Thursday, September 28, 2017

इस हिंसा और बर्बरता के क्या हैं मायने?

क्या जमाना है। कोई कानून तोड रहा हो, माहौल बिगाड रहा हो, बेहूदा हरकतें कर रहा हो, वातावरण को दूषित कर रहा है... तो भी आप उसे रोक नहीं सकते। सामने वाला आपको अपना शत्रु मानने लगता है उसके सिर पर खून सवार हो जाता है। कल दिल्ली में एक वकील सार्वजनिक स्थल पर सिगरेट के धुएं के छल्ले उडा रहा था। उसकी इस हरकत को फोटोग्राफी के दो छात्र देख रहे थे। उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने बडी शालीनता के साथ वकील को सरेआम सिगरेट न पीने का अनुरोध किया। छात्र तो सर... सर कर बात कर रहे थे, लेकिन वकील तू... तडाक और गाली-गलौच पर उतर आया। छात्र शालीनता का दामन थाम अपनी बाइक पर सवार होकर जाने लगे तो वकील ने अपनी कार बाइक पर च‹ढा दी। एक छात्र की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। वकील शराब के नशे में धुत था और सिगरेट के छल्ले बनाकर आने-जाने वाली महिलाओं के मुंह पर मार रहा था। लोग तमाशबीन बने देख रहे थे। किसी ने भी उसे फटकारने की हिम्मत नहीं की। दो सजग छात्रों ने पहल की तो एक छात्र को जान से हाथ धोना पड गया। यह हमारे समाज का वो डरावना चेहरा है जो डराता है और चिंतन-मनन को विवश करता है कि आखिर लोगों में इतना गुस्सा क्यों है और वे कानून से खौफ क्यों नहीं खाते?
मध्यप्रदेश के अशोक नगर में एक पिता ने पत्नी और गांव वालों के तानों से तंग आकर अपनी दो बेटियों को बेतवा पुल के नदी में फेंककर मार डाला। हत्यारे पिता का कहना था कि मुझसे बार-बार कहा जाता था कि तेरी तीन-तीन बेटियां हैं। तेरी पत्नी फिर गर्भवती हो गई है। उस पर तुम कामधंधा तो करते नहीं हो फिर ऐसे में बच्चों की परवरिश कैसे करोगे। उनका पेट कैसे भरोगे...?
कमलेश अहिरवार नामक यह दरिंदा अपनी छह वर्षीय बेटी रक्षा और तीन वर्षीय बेटी पूनम को इलाज के बहाने ले गया और जब दो दिन बाद वह अकेला घर लौटा तो पत्नी ने बेटियों के बारे में पूछा। उसने नजर चुराते हुए बताया कि चौराहे पर सुलाकर कहीं चला गया था। जब वापस आया तो बेटियां वहां से गायब थीं। पत्नी, पति के जवाब को सुनकर हैरत में पड गई। यह कैसा बाप है जिसे अपनी बेटियों का गायब होना किसी मामूली से सामान के गुम हो जाने जैसा लग रहा है! पति चुपचाप कमरे में जाकर चादर ओढकर बेफिक्र सो गया। पत्नी के तो होश ही उड चुके थे। उसने पति को फटकारा और फौरन थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने दबाव डालने लगी, लेकिन वह टालमटोल करने लगा। पत्नी ने अपने रिश्तेदारों के साथ जाकर थाने में बेटियों की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई तो बेटियों की हत्या का यह शर्मनाक, भयावह सच सामने आया। इस तरह से मेरठ में एक जल्लाद बाप ने अपनी दुधमुंही बेटी को गला घोटकर मार डाला और शव को सूखे तालाब में दबाकर बेफिक्र हो गया। हुआ यूं कि राजेश कुमार नामक युवक का अपनी दूसरी पत्नी से झगडा हुआ। पत्नी गुस्से में घर से निकल गई। इसके कुछ मिनटों के बाद बच्ची रोने लगी। राजेश गुस्से में आग बबूला हो गया और उसने अपनी मासूम बच्ची का गला दबाकर मार डाला। गांव के लोग सुबह सैर को निकले तो उनकी नजर सूखे तालाब में मिट्टी हटाकर कुछ नोचने की कोशिश करते कुत्तों पर पडी तो उनका माथा ठनका। कुत्तों को वहां से हटाया गया तभी सात माह की बच्ची का शव नजर आया।
दिल्ली के गोकुलपुरी इलाके में एक शख्स को पडोसी के नाबालिग बेटे को शराब न पीने की नसीहत देना भारी पड गया। वह शख्स जब अपने घर जा रहा था तो रास्ते में उसे अपने पडोसी का लडका अपने कुछ दोस्तों के साथ शराब पीते नजर आया। उसने पडोसी धर्म निभाते हुए लडके को कहा कि वह अक्सर उसे यहां दोस्तों के साथ शराबखोरी करते देखता है, आज तो वह उसके पिता को उसकी शिकायत करके ही रहेगा। वह नाबालिग फौरन अपने घर गया और पिता को बुला लाया पिता-पुत्र ने रॉड से हमला कर नसीहत देनेवाले शख्स को इतना पीटा कि उसे अस्पताल ले जाना पडा। बडी मुश्किल से उसकी जान बच पायी।
खून के रिश्तों को डसती निष्ठुरता की खबरें हिलाकर रख देती हैं। कुछ महीने पूर्व एक बेटे की बेरहमी की खबर ने काफी सुर्खियां पायी थीं। बेटा विदेश में रहता था और मां अकेली दिल्ली में। उम्रदराज मां के नाम दिल्ली में करोडों की सम्पत्ति थी। इकलौते बेटे के सात समन्दर पार रहने के कारण मां की देखरेख करने वाला कोई नहीं था। एक दिन बेटा विदेश से लौटा। मां को संपूर्ण सम्पत्ति बेचकर अपने साथ विदेश चलने के लिए राजी कर लिया। किसी भी मां के लिए बेटे के साथ से बढकर और कुछ नहीं होता। वह राजीखुशी तैयार हो गई। बेटे ने आनन-फानन में संपत्ति का सौदा कर करोडों रुपये अपनी अटैची में रखे और मां को साथ लेकर हवाई अड्डे पहुंच गया। मां की खुशी का पार नहीं था। अपने बेटे, पोते-पोतियों के साथ शेष जीवन बिताने का उसका वर्षों का सपना पूरा होने जा रहा था। "मां तुम यहां पर बैठों मैं एक जरूरी काम निपटाकर आता हूँ।"  बेटे ने बडी आत्मीयता के साथ मां को आश्वस्त किया और चला गया। घडी की सुई खिसकने लगी। मां राह देखती रही। दोपहर से रात हो गयी, लेकिन बेटे का कोई अता-पता नहीं था। उसने हवाई अड्डे के अधिकारियों को अपनी चिन्ता से अवगत कराया। खोजबीन की गई तो पता चला कि बेटा तो घंटो पहले विदेश फुर्र हो चुका है। अकेली मां रोती-बिलखती रही। यह खबर देश के तमाम अखबारों में छपी। लोगों ने नालायक बेटे को जी-भरकर कोसा। दूसरे दिन की सुबह अपनी ही औलाद के हाथों ठगी गई मां की हार्टअटैक से मौत हो गई।
दिल्ली के निकट स्थित नोएडा में बीते सप्ताह एक और अहसानफरामोश बेटा अपनी उम्रदराज मां को जिला अस्पताल के इमरजेंसी में इलाज के बहाने छोडकर चलता बना। उसने अस्पताल को अपना मोबाइल नंबर भी गलत दिया था। बुजुर्ग मां अपनी गंभीर बीमारी को भूल बार-बार बेटे का नाम लेकर रोती रही। बेटे ने मां को पूरी तैयारी के साथ अस्पताल में लाकर छोडा था। उसने मां के पूरे कपडे और अन्य जरूरी सामान एक बडे अटैची में भरे थे। डॉक्टर ने जब इलाज शुरू किया तो वह दवाई लेने के बहाने से अस्पताल से जो गया कि डॉक्टर भी इंतजार करते रहे और मां के तो रो-रो कर आंसू ही सूख गए।

