Thursday, June 28, 2018

लापरवाही, भूल और अपराध

शहर अपराध के घने जंगल बनते जा रहे हैं जहां अपराधी अपना काम करके बडी आसानी से गुम हो जाते हैं। हत्या, अपहरण, डकैती, लूटपाट और बलात्कार जैसी संगीन घटनाएं नगरों और महानगरों की पहचान बन चुकी हैं। एक जमाना था जब अपराधी पुलिस से खौफ खाते थे, लेकिन आज जिस तरह से सरेआम सडकों पर गोलियां चलती हैं, हत्याएं कर दी जाती हैं उससे यह मानने में कोई हर्ज नहीं कि अपराधी खुद को खाकी वर्दी से ज्यादा ताकतवर समझने लगे हैं। अपनों और बेगानों की पहचान करना बेहद मुश्किल हो गया है। रिश्तों को स्वार्थ के हाथों बिकने में देरी नहीं लगती। दोस्ती, भरोसा और जान-पहचान कब आफत बन जाए कहा नहीं जा सकता। १० जून २०१८ की रात नागपुर में एक राक्षस प्रवृत्ति के अपराधी ने अपने चार साल के बेटे, बहन, जीजा उनकी बेटी और बहन की सास को गाजर-मूली की तरह काट डाला। यह नृशंस हत्यारा मन की शांति और बुरी आत्माओं से दूरी बनाये रखने के लिए शहर के एक मंदिर में देर रात तक बैठकर पूजा-पाठ किया करता था। उसने अपने एक हाथ पर काली मां तो दूसरे हाथ पर खुद का नाम गुदा रखा है। नागपुर शहर ने ऐसा नरसंहार पहले कभी नहीं देखा था। अपने जीजा के परिवार के साथ-साथ अपने ही बेटे का खात्मा करने वाले इस नशेडी ने २०१४ में अपनी पत्नी की चरित्र पर संदेह होने के चलते हत्या कर उसकी लाश सूखी घास डालकर जला दी थी। सत्र न्यायालय ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई और उसे जेल भेज दिया था। उसके जेल जाने के बाद उसके दोनों बच्चों की देखरेख बहन और जीजा ने की थी। यह सिलसिला अभी तक चल रहा था। इतना ही नहीं उन दोनों ने उसे जेल से रिहा करवाने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की और पानी की तरह पैसा बहाया था। तीन साल तक जेल में रहने के बाद अंतत: हाईकोर्ट ने उसे निर्दोष मानते हुए रिहा कर दिया। बहन और जीजा ने यह सोचकर उसे अपने घर में रहने की इजाजत दे दी थी कि अब उसमें सुधार आ चुका होगा। हालांकि इस सनकी हत्यारे को घर में रखने का कुछ रिश्तेदारों ने पुरजोर विरोध किया था। जब हत्यारा जेल में था तब उसके जीजा ने उसके खेत को अधिया यानी किराये पर दे दिया था। वे चाहते थे कि यह खेती की जमीन सुरक्षित रहे ताकि उसके बच्चों के काम आ सके। लेकिन हत्यारा साला खेती को बेचकर ऐश करना चाहता था। इसी बात को लेकर लगभग छह महीने पूर्व उसने जीजा को जान से मारने की धमकी भी दी थी, लेकिन उन्होंने इसे गंभीरता से नहीं लिया और अहसानफरामोश साला मौका पाते ही इतनी विभत्स और भयावह वारदात को अंजाम देकर पंजाब के लुधियाना शहर में जा पहुंचा। लुधियाना में उसे कृषि के औजार बनाने वाली फैक्टरी में नौकरी भी मिल गई। जिस शख्स ने उसे नौकरी दिलायी थी वह उसके मोबाइल का इस्तेमाल करने लगा था जिसके चलते पुलिस ग्यारह दिन बाद उसे दबोचने में सफल हो गयी। उसके सारे मंसूबे धरे के धरे रह गये।
नोएडा में एक न्यूज चैनल मालिक को एक युवती ने ऐसा फांसा और सबक सिखाया जिसे वह जीवनभर याद रखेगा। उसे किसी मित्र ने सेहत बनाने के लिए प्रतिदिन जिम जाने की सलाह दी तो उसने शहर की एक जिम में जाना प्रारंभ कर दिया। इसी दौरान जिम चलाने वाली खूबसूरत युवती से उसका सामना हुआ तो वह उस पर मर मिटा। युवती को पता था कि चैनल मालिक मोटी आसामी है। ऐसे में उसने कुछ ऐसा चक्कर चलाया कि दोनों में गहरी दोस्ती हो गई। एकांत में मिलने-जुलने का सिलसिला भी प्रारंभ हो गया। इसी दौरान दोनों के बीच की सभी दूरियां मिट गयीं। वासना के आवेग में अंधा हुआ चैनल मालिक मुफ्त में मिल रहे देह सुख से आनंदित था। उसे भनक ही नहीं लगी कि उन दोनों के मिलन का अश्लील वीडियो बनाया जा चुका है। हैरत की बात तो यह है कि लोगों को हमेशा सजग रहने का पाठ पढाने वाला चैनल मालिक, युवती के चरित्र और चाल-चलन का आकलन ही नहीं कर पाया! कुछ दिनों के बाद युवती ने अपना असली रंग दिखाया और वीडियो को वायरल करने की धमकियां देते हुए ब्लैकमेल करने लगी। चैनल मालिक ने सोचा कि पच्चीस-पचास हजार रुपये लेकर युवती पीछा छोड देगी, लेकिन युवती ने जब मुंह खोला तो उसके पैरों तले की जमीन ही खिसक गई। वह पूरे पच्चीस करोड मांग रही थी। ब्लैकमेल के इस खेल में युवती का एक दोस्त भी शामिल था। दोनों ने मिलकर न्यूज चैनल वाले को दिन में ऐसे तारे दिखाए की उसकी नींद उड गई। दिन में कभी झपकी लगने पर भी बुरे-बुरे सपने आने लगे। यह डर भी सताने लगा कि अगर उसने ब्लैकमेलर युवती की मांग पूरी नहीं की तो वह दूसरे न्यूज चैनल वालों के पास पहुंच जाएगी और वे अपने-अपने चैनल पर ब्रेकिंग न्यूज दिखा-दिखाकर उसका तमाशा बना कर रख देंगे। उसके अतीत और वर्तमान की चीरफाड कर उसका भी राम-रहीम, आसाराम और तरुण तेजपाल जैसा हाल करके रख दिया जाएगा। एक शुभचिंतक ने उन्हें सलाह दी कि अगर युवती की मांग पूरी कर दी तो भी आसानी से छुटकारा नहीं मिलेगा। पुलिस का सहारा लेना ही होगा। बहुत सोच-विचार करने के पश्चात वह पुलिस की शरण में पहुंचा। दो करोड की पहली किश्त लेने के बहाने उसने दोनों को नोएडा के एक रेस्टारेंट में बुलाया। जैसे ही वे रुपये लेने के लिए रेस्टारेंट पहुंचे उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। दोनों आरोपी पहले भी कई रईसो को अपने जाल में फंसा चुके हैं।
सोलह साल के दसवीं कक्षा में पढने वाले एक छात्र को शिक्षक ने पढाई में ध्यान नहीं देने की वजह से डांटा तो उसने अपने घरवालों को नमक-मिर्च लगाकर ऐसा भडकाया कि उन्होंने स्कूल पहुंचकर शिक्षक को जी भर कर खरी-खोटी सुनायी और भविष्य में कभी भी ऐसी भूल न दोहराने की चेतावनी दे डाली। अपने शिक्षक से आये दिन मुंहजोरी करने वाले इस छात्र ने पुलिस स्टेशन पर भी फोन कर शिक्षक की शिकायत की। जब इतने में भी उसका जी नहीं भरा तो उसने स्कूल को ही बंद करवाने की ठान ली। इसके लिए उसने वो अपराध कर डाला जिसकी कल्पना भारत में तो नहीं की जाती। तीन दिन बाद वह नौवीं कक्षा के एक छात्र को डरा-धमका कर स्कूल के शौचालय में ले गया और उसके पेट, माथे, सीने और पीठ पर चाकू से कई वार कर उसकी हत्या कर दी। इस छात्र का बस चलता तो उसे डांटने वाले शिक्षक को ही मार डालता। पर शिक्षक की मजबूत कद-काठी ने उसके मंसूबे और हौसले को पस्त कर दिया। स्कूल के अत्यंत सीधे-सादे छात्र की हत्या करने वाला यह हिंसक छात्र जब पकड में आया तो वह बडे आराम से पेशेवर अपराधी की तरह पुलिस के सवालों का जवाब देता रहा। पुलिसवाले भी हैरान थे। जिस सोलह साल के बच्चे का चेहरा डरा-सहमा दिखायी देना चाहिए था वह तो पछतावे से कोसों दूर भयमुक्त था।

