Thursday, September 27, 2012

वफादारी का ईनाम

देशभर में काला धन के खिलाफ बिगुल बजाते फिरते बाबा रामदेव घटिया तेल, नमक, लीची शहद, जैम आदि बाजार में खपा कर लोगों की जिन्दगी से खिलवाड कर रहे हैं। वैसे इस तरह के घटिया काम घटिया किस्म के व्यापारी किया करते हैं। रामदेव बाबा तो योगी हैं। योगी के साथ ऐसा दुर्योग...! हैरान परेशान करने वाली बात तो है। देशवासियों को जागृत करने की कसरत करने वाले बाबा अपने बचाव में लाख दलीलें दें, पर उत्तराखंड खाद्य विभाग की रिपोर्ट ने दबी-छिपी सच्चाई सामने लाकर रख दी है। योगी के भीतर दुबक कर बैठे मुनाफाखोर के इस मलीन चेहरे को भी लोगों ने देख लिया है। उनके अंध भक्त इसे भी सरकारी साजिश बताने से बाज नहीं आएंगे। इस मुल्क में जितने भी बाबा हैं, उनका सारा का सारा साम्राज्य उनके अंध भक्तों की बदौलत ही टिका हुआ है। इन अंध भक्तों में कई तो ऐसे होते हैं जिनके ऊपर 'बाबा' के बहुतेरे उपकार होते हैं। 'बाबा' के गोरखधंधो को आगे बढाने में भक्तों का भी खासा योगदान होता है। राजनीति की तरह यहां भी 'चोर-चोर मौसेरे भाई' की कहावत चरितार्थ होती रहती है।
रामदेव, पतंजली योगपीठ और दिव्य फार्मेसी के कर्ताधर्ता हैं, जहां अरबो-खरबों का धंधा होता है। उनके आश्रम में शुरू-शुरू में 'योगासन' पर विशेष ध्यान दिया जाता था। माया के चक्कर ने अपनी ऐसी माया दिखायी कि आश्रम में नमक, काली मिर्च, लीची शहद, पाचन चूर्ण, काली मिर्च, तरह-तरह की यौन शक्तिवर्धक दवाओं के साथ-साथ और भी बहुत कुछ बनने लगा। कहीं और बने सामानों को भी बाबा की कंपनी का ठप्पा लगाकर धडल्ले से बेचा जाने लगा। योग ने बाबा की 'साख' जमा दी। चंदा भी जम कर बरसने लगा। बाबा जान-समझ गये कि जनता उनकी मुरीद हो चुकी है। वे जो भी माल खपाना चाहें खपा सकते हैं। अब जब पोल खुलने लगी है तो रामदेव कहते हैं कि उन्होंने सरकार के खिलाफ जंग छेड रखी है इसलिए उन पर बदले का डंडा चलाया जा रहा है। वे ये भी फरमाते हैं कि यह आम आदमी और अमीरों के बीच की जंग है। बाबा खुद को आम आदमी मानते हैं!
रामदेव भले ही खुद को आम आदमी प्रचारित कर आम आदमी की सहानुभूति बटोरने की कोशिशों में लगे हुए हैं पर असली आम आदमी इतना बेवकूफ नहीं है कि हकीकत से वाकिफ न हो। दिव्य फार्मेसी के बैनर तले देशभर में खुली बाबा की दूकानों पर जो भी माल बिकता है उसकी ऊंची कीमतें ही बता देती हैं कि रामदेव की असली मंशा क्या है। दरअसल वे भी नेताओं की तरह आम आदमी के झंडे को ऊंचा उठाकर अपना असली हित साधने में लगे हैं। उनके व्यवसायी मकसद और असीम महत्वाकांक्षाओं के बारे में जितना भी लिखा जाए, कम है। कुछ महीने पहले तक देश जो सपना देख रहा था उसकी धज्जियां उड चुकी हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ अगर रामदेव, अन्ना हजारे की तरह पारदर्शी होते तो जनहित की जंग की ऐसी दुर्गति न होती। जब तक अन्ना और उनकी विद्राही टीम अकेले 'लोकपाल' की मांग पर अडी थी, तब तक सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। जैसे ही बाबा ने अन्ना के मंच पर पांव धरे, सारा मामला ही गडबडा गया। अन्ना टीम बिना कोई भेदभाव किये सभी भ्रष्टाचारियों पर निशाना साधना चाहती थी, वहीं बाबा कुछ को नजरअंदाज करने की भूमिका में थे। उन्हें सारी की सारी कमियां कांग्रेस में ही नजर आयीं। भारतीय जनता पार्टी के जगजाहिर भ्रष्टाचारियों को भी उन्होंने पाक-साफ होने के प्रमाण पत्र बांटने में कोई कमी नहीं की।
पिछले वर्ष अन्ना आंदोलन के साथ जो भीड खडी नजर आती थी, वह धीरे-धीरे नदारद होती चली गयी। अन्ना का इसमें कोई दोष नहीं था। दोषी थे तो सिर्फ और रामदेव जिन्होंने 'योग' के मार्ग को त्यागकर व्यापार की राह पकड ली थी। अन्ना सभी को एक ही तराजू में तोलने में यकीन रखते आये हैं। उनका ठिकाना एक मंदिर था तो योगी ने देश तो देश विदेशों में भी टापू खरीदने शुरू कर दिये थे। आश्रम में बनने वाले विभिन्न सामानो का धंधा भी जोर पकड चुका था। उनके धंधे पर भी उंगलियां उठने लगी थीं। अपने 'गुरू' को गायब करा देने के संगीन आरोप भी रामदेव पर लगे। शीशे के घर में रहने वाला चतुर-चालाक बाबा राजनीति के दस्तूर को समझ नहीं पाया! बाबा अगर सिर्फ योगी होते तो उन्हें कटघरे में खडा करने की कोई जुर्रत ही न कर पाता। अन्ना और रामदेव के इसी फर्क ने एक अच्छे-खासे आंदोलन को पानी पिला दिया है। अन्ना की कोई मजबूरी नहीं। रामदेव की अनेकों मजबूरियां हैं। अन्ना हजारे सीधे और सरल किस्म के समाजसेवक हैं। वे सच को सच और भ्रष्ट को भ्रष्ट कहने में कोई संकोच नहीं करते। बाबा बहुत नापतोल कर चलते हैं। उनके धंधे ही कुछ ऐसे हैं, जिनके कारण उन्हें अपने बचाव और पक्ष में खडे होने और बोलने वाले राजनेताओं की जरूरत पडती रहती है। उनका यह काम भाजपा वाले पूरी ईमानदारी के साथ करते चले आ रहे हैं। अब तो किरण बेदी भी भाजपा के साथ खडी हो चुकी हैं। किरण बेदी का रंग बदलना लोगों को हैरान कर गया है। भाजपा को तो ऐसे 'गिरगिटी' चेहरों की तलाश रहती है। तभी तो उसने अभी से दिल्ली की गद्दी पर किरण को बैठाने के सपने भी देखने शुरू कर दिये हैं। अगर ये सपना पूरा नहीं हुआ तो राज्यसभा की सांसद तो बन ही जाएंगी किरण बेदी। हर किसी को 'वफादारी' का ईनाम मिलना ही चाहिए...।