Thursday, September 21, 2017

जवाब मांगते सवाल

एक जमाना था जब स्कूल, पाठशाला का नाम लेते ही आंखों के सामने देवी-देवताओं की मूर्तियों से सुसज्जित मंदिर की तस्वीर घूमने लगती थी। माता-पिता अपने बच्चों को इस मंदिर में भेजकर गर्वित होते थे। उन्हें वहां पर अपनी संतानों के पूर्णतया सुरक्षित होने का भरोसा रहता था। मां-बाप सबकुछ मंदिर के भगवान पर छोड देते थे। मास्टरजी भी अपने छात्रों को अपनी औलादों की तरह ज्ञान, स्नेह और सुरक्षा प्रदान करते थे। वक्त पडने पर डंडे से कुटायी भी कर देते थे। अभिभावकों को भी कोई आपत्ति नहीं होती थी। वक्त बदलने के साथ-साथ स्कूल, पाठशालाएं भी बदल गयीं और मास्टर साहब भी। बीते सप्ताह गुरुग्राम में स्थित एक नामी स्कूल, जिसे रायन इंटरनैशनल स्कूल के नाम से पूरे देश में जाना जाता है, में हुई प्रद्युम्न नामक सात साल के बच्चे की निर्मम हत्या ने समस्त सजग देशवासियों को हिलाकर रख दिया। दरअसल, यह हत्या उस भरोसे की हुई जिस भरोसे से बच्चों को पढने और संस्कारित होने के लिए स्कूल भेजा जाता है। माता-पिता को जब अपने बच्चे की बर्बर हत्या की खबर मिली तो वे अपनी सुध-बुध खो बैठे। उनके लिए उनका बेटा ही उनके जीने का एकमात्र मकसद था। उनके सारे सपने चकनाचूर हो गए। आज भी मां के सामने बार-बार बेटे का चेहरा घूमने लगता है, जिसे वह रोजाना स्कूल के लिए तैयार करती थी। उसने उसे बडा आदमी बनाने के लिए अपनी सभी इच्छाओं को तिलांजलि दे दी थी। बेटी बडी है और बेटा छोटा था। बेटे को स्विमिंग, साइकलिंग और क्रिकेट का काफी शौक था। वह कहता था कि मुझे विराट कोहली बनना है। दिनभर घर में क्रिकेट का बैट लेकर घूमता रहता था।
मां को हवाई जहाज में सारी दुनिया घुमाने की बातें करने वाले बेटे की तस्वीर को निहारती मां के मुंह से बार-बार यही शब्द निकलते हैं कि मेरे बेटे के साथ जो हुआ वह दुनिया में किसी बच्चे के साथ न हो। शिक्षा को कारोबार और व्यापार बनाने वाले निजी स्कूलों की बहुत लंबी श्रृंखला है। अधिकांश स्कूल अंधाधुंध कमायी का जरिया बन गए हैं। यह भी जान लें कि अधिकतर प्रायवेट स्कूल नेताओं, मंत्रियों, तथाकथित समाज सेवकों, उद्योगपतियों और धन्नासेठों के द्वारा चलाये जा रहे हैं। यह ऐसी जमात है जिसका एकमात्र लक्ष्य धन कमाना है। इनमें से अधिकांश खुद अंगूठा छाप हैं, लेकिन बडे-बडे डिग्रीधारियों को अपने इशारे पर नचाते हैं। दरअसल इनके लिए स्कूल, कालेज और अस्पताल चलाना धंधा बन गया है। सरकारें भी इन पर मेहरबान रहती हैं। कौडी के दाम पर जमीनें दे दी जाती हैं। महाराष्ट्र में कई नेता ऐसे हैं जिनके बीसियों स्कूल, कालेज, अस्पताल चल रहे हैं। राकां के दिग्गज नेता प्रफुल्ल पटेल के तो चालीस से ज्यादा स्कूल, कालेज दौड रहे हैं। मेडिकल और इंजिनियरिंग कालेजों में प्रवेश के नाम पर लाखों की वसूली की जाती है। फीस भी अच्छी-खासी होती है। इनके यहां चलने वाली भर्राशाही की तरफ शासन और प्रशासन का बहुत कम ध्यान जाता है। धंधेबाजों के हाई-फाई स्कूलों की मनमानी और लापरवाही की वजह से सतत दिल दहलाने वाली घटनाएं सामने आती रहती हैं। धन के बल पर स्कूलों के प्रबंधक, मालिक तमाम कायदों और दिशा-निर्देशों को जूते की नोक पर रखते हैं और छात्र-छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार, दुराचार एवं हत्याओं तक की खबरें सुर्खियां पाती रहती हैं। दो वर्ष पूर्व बंगलुरु में एक नामी-गिरामी स्कूल में पढने वाली पहली कक्षा की छात्रा पर एक नरपशु जिम इंस्ट्रक्टर ने बलात्कार का जुल्म ढाया था। इस शर्मनाक घटना के विरोध में अभिभावकों और स्थानीय लोगों ने जमकर विरोध प्रदर्शन और तोडफोड की थी। इसी तरह से मुंबई में इसी वर्ष के अगस्त महीने में विख्यात सेठ जुग्गीलाल पोद्दार स्कूल में चार साल की एक मासूम बच्ची बलात्कार का शिकार हुई। बलात्कारी स्कूल का ही चपरासी था।
राजस्थान के बीकानेर के एक निजी स्कूल में तेरह साल की छात्रा के साथ आठ शिक्षकों ने डेढ साल तक बलात्कार किया। इतना ही नहीं यह दुष्ट, छात्रा की अश्लील क्लिप बनाकर उसे लगातार ब्लैकमेल और प्रताडित करते थे जिसके चलते उसे समर्पण हेतु विवश होना पडता था। बलात्कारी शिक्षक स्कूल की छुट्टी हो जाने के बाद उसे कमरे में जबरन बंद कर मनमानी करते थे। पीडिता कहीं गर्भवती न हो जाए इस भय से बलात्कारी शिक्षकों ने उसे इतनी अधिक मात्रा में गर्भ निरोधक गोलियां जबरन खिलायीं जिससे उसे कैंसर हो गया। यह सच भी बेहद चौंकाने वाला है कई पब्लिक स्कूलों के एकदम निकट शराब की दुकानें खुली हुई हैं जहां पर लडते- लुढकते शराबियों का जमावडा लगा रहता है। रायन इन्टरनैशनल स्कूल के समीप खुली दारू की दुकान लोगों के गुस्से का शिकार हो गयी। यहां पर भी बच्चों के सामने आपत्तिजनक गतिविधियां चलती रहती हैं। शराबी छात्राओं के साथ बेखौफ छेडछाड करते हैं। स्कूल की छुट्टी के बाद खुलेआम शराबियों को शराब पीते देखकर बच्चों पर क्या असर पडता होगा इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। देश के विभिन्न शहरों में चलने वाले पब्लिक स्कूलों के निकट खुली शराब की दुकानों से न स्कूल संचालकों को कोई फर्क पडता है और न ही प्रशासन के दिमाग की घंटी बजती है। बार-बार यही सवाल उठता है कि १०० मीटर के दायरे में शराब की दुकान खोलने की अनुमति कैसे मिल जाती है? यकीनन यह सब धन की माया है। छात्र-छात्राओं की सुरक्षा के प्रति घोर लापरवाही बरतने वाले स्कूल प्रबंधक जानबूझकर इस सच को भी नजरअंदाज करते चले आ रहे हैं कि किशोर न्याय अधिनियम २०१६ की धारा ७५ में स्पष्ट उल्लेख है कि बच्चा जिसके संरक्षण में होगा उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी उसी संस्था की होगी।

