Thursday, October 17, 2024

दृष्टिकोण

     हर किसी की खुशी और  संतुष्टि का पैमाना  एक सा नहीं। इस धरा पर सबके पास सबकुछ  नहीं। कुछ लोगों के पास अपार धन-दौलत है। बंगले और बड़ी-बड़ी कोठियां हैं, एक  से बढ़कर एक आलीशान कारें हैं। 

    हमारे देश में कुछ के हिस्से में बेहिसाब खुशहाली है, भरपूर  सुविधाजनक जीवन जीने के अवसर हैं, लेकिन  कई  भारतवासी गरीबी से बदहाल हैं। दो वक्त  का जैसा-तैसा भोजन भी उनके लिए दूर-दूर का सपना है। यह कष्टदायक असमानता पता नहीं कब ख़त्म  होगी? देश के हुक्मरान बीते कई वर्षों से गरीबी हटाने के झूठे वादे करते हुए वोट ऐंठते चले आ रहे हैं। उन्होंने तो कोठियों पर कोठियां तान लीं, लेकिन झोपड़ियों की संख्या कम नहीं हुई। आसमान के नीचे जीवन यापन करने वालों की तादाद में लगातार इजाफा होता रहा। जिन लोगों ने अपनी-अपनी तरकीबों से अकूत धन-दौलत  जमा कर ली है उनमें अधिकतर स्वार्थी, बेरहम और लालची हैं। नव धनाढ्य तो गरीबों और असहायों की परछाई से ही दूर  रहते हैं। अपने बेटी- बेटों की सगाई तथा शादी में अरबों-खरबों रुपए  उड़ाने वालों की तमाशे बाजी किसी से छिपी नहीं है। पच्चीस-पचास गरीबों को खाना और चंद कन्याओं का सामूहिक विवाह रचाकर अपनी पीठ थपथपाने वालों की भीड़ में जब चुपचाप इंसानियत का धर्म निभाने वालों पर नज़र जाती है, उनके बारे में पढ़ने-सुनने में आता है तो उनकी वंदना करने को जी चाहता है। बीते दिनों सोशल मीडिया में लगातार वायरल होते एक वीडियो को देखा तो बस देखता और सोचता ही रह गया कि मानवता की इससे बेहतर और दूसरी कौन  सी जीवंत मिसाल और परिभाषा हो सकती है?

    एक मेहनतकश आम भारतीय अपने छोटे से बच्चे को गोद में लिए गुब्बारे बेचता फिर रहा है। इसी दौरान उसकी एक चमचमाती कार पर नज़र पड़ती है और वह अपने मोबाइल फोन से कार के साथ सेल्फी लेने लगता है, तभी कार का मालिक वहां आ जाता है तो वह यह सोच कर घबरा जाता कि मालिक उसे डांटेगा-फटकारेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता। कार वाला करोड़पति उससे बड़ी अदब के साथ पेश आते हुए अपने साथ खड़े कर कई फोटो खींचकर उसे अपार खुशी के झूले में झुला देता है। इतना ही नहीं वह बड़े दिल  वाला उसे अपने साथ  कार  में  भी  बैठाता और घुमाता है, गुब्बारे वाले शख्स की खुशी का ठिकाना नहीं रहता। उसके चेहरे पर स्पष्ट लिखा नज़र आता कि इस खास दिन को वह कभी नहीं भूल पायेगा। 

    हिंदुस्तान की बहादुर परोपकारी बेटी मंजूषा सिंह ने मतिमंद बच्चे-बच्चियों की देखभाल करने तथा उन्हें मातृत्व  सुख-सुविधा और  आत्मीयता देने के लिए शादी नहीं की। ब्याह  बंधन में बंधतीं तो अपने बच्चों में उलझ कर रह जातीं। वह तीस साल से मतिमंद बच्चों को अपनी संतान मान कर उनकी सेवा और देखभाल कर रही हैं। 54 साल पुरानी सेरेब्रल पॉल्सी एसोसिएशन ऑफ इंडिया की प्रभारी और विशेष शिक्षिका मंजूषा ने बताया कि जब  मैं मात्र 13 साल  की थी तब मेरी मां का देहावसान हो गया था, इसलिए मैं मां की अहमियत को अच्छी तरह से जानती-समझती हूं। मां के गुजरने के गम ने मुझे पूरी तरह  से निराश कर दिया था। काउंसलिंग तक करानी पड़ी। काउंसलिंग टीचर ने तब कहा था कि जरूरी नहीं कि आप हमेशा स्वयं के बारे में ही सोच कर परेशान होते रहें। अपना जीवन दूसरों को समर्पित करने से हमारे सभी दु:ख  उड़न छू  हो जाते हैं और अभूतपूर्व शांति और खुशी की प्राप्ति होती है। टीचर की बात ने मेरी सोच बदल  दी और मैं इन विकलांग बच्चों की मां बन गई। ये बच्चे मानसिक रूप  से कमजोर होते हैं। इनका शरीर भले ही किसी भी उम्र का हो, लेकिन दिमाग एक जैसा होता है। हमारे पास 9 महीने से लेकर 74 साल  तक के बच्चे  आते हैं। इन बुजुर्गों  को भी हम बच्चा मानते हैं, क्योंकि दिमाग  से वे भी बच्चे ही होते हैं। इन सबको  इलाज  के साथ-साथ  ऐसी खास तरह की ट्रेनिंग दी जाती है, जिससे वे दिलेरी के साथ जीवन व्यतीत कर सकें और अकेले  संघर्षरत रहते हुए वह सब  हासिल करें जो दूसरों के हिस्से में आता है।

    भारत के अत्यंत संवेदनशील और  परोपकारी उद्योगपति रतन टाटा का हाल ही में 86 वर्ष  की उम्र  में निधन  हो गया। वे ऐसे कारोबारी थे, जिन्होंने नितांत  ईमानदारी और परिश्रम से हजारों अरबों-खरबों रुपए के उद्योग और संपत्ति का विशाल साम्राज्य  खड़ा किया, लेकिन अहंकार और दिखावे से जीवन पर्यंत  दूर रहे। उन्हें दूसरों की सहायता करने में अपार आनंद आता था। दूसरे उद्योगपतियों की तरह धन को खुद पर तथा अपने परिवार  जनों  पर लुटाने की बजाय  गरीबों, असहायों तथा जरूरतमंदों पर खुले हाथ  खर्च  करना उन्हें बहुत सुहाता था। उन्हें बच्चों से भी अत्यधिक  स्नेह  था। उनके बीच पहुंचते ही वे बच्चे हो जाते थे। वैसे भी उनके चेहरे की मासूमियत और भोलापन आम भारतीयों  जैसा ही था। छल-कपट और ऊंच -नीच की संकुचित विचार-भावना से कोसों दूर...। जब किसी के भले और सहायता की बात आती तो तुरंत पहुंच जाते। एक बार रतन टाटा ने 200 व्हील चेयर विकलांग बच्चों को भेंट में देने की सोची। जब वे बच्चों के बीच पहुंचे तो वे खुद को बच्चा महसूस  करने लगे। बच्चों को व्हील चेयर सौंपते हुए उनका चेहरा खुशी से चमक रहा था। बच्चे भी बेहद प्रसन्न थे। उन्हें व्हील चेयर पर बैठकर घूमते और मस्ती करते देख रतन टाटा का मन मयूर नाच उठा। जब रतन टाटा वापस जाने को हुए तभी एक बच्चे ने कसकर उनकी टांग  पकड़ ली। उन्होंने धीरे अपने पैर को छुड़ाने का भरसक प्रयास किया, लेकिन तब भी बच्चा टस से मस नहीं हुआ। तब उन्होंने बच्चे को बड़ी आत्मीयता से पुचकारा और बड़े स्नेह से पूछा, बेटे तुम्हें कुछ और भी चाहिए? बच्चे  ने कहा कि, मैं जीभरकर आपका चेहरा देखना चाहता हूं ताकि हमेशा-हमेशा याद रहे। जब मुझे स्वर्ग में आपके दर्शन  हों तो आपको तुरंत पहचान लूं। मासूम बच्चे के इस  कथन ने रतन टाटा को इस कदर झकझोरा कि उसी क्षण जीवन के प्रति  उनका नजरिया ही बदल गया। इस सदी के प्रेरक महामानव रतन टाटा को इंसानों के साथ-साथ जानवरों से भी अत्यधिक स्नेह था। उनके निधन पर करोड़ों देशवासी ही नहीं गमगीन हुए, उनके लाडले पाले-पोसे कुत्ते  ने भी आंसू बहाये। इस कुत्ते को वे पर्यटन स्थल गोवा से लाये थे इसलिए उन्होंने उसका नाम ‘गोवा’ रखा था। महादयालू रतन टाटा के अंतिम संस्कार में उनका कुत्ता ‘गोवा’ अंतिम सम्मान देने आया था.....