Thursday, September 20, 2012

चाटूकारों के चक्रव्यूह में फंसा आम आदमी

हिं‍दुस्तान के गृहमंत्री सुशील कुमार शिं‍दे राजनीति में पदार्पण करने से पहले महाराष्ट्र पुलिस में पदस्थ थे। एक अदने से सब इंस्पेक्टर की 'प्रतिभा' को मराठा क्षत्रप शरद पवार ने जांचा-परखा और राजनीति में आने की सलाह दे डाली। खाकी वर्दीधारी ने खादी धारण करने में जरा भी देरी नहीं लगायी।
पुलिसिया चाल-ढाल में रचे-बसे सुशील कुमार शिं‍दे ने राजनीति के क्षेत्र में भी बडी आसानी से अपनी जडे जमानी शुरू कर दीं। उन्हें महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री भी बनाया गया। वर्तमान में वे देश के गृहमंत्री हैं। अपने शुरुआती दौर के आका से काफी आगे निकल चुके हैं। शरद पवार को यह बात यकीनन खलती होगी। जिसे रास्ता दिखाया उसी ने धक्का मारकर पीछे धकेल दिया। शिं‍दे गांधी परिवार के परम भक्त हैं। पवार तो सोनिया गांधी के विदेशी मुद्दे को लेकर कांग्रेस पार्टी तक को छोड अपनी खुद की पार्टी बना चुके हैं। आज वे राष्ट्रवादी कांग्रेस के सर्वेसर्वा हैं। राजनीति के विद्वानों का मानना है कि यदि शरद पवार ने कांग्रेस नहीं छोडी होती तो उन्हें इस कदर मायूसी का मुंह नहीं देखना पडता। ये उनकी अकड और भूल ही थी जिसने उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी से बहुत दूर कर दिया। देखते ही देखते उनका चेला गृहमंत्री बन गया है। यानी आने वाले समय में उसके लिए प्रधानमंत्री बनने की अनंत संभावनाएं बाहें फैलाये खडी हैं। भूतपूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय ज्ञानी जैल सिं‍ह और सुशील कुमार शिं‍दे एक ही मिट्टी के राज योद्धा कहे जा सकते हैं जिन्होंने कसीदे पढने में महारत के दम पर बुलंदियां हासिल कीं। ज्ञानी जी बेहिचक कहा करते थे कि अगर श्रीमती इंदिरा गांधी उन्हें आदेश देंगी तो वे झाडू लगाने से भी नहीं कतरायेंगे। वे बेझिझक स्वीकारते थे कि उनकी इसी योग्यता ने उन्हें देश के राष्ट्रपति बनवाया है। सुशील कुमार शिं‍दे भी कांग्रेस तथा सोनिया गांधी के अहसानमंद हैं, जिन्होंने उन्हें वहां तक पहुंचाया है, जहां पहुंचने के लिए कई दिग्गज कांग्रेसी अपनी सारी उम्र खपा चुके हैं और थक-हार कर बैठ गये हैं। बेचारों की तमाम उम्मीदें तमाम हो गयी हैं। आज के राजनीतिक दौर में चरण वंदना और स्वामिभक्ति का पुरस्कार मिलता ही है। जिनकी खुद्दारी उन्हें बार-बार नतमस्तक नहीं होने देती वे चाटूकारों से बहुत पीछे रह जाते हैं। कई चाटूकार तो हद दर्जे के चालाक हैं। जिसे दूसरे लोग मक्खन बाजी कहते हैं उसे वे निष्ठा और वफादारी कहते हैं। उनकी इस निष्ठा को लेकर भले ही लोग उनकी खिल्ली उडाते रहें पर उन्हें कोई फर्क नहीं पडता। इन निष्ठावानों के लिए जनता जनार्दन कोई मायने नहीं रखती। इन्हें पुरस्कृत करते चले जाने वाले 'आका' ही इनके एकमात्र भगवान हैं। जो इनके दिल और दिमाग में हरदम बसे रहते हैं। भगवान के समक्ष आम इंसानों का कोई मोल नहीं है तभी तो देश के गृहमंत्री ये कहते नहीं हिचकते: 'बोफोर्स मामले की तरह जल्द ही कोयला घोटाले को भी भुला दिया जायेगा। इस देश की आम जनता तो हद दर्जे की भुलक्कड है।' एक निहायत ही जिम्मेदार मंत्री के जब ऐसे विचार हों तो मन में कई तरह के विचारों का आना स्वाभाविक है। देश की जनता की स्मरणशक्ति को शुन्य मानने वाले विद्वान गृहमंत्री के कथन में ये संदेश छिपा दिखता है कि तमाम भ्रष्टाचारी बेखौफ होकर अपने गोरखधंधे चलाते रहें। सरकार भी आंख और कान बंद कर ले। सरकारी संपदा लुटती है तो लुटती रहे। लुटेरों का बाल भी बांका नहीं होना चाहिए। आम जनता तो एक कान से सुनती है और दूसरे से निकाल देती है। विरोधियों का तो काम ही है चीखना-चिल्लाना। जो लोग नेताओं को वोट देकर सत्ता तक पहुंचाते हैं वे तो अंधे-बहरे हैं। उनसे डर काहे का...!
ऐसा भी लगता है कि शिं‍दे ने खयाली पुलाव खाने और पचाने में महारत हासिल कर ली है। उन्हें सोनिया गांधी की मेहरबानियां तो याद हैं पर उस जनता को भूल गये हैं जिसने उन्हें वोट देकर इतने ऊंचे ओहदे तक पहुंचाया है। अगर आम आदमी ने उन्हें घास नहीं डाली होती तो वे आज भी 'खाकी' में लिपटे भ्रष्ट मंत्रियों-संत्रियों की सेवा और पहरेदारी में लगे नजर आते। शिं‍दे जी, जिनके वोट की बदौलत आज आप देश के गृहमंत्री बने हैं उनके साथ अहसान फरामोशी मत कीजिए! इस मुल्क का लोकतंत्र आपको कभी माफ नहीं करेगा। इस देश की जनता, जो आपको भुलक्कड और अनाडी नजर आ रही हैं, वही आप जैसों को ऐसा सबक सिखायेगी कि होश ठिकाने आ जाएंगे।
क्या आपकी याददाश्त का दिवाला पिट गया है जो आप कसीदे पढने के चक्कर में सच्चाई का गला घोंटने पर उतारु हैं? जब बोफोर्स स्कैंडल सामने आया था तब देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की कैसी दुर्गति हुई थी और आम जनता ने कांग्रेस को किस तरह से दुत्कार कर सत्ता से बाहर कर दिया था, इसकी हकीकत आज भी देशवासियों के दिलो-दिमाग में ताजा है। बोफोर्स की वजह से ही कांग्रेस इस कदर धराशायी हुई कि वर्षों बीत जाने के बाद भी उठ नहीं पायी है। बैसाखियों के दम पर वह केंद्र की सत्ता का 'भोग' जरुर कर रही है पर इस भोग का 'रोग' उसके तन-बदन को खोखला करता चला आ रहा है। देश पर जबरन आपातकाल थोपने वाली श्रीमती इंदिरा गांधी को भी आम जनता की जागरूकता की वजह से सत्ता खोने की असहनीय पीडा से रूबरू होना पडा था। देश की आम जनता कोयला घोटाले को भला कैसे भूल सकती है? इसकी वजह से ही तो कई दिग्गज 'नकाबपोशों' का असली चेहरा सामने आया है। लोग तो उनका मुंह नोच लेना चाहते हैं और गृहमंत्री जी आप हैं कि...?