Thursday, June 21, 2018

नेकी के साथी

यह भारत ही है जहां एक तरफ समृद्धि के अनंत उजाले हैं तो दूसरी तरफ गरीबी और बदहाली का घना अंधेरा है। जिन धनपशुओं की आंखों पर पट्टी बंधी है वे कल्पना नहीं कर सकते कि देश के कुछ प्रदेश ऐसे हैं जहां भूख के कारण मौतें होती रहती हैं। लाखों बच्चों को कई दिनों तक अन्न का दाना तक नसीब नहीं होता। कुपोषण के चलते कितने बच्चों को असमय इस दुनिया से विदायी लेनी पडती है इसका सटीक आंकडा सरकारों के पास भी नहीं है। जो लोग खबरों से करीबी रिश्ता रखते हैं उन्हें २०१७ के उस सितंबर महीने की याद होगी जब झारखंड की एक दस-ग्यारह साल की बच्ची अपनी बेबस मां से भात की मांग करते-करते चल बसी थी। ऐसी खबरें मीडिया में कम ही सुर्खियां पाती हैं। लेकिन यह खबर किसी तरह से सजग भारतवासियों तक पहुंच गयी थी। लोग स्तब्ध रह गये थे। संतोषी नाम की इस बच्ची की भूख से हुई मौत को लेकर सरकार और प्रशासन को कई दिनों तक कोसा गया था। नेताओं के लिए ऐसी मौतें चुनावों में वोट बटोरने का साधन बनती हैं। हिन्दुस्तान के अधिकांश नेता किस मिट्टी के बने हैं इससे कौन वाकिफ नहीं है। यही नेता ही तो प्रदेश और देश चलाते हैं। इनके कभी भी न पूरे होने वाले वादों और छल-कपट के दंश से करोडों भारतवासी वर्षों से लहुलूहान होते चले आ रहे हैं। यह अपना चेहरा बदल-बदल कर आते हैं और वोट झटक कर ले जाते हैं। पता नहीं यह सिलसिला कब तक चलने वाला है। ऐसे अनिश्चित दौर में भी कई इंसानियत के रखवाले हैं जो भारतीय संस्कारों को जिन्दा रखे हुए हैं। दीन-दुखियों के प्रति इनका समर्पण देखकर जी चाहता है कि काश- ऐसा वक्त आ जाए जब देश की सत्ता सौदागर किस्म के राजनेताओं के हाथों से छिनकर मानवता के रक्षकों के हाथों में चली जाए। अगर सभी देशवासी ठान लें तो इस सपने को साकार करना नामुमकिन नहीं है। हां, अफसोस इस बात का भी है कि ईमानदार, चरित्रवान, परोपकारी और संवेदनशील लोग राजनीति में आना ही नहीं चाहते। बहुत से लोगों को पता ही नहीं होगा कि लगभग २० करोड गरीब भारतीयों को रोज भूखे पेट सोना पडता है। गरीबी हटाने के नारे उछालकर कितने नेता विधायक, सांसद, मंत्री बन गए लेकिन गरीब वहीं के वहीं हैं। बस धनवानों का ही धन सतत बढता चला जा रहा है। इनका धन इन्हीं के घर-परिवार के काम आता है। अधिकांश धनपतियों के मन में जनहित का विचार कभी भी नहीं आता। कुछ लोग हैं जो यह मानते हैं कि ईश्वर ने उन्हें दीन-दुखियों की सेवा करने के लिए इस धरती पर भेजा है।
हरियाणा के दामोदा खुर्द गांव निवासी बलविन्द्र सिंह नैन एक ऐसे इन्सान है जिन्हें दूसरों की सेवा करने में अपार सुख की अनुभूति होती। अनाज मंडी में आढत के साथ-साथ पेट्रोल पम्प चलाने वाले बलविन्द्र अपने दोस्तों के सहयोग से वर्ष २००५ से सालासर और वैष्णोदेवी पैदल जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए निशुल्क भोजन की व्यवस्था करते चले आ रहे हैं। धार्मिक यात्रा पर निकलने वाले धर्म प्रेमियों को भोजन मुहैय्या करवाते-करवाते एक दिन उनके मन में विचार आया कि जो लोग घर से बेघर हैं, अपंग हैं, कुछ कमा नहीं सकते, सडकों, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड आदि स्थानों पर भूखे-प्यासे भटकते रहते हैं उनके लिए कुछ-न-कुछ जरूर किया जाना चाहिए। ऊपर वाले की मेहरबानी से उनके पास किसी सुख-सुविधा की कमी नहीं है। चारों तरफ से धन बरस रहा है तो फिर ऐसे में जरूरतमंदों की सेवा कर जीवन को