Thursday, October 10, 2024

ज़मीन-आसमान

     हम कल होंगे या नहीं, कोई  नही जानता। यहां कुछ भी तय नहीं। हर शख्स यहां इम्तिहान से रुबरू  होने की राह पर है। यह सच अपनी जगह है कि वह पास होता या फेल। जिन्दगी में उतार-चढ़ाव आना भी लाज़मी है यही इन्सान का परीक्षा काल होता है। यह भी हम पर निर्भर है कि समस्याओं की निदान किस तरह से करते हैं। दुनिया में हर  समस्या का हल है। बस उसे तलाशना होता है। भागने से समस्या और विकराल शक्ल अख्तियार कर लेती है। संकोच और भय अच्छे-अच्छे शरीरधारियों को कुछ अलग और बड़ा करने से रोकता ही नहीं, चुनौतियां से जूझने और मुंह चुराने के तरह-तरह के बहानों का गुलाम बना कर रख देता है। हमारी इस धरा पर कई लोगों के साथ कुदरत अन्याय कर देती है। उनसे बहुत कुछ छीन लेती है। इनमें से अधिकांश लोग हताशा और निराशा के गर्त में गर्क होकर रह जाते हैं। लेकिन कुछ लोग अपनी शारीरिक अक्षमता को ऊपर वाले का घोर अन्याय और अपना मुकद्दर मानने की बजाय ऐसा करिश्मा और चमत्कार कर दिखाते हैं कि दुनिया उनकी जय-जयकार करते नहीं थकती। जहां प्रेरणा उत्प्रेरक का काम करती है, वहीं किसी भी अन्याय और शारीरिक कमी के शिकार लोगों की सहायता तथा मार्गदर्शन बहुत मायने रखता है। जिस तरह से डूबते को तिनके का सहारा होता है वैसे ही दिव्यांगों के कंधे पर हाथ रखना कैसे चमत्कारी साबित होता है इसके एक नहीं अनेक उदाहरण हैं। जिन्होंने ज़मीन पर परिश्रम और संघर्ष कर ऊंचे आसमान को छूने का कीर्तिमान रच कर दिखाया है। हिमाचल प्रदेश में स्थित धर्मशाला शहर में एक लड़की कभी अपनी मां के साथ हाथ में कटोरा पकड़े भीख मांगा करती थी, लेकिन आज वह एमबीबीएस डॉक्टर बन चुकी है। कल तक चुप-चुप और सहमी-सहमी रहने वाली पिंकी हरयान अब फर्राटेदार इंग्लिश बोलती है। पिंकी की जिन्दगी को पूरी तरह से बदलने का करिश्मा किया है, परोपकारी तिब्बती शरणार्थी भिक्षु जामयांग ने। मैक्लोडगंज  की टोंग-लेन चैरिटेबल ट्रस्ट के संस्थापक और निदेशक जामयांग ने एक बच्ची को भीख के लिए भटकते देखा तो उन्होंने उसे अपने पास बुलाकर दुलारते हुए पूछा, बिटिया क्या तुम्हारा स्कूल जाने का मन नहीं होता? तो बच्ची तुरंत बोली, बहुत होता है अंकल...मैं तो बड़ी होकर डॉक्टर बनना चाहती हूं लेकिन...। भिक्षु जामयांग ने पिंकी के गरीब  माता-पिता से अनुमति लेकर फौरन उसका स्कूल में दाखिला कराया। खान पान  और रहने की संस्था के सर्व सुविधायुक्त होस्टल में पूरी व्यवस्था भी करवा दी। वह पढ़ाई में बहुत होशियार थी। 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही उसने नीट की परीक्षा भी चुटकीयां बजाते हुए  पास कर ली। साल 2018 में पिंकी का चीन के एक प्रमुख मेडिकल कॉलेज में एडमिशन करवा दिया गया। यहां से छह साल तक एमबीबीएस की पढ़ाई करने के बाद वह अभी कुछ दिन पूर्व ही धरमशाला लौटी हैं। उसके पिता बूट पॉलिश का काम छोड़कर  चादर और दरियों के व्यापार में अच्छी-खासी कमाई कर रहे हैं। मां भी इज्जत भरी जिन्दगी जी रही हैं। पिंकी का छोटा भाई और बहन अत्यंत सुविधाजनक टोंग-लेन स्कूल में पढ़ाई-लिखाई कर रहे हैं। 

    अपनी कमजोरी को ही ताकत बना लेने वाली मुस्कान सिर्फ नाम भर की मुस्कान नहीं। मुस्कराहट और  उत्साह से उसका चेहरा हरदम चमकता रहता है। उसकी बेफिक्री, चुस्ती-फुर्ती यह पता लगने ही नहीं देती कि वह पूर्णतया दृष्टिहीन है। शिमला की रहने वाली मुस्कान ने अपनी स्कूली शिक्षा कुल्लू के ब्लांइड स्कूल सुल्तानपुर और शिमला के पोर्टमोर स्कूल से पूरी की। इसके बाद राजकीय कन्या महाविद्यालय शिमला से म्यूजिक में ग्रेजुएशन और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से मास्टर की पढ़ाई पूरी की। नेट और सेट की परीक्षा भी अच्छे नंबरों से पास करने वाली जूनूनी ऊर्जावान मुस्कान की आवाज का सुरीलापन हर किसी का मन मोह  लेता है। ऑनलाइन रेडियो उड़ान की प्रतियोगिता में शामिल होकर अव्वल स्थान प्राप्त करने वाली मुस्कान को  बेंगलुरु के समर्थनम ट्रस्ट फॉर डिसेबल ने स्पांसर कर अमेरिका भेजा। ढाई महीने वहां रहकर उसने लाजवाब प्रस्तुतिकरण कर अमेरिका वासियों का भी दिल जीता। मुस्कान कहती हैं कि अपनी कमी की वजह से निराश होने की बजाय उसे अपनी ताकत बना लेने पर दुनिया की कोई ताकत आपको डरा और हरा नहीं सकती। निधि चित्रकार बनना चाहती थीं। लेकिन नियति कुछ और ठान चुकी थी। तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी निधि की पंद्रह साल की आंख की रोशनी छिन गई। उसका बड़ा भाई पहले से ही दृष्टिबाधित था। निधि को समझ में आ गया कि यह अंधेरा उम्र भर उसका साथी बने रहने वाला है। उसने अपने मन को पक्का कर सफेद छड़ी के सहारे चलना सीखते हुए सॉफ्टवेयर से पढ़ना शुरु कर दिया। संकल्प और संघर्ष की यात्रा कभी निष्फल नहीं होती। उसने मॉस मीडिया की पढ़ाई में टॉप करने के बाद मास्टर्स किया। 2011 से सतत विकलांग महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्षरत निधि ने 2017 में एनजीओ राइजिंग फ्लेम की स्थापना की। उनकी यह संस्था दिव्यांग महिलाओं तथा युवाओं के हित में निरंतर सक्रिय है। निधि ने दिव्यांग महिलाओं की आपबीती अनुभवों की किताब का भी प्रकाशन किया है। इस प्रभावी किताब में उजागर दिव्यांग महिलाओं का भोगा हुआ सच वाकई आंखें और मन-मस्तिष्क के बंद दरवाजे खोल कर रख देता है...।