Thursday, September 14, 2017

आस्था के सौदागर

राजनीति और धर्म के बाजार में वर्षों से खोटे सिक्के धडल्ले से चल रहे हैं। इनके बारे में पूरी जानकारी होने के बावजूद कोई प्रभावी कदम उठाने की कोशिश ही नहीं की गई। पथभ्रष्ट नेताओं को तो लगभग पूरी तरह से बख्श दिया गया है। वे हर तरह की मनमानी करने को स्वतंत्र हैं। इसके लिए सबसे ज्यादा दोषी हम और आप हैं जो आंख मूंदकर इस छलिया बिरादरी का अंधानुकरण करते हैं। डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत का धूर्त और कपटी चेहरा सामने आने के बाद अखिल भारतीय अखाडा परिषद ने १४ फर्जी और ढोंगी बाबा की जो सूची जारी की है उसमें गुरमीत के अलावा जो नाम शामिल हैं उनमें से कुछ जेल में हैं तो कुछ का डंका अभी भी गूंज रहा है। हमारे यहां धर्मांध लोगों को कितना भी सचेत किया जाए, लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पडता। आज से लगभग तीन वर्ष पूर्व जब प्रवचनकार आसाराम के कुकर्मों का पिटारा खुला था तो होना तो यह चाहिए था कि लोग कपटी बाबाओं से दूरी बना लेते। बाबा भी खुद में सुधार लाते, लेकिन न तो अंधभक्तों के दिमाग के ताले खुले और न ही फर्जी बाबाओं ने आसाराम की गिरफ्तारी से कोई सबक सीखा। उन्होंने तो यही मान लिया था कि आसाराम बदकिस्मत था जो पकड में आ गया। वे बहुत सतर्क होकर अपना काम करते हैं इसलिए उनकी पोल कभी भी नहीं खुलेगी। उनकी शिकार महिलाएं कभी भी उनके खिलाफ मुंह नहीं खोलेंगी। आसाराम को जेल में ठूंसे जाने के बाद कई धूर्त बाबाओं के कुकर्मों का भांडाफोड हुआ, लेकिन ढोंगी बाबाओं के अंधभक्तों की तंद्रा नहीं टूटी। यही वजह है कि रामपाल और गुरमीत जैसे कपटियों का धर्म का धंधा सरपट दौडता रहा। कहावत है कि 'पाप का घडा एक न एक दिन फूटता ही है। पिछले वर्ष रामपाल को जेल भेजे जाने पर उसके अनुयायियों ने जमकर अपनी गुंडागर्दी का तमाशा दिखाया था। उनपर काबू पाने के लिए पुलिस की भी सांसें फूल गयी थीं। रामपाल भक्तों के धन की बदौलत राजसी जीवन जीने के साथ-साथ नारियों की अस्मत लूटता था। गुरमीत ने तो जैसे सभी अय्याश पाखंडियों को मात दे दी। उसके भक्तों की संख्या करोडों में बतायी जाती है। अपने ही भक्तों के साथ विश्वासघात करने वाला गुरमीत तो बहुत बडा जालसाज और अपराधियों का सरगना निकला। उसके अपराधों की फेहरिस्त काफी लम्बी है। उसको अदालत के द्वारा दोषी करार दिये जाने के बाद जो हिंसा हुई उसमें ४० लोगों ने अपनी जान दे दी और सैक‹डो घायल हुए। यह सब उस अंधभक्ति के कारण हुआ जो धूर्त साधुओं की पूंजी है। नाबालिग लडकी के यौन शोषण के आरोप में २०१४ से जेल में बंद आसाराम के चेलों ने भी उसे जेल में डाले जाने पर कम तमाशेबाजी नहीं की थी। जिस तरह से गुंडे-बदमाश और पेशेवर हत्यारे अपने खिलाफ खडे होने वाले गवाहों को धमकाते-चमकाते हैं वैसा ही धतकर्म आसाराम और उसके खरीदे हुए गुंडों ने किया। कुछ गवाहों की तो हत्या तक करवा दी गयी। एक जमाना था जब आसाराम के यहां मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और बडे-बडे नेताओं का भी जमावडा लगा रहता था। इसी जमावडे ने आसाराम की 'साख' में खूब इजाफा किया था और उसके अनुयायियों की संख्या बढती चली गई थी। तब भी उस पर कई संगीन आरोप लगते थे, लेकिन उनपर ध्यान नहीं दिया जाता था। गुरमीत और रामपाल जैसे नकाबपोश देहभोगियों ने भी जी-भरकर आसाराम का अनुसरण किया और चंद वर्षों में अरबों-खरबों का साम्राज्य खडा कर लिया। दरअसल इन लोगों की सोच साधु-संतों वाली है ही नहीं। यह धन और सम्पत्ति के जन्मजात भूखे हैं। येन-केन-प्रकारेण धन बटोरना ही इनका मूल उद्देश्य है। दुनिया को तो यह