Thursday, September 13, 2012

असली राष्ट्रद्रोहियों को पहचानो

मंत्री और सांसद अपनी गरिमा खोने लगे हैं। उन्हें अब लोगों के सवाल रास नहीं आते और आग बबूला हो उठते हैं। आम जनता का गुस्सा भी उफान पर है। पता नहीं क्या कर बैठे। नये-नये घपले-घापे और तमाशे सामने आ रहे हैं। यह सिलसिला कहां पर जाकर थमेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। पिछले दिनों पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को एक कार्टून इतना आहत कर गया कि उन्होंने कार्टूनिस्ट को जेल में सडाने की ठान ली। ऐसा लगा कि इस देश में लोकतंत्र का जनाजा निकालने की तैयारी हो रही है। जिस शख्स ने ममता का कार्टून बनाया और जेल यात्रा की सजा भुगती, वह कोई अनपढ गंवार नहीं है। अंबिकेश महापात्र नाम है इनका। जादवपुर विश्वविद्यालय में केमेस्ट्री के प्रोफेसर हैं। कार्टून के जरिये वे दंभी ममता को 'राजधर्म' से अवगत कराना चाहते थे। परंतु ममता उखड गयीं, जैसे किसी ने भरे चौराहे पर तमाचा जड दिया हो। सत्ता के मद में चूर मुख्यमंत्री ने अपना आपा खो दिया। दरअसल ममता अपनी ही छवि को ध्वस्त करने पर तुली हैं। जब देखो तब अपनी पर आ जाती हैं। किसी भी नागरिक को मुख्यमंत्री, मंत्री से प्रश्न पूछने का पूरा अधिकार है। आमसभा के दौरान एक किसान ने अपने प्रदेश की मुख्यमंत्री पर सवाल दागा कि 'आप कब तक खोखले वादे करती रहेंगी? गरीब किसान मर रहे हैं और आपको उनकी कोई चिं‍ता नहीं है...! आप किसानों के उद्धार के लिए कुछ करना भी चाहती हैं या यूं ही भाषणबाजी करती रहेंगी?' किसान की पीडा को समझने की बजाय ममता भडक उठीं। उनका खून खौल उठा। एक अदने से किसान की उनसे सवाल पूछने की हिम्मत कैसे हो गयी! गुस्सायी मुख्यमंत्री ने मंच से ही दहाड लगायी कि हो न हो यह कोई माओवादी ही है जो उनकी सभा में बाधा पहुचाने के लिए आया है। मुख्यमंत्री के आरोप जडने की देरी थी कि पुलिस वालों ने उसे फौरन गिरफ्तार कर लिया। अगले दिन उसे रिहा भी कर दिया फिर पता नहीं क्या हुआ कि दो दिन बाद उसे फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। इस बार उस पर मुख्यमंत्री पर हमले का प्रयास करने, आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने और शांति भंग करने के संगीन आरोप जड दिये गये। ऐसे 'खतरनाक' शख्स को सबक सिखाया जाना जरूरी था। अदालत ने जमानत नहीं दी और उसे उसके सही ठिकाने यानी जेल में डाल दिया गया। ममता को हर वो आदमी अपना दुश्मन लगता है जो उन्हें आईना दिखाने की चेष्टा करता है। सच से खौफ खाने वाली इस मुख्यमंत्री के प्रदेश में वही लोग सुरक्षित हैं जो उनकी आरती गाते हैं। हाल ही में प्रगतिशील लेखक नजरूल इस्लाम की लिखी एक किताब पर इसलिए प्रतिबंध लगा दिया गया, क्योंकि इसमें मुख्यमंत्री पर उंगलियां उठायी गयी हैं और ऐसे-ऐसे सवाल किये गये हैं जो उन्हें कतई पसंद नहीं हैं। लेखक नजरूल इस्लाम सार्थक लेखन के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने वाम मोर्चा की सरकार के कार्यकाल में पुलिस के राजनीतिकरण पर भी एक सशक्त किताब लिखी थी जिसने तब के शासकों की नींद हराम करके रख दी थी। उन्होंने भी लेखक को कानूनी दांव-पेंच में उलझाया था पर अंतत: सच की जीत हुई थी। ममता चाहतीं तो इतिहास से सबक ले सकती थीं। पर वे भी वही सब कर रही हैं उनके पूर्ववर्ती शासकों ने किया था। लगता है कि अहंकार बुद्धि पर हावी हो चुका है। सच, सोच और सजगता की बलि चढाने की प्रतिस्पर्धा चल रही है।
कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी ने भ्रष्ट व्यवस्था पर निशाना साधते हुए कार्टून बनाया तो उन्हें देशद्रोही करार देते हुए १४ दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। देश की सजग जमात ने सरकारी तांडव का जमकर विरोध किया। सारा का सारा मीडिया भी असीम के पक्ष में खडा हो गया तो महाराष्ट्र के सरकारी तंत्र की जमीन खिसकने लगी। असीम त्रिवेदी एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के पोते हैं। उन्हें मालूम है कि हिं‍दुस्तान को आजाद कराने के लिए कितनी और कैसी-कैसी कुर्बानियां दी गयीं। जब उन्होंने देखा कि शहीदों के सपनों का भारत कहीं नजर नहीं आ रहा तो वे आहत हो उठे। व्यवस्था के खिलाफ अपना विरोध दर्शाने के लिए उन्होंने कार्टून विधा का सहारा लिया। सरकार और उसके तमाम पुर्जे चापलूसी पसंद करते हैं। आलोचना और विरोध तो कतई नहीं। सरकार ने जब देखा असीम सच की लडाई लडने वाला एक जिद्दी नौजवान है और देश के करोडों लोग भी उसके साथ खडे हो गये है तो उसने उसे रिहाई देने में ही अपनी भलाई समझी।
यह कितनी अजीब बात है कि कई राजनेता मीडिया का सामना करने का साहस तक खोते जा रहे हैं। कांग्रेस के सांसद नवीन जिं‍दल ने हजारों करोड के कोयला कांड में शामिल होकर अपनी छवि को तो कलंकित करने में किं‍चित भी देरी नहीं लगायी पर जब मीडिया से रूबरू होने की बारी आयी तो हाथ-पांव चलाने लगे! जिस देश में गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और बदहाली के कारण करोडो लोगों का जीना हराम हो गया हो वहां अगर कुछ गिने चुने लोग सरकारी संपदा को लूटने में लगे हों और शाही जीवन बिता रहे हों तो वहां गुस्से के बारूद नहीं तो और क्या फूटेंगे? क्या ऐसे भ्रष्टाचारी ठगों और लुटेरों को नजर अंदाज कर दिया जाए? आज जनता देश के हुक्मरानों से पूछ रही है कि सच को उजागर करने वाले कार्टूनिस्ट, लेखक और किसान देशद्रोही हैं या अरबो-खरबों की सरकारी संपदा चट कर जाने वाले ये तथाकथित राजनेता जिनका कोई ईमान-धर्म नहीं है...।