Thursday, October 3, 2024

अपनी-अपनी सोच-समझ

    बीते दिनों भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) पार्टी के नेता एम एम लारेंस का 95 वर्ष की आयु में निधन हो गया। लारेंस ने अपने जीवित रहते देहदान का संकल्प लिया था। उनकी दिली इच्छा थी कि मरणोपरांत उनकी देह का शैक्षिक उद्देश्यों के लिए उपयोग हो। उनकी इच्छानुसार जब पार्थिव शरीर को सरकारी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल को दान देने की तैयारी चल रही थी तभी दिवंगत नेता की बेटी ने विरोध के स्वर बुलंद कर दिए। लारेंस के दोनों बेटों ने तो शव को मेडिकल को सौंपने की सहमति दे दी थी, लेकिन जिद्दी बेटी ने तरह-तरह के तर्कों तथा कारणों की झड़ी लगाकार मेडिकल प्रशासन को दुविधा में डालकर अच्छा-खासा हंगामा खड़ा कर दिया। एम एम लारेंस देहदान का महत्व अच्छी तरह से समझते थे। चिकित्सा जगत में मृत देह को अमूल्य माना जाता है। सिर्फ मेडिकल के सघन अध्ययन के लिए ही नहीं, सभी प्रकार के शोध एवं जटिल आपरेशन के लिए भी मार्गदर्शक साबित होती है। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि महान संत, महात्यागी ऋषि दधीचि ने जब देखा कि दानवों का आतंक सतत बढ़ता ही चला जा रहा है। लोगों का जीना मुहाल हो गया है तो उन्होेंने अपना शरीर ही त्याग दिया ताकि उनकी हड्डियों से ऐसा मजबूत धनुष बनाया जा सके, जिससे राक्षसों का पूरी तरह से संहार संभव हो। हमारे एक परिचित थे, जो लोगों को अंगदान और देहदान के लिए प्रेरित करते रहते थे। अखबार में जब भी किसी के अंगदान की मिसाल कायम करने की खबर पढ़ते तो उसकी कटिंग फेसबुक पर डालने के साथ फ्रेम करके अपनी दुकान पर टांग देते थे। इसके लिए उन्होंने एलबम भी बना रखी थी। उन्होंने अपने परिवार को भी कह रखा था कि उनकी मौत के बाद उनके पार्थिव शरीर को अस्पताल को सौंप दिया जाए। शहर के सभी समाचार-पत्रों में भी मरणोपरांत देहदान की सूचनानुमा खबर उन्होंने प्रकाशित करवाई थी। अभी हाल में अचानक वे चल बसे। उनकी पत्नी ने मृत देह को दान करने से स्पष्ट इंकार कर दिया। उनका कहना था कि अपने पति परमेश्वर की देह की चीर-फाड़ की कल्पना से उनका बदन कांपने लगता है। यह महिला शहर के प्रमुख अखबार में सह-संपादक के पद पर आसीन हैं। रक्तदान, अंगदान और देहदान के लिए पाठकों को प्रोत्साहित करने के लिए धड़ाधड़ लेख लिखती और प्रकाशित करवाती रहती हैं। अपने पति के देहदान के संकल्प में अटल बाधा बनी यह महिला पत्रकार खुद को सही ठहराने के लिए लोगों को यह बताना और याद दिलाना नहीं भूलीं कि दस वर्ष पूर्व नगर के विख्यात साहित्यकार, प्रवचनकार, समाज सेवक स्वतंत्र कुमार की मृत देह मेडिकल कॉलेज को सुपुर्द की गई थी, तब प्रबंधन की लापरवाही के फलस्वरूप शरीर बुरी तरह से सड़-गल गया था और उसमें कीड़े रेंगने लगे थे। मैं अपने पति के शरीर की ऐसी दुर्गति होते न देख सकती हूं और न ही कभी सोच सकती हूं। इसलिए मैंने पापा के घोषित देहदान के संकल्प को पूर्ण नहीं होने दिया। जब इस महान पत्नी को जानकारों ने बताया कि तब और अब में जमीन आसमान का फर्क है। तब की तुलना में आज का मीडिया बहुत सतर्क है। इस सोशल मीडिया के प्रबल दौर में किसी धांधली पर पर्दा डालना पहले की तरह सहज और सरल नहीं रहा। इस सच से लापरवाह, कामचोर और मुफ़्तखोर अनजान नहीं। वैसे भी आपका कर्तव्य है कि अपने पति के संकल्प को किसी भी हालत में पूर्ण करें। अपनी पत्रकारिता पर भी सवालिया दाग न लगाएं।

    देहदान के क्षेत्र में कार्यरत समाजसेवी बताते हैं कि अपने जीवित रहते लोग जब देहदान का संकल्प और घोषणा  कर देते हैं, तो उनकी मृत्यु के बाद उनके परिवार का पहला दायित्व और काम यह होना चाहिए कि मृतक की इच्छा का खुशी-खुशी पालन करें। इसमें किसी प्रकार की बहानेबाजी और ना-नुकुर दुनिया को छोड़कर चल देने वाले इंसान का अपमान तथा उसके साथ किया गया घोर विश्वासघात है। मेरे प्रिय पाठक मित्रो... हो सकता है आपको कम यकीन हो फिर भी देहदान और अंगदान को करने और  लोगों को प्रोत्साहित करने में महिलाएं पुरुषों से आगे हैं। इसमें भी दो राय नहीं कि देहदान और अंगदान जबरन नहीं करवाया जा सकता। मृत्यु के बाद देहदान और अंगदान का फैसला कठिन तो होता है, लेकिन इससे जो संतुष्टि और खुशी मिलती है उसका पता उन परिवारों की सामने आने वाली प्रतिक्रियाओं और मनोभावनाओं से चलता रहता है...। पिछले दिनों विक्रम नामक युवक की दुर्घटना में दर्दनाक मौत हो गई। गमगीन घर परिवार के प्रमुख सदस्यों ने बेटे के अंगदान करने का तुरंत निर्णय लिया। अंगदाता विक्रम के पिता कहते हैं कि मुझे बहुत खुशी है कि मेरे पुत्र की आंख से कोई दृष्टिहीन देख पा रहा है। किसी के शरीर में उसका दिल धड़क रहा है। किसी को उसकी किडनी तो किसी के शरीर में उसका लिवर है। वह मरकर भी दूसरों के काम आया इससे बढ़कर हमारे लिए क्या खुशी हो सकती है। घर के जो सदस्य पहले राजी नहीं थे वे भी परम संतुष्ट हैं। अंगदाता अनीता के शब्द हैं, बेशक मेरी पत्नी सशरीर मेरे साथ नहीं, लेकिन वो अब भी इस दुनिया में जिंदा है। मैं यह नहीं जानना चाहता कि मेरी पत्नी के अंग किसे लगाये गए, लेकिन मुझे तो इस बात की प्रसन्नता सदैव रहेगी कि मेरी प्रिय पत्नी मौत के बाद भी चार अनजान लोगों को जीवन दे गई। तरुण की अस्सी वर्षीया मां अचानक चल बसीं। शव उसके सामने पड़ा था। अपनी ममतामयी मां के साथ बिताए असंख्य सुखद लम्हों को याद करते-करते उसके दिमाग में कभी मां के कहे शब्द कौंधे, अगर मुझे कुछ हो जाए तो बेटा आंसू मत बहाना। मेरे नाखून भी किसी के काम आएं तो उन्हें भी दान कर देना। रिश्तेदारों के विरोध की चिंता और परवाह न करना। तरुण ने उसी पल अंगदान के लिए तुरंत स्वीकृति दे दी। उनका कथन है कि मां के अंगदान के बाद उनके नहीं होने का एहसास मुझे बिल्कुल नहीं होता...।