मोहमाया से दूर रहने, भौतिक सुखों के त्यागने की शिक्षा देते हैं, लेकिन खुद चौबीस घण्टे भोग विलास में डूबे रहते हैं। गुरमीत ने बिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के मुख्यालय में तलाशी में कई रहस्योद्घाटन हुए। गुरमीत कितना अय्याश था और साध्वियों का कहां-कहां यौन शोषण करता था इसका पता तो इस सच से चलता है कि वह जिस गुफा में रहता-सोता था उससे जुडा एक गुप्त रास्ता था जो सीधे साध्वी निवास पर खुलता था। इसी साध्वी निवास में विभिन्न महिलाएं रखी जाती थीं जिन्हें वह अपनी अंधी वासना का शिकार बनाता था। डेरा छोड चुके कुछ लोगों ने बताया कि डेरा प्रमुख गुरमीत और उसके कुछ करीबियों के अलावा गुफा में घुसने की किसी को भी इजाजत नहीं थी। खुद को संत कहने वाले 'भगवान के दूत' के यहां एके-४७, विस्फोटकों एवं पटाखों की फैक्टरी का मिलना आखिर क्या दर्शाता है? गौरतलब है कि गुरमीत को महिलाओं से मालिश करवाने की लत थी। इसीलिए वह अपनी मुंहबोली बेटी हनीप्रित को अपने साथ जेल में रखना चाहता था। जेल में गुरमीत के स्वास्थ्य की जांच करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि वह 'सेक्स एडिक्ट' है। इसी वजह से जेल में वह बेचैन रहता है। गुरमीत के एक पूर्व सेवक का दावा है कि गुरमीत नियमित सेक्स टॉनिक लेता था। उसके लिए आस्ट्रेलिया और कई देशों से यौन क्षमता बढाने वाला पेय मंगाया जाता था। इतना ही नहीं कुछ लोगों का यह भी दावा है कि वह सुंदरियों के साथ-साथ सुरा का भी गुलाम था। हजारों अनुयायियों को इसकी जानकारी थी फिर भी उनका गुरमीत से पता नहीं मोहभंग क्यों नहीं हुआ? अपने दुखों को दूर करने और सुकून की चाहत में आश्रमों और डेरों में पहुंचने वाली भीड में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिन पर बाबाओं को बहुत भरोसा होता है। यह भरोसा काफी जांचने-परखने के बाद बलवती होता है। यह भक्त भी बहती गंगा में हाथ धोने के मौके तलाशते रहते हैं। अपने 'भगवान' के ऊपर जाने या जेल में जाने के बाद यह उनकी धन-सम्पत्ति पर कब्जा करने की साजिशों में लीन हो जाते हैं। एक थे आशुतोष महाराज जिनका २९ जनवरी २०१४ को देहावसान हो गया था। लेकिन उनके कुछ करीबी चालाक भक्तों ने यह प्रचारित कर दिया कि महाराज तो गहरी नींद में लीन हैं। जैसे ही उनकी नींद खुलेगी वे अपने भक्तों के बीच खडे नज़र आएंगे। तीन साल से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है और महाराज का शव डीप फ्रीजर में रखा हुआ है। अंधभक्त उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब महाराज अपनी चेतना में लौट आएंगे। महाराज का बेटा अपने पिता की देह का अंतिम संस्कार करना चाहता है, लेकिन महाराज के आश्रम पर कब्जा जमा चुके 'दबंग' चेहरे उन्हें इसकी इजाजत देने को तैयार नहीं हैं। महाराज की अरबों-खरबों की जो सम्पत्ति है उस पर भी उन्होंने अपना कब्जा जमा लिया है। आसाराम के जेल में जाने के बाद इंदौर, नागपुर, अहमदाबाद, सूरत आदि शहरों में उनके जो आश्रम थे और धन सम्पत्ति थी उस पर कुछ विश्वस्त भक्तों ने कब्जा जमा लिया है। कई भक्तों ने बडी-बडी इमारतें खडी कर ली हैं और महंगी आलीशान गाडियों में घूमने लगे हैं। इंदौर के एक 'गुटखाछाप' भक्त ने तो बडी 'दबंगता' के साथ देश के विभिन्न महानगरों से एक दैनिक अखबार का प्रकाशन प्रारंभ कर 'दुनिया' को अपना जलवा दिखा दिया है। ऐसे खुशकिस्मत और प्रतिभावान लोग अब यही चाहते हैं कि आसाराम जेल में ही पडा-पडा मर-खप जाए। गुरमीत उर्फ राम रहीम के नजदीकी अनुयायियों की भी नजर उसके डेरों, जमीनों और तमाम धन-दौलत पर है जो उसने लोगों को बेवकूफ बनाकर जुटायी है।