सार्थक क्यों न बनाया जाए। बलविन्द्र ने भूखे-प्यासों को दो समय का भोजन नि:शुल्क उपलब्ध कराने के लिए २०१६ में हिसार प्रशासन की मदद से सबसे पहला 'रोटी बैंक' खोला। धीरे-धीरे और यह सिलसिला आगे बढता चला गया। हरियाणा के पानीपत, सिरसा, जींद, कैथल, रोहतक और पीरागढी (दिल्ली) में एक-एक जगह फतेहाबाद (हरियाणा) में दो 'रोटी बैंक' खुल चुके हैं। जहां पर प्रतिदिन औसतन छह हजार, माह में करीब दो लाख और साल में २२ लाख भूखों को दो वक्त का खाना खिलाया जाता है। इन रोटी बैंकों को सुचारू रूप से चलाने के लिए प्रतिवर्ष पांच करोड की जरूरत पडती है। रोटी बैंक चैरिटेबल ट्रस्ट के चेयरमैन बलविन्द्र बताते हैं कि "जहां-जहां भी रोटी बैंक खुले हुए हैं, वहां ७०-८० संपन्न लोग ट्रस्ट के साथ जुडे हैं।" दानदाताओं की यह संख्या ८०० तक पहुंच चुकी है। इनमें सक्षम किसान, व्यापारी और कुछ अधिकारी भी शामिल हैं। ये लोग खाद्य सामग्री और दान में रकम देकर 'रोटी बैंक' के संचालन में मदद करते हैं। 'रोटी बैंक' के पास से गुजरने वाले लोग भी दान पात्र में इच्छानुसार रुपये डालते हैं। रिक्शा चालक और दिहाडी मजदूर, जिनके पास किसी छोटे ढाबे पर भोजन करने लायक पैसे नहीं होते, वे भी रोटी बैंक में दोनों समय का खाना खाते हैं और इच्छानुसार योगदान करते हैं। इसके अलावा भी राशि कम पडती है तो ट्रस्ट के २३ सदस्य अपनी हैसियत के अनुसार भागीदारी करते हैं। इस सच को अच्छी तरह से जान लें कि अपने देश में अच्छे कामों में साथ देने वाले लोगों की कमी नहीं है। बस उन्हें इंतजार रहता है ईमानदार, कर्तव्यपरायण और विश्वासपात्र नायकों का जिनका अतीत और वर्तमान पाक-साफ हो, उसूलों के पक्के हों और जनहित के कार्यों को अंजाम देने की अथाह इच्छाशक्ति हो। जब उन्हें किसी भी व्यक्ति में यह खूबियां नजर आती हैं तो वे उनका हर तरह से साथ देने और अनुसरण करने में देरी नहीं लगाते। इस सच से लगभग हर कोई अवगत है कि अन्न की बर्बादी के मामले में हम भारतवासी अव्वल हैं। विभिन्न समारोहों के सम्पन्न होने के बाद बचने वाले भोजन को बडी बेदर्दी के साथ कचरे के ढेर के हवाले कर दिया जाता है। धनवान और उच्च मध्यमवर्ग के लोग भी बचे हुए अन्न को इधर-उधर फेंक देते हैं। उनके मन में कभी यह विचार ही नहीं आता कि इस भोजन से कई भूखे व्यक्तियों का पेट भरा जा सकता है। इस तरह से होने वाली भोजन की बर्बादी संवेदनशील इंसानों को बुरी तरह से व्यथित कर देती है। ऐसे ही एक शख्स हैं द्वारिका प्रसाद अग्रवाल जो व्यापारी होने के साथ-साथ एक सिद्धहस्त कहानीकार और उपन्यासकार भी हैं। अग्रवाल जी बिलासपुर के सदर बाजार स्थित एक होटल के संचालक हैं, जिसका नाम है, 'श्री जगदीश लॉज।' इस लॉज के प्रवेश द्वार पर उन्होंने एक फ्रिज रखवाया है तथा एक बैनर लगाया है जिसपर लिखा है कि- "क्या आपके घर में खाना या नाश्ता बच जाता है। उस खाने को यहां रखे फ्रिज पर रख जाइए ताकि किसी भूखे की भूख मिट सके। कृपया वही सामान रखें जो शुद्ध और खाने योग्य हो।" श्री अग्रवाल सोशल मीडिया पर भी काफी सक्रिय रहते हैं। मेरे पाठक मित्रों को यह जानकर ताज्जुब होगा कि श्री अग्रवाल का यह अभूतपूर्व प्रयास खूब रंग ला रहा है। कई लोग शादी-ब्याह और घरों में बचने वाला भोजन फ्रिज पर रख देते हैं जो भूखे पेट भरने के काम आता है और हां ऐसे लोगों की भी अच्छी खासी तादाद है जो ताजा गर्मागर्म भोजन और फल आदि भी फ्रिज में रखकर सच्ची मानवता का धर्म निभाते हैं।

