Thursday, May 30, 2024

अब नहीं तो कब जागोगे?

    इंटरनेट और मोबाइल की सुलभता ने बहुत कुछ उलट-पुलट कर दिया है। बच्चों से बचपन छीन लिया है। छोटे से छोटा बच्चा भी मोबाइल का जानकार लगता है। मोबाइल, लैपटॉप को लेकर बड़ों से ज्यादा उसमें समझ है। यही समझ अब बहुत घातक साबित हो रही है। पढ़ाई के लिए मोबाइल, लैपटॉप और कम्प्यूटर जरूरी हैं, लेकिन ऑनलाइन पढ़ाई करते-करते बेटे-बेटियां किस कदर गुमराह होकर मानसिक रूप से बीमार तथा अपराधी बन रहे हैं उसकी गवाह हैं ये डरावनी खबरें।

    राजस्थान में एक बारह साल के बच्चे ने अश्लील वीडियो देखने के बाद अपनी छह वर्षीय बहन का रेप कर दिया। कुछ दिन पहले ही माता-पिता ने इस मासूम भोले-भाले बेटे को पढ़ाई के लिए मोबाइल खरीद कर दिया था। छठवीं कक्षा में पढ़ रहे इस बच्चे को ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान पोर्न वोडियो की लिंक दिखी, जिसे उसने क्लिक कर दिया। उसके बाद जैसे ही उसकी अश्लील वीडियो पर नज़र पड़ी तो उसकी उत्सुकता बढ़ती चली गई। स्कूली पढ़ाई की बजाय सेक्सी वीडियो उसे लुभाने लगे। दोस्तों से मिलने और खेलने-कूदने के लिए उसने बाहर जाना बंद कर दिया। उसके मां-बाप के पास बच्चे पर नज़र रखने की फुरसत ही नहीं थी। वे अपने में मस्त थे। उनके सो जाने के बाद वह रात-रात भर तक पोर्न वीडियो में डूबा रहता। मां-बाप को लगता बच्चा पढ़ने में तल्लीन है। घर में उनकी एक छह वर्ष की बेटी भी थी। एक रात पोर्न वीडियो देखते-देखते उसने अपना संयम खोते हुए अपनी मासूम बहन का रेप कर दिया। सुबह जब मां-बाप को पता चला तो उन्होंने बलात्कारी बच्चे की अंधाधुंध पिटायी की। भविष्य में सावधान रहने की कसम भी खायी। 

    मुंबई के कुरार इलाके में 16 वर्षीय किशोरी को पोर्न वीडियो की लत ने जकड़ लिया। जब मौका पाती स्त्री-पुरुष के शारीरिक मिलन वाले वीडियो देखने बैठ जाती। स्कूल की किताबों को छूने का उसका मन ही नहीं होता। रात को वह अपने तेरह वर्षीय भाई के साथ सोफे पर सोती थी। वह भाई को भी पोर्न वीडियो दिखाने लगी। एक रात वीडियो देखते-देखते उसने छोटे भाई को सेक्स करने के लिए मजबूर कर दिया। वह नादान नहीं, नहीं करता रहा, लेकिन वह अपनी मनमानी करके ही मानी। फिर उसके बाद तो यह रोज का सिलसिला हो गया। भाई की मर्जी के खिलाफ यौन संबंध बना कर आकाश में उड़ती लड़की तब धड़ाम से धरती पर आ गिरी जब उसे खुद के गर्भवती होने का पता चला। माता-पिता उसका गर्भ गिरवाने के लिए किसी डॉक्टर के यहां ले गये तो उसने पुलिस को सूचना दे दी। मुंबई के वाशी में तेरह साल के भाई और पंद्रह वर्ष की बहन ने मिलकर पोर्न वीडियो देखा। भाई का प्रेक्टिकल करने का मन हो आया। बहन ने मना किया तो वह मन मसोस कर रह गया, लेकिन मौके की ताक में लगा रहा। एक दिन जब घर में कोई नहीं था, तब उसने बहन को दबोचा और उस पर बलात्कार कर डाला। बेटी के पीरियडस रुकने पर मां का माथा ठनका। गर्भ गिरवाने के लिए मां बेटी को अस्पताल लेकर गई तो मीडिया को भी खबर लग गई। उसके बाद तो अखबारों तथा न्यूज चैनलों पर यही खबर चीखती-चिल्लाती रही। 

    उत्तरप्रदेश के शहर गाजियाबाद में पोर्न देखने के अभ्यस्त दो भाई मिलकर अपनी ही 14 वर्षीय बहन का महीनों यौन शोषण करते रहे। जब वह गर्भवती हुई तब मां-बाप की तंद्रा टूटी। आसपास के लोगों को जब पता चला तो उनका खून खौल गया। कैसे लापरवाह मां-बाप हैं, जिनके होते बेटी की भाइयों के हाथों अस्मत लुटती रही और ये अनजान रहे। पड़ोसियों ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाने से पहले मां-बाप को डंडे-लाठियों से मारा पीटा। बहन-भाई के रिश्ते को कलंकित करने वाले दोनों भाइयों को भी मार-मार कर अधमरा कर दिया। बिलकुल वैसे ही जैसे पुणे में शराब के नशे में टुन्न होकर करोड़ों की कार से दो होनहारों को रौंदने वाले नाबालिग के खरबपति बिल्डर बाप की गुस्सायी भीड़ ने मुक्कों, थप्पड़ों, जूतों, चप्पलों से अंधाधुंध धुलाई की। इस रईस लापरवाह बाप ने यदि अपने बेटे को खुले सांड की तरह नहीं छोड़ा होता तो इंजीनियर युवती और युवक की दर्दनाक मौत होने की नौबत ही न आती। बददिमाग बाप के बिगड़े नाबालिग लड़के ने पुणे के आलीशान पब में अपने दो दोस्तों के साथ मात्र डेढ़ घण्टे में 48 हजार की शराब गटक ली। बार से लड़खड़ाते हुए निकलने के बाद तूफानी रफ्तार से बिना रजिस्ट्रेशन वाली कार दौड़ाते हुए युवक-युवती की हत्या कर दी। इतना ही नहीं इस नाबालिग शैतान ने उन्हें रौंदने के बाद फिर से अन्य बार में जाकर हजारों रुपये की शराब गटकी। अपने बेटे के अखंड शराबी तथा अंधाधुंध खर्चीले होने की रईस पिता को पूरी जानकारी थी। उसे यह भी पता था कि उसे ढंग से कार चलाना नहीं आता है। नाबालिग होने के कारण उसका अभी ड्रायविंग लायसेंस भी नहीं बना है। शराब के नशे में धुत होकर हत्यारे बने नशेड़ी बेटे से ज्यादा कसूरवार तो उसका धनपशु बाप है, जिसने अपने कपूत पर अंकुश लगाने की नहीं सोची। उसी तरह से वे सभी मां-बाप भी अपराधी ही हैं, जो बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाई के लिए महंगा मोबाइल तो उपलब्ध करा देते हैं, लेकिन यह देखने के लिए वक्त नहीं निकालते कि वे पढ़ाई की बजाय कौन से गुल खिला रहे हैं? भाई-बहन के एक साथ पोर्न देखने से बेखबर रहने वाले पालकों के कारण ही पवित्र रिश्ते अर्थ खो रहे हैं। सुरक्षा और पवित्रता के सुखद अहसास में रचे बसे भाई-बहन के रिश्ते की दुर्गति की कल्पना ही रुला देती है। इन खबरों को पढ़ने के बाद भी यदि अभिभावक सतर्क नहीं होते तो तय है कि ऐसी शर्मनाक खबरों में इजाफा ही होगा और लोग माथा पीटते रहेंगे।