Thursday, September 7, 2017

कट्टरपंथियो होश में आओ

कहने और करने में बहुत फर्क होता है। अपनी साख खो चुके नेताओं और बुद्धिजीवियों की तरह शोर-शराबा करने वालों की तादाद काफी ज्यादा है। खुद तो कुछ करते नहीं दूसरों को भी शंका की निगाह से देखते रहते हैं। कट्टरपंथी ताकतों के खिलाफ लिखने और बोलने वालों की हत्या कर दी जाती है। ऐसी निर्मम हत्याओं को सही ठहराने वाले कुछ चेहरे कल भी छाती ताने थे और आज भी हत्या-दर-हत्या करने से नहीं सकुचाते। अपने देश की राजनीति और नेताओं ने दूरियां बढाने में जितनी ऊर्जा खर्च की है, उतनी अगर सर्वधर्म समभाव की नीति पर चलने में लगायी होती तो वतन की तस्वीर ही बदल चुकी होती। निराशा और हताशा की डरावनी लकीरें नज़र ही नहीं आतीं। अयोध्या में हंसी-खुशी राम-मंदिर का भी निर्माण हो गया होता। वोटों की गंदी राजनीति ने फासले इस कदर बढा दिये हैं कि कुछ भी समझ में नहीं आता। हां, यह सच है कि वोटों के भूखे सत्ताधीशों ने भी निराशा के सिवाय कुछ भी नहीं दिया। यह आम लोग ही हैं जिन्होंने साम्प्रदायिक सौहार्द की मिसालें पेश कर भाईचारे की लौ को जलाए रखा है। हर धर्म के मानने वालों में फरिश्तों का वास है जो बार-बार आईना दिखाते रहते हैं। देश में आए दिन कुछ नेता हिन्दू-मुस्लिम समुदाय के बीच कटुता और वैमनस्य के बीज बोने वाली भाषणबाजी कर देश का माहौल बिगाडने का खेल खेलते रहते हैं। कई लोग इनकी साजिशों के हाथों का खिलौना बनने में देरी नहीं लगाते। ऐसे दौर में पिछले दिनों उत्तराखंड के एक गुरुद्वारे के द्वार नमाज के लिए खोल दिये गये। गौरतलब है कि चमोली जनपद स्थित जोशीमठ में हर वर्ष गांधी मैदान में नमाज अदा की जाती थी, लेकिन इस बार घनघोर बारिश की वजह से नमाज पढना बेहद मुश्किल हो गया। गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी ने मुस्लिम भाइयों की इस समस्या का फौरन समाधान निकालते हुए नमाज के लिए गुरुद्वारे में सहर्ष जगह दे दी। मुस्लिम समुदाय के करीब सात सौ लोगों ने गुरुद्वारे में ईद की नमाज अदा कर देश की एकता, अखंडता और अमन चैन की दुआ मांगी। मुख्य नमाजी इमाम ने मुस्लिम समुदाय को मानवता की रक्षा करने और अन्य सभी धर्मों के लोगों की मदद के लिए सदा तैयार रहने की अपील की। नमाज के दौरान हिन्दू, सिख सहित अन्य सम्प्रदाय के लोग काफी संख्या में मौजूद थे।
आइए... अब आपको मिलाते हैं साइकिल मैकेनिक अयोध्या के अस्सी वर्षीय मोहम्मद शरीफ से जो वर्षों से लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करते चले आ रहे हैं। लगभग पच्चीस साल पूर्व १९९२ में जब राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद चरम पर था और आपसी भाईचारे के परखच्चे उडा दिये गये थे तब उनका जवान बेटा गायब हो गया था। एक महीने तक गायब रहे बेटे की सडी-गली लाश एक बोरे में बंद मिली थी। मोहम्मद को बेटे की मौत ने झकझोर कर रख दिया था। उन्हे इस बात का बेहद गम था कि उनका बेटा सम्मानजनक ढंग से अंतिम संस्कार से वंचित रह गया। तब उन्होंने काफी चिंतन-मनन किया। हत्यारे उनकी नजरों से दूर थे। किसको कोसते, अपना गुस्सा दिखाते और नफरत के बारूद को थामे बदले की भावना में जलते रहते। उन्होंने फैसला किया कि जीवन भर कटुता के साथ जीने की बजाय अमन चैन का संदेश पहुंचाया जाए। नफरत और बदले की भावना वो आग है जो कभी ठंडी नहीं होती। उन्होंने अपने बेटे की सडी-गली लाश को दफनाने के साथ यह निश्चय भी किया कि अब किसी भी लावारिस लाश का ऐसा हश्र नहीं होने देंगे। वो दिन था और आज का दिन है। वे साइकिल से जिला अस्पताल के शवग्रह के चक्कर लगाते हैं और लावारिस शव मिलने पर उसका अंतिम संस्कार करते हैं। पिछले पच्चीस सालों से नियमित कब्रिस्तान और श्मशान के चक्कर काटने वाले मोहम्मद ने पूरे शहर के सार्वजनिक स्थलों पर साइन बोर्ड लगा दिए हैं जिनपर लिखा है कि कोई भी लावारिस शव मिलने पर मुझसे संपर्क करें। उन्हें ऐसे-ऐसे शवों से रूबरू होना पडता है जो बुरी तरह से क्षत-विक्षत हो चुके होते हैं। उन्हें देखना और पहचानना भी मुश्किल होता है। वे सभी शवों को उनके धर्म के हिसाब से एक कमरे में रखते हैं, नहलाते हैं और कफन से ढकने के बाद अंतिम संस्कार करते हैं। अब तक सैकडों-हिन्दू-मुसलमानों के लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके मोहम्मद बताते हैं मेरे इस काम में कई लोग भी मदद करते हैं। कुछ साल पहले उन्हें एक सामाजिक पुरस्कार से नवाजा गया। इसमें जो राशि मिली उससे उन्होंने हाथ से चलने वाले ठेले खरीदे और शवों को उनके अंतिम मुकाम पर ले जाने के लिए चार कामगारों को भी रख लिया। वे कहते हैं कि मैं लाश के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता। हिन्दुस्तान के आम जन भी सर्वधर्म समभाव का समर्थक हैं। यह तो नेताओं की शातिर बिरादरी है जो वोटों के चक्कर में लडाने और बांटने का काम करती है।
इसी महीने देश की राजधानी दिल्ली में दो हिन्दू और मुस्लिम परिवारों ने एक दूसरे को अंगदान करके भाईचारे की अभूतपूर्व मिसाल पेश की है। दिल्ली के इकराम और बागपत के राहुल ने दिल्ली के जेपी हॉस्पिटल में अपनी किडनी संबंधित बीमारी की जांच करायी तो पता चला कि दोनों की किडनियां पूरी तरह से खराब हो चुकी हैं। ऐसे में उन्हें एक-एक डोनर की जरूरत थी। डॉक्टरी जांच के बाद पाया गया कि दोनों के परिवार में कोई भी सदस्य किडनी डोनर के लिए उपयुक्त नहीं था। केवल इकराम की पत्नी रजिया और राहुल की पत्नी पवित्रा ही डोनर के लिए योग्य थे। समस्या यह भी थी कि दोनों मरीज और उनकी पत्नी का ब्लड ग्रुप एक नहीं होने के कारण अपने-अपने पति को किडनी दान नहीं कर सकती थीं। ऐसे में अस्पताल के डॉक्टरों ने दोनों परिवारों को इकट्ठा किया और उन्हें बताया कि यदि ऐसी स्थिति में दोनों महिलाएं एक-दूसरे के पति के लिए किडनी दान करें तो दोनों मरीजों को नया जीवन मिल सकता है। दोनों महिलाओं ने बिना किसी हिचकिचाहट किडनी दान करने का निर्णय लेने में देरी नहीं की। इसके बाद अगली प्रक्रिया के तहत करीब पांच घंटे चले ऑपरेशन ने इकराम की पत्नी रजिया की किडनी राहुल को और राहुल की पत्नी पवित्रा की किडनी इकराम को सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित कर दी गई।