    संतान हर मां के लिए सबसे अनमोल होती है। कोख में आने से लेकर उसके बढ़ने तक कितने ही सपने हर मां संजोए रखती है। ऐसे में जब जवान संतान किसी हादसे की शिकार हो जाए तो मां की दुनिया ही सूनी हो जाती है, लेकिन अपने इस दुख से उबरकर एक मां ने ऐसा फैसला किया कि चौबीस वर्ष की उम्र में जिंदगी से जंग हारनेवाला उसका लाल अब किसी की आंखों की रोशनी तो किसी का दिल बन चुका है। इस मां के फैसले से अपनी जिंदगी बचाने अंगदान की प्रतीक्षा कर रहे पांच लोगों को नई जिंदगी मिली है। 

    2023 में 16,542 अंगदान हुए, जिसमें अधिक महिलाएं जीवित दाता थीं। केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के डेटा के अनुसार, पिछले साल 5651 पुरुषों और 9784 महिलाओं नें अंगदान किए। साथ ही कुल 18,378 अंग प्रत्यारोपण किए गए। इसमें 13,426 किडनी ट्रांसप्लांट सबसे अधिक थे। डेटा से पता चलता है कि 10 साल में अंगदान में लगभग चार गुना की बढ़ोतरी हुई है। सामने आए आंकड़ों से यह भी पता चला है कि मृत पुरुष दानवीरों की संख्या अधिक है, जिसमें 844 पुरुषों ने अंगदान किया, जबकि 255 महिलाओं ने। 2013 में जहां कुल अंगदानकर्ता 4990 थे, वहीं 2023 में यह बढ़कर 17168 हो गए। इसके बावजूद हमारे देश में अंगदान दर अभी भी प्रति दस लाख की आबादी में एक से नीचे है। गौरतलब है कि एक जीवित अंगदाता उसे कहते हैं जब वह प्रत्यारोपण के लिए किसी व्यक्ति को अन्य व्यक्ति को अंग या अंग का हिस्सा दान करता हैं। यह भी अत्यंत गौरतलब है कि सबसे आम जीवित अंगदान किडनी है। लिवर का एक हिस्सा भी दान किया जा सकता है। अधिकांश लोगों को इसकी जानकारी नहीं कि कौन सा अंग कब तक ट्रांसप्लांट कर सकते हैं। दिल-4-6 घंटे में, लिवर 12 घंटे तक, किडनी-30 घंटे तक, आंख 6 घंटे तक, त्वचा 6 घंटे तक, आंतें व पैक्रियाज 4-6 घंटे में ट्रांसप्लांट किये जा सकते हैं।

Thursday, September 26, 2024

संस्कार

    खुश और सेहतमंद रहना तो सभी चाहते है। मिलने-मिलाने वाले इज्जत से पेश आएं, कहीं अनादर न हो, अपने नाम, काम और पहचान का डंका बजता रहे यह भी हर कोई चाहता है। सब को खबर है कि स्वास्थ्य से बढ़कर कुछ भी नहीं। यदि शरीर रोगमुक्त, चुस्त-दुरुस्त है तो ही दुनियाभर की सुख-सुविधाएं अपनी हैं। सार्थक हैं। तनाव मुक्त होकर जीना भी तभी संभव है जब बुरी संगत और बुरे कर्मों से दूरी बना ली जाए। कोई अगर हितकारी सुझाव देता है तो उसकी अवहेलना, तिरस्कार, अपमान न किया जाए। यूं तो देश में तमाशबीनों की भरमार है, लेकिन कुछ लोग अपने आसपास गलत होता नहीं देख सकते। पहले अखबार में छपी इस खबर पर गौर करें...।

    ‘‘शहर के एक मोहल्ले में शाम होते ही तीन युवकों का शराब पी कर आती-जाती महिलाओं से बदतमीजी करना रोजमर्रा की बात थी। उनके बेलगाम अश्लील इशारों की वजह सभी आहत और परेशान रहते। खासकर युवतियां, जिन्हें घर में दुबक कर रह जाना पड़ता था। अधिकांश लोग व्यापारी थे, जिन्हें नोट छापने से फुर्सत नहीं थी। अपने काम से ही मतलब रखते थे। एक अंधेरी रात शराबियों की अति बेहयायी वहां रहने वाले स्कूल के शिक्षक से देखी नहीं गई। वे गुस्से से तमतमा गए। उन्होंने तीनों को जोरदार फटकार लगाते हुए वहां से तुरंत चले जाने को कहा। उस वक्त तो वे बड़बड़ाते हुए वहां से निकल लिए, लेकिन आधी रात को आठ-दस गुंडों के झुंड ने उम्रदराज शिक्षक और उनकी पत्नी को निर्वस्त्र कर बड़ी बेरहमी से पटक-पटक कर पीटा। जाते-जाते पेट्रोल छिड़क कर घर भी फूंक दिया। पड़ोसियों ने अपनी जान जोखिम में डालकर बड़ी मुश्क़िल से उन्हें आग से बाहर निकालने में सफलता पाई, लेकिन एक दुःखद, चिंतित करने वाला शर्मनाक सच यह भी है की जब शराबी एक साथ असहाय शिक्षक और उनकी पत्नी का खून बहा रहे थे और वे संघर्षरत रहकर जोर-जोर से चीख-चिला कर बचाने की गुहार लगा रहे तब सुनने के बाद भी किसी ने सामने आने की हिम्मत नहीं की। वहां पर कब्रिस्तान-सा सन्नाटा बना रहा।

    अखबार में छपी उपरोक्त खबर के नीचे यह खबर भी छपी थी... 