Thursday, May 23, 2024

मिसाल-बेमिसाल

    इस बार के ‘मदर्स डे’ ने कुछ ममतामयी नारियों से रूबरू करवाया। मां का ममत्व तो अपरम्पार है। पिता की चुप्पी में छिपे अपार अपनत्व और त्याग का भी कोई सानी नहीं। मां-बाप अपने बच्चों के पहले शिक्षक होते हैं। संतानें उन्हीं से अच्छे-बुरे का ज्ञान पाती हैं। दोनों अपने बच्चों पर बिना शर्त सब कुछ समर्पित कर देते हैं। यहां तक कि अपनी जान और मान-सम्मान भी। चिकित्सालयों, अस्पतालों में रात-दिन खटने वाले डॉक्टरों तथा नर्सों की जीवनदायी भूमिका भी जन्मदाताओं से कम नहीं। मौत के कगार पर खड़े मरीजों को रोग मुक्त कर नया जीवन देने वाले इन महान सेवकों को इसलिए धरती का भगवान कहा जाता है। मध्यप्रदेश के शहर मंडला में जन्में तीन नवजातों का समय से पहले जन्म लेने के कारण वजन अत्यंत कम था। दूसरे उनके फेफड़े भी अविकसित थे, जिसकी वजह से उनके लिए सांस लेना दूभर हो रहा था। इन नवजातों को वेंटिलेटर पर रखा गया। डॉक्टरों तथा परिचारिकाओं ने इन्हें बचाने के लिए रात-दिन एक कर दिया। सांस नहीं ले पाने वाले इन शिशुओं के माता-पिता के लिए तो यह डॉक्टर और नर्सें जीते-जागते ईश्वर हैं। नारंगी शहर नागपुर में स्थित शासकीय वैद्यकीय महाविद्यालय (मेडिकल) के बाल रोग विभाग के न्यूयोनेटल इंटेन्सिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में ऐसे नवजात शिशुओं की जान बचाने के लिए डॉक्टर, नर्स व कर्मचारी 24 घंटे तैनात रहते हैं। इस विभाग में एक किलो व इससे भी कम वजन वाले करीब तीस से चालीस व डेढ़ किलो वाले साठ से सत्तर नवजात शिशु भर्ती रहते हैं। इनका बड़ी सतर्कता के साथ इलाज और देखभाल की जाती है। 

    थैलेसिमिया की बीमारी से युद्धरत सात वर्षीय रेहान को हर पंद्रह दिन में खून चढ़ाना पड़ता है। उसके माता-पिता मेहनत मजदूरी करते हैं। अपने लाड़ले के उपचार के लिए दोनों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। मां ने अपने गहने तक कुर्बान कर दिये हैं और पिता अपने बेटे के लिए खून-पसीना बहाते नहीं थकते। दोनों बस यही चाहते हैं कि बेटा शीघ्र स्वस्थ हो जाए। उसका दर्द उनसे देखा नहीं जाता। कई रातें दोनों ने भूखे पेट जाग-जाग कर काटी हैं। बेटे की चिंता के चलते मानसिक तनाव की शिकार हो चुकी मां को अपनी कतई फिक्र नहीं। डॉक्टरों ने बेटे के इलाज के लिए 15 लाख  रुपये का खर्चा बताया है। काफी भागदौड़ करने के पश्चात बच्चे के बोन मेरो ट्रान्सप्लांट के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय, कोल इंडिया तथा मुख्यमंत्री कोष से 15 लाख की व्यवस्था तो हो गई है, लेकिन ऑपरेशन के पश्चात लगने वाले 5 लाख रुपये के लिए दोनों परेशान हैं। तपती धूप में संवेदनशील दानदाताओं की चौखट पर दस्तक देते फिर रहे हैं। उन्हें यकीन है कि विधाता उनके साथ नाइंसाफी नहीं होने देंगे। 

    छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहती हैं, सुदर्शना। वर्षों से कैंसर मरीजों के सेवा में लगी हैं। कैंसर के मरीजों की जानलेवा पीड़ा से अच्छी तरह से वाकिफ सुदर्शना का जब उन माताओं के निकट जाना हुआ जो सर्वाइकल कैंसर से जूझ रही हैं, तो उन्होंने खुद में और उनमें एक अंतर महसूस किया। वह था बालों का। उनके सिर के बाल कैंसर की वजह से गायब हो गये थे। ऐसे में सुदर्शना ने अपने बाल भी कटवा दिए, ताकि महिला मरीजों को उनके साथ अपनापन महसूस होता रहे। 

