Thursday, November 5, 2026

हर तरफ हो प्रेरक उजाला

 कहीं न कहीं समय के साथ-साथ लोग भी बदल रहे हैं। बदलने को मजबूर भी होना पड़ रहा है। अजीब सी आपाधापी का समय है। सोशल मीडिया ने भी अपना खूब रंग दिखाया है। अनेकों लोगों को भटका और उलझाकर रख दिया है। मोबाइल ने लगभग सभी को ऐसे मोहजाल में फांसा है कि क्या बच्चे, क्या युवा और यहां तक उम्रदराज भी इसमें उलझकर अपना कीमती वक्त जाया कर रहे हैं। दिमाग को एकाग्र और ऊर्जावान बनाने वाली किताबों की पहले जैसी पूछ-परख नहीं रही। अच्छी प्रेरक और ज्ञानवर्धक पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने वाले पाठक कम हो गए हैं। सोशल मीडिया पर धड़ाधड़ आती भ्रामक खबरों तथा जानकारियों को सच माना जाने लगा है। दिन-रात काम धंधे और मोबाइल में व्यस्त माता-पिता के पास अपने बच्चों के लिए पहले जैसा वक्त नहीं। वे बेखबर हैं कि उनकी संतानें कैसे-कैसे और कौन से गलत मार्गों की राही बन हिंसक और निरंकुश हो रही हैं। जब धमाका होता है तब कहीं जाकर उनकी आंख खुलती है। लड़के-लड़कियों की महंगे-महंगे मोबाइलों की जिद्दी चाहत के चलते माता-पिता को कैसी-कैसी परेशानियां और कष्टों को झेलना पड़ रहा है, इसका पता तो आये दिन अखबारों तथा न्यूज चैनलों पर आनेवाली दिल दहलाने वाली खबरों से चल जाता है। ऑनलाइन गेम्स और जुए...सट्टेबाजी के शौक को अपनाकर पता नहीं कितने किशोरों तथा युवाओं ने अपने पालकों की खून-पसीने की जमा पूंजी को लुटाया, उड़ाया और अभी भी सीने पर खंजर पर खंजर चला रहे हैं। 

मानव में मानवता का होना निहायत जरूरी है। उदारता ही नर को नारायण बनाती है। हमारे पूर्वजों ने उत्सवी त्यौहार मनाने की शुरुआत यूं ही नहीं की होगी। हर धर्म के त्यौहार के साथ प्रेरक संदेश जुड़े हैं। इनसे खुशी मिलती है। ताजगी का भरपूर एहसास होता है। दीपावली के पर्व का महत्व घर, कार्यालय आदि की साफ-सफाई की सोच से ज्यादा मन की शुद्धता से जुड़ा है। जिस तरह से कचरा और गैरजरूरी सामान फेंक दिया जाता है, वैसे ही ईर्ष्या, शत्रुता, भेदभाव और अराजक विचारों से खुद को मुक्त कर दीपावली, होली, दशहरा को मनाने में ही वास्तविक बुद्धिमानी और सार्थकता है। मन के अंधकार को मिटाकर सकारात्मकता के प्रकाश को फैलाना ही दीपावली है। बाहर के साथ-साथ अपने भीतर जिसने उजाला कर लिया उसके लिए हर दिन दिवाली है। लोभ, काम, क्रोध और मोह को भी अंधकार का प्रतिरूप माना गया है। मेरी निगाह में तो हमारे पूर्वजों से महान और कोई मोटिवेशनल नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण की ‘गीता’ तो सदियों से प्रेरणा के दीप जलाती  चली आ रही है। उन्हीं से प्रेरित मोटिवेशन करने वालों की लंबी श्रृंखला दिखायी देती है। सभी का एक ही मत है कि भौतिक सुख-सुविधाओं का वास्तविक आनंद वही ले सकता है जो सच्चा, अच्छा, स्वस्थ और फुर्तीला है। लस्त-पस्त, लुंज-पुंज हालत में जीना कोई जीना नहीं। मोबाइल की लत से कैसे मुक्ति पाएं। कैसे रचनात्मक और सकारात्मक बनें इसकी सीख और सलाह वो सोशल मीडिया तो देने से रहा, जहां पर झोलाछाप किस्म के चेहरे चिकित्सक बन ज्ञान बांट रहे हैं। ये जड़ी बूटी खाओ, ऐसे कसरत करो, वैसे दौड़ो भागो, दूध मीठा जहर है, पनीर और घी से भी दूरी बनाओ, गेहूं की रोटी खाना बंद करो जैसे और भी कई सुझाव देते नये-नये नुस्खेबाजों ने लंबी उम्र पाने के लिए नसीहतों की झड़ी लगा रखी है। इन्हें कौन समझाए कि हमारे पूर्वजों ने दूध, दही, घी और गेहूं की रोटी की बदौलत सेहत से भरपूर लंबी उम्र पायी। बिना किसी जानकार डॉक्टर की सलाह के अंधा अनुसरण करना खतरनाक और जानलेवा साबित हो सकता है। और भी न जाने कितनी-कितनी भ्रामक और आधी-अधूरी गलत जानकारियों की भीड़ के दौर में शब्दों और विचारों की दुनिया में कहीं कोई धोखाधड़ी और मिलावट नहीं है। डॉक्टर शारीरिक और मानसिक बीमारियों का इलाज करने के लिए मोटी-मोटी फीस लेकर जेब खाली कर देते हैं, लेकिन आधुनिक मोटिवेशनरों के प्रेेरक संदेशों को अपनाने भर से हमारी-आपकी जिन्दगी संवर सकती है। प्रेरक सुविचार यकीनन हमारा जीवन बदल सकते हैं.....