Thursday, September 6, 2012

यारों, दोस्तों और रिश्तेदारों की अंधी लूट

देश को लूटने की होड मची है। कई राजनेता और उद्योगपति तो इस खेल के पुराने खिलाडी रहे हैं। अब तो मीडिया के दिग्गजों के नाम भी सुर्खियां पाने लगे हैं। ऐसा लगता है कि सभी लुटेरे बडी हडबडी में हैं। क्या पता कल मौका मिले या ना मिले। आज मिला है, तो जी भरकर लूट लो...। देश भक्त होने का ढोल पीटने की पोल खुल रही है। इनकी दगाबाजी को देखकर आम जनता इतने गुस्से में है कि अगर उसका बस चले तो वह इन्हें भरे चौराहे पर खडा कर दुरुस्त कर दे। बेचारी आम जनता बेबस है इसलिए देश मनमानी लूट का तांडव मचा है...।
देश के प्रधानमंत्री बडे गजब के इंसान हैं। उन्हें आम जनता की तकलीफें दिखायी नहीं देतीं। किसानों की आत्महत्याओ की खबरें उन्हें विचलित नहीं करतीं। महंगाई के दानव के दंश की मार से आहत आम जनता की फरियाद सुनने का उनके पास वक्त नहीं है। हर सवाल के जवाब में उनके पास सिर्फ 'खामोशी' है। तो फिर आखिर वे सुनते किसकी हैं और किनके समक्ष हथियार डालने में देरी नहीं लगाते? जवाब खुद-ब-खुद सामने आते चले जा रहे हैं। सवा सौ करोड से अधिक जनता के सीधे-सरल प्रधानमंत्री के कानों तक चंद मंत्रियों, सांसदों और उद्योगपतियों की आवाज फौरन पहुंच जाती है और उनकी हर मंशा भी पूरी कर दी जाती है! देश के पर्यटन मंत्री सुबोधकांत सहाय ने जब अपने भाई सुधीर सहाय की कंपनी के नाम की सिफारीश की तो उन्होंने फौरन थाली में परोस कर कोयले की खदानें सौंप दीं। भाई ने करोडों रुपये कमा लिये और मंत्री जी भी गदगद हो गये। उनके लिए मनमोहन सिं‍ह किसी फरिश्ते से कम नहीं। एक ही झटके में सात पीढि‍यों की 'ऐश' का इंतजाम हो गया। देश सेवा का इससे अच्छा 'मेवा' और क्या हो सकता है। ऐसे में कौन होगा जो 'राजनेता' नहीं बनना चाहेगा? इस मुखौटे की आड में सबकुछ करने की खुली छूट मिल जाती है। अमानत में खयानत करने का लायसेंस भी मिल जाता है। चोरी के पकडे जाने पर बचाव की कला भी आ जाती है।
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद विजय दर्डा को भी अरबों रुपयों की कोयला खद्दानों के लिए ज्यादा पापड नहीं बेलने पडे। विजय दर्डा सांसद होने के साथ-साथ मीडिया के दिग्गज भी कहलाते हैं। महाराष्ट्र में उनके 'लोकमत' की खासी धाक है। हिं‍दी और अंग्रेजी में भी दैनिक निकालते हैं। चैनल आईबीएन ७ भी उनकी मुट्ठी में है। यानी अच्छे-खासे बलशाली हैं ये कांग्रेसी सांसद। ऐसे में मनमोहन सिं‍ह की क्या मजाल कि उनकी मंशा पूरी न होने देते। उन्हें तो उन्हें, उनके दोस्त को भी कौडि‍यों के मोल कोयला ब्लॉक दे दिये गये। दर्डा यारों के यार हैं। मीडिया का फायदा लेना उन्हें खूब आता है। वे जानते हैं कि बुरे वक्त में दोस्त और भाई-बेटे ही काम आते हैं। इसलिए वे अपनों का खास ख्याल रखते हैं। उन्हें किसी भी तरीके से मालामाल करने की जुगाड में लगे रहते हैं। ताकि वक्त आने पर 'रिश्ते' काम आ सकें। वे हर राजनीतिक पार्टी के मुखिया के साथ करीबी बनाये रखने में भी माहिर हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी भी उनके खासमखास हैं। ज्यादा दिन नहीं हुए जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की आरती गाते देखे गये थे। लगता है कांग्रेस ने तभी तय कर लिया था कि इन्हें तो मजा चखाना ही है। विजय दर्डा के छोटे भाई राजेंद्र दर्डा महाराष्ट्र सरकार में शिक्षा मंत्री हैं। बेटे की भी बडी-बडी कंपनियों में साझेदारी है। फाइव स्टार होटल और स्कूल-कालेज भी चलाते हैं यानी सर्वशक्तिवान हैं। यह भी कह सकते हैं कि दर्डा परिवार बलवानों और धनवानों का जमावडा है। आज के दौर में सिर्फ और सिर्फ ऐसे ही मायावानों का सिक्का चलता है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय सचिव किरीट सौमेया के अनुसार दर्डा परिवार और जायसवाल समूह की अटूट कमाऊ भागीदारी है। इन्हें पानी के मोल नौ खद्दाने आवंटित की गयी हैं। जिसमें २५ हजार करोड का घोटाला हुआ है। नागपुर के जायसवाल बंधु केंद्रीय कोयला मंत्री श्री प्रकाश जायसवाल के भी रिश्तेदार हैं। है न कमाल की बात। यारी-दोस्ती और रिश्तेदारी के बलबूते पर देश की अरबों-खरबों की खनिज संपदा की लूट मची है। दूसरी तरफ कोयला मंत्री यह बयान देकर जनता के आक्रोश को शांत करना चाहते हैं कि मंत्रियों तथा सांसदो के रिश्तेदारो को भी धंधा करने का पूरा हक है। वे भी इस देश के नागरिक हैं। किसी मंत्री के भाई या उसके रिश्तेदार को कोल ब्लाक आवंटित करने को लेकर सवाल उठाना बेमानी है। यह कहां का इंसाफ है कि यदि कोई किसी सांसद और अखबार वाले का करीबी है, तो उसे कोयले की खद्दानें न दी जाएं? मंत्री जी जो चाहें कहते रहें। उन्हें भी अपनी बात कहने का पूरा हक है। हमारा भी यही कहना है कि सत्ताधीशों और नेताओं के करीबियों को सौ खून माफ हैं। वे सबकुछ करने को स्वतंत्र हैं। वे जहां चाहें लूट मचायें, देश को खा-चबा जाएं उन्हें कोई कुछ नहीं कहने वाला। यह देश 'ऊंचे लोगों' की बपौती बनकर रह गया है। इन्हीं ऊंचों की तिजोरियों में देश की अस्सी प्रतिशत दौलत सिमट कर रह गयी है। आम आदमी जहां का तहां है, क्योंकि उसकी किसी मंत्री, सांसद, उद्योगपति, अफसर, अखबारी लाल आदि-आदि से कोई दोस्ती या रिश्तेदारी नहीं है।