    बच्चे बड़े होकर अपने पैरों पर खड़े होते ही गिरगिट की तरह अपना रंग बदल लेते हैं। उन्हें अपने माता-पिता के वो दिन विस्मृत करने में देरी नहीं लगती, जिनकी वजह से उन्हें बुलंदियों को छूने का मौका मिलता है। अपनी संतान के लिए कुछ भी कर गुजरने वाले मां-बाप को पछतावे की आग में झुलसते देख बहुत पीड़ा होती है। गुस्सा भी आता है। तय है कि इस पर माथा खपाने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। जिसकी जैसी फितरत है, वह वही करता है। हम और आप उसे बदल नहीं सकते, लेकिन मां-बाप तो मां-बाप हैं, जो कभी नहीं बदलते। क्या आपने भी यह खबर पढ़ी है, जिसे मैं तो भूल ही नहीं पा रहा हूं...। 

    ‘‘बिहार के हाजीपुर के निवासी साहनी दंपति के 11 और 14 साल के बच्चे घर से खेलने के लिए निकले थे, लेकिन शाम तक वापस घर नहीं लौटे। बच्चे पहले भी इधर-उधर जाते थे, लेकिन कुछ ही देर के बाद लौट आते थे। मां-बाप ने कुछ घंटों तक उनकी राह देखी। फिर उनकी तेजी से तलाश प्रारंभ कर दी। उनके मित्रों से पूछा-पाछा, रिश्तेदारों तथा करीबियों के यहां भी फोन घुमाया, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। थक-हार कर दोनों पुलिस की शरण में पहुंचे। पुलिस की मांग पर उन्होंने अपने बच्चों की तस्वीरें भी थमा दीं। पुलिस के उच्च अधिकारी ने गंभीरता से खोजबीन करने के आश्वासन के साथ उन्हें घर वापस भेज दिया। जैसे-तैसे दोनों ने रात काटी। सुबह होते ही थाने जा पहुंचे। वहां पर विराजमान खाकी वर्दीधारी ने उन्हें देखते ही कहा, ‘‘अभी तो कुछ ही घंटे हुए हैं। हम हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे हैं। हमारी भागदौड़ जारी है। आप धैर्य रखें। ऐसे मामलों में जल्दबाजी अच्छी नहीं होती।’’ दोनों निराश मन से वहां से चल दिए। तीसरे दिन भी उन्हें यह कहकर चलता कर दिया गया कि कुछ तो सब्र करें। जल्द ही बच्चों के मिलने की सुखद खबर आपको सुनने को मिलेगी। 

    आज-कल, आज-कल करते-करते कई हफ्ते बीत गये, लेकिन उन्हें झूठी तसल्ली ही मिली। आखिरकार निराश और हताश मां-बाप ने खुद ही बच्चों को खोजने का निश्चय किया। अपने गुमशुदा बेटों की तलाश में उन्होंने महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गोवा, बिहार के साथ-साथ पड़ोसी देश नेपाल की सड़कों तथा गली कूचों की खाक छान मारी, लेकिन कहीं कोई सुराग नहीं मिला। मध्यप्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में किसी भले आदमी ने उन्हें भिखारी का भेष धारण कर बच्चों को तलाशने की सलाह दी। दोनों ने तुरंत फटे-पुराने वस्त्र धारण कर बिना किसी संकोच के भिखारी का भेष धारण कर लिया। दोनों पढ़े-लिखे हैं। बच्चों का अपहरण करने के बाद उन्हें अपंग बना भिक्षा मंगवाने को विवश करने वाले बेरहम गिरोहों के बारे में उन्होंने कई डरावनी खबरें पढ़ रखी थीं। दोनों ने भिखारियों के साथ उठना-बैठना और भीख मांगना प्रारंभ कर दिया। मैले-कुचैले बदबूदार पहनावे में कभी मंदिर, कभी मस्जिद तो कभी गुरुद्वारे के आसपास घूमने लगे। कुछ दिनों तक भिखारियों के साथ घुलमिल रहते-रहते उन जगहों की जानकारी भी हासिल कर ली, जहां बच्चों को भिक्षा मांगने के तौर तरीके सिखाये जाते हैं। इसी दौरान उन्हें किसी जन्मजात भिखारी ने सुझाव दिया कि वे राजस्थान के बीकानेर में स्थित शनि मंदिर जाएं। वहां पर बच्चे मिल सकते हैं। दोनों तुरंत भागे-भागे वहां जा पहुंचे। तीन दिन तक भूखे-प्यासे भटकते रहे। चौथे दिन सुबह-सुबह मंदिर के बाहर लगी भिखारियों की भीड़ में हाथ में कटोरा लिए उन्होंने अपने बड़े बेटे को देखा तो दहाड़ मार कर रो पड़े। वहीं से उन्हें छोटे बेटे के हावड़ा में होने की जानकारी मिली। तीनों महीने भर तक पागलों की तरह हावड़ा की खाक छानते रहे। अंतत: मेहनत रंग लायी। छोटा बेटा भी महानगर के भीड़-भाड़ वाले चौराहे पर भीख मांगता मिल गया। कई महीनों तक हाथ में कटोरा लेकर भटके मां-बाप अपने दोनों दुलारों को साथ लेकर जब घर लौटे तो पूरे मोहल्ले के स्त्री-पुरुषों तथा बच्चों ने उनका सत्कार किया और फटाके फोड़कर दिवाली मनायी।