    ‘‘थाईलैंड के बैकांक में एक महिला को किचन में बर्तन धोने के दौरान अजगर ने जकड़ लिया। 64 वर्षीय महिला लगभग दो घंटे तक 16 फीट के अजगर से बचने के लिए जूझती रही। उसका जोर-शोर से संघर्ष जारी था तभी उसी दौरान घर के सामने से गुजर रहे एक शख्स ने महिला की चीख़-पुकार की आवाज़ सुनी। उस जागरूक इंसान के द्वारा पुलिस को तुरंत सूचित करने से महिला को बचा लिया गया।’’ 

    मेरे मन-मस्तिष्क में यह प्रश्न भी अभी तक कब्जा जमाये है कि शराबी, बदमाश, मदहोश युवकों को सुधरने की सीख देकर शिक्षक ने कोई बहुत बड़ी भूल कर दी? उन्हे भी मोहल्ले के अन्य लोगों की तरह चुपचाप रहने का दस्तूर निभाते हुए इस सोच से बंधे रहना चाहिए था कि, जो हो रहा है, होता रहे। मेरे घर में कौन सी बहू-बेटियां हैं। ऐसे में दूसरों की बहन-बेटियों की चिंता मैं क्यों करूं? यह गली भी कौन सी मेरे बाप-दादा की है, जो इस पर अपना अधिकार जताते हुए गुंडों को गुण्डागर्दी करने से रोकूं। शिक्षक महोदय की यदि यही संकुचित, स्वार्थी और विकृत सोच होती तो वे अपने में मस्त रहते। अपने रास्ते आते और निकल जाते, लेकिन उनसे यही तो नहीं हो पाया। कई वर्षों तक हाईस्कूल में अध्यापन कर चुके गुरूजी को लगा था कि लड़के उनके साथ अदब से पेश आते हुए चुपचाप गिलास, बोतल, चखना समेट कर गली से चले जाएंगे। जो हुआ उसकी तो उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी। 

    कितना अच्छा होता यदि वे पुलिस स्टेशन जाकर बदमाशों के खिलाफ रिपोर्ट लिखाते। वहां पर ढिलाई बेपरवाही दिखने पर सभी मोहल्लेवासी एकजुट होकर उन्हें वहां से खदेड़ने का एक सूत्रीय अभियान चलाते तो अंततः वे चले जाने को मजबूर हो जाते, लेकिन एक-दूसरे से कटे रहने की शहरी संस्कृति ने ऐसी कोई पहल होने ही नहीं दी। मेल-मिलाप, एकता और अटूट संकल्प में कितनी ताकत होती है, इसकी वास्तविक तस्वीर पिछले दिनों हमने उत्तरप्रदेश के एक गांव में देखी। मिरगपुर नामक इस गांव को भारत देश का सबसे पवित्र और अनुशासित गांव का दर्जा मिला हुआ है। दस हजार की आबादी वाले इस आदर्श गांव में पांच सौ साल से किसी ने कोई नशा नहीं किया। कई लोगों ने शराब और बीयर का नाम तक नहीं सुना। न ही कभी दुष्कर्म और छेड़छाड़ की कोई घटना घटी। गांववासी कई पीढ़ियों से शुद्ध शाकाहारी हैं। खाने में प्याज-लहसून तक का इस्तेमाल नहीं करते। तनाव मुक्त रहने वाले यहां के नागरिकों को डॉक्टरों की बहुत कम शरण लेनी पड़ती है। सभी एक-दूसरे का मान-सम्मान करते हैं। युवा, बड़ों की बातों को बड़े ध्यान से सुनकर अनुसरण करते है। गांव की बेटियां जब शादी करके किसी अन्य स्थान यानी ससुराल जाती हैं तो वे मिरगपुर गांव की प्रतिज्ञा से मुक्त हो जाती हैं, लेकिन फिर भी अपने जन्मस्थल के संस्कार उनके दिल दिमाग में इतनी मजबूत जड़ें जमा चुके होते हैं, जिससे वे ससुराल के सदस्यों को नशे-पानी से दूर रखने के भरपूर प्रयास में लगी रहती हैं। और हां, मिरगपुर में ब्याह कर आने वाली बहुएं इस प्रतिज्ञा से सदा-सदा के लिए बंध जाती हैं। मिरगपुर का नाम इंडिया बुक के बाद एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज हो चुका है। जिला प्रशासन ने भी इसे बड़े गर्व के साथ नशा मुक्त गांव घोषित कर रखा है। इस सात्विक गांव में जो भी जाता है आश्चर्य में पड़ जाता है। उसका वहीं बस जाने का मन करता है। दो वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के शहर सहारनपुर की यात्रा के दौरान किसी पर्यटन प्रेमी ने हमें मिरगपुर को करीब से देखने की सलाह दी थी। उत्तरप्रदेश के भ्रमण पर निकले हमारे दल में चार पत्रकार और तीन कॉलेज के प्रोफेसर थे। दो उम्रदराज पत्रकारों और एक प्रोफेसर महोदय को तो मिरगपुर इस कदर भाया कि उन्होंने कुछ महीने बाद अपने शहर को छोड़-छाड़ कर मिरगपुर में हमेशा-हमेशा के लिए बसने की घोषणा को साकार भी कर दिया।

Friday, September 20, 2024

सत्ता की लाठी

    धनपतियों की अंकुशहीन, बिगड़ैल  औलादों की अंधाधुंध शराब गटक कर राहगीरों को रौंदनें की खबरें अब बिल्कुल नहीं चौंकातीं। देश का प्रदेश महाराष्ट्र तो इन दिनों बिल्डर्स राजनेताओं, भू-माफियाओं, शराब माफियाओं, शिक्षा माफियाओं और तथाकथित महान समाज सेवकों की नशेड़ी संतानों के नशीले तांडव से लगातार आहत और बदनाम होने को विवश है। कई लोग तो यह भी कहने और मानने लगे हैं कि महाराष्ट्र और शराब का जो चोली दामन का साथ बन चुका है, उसका पूरा श्रेय यहां की कुटिल राजनीति तथा घाघ राजनेताओं को जाता है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली की तर्ज पर अब महाराष्ट्र भी चरस, अफीम, गांजा, एमडी के नशे में बुरी तरह से लड़खड़ाता और डगमगाता नज़र आ रहा है। उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, साहित्य की हर विधा में पारंगत लेखकों, पत्रकारों, संपादकों, कलाकारों तथा देश-विदेश में विख्यात राजनीतिक हस्तियों, उद्योगपतियों के प्रतिष्ठित शहर पुणे तथा नागपुर में तो ऐसे-ऐसे अपराधों का तांता लगा है, जिनकी कभी कल्पना नहीं की गई थी। स्कूल, कॉलेज के लड़के-लड़कियां एमडी तथा शराब के नशे के शौक को पूरा करने के लिए स्कूटर, मोटरसाइकिल की चोरी-चक्कारी के साथ-साथ चेन स्नैचिंग करने लगे हैं। होटलों, फार्महाउसों, ब्यूटी पार्लरों तथा विभिन्न अय्याशी के ठिकानों पर कम उम्र की कॉलेज कन्याओं का रोज-रोज जिस्मफरोशी करते पकड़े  जाना आखिर क्या दर्शाता है? 