Thursday, August 30, 2012

चोर मचाए शोर

देश के नौजवानों का गुस्सा उफान पर है। अब उन्हें आश्वासनों से आश्वस्त कर पाना आसान नहीं है। युवकों की एक बडी जमात को यह बात समझ में आ गयी है कि देश के वर्तमान शासकों में से ज्यादातर भरोसे के काबिल नहीं हैं। देश को रसातल में ले जाने के दोषियों की लगभग शिनाख्त हो चुकी है। ऐसे विकट दौर में मुल्क की राजनीति के मंच पर कोई भी ऐसा चेहरा नजर नहीं आता जिस पर आज की पीढी पूरी तरह से यकीन कर सके। यही वजह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लडाई लडने वालों को किराये की भीड जुटानी नहीं पडती। लोकपाल के लिए सतत संघर्षरत अन्ना हजारे इसका ज्वलंत उदाहरण हैं। उनके एक इशारे पर देशभर में युवाओं के हुजूम का सडकों पर उतर आना यही दर्शाता है कि वे वर्तमान शासन व्यवस्था से नाखुश हैं। उन्हें किसी ऐसे नायक की बेसब्री से तलाश है जो देश की डूबती नैय्या को किनारे लगा सके।
अन्ना हजारे और उनकी टीम पिछले डेढ वर्ष से भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेडे हुए है। मनमोहन सरकार जब टस से मस होती नहीं दिखी तो टीम ने राजनीति के मैदान में उतरने का ऐलान कर दिया। कई राजनेताओं ने इस फैसले की खिल्ली उडायी। इस खिल्ली के पीछे जबरदस्त भय छिपा है। भ्रष्टाचारी हमेशा भयग्रस्त रहते हैं। सत्ता के लुट जाने का डर उनकी नींद हराम किये रहता है। अगर शासक पूरी तरह से ईमानदार होते तो 'लोकपाल' कब का अस्तित्व में आ चुका होता। जहां अपनी गर्दने कटने का डर हो वहां नंगी तलवारें नहीं लटकायी जातीं। कोई बेवकूफ ही ऐसी भूल करेगा। हमारे देश के नेता तो वैसे भी जनता को बेवकूफ बनाने के लिए जाने जाते हैं। कल तक अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लडने वाले अरविं‍द केजरीवाल और उनके समर्थक बीते रविवार को जब कोयला घोटाला मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिं‍ह, सप्रंग अध्यक्ष सोनिया गांधी और भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी के आवास को घेरने निकले तो उनके साथ जोशो-खरोश से लबालब युवक-युवतियों की जो भीड थी, उसने यह संदेश तो दे ही दिया है कि सत्ता की आड में लूटमार करने वाले शासक और राजनेता सावधान हो जाएं। भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने के लिए सडक पर उतरे योद्धाओं ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि लगभग सभी राजनीतिक दलों में ऐसे लोग शामिल हैं जो मुल्क की संपदा को लूटने में कोई परहेज नहीं करते। कांग्रेस और भाजपा के नेताओं ने मिलजुल कर कोयले की अंधी लूट मचायी और अरबो-खरबों के वारे-न्यारे किये। इस हकीकत को पता नहीं क्यों किरण बेदी ने नजर अंदाज कर दिया! उन्हें भाजपा ईमानदार लगने लगी और कोयले के सर्वदलीय लुटेरों के खिलाफ सडक पर उतरने से कन्नी काट गयीं। कल तक अन्ना टीम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती रहीं किरण बेदी के इस नये रूख में भी रहस्य छुपे हैं। नितिन गडकरी ऐसे चेहरों पर नजर बनाये रखने में माहिर हैं। कुछ माह बाद यदि यह खबर सुनने में आती है कि किरण बेदी को भाजपा ने राज्यसभा का सांसद बनाने की तैयारी कर ली है तो आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए। सडक से लेकर संसद तक छिडे कोल युद्ध में राजनेताओं को एक दूसरे पर कीचड उछालने का भी अच्छा-खासा अवसर मिल गया।
भाजपा की कद्दावर नेत्री सुषमा स्वराज ने डंके की चोट पर कह डाला कि कांग्रेस ने सिर्फ कोयले की दलाली में ही नहीं, बल्कि लोहे की दलाली में भी 'मोटा माल' खाया है। कांग्रेस के बयानवीरों ने जब सुषमा को रेड्डी बंधुओं की याद दिलायी तो उन्होंने रहस्योद्घाटन कर डाला कि कांग्रेस के एक मुख्यमंत्री ने रेड्डी बंधुओ से भी मोटी थैलियां ली थीं। हमारे यहां के नेता बडे कमाल की चीज हैं। पता नहीं कौन-कौन से रहस्य अपने अंदर दबाये रहते हैं। जब उन पर कोई वार करता है तभी रहस्योद्घाटन करते हैं! वर्ना चुप्पी बनाये रहते हैं। क्या ऐसे देशभक्तों को बार-बार सलाम नहीं करना चाहिए? वैसे सुषमा और रेड्डी बंधुओं के रिश्ते बडे पुराने हैं। रेड्डी बंधु सुषमा को अपनी बहन मानते हैं। सब जानते हैं कि बहन और भाई एक दूसरे की रक्षा करने के अटूट रिश्ते से बंधे होते हैं। कांग्रेस के कई नेता सुषमा से मोटे माल की परिभाषा जानने को ऐसे उतावले दिखे जैसे भ्रष्टाचार के खेल में वे जन्मजात अनाडी हों। देश के एक बडे खनन समूह  वेदांता रिसोर्सेज ने खुलासा किया है कि उसने पिछले तीन वर्षों के दौरान देश के विभिन्न राजनीतिक दलों को २८ करोड का चंदा दिया है। वेदांता के कर्ताधर्ता अनिल अग्रवाल ने यह तो नहीं बताया कि किस पार्टी को कितना धन दिया गया पर समझने वालों के लिए इशारा ही काफी है। भारतवर्ष में कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा का सिक्का चलता है। कोई भी उद्योगपति इन्हें मोटा या छोटा माल दिये बिना अपने काले-पीले धंधों को अंजाम नहीं दे सकता। देश के जितने भी कुख्यात खनन माफिया, भू-माफिया, दारू माफिया और संदिग्ध उद्योगपति हैं, सभी राजनीतिक पार्टियों को थैलियां पहुंचाते हैं। इन थैलियों को चंदा कह लें या फिर मोटा माल बात एक ही है...। हा यह बात दीगर है कि पार्टियों की औकात देखकर ही भेंट चढायी जाती है। राजनीतिक पार्टियां भी इस माल पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझती हैं। इसी से उनकी पार्टियों का कारोबार चलता है। मतदाताओं को 'माल' बांटने के लिए भी इसी 'मोटे माल' का उपयोग किया जाता है। पार्टी के खाते में आडा-तिरछा चंदा बडी आसानी से समाहित हो जाता है और उंगलियां भी नहीं उठ पातीं। न जाने कितने नेता चंदे की बदौलत मालामाल हो गये हैं। बसपा सुप्रीमों मायावती इसका जीवंत उदाहरण हैं।