Thursday, May 16, 2024

देशी, विदेशी ठग

    यह सतर्क होने का वक्त है। सोने का नहीं जागने का समय है। किस्म-किस्म के धोखे करने वाले हमारे आसपास विद्यमान हैं। ठगों और लुटेरों ने अपने तौर-तरीके बदल लिये हैं। अखबारों तथा न्यूज चैनलों पर लुभावने विज्ञापन देकर नकली खाद्य पदार्थ, दवाएं, टॉनिक, सौंदर्य प्रसाधन आदि खपा कर भारतीयों की जेबें साफ करने के साथ-साथ उन्हें बीमार किया जा रहा है। इस लूटमारी के कुचक्र में देशी और विदेशी कंपनियां मौत के सौदागर की सशक्त भूमिका में हैं। रंग-बिरंगे पैकेटों में भरे खाद्य पदार्थ कितने फायदेमंद है, गुणवता की कसौटी में कितने खरे हैं, इसकी चिंता और खोज-खबर मां-बाप ने भी लेनी बंद कर दी है। पिछले दिनों राजस्थान के गुलाबी शहर जयपुर में एक 14 वर्षीय किशोर की हार्ट अटैक की वजह से मौत हो गई। पंजाब के पटियाला में केक खाते ही दस वर्ष का बच्चा चल बसा। मोबाइल देखते-देखते एक बच्चे को दिल का ऐसा दौरा पड़ा कि डॉक्टरों के सभी प्रयास धरे के धरे रह गये। दिल्ली में एक पंद्रह वर्ष की लड़की, जिसे मोबाइल पर गेम खेलने की लत थी उसने भी दिल का दौरा पड़ने पर मौत का दामन थाम लिया। ऐसी अनेकों खबरें हैं, जो यह बता रही हैं कि स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक आहार की वजह से कम उम्र के बच्चे मौत का निवाला बन रहे हैं।

    व्यापारी, कारोबारी को तो अपना माल बेचना ही है। उसके लिए डिब्बा बंद जूस, चाकलेट, पिज्जा, कोल्डड्रिंक्स, विभिन्न प्रोटीन सप्लीमेंट कमायी के साधन हैं। नैतिकता और ईमानदारी भी अधिकांश धंधेबाजों के शब्दकोष में शामिल नहीं है। सतर्क तो उपभोक्ता को होना है। लेकिन उनके पास समय का अभाव है। उनके पास यह जांचने का भी वक्त नहीं है कि वे अपने बच्चों को जो पिला-खिला रहे हैं उससे कितना फायदा और नुकसान है। उन्हें तो अपने बच्चे के मोटापे में भी खुशी और तसल्ली का अहसास होता है। लोग भी मोटे बच्चों को खाते-पीते घर की निशानी कहकर उनका उत्साहवर्धन करते हैं,  लेकिन जब उनका खाता-पीता बच्चा एकाएक चल बसता है तो माथा पीटने के सिवाय उनके पास कोई चारा नहीं रहता। घर में ताजा फलों का जूस बनाने की बजाय डिब्बाबंद फलों के रस को असली फलों का रस समझने वालो की बढ़ती जमात को नकली,विदेशी सामान जितने आकर्षित करते हैं, उतने स्वदेशी नहीं।

    स्वदेशी की अवहेलना और विदेशी का सम्मान कितना नुकसान पहुंचा रहा है, इसका आकलन करने का किसी के पास समय नहीं है। मेरे प्रिय पाठक मित्रों को याद होगा कि कुछ वर्ष पूर्व विदेशी मैगी में हानिकारक सीसा होने की खबरों ने खासी हलचल मचायी थी। कई दिनों तक खूब शोर-शराबा मचा था, फिर विदेशी कंपनी नेस्ले की मैगी धड़ाधड़ बिकने लगी थी। इस बीच भारत के शातिर योग गुरू और धूर्त कारोबारी रामदेव बाबा ने स्वदेशी मैगी बाजार में उतार कर जमकर चांदी काटी थी। इसी नेस्ले के शिशु आहार सेरेलैक को लेकर इन दिनों शिकायतों का अंबार लगा है। 

    अपने देश भारत में प्रतिवर्ष बीस हजार करोड़ रुपये की सेरेलैक की खपत हो जाती है। सेरेलैक की सूक्ष्मता से जांच के बाद यह सच सामने आया है कि इसमें चीनी का मात्रा तय सीमा से काफी ज्यादा है। भारतीय बच्चे मीठे की लत के शिकार हो रहे हैं। मोटापा तथा अन्य गंभीर बीमारियां जकड़ रही हैं। चिंतित तथा परेशान करने वाला सच यह भी है कि यूरोपीय देशों में जो सेरेलैक भेजा जाता है उसमें चीनी बिलकुल नहीं होती, लेकिन भारत, बांग्लादेश तथा अन्य एशियाई व अफ्रीकी देशों में बेचे जाने वाले सेरेलैक की हर खुराक में तीन ग्राम से अधिक चीनी के होने का पर्दाफाश हुआ है। बच्चों को टॉनिक की जगह जहर पिलाने वाली नेस्ले अपने देश स्विट्जरलैंड में भी जो सेरेलैक बेचती है उसमें चीनी नहीं मिलाती। अधिक मीठा खाने के कारण बच्चों को दिल की बीमारी, मुंहासे, पाचन संबंधी समस्याएं, डिमेशिया और किडनी संबंधी बीमारियों के होने का निरंतर खतरा बढ़ रहा है। मीठा वो धीमा ज़हर है जो कम उम्र में मधुमेह, उच्च रक्तचाप के साथ-साथ दांतों में सड़न तथा अवसाद का भी जन्मदाता है। नेस्ले के लगभग 150 उत्पाद पूरी दुनिया में बेचे जाते हैं। 