    2024 के मई महीने की 19 तारीख को पुणे में तड़के शराब के नशे में मदहोश एक नाबालिग ने अंधाधुंध रफ्तार से करोड़ों की लग्जरी कार दौड़ाते हुए युवक और युवती की जान ले ली। दोनों मृतक होनहार इंजीनियर थे और मध्यप्रदेश के मूल निवासी थे। इनकी हत्या करने वाले नाबालिग के पास कार चलाने का लाइसेंस नहीं था। फिर भी उसके बिल्डर पिता ने करोड़ों रुपए की कार की चाबी अपने नशेड़ी बेटे को थमा दी थी। साथ ही दोस्तों के साथ शानो-शौकत के साथ गुलछर्रे उड़ाने के लिए क्रेडिट कार्ड भी दे दिया था। बिगड़ैल नाबालिग रोज की तरह उस रात भी मां-बाप तथा दादा के आशीर्वाद से अपने अय्याश यारों के संग नई-नई पोर्श कार में सवार होकर शहर के आलीशान शराबखाने गया। वहां पर सबने लगभग अस्सी हजार रुपए की मनपसंद शराब गटकी। कबाब भी खूब चखा। तृप्त होने के बाद रात का शहजादा और उसके साथी लगभग एक घंटे तक यहां-वहां कार को हवाई रफ्तार से अंधाधुंध दौड़ाते रहे। इस बीच पियक्कड़ों की फिर और पीने की तलब जागी तो किसी दूसरे रंगारंग मयखाने में बैठकर शराब पीते रहे। यहां भी नशे में टुन्न नाबालिग ने अपने बाप की काली कमायी के तीस हजार रुपये की खुशी-खुशी आहूति दे दी। दो हत्याएं करने के बाद भी धनपशु की औलाद के चेहरे पर किंचित भी मलाल, चिंता, खौफ का नामोनिशान नहीं था। जल्लाद को पूरा-पूरा यकीन था कि देश का कानून उसका बाल भी बांका नहीं कर सकता। हुआ भी वही। उसके बाप, दादा तथा मां ने  लाड-प्यार में पले बेटे को कानून के फंदे से बचाने के लिए पुलिस, विधायक, मंत्री, संत्री सबको खरीदने के लिए एड़ी-चोटी की ताकत लगा दी। नृशंस हत्यारे को बचाने के लिए अस्पताल के डॉक्टर बिकने से नहीं सकुचाये। जांच में बेटा शराबी साबित न हो इसके लिए मां ने अपने ब्लड सैंपल को बेटे के ब्लड सैंपल में बदलकर कानून की आंखों में धूल झोंकने की चाल चली, लेकिन अंतत: पर्दाफाश हो ही गया। इसी चालबाजी में उनके काले अतीत के पन्ने भी खुलते गए। बाप तो बाप, दादा भी दस नंबरी निकला और उसके अंडर वर्ल्ड से पुराने जुड़ाव का भी पर्दाफाश हो गया।

    पुणे के इस हत्याकांड के कुछ दिन बाद मुंबई के वरली में सत्ता पक्ष के एक नेता के दुलारे की बीएमडब्ल्यू कार ने एक स्कूटर को जोरदार टक्कर मारी, जिससे किसी गरीब मां-बाप की इकलौती लाड़ली बिटिया की वहीं मौत हो गई। यह हत्यारा नेता-पुत्र भी शराब के नशे में टुन्न था। पुलिस उसके पीछे-पीछे भागती रही और वह हत्याकांड को अंजाम देने के बाद बेफिक्र होकर अपनी प्रेमिका की गोद में जाकर सो गया। इसी सितंबर के महीने में ही नागपुर में भाजपा के मालदार प्रदेश अध्यक्ष के बेटे ने मित्रों के साथ जाम पर जाम टकराने के बाद आधी रात को आसमान छूती अपनी ऑडी कार से चार मोपेड सहित एक कार को जोरदार टक्कर मारी। दो लोग बुरी तरह से घायल हो गये। शराबी मंडली ने वहां रुकने की बजाय भाग जाना बेहतर समझा। इसी  भागमभाग में उनकी कार का टायर भी फट गया, जिससे ऑडी पोलो कार से जा टकरायी। इस नशीले अपराध की वजह से भीड़ ने नेता पुत्र और उसके साथी की जमकर मरम्मत की और नुकसान की भरपाई के बाद बड़ी मुश्क़िल से तब जाने दिया जब उन्हें पता चला कि इस कांड का हीरो प्रदेश के दमदार नेता की बिगड़ैल औलाद है। ऑडी कार को पुलिस ने जब अपने कब्जे में लिया तब उसकी नंबर प्लेट नदारद थी। सुबह के सभी अखबारों की यही प्रमुख खबर थी। बड़े अनमने मन से पुलिस ने तब शिकायत दर्ज की जब उस पर चारों और से दबाव पड़ने लगा। पुत्र मोह के कैदी पिताश्री यानी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष का बयान आया कि घटना अत्यंत दुःखद है। कार उनके पुत्र के नाम पर रजिस्टर्ड है। वे चाहते हैं कि पूरी तरह से निष्पक्ष जांच  हो। उन्होंने पुलिस को कोई फोन नहीं किया है और न ही किसी भी तरह से जांच को प्रभावित करने की कोशिश करेंगे। मामले को लेकर राजनीति करना उचित नहीं। यह नेताओं की कौम आखिर किसको बेवकूफ बनाने पर तुली रहती है? सत्ताधीशों को बोलना ही कहां पड़ता है। सत्ता की लाठी बिना चले अपना काम कर गुजरती है। प्रशासन के चाटूकार लाठी के इशारे पर नाचना अच्छी तरह से जानते हैं। वैसे भी खाकी वर्दी को सत्ता की खामोश जुबान बहुत जल्दी समझ में आ जाती है। उनकी पार्टी की केंद्र तथा प्रदेश में सरकार है। पूरा तंत्र उनकी मुट्ठी में है। उनका बाल भी बांका करने का किसमें दम है? पुलिस तो हिम्मत कर ही नहीं सकती। उसका नेताओं से हमेशा वास्ता पड़ता रहता है। कभी यदि काला-पीला करने के बाद फंस गए तो बचने-बचाने के लिए उन्हें सत्ता के दरवाजे पर जाकर नाक रगड़नी होती है। आधुनिक शिष्टाचार और आदान-प्रदान कर यह मायावी दस्तूर वर्षों से चला आ रहा है। खुशी-खुशी या मजबूरी में इसे निभाना ही पड़ता है। हां यह भी न भूलें कि, नाम मात्र के ही बाप ही ऐसे होते हैं जो अपनी संतान के हिमायती न हों। सत्ताधीशों के संतान मोह का तो इतिहास साक्षी है, जो अपने खोटे सिक्कों तक को राजनीति के बाजार में बखूबी खपाने और चलाने की हर कला में सिद्धहस्त हैं। महाराष्ट्र  में तो ऐसे नेताओं की भरमार है जो कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद एक तरफ मेडिकल तथा इंजीनियरिंग कॉलेज उद्योग धंधों को चला रहे हैं, दूसरी तरफ बीयर बार, पब, शराब की फैक्ट्रियां तथा दूकानें खोल कर अरबों-खरबों की माया जुटा रहे हैं। पब्लिक अंधी नहीं है। उसे अच्छी तरह से दिखायी दे रहा है कि शहरों के साथ-साथ ग्रामों में भी मंत्रियों, नेताओं की प्रबल भागीदारी में नशे के विभिन्न कारोबार फलफूल रहे हैं...।

