भी एक मां मेहनत-मजदूरी कर अपने दो बच्चों के भविष्य के निर्माण में लगी थी। इसके लिए वह दूसरों की निर्माणाधीन गगनचुंबी इमारतों के लिए ईंट-सीमेंट ढोती और उसका छह साल का बच्चा रघु और उससे पांच वर्ष बड़ा गुड्डू भी चंद सिक्के पाने के लिए रेलवे स्टेशन पर चल देते। कोई दयालू यात्री खाने को देता तो खा लेते। नहीं तो भूखे रह जाते। नींद आती तो प्लेटफार्म के किसी कोने में सो जाते। दोनों ने रेलगाड़ी तो देखी थी लेकिन कभी चढ़े नहीं थे। एक दिन रघु रात में पेट में दर्द होने के कारण सो नहीं पाया था। उसकी आंखें बार-बार बंद हुई जा रही थीं। तभी उसकी निगाह सामने खड़ी खाली ट्रेन की बोगी पर जा पड़ी। उसने इधर-उधर देखा। भीड़ में बड़ा भाई कहीं दिखायी नहीं दिया। नन्हा-मुन्ना रघु बड़ी फुर्ती से बोगी में जाकर लेट गया। पलक झपकते ही उसकी आंख लग गई। गहरी नींद ने उसे अपने आगोश में ऐसे ले लिया जैसे मां अपने बच्चे को गोद में ले लेती है। कुछ घंटे के बाद रघुकी नींद खुली। ट्रेन हवा से बातें कर रही थी। ट्रेन के डिब्बे में वह नितांत अकेला था। कई घंटे के पश्चात जब टे्रन रुकी तो वह सोलह सौ किलोमीटर का सफर तय कर कोलकाता पहुंच चुकी थी।

घबराया और डरा बच्चा नीचे उतरा। प्लेटफार्म से बाहर निकलकर भूखे पेट इधर-उधर देखता रहा। एक पुलिस वाले की उस पर नज़र पड़ी तो उसके घर-परिवार का पता लगाने की कोशिश शुरू हो गई। लेकिन मासूम कुछ भी नहीं बता पाया। फिर भी उसके अपनों का पता लगाने की बहुत कोशिश की गई, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। थक-हारकर प्रशासन ने उसे अनाथआश्रम भेज दिया। कुछ महीनों के बाद आस्ट्रेलिया का एक संपन्न परिवार बच्चा गोद लेने के इरादे से आश्रम आया तो उसे रघु एकदम जच गया। आस्ट्रेलिया के तस्मानिया शहर में रहने वाले दंपत्ति ने उसे नया नाम देते हुए अच्छी तरह से देखभाल करनी प्रारंभ कर दी। नया देश, नया घर और बेइंतहा प्यार पाकर भी रघु अपनी मां और भाई को भूल नहीं पाया। वह धीरे-धीरे बड़ा होता चला गया। बचपन की धुंधली यादें उसके साथ-साथ चलती रहीं। वह तीस वर्ष का हो चुका था। दुनिया की सारी सुख-सुविधाएं उसे हासिल थी। सोशल मीडिया के जमाने ने तेजी से दस्तक दे दी थी। रघु जब खाली होता तो कंप्यूटर खोलकर बैठ जाता। उसे यकीन होता चला गया कि गूगल एक न एक दिन जरूर उसे उसकी मां और भाई से मिला देगा। जहां चाह होती है, वहां राह निकल ही आती है। एक दिन जब वह कंप्यूटर स्क्रीन पर भारत के रेलवे स्टेशनों और रेल पटरियों को खंगाल रहा था, तभी उसकी सतर्क निगाहें एक जगह पर अटकी की अटकी रह गईं। बिल्कुल वही रेलवे स्टेशन, वही प्लेटफार्म और वही पानी की टंकी जहां पर वह अपने भाई के साथ अक्सर बैठ जाता था। रघु ने अपने बचपन की खोज कर ली थी। अब तो बस वह किसी भी तरह से भारत पहुंच जाना चाहता था। दिल की