Thursday, June 14, 2018

सच और झूठ

हमारे यहां बात-बात पर होहल्ला मचता रहता है। राजनीति और बुद्धिजीवियों की जमात में ऐसे कई चेहरे हैं जो अच्छा होता नहीं देख सकते। उनकी बस यही मंशा रहती है कि देश में आपसी टकराव होता रहे। चरित्र हनन का दौर चलता रहे और सर्वधर्म समभाव के परखच्चे उडते रहें। हां अब तो सोशल मीडिया भी भडकाने, लडाने और झूठ को सच बताने का अड्डा बन गया है। फेक न्यूज के जन्मदाता भी सीना तानकर चलते हैं। बीते सप्ताह देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी नागपुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तृतिय वर्ष के प्रशिक्षण शिविर में बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए। प्रणब मुखर्जी के द्वारा संघ के निमंत्रण को स्वीकार किए जाने पर ही कई कांग्रेसियों ने विरोध किया था। उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी भी अप्रसन्न थीं। दरअसल हुआ यूं कि जैसे ही प्रणब मुखर्जी ने नागपुर की धरा पर कदम रखा तो दिल्ली में शर्मिष्ठा मुखर्जी के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने की चर्चा ने जोर पकड लिया। एक-दो न्यूज चैनलों ने यह खबर भी प्रसारित कर दी कि पूर्व राष्ट्रपति की यह पुत्री पश्चिम बंगाल की मालदा लोकसभा सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लडेंगी। दिल्ली से दूर रानीखेत के पहाडों पर सूर्यास्त के खूबसूरत नजारों का लुत्फ उठाती शर्मिष्ठा ने जब यह खबर सुनी तो वह हतप्रभ रह गयीं। उन्हें ऐसा लगा कि उनकी खुशी, शांति और सुकून को किसी ने एक ही झटके में लूट लिया है। अपने पिता के संघ के कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर प्रारंभ से नाराजगी जता चुकी शर्मिष्ठा ने फौरन ट्वीट किया कि मैं कांग्रेस की एक समर्पित कार्यकर्ता हूं। मैं किसी सपने को पूरा करने नहीं बल्कि विचारधारा की वजह से कांग्रेस से जुडी हूं। इस पार्टी की विचारधारा में मुझे अटूट यकीन है। कांग्रेस छोडने से बेहतर होगा कि मैं राजनीति ही छोड दूं। मेरे द्वारा भविष्य में भाजपा की टिकट पर चुनाव लडने की खबर भाजपा के डर्टी ट्रिक डिपार्टमेंट का कारनामा है। उन्होंने फिर से अपने पिता को सचेत करते हुए कहा कि भविष्य में उनका भाषण तो भुला दिया जाएगा, लेकिन तस्वीरें संभालकर रखी जाएंगी।
नागपुर के रेशिमबाग स्थित संघ मुख्यालय में आयोजित गरिमामय समारोह में प्रणब मुखर्जी ने अपने भाषण से समस्त देशवासियों का दिल जीत लिया। जो कांग्रेस के नेता इस कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर बवाल मचाये थे, वे भी वाहवाही करते रह गए। संघ ने उम्मीदें लगा रखी थीं कि प्रणब मुखर्जी संघ की तारीफों के पुल बांधकर एक अच्छे मेहमान की भूमिका निभायेंगे, लेकिन उन्होंने एक अनुभवी नेता की तरह नपा-तुला भाषण देकर अपनी चतुराई और कला-कौशल का प्रदर्शन किया। प्रणब मुखर्जी जब संघ के नेताओं के साथ मंच पर विराजमान थे तब उन्होंने धोती-कुर्ता और जाकिट पहन रखी थी। मंच पर उन्होंने एक बार भी न संघ अथवा उसके संस्थापक केशव बलिराम हेडगवार का नाम लिया और न ही ध्वज को प्रणाम किया। लेकिन कार्यक्रम के समाप्त होने के कुछ घण्टों के बाद ही एक फर्जी फोटो सोशल साइट्स पर वायरल हो गई जिसमें प्रणब मुखर्जी सर संघचालक मोहन भागवत के साथ ध्वज प्रणाम करते नजर आए। जिन-जिन लोगों ने सोशल मीडिया पर पूर्व राष्ट्रपति को इस मुद्रा में देखा उनकी तीखी प्रतिक्रियाओं का तांता लग गया। प्रणब मुखर्जी की पुत्री और कांग्रेस नेता शर्मिष्ठा मुखर्जी ने आगबबूला होकर इस फोटो को ट्विटर पर शेयर करते हुए लिखा कि जिसका डर था, वही हुआ। मैंने तो अपने पिता को पहले ही चेताया था। शर्मिष्ठा का गुस्सा संघ और भाजपा को लेकर था, लेकिन फोटो के साथ छेडछाड करने का काम यकीनन किन्हीं ऐसे लोगों का था जो पूर्व राष्ट्रपति संघ और भाजपा की छवि बिगाडना चाहते हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सहसरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य ने यह कहने में देरी नहीं लगायी कि यह तो उन विभाजनकारी राजनीतिक तत्वो की शर्मनाक करतूत है। जो संघ को बदनाम करने के लिए घटिया चालें चलते रहते हैं।
यह कहना गलत नहीं होगा कि सोशल मीडिया पर काफी हद तक ऐसे लोगों का कब्जा हो चुका है जो फेक न्यूज और तस्वीरों के साथ छेडछाड करने की कलाकारी में माहिर हैं। सोशल मीडिया इन लोगों के लिए दुष्प्रचार करने का माध्यम बन गया है। पिछले सप्ताह पुणे पुलिस ने एक संदिग्ध नक्सली से एक पत्र बरामद किया। इस पत्र में खुलासा किया गया था कि नक्सलियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की योजना बनायी है। जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की गई थी ठीक वैसे ही नरेंद्र मोदी को भी जान से मारने की योजना है। इस खबर के न्यूज चैनलों से प्रसारित और अखबारों में छपते ही देशवासी चिन्ताग्रस्त हो गये। कुछ राजनेताओं ने चुनाव जीतने के लिए इसे भाजपा की चाल बताया। जेएनयू छात्र संघ की पूर्व उपाध्यक्ष शेहला रशीद ने यह ट्वीट कर खलबली मचायी और मीडिया की सुर्खियां पायीं, "ऐसा लगता है कि संघ और गडकरी मोदी की हत्या की साजिश रच रहे हैं।" राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी पर लगे इस संगीन आरोप का भाजपा के कार्यकर्ताओं ने सडक पर आकर विरोध दर्शाया तो गडकरी ने ऐसी घटिया सोच रखने वालों को अदालत में घसीटने की चेतावनी दे दी।

