कुछ शातिर चेहरे देश में गहरी गड़बड़ और उठापटक करने के सपने देख रहे हैं। दरअसल, जब से कर्मठ माननीय नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने हैं तभी से ऐसे लोगों की रातों की नींद उड़ी हुई है। इस बार के स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से उन्होंने राष्ट्र के नाम संबोधन करते हुए उपलब्धियों, चुनौतियों और भविष्य के संकल्पों की बात करते-करते ‘दिमागी नक्सल’ से सतर्क और सावधान करने की अपील क्या की, कि राई का पहाड़ बनाने वाले सफेदपोश उछल-कूद मचाने लगे। उन्होंने तो किसी का नाम नहीं लिया था, लेकिन ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ कहावत तो कुछ ऐसे चरितार्थ हुई कि क्या कहें? स्वघोषित नक्सलियों की कतार लग गई। आतंकवाद, नक्सलवाद, आतंकवादी, नक्सलवादी, देशद्रोही जैसे शब्द कोई नये शब्द नहीं हैं। नक्सलवाद के राष्ट्रद्रोही खूनी वार को भारत माता ने अनेकों वर्षों तक झेला है। खुद को बड़े गर्व के साथ नक्सली तथा माओवादी कहने-कहलवाने वाले कोई गैर नहीं अपने ही थे। लेकिन थे तो दुश्मन से बदतर ही। उनका खात्मा करने के लिए सरकार ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। अंतत: सफलता भी पायी। हालांकि अव्यवस्था और तनाव बढ़ाने वाले नक्सलियों के कुछ अंश अभी भी बचे हुए हैं। जंगलों में कम, शहरों में ज्यादा।
नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलवादी गांव से हुई थी। इसी गांव के नाम पर इसे नक्सलवाद नाम दिया गया। चीनी साम्यवादी नेता माओत्सो तुंग की विचारधारा से प्रेरित वामपंथी नेता चारू मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल जैसे आदिवासी और किसान नेताओं को जब लगा कि भारत में सामंती सोच रखने वाले जमींदारों के द्वारा गरीब, किसानों तथा आदिवासियों का इस कदर शोषण और अन्याय किया जा रहा है, जिससे वे भुखमरी और तमाम बदहाली से जूझ रहे हैं तो उन्होंने नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत की। हथियारबंद क्रांति के जरिए लोकतांत्रिक व्यवस्था और सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए प्रारंभ हुआ, यह आंदोलन बंगाल से निकलकर धीरे-धीरे छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, बिहार और आंध्रप्रदेश के आदिवासी इलाकों में तेजी से फैलते हुए सरकारों के लिए सिरदर्दी और गहन चिंता का विषय बनता गया।
जब नक्सलवाद के संस्थापकों की एक-एक कर मौत हो गई तो जो बचे और नये-नये जुड़े थे उनमें आदिवासियों की चिंता कम और खुद के कल्याण की भावना घर करती गई! भ्रष्ट नेताओं, मंत्रियों, नौकरशाहों की तरह उन्होंने भी शहरों में बंगले बना लिये, अपने बच्चों को पढ़ने के लिए विदेशों में भेजना प्रारंभ करते हुए किसानों तथा आदिवासियों के बच्चों को अनपढ़ बनाये रखते हुए बंदूकों और बारूदों के बीच मरने-मारने के लिए छोड़ दिया। समय बीतने के साथ-साथ नक्सली नेता ही आदिवासियों को न्याय दिलाने की बजाय उन पर जुल्म ढाने लगे। उन पर दबाव डाला जाने लगा कि वे अपने बच्चों को उनके हिंसक आंदोलन से जोड़ें। खुद भी तन-मन और धन से साथ दें। आदिवासियों के हित के लिए निर्धारित सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधाएं खड़ी की जाने लगीं। ठेकेदारों, व्यापारियों, नेताओं तथा उद्योगपतियों को डरा-धमकाकर मोटी धन-वसूली कर धड़ाधड़ हथियार खरीदे जाने लगे और पुलिस, सुरक्षा बलों तथा आम जनों को मौत के घाट उतारा जाने लगा। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा तथा महाराष्ट्र के अंदरूनी क्षेत्रों में स्कूल, अस्पताल, सड़कें न बन पाएं तथा विकास कार्य ठप रहें, इसके लिए तरह-तरह के अड़ंगे डाले गये। खून-खराबा भी किया गया, जिससे बड़ी-बड़ी कंपनियां निवेश करने से बचती रहीं। इससे देश को अत्याधिक आर्थिक नुकसान हुआ। आदिवासी इलाकों में जो विकास कार्य होने चाहिए थे वे कई वर्षों तक ठिठके और पूरे तरह से थमे के थमे रहे। सड़कों, पुलों और रेल लाइनों को बारूदों से उड़ाने वाले दुर्दांत नक्सली यही चाहते थे कि जंगली इलाकों में रहने वाले लोग विकास से अछूते रहकर सरकार को कोसते हुए उनके इशारों पर ही नाचते रहें। वर्षों तक हुआ भी यही। सुरक्षा बलों को नक्सलियों तक पहुंचने में अनेकों तकलीफों तथा संकटों का सामना करना पड़ता था। सुरक्षा बलों की योजना और तैयारी की नक्सलियों को पहले ही खबर लग जाती थी। उन्हें सतर्क कर दिया जाता था। इस काम में उन्हें उन लोगों का साथ और सहयोग मिलता था, जिन्हें जान से हाथ धोने का भय दिखाकर अपने पक्ष में कर लिया जाता था। अर्बन नक्सली भी इस ‘राष्ट्रद्रोही’ कृत्य में खासी भूमिका निभाते थे। दरअसल, नगरों-महानगरों में अय्याशी कर रहे शहरी नक्सलियों ने सुरक्षा बलों की शहादत पर हमेशा शर्मनाक मौन साधे रखा और हत्यारे नक्सलियों की मौत पर ज़ार-ज़ार आंसू बहाए और नंग-धड़ंग होकर मानवाधिकार के ढोल पीटे। नक्सलियों ने आधी-सदी तक भारत माता को आहत करते हुए चार हजार आदिवासियों तथा अन्य निर्दोषों की जानें ले लीं। अनेकों को तो इस शक में मार डाला गया कि वे पुलिस के मुखबिर हैं। लगभग साढ़े तीन हजार पुलिस व सुरक्षा बल के जवानों की शहादत पर भी बुद्धिजीवी अर्बन नक्सली कभी कुछ नहीं बोले। इनकी आंखों के सामने ही घने जंगलों में स्थित स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों, रेलमार्गों तथा बिजली जैसी विकास परियोजनाओं को बम से उड़ाकर नुकसान पहुंचाया गया। हजारों गरीब आदिवासी नवयुवकों, युवतियों, बच्चों के भविष्य पर डाका डाला गया, कई परिवार तबाह हुए, उजड़े, बिखरे, बार-बार प्रताड़ित हुए लेकिन आतंकवादियों के यह शुभचिंतक सरकार को ही कसूरवार ठहरा कर केवल और केवल उसे ही कोसते रहे।
पूर्व की केंद्र की सरकारें ढुलमुल नीति अपनाते हुए खून-खराबा देखती रहीं। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने दृढ़ निश्चय किया कि किसी भी हालत में भारतवर्ष से नक्सलवाद का पूरी तरह से सफाया करके दिखाना है। केंद्रीय सुरक्षा बलों और पुलिस ने दिन-रात घने जंगलों में आक्रामक अभियान चलाते हुए नक्सलियों के सुरक्षित ठिकानों को नेस्तनाबूत करने का ऐसा तीव्र अभियान चलाया कि नक्सलियों के कमांडरों के हौसले पस्त होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। मुठभेड़ों में कई कुख्यात और शीर्ष कमांडर मौत के घाट उतार दिए गए। बचे-खुचे कमांडरों ने अपने दल-बल के साथ आत्मसमर्पण करने में ही भलाई समझी। अब तो हजारों नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण करते हुए मुख्य धारा में लौट आये हैं। जो नाममात्र के बचे हैं वे भी आत्मसमर्पण की तैयारी में हैं। सरकार का दावा है कि नक्सलवाद नामक कलंक का लगभग अंत हो गया है। सरकारी दावे में बहुतेरी सच्चाई भी नज़र आने लगी है। अनेकों