बेकाबू धड़कन के साथ वह यह भी सोचने लगा कि लगभग छब्बीस साल बीत चुके हैं। मां जिन्दा होगी भी या नहीं। यदि होगी तो उसे पहचान भी पाएगी? वर्ष 2012 के एक दिन युवा रघु अपने गांव बुरहानपुर जा पहुंचा। जैसे ही उसने छोटी सी झोपड़ी के सामने कदम रखे वहां से एक उम्रदराज महिला बाहर निकली। दोनों की नज़रें मिलीं और छब्बीस साल की जुदाई का लंबा फासला सेकंडों में सिमट गया। मां ने फौरन अपने बेटे को गले से लगा लिया। हर किसी को झकझोर कर रख देने वाली इस हकीकत पर आगे चलकर हॉलीवुड में एक फिल्म बनी। ‘लॉयन’ नाम की इस दिल को छू लेनेवाली फिल्म को छह ऑस्कर नॉमिनेशंस मिले। लेकिन एक मां के लिए अपने खोये बेटे से वर्षों बाद मिलना और सीने से लगाना ऑस्कर से भी बड़ा इनाम था।

चित्र -2 : इंदौर में स्थित ‘निराश्रित आश्रम’ में 85 वर्षीय सरिता की मौत हो गई। उसका एक जवान बेटा था। वही उसे साढ़े चार साल पहले आश्रम में यह कहकर छोड़ गया था कि चिन्ता मत करना, मैं दो दिन के बाद आकर तुम्हें ले जाऊंगा। मां को अपने बेटे पर यकीन था। कुछ दिन पहले ही बेटे ने मां के नाम के मकान को बेचा था, जिसे उसके दिवंगत पिता ने मां को खरीदकर दिया था। बेटा रोज-रोज आर्थिक तंगी का रोना रोता रहता था तो बूढ़ी मां पसीज गई थी। हालांकि उसके पति ने उसे कई बार सख्त हिदायत दी थी कि अपने जीते जी इस मकान को भूलकर भी बेटे-बहू या पोते-पोती का नाम न करना। बेचने की अनुमति देने की तो बिल्कुल सोचना ही नहीं। यहां किसी का कोई भरोसा नहीं। लेकिन फिर भी मां ने भरोसा कर लिया। बेटा-बहू जब देखो तब अपने बेटे को उच्च शिक्षा दिलाने में आ रहे धन के घोर अभाव का राग गाने बैठ जाते। शुरू-शुरू में तो उसे अपने पति का कहा याद रहा लेकिन कालांतर में किन्हीं भावुक क्षणों में उसके मन में विचार आया कि मेरे होते मेरे बच्चे परेशानी झेलें तो मेरा जीना किस काम का? उसे कहां पता था कि घर बिकते ही उसे एकदम बेगाना कर दिया जाएगा। जीवन का आखिरी वक्त वृद्धाश्रम में घुट-घुट कर बिताना पड़ेगा। जिस बेटे को उसने अपनी जान से ज्यादा चाहा, परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ी वह उसके बुढ़ापे का सहारा बनने की बजाय इतना निष्ठुर हो जाएगा कि उसके इंतजार में पानी से बाहर फेंक दी गई मछली की तरह तड़पती रहेगी। उसके पास एक ही चश्मा था। आंखों की रोशनी कम हो जाने के कारण चश्मे का नंबर बदल चुका था। आश्रम के व्यवस्थापक ने जब उसे नया चश्मा लाकर दिया तो वह बहुत खुश होकर बोली थी कि बहुत जरूरी था यह मेरे लिए। मेरा बेटा जब आयेगा तो ठीक से उसे देख तो सकूंगी। मां को आखिरी सांस तक यकीन था कि बेटा जरूर आयेगा। लेकिन वह नहीं आया। आश्रम प्रबंधन ने उसे मां के निधन की बार-बार सूचना दी लेकिन उसका कोई जवाब नहीं आया। फिर भी बेटे के आने की राह देखी गई। पूरे तीन दिन तक मां का शव बेटे का इंतजार करता रहा। आखिरकार पूरे सम्मान के साथ अभागी मां का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