Thursday, June 7, 2018

अभी टूटी नहीं आशा की डोर

मुझे २०१४ की याद आ रही है। देश में कितना उत्साह भरा माहौल था। हर कोई खुश था आशान्वित था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण और दावे दमदार लगते थे। ऐसा प्रतीत होता था कि अब देश का पूरी तरह से कायाकल्प होना तय है। वो दिन दूर नहीं जब देश से गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी, अशिक्षा, असमानता और किसानों की समस्याओं का नामोनिशान मिट जाएगा। हर चेहरे पर चमक होगी। चारों तरफ खुशहाली ही खुशहाली नज़र आएगी। देश आर्थिक सुधारों के मार्ग पर सरपट दौडने लगेगा। नरेंद्र मोदी नाम के इस प्रभावी परिश्रमी और ईमानदार नेता ने जो वादे किए हैं वे जल्द पूरे हो जाएंगे। नरेंद्र मोदी को सत्ता पर काबिज हुए चार साल बीत चुके हैं। किसी प्रधानमंत्री के कार्यों के मूल्यांकन के लिए इतनी अवधि कम नहीं होती। आज चारों तरफ सवाल गूंज रहे हैं। बस यही कहा जा रहा है कि मोदी जनता की उम्मीदों पर पूरी तरह से खरे नहीं उतरे। उनकी सरकार किसानों, मजदूरों, बेरोजगारों, दलितों-शोषितों के लिए कुछ नहीं कर पायी। २०१४ में जो भीड यह नारे लगाती थी कि २०१९ में भी भाजपा का परचम लहरायेगा, नरेंद्र मोदी के सामने कोई नहीं टिक पायेगा, वह आज असमंजस में है। वो युवा बेहद निराश हैं जिन्होंने मोदी पर भरोसा कर उन्हें विजयी बनाने में अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। आम जनता का भी यही हाल है। फिर भी विपक्ष भी केंद्र की सत्ता पाने के लिए एकजुट होने लगा है। भले ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह आज भी यह कहते नहीं थकते हों कि भाजपा आने वाले पचास साल तक देश पर राज करेगी, लेकिन सच तो यह है कि वे भी देशवासियों के बदलते मूड से अनभिज्ञ नहीं हैं। चतुर नेताओं की यही फितरत होती है कि वे हवा का रुख पहचानने के बाद भी अपनी जीत के दावे करते रहते हैं। इसी का नाम राजनीति है। अभी हाल ही में हुए उपचुनावों में भाजपा को जिस तरह की पराजय का मुंह देखना पडा उससे भाजपा के अच्छे भविष्य की तस्वीर तो नहीं उभरी। कर्नाटक में सरकार बनाने में मिली विफलता के बाद कैराना, गोंदिया-भंडारा लोकसभा सीटों तथा नुरपुर विधानसभा उपचुनाव में हुई करारी हार ने भाजपा के दिग्गजों को अंदर से तो हिलाकर रख ही दिया है। यही वजह है कि अमित शाह को अपने 'शुभचिंतकों' के यहां चक्कर काटने शुरू कर दिये हैं। पिछले दिनों वे अपने पुराने प्रचारक बाबा रामदेव से मिले और उन्हें २०१९ में भी साथ देने का अनुरोध किया। रोज़-रोज़ भाजपा को दुत्कारने वाले शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे के समक्ष नतमस्तक होने में भी अमित शाह ने अपनी भलाई समझी है। विख्यात उद्योगपति रतन टाटा के यहां हाजिरी लगाकर अपनी बेचैनी दर्शा दी है। भाजपा ने एकाएक अखबारों और न्यूज चैनलों पर विज्ञापनों की झडी लगा दी है जिनमें अपनी उपलब्धियां गिनायी जा रही हैं। कहा जा रहा है कि चार साल में देश एशिया की तीसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था बनने में सफल हुआ है। सरकार ने आर्थिक क्षेत्र में कई ऐतिहासिक व साहसिक निर्णय लिए हैं। यह मोदी के नेतृत्व का ही कमाल है कि अंतरराष्ट्रीय राजनयिक व कूटनीतिक पहल के क्षेत्र में भारत ने विश्व स्तर पर अपनी छाप छोडी है। डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप, स्वच्छ भारत मिशन, प्रधानमंत्री जन-धन योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, नमामि गंगे आदि कई परियोजनाओं को प्रभावी ढंग से कार्यान्वित करने के साथ-साथ सरकार का पूरे देश में सीमेंट की सडकें बनाने का काम तेजी से चल रहा है। मेट्रो रेल के काम  की प्रगति किसी से छिपी नहीं है। रोजगार भी पैदा किये जा रहे हैं। लाखों बेरोजगारों को नौकरियां दी जा चुकी हैं।
यह सरकार के वो दावे हैं जिनसे कुछ लोग सहमत हैं और अधिकांश असहमत। अपने देश में तो आज भी रोटी, कपडा और मकान करोडों लोगों की प्रमुख जरूरत है। जनता की समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए था, जो नहीं हो पाया। जब तक मूल समस्याएं रहेंगी तब तक सत्ताधीशों को कटघरे में खडा किया जाता रहेगा। जिस देश में अव्यवस्था के कारण रेलगाडियां घंटों लेट चलती हों, दुर्घटनाओं का सदा खतरा बना रहता हो, रेलपटरियों की हालत जर्जर हो चुकी हो, यात्रा के दौरान मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव हो और रिश्वतखोरी उफान पर हो वहां पर बुलेट ट्रेन के 'ऊंचे सपने' लोगों को राहत नहीं दे सकते। जब नोटबंदी की गई थी तब जोर-शोर के साथ यह कहा गया था कि इससे काला धन और काला कारोबार करने वालो को चोट पहुंचेगी। सच तो यह है कि नोटबंदी के दौरान सिर्फ आम आदमी को ही तकलीफें झेलनी पडीं। जीएसटी के चलते छोटे कारोबारियों के लिए मुश्किलों का पहाड खडा हो गया। काला धन आज भी बाजार की शान बना हुआ है। भ्रष्टाचार से भी मुक्ति नहीं मिली है। दलितों और महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों पर पूरी तरह से लगाम नहीं लग सकी। आर्थिक संकट से जूझते किसान आत्महत्या करने को विवश हैं। कानून के डंडे का भय अपराधियों को न उस सरकार के कार्यकाल में सताता था और न ही आज।
हां इस सच को कोई नकार नहीं सकता कि देशवासियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा परिश्रमी और ईमानदार नेता नहीं देखा। ऐसे में अगर उनके कार्यकाल में सकारात्मक परिणाम नहीं निकले तो लोगों का राजनीति और राजनेताओं से भरोसा ही उठ जाएगा। इसलिए अभी भी वक्त है। आस की डोर अभी पूरी तरह से नहीं टूटी है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार को प्राथमिकता के आधार पर लोगों की मूलभूत समस्याओं का समाधान करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगानी ही होगी।