    विदेशों में तो जैसे ही कोई गलत रिपोर्ट आती है तो उस उत्पाद पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया जाता है। वहां की जांच एजेंसियां सदैव सतर्क रहकर खाद्य एवं पेय पदार्थों की निगरानी करती हैं। इतना ही नहीं वहां पर तो हर नियम-कायदे का सख्ती से पालन किया जाता है। किसी को भी बख्शा नहीं जाता। भारत में सेटिंग का चलन कुछ ऐसा है कि बड़े-बड़े अपराध और अपराधी रिश्वत एवं संबंधों के दबाव की बदौलत बच जाते हैं। उन्हें कब क्लीनचिट दे दी जाती है, लोगों को खबर ही नहीं होती। विदेशों में सेहत के साथ किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाता। विभिन्न मसालों के लिए पूरे विश्व में भारत का बड़ा नाम है। दुनिया भर के देशों में यहां से मसाले निर्यात किये जाते हैं। हाल ही में हांगकांग और सिंगापुर में जांच में जब भारतीय मसालों में एथिलीन आक्साइड नाम का रासायनिक कैंसर कारक तत्व पाया गया तो दोनों देशों ने तुरंत प्रतिबंध लगा दिया। हानिकारक आहार के साथ-साथ नकली दवाएं भी भारतवासियों की शत्रु बनी हुई हैं। कुछ हफ्ते पूर्व देश की राजधानी दिल्ली, गुरुग्राम, मेरठ आदि में करोड़ों की नकली दवाओं का जखीरा पकड़ में आया। अखबारों तथा न्यूज चैनलों में भ्रामक विज्ञापन देकर गलत दवाओं को बाजार में खपाने में बाबा रामदेव भी काफी कुख्यात हैं। योग के माध्यम से देश-विदेश में अपनी पहचान बनाने वाले इस बाबा ने आंखों में धूल झोंकने की कलाकारी में भी अभूतपूर्व महारत हासिल कर ली है। कोरोना काल में रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद ने थोथा दावा किया था कि उनके प्रोडक्ट ‘कोरोनिल’ और ‘स्वसारी’ से कोरोना का इलाज किया जा सकता है। उनकी बनायी दवाएं जितनी उपयोगी और असरकारी हैं, उतनी दूसरी दवाएं कतई नहीं। एलोपैथी वाले तो बस लूटमार ही करते हैं। करोड़ों भारतीयों ने बाबा के विज्ञापनों, दावों पर यकीन कर ‘पंतजलि’ की दवाओं को आंखें बंद कर खरीदा, लेकिन उन्हें इनका कोई फायदा नहीं हुआ, लेकिन बाबा ने तो छल-कपट के मायाजाल से करोड़ों रुपये अंदर कर लिए। बाद में कई प्रबुद्ध लोगों ने शिकायतें कीं। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने सुप्रीम कोर्ट में पंतजलि आयुर्वेद के विज्ञापनों को भ्रामक बताते हुए याचिका दायर कर दी, लेकिन रामदेव खुद की दवाओं को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए एलोपैथी दवाइयों के खिलाफ विज्ञापनबाजी करते रहे। सुप्रीम कोर्ट ने यदि बाबा रामदेव की मनमानी और काम करने के तरीके पर गंभीरता से ध्यान देकर फटकारा नहीं लगायी होती तो उसकी ठगी की दुकान की रौनक सतत बरकरार रहती। हां, कोर्ट ने यह भी कहा कि रामदेव ने योग के क्षेत्र में यकीनन अच्छा काम किया है, लेकिन एलोपैथी चिकित्सा पद्धति की बेवजह आलोचना करना अनुचित है।

Thursday, May 9, 2024

रंग-बिरंगे नकाब

    दो आशिक मिजाज मित्र शहर के आलीशान होटल के बार में रसरंजन कर रहे थे। उनका किसी जरूरी काम से अमरावती से नागपुर आना हुआ था। सदर में स्थित होटल अशोका का बड़ा नाम है। मांसाहारी, शाकाहारी, लजीज भोजन तथा पीने-पिलाने के शौकीनों को यहां का वातावरण खासा रास आता है। पैग पर पैग चढ़ाते दोनों मित्रों ने होटल में प्रवेश करते ही उन दो महिलाओं को देख लिया था जो भोजन करने के इरादे से वहां आयी थीं। इसलिए दोनों ने ऐसी सीट चुनी थी, जहां से खूबसूरत महिलाओं का दीदार होता रहे। इत्मीनान से भोजन करती महिलाओं को दोनों पुरुष सड़क छाप मजनूओं की तरह घूर रहे थे और वे उन्हें नजरअंदाज कर रहीं थीं। शहर के पुराने नामी होटल में सुकून से भोजन करने आयीं दोनों महिलाओं को रह-रह कर गुस्सा आ रहा था। चप्पल और तमाचों से अच्छी तरह से धुन देने की उनकी इच्छा भी हो रही थी, सब्र का दामन थामे रहीं। बिगड़े रईसों की अश्लील इशारेबाजी चलती रही। महिलाएं जल्दी-जल्दी भोजन कर उठ खड़ी हुईं। बाहर निकल कर जब वे कार में बैठीं तो वे मनचले भी उन्हें अपने करीब आते नज़र आए। तब भी उन्हें बहुत गुस्सा आया। फटकारने की भी इच्छा हुई, लेकिन तमाशा खड़ा करने की बजाय चुपचाप कार में बैठकर वहां से चल दीं।

    दोनों रंगीन मिजाज बदमाशों ने अपनी बिना नंबर वाली कार उनकी कार के पीछे दौड़ानी प्रारंभ कर दी। इस दौरान उन्होंने उनकी कार को रोकने का भी भरसक प्रयास किया। लगभग चार किमी तक उनका पीछा जारी रहा। जब महिलाओं की कार एक अपार्टमेंट पर रुकी तब भी वे अश्लील इशारेबाजी करने से बाज नहीं आए। ऐसे बदचलन लफंगों को अकेले मॉल में शापिंग करने, होटलिंग करने तथा आजादी के साथ सैर सपाटा करने वाली नारियां चरित्रहीन लगती हैं। इसलिए उन्हें अपने जाल में फांसने की तिकड़में लगाते हुए नीचता की सभी हदें पार करने से बाज नहीं आते। घर पहुंच कर महिलाओं ने राहत की सांस ली। दरअसल इन दोनों महिलाओं में से एक के पति शहर पुलिस विभाग में आला अधिकारी हैं। अधिकारी की पत्नी अपनी पुरानी सहेली के संग अच्छे सुखद माहौल में भोजन तथा बातचीत करने के इरादे से गईं थीं, लेकिन बिगड़े मनचले रईसों ने उनका वहां इत्मीनान के साथ बैठना मुश्किल कर दिया। महिला ने बड़े दु:खी मन से अपने साथ हुई बदसलूकी की पूरी-पूरी जानकारी अपने पति महोदय को दी तो उनका भी पारा चढ़ गया। दोनों आरोपी अपार्टमेंट के सीसीटीवी में कैद हो चुके थे। तड़के साढ़े चार बजे नागपुर की पुलिस ने अमरावती में दोनों को गिरफ्तार कर लिया। दोनों बड़े कारोबारी हैं। एक का अमरावती में अच्छा-खासा होटल है तो दूसरा फायनांस का काम करता है। होटल वाले का पाकिस्तान कनेक्शन भी सामने आया है। उसके बैंक खातों में पाकिस्तान से फंडिंग होने की जानकारी सामने आने से इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) ने भी अपना शिकंजा कस दिया है। यह शख्स सन 2000 में पाकिस्तान से अमरावती आया था। इसके माता-पिता अभी भी पाकिस्तान में रहते हैं। एक भाई भी है जो पाकिस्तान में संत का चोला धारण कर उपदेशक बना घूमता है और यह भारत में पता नहीं कैसे-कैसे शैतानी गुल खिलाता घूम रहा है।