चित्र-3 : महाराष्ट्र में एक ऊंची पहाड़ी से गिरते बाप-बेटे और चंद सेकंड के बाद मां के छलांग लगाने का वीडियो जिसने भी देखा बस सन्न रह गया। आपसी विवाद, कलह-क्लेश की ऐसी भी परिणति हो सकती है वो सभी ने देखी। लड़ाई-झगड़े और मनमुटाव किस घर-परिवार में नहीं होते! इस कहानी का मुख्य पात्र कुणाल है जिसकी अपने पिता मुरलीधर से अनबन चल रही थी और मां दोनों के बीच पिस रही थी। कुणाल कोई आवारा किस्म का लड़का नहीं था। दसवी की परीक्षा में उसने 92 प्रतिशत अंक पाये थे। उसके माता-पिता आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। दोनों अलग-अलग रहते थे। कुणाल अपनी मां के साथ था। कुणाल चाहता था कि माता-पिता भी साथ रहे। उनके बीच दूरी की वजह एक दूसरी औरत भी थी। इसके साथ और भी कुछ जमीन संबंधित पारिवारिक विवाद थे जिनकी वजह से तनाव की स्थिति बनी रहती थी। उनके बड़े बेटे की कुछ वर्ष पूर्व बीमारी के कारण मौत हो गई थी। इससे भी उन्हें बहुत सदमा लगा था। कुणाल की मां संगीता खुद को व्यस्त तथा मन को शांत रखने के लिए सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहने लगी थी। उसने अपना एक यू-टयूब चैनल बनाया था, जिसमें तरह-तरह के वीडियोज पोस्ट करती रहती थी। मुरलीधर को संगीता का सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना रास नहीं आता था। तस्वीरों तथा वीडियो में संगीता जिस तरह से खुश दिखायी देती थी। उससे कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि कैमरे के सामने की मुस्कराहट के पीछे कितनी अशांति, तनाव और परेशानी अपना डेरा जमाये है।

कुणाल के पिता ट्रक चलाते थे। बेटे कुणाल ने उनसे बगैर पूछे महंगा मोबाइल फोन खरीदा था, जिसकी किश्ते भरने में उसे मुश्किल हो रही थी। पिता भी आर्थिक परेशानियों के चलते टालमटोल कर रहे थे। पिता के इस व्यवहार से भी वह आहत था। उसने पिता की मजबूरी को समझने की कोशिश नहीं की और पिछली बार की तरह इस बार भी पिता से तीखी बहस करने के पश्चात पहाड़ी पर चला गया। बेटा कहीं खुदकुशी न कर ले, इस डर से मां संगीता और पिता मुरलीधर तुरंत वहां जा पहुंचे। उन्होंने देखा कि कुणाल पहाड़ी के शिखर के एकदम किनारे खड़ा है। दोनों उससे पीछे हटने की गुहार लगाने लगे। जवाब में कुणाल ने अपना आईफोन, कलाई घड़ी और चांदी की चेन उतार फेंकी और मां से कहने लगा कि मेरी बात कोई नहीं सुनता। ऐसे में मेरी जीने की इच्छा नहीं रही। मेरी जिन्दगी की किसी समस्या का समाधान नहीं निकल पा रहा है। अब कुछ ठीक होगा भी नहीं। तीन घंटे तक उसे मनाने की कोशिशें चलती रहीं। जिद्दी बेटे को मनाने के लिए मां को अंतत: कहना पड़ा कि मैं जीवनभर तुम्हारे ही