चित्र-1 : ज़िन्दगी से हैरतअंगेज और कुछ भी नहीं। यहां हर कोई अपनी-अपनी ‘कभी खुशी कभी गम’ नामक फिल्म का निर्माता है। यथार्थ के ताने-बाने में बुनी यही फिल्म कभी उसे रूलाती है तो कभी खुश कर जाती है। गरीबी अमीरी और खून के रिश्ते अपनी जगह। इनके वजन के समक्ष और कुछ भी नहीं। सब हवा-हवाई है। नितांत खोखला है। वो अस्सी के दशक का दौर था। अब की तरह तब भी एक मां मेहनत-मजदूरी कर अपने दो बच्चों के भविष्य के निर्माण में लगी थी। इसके लिए वह दूसरों की निर्माणाधीन गगनचुंबी इमारतों के लिए ईंट-सीमेंट ढोती और उसका छह साल का बच्चा रघु और उससे पांच वर्ष बड़ा गुड्डू भी चंद सिक्के पाने के लिए रेलवे स्टेशन पर चल देते। कोई दयालू यात्री खाने को देता तो खा लेते। नहीं तो भूखे रह जाते। नींद आती तो प्लेटफार्म के किसी कोने में सो जाते। दोनों ने रेलगाड़ी तो देखी थी लेकिन कभी चढ़े नहीं थे। एक दिन रघु रात में पेट में दर्द होने के कारण सो नहीं पाया था। उसकी आंखें बार-बार बंद हुई जा रही थीं। तभी उसकी निगाह सामने खड़ी खाली ट्रेन की बोगी पर जा पड़ी। उसने इधर-उधर देखा। भीड़ में बड़ा भाई कहीं दिखायी नहीं दिया। नन्हा-मुन्ना रघु बड़ी फुर्ती से बोगी में जाकर लेट गया। पलक झपकते ही उसकी आंख लग गई। गहरी नींद ने उसे अपने आगोश में ऐसे ले लिया जैसे मां अपने बच्चे को गोद में ले लेती है। कुछ घंटे के बाद रघुकी नींद खुली। ट्रेन हवा से बातें कर रही थी। ट्रेन के डिब्बे में वह नितांत अकेला था। कई घंटे के पश्चात जब टे्रन रुकी तो वह सोलह सौ किलोमीटर का सफर तय कर कोलकाता पहुंच चुकी थी।
घबराया और डरा बच्चा नीचे उतरा। प्लेटफार्म से बाहर निकलकर भूखे पेट इधर-उधर देखता रहा। एक पुलिस वाले की उस पर नज़र पड़ी तो उसके घर-परिवार का पता लगाने की कोशिश शुरू हो गई। लेकिन मासूम कुछ भी नहीं बता पाया। फिर भी उसके अपनों का पता लगाने की बहुत कोशिश की गई, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। थक-हारकर प्रशासन ने उसे अनाथआश्रम भेज दिया। कुछ महीनों के बाद आस्ट्रेलिया का एक संपन्न परिवार बच्चा गोद लेने के इरादे से आश्रम आया तो उसे रघु एकदम जच गया। आस्ट्रेलिया के तस्मानिया शहर में रहने वाले दंपत्ति ने उसे नया नाम देते हुए अच्छी तरह से देखभाल करनी प्रारंभ कर दी। नया देश, नया घर और बेइंतहा प्यार पाकर भी रघु अपनी मां और भाई को भूल नहीं पाया। वह धीरे-धीरे बड़ा होता चला गया। बचपन की धुंधली यादें उसके साथ-साथ चलती रहीं। वह तीस वर्ष का हो चुका था। दुनिया की सारी सुख-सुविधाएं उसे हासिल थी। सोशल मीडिया के जमाने ने तेजी से दस्तक दे दी थी। रघु जब खाली होता तो कंप्यूटर खोलकर बैठ जाता। उसे यकीन होता चला गया कि गूगल एक न एक दिन जरूर उसे उसकी मां और भाई से मिला देगा। जहां चाह होती है, वहां राह निकल ही आती है। एक दिन जब वह कंप्यूटर स्क्रीन पर भारत के रेलवे स्टेशनों और रेल पटरियों को खंगाल रहा था, तभी