Thursday, August 23, 2012

मीडिया का दम

ढोंगी समाजवादी मुलायम सिं‍ह यादव के लाडले अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की सत्ता तो हासिल कर ली पर वहां की आम जनता सपनों के इस सौदागर से खुश नहीं है। लोगों को लगने लगा है कि वे बुरी तरह से ठगे गये हैं। यूपी की तस्वीर को बदल पाना अखिलेश के बस की बात नहीं है। इस युवा मुख्यमंत्री की भले ही कैसी भी मजबूरी हो पर वोटरों ने तो उन्हें प्रदेश के कायाकल्प के लिए ही चुना था। मुलायम सिं‍ह जानते थे कि वे मतदाताओं का विश्वास खो चुके हैं इसलिए उन्होंने अपने पुत्र के कंधे पर बंदूक रख कर अपना स्वार्थ साधने की योजना बनायी और उसमें सफल भी हो गये...। दिखावे के तौर पर अखिलेश को मुख्यमंत्री बना तो दिया गया है पर असली ताकत मुलायम और उनकी कुटिल मंडली के हाथ में है, इसलिए अराजक तत्व अपनी मनमानी करने को स्वतंत्र हैं। बेचारे अखिलेश चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। मीडिया के सब्र का पैमाना भी भरने लगा है। उसने भी अखिलेश को निशाने पर लेना शुरू कर दिया है। बीते सप्ताह चंद अराजक तत्वों ने कुछ पत्रकारों की पिटायी कर दी। कलम के पुजारी बौखला उठे और सीधे जा पहुंचे मुख्यमंत्री के दरबार। मुख्यमंत्री ने उनकी हर शिकायत ध्यान से सुनी और उन्‍‍हें भरोसा दिलाया कि उनके रहते अब कोई पत्रकारों का बाल भी बांका नहीं कर पायेगा। अखिलेश पत्रकारों पर इतने मेहरबान हो गये कि उन्होंने यूपी के पत्रकारों को एकदम सस्ती कीमतों पर सर्व-सुविधायुक्त घर देने का ऐलान कर दिया। इतना ही नहीं उनके लिए मुफ्त इलाज की सुविधा उपलब्ध करवाने की घोषणा भी कर डाली। जिन मीडिया कर्मियों के कैमरे और वाहन तोडे गये थे उनकी क्षतिपूर्ति भी सरकारी खजाने से हो गयी। यह है मीडिया का दम। जिस मुख्यमंत्री को जनता से किये गये वादे पूरे करने में नानी याद आ रही है उसने पत्रकारों को चुटकी बजाते ही प्रसन्न और संतुष्ट कर दिया। पत्रकारों के चेहरे भी चमक उठे। मुलायम सिं‍ह भी जब प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने भी कई अखबारों के चापलूस सम्पादकों और पत्रकारों को भारी-भरकम उपहारों और पुरस्कारों से नवाजने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। आरती गाने वाले कलमवीरों के लिए सरकारी खजाना लुटा देने वाले मुलायम सिं‍ह देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोये हैं। वे जानते हैं कि सपने कैसे साकार किये जाते हैं। बाप के गुण बेटे तक पहुंचने में देरी नहीं लगती। अखिलेश एक अच्छे बेटे का फर्ज निभा रहे हैं। उन्होंने भी यह बात गांठ बांध ली है कि लोगों के असंतोष भरे स्वरों को मीडिया के ढोल का शोर ही दबा सकता है। ऐसा कतई नहीं है कि सिर्फ राजनेता ही मीडिया को साधने के लिए विभिन्न तिकडमें आजमाते हैं। स्वर्गीय धीरूभाई अंबानी के सुपुत्रों की तरह गौतम अदानी भी देश के एक नामचीन उद्योगपति हैं। अंबानी बंधुओं की तर्ज पर काम करते हुए उन्होंने भी चंद वर्षों में अरबों-खरबों का साम्राज्य खडा कर लिया है। दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश हिं‍दुस्तान में अनवरत तरक्की हासिल करने के लिए कौन से रास्ते पर चलना चाहिए और किन-किन हस्तियो को साधना और रिझाना चाहिए इस कला में अदानी ने भी श्रेष्ठता हासिल कर ली है। केंद्र सरकार के कई मंत्री उनकी जेब में रहते हैं। उन्हें देश के किसी भी प्रदेश में अपनी विद्युत परियोजनाएं प्रारंभ करने और विभिन्न उद्योग लगाने के लिए कौडि‍यों के भाव सरकारी जमीनें उपलब्ध करवा दी जाती हैं। किसानों की खेती की जमीनें हडपने की भी उन्हें खुली छूट दे दी जाती है। मजदूरों का शोषण और उनकी जान के साथ खिलवाड करना इनके लिए आम बात है।