*मोटिवेशन या अभिप्रेरणा में वह शक्ति है जो  व्यक्ति को अपने उद्देश्य को पाने के लिए प्रेरित करती है और ऊर्जावान बनाती है। 

*अच्छे और रचनात्मक विचारों को दोहराना हमारे मन को दृढ़ बनाता है। सकारात्मक विचार हमारे मन में समाधान और सुधार के बीज बोते हैं। इनका निरंतर अभ्यास आत्मसम्मान का भाव बढ़ाता है।

*हफ्ते में एक दिन या कुछ घंटे के लिए मोबाइल से पूरी तरह से दूर रहें। इस  समय को अपनों के साथ बिताएं। बच्चों और बड़ों की सुनें और सुनाएं।

*यात्रा में मोबाइल बंद कर देना, कोई किताब पढ़ लेना, संगीत सुनना या सफर में आते-जाते दृष्यों को महसूस करना ताजगी भर सकता है।

*ऊर्जा और स्पष्टता के लिए दिमाग को पर्याप्त आराम दें। अपनी नींद पूरी करेंं। आराम करना, समय खराब करना नहीं है। इससे आपकी कुशलता बढ़ती है।

*हर चीज की प्रतिक्रिया देना, उससे सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है। चुप रहना और आसानी से रिएक्ट न करना हमारी विचार प्रक्रिया को मजबूत बनाता है। चुप्पी हमें शांति, अकेलापन और एकांत देती है। ये वो गुण हैं, जो हमारे दिमाग को सूचनाओं के ओवरलोड से बचाते हैं।

*अपनों से दिल का हाल बताएं। उनका हालचाल जानें। पास हों तो सीधी बात करें, दूर हों तो नंबर डायल करें, लेकिन बात जरूर करें।

*हम परिवार, समाज, शिक्षकों, किताबों और अनुभवों से बहुत कुछ सीखते हैं। दूसरे लोगों के अनुभव हमारे निर्णयों को बेहतर बना सकते हैं।

*स्वयं के प्रति दयालु रहें। अपने खुद के भी दोस्त बनें। एक अच्छे दोस्त की तरह ही खुद को सहारा दें।

*अपनी पसंद का कोई हुनर सीखें, कविता, कहानी, लेख लिखें, गिटार बजाएं, पेंटिग्स करें, गीत गुनगुनाएं।

*पचास के बाद की जिन्दगी को आर्थिक रूप से सुरक्षित बनाने के लिए सही निवेश करें।

*यदि मन शांत और संतुष्ट है तो साधारण परिस्थितियों में भी खुशी और आनंद मिल सकता है। 

*बदलते हालात के अनुसार खुद को ढालें। लचीला दृष्टिकोण अपनाएं।

*धैर्य ही आपको सफल बनाता है और दूसरों से आगे रखता है। 

*जितना संभव हो, अपनी लय बिगड़ने न दें।

*तुरंत प्रतिक्रिया देने से बचें।

*सीखने के अवसरों की सतत तलाश करें।

*कठोर शब्दों पर न जाएं, सीख पर ध्यान दें।

*अपने इरादों को छुपा कर रखें।

*अपनी सीमाओं को पहचानें।

*योग और व्यायाम से मुंह न मोड़ें।

सहजता और सरलता के साथ जीवन आसान करते हुए बेफिक्री का दामन थामे रहें। चिंता, भय और अस्थिरता से बात बनती नहीं, बिगड़ती है। 

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