उसकी सतर्क निगाहें एक जगह पर अटकी की अटकी रह गईं। बिल्कुल वही रेलवे स्टेशन, वही प्लेटफार्म और वही पानी की टंकी जहां पर वह अपने भाई के साथ अक्सर बैठ जाता था। रघु ने अपने बचपन की खोज कर ली थी। अब तो बस वह किसी भी तरह से भारत पहुंच जाना चाहता था। दिल की बेकाबू धड़कन के साथ वह यह भी सोचने लगा कि लगभग छब्बीस साल बीत चुके हैं। मां जिन्दा होगी भी या नहीं। यदि होगी तो उसे पहचान भी पाएगी? वर्ष 2012 के एक दिन युवा रघु अपने गांव बुरहानपुर जा पहुंचा। जैसे ही उसने छोटी सी झोपड़ी के सामने कदम रखे वहां से एक उम्रदराज महिला बाहर निकली। दोनों की नज़रें मिलीं और छब्बीस साल की जुदाई का लंबा फासला सेकंडों में सिमट गया। मां ने फौरन अपने बेटे को गले से लगा लिया। हर किसी को झकझोर कर रख देने वाली इस हकीकत पर आगे चलकर हॉलीवुड में एक फिल्म बनी। ‘लॉयन’ नाम की इस दिल को छू लेनेवाली फिल्म को छह ऑस्कर नॉमिनेशंस मिले। लेकिन एक मां के लिए अपने खोये बेटे से वर्षों बाद मिलना और सीने से लगाना ऑस्कर से भी बड़ा इनाम था।
चित्र -2 : इंदौर में स्थित ‘निराश्रित आश्रम’ में 85 वर्षीय सरिता की मौत हो गई। उसका एक जवान बेटा था। वही उसे साढ़े चार साल पहले आश्रम में यह कहकर छोड़ गया था कि चिन्ता मत करना, मैं दो दिन के बाद आकर तुम्हें ले जाऊंगा। मां को अपने बेटे पर यकीन था। कुछ दिन पहले ही बेटे ने मां के नाम के मकान को बेचा था, जिसे उसके दिवंगत पिता ने मां को खरीदकर दिया था। बेटा रोज-रोज आर्थिक तंगी का रोना रोता रहता था तो बूढ़ी मां पसीज गई थी। हालांकि उसके पति ने उसे कई बार सख्त हिदायत दी थी कि अपने जीते जी इस मकान को भूलकर भी बेटे-बहू या पोते-पोती का नाम न करना। बेचने की अनुमति देने की तो बिल्कुल सोचना ही नहीं। यहां किसी का कोई भरोसा नहीं। लेकिन फिर भी मां ने भरोसा कर लिया। बेटा-बहू जब देखो तब अपने बेटे को उच्च शिक्षा दिलाने में आ रहे धन के घोर अभाव का राग गाने बैठ जाते। शुरू-शुरू में तो उसे अपने पति का कहा याद रहा लेकिन कालांतर में किन्हीं भावुक क्षणों में उसके मन में विचार आया कि मेरे होते मेरे बच्चे परेशानी झेलें तो मेरा जीना किस काम का? उसे कहां पता था कि घर बिकते ही उसे एकदम बेगाना कर दिया जाएगा। जीवन का आखिरी वक्त वृद्धाश्रम में घुट-घुट कर बिताना पड़ेगा। जिस बेटे को उसने अपनी जान से ज्यादा चाहा, परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ी वह उसके बुढ़ापे का सहारा बनने की बजाय इतना निष्ठुर हो जाएगा कि उसके इंतजार में पानी से बाहर फेंक दी गई मछली की तरह तड़पती रहेगी। उसके पास एक ही चश्मा था। आंखों की रोशनी कम हो जाने के कारण चश्मे का नंबर बदल चुका था। आश्रम के व्यवस्थापक ने जब उसे नया चश्मा लाकर दिया तो वह बहुत खुश होकर बोली थी कि बहुत जरूरी था यह मेरे लिए। मेरा बेटा जब आयेगा तो ठीक से उसे देख तो सकूंगी। मां को आखिरी सांस तक यकीन था कि बेटा जरूर आयेगा। लेकिन वह नहीं आया। आश्रम प्रबंधन ने उसे मां के निधन की बार-बार सूचना दी लेकिन उसका कोई जवाब नहीं आया। फिर भी बेटे के आने की राह देखी गई। पूरे तीन दिन तक मां का शव बेटे का इंतजार करता रहा। आखिरकार पूरे सम्मान के साथ अभागी मां का अंतिम संस्कार कर दिया गया।
चित्र-3 : महाराष्ट्र में एक ऊंची पहाड़ी से गिरते बाप-बेटे और चंद सेकंड के बाद मां के छलांग लगाने का वीडियो जिसने भी देखा बस सन्न रह गया। आपसी विवाद, कलह-क्लेश की ऐसी भी परिणति हो सकती है वो सभी ने देखी। लड़ाई-झगड़े और मनमुटाव किस घर-परिवार में नहीं होते! इस कहानी का मुख्य पात्र कुणाल है जिसकी अपने पिता मुरलीधर से अनबन चल रही थी और मां दोनों के बीच पिस रही थी। कुणाल कोई आवारा किस्म का लड़का नहीं था। दसवी की परीक्षा में उसने 92 प्रतिशत अंक पाये थे। उसके माता-पिता आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। दोनों अलग-अलग रहते थे। कुणाल अपनी मां के साथ था। कुणाल चाहता था कि माता-पिता भी साथ रहे। उनके बीच दूरी की वजह एक दूसरी औरत भी थी। इसके साथ और भी कुछ जमीन संबंधित पारिवारिक विवाद थे जिनकी वजह से तनाव की स्थिति बनी रहती थी। उनके बड़े बेटे की कुछ वर्ष पूर्व बीमारी के कारण मौत हो गई थी। इससे भी उन्हें बहुत सदमा लगा था। कुणाल की मां संगीता खुद को व्यस्त तथा मन को शांत रखने के लिए सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहने लगी थी। उसने अपना एक यू-टयूब चैनल बनाया था, जिसमें तरह-तरह के वीडियोज पोस्ट करती रहती थी। मुरलीधर को संगीता का सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना रास नहीं आता था। तस्वीरों तथा वीडियो में संगीता जिस तरह से खुश दिखायी देती थी। उससे कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि कैमरे के सामने की मुस्कराहट के पीछे कितनी अशांति, तनाव और परेशानी अपना डेरा जमाये है।
कुणाल के पिता ट्रक चलाते थे। बेटे कुणाल ने उनसे बगैर पूछे महंगा मोबाइल फोन खरीदा था, जिसकी किश्ते भरने में उसे मुश्किल हो रही थी। पिता भी आर्थिक परेशानियों के चलते टालमटोल कर रहे थे। पिता के इस व्यवहार से भी वह आहत था। उसने पिता की मजबूरी को समझने की कोशिश नहीं की और पिछली बार की तरह इस बार भी पिता से तीखी बहस करने के पश्चात पहाड़ी पर चला गया। बेटा कहीं खुदकुशी न कर ले, इस डर से मां संगीता और पिता मुरलीधर तुरंत वहां जा पहुंचे। उन्होंने देखा कि कुणाल पहाड़ी के शिखर के एकदम किनारे खड़ा है। दोनों उससे पीछे हटने की गुहार लगाने लगे। जवाब में कुणाल ने अपना आईफोन, कलाई घड़ी और चांदी की चेन उतार फेंकी और मां से कहने लगा कि मेरी बात कोई नहीं सुनता। ऐसे में मेरी जीने की इच्छा नहीं रही। मेरी जिन्दगी की किसी समस्या का समाधान नहीं निकल पा रहा है। अब कुछ ठीक होगा भी नहीं। तीन घंटे तक उसे मनाने की कोशिशें चलती रहीं। जिद्दी बेटे को मनाने के लिए मां को अंतत: कहना पड़ा कि मैं जीवनभर तुम्हारे ही साथ रहूंगी। अपने पति से हमेशा-हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ दूंगी। यदि तुम्हें मेरी बात पर यकीन नहीं तो मैं अपना मंगलसूत्र अभी उतारकर फेंक देती हूं। बस अब एक बार तुम मेरा कहना मान लो। मां के बेटे के प्रति प्रेम लगाव, अपनत्व और स्नेह की ऐसी पराकाष्ठा! जहां पति पीछे तो बेटा बहुत पहले! मां के अंदर की गहराई को काश औलादें भी समझ पातीं। इस बीच घबराये पिता मुरलीधर बेटे को पकड़ने के लिए आगे बढ़े तो दोनों का संतुलन ही बिगड़ गया और दोनों ढाई सौ फीट गहरी खाई में जा गिरे। इस दर्दनाक मंजर को देखते ही सिर्फ चार सेकंड के भीतर मां संगीता ने भी पहाड़ी से छलांग लगाकर मौत का दामन थाम लिया। पहाड़ी पर और भी कई लोग जमा थे। नीचे भी भीड़ थी। अधिकांश लोग धड़ाधड़ वीडियो बनाने में लगे थे। कोई भी कुणाल को बचाने के लिए आगे नहीं आया। और एक परिवार पूरी तरह से खत्म हो गया।
चित्र-4 : मां बस मां होती है। ममता का कभी न सूखने वाला सागर। उसके स्नेह, दुलार और अपनत्व का अमृत यहां भी बरसता है और दूर बहुत दूर सात समंदर पार भी। कहीं कोई फर्क नहीं। अपने कलेजे के टुकड़े के लिए कुछ भी कर गुजरने और किसी भी तूफान से लोहा लेने को तत्पर रहने वाली मां जरूरी नहीं कि शारीरिक रूप से बहुत शक्तिशाली हो। उसके मन की विशालता को नापने वाला अभी तक कोई पैमाना नहीं बना। न्यूयार्क में रहती हैं जेसिका फ्लेचर। उनका एक 11 साल का बेटा है। नाम है, हंटर। हंटर ठीक से नहीं बोल पाता है। दूसरे बच्चों के साथ घुलने-मिलने, खेलने में उसे कोई रुचि नहीं। बात करते समय अक्सर उसकी नज़रें झुकी की झुकी रहती हैं। हंटर की मां उसकी कमजोरी को खूब जानती और समझती हैं। जेसिका अपने बेटे हंटर के साथ एक रेस्टारेंट में खाना खाने गई थी। हंटर बोल नहीं पाने के कारण एक डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल करता है। अचानक उस डिवाइस की बैटरी खत्म हो गई। बेटे के लिए अपनी बात कहना, बताना मुश्किल हो गया। मां जेसिका बहुत परेशान हो गईं, तो हंटर ने एक नेपकिन उठाया और उस पर कीबोर्ड बनाया और अपनी पसंद का खाना बताने लगा। हंटर के इस तरीके ने जेसिका को एक नया रास्ता दिखा दिया। जेसिका समझ चुकी थी कि टेक्निक कभी भी धोखा दे सकती हैं, इसलिए उन्होंने एक टैटू आर्टिस्ट की मदद से अपनी हाथ पर कीबोर्ड का पक्का टैटू ही बनवा लिया। अब जब भी डिजिटल डिवाइस बंद हो जाता है तो बेटा मां के हाथ पर बने अक्षरों को छूकर अपनी बात समझा देता है। जेसिका के इस टैटू में वर्ड स्माइली और एक दिल का सिंबल भी बना हुआ है। टैटू देखने के बाद बेटे ने मां के हाथ पर पहला शब्द टाइप किया, ‘मम्मा।’ मां का ये अनोखा तरीका बेटे को बहुत पसंद आया। सोशल मीडिया पर मां-बेटे की ये स्टोरी खूब वायरल होती रही और लाखों लोगों के दिलों को सतत छूती रही।

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