    छोटी और घटिया सोच रखने वाले आदमी के पास जब पैसा आता है, लोग उसे जानने लगते हैं, नाम हो जाता है। तो उसकी रंगत बदल जाती है। नये-नये शौक उसे आकर्षित करने लगते हैं।  बहुतों को याद होगा कि बीते वर्ष उज्जैन में बलात्कारियों की हवस का शिकार हुई एक बारह वर्षीय बालिका सड़क पर मदद की भीख मांगती भटक रही थी। किसी सभ्य शहरी ने सहायता का हाथ नहीं बढ़ाया था। तब आश्रम का एक पुजारी उसके लिए मसीहा बन सामने आया था। उसने बच्ची पर अपना वस्त्र ओढ़ा कर अस्पताल पहुंचाया था। ईश्वर की तरह अवतरित हुए परोपकारी, मददगार पुजारी की हर किसी ने प्रशंसा की थी, लेकिन वो उसका असली चेहरा नहीं था। उसका असली चेहरा तो अभी हाल में सामने आया है। तीन नाबालिग लड़कों के यौन शोषण के संगीन आरोप में पुलिस ने उसे हथकड़ियां पहना दी हैं। कलम चलाते-चलाते एकाएक मुझे निदा फाज़ली का यह शेर याद हो आया है, ‘‘हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी,  जिसको भी देखना हो कई बार देखना’’...लेकिन यह भी सच है कि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें कई-कई बार देखो, कितने भी करीब से देखो, लेकिन उनकी समग्र पहचान सामने नहीं आ पाती। बहुत कुछ छिपा और दबा रह जाता है। यह चालाकी, धूर्तता और नकाबपोशी भारत के अधिकांश राजनेताओं के चरित्र में रची-बसी है। पाप का घड़ा भरने के बाद जब कभी इनका पर्दाफाश होता है तो लोग हतप्रभ रह जाते हैं।

    देश के प्रदेश कर्नाटक के युवा सांसद प्रज्वल रेवन्ना  और उनके पिता एचडी रेवन्ना पर ऐन लोकसभा चुनाव के बीच संगीनतम यौन शोषण के आरोपों ने पूरे देश में तहलका मचा कर यह संदेश भी दे दिया है कि जिन सांसदों, विधायकों, मंत्रियों, संत्रियों पर महिलाओं के संरक्षण की जिम्मेदारी है, वे ही जन्मजात व्याभिचारी और बलात्कारी हैं। देशवासियों एक से एक सेक्स स्कैंडल से रूबरू होते आये हैं, लेकिन एसी खबर पहली बार सुनी जानीं, जिसमें बाप और बेटे के बीच कोई पर्दा नहीं। दोनों ऐसे देह भोगी हैं जिन्हें एक साथ एक ही नारी के साथ बिस्तरबाजी करने में कोई लज्जा और संकोच नहीं। हमने तो अभी तक यही देखा-सुना था कि वासना के खेल में पिता और बेटे के बीच मर्यादा का पर्दा होता है। संस्कृति और संस्कार का भी यही तकाजा है, लेकिन भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के नीच  बेटे और पोते के यौनाचार वाले 2976 वीडियोज वायरल होने से देश और दुनिया को पता चल गया है कि भारत की राजनीति में कैसे-कैसे भूखे भेड़ियों ने जनसेवा की बजाय अंधी वासना का तांडव मचा रखा है। इन सफेदपोश बलात्कारियों के वीडियो बाहर नहीं आते तो यह शर्मनाक सच रंगीन नकाब में ढंका रह जाता। एक बीस वर्षीय युवक को उसके दोस्त ने बताया कि एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें उसकी मां को रस्सी से बांधा गया है और सांसद प्रज्जवल उनसे दुष्कर्म कर रहा है। युवक ने जब इस वीडियो को देखा तो उसके दिमाग की नसें फट गईं। उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, लेकिन वह मां की अस्मत लुटने की पीड़ा और सदमे से  अभी तक बाहर नहीं आ पाया है। ऐसे हजारों लोग हैं, जिनकी मां, बहनें वहशी बाप-बेटे की दरिंदगी की शिकार हुई हैं।

Thursday, May 2, 2024

आंख मूंदकर मतदान!