Thursday, September 12, 2024

अगर-मगर के बीच

     पूरे विश्व में उम्रदराज स्त्री-पुरुषों का सुख-चैन से जीना दूभर होता चला जा रहा है। बड़े ही जोर-शोर से कहा जा रहा है कि अधिकांश औलादें मतलबी हो गई हैं। उन्हें अपने जन्मदाताओं की खास चिन्ता नहीं रहती। वे तो बस अपने में मग्न हैं। यह किसी एक देश का संकट होता तो नजरअंदाज किया जा सकता था। जहां-तहां बुजुर्गों में निराशा और हताशा है। जीने की उमंग छिन सी गई है। जिन पर भरोसा किया, वही विश्वासघाती निकले। ऐसी एक से बढ़कर एक दिल दहला देने वाली खबरेें पढ़ और सुन-सुन कर माथा चकराने लगता है। अच्छे भले इंसान को भविष्य की चिंता और घबराहट कस कर जकड़ लेती है। पहले इस हकीकत से रूबरू होते हैं, जिससे हिन्दुस्तान भी पूरी तरह से अछूता नहीं है...। 

    जापान में लाखों लोग अकेलेपन से जूझ रहे हैं। उनका जीवन नर्क बन चुका है। जिन औलादों को पाल-पोस कर उन्होंने हर तरह से काबिल बनाया, वही गद्दार साबित हुईं। बुजुर्गों के साथ कुछ पल बैठने, उनका हाल-चाल जानने का उनके पास वक्त ही नहीं। जन्मदाताओं को उनके हाल  पर छोड़ दिया गया है। मृत्यु के वक्त भी कोई परिजन, रिश्तेदार, केयरटेकर या मित्र उनके आसपास नहीं होता। अंतिम काल में अपनों का साथ और चेहरा देखने के लिए वे तड़पते, तरसते रह जाते हैं। तेजी से तरक्की करते जापान में बीते छह महीनों में 37,227 बुजुर्ग अपने घरों के एकांत में मृत पाये गए। उनके पड़ोसी तथा रिश्तेदार कई दिनों तक उनकी मौत से अनभिज्ञ रहे। लगभग चार हजार शवों को मृत्यु के  एक-डेढ़ माह बाद तो 130 शवों को  असहनीय बदबू आने पर एक वर्ष बाद घरों से बाहर निकाला जा सका। मृतकों में जहां 85 वर्ष या उससे ज्यादा उम्र के बुजुर्ग थे, वहीं 65-70 आयु के लोग भी शामिल थे, जो चल फिर सकते थे, लेकिन निराशा और अकेलेपन ने उनकी जान ले ली।’’ 

    हमारे देश में उम्रदराज स्त्री-पुरुषों की औलादों की अनदेखी की वजह से होने वाली मौतों की तादाद इतनी ज्यादा और भयावह तो नहीं, लेकिन चिंतित करने वाली तो जरूर है। वो मां-बाप यकीनन अत्यंत भाग्यशाली हैं, जिनकी संतानें उनके प्रति पूरी तरह से समर्पित हैं। उनकी देखभाल और मान-सम्मान में कहीं कोई कसर नहीं छोड़तीं। इस सच से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि, आपाधापी और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में अनेकों बेटे-बेटियों को मजबूरन अपने अभिभावकों से दूर जाने, रहने कमाने को विवश होना पड़ता है। फिर भी अधिकांश जागरूक बेटे-बेटियां अपने जन्मदाताओं से दूरियां नहीं बनाते। भारतीय उत्सव, संस्कार, परंपराएं और बुजुर्गों की सीख उन्हे घर-परिवार से जोड़े रखती हैं।

    हमारे यहां वर्ष भर त्यौहारों का जो सिलसिला बना रहता वह रिश्तों की डोर को कमजोर नहीं होने देता। दिवाली, ईद, दशहरा, होली, गुरुनानक जयंती, क्रिसमस आदि सभी त्यौहार मेलजोल, सकारात्मक ऊर्जा तथा अपार खुशियां प्रदान करते हैं। बहुत ही कम ऐसे घर-परिवार होंगे, जहां रामायण और गीता जैसे ग्रंथ नहीं होते होंगे तथा बच्चों को भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण के जीवन चरित्र के बारे में बताया-समझाया नहीं जाता होगा। कितनी संतानें इनसे प्रेरित  होकर इसे आत्मसात करती हैं, यह तथ्य और सच अपनी जगह है।

    यह भी सच है कि, पिछले कुछ वर्षों में भारत में भी रिश्तों की मान-सम्मान करने की परिपाटी में बदलाव और कमी देखी जा रही है। कोरोना काल में मनुष्य के मजबूरन स्वार्थी बनने की हकीकत को याद कर आज भी कंपकंपी सी छूटने लगती है। इस दुष्ट काल में कुछ संतानों ने अपना रंग बदला और अच्छी औलाद का फर्ज नहीं निभा पाए। कैसी भी विपदाएं आई हों, लेकिन भारतीय मां-बाप अपने दायित्व से कभी भी विचलित नहीं हुए। हिंदुस्तानी अभिभावकों का यही गुण उन्हें बार-बार नमन का अधिकारी बनाता है। वे अपने बच्चों के पालन-पोषण में कोई कमी नहीं छोड़ते। उन्हें सतत यही उम्मीद रहती है कि उनके बच्चे कभी भी उनकी अनदेखी नहीं करेंगे। कैसा भी वक्त होगा, अपना फर्ज निभाने से नहीं चूकेंगे, लेकिन अपवाद की श्रेणी में आने वाली औलादें जब मां-बाप की आशाओं के तराजू पर खरी नहीं उतरतीं तो वे खुद को लुटा-पिटा मानकर निराशा का कफन ओढ़ लेते हैं। उन्हें बार-बार खुद की गलती का अहसास होता है, लेकिन तब तक चिड़िया खेत चुग कर फुर्र हो चुकी होती है। मैंने अपने आसपास कुछ ऐसे पालकों को देखा है, जो अपने बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए उम्र भर खून-पसीना बहाते रहते हैं। उन्हें यह खौफ खाये रहता है कि हमारे बाद बच्चे कैसे रहेंगे। उन्हें कोई तकलीफ तो नहीं होगी। वे किसी की साजिश का शिकार तो नहीं हो जाएंगे। इस चक्कर में वे अपने साथ न्याय नहीं कर पाते। जबकि होता यह है कि पालकों ने स्वर्गवास के पश्चात कई बच्चों को पहले से बेहतर नई राह मिल जाती है। वे अपने में ही मस्त हो सब कुछ भूल-भाल जाते हैं। उन्हें मां-बाप के त्याग की भी याद नहीं आती। जीने की परिभाषा यदि सीखनी हो तो ओशो से बड़ा और कोई शिक्षक नहीं है। वे मात्र 58 साल तक इस धरा पर रहे, लेकिन आज भी जिन्दा हैं। उन्होंने इतने कम समय में इतना कुछ कर डाला जितना सौ साल में भी संभव नहीं। उनकी हजारों प्रेरक किताबें उनके देव पुरुष होने का जीवंत प्रमाण हैं। उनकी समाधि पर लिखा हुआ है। ‘‘ओशो, जो न कभी पैदा हुए, न कभी मरे।’’ उन्होंने 11 दिसंबर, 1931 और 19 जनवरी, 1990 के बीच इस धरती की यात्रा की। 