साथ रहूंगी। अपने पति से हमेशा-हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ दूंगी। यदि तुम्हें मेरी बात पर यकीन नहीं तो मैं अपना मंगलसूत्र अभी उतारकर फेंक देती हूं। बस अब एक बार तुम मेरा कहना मान लो। मां के बेटे के प्रति प्रेम लगाव, अपनत्व और स्नेह की ऐसी पराकाष्ठा! जहां पति पीछे तो बेटा बहुत पहले! मां के अंदर की गहराई को काश औलादें भी समझ पातीं। इस बीच घबराये पिता मुरलीधर बेटे को पकड़ने के लिए आगे बढ़े तो दोनों का संतुलन ही बिगड़ गया और दोनों ढाई सौ फीट गहरी खाई में जा गिरे। इस दर्दनाक मंजर को देखते ही सिर्फ चार सेकंड के भीतर मां संगीता ने भी पहाड़ी से छलांग लगाकर मौत का दामन थाम लिया। पहाड़ी पर और भी कई लोग जमा थे। नीचे भी भीड़ थी। अधिकांश लोग धड़ाधड़ वीडियो बनाने में लगे थे। कोई भी कुणाल को बचाने के लिए आगे नहीं आया। और एक परिवार पूरी तरह से खत्म हो गया।

चित्र-4 : मां बस मां होती है। ममता का कभी न सूखने वाला सागर। उसके स्नेह, दुलार और अपनत्व का अमृत यहां भी बरसता है और दूर बहुत दूर सात समंदर पार भी। कहीं कोई फर्क नहीं। अपने कलेजे के टुकड़े के लिए कुछ भी कर गुजरने और किसी भी तूफान से लोहा लेने को तत्पर रहने वाली मां जरूरी नहीं कि शारीरिक रूप से बहुत शक्तिशाली हो। उसके मन की विशालता को नापने वाला अभी तक कोई पैमाना नहीं बना। न्यूयार्क में रहती हैं जेसिका फ्लेचर। उनका एक 11 साल का बेटा है। नाम है, हंटर। हंटर ठीक से नहीं बोल पाता है। दूसरे बच्चों के साथ घुलने-मिलने, खेलने में उसे कोई रुचि नहीं। बात करते समय अक्सर उसकी नज़रें झुकी की झुकी रहती हैं। हंटर की मां उसकी कमजोरी को खूब जानती और समझती हैं। जेसिका अपने बेटे हंटर के साथ एक रेस्टारेंट में खाना खाने गई थी। हंटर बोल नहीं पाने के कारण एक डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल करता है। अचानक उस डिवाइस की बैटरी खत्म हो गई। बेटे के लिए अपनी बात कहना, बताना मुश्किल हो गया। मां जेसिका बहुत परेशान हो गईं, तो हंटर ने एक नेपकिन उठाया और उस पर कीबोर्ड बनाया और अपनी पसंद का खाना बताने लगा। हंटर के इस तरीके ने जेसिका को एक नया रास्ता दिखा दिया। जेसिका समझ चुकी थी कि टेक्निक कभी भी धोखा दे सकती हैं, इसलिए उन्होंने एक टैटू आर्टिस्ट की मदद से अपनी हाथ पर कीबोर्ड का पक्का टैटू ही बनवा लिया। अब जब भी डिजिटल डिवाइस बंद हो जाता है तो बेटा मां के हाथ पर बने अक्षरों को छूकर अपनी बात समझा देता है। जेसिका के इस टैटू में वर्ड स्माइली और एक दिल का सिंबल भी बना हुआ है। टैटू देखने के बाद बेटे ने मां के हाथ पर पहला शब्द टाइप किया, ‘मम्मा।’ मां का ये अनोखा तरीका बेटे को बहुत पसंद आया। सोशल मीडिया पर मां-बेटे की ये स्टोरी खूब वायरल होती रही और लाखों लोगों के दिलों को सतत छूती रही।