    नागपुर शहर के धरमपेठ में स्थित है, ट्रैफिक पार्क चौक। भीड़-भाड़ वाले इस चौक पर लोकसभा चुनाव की वोटिंग के चंद दिन बाद लगाया गया होर्डिंग आते-जाते हर शख्स के आकर्षण का केंद्र बना रहा। मतदान से मुंह चुराने वाले मतदाताओं को लताड़ लगाते इस होर्डिंग में ‘शेम ऑन यू’ लिखकर उन पर तीखा वार किया, जिन्होंने लोकतंत्र के महापर्व का अपमान किया। लेकिन क्या उन पर कोई असर हुआ? ध्यान रहे कि नागपुर लोकसभा क्षेत्र में लगभग 22 लाख मतदाता हैं, लेकिन दस लाख पंद्रह हजार मतदाता वोट देने ही नहीं गये। कई घरों में दुबके रहे तो अनेकों छुट्टी मनाने के लिए शहर से दूर चले गये। सर्वधर्म समभाव और एकता के प्रतीक नारंगी नगर के माथे पर यकीनन कलंक जैसी है यह लापरवाही। सजग शहरवासी इस होर्डिंग को लगाने वाले की जहां प्रशंसा करते रहे वहीं प्रशासन को इसकी सजीली और नुकीली शब्दावली इस कदर आहत कर गई कि उसने इसे हटाने में चीते सी फुर्ती दिखायी। वोटर लिस्ट में भारी पैमाने पर हुई गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को मिर्ची लगने की चर्चा गली-कूचों, चौक-चौराहों पर जोर पकड़ती रही। यह भी बेहद चौंकाने वाली हकीकत है कि अकेले नागपुर लोकसभा क्षेत्र में करीब ढाई लाख मतदाता सूची से नाम कटने, इधर-उधर होने या नाम में गड़बड़ी होने के कारण वोट करने से वंचित रह गए। 

    हिंदुस्तान के निर्वाचन आयोग ने सुनियोजित तरीके से मतदान कराने के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखी। ऐसे-ऐसे दुर्गम स्थानों पर कर्मचारियों को भेजा, जहां हट्टे-कट्टे लोग जाने से घबराते हैं। जिन स्थानों पर पांच-सात मतदाता हैं वहां पर भी ईवीएम की मशीनों के साथ कर्मचारियों को भिजवाया और काम पर लगाया गया। 

    यह बताने की जरूरत नहीं होने के बावजूद भी लिखना पड़ रहा है कि अपने देश भारत में चुनावों की अपार अहमियत है। अपने मताधिकार का उपयोग कर सरकार चुनी जाती है। हर पांच साल में होने वाले लोकसभा चुनाव का सजग मतदाताओं को बेसब्री से इंतजार रहता है। इन चुनावों की प्रक्रिया में जो अरबों रुपये खर्च होते हैं। उनसे अनेकों विकास कार्य संपन्न किये जा सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र में चुनाव की जरूरत और प्राथमिकता सर्वोच्च स्थान रखती है। 

    गौरतलब है कि 2024 को इस लोकसभा चुनाव में 1 लाख 20 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की एक रिपोर्ट में यह अनुमान लगाया गया है कि 2024 के चुनावों का खर्च 2019 में हुए लोकसभा चुनावों की अपेक्षा दोगुना होगा। 2019 के चुनाव में कुल खर्च तकरीबन 55 से 60 हजार करोड़ था। कितने आश्चर्य की बात है कि चुनावी खर्च सतत तो बढ़ रहा है, लेकिन मतदान करने वाले भारतीयों की संख्या में बढ़ोतरी की बजाय कमी हो रही है। वो भी तब जब नये वोटरों की संख्या में जबरदस्त इजाफा हो रहा है। चुनावों में खर्च होने वाला धन अंतत: देशवासियों का ही है, जिसकी कमी की वजह से करोड़ों भारतीय विभिन्न अभावों से जूझ रहे हैं। गरीबों तथा अमीरों के बीच की असमानता दिन-ब-दिन बढ़ती चली जा रही है। मतदान की अवहेलना या मतदान में सजगता नहीं बरतने का खामियाजा भी अंतत: देशवासियों को ही भुगतना पड़ता है। 

    खामियाजा तो मतदाताओं की और भी कई गलतियों का देश को सतत भुगतना पड़ रहा है। भ्रष्टाचारी, बलात्कारी, हत्यारे और किस्म-किस्म के माफिया चुनाव लड़ते हैं और जीत जाते हैं। राजनीतिक दलों के अधिकांश कर्ताधर्ता उन्हीं को चुनाव मैदान में उतारते हें जो येन-केन-प्रकारेण विजयी होने का चमत्कार दिखाने में सक्षम होते हैं। 950 करोड़ रुपये का चारा घोटाला कर बार-बार जेल जाने वाला इस सदी का सबसे भ्रष्ट नेता लालूप्रसाद यादव अपने पूरे खानदान के साथ छाती तानकर वोट मांगने पहुंच जाता है। सजायाफ्ता होने पर अपनी अनपढ़ पत्नी को मुख्यमंत्री बना देता है। उसका कम पढ़ा-लिखा छोटा बेटा बिहार का उपमुख्यमंत्री बन जाता है। बड़ा बेटा जो चपरासी बनने के काबिल नहीं वह मंत्री पद का सुख भोगते हुए करोड़ों शिक्षित युवकों को अपना माथा पीटने को विवश कर देता है। यहां तक कि उसकी बेटियां भी सांसद बनकर करोड़ों-अरबों की दौलत के साथ इठलाती, गाती-नाचती नज़र आती हैं। यह अनोखा नाटक और नज़ारा उन मतदाताओं की देन है जो मतदान करते वक्त जाति और धर्म की सोच की जंजीरों में जकड़े रहते हैं। जिनके लिए लूट-खसोट और भ्रष्टाचार कतई कोई अपराध नहीं। आंख मूंदकर मतदान करने वालों की वजह से ही न जाने कितने खूंखार अपराधी विधायक और सांसद बनते देखे गये हैं। देश के आम आदमी को जब किसी अपराध की वजह से जेल जाना पड़ता है, तब शर्म के मारे उसे अपना मुंह छिपाना पड़ता है। अपने और बेगाने उससे दूरी बना लेते हैं। यहां तक कि उसके बाल-बच्चों को भी अपने निकट नहीं आने देते, लेकिन राजनीति के लुटेरों, हत्यारों, बलात्कारियों के गुनाहों को जनता बहुत जल्दी भूल जाती है। इसलिए राजनीति के चोर-उचक्कों को कभी शर्म नहीं आती। शर्म आती तो छाती तानकर मतदाताओं के यहां वोट लेने के लिए नहीं पहुंच जाते। चुनाव जीतने के बाद भ्रष्ट नेता छाती तान कर यह कहना-बताना और चेताना नहीं भूलते कि यदि हम जनता की निगाह में अपराधी होते तो वह हमें वोट ही क्यों देती। अदालत के द्वारा सजा देने से क्या होता है। लोकतंत्र में तो जनता की अदालत से ऊपर और कोई कोर्ट-कचहरी नहीं। 