Thursday, August 31, 2017

धूर्त और बहुरूपिये

नाम राम रहीम। लेकिन उनके संस्कारों और नेक कर्मों से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं। इंसां होने का दावा करने वाले शैतान गुरमीत ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि उसे अपने दुष्कर्मों की सज़ा मिलेगी। उसके सत्ताधीशों से प्रगाढ रिश्ते थे। नेता, अफसर उसके यहां आकर चरणवंदना करते थे। प्रशासन उसके इशारों पर नाचता था। इसलिए वह पूरी तरह से बेफिक्र होकर दुष्कर्म पर दुष्कर्म करता रहा और जिसने भी उसके खिलाफ आवाज़ उठाई उसकी इस दुनिया से रवानगी कर दी गई। फिर भी सदियों से चली आ रही यह कहावत कि 'ऊपर वाले के यहां देर है, अंधेर नहीं' चरितार्थ हो गई। डेरा सच्चा के सर्वेसर्वा गुरमीत को केन्द्रीय जांच ब्यूरो की विशेष अदालत ने अपनी दो शिष्याओं के साथ बलात्कार करने के संगीन अपराध में बीस साल की कडी सजा सुनायी। खुद को भगवान का दूत कहने वाला गुरमीत फैसला सुनते ही फूट-फूट कर रोया। हाथ जोडकर उसने दया की भीख मांगी। उसके हाथ-पैर कांपने लगे। वह बार-बार माफी की भीख मांगता रहा और कहता रहा है कि उसने जीवन पर्यंत बेबसों, गरीबों, दलितों, शोषितों की मदद की है। लाखों लोगों को नशे से मुक्ति दिलवायी है, वेश्याओं का उद्धार किया है, विधवाओं को आश्रय दिया है और समाज के लिए ऐसे कई काम किये हैं जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन माननीय जज पर कोई असर नहीं पडा। उन्होंने तो गुरमीत के काले सच की पूरी किताब पढने-जांचने के बाद ही यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। गुरमीत की नीच हरकतों का पिटारा तो २००२ में ही खुल गया था जब पीडित साध्वी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिखकर डेरा सच्चा सौदा के सिरसा डेरे में साध्वियों से दुष्कर्म किये जाने की शिकायत कर गुरमीत के संत नहीं, कुसंत होने का सारा काला-चिट्ठा पूरे सबूतों के साथ पेश किया था। तब होना तो यह चाहिए था कि यह खबर देश के तमाम अखबारों के पहले पन्ने पर जगह पाती, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। गुरमीत का अथाह रसूख और धनबल काम कर गया और अधिकांश नामी-गिरामी, बडे-बडे पत्रकारों, संपादकों और मालिकों ने बिकने में देरी नहीं लगायी। गुरमीत ने अपने व्याभिचारी चेहरे को छुपाने के लिए देश के बडे-बडे समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में चार-चार-आठ-आठ पेज के ऐसे-ऐसे विज्ञापन छपाने शुरू कर दिए जिनमें उसे ईश्वर का एकमात्र ऐसा दूत दर्शाया गया जिसका इस धरती पर आगमन ही गरीबों की सेवा और नारी कल्याण के लिए हुआ है। पत्रकारिता के इस बिकाऊ और घोर अंधेरे दौर में उजाले की किरण के रूप में तब एक पत्रकार ने गुरमीत के काले कारनामों को उजागर करने का बीडा उठाया। इस पत्रकार का नाम था, रामचंद्र छत्रपति। वे सिरसा से एक सांध्य दैनिक 'पूरा सच' का प्रकाशन करते थे जिसकी खबरें उसके नाम के अनुरुप होती थीं। उन्होंने बेखौफ होकर साध्वी की चिट्ठी को 'पूरा सच' में प्रकाशित करने के साथ-साथ उसके तमाम काले कारनामें लगातार उजागर करने का अभियान चला दिया। इससे गुरमीत की तो चूलें ही हिल गयीं और वह इस कदर बौखलाया कि उसने निष्पक्ष निर्भीक पत्रकार की हत्या करवा दी। इस निर्मम हत्या पर कहीं कोई शोर-शराबा नहीं हुआ। एक पाखंडी के द्वारा करवायी गई इस निर्मम हत्या को महज एक आम खबर मानकर भुला दिया गया और अब जब गुरमीत को जेल में ठूंसा गया तो देश के तमाम मीडिया को रामचंद्र छत्रपति की कुर्बानी की याद हो आयी। विभिन्न न्यूज चैनलों और समाचार पत्रों में छत्रपति की निर्भीक पत्रकारिता के चर्चे होने लगे। जिन दैनिक अखबारों के मालिकों और संपादकों ने तब छत्रपति के द्वारा भेजी गई साध्वी की चिट्ठी और गुरमीत के डेरों में चलने वाले हवस के खेल की सच्चाई को छापने से इन्कार कर दिया था वे भी अब यही लिखते और कहते नजर आ रहे हैं कि पत्रकार हो तो रामचंद्र जैसा, जिसने गुरमीत जैसे दानव से लोहा लेकर सजग पत्रकारिता का मान और सम्मान बढाया। सच तो यह है कि अगर तब देश का सारा मीडिया पाखंडी गुरमीत के पर्दाफाश में जुट जाता तो उसके कुकर्मों की शर्मनाक यात्रा और आगे नहीं बढ पाती। मीडिया ही है जो लोगों को जगा सकता है। यह काम नेताओं के बस का नहीं है। उन्हें तो जहां से वोट मिलते दिखते हैं, वहीं पर वे भीख का कटोरा लेकर पहुंच जाते हैं। अय्याश गुरमीत को सजा सुनाये जाने के बाद कई अंधभक्तों के होश ठिकाने आ गये हैं और उन्होंने वासना के कीचड में सने ढोंगी की तस्वीरों को कचरे और नालियों के हवाले करना शुरू कर दिया है। यह उनके साथ किये गए विश्वासघात से उपजा गुस्सा है। यह नफरत उन हवस के पुजारियों के लिए चेतावनी है जो साधु का लिबास धारण कर भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बनाते हैं। गुरमीत जैसे कई और धूर्तों का जाल जहां-तहां फैला है। इनके कई खरीदे हुए चेले होते हैं जो भोले-भाले लोगों को फांसने के लिए दिन-रात इनके गुणगान के प्रचार में लगे रहते हैं। इनके निशाने पर अनपढ और गरीब लोग ज्यादा होते हैं जिन्हें बताया जाता है कि बाबा उनकी सभी समस्याओं का खात्मा कर सकते हैं। उनकी सभी मनचाही मुरादें पूरी हो सकती हैं। निराश और हताश लोग बडी आसानी से उनके झांसे में आ ही जाते हैं। गुरमीत के भी ऐसे ही अंधभक्त शिष्यों की संख्या लाखों-करोडों में थी जो 'चमत्कार' पर यकीन रखते थे। बाबाओं के अनुयायियों की संख्या के आधार पर ही उनकी कीमत, रूतबा तय होता है। गुरमीत के डेरों में उनके लाखों भक्तों को वोट में तब्दील करने के लिए विभिन्न पार्टियों के राजनेता उसके आगे-पीछे दौडते रहते थे। वे उसके यहां नतमस्तक होने के लिए बार-बार हाजिरी लगाते रहते थे। 'इस हाथ ले, उस हाथ दे' की नीति पर चलने वाला गुरमीत उन्हें भरोसा दिलाता था कि उसके लाखों भक्तों के वोटों पर सिर्फ उन्हीं का हक है। इन्हीं वोटों के लालच में ही वर्षों तक कांग्रेस गुरमीत पर कई तरह की मेहरबानियों की बरसात करती रही। चार कांग्रेसी सांसदों ने सीबीआई के डायरेक्टर पर पावन रिश्तों के हत्यारे गुरमीत का केस बंद करने का जबर्दस्त दबाव बनाकर उसके हौसले को बुलंद किया था। भारतीय जनता पार्टी पर भी कांग्रेस की परंपरा निभाने के आरोप हैं।
गुरमीत की तथाकथित बेटी हनीप्रीत ने डंके की चोट पर कहा कि, "हरियाणा में विधानसभा के चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी से यह डील हुई थी कि पार्टी के सत्ता में आने के बाद भरपूर राहत प्रदान की जाएगी और बलात्कार का मुकदमा खत्म कर दिया जाएगा। गुरमीत ने भाजपा के दिग्गज नेताओं पर यकीन कर डेरा के प्रभाव वाली २८ विधानसभा सीटों पर भाजपा के पक्ष में मतदान करने का फरमान जारी किया था। मनोहरलाल खट्टर ने ही चुनाव के वक्त गुरमीत की मुलाकात अमित शाह से कराई थी। गुरमीत को पूरा यकीन था कि उसके साथ धोखा नहीं होगा। सीबीआई कोर्ट की ओर से उसे बलात्कार का दोषी ठहराए जाने के बाद यह तय हो गया है कि भाजपा के दिग्गज नेताओं ने वोट के लालच में सत्ता प्राप्ति के लिए बाबा के साथ धोखा किया है।"

Thursday, August 24, 2017

आज़ादी...आज़ादी...आज़ादी?