उनके कारखानों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम न होने के कारण मजदूरों के घायल होने तथा मौत के मुंह में समाने की खबरें आती रहती हैं। पर ये खबरें सुर्खियां हासिल नहीं कर पातीं। अफसरों, जनप्रतिनिधियों और छुटभइये किस्म के नेताओं को अपनी जेब में रखने वाले अदानी जहां कहीं भी अपना उद्योग लगाते हैं वहां के मीडिया का खास ध्यान रखते हैं। बडे अखबार मालिकों से दोस्ताना बनाने में देरी नहीं लगाते। तथाकथित सिद्धांतवादी अखबारों पर इस कदर विज्ञापनों की बरसात कर देते हैं कि उनके तमाम सिद्धांतों की ही धज्जियां उड जाती हैं। कुछ जागरूक पत्रकार अदानी के कारनामों की खबरें अपने अखबारों के संपादकों के पास भेजते भी हैं तो उन्हें रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया जाता है। महाराष्ट्र के सजग पाठक अदानी के जादू से वाकिफ हो चुके हैं। इस जादूगर की मेहरबानी से गुजरात के उन पत्रकारों की भी किस्मत खुल गयी है जो मक्खनबाजी में माहिर हैं। खबर है कि मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और अदानी की आरती गाने तथा दलाल की भूमिका निभाने वाले तीस पत्रकारों के अभूतपूर्व समर्पण से प्रसन्न होकर अदानी ने उन्हें ३० से ७० लाख रुपये की कीमत के फ्लैट उपहार में दिये हैं।
जो उद्योगपति पत्रकारों को लाखों रुपयों के फ्लैट की सौगात दे सकता है वह अखबारों के संपादकों और मालिकों के लिए कितना कुछ कर सकता है इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। वैसे भी अब अधिकांश बडे अखबार उद्योगपतियों, बिल्डरों, भूमाफियाओं और खनिज माफियाओं के द्वारा चलाये जा रहे हैं। देश में कोयला घोटाला को लेकर जबरदस्त शोर मचा है। अखबारों में रोज खबरें छप रही हैं कि कैसे हजारों करोड के कोयला घोटाले को अंजाम दिया गया। यह भी कम चौंकाने वाली सच्चाई नहीं है कि देश के एक बडे अखबार के मालिकों ने अखबार का रौब दिखाकर बिजली परियोजना के नाम पर अवैध तरीके से दो कोयला ब्लाक हथियाये और बिजली उत्पादन करने की बजाय कोयले का कारोबार कर ७६५ करोड का घपला कर डाला। बिजली परियोजना अभी भी अधर में लटकी है। खुद को भारत का सबसे बडा समाचार पत्र समूह कहने वालों का बस चले तो देश की सारी दौलत को अपनी तिजोरी में कैद कर लें। लोगों के मन में अक्सर सवाल उठता है कि बडे-बडे चालीस और साठ पेज के अखबार डेढ-दो रुपये में कैसे बेचे जाते हैं। आखिर घाटे का व्यापार क्यों किया जाता है? दरअसल हमारे देश में नामी-गिरामी अखबार मालिकों से सरकारें भी डरती हैं। कई अखबार मालिक दिखावे के लिए अखबार निकालते हैं पर उनके असली कमाऊ धंधे कुछ और होते हैं। अरबो-खरबों के सरकारी ठेके लेना, कोयला ब्लॉक आबंटन करवाना और करोडों की सरकारी जमीनों को कौडियों के भाव पाना ही इनका असली मकसद है। कुछ ऐसे पहुंचे हुए अखबार मालिक भी हैं जिन्हें आम जनता तो दुत्कारती है पर फिर भी वे राज्यसभा के सांसद बनते चले आ रहे हैं। ये सब लेन-देन का खेल है जिसे अपने देश में बखूबी अंजाम दिया जा रहा है।

Thursday, August 16, 2012

एक सच यह भी...