Thursday, May 31, 2018

अति मारे मति

सभी नहीं पीते। लेकिन जो पीते हैं उन्हीं की बदौलत सरकारों को अरबों-खरबों की कमायी होती है। गरीब देसी पीता है। अमीर अंग्रेजी। कितने अमीरों और गरीबों को नशे की लत का शिकार होकर अपनी कब्र खुद खोदते देखा गया है। इसके मोहपाश का शिकार होकर कई लेखक, पत्रकार, उद्योगपति, नेता, कलाकार अपना सबकुछ गंवा कर फकीर बन गए, इज्जत लुटा बैठे फिर भी नशे के मोहपाश से मुक्त नहीं हो पाए। जिनकी छाती पर समझदार होने का तमगा लगा होता है, जिनकी समाज में अपार प्रतिष्ठा होती है, जिन्हें लोग अपना प्रेरणास्त्रोत मानते हैं, जिनकी वाहवाही के किस्से गूंजते रहते हैं, आखिर वे भी क्यों और कैसे नशे के शिकंजे में फंस ही जाते हैं। नशे में ऐसा कौन-सा सम्मोहन होता है जो पीछा नहीं छोडता? शराब और अन्य नशों के साथी बने कुछ लेखक, पत्रकार मित्र कहते हैं कि इन्हें ले लेने के बाद दिमाग के बंद दरवाजे खुल जाते हैं, सोच का घोडा छलांगें मारने लगता है और संकोच के ताले टूट जाते हैं, जिससे ऐसे-ऐसी रचनाएं जन्म लेती हैं जिन्हें जमाना वर्षों तक याद रखता है। नशे के आदी व्यापारी, उद्योगपति, ठेकेदार, नेता और दलाल मानते है नशा संबंधों को प्रगाढ बनाने में अभूतपूर्व भूमिका निभाता है। दूरियां घटाता है और ऐसे-ऐसे काम संभव कर दिखाता है जिनकी होश में कल्पना नहीं की जा सकती। गरीब अपनी गरीबी को चिढाने और कुछ समय के लिए सुध-बुध खोने के लिए पीते हैं तो अमीरों के पास होते हैं बहाने अपार।
अमूमन यह माना जाता है कि डॉक्टर नशे से दूर रहते होंगे। क्योंकि नशे से होने वाले नुकसानों से सबसे ज्यादा डॉक्टर ही वाकिफ रहते हैं। यह भी सच है कि यह दुनिया अपवादों से भरी पडी है। डॉक्टरों के जीवन में कई तरह की परेशानियां, चिंताएं और दुविधाएं होती हैं। अपने कर्तव्य को निभाने के लिए उन्हें अपनी नींद और सुख-चैन की तिलांजलि देनी पडती है। दिल्ली में रहने वाले सर्जरी के एक प्रसिद्ध डॉक्टर को मरीजों की सर्जरी के दौरान घंटों तक खडा रहना पडता था। जिसकी वजह से उन्हें कमर के दर्द ने घेर लिया। शुरुआती दौर में दर्द से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने आम दर्द निवारक दवाएं लीं। जब बात नहीं बनी तो बुटरफेनॉल नामक इंजेक्शन लेने लगे जिसे मरीजों को सर्जरी के बाद दर्द से राहत के लिए लगाया जाता है। इस इंजेक्शन को लगाने के बाद मन-मस्तिष्क पर नशा हावी हो जाता है क्योंकि इसमें मार्फिन की मात्रा अधिक रहती है। शुरु में वह इस इंजेक्शन को सप्ताह में एक से दो बार लेते थे। धीरे-धीरे उन्हें इसकी ऐसी लत लगी कि नशे के तौर पर प्रतिदिन तीन से चार बार यह इंजेक्शन लेने लगे। जिससे राहत मिलने की बजाय सेहत बिगडने लगी। प्रेक्टिस पर भी असर पडने लगा। जहां पहले कभी मरीजों की लाइन लगी रहती थी अब वहां पर सन्नाटा छाया नजर आने लगा। डॉक्टर के नशे में रहने के कारण घर में भी लडाई-झगडा होने लगा। पत्नी ने उन्हें बहुतेरा समझाया, लेकिन इंजेक्शन के नशे के गुलाम हो चुके डॉक्टर ने एक भी नहीं सुनी। हालात इस कदर बिगडे कि पत्नी और बच्चे घर छोडकर चले गए। ऐसा भी नहीं था कि यह डॉक्टर महोदय कमर के दर्द से छुटकारा पाने के लिए केवल बुटरफेनॉल नामक दवा ही लेते थे। उन्हें शराब और सिगरेट का भी खास शौक था। नींद की गोलियां गटकने में भी कमी नहीं करते थे। एक इंसान और इतने सारे नशे! आखिरकार उनकी हालत इतनी बिगड गई कि बेहोशी के दौरे पडने लगे। साथी डॉक्टरों से उनकी यह हालत देखी नहीं गई तो वे उन्हें किसी तरह से समझाकर गाजियाबाद स्थित नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर में इलाज के लिए ले गए। जहां उनका अभी भी इलाज चल रहा है।
नशे में इंसान क्या-क्या नहीं कर गुजरता। उसे रिश्तों का भी भान नहीं रहता। नई दिल्ली में स्थित जामियानगर में एक शराबी बेटे ने दो साथियों के साथ मिलकर अपने माता-पिता को मौत के घाट उतार दिया। पच्चीस वर्षीय इस हत्यारे को शराब के अलावा ड्रग्स लेने की भी लत थी। माता-पिता उसे टोकते रहते थे। पत्नी भी छोडकर चली गई थी। तलाक का केस चल रहा था। इसी बीच उसकी फेसबुक के जरिये कानपुर की एक युवती से दोस्ती हो गई थी। वह इस युवती से शादी करना चाहता था, जबकि माता-पिता इस शादी के खिलाफ थे। एक दिन उसने जमकर शराब पी और अपने दो दोस्तों को ढाई लाख की सुपारी देकर बूढे मां-बाप की हत्या करवाकर फेसबुक फ्रेंड से शादी करने की तैयारी शुरू कर दी। शुरू में पुलिस यह मानकर चलती रही कि दंपति ने खुदकुशी की है। लेकिन पोस्टमार्टम में पता लग गया कि मुंह दबाकर दोनों की हत्या की गई है। पुलिस ने आसपास लगे सीसीटीवी फुटेज और बेटे के मोबाइल की कॉल डिटेल को खंगाला तो आखिरकार सच सामने आ गया। शराब पीकर घर को कलह का मैदान बनाने और मारपीट करने वाले पिताओं की खबरें तो हम अक्सर सुनते और पढते रहते हैं। लेकिन पिता की शराब की लत से परेशान होकर बेटे के द्वारा खुदकुशी कर लेने की खबरें कम ही सुनने और पढने में आती हैं। तामिलनाडु के तिरुनेलवेली में रहने वाला दिनेश अपने पिता की शराबखोरी से त्रस्त हो चुका था। वह पिता को टोक-टोक कर थक गया था। पर शराबी पिता को शराब के अलावा और कुछ सूझता ही नहीं था। ऐसे में नशे में धुत होकर रोज घर में मारपीट, गाली-गलोच करने वाले पिता से उसे इतनी घृणा हो गई कि उसने उन्हें कोई चोट पहुंचाने की बजाय खुदकुशी कर ली। डॉक्टर बनने की चाहत रखने वाले इस बेटे के मन में अपने शराबी पिता के प्रति कितनी नफरत थी उसका पता उसके सुसाइड लेटर में लिखी इन पंक्तियों से लग जाता है - "अप्पा आप शराबी हैं, इसलिए मेरी चिता को छूना भी नहीं।"