नक्सली जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं, खेतों, कारखानों तथा अन्य ईमानदारी और मेहनत के कामों में लगकर सामान्य जीवन जीने लगे हैं। यह बदलाव उन्हें बहुत सुखद लग रहा है। उनका कहना है कि लोकतंत्र के शत्रु, हत्यारे नक्सलियों के दबाव और प्रलोभन ने उन्हें दिशाहीन कर दिया था। काश! ऐसा पहले हो जाता तो उनकी जिन्दगी के कई वर्ष यूं ही बरबाद नहीं होते। वे भी सभी अमन पसंद देशवासियों की तरह इज्जत और शान-शौकत भरा जीवन जी पाते।
जंगलों से तो नक्सलियों का सफाया हो गया, लेकिन शहरों में जो स्वघोषित नक्सली सीना ताने घूम रहे हैं उनके काम करने का ढंग काफी जाना-पहचाना है। यह लोग विश्वविद्यालयों और इधर-उधर के बौद्धिक मंचों पर विराजमान होकर माओवाद या हिंसक उग्रवाद की विचारधारा का समर्थन करते हुए भारत माता के खिलाफ माहौल बनाने में सतत प्रयत्नशील हैं। राष्ट्रद्रोही तत्वों के सुर में सुर मिलाने वाले इन लोगों में सत्ता का सुख भोगने की जबरदस्त बेचैनी और तीव्र लालसा है। इस सच से इंकार नहीं कि सत्ता और व्यवस्था के प्रति कई लोगों में नाराजगी है। अनेकों भारतीय गुस्से में हैं लेकिन फिर भी वे बड़े संयम और अदब के साथ अपना विरोध प्रकट करते रहते हैं। उनके मन में कभी भी हिंसा और बंदूक उठाने का विचार नहीं आया। सत्ता और व्यवस्था से असहमत और नाराज होकर सड़कों पर उतरने वाले सभी लोगों को नक्सली नहीं कहा जा सकता। जिनके पास दिमाग है वे बोलेंगे भी और विरोध भी दर्शायेंगे। लेकिन उन्होंने कभी देश के प्रधानमंत्री को कभी गंदी-गंदी गालियां नहीं दीं। आज की युवा पीढ़ी देश में बदलाव चाहती है। उसके मन-मस्तिष्क में ऐसे हिंदुस्तान की तस्वीर है जहां हर नागरिक खुश और संतुष्ट हो। नेता केवल नारेबाजी न करते हुए समाज के हर वर्ग की ईमानदारी से सेवा करें और उनकी तकलीफों को जान-समझकर उनका समाधान भी करें। जब तक देश की मूल समस्याओं का हल नहीं निकलेगा तब तक युवा बेचैन रहेंगे और सड़कों पर उतरते रहेंगे। उन्हें दिशाहीन करने के षडयंत्र भी रचे जा रहे हैं। देशप्रेमियों की भीड़ में कई ऐसे शातिर लोग भी है, जो खुद घातक हथियार नहीं उठाते लेकिन हथियार दिलाते और उकसाते रहते हैं। यही लोग देश के लिए खतरा बने हुए हैं। दरअसल, भारत की राजनीति में कई ऐसे सत्तालोलुपों का जमावड़ा हो गया है। जिन्हें जनता ने पूरी तरह से नकार दिया है। उन्हें यह बात भी समझ आ गई है कि उनकी पोल पूरी तरह से खुल चुकी है। उनका हर नकाब तार-तार हो चुका है। लेकिन फिर से सत्ता पाने की चाह अभी भी बनी हुई है। इसके लिए वे छात्रों तथा युवाओं के जायज आंदोलनों में बिन बुलाये पहुंचते हुए उनके कान में हिंसा और खून-खराबे का मंत्र भी फूंक रहे हैं। यह दिमागी नक्सली उन युवाओं को भी अपने रंग में रंग देना चाहते है जो अभी तक सियासती छल-कपट से दूर हैं। यह कतई न भूलें कि अर्बन नक्सली वही कलंकित चेहरे हैं जो आतंकवादियों को बचाने के लिए आधी रात में अदालत के दरवाजे खुलवाते हैं और देश के टुकड़े करने के नारे लगाने वालों को गले लगाते हैं। उनकी बस यही मंशा है कि जिस तरह से बांग्लादेश और नेपाल में युवाओं और छात्रों (जेन-जी) ने हिंसक आंदोलन कर सत्ता परिवर्तन या तख्ता पलट किया है। वैसे ही कुछ भारत में भी हो जाए और उनकी फिर से लूटपाट और मौज ही मौज हो जाए।

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