कितने युवा ऐसे हैं जो सच्चे प्यार की परिभाषा को आत्मसात करने को तैयार ही नहीं हैं। स्कूल कॉलेजों में अध्ययनरत असंख्य छात्रों को जकडता सेक्स और रोमांस का बुखार भयावह और चिंताजनक मंजर दिखाने लगा है। एकतरफा तथाकथित प्यार के आवेश में मनमानी करने वाले मजनुओं ने सम्मान, मनुहार और त्याग से दूरी बनानी शुरू कर दी है। उनमें यह सोच घर कर चुकी है कि मेरी नहीं, तो किसी और की भी नहीं। नहीं सुनना तो उन्हें कतई रास नहीं आता। इसी के फलस्वरूप उनके बलात्कारी और हत्यारे होने के समाचार बेटियों और उनके माता-पिता को बेहद डराने लगे हैं। वैसे ऐसे लोगों की तुलना तो सिर्फ और सिर्फ जानवरों से ही की जा सकती है। मानसिक रूप से बीमार वासना के गुलामों के कई चेहरे हैं। एक ओर जहां बेगाने घिनौने दुराचारों को अंजाम दे रहे हैं वहीं अपने भी अपनों की इज्जत पर डाका डालने में पीछे नहीं हैं। जो संबंध कभी पवित्रता की कसौटी पर पूरी तरह से खरे उतरते थे, उनमें खोट का आ जाना कई-कई सवाल खडे करता है। करीबी रिश्तों में घर कर चुकी विषाक्त गंदगी की सफाई आखिर कैसे हो पायेगी और दूसरों की मजबूरी और पीडा का फायदा उठाने की प्रवृत्ति का कैसे अंत होगा?
श्रेया बारहवीं क्लास की छात्रा थी। वह प्रोफेसर बनना चाहती थी। वह एशियाड और ओलंपियाड में कई बार टॉप लेवल पर आ चुकी थी। २८ जुलाई २०१७ को उसने स्कूल के जोनल कॉम्पिटशन अचीवमेंट में यह कविता सुनाई थी जिसे सुनकर सभी भावुक हो गए थे, "बेटियां किसी से कम नहीं... मगर घर से निकलने में डरती हैं... नजरें घूरती हैं... डर लगता है पीछा करने वालों से... फिर भी बेटियां किसी से कम नहीं, किसी के डर से घर में कैद न करो...।" १७ वर्षीय श्रेया शुरू से ही पढाई में होनहार थी। रात को दो बजे तक पढती रहती थी। माता-पिता को उसे याद दिलाना पढता था कि काफी रात हो गयी है, अब सो जाओ, सुबह स्कूल जाना है। स्कूल से आने के बाद भी वह अपने भाई को पढाती और मां के साथ काम में हाथ बंटाती। हर पल का सदुपयोग करने वाली श्रेया की १६ अगस्त २०१७ को गला दबाकर हत्या कर दी गई। हत्यारा और कोई नहीं, उसी का दोस्त सार्थक था, जिससे उसने कुछ वजहों से दूरियां बना ली थीं और बात तक करना बंद कर दिया था। लेकिन सार्थक जब-तब उसका पीछा कर उसे तंग करता रहता था। श्रेया ने सार्थक को कई बार फटकारा, लेकिन वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। उसके पास श्रेया की कुछ तस्वीरें भी थीं जिनके दम पर वह उस पर एकांत में मिलने के लिए दबाव डालता था। बुधवार शाम आठ बजे श्रेया ट्यूशन पढकर घर लौट रही थी तो वह उसके समक्ष गिडगिडाने लगा कि उसे सिर्फ एक बार जरूरी बात करनी है। इसके बाद वह कभी उसका पीछा नहीं करेगा। श्रेया उसकी बात मान गई। दोनों कुछ ही दूरी पर संकरी गली में जा पहुंचे। श्रेया ने उसे अपना ध्यान पढाई-लिखाई पर लगाने और उसका पीछा करने से बाज आने को कहा तो वह भडक उठा। सार्थक कुछ और ही सोचकर आया था। उसने बस यही रट लगाये रखी कि वह उससे बेहद प्यार करता है। श्रेया ने उसे बहुतेरा समझाया कि उसके मन में कभी भी ऐसा कोई ख्याल नहीं आया। दोस्ती का उसने गलत अर्थ लगाया है। गलत हरकतों के कारण ही वह उसकी नजरों से गिर चुका है। बातों ही बातों में दोनों के बीच नोंक-झोंक और धक्का-मुक्की होने लगी। गुस्से में आकर उसने श्रेया का गला घोंटा और सीधे अपने घर पहुंच गया।
श्रेया के माता-पिता और भाई इस सदमे को कभी भी नहीं भूल पाएंगे। उसका हंसना-खिलखिलाना और शरारतें करना उन्हें जब-तब याद आता रहेगा। बेटी के कमरे में सजे मेडल्स, शील्ड और सर्टिफिकेट्स ताउम्र पुरानी यादों को ताजा करते हुए आंखों को भिगोते रहेंगे। हत्यारा सार्थक तो कुछ साल जेल की सलाखों के पीछे रहने के बाद जिन्दा अपने घर वापस लौट आयेगा।
जब देशवासी आजादी का जश्न मना रहे थे तब चंडीगढ में दस साल की एक बलात्कार पीडिता बच्ची ने अस्पताल में एक बेटी को जन्म दिया। बच्ची को उसके मामा ने अपनी हवस का शिकार बनाया था। बीते महीने जब बच्ची के पेट में दर्द हुआ तो उसकी मां उसे डॉक्टर के पास ले गई थी। वहां पर पता चला कि बच्ची तो सात महीने से गर्भवती है। बच्ची के गर्भवती होने की खबर जब मीडिया में आयी तो पूरा देश स्तब्ध रह गया। अखबारों और न्यूज चैनलों पर चर्चाओं का दौर चलने लगा। पिता, चाचा, भाई, मामा के वहशीपन की नयी-पुरानी दास्तानें दुहरायी जाने लगीं और गर्त में जाते नजदीकी रिश्तों पर गहन चिन्ता जताने का सिलसिला चल पडा। नाबालिग बच्ची के अबॉर्शन की अनुमति मांगी गई, लेकिन शीर्ष अदालत ने अनुमति देने से इन्कार कर दिया था। ३२ हफ्ते के गर्भ की मेडिकल रिपोर्ट देखने के बाद अदालत का मानना था कि गर्भपात न तो पीडिता के लिए ठीक है और न ही भ्रूण के लिए। बच्ची की प्रेग्नेंसी ३६ हफ्ते के करीब पहुंचने पर उसे १५ अगस्त के दिन आपरेशन थिएटर ले जाया गया जहां उसने बेटी को जन्म दिया। अबोध बच्ची से उसके गर्भवती होने के सच को छिपाया गया। उसे बताया गया कि उसके पेंट में पथरी थी जिसका ऑपरेशन किया गया है। गौरतलब है कि मनोविज्ञान की डॉक्टरों ने डिलीवरी से पहले बच्ची को मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार करने के लिए काउंसलिंग को जरूरी बताया था, पर बच्ची के माता-पिता ने मना कर दिया था। उनका कहना था कि इससे बच्ची को पता चल सकता है कि वह गर्भवती है। बच्ची के पिता ने दो दिन पहले मेडिकल कॉलेज प्रशासन को एक पत्र में स्पष्ट लिख दिया था कि वे किसी भी हालत में नवजात को अपनाने को तैयार नहीं हैं। उनकी बेटी को भी जन्म लेने वाले बच्चे का मुंह न दिखाया जाए। देश के कई लोगों ने बच्ची को गोद लेने की इच्छा जतायी है। अमेरिका से एक व्यक्ति ने बच्ची को गोद लेने के लिए हॉस्पिटल डायरेक्टर को ईमेल भेजी है।
मानवता का धर्म तो यही कहता है कि लाचार और बीमार के प्रति सहानुभूति दर्शाते हुए उसकी सहायता करनी चाहिए। लेकिन...। १५ अगस्त को देश की राजधानी दिल्ली में लोगों का चौंका देने वाला बेरहम और बेपरवाह चेहरा नजर आया। एक तेज रफ्तार कार की चपेट में आया युवक १४ घण्टे तक रिंग रोड पर तडपता रहा, लेकिन किसी को भी उसकी मदद करने की नहीं सूझी। उलटे उसे लूट लिया गया। एक स्कूटर सवार लहुलूहान तडपते युवक के पास पहुंचा और उसका १२ हजार रुपये से भरा बेग और जेब से तीन हजार रुपये लेकर चलता बना। हां, उसने वहां पर एक पानी की बोतल जरूर रख दी। एक पानी की बोतल के बदले १५ हजार की इस लूट ने यकीनन इंसानियत को तो शर्मसार कर ही डाला।