Thursday, May 24, 2018

बचपन की तस्करी

यह सच किसी भी संवेदनशील भारतीय को स्तब्ध कर सकता है कि अपने देश में प्रतिवर्ष हजारों बच्चे गुम हो जाते हैं, गायब कर दिये जाते हैं। बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी हमारे यहां काफी ज्यादा लापरवाही बरती जाती है। बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसा के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने वाले नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी का कहना है कि देश में हर घंटे में दो बच्चों के साथ यौन उत्पीडन होता है। हर ८ मिनट में किसी बच्चे को चुराया जाता है। घरों में, स्कूलों में, पडोस में कही भी बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। दोस्त, रिश्तेदार, शिक्षक, डॉक्टर और पुलिसवाले तक किसी के भी इरादे गंदे हो सकते हैं। घर की इज्जत और मान मर्यादा के नाम पर बच्चों की आवाज को दबा दिया जाता है। अपराधी बेखौफ घूमते हैं। दुनियाभर में अस्सी प्रतिशत से ज्यादा मानव तस्करी यौन शोषण के लिए की जाती है और बाकी बंधुआ मजदूरी के लिए। भारत को एशिया में मानव तस्करी का गढ माना जाता है।
मानव तस्करी और मानव व्यापार इंसानों का काम नहीं हो सकता। यह तो राक्षसी कृत्य है। अफसोस... मानवता को शर्मसार करने और धन-दौलत को सर्वोपरि मानने वालो की संख्या इक्कीसवीं सदी में बहुत ज्यादा है। इसी प्रगतिशील सदी में मासूम बच्चे कूडे में से खाना तलाशते हैं। गगनचुंबी इमारतों के निर्माण के लिए अपने मासूम कंधों पर र्इंटे ढोते हैं, अपने सिर पर रेत और सीमेंट की बोरियां रख कर अपने बचपन को लुटता देखते हैं। अखबार बेचते हैं, सब्जी बेचते हैं और चाय आदि के ठेले लगाने के साथ-साथ विभिन्न अपराधों में लिप्त हो जाते हैं। शासक नेता, नौकरशाह, समाजसेवक, धनपति यह मानकर अपनी आंखें बंद कर लेते हैं कि यही इनका मुकद्दर है और मुकद्दर तो ऊपर वाला तय करता है।  जिन परिवारों के बच्चे गुम हो जाते हैं उनका तो जीना ही मुहाल हो जाता है। पुलिस थानों के चक्कर काटते-काटते महीनों गुजर जाते हैं। पुलिस की बेरुखी भी उन्हें तोडकर रख देती है। कई मां-बाप ऐसे भी होते हैं जो अपने बच्चे की गुमशुदगी की रिपोर्ट थाने में दर्ज करवाने जाते ही नहीं। दरअसल उन्हें पता होता है कि अधिकांश पुलिस वाले बिना रिश्वत के काम ही नहीं करते। जिन बच्चे और बच्चियों की तस्करी और अपहरण कर लिया जाता है उन्हें अमानवीय यातनाएं और अपंग बनाकर भीख मंगवाने और देह व्यापार में झोंक देने की खबरें हम और आप वर्षों से पढते और सुनते चले आ रहे हैं। कई सफेदपोश और संगठित गिरोह बच्चों को गायब करने के काम में लगे हैं। उनके लिए यह उनका धंधा है, कारोबार है जिससे मोटी कमायी होती है। इस मोटी और काली कमायी के लिए कई लोग नवजातों की तस्करी में लगे हुए हैं। पिछले वर्ष पश्चिम बंगाल के नार्थ २४ परगना इलाके में एक नर्सिंग होम के कर्ताधर्ता नवजातों के सौदे का काला कारोबार करते हुए पकडे गए। देश में ऐसे सैकडो 'कारोबारी' हैं। सभी तो पकड में नहीं आते। देश और विदेश में जिन दंपत्तियो के बच्चे नहीं होते, उन्हें मोटी कीमत पर नवजातों को बेचा जाता है। नवजातों की अलग-अलग कीमत होती है। जिन बच्चों का रंग गोरा होता है उन्हें दो लाख रुपये और काले और सांवले बच्चों को एक से डेढ लाख में बेचा जाता है। अगर कोई महिला अबॉर्शन कराने आती है तो उसे भी पैसे देकर बच्चे को जन्म देने को कहा जाता है। इस तरह का कारोबार करने वाले नर्सिंग होम और पॉली क्लिनिक में जो बच्चे पैदा होते हैं उनके मां-बाप को बताया जाता है कि नवजात जिन्दा नहीं पैदा हुआ। गरीब मां-बाप आसानी से यकीन कर लेते हैं। कम ही होते हैं जो ज्यादा पूछताछ करते हैं। ज्यादा विरोध करने वाले गरीब मां-बाप का चंद रुपये देकर मुंह बंद कर दिया जाता है।
पचास-साठ साल बाद पूरी तरह से जागृत हो चुके भारतीय यह पढ और सुनकर यकीनन चकरा जाएंगे कि एक दौर ऐसा भी था जब देश में बचपन बिकता था। बेटे और बेटियों की तस्करी कर उन्हें अमानवीय यातनाएं दी जाती थीं और उन्हें तरह-तरह की मंडियों के हवाले कर दिया जाता था। मासूमों को सामान की तरह बेचा-खरीदा जाता था। उनकी फरियाद और चीखें अनसुनी कर दी जाती थीं। पैसा कमाने के लिए ईमानदार रास्तों और तरीकों के होने के बावजूद यह अमानवीयता और दरिंदगी चरम पर थी। उस सचेत पीढी के मन में यह विचार भी जरूर आयेगा कि जब बचपन पर ऐसा जुल्म हो रहा था तब सजग देशवासी कहां थे। ऐसी कौन-सी मजबूरी थी जिसके चलते राजनेताओं, सत्ताधीशों, समाज सेवकों और बुद्धिजीवियों ने आंखें बंद कर ली थीं और जुबानों पर ताले जड लिए थे? इन पंक्तियों को पढने के बाद मेरे पाठक मित्र यह सवाल भी कर सकते हैं कि यदि पचास-साठ साल बाद भी हालात नहीं बदले तो? ऐसे में मेरा जवाब है हमें आशावादी होना ही होगा।

Thursday, May 17, 2018

खुद के हत्यारे

वो पुलिस अधिकारी जिससे अपराधी कांपते हों, जिसकी कर्तव्यपरायणता के किस्से लोग वर्षों से सुनते चले आ रहे हों, जो असंख्य लोगों का प्रेरणास्त्रोत हो, आदर्श हो उसकी एकाएक आत्महत्या की खबर आए तो दिमाग का सुन्न हो जाना और सवालों का खडा होना लाजिमी है। महाराष्ट्र के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक हिमांशु रॉय की खुदकशी की खबर सुनकर मन में यह विचार आया कि क्या इसके सिवाय और कोई चारा नहीं था? क्या जीने के सभी रास्ते बंद हो गये थे? ऐसे कौन से कारण हैं जो जिद्दी और जुनूनी व्यक्ति को भी मिट्टी में मिलने को विवश कर देते हैं। महज ५५ वर्ष की उम्र में रिवॉल्वर को अपने मुंह में रखकर गोली चला खुदकुशी करने वाले हिमांशु रॉय के ऐसे कई किस्से हैं, जिन्होंने ऐसे लौहपुरुष के रूप में स्थापित किया जो हारना नहीं, जीतना जानता था। १९८८ बैच के इस आईपीएस अधिकारी ने कुख्यात माफिया सरगना दाऊद इब्राहिम की सम्पत्ति को जब्त कराने के अभियान में प्रमुख भूमिका निभायी थी। दाऊद के भाई इकबाल कासकर के ड्राइवर आशिफ के एनकाउंटर, पत्रकार जेडे हत्या प्रकरण, लैला खान एवं लॉ ग्रेजुएट पल्लवी पुरकायस्थ डबल मर्डर केस जैसे मामलों की जांच को अंजाम तक पहुंचा कर ही दम लिया था।
पाकिस्तानी मूल के अमेरिका में जन्मे लश्कर-ए-तैयबा आतंकी डेविड हेडली के मामले की जांच करने वाली टीम में भी वे शामिल थे। आइएस में शामिल होने जा रहे अरीब मजीद को वापस लाने में उनकी प्रमुख भूमिका थी। साल २०१३ के आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग केस को भी सुलझाने में आगे रहने वाले इस वर्दीधारी के लिए सभी अपराधी बराबर थे। वे किसी के रुतबे और पहुंच की परवाह नहीं करते थे। उन्होंने १९९१ में मालेगांव में हुई अपनी पहली नियुक्ति में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद भडके दंगों को बडी सूझ-बूझ के साथ नियंत्रित कर अपनी योग्यता का परिचय दे दिया था। बडी से बडी कठिनाइयों के सामने डटकर खडे होने वाले लडाकू के द्वारा हड्डियों के कैंसर से भयभीत होकर मौत से पहले मौत को गले लगाने की सच्चाई जिन्दगी से धोखाधडी से कम नहीं। लडाकू कभी भी ऐसी मौत नहीं मरा करते। वे तो आखिर तक लडा करते हैं। उनके इस कदम से उन लोगों को बेहद निराशा हुई है जो उन्हें असली नायक मानते थे। कई गंभीर कैंसर रोगी समुचित इलाज से ठीक होते देखे गए हैं। कैंसर से छुटकारा पाने के लिए उन्हें वर्षों तक निर्भीक यौद्धा की तरह लडते देखा गया है। रॉय ने अपने मित्रों से कहा था कि उन्होंने नौकरी के दौरान कई दबावों और तकलीफों को झेला है। इस दर्द को भी बडी बहादुरी के साथ सह लेंगे। कौन नहीं जानता कि पुलिस के उच्च अधिकारियों पर मंत्रियों और नेताओं का दबाव रहता है। वे उन्हें अपने इशारों पर नचाना चाहते हैं। हिमांशु रॉय ने इसी तकलीफ की तरफ इशारा किया था। रॉय जैसे अधिकारी अपने कर्तव्य को ही प्राथमिकता देते हैं। इसलिए प्रताडना के शिकार होते हैं।
हिमांशु की दु:खद आत्महत्या ने मुझे मुकेश पांडे की याद दिला दी जिन्होंने २०१७ के अगस्त माह में खुदकुशी कर ली थी। राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद के स्टेशन से एक किमी दूर रेलवे ट्रैक के पास उनका क्षत-विक्षत शव मिला था। २०१२ के बैच के इस युवा आइएएस अधिकारी ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था- "मुझे जिंदगी ने बहुत थका दिया है। इसके दांव-पेच से मैं इस कदर परेशान हो गया हूं कि मेरा इंसान के अस्तित्व से ही विश्वास उठ गया है। मेरे मां-बाप और पत्नी हमेशा आपस में लडते-झगडते रहते हैं। उनके बीच की तनातनी ने मेरा जीना दुश्वार कर दिया है। मेरी पत्नी और मेरे विचारों में जमीन-आसमान का अंतर है। हमारी एक बेटी भी है। मैं पत्नी और बेटी से बेहद प्यार करता हूं। मेरी मौत के लिए मेरी छवि भी जिम्मेदार है। मैं स्वीकार करता हूं कि मैं खुले दिल का नहीं हूं। पत्नी को बदल पाना मेरे बस की बात नहीं है। मेरा जीवन से मन भर गया है इसलिए खुदकुशी कर रहा हूं। रेलवे ट्रैक पर गर्दन रखकर आत्महत्या करने से पहले मुकेश एक गगनचुंबी इमारत के दसवें माले पर छलांग लगाने के लिए चढे थे पर पता नहीं उनके मन में कौन-सा विचार आया कि वे वहां से उतरकर गाजियाबाद की तरफ चल दिए। तय है कि उन्होंने एकाएक खुदकुशी नहीं की। कई तरह के विचारों से जूझते रहे। यह कितनी हैरानी की बात है कि जो बुद्धिमान प्रशासनिक अधिकारी दूसरों की समस्याओं को चुटकी बजाकर हल कर देता था वह अपने घरेलू झगडों का हल नहीं निकाल सका। यह भी सच है कि देश में होने वाली आधी से ज्यादा आत्महत्याएं पारिवारिक कलह का परिणाम होती हैं।
यह सच बेहद चौंकाने वाला है कि दुनिया में हर ४० सेकंड में एक आत्महत्या हो जाती है। प्रतिवर्ष औसत आठ लोग आत्महत्या कर लेते हैं मनोविज्ञानियों का कहना है कि यदि समय रहते आत्महत्या करने की ठान चुके शख्स को भावनात्मक संबल मिल जाए तो वह अपना इरादा बदल सकता है, कोई भी व्यक्ति हताश और निराशा होने पर नहीं, बल्कि सही सलाह और सहारा नहीं मिलने पर आत्महत्या कर गुजरता है वह अंत तक इंतजार करता है कोई उसकी पी‹डा को समझे। उसे अपनी अवहेलना बर्दाश्त नहीं होती। जीवन से निराश हो चुके व्यक्ति का चेहरा ही उसका दर्पण होता है। उसकी उदासी, समस्याएं, तकलीफें, चिंताएं चेहरे पर ही नजर आ जाती हैं। उसके स्वभाव और दिनचर्या में भी काफी बदलाव आ जाता है। वह सभी से दूरी बनाने की कोशिश करने लगता है। यह वो संकेत हैं जो परिवार के सदस्यों, दोस्तों और करीबियों का ध्यान खींचने के लिए काफी हैं। यह ध्यान रहे कि ऐसे व्यक्ति से ज्यादा पूछताछ और सवाल करने की बजाए उसकी ही बात सुनी और समझी जानी चाहिए। खाने-पीने, सोने और सेहत का पूरी तरह से ख्याल रखा जाना चाहिए। अपनों का करीब रहना, उनका खुलकर बात करना, खुश रहने के मौके उपलब्ध करवाना और हर तरह की मदद के लिए तत्पर रहना किसी अच्छे चिकित्सक के गहन इलाज से कम नहीं होता। उसे ज्यादा से ज्यादा समय देकर प्रेम और सांत्वना से सकारात्मक विचारों से जोडने की कोशिश उसके लिए हितकारी साबित होती है।