नेताओं के चक्कर में अपनी हंसती-खेलती जिं‍दगी को नर्क बनाने और दर्दनाक मौत के हवाले हो जाने वाली महत्वाकांक्षी युवतियों की वास्तविक संख्या का पता लगा पाना आसान नहीं है। इस सिलसिले कहीं अंत होता भी नजर नहीं आता। १९९५ में देश की राजधानी दिल्ली में सुशील शर्मा नामक युवा कांग्रेस नेता ने अपनी प्रेमिका नैना साहनी को तंदूर की धधकती आग में झोंक दिया था, क्योंकि उसे शक था कि वह उसके प्रति वफादार नहीं है। हालांकि वह खुद भी हद दर्जे का लम्पट था। इधर-उधर मुंह मारे बिना उसे चैन नहीं मिलता था। पर उसे प्रेमिका ऐसी चाहिए थी जो सती-सावित्री हो। आधुनिक विचारों वाली नैना साहनी ने राजनीति में जगह बनाने के लिए सुशील शर्मा को अपने मोहपाश में बांधने की भूल की थी, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पडा। दरिंदगी और हैवानियत की तमाम सीमाएं पार करके रख देने वाली इस राक्षसी घटना के उजागर होने के बाद लगा था कि युवतियां इससे सबक लेंगी और अय्याश नेताओं के आसपास जाने से भी कतरायेंगी। पर ऐसा हो नहीं पाया। इतिहास गवाह है कि कामुक नेताओं को हमेशा उन नारियों की तलाश रहती है जो अपने मादक रंग-रूप की बदौलत कुछ पाना चाहती हैं। राजनीति के प्रांगण में एक से बढकर एक नारायण दत्त तिवारी भरे पडे हैं जिनकी हवस कभी भी मिटने का नाम नहीं लेती। जहां-तहां इनके जाल बिछे रहते हैं। जिनमें कई बार सच्ची और सीधी नारियां भी फंस जाती हैं। कुछ का भला हो जाता है और कुछ का बहुत बुरा हश्र होता है। मधुमिता का नाम आज भी कई लोगों को याद होगा। अच्छी-खासी कविताएं लिखा करती थी। अभिनय कला में पारंगत होने के कारण मंचों पर छा जाया करती थी। ऐसे ही किसी कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के एक अय्याश मंत्री की उस पर नजर पड गयी। पता नहीं रंगीले मंत्री ने मधुमिता को कौन-से चमकते सपने दिखाये कि वह भटक गयी। उसे खबर थी कि मंत्री शादीशुदा है। फिर भी वह उसके मोहपाश में बंध गयी। एक पढी-लिखी युवती ने अपनी मान-मर्यादा को इसलिए ताक पर रख दिया था क्योंकि उसे भौतिक सुविधाओं की अपार भूख थी। मंत्री के लिए यह कोई बडी बात नहीं थी। हराम की कमायी को अपनी अय्याशियों पर लुटाना उसका पुराना शगल था। पहले भी न जाने कितनी युवतियों का वह यौन शोषण कर चुका था। वह निरंतर बचता आया था। मधुमति गर्भवती भी होती रही और मंत्री पर शादी करने का दबाव भी बनाती रही। मंत्री के राजी होने का सवाल ही नहीं उठता था। आखिरकार वो दिन भी आ गया जब एक उभरती हुई कवयित्री की संदिग्ध मौत की खबर ने लोगों को हैरत में डाल दिया। दोनों के अवैध रिश्तों पर देशभर के अखबारों के पन्ने रंगे गये और न्यूज चैनल वाले झूम-झूमकर मधुमिता और अमरमणी त्रिपाठी के वासना में डूबे रिश्तों के अफसाने सुनाते रहे। मधुमिता की मौत से भी सबक लिया जा सकता था। ऐसी घटनाएं आंखें खोलने का काम करती हैं। किसी ने शायद सच ही कहा है कि इश्क अंधा होता है...।
अनुराधा बाली उर्फ फिज़ा और गीतिका शर्मा ने भी मधुमिता की कहानी को दोहराया है। दोनों इस जहां से विदा हो चुकी हैं। दोनों के हिस्से में भी संदिग्ध मौत आयी है। दोनों ही समझदार कहलाती थीं। पढी-लिखी थीं। फिर भी नेताओं के मायाजाल में ऐसे उलझीं कि काला इतिहास बनकर रह गयीं। फिज़ा और गीतिका की मौत ने एक फिर से यह भी साबित कर दिया है कि ऐसे फिसलन भरे रिश्तों का अंजाम बुरा ही होता है। गैर मर्दों पर आसक्त हो जाने वाली नारियों के लिए भी यह बहुत बडा सबक है। अनुराधा और गीतिका इतनी सक्षम तो थीं कि अपनी मेहनत के बलबूते पर सम्मानजनक जीवन जी सकती थीं। पर उनके बहुरंगी सपनों ने उनके पैरों की जमीन छीन ली। अनुराधा ने खुद को हरियाणा के राजनेता चंद्रमोहन की सेज तक पहुंचा दिया तो गीतिका हरियाणा के ही मंत्री गोपाल कांडा के इशारों पर नाचती रही। इसमें जबरदस्ती ही नहीं, मनमर्जी भी थी। पहल किसने की यह बात भी कोई मायने नहीं रखती। जहां आपसी रजामंदी हो वहां नारी को अबला और पुरुष को सबल कहकर किसी एक पक्ष के प्रति सहानुभूति दर्शाना बेमानी है। अनुराधा जब चंद्रमोहन से पहली बार मिली तब वह प्रदेश का उपमुख्यमंत्री था। उपमुख्यमंत्री कोई छोटी-मोटी हस्ती नहीं होता। एक बडी हस्ती के प्रति आसक्त होने के पीछे अनुराधा का भी स्वार्थ था। उसे अपने वो तमाम सपने साकार करने थे जो अधूरे रह गये थे। चंद्रमोहन ने देह की प्यास बुझाने के लिए अपने पद की गरिमा को ताक पर रख दिया तो अनुराधा ने भी नैतिकता और मर्यादा के चोले को उतार फेंका। वह जानती थी कि चंद्रमोहन पहले भी किसी के साथ सात फेरे ले चुका है। अनुराधा ने एक बाल-बच्चेदार शख्स को हथियाने के लिए अपना धर्म तक बदलने में देरी नहीं लगायी। चंद्रमोहन तो उस पर बुरी तरह से आसक्त था ही। धर्म उसने भी बदला पर वह प्यार के धर्म को नहीं निभा पाया। दोनों का प्यार अगर सच्चा होता तो उनके जुदा होने के हालात न बनते। स्वार्थ पर टिके रिश्तों का हमेशा यही अंजाम होता है। गीतिका को भी पता था कि जो धनाढ्य नेता उससे नजदीकियां बढाने को आतुर है, वह उसकी उम्र की लडकी का पिता है। गीतिका की भले ही कोई और मजबूरी रही हो पर कोई भी मर्द किसी युवती के साथ जबरन शारीरिक संबंध नहीं बना सकता। गीतिका का गर्भपात करवाना दर्शाता है कि वह पूरी तरह से निर्दोष नहीं थी। ऐसे में...?