Thursday, August 17, 2017

अपनी जान के दुश्मन

मैं तो यही मानता हूं कि यह जीवन विधाता का दिया एक ऐसा उपहार है जिसकी हिफाजत और कद्र की ही जानी चाहिए। जो लोग आत्महत्या करते हैं वे यकीनन भ्रमित और कायर होते हैं। उनमें जीवन की राह में आने वाले संघर्षों का सामना करने की ताकत नहीं होती। निर्बल और विवेकहीन भी होते हैं यह लोग। रोजमर्रा की छोटी-मोटी समस्याओं को अटल पहाड मान घबरा जाते हैं। मुंह छिपाकर भाग निकलने में ही अपनी भलाई समझते हैं। इनकी सारी शिक्षा-दीक्षा भी अर्थहीन हो जाती है। बच्चे कहीं न कहीं बडों से ही प्रेरणा लेते हैं। जब बडे ही अपने कर्तव्य से भागने लगें, अपने जीवन को नीरस मानने लगें और समस्याओं से टकराने का दम ही न रहे तो सोचिए बच्चे किस राह पर चलेंगे? मेरी आखों के सामने रह-रहकर बक्सर के डीएम मुकेश पांडे का चेहरा कौंधने लगता है। अखबारी दुनिया से बेहद करीबी का वास्ता रखने के कारण आम मौतों और दुर्घटनाओं की खबरें ज्यादा नहीं चौंकातीं। हां किसी जुआरू नेता, अधिकारी, समाजसेवक, साहित्यकार की आत्महत्या की खबर मुझे हिलाकर रख देती है। बिहार के बक्सर जिले के जिलाधिकारी मुकेश पांडे का शव बीते सप्ताह की रात गाजियाबाद स्टेशन से एक किमी दूर कोटगांव के पास रेलवे ट्रैक के पास क्षत-विक्षत हालत में मिला। एक सुसाइड नोट भी बरामद हुआ। २०१२ बैच के इस आइएएस अधिकारी ने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि, 'मैं अपनी जिन्दगी से काफी परेशान हो गया हूं। मेरा इंसान के अस्तित्व पर से ही विश्वास उठ गया है। मेरे मां-बाप और पत्नी में हमेशा तनातनी रहती है। हमेशा उलझते रहते हैं, जिससे मेरा जीना दुश्वार हो गया है। दोनों गलत नहीं हैं, दोनों आपस में प्यार करते हैं, लेकिन हर बार अति अच्छी नहीं होती। मेरी पत्नी मुझसे प्यार करती है। मेरी बेटी भी है। मेरी शादी के बाद जीवन में उथल-पुथल है। हम दोनों की छवि बिल्कुल अलग है। हम दोनों का कोई मेल नहीं है, फिर भी मैं दोनों से प्यार करता हूं। मेरी मौत के लिए मेरी छवि ही जिम्मेदार है। मैं खुले दिल का नहीं हूं। मैं जिन्दगी से परेशान हूं। मैंने सोचा कि तप करूं या समाज सेवा करूं, पर मेरा जीवन से मन भर गया है।'
मुकेश की मौत के बाद उनकी पत्नी, सास और ससुर जब मौके पर पहुंचे तो उनकी आंखें भीग गयीं। सास और ससुर अपने दामाद को कोसने से भी खुद को नहीं रोक सके। हां, ऐसे लोग सहानुभूति के अधिकारी नहीं होते। रस्म अदायगी तो करनी ही पडती है। यही संसार की रीत है। छोटी-छोटी बातों से आहत होकर मौत को गले लगा लेना नपुंसकता की निशानी है। कोई भी शख्स यूं ही आइएएस अधिकारी नहीं बन जाता है। बहुत मेहनत करनी पडती है। मुकेश भी यकीनन परिश्रमी और बुद्धिमान रहा होगा। घर-परिवार में होने वाले मनमुटावों ने उसे इतना विवेकहीन कैसे बना दिया कि उसने मौत के लिए रेल की पटरी चुन ली? मुकेश के सुसाइड नोट को पढने के बाद यह आभास भी होता है कि वह अपनी पत्नी, बेटी और मां-बाप को बहुत चाहता था। वह शांतिप्रिय था। तनातनी और लडाई-झगडे जैसी समस्याएं तो कई घरों में होती हैं। समझदार लोग उनको खत्म करने के लिए मिल-बैठकर हल तलाशते हैं। जीवन का अंत नहीं करते। मुकेश तो पढा-लिखा था। उसके लिए इस परेशानी का हल निकालना असंभव नहीं था। उसने पत्र में खुद को खुले दिल का बताया है। उसकी पत्नी के साथ उसके विचार मेल नहीं खाते थे। यह समस्या भी आम है। एक खास आदमी के द्वारा आम समस्या से घबराकर मौत को गले लगने की भयावह हकीकत उसी की अक्लमंदी, योग्यता, निष्ठा, मिलनसारिता और शिक्षा-दीक्षा को कठघरे में खडा कर देती है।
आज के इस आधुनिक दौर में बच्चों को मौत के हवाले करने वाले कई खेल ईजाद कर दिये गए हैं। बारह-पंद्रह साल के बच्चे खेल ही खेल में जिस तरह से मौत को गले लगा रहे हैं उससे चिन्ता भी होती है और भय भी लगता है। कुछ हफ्ते पूर्व महाराष्ट्र के सोलापुर में चौदह साल के एक बच्चे मनप्रीत ने सातवीं मंजिल से कूदकर जान दे दी और इस हफ्ते पश्चिम बंगाल में स्थित मिदनापुर जिले के आनंदपुर में चौदह वर्षीय दसवीं क्लास के छात्र अनकन ने इंटरनेट गेम ब्ल्यू व्हेल के हिंसक मायावी चक्कर में आत्महत्या कर ली। इन दोनों बच्चों को 'ब्ल्यू व्हेल' खेलने की लत लग गई थी। ब्ल्यू व्हेल गेम को २०१३ में रूस के फिलिप बुडेईकिन ने बनाया था। पचास दिन तक चलने वाले इस गेम में एक एडमिन होता है जो खेलने वाले को गेम कैसे खेलना है और आगे क्या करना है, इसके बारे में बताता है। खिलाडी को हर दिन एक कोड नम्बर दिया जाता है। जो हॉरर से जुडा होता है। इसमें हाथ पर ब्लेड से ५७ लिखकर इसकी फोटो अपलोड करनी होती है। फाइनल राउंड में पहुंचने से पहले बच्चों को स्वयं को भयानक कष्ट देकर होने वाले रोमांच और आनन्द के लिए उकसाया जाता है और अपने ही प्रति हिंसा करनी होती है। उन्हें गेम जीतने के लिए आत्महत्या के लिए उकसाया जाता है। इस खेल को एक बार शुरू करने पर बीच में नहीं छोडा जा सकता। यदि कोई बच्चा ऐसा करने की कोशिश करता है तो माता-पिता को मारने की धमकी तथा तरह-तरह से ब्लैकमेल किया जाता है। इस हत्यारी गेम के तैयार करने वाले फिलिप का कहना है कि इस खेल को खेलकर अपनी जान देने वाले लोग इस धरती पर रहने और जीने के लायक नहीं थे। समाज की सफाई के लिए ही उसने यह गेम तैयार किया है। गौरतलब है कि अब तक दुनिया भर में इस खेल के चक्कर में ढाई सौ से अधिक बच्चे अपनी जान गंवा चुके हैं। भारत में भी इस हत्यारी गेम ने बडी तेजी से बच्चों को अपने शिकंजे में लेना शुरू कर दिया है। जानलेवा इंटरनेट गेम के मक्कडजाल का शिकार हुआ मुम्बई का किशोर मनप्रीत बडा होकर पायलट बनना चाहता था। आनंदपुर का अनकन भी पढाई-लिखाई में होशियार था। उसके मां-बाप ने उसके उज्ज्वल भविष्य के कई-कई सपने देखे थे। मनप्रीत ने सोसायटी की इमारत की पांचवी मंजिल से कूदकर मौत को गले लगाया तो अनकन ने घर के बाथरूम में। इंदोर में ब्ल्यू व्हेल के लती एक बच्चे को आत्महत्या करने से बचाया गया।