ओशो कहते हैं,

सब पड़ा रह जाएगा, दीये जलते रहेंगे

फूल खिलते रहेंगे, तुम झड़ जाओगे

संसार ऐसे ही चलता रहेगा

शहनाइयां ऐसे ही बजती रहेंगी, 

तुम न होओगे

वसंत भी आएंगे, फूल भी खिलेंगे,

आकाश तारों से भी भरेगा

सुबह भी होगी, सांझ भी होगी

सब ऐसा ही होता रहेगा,

एक तुम न होओगे...।

Friday, September 6, 2024

खबरदार करती खबरें

     प्रतिदिन की तरह पति-पत्नी  सुबह  की सैर पर निकले। रास्ते में पड़ने वाली गहरी नदी में दोनों ने एक साथ छलांग लगा दी। किसी राह चलते साहसी व्यक्ति ने नदी में डुबकी  लगाकर महिला को तो बचा लिया, लेकिन पुरुष पानी के बहाव के साथ बह गया। यह खबर जिसने पड़ी वह हतप्रभ रह गया। दोनों को मार्निंग वॉक का शौक था। अपने स्वस्थ के प्रति सतर्क थे। लंबा जीवन जीने की तमन्ना भी रही होगी, तो फिर ऐसे में दोनों ने यह हैरतअंगेज कदम क्यों उठाया? कई खबरें अपने साथ प्रश्न भी जोड़े रहती हैं। सभी के जवाब नहीं मिल पाते। संतान सुख से वंचित शंकालू पति ने पीट-पीट कर पत्नी की हत्या कर दी। हत्या के बाद वह उस के शव के पास घंटों गुमसुम बैठा रहा। मृतका के सिर के पास नारियल भी रखा था। ...कोलकाता में मेडिकल कॉलेज में हुए बलात्कार-हत्या के संगीन मामले को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी  मुर्मू ने कहा, देश में गुस्से का माहौल है। मैं स्वयं निराश और भयभीत  हूं। महिलाओं  के खिलाफ  होने वाले अपराधों के लिए कुछ लोगों द्वारा महिलाओं को वस्तु के रूप में देखने की मानसिकता जिम्मेदार  है। अपनी बेटियों के प्रति यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनके भय से मुक्ति पाने के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करें। अब समय आ गया है कि न केवल इतिहास का सीधे सामना किया जाए बल्कि अपनी आत्मा के भीतर झांका जाए और महिलाओं के खिलाफ अपराध की इस बीमारी की जड़ तक पहुंचा जाए।

    महाराष्ट्र के छत्रपति संभाली  नगर में महिला डॉक्टर ने अपने पति के आतंक और जुल्म की इंतिहा से उकता और घबरा कर खुदकुशी कर ली। उसने अपने सुसाइड नोट  में लिखा कि मेरी हार्दिक इच्छा है की मेरे पति मुझे चिता पर रखने से पहले कसकर गले लगाएं। जिस शैतान पति ने कभी चैन से जीने नहीं दिया। अच्छे-खासे जीवन को नर्क बना कर रख दिया उससे यह कैसी मांग? दुर्जन पति के प्रति मरते दम तक सहानुभूति रखने वाली यह नारी मेडिकल अधिकारी थी यानी आर्थिक रूप में सक्षम थी। दिन-रात गाली-गलौच और शंका करने वाले पति को उसके हाल पर छोड़कर नयी स्वतंत्र राह भी तो पकड़ी जा सकती थी। फांसी के फंदे पर झूल कर इसी पढ़ी-लिखी भारतीय नारी ने खुद को किसी सहानुभूति के लायक भी नहीं छोड़ा। 

    ‘‘महाराष्ट्र में  चौथी क्लास  की छात्रा से शिक्षक ने, तो सगी  बेटी से बाप ने किया बलात्कार।’’ कल्याण  तहसील  में स्थित  एक गांव  में पुलिस ने 37 वर्षीय दरिंदे को दो साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म के संगीन आरोप में गिरफ्तार किया है। मासूम का अस्पताल में इलाज चल रहा है। बच्ची के माता-पिता तीन माह पूर्व मेहनत-मजदूरी करने आए थे। बच्ची घर के पास की दुकान से चाकलेट खरीदने गई थी। शैतान उसे उठाकर ले गया और निर्जन स्थान पर बलात्कार की कोशिश की। पीड़ा से कराहती बच्ची रोते हुए घर पहुंची तो नराधम की हैवानियत का पता चला।

    ‘‘यूपी में छात्रा से बलात्कार के आरोपियों के जेल से बाहर आने पर फूल, गुलदस्ते और हार पहनाकर किया गया स्वागत’’... जी हां, एकदम सही पढ़ा आपने। उत्तरप्रदेश के आईआईटी बीएचयू में बीटेक छात्रा की लगभग आठ माह पूर्व दो बदमाशों ने अस्मत पर डाका डाला था। इन दरिंदों के खिलाफ हजारों लोग सड़कों पर उतरे थे। अभी हाल में अदालत ने दोनों को सशर्त जमानत दे दी। साथ में यह भी कहा कि इन पेशेवर अपराधियों को जनता के बीच जाने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन जनता तो जनता है, सब कुछ जानती, समझती है, फिर भी अंधी-बहरी बनी रहना चाहती है। जिन्हें  अपना मानती है, उनके सौ खून माफ करने की हिमायती होने में नहीं सकुचाती। यह हमारे समाज की बेहद  शर्मनाक  हकीकत है।

    कई हृदयहीन भारतीय दूसरों की बहन, बेटियों का आदर करना नहीं जानते। उनका संरक्षण करना तो बहुत दूर की बात  है। पिछले कुछ सालों में हमारे भारत को बलात्कारियों का देश भी कहा जाने लगा है। कोई भी दिन ऐसा नहीं गुजरता जब देश के किसी हिस्से में बहन-बेटी की आबरू लूटने का खबर पढ़ने-सुनने में न आती हो। घर की सुरक्षित चार दिवारी में भी बेटियां, बहुएं और मासूम बच्चियां रौंद दी जाती हैं। उनके विरोध के स्वर और चीखों को बड़ी चालाकी से दबा-छिपा दिया जाता है। शर्मनाक तथ्य यह भी है कि संपूर्ण भारत में व्याभिचार और बलात्कार को लेकर अत्यंत शर्मनाक राजनीति होती देखी जाती है। पीड़िताओं के साथ बड़ी निर्लज्जता से भेदभाव कर आहत करने वाली बयानबाजी रूकने का नाम नहीं लेती। समाज को विषैला और असंवेदनशील बनाने में उन राजनेताओं की बहुत बड़ी भूमिका  है, जो इस मामले में घोर पक्षपाती हैं। जिन प्रदेशों में उनकी सरकार है वहां पर महिलाओं के साथ बर्बरता होने पर खामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं और जहां पर उनकी सत्ता नहीं वहां कुत्तों की तरह भौंकने में कोई कमी नहीं करते। देश की बेटियों पर हो रहे दुराचारों के मामले में भेदभाव करने वाले नेताओं की वजह से ही राक्षसी कृत्य करने वाले चुन-चुन कर नारियों की इज्जत पर डाका डालते हैं और बाद में अपने आकाओं की गोद में जाकर बैठ जाते हैं। उनके आका उन्हें बचाने के लिए ओछी से ओछी चालें चलने लगते हैं। देश का कानून भी इनके कुचक्र का शिकार हो जाता है। सबूतों के अभाव में भरे चौराहे पर बलात्कार करने वाले दुराचारी  बाइज्जत बरी हो जाते हैं। उनको अपना आदर्श मानने वाले उनका आन-बान और शान के साथ गुलदस्तों तथा फूलों के हारों से अभिनंदन-स्वागत कर पीड़िता और उनके माता-पिता के सीने में खंजर घोंपकर बार-बार लहुलूहान और करते रहते हैं।