    हाल ही में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की नाक के नीचे पच्चीस हजार शिक्षकों की भर्ती में जबरदस्त घोटाला हो गया। कलकता हाईकोर्ट ने सभी शिक्षकों की भर्ती रद्द कर दी। रिश्वत की मलाई चटाकर नौकरी हथियाने वालों के साथ-साथ उन पर भी आफत आन पड़ी, जिन्होंने कड़ी मेहनत के बाद नौकरी हासिल की थी। बड़े लंबे इंतजार के बाद उनके जीवन में स्थिरता आ पायी थी, लेकिन हाईकोर्ट के फैसले ने उनके पैरों की जमीन ही छीन ली। अपने परिवार के अकेले कमाने वाले कई लोगों को पड़ोसियों तक को अपना मुंह दिखाने में शर्मिंदगी महसूस हो रही है। नौकरी के दौरान उन्हें जो वेतन मिला था, वो खर्च हो गया। ऐसे में 12 फीसदी सूद के साथ सरकार को पैसे लौटाने के फैसले का पालन कर पाना उसके बस की बात नहीं है, लेकिन हमारे यहां तो अक्सर गेहूं के साथ घुन भी पिस जाता है। जिन्होंने गलत हथकंडे अपना कर नौकरी हथियायी, दरअसल सजा के तो वही हकदार हैं और हां उन नेताओं पर भी कोई आंच नहीं आयी जिन्होंने रिश्वत खाकर नालायक लोगों को शिक्षक बनाने का अक्षम्य संगीन अपराध किया है।

Thursday, April 25, 2024

गलत और सही

    गले में फूलों की माला, हाथों में मेहंदी, शानदार लिबास और खुशी से दमकता चेहरा। मतदान केंद्र पर एक नवविवाहिता को देखकर मतदाता हैरत में थे। कुछ ही घण्टों के पश्चात इस सजी-धजी दुल्हन को बारातियों के साथ नोएडा रवाना होना था। उसे जैसे ही पता चला कि आज वोटिंग है तो वह मतदान केंद्र पर दौड़ी-दौड़ी चली आई। बड़े इत्मीनान से अपने मनपसंद प्रत्याशी को वोट देने के बाद वह अपने पिया संग ससुराल चल दी। घर में जवान पति की मृतक देह पड़ी थी। अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही थीं। रिश्तेदार तथा अड़ोसी-पड़ोसी गम में डूबे थे। कल तक जो चल-फिर रहा था, हंस बोल रहा था आज लाश बना पड़ा था। ऐसे अत्यंत दुखद समय में मृतक की पत्नी और मां अपने मतदान के दायित्व को निभाने के लिए जब मतदान केंद्र पर पहुंची तो सभी उनके समक्ष नतमस्तक हो गये।

    आंबेडकरवादी समाज सेविका 17 अप्रैल को अचानक चल बसीं। सात समंदर पार विदेश में रहने वाला बेटा दूसरे दिन रात तक घर आ पाया। 19 अप्रैल को मृतका का सुबह मोक्षधाम में अंतिम संस्कार किया गया। उसके तुरंत बाद पति ने मतदान केंद्र की राह पकड़ी और अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इस आदर्श भारतीय पति ने कहा कि उसने लोकतंत्र के महायज्ञ में अपने मत की आहूति देकर अपनी राष्ट्रप्रेमी पत्नी को सच्ची श्रद्धांजलि दी है...।

    लोकसभा चुनाव 2024 के पहले चरण में अनेकों युवाओं, महिलाओं तथा बुजुर्गों ने गर्मी की तपिश की बिना कोई चिंता और परवाह किए मतदान किया। दिव्यांगों तथा उम्रदराजों ने भी लोकतंत्र के महापर्व में अपनी सार्थक हिस्सेदारी निभायी, लेकिन कई मतदाता मतदान से दूर रहे। नागपुर जैसे पढ़े-लिखों के शहर में मात्र 56 प्रतिशत मतदान का होना कई सवाल खड़ा कर गया। गड़चिरोली लोकसभा क्षेत्र जो नक्सलियों का गढ़ कहलाता है,  वहां शहरी इलाकों से ज्यादा मतदान होना भी बहुत कुछ कह और बता गया। मतदान से कन्नी काटने वालों के अपने-अपने तर्क और बहाने हैं। यह वही लोग हैं, जो सत्ताधीशों, नेताओं, प्रशासन और सरकारी नीतियों पर उछल-उछलकर उंगलियां उठाते हैं। महंगाई, बेरोजगारी और अव्यवस्था पर भी रह-रहकर तीर चलाते हैं। किसने देश को तबाह किया और कौन सा नेता भारत का कायाकल्प कर सकता है इस पर जहां-तहां लंबी-चौड़ी भाषणबाजी करने वालों को वोट देने से ज्यादा छुट्टी मनाने में ज्यादा आनंद आता है। 

    इसमें दो मत नहीं कि इस बार के चुनावी माहौल में पहले सा रोमांच, उत्साह नज़र नहीं आ रहा हैं। 2014 में जो युवा मतदान के लिए उमड़ पड़े थे, मोदी... मोदी चिल्ला रहे थे, इस बार वे भी खास उत्साहित नहीं नज़र आ रहे। खाता-पीता मध्यवर्ग तथा उच्च वर्ग शुरू से ही मतदान के लिए बाहर निकलने से कतराता आया है। वह किस्मत और संबंधों का धनी है। जोड़-तोड़ की सभी सुख-सुविधाएं उसकी मुट्ठी में हैं। इसलिए वह अपने आप में मस्त है। झटके से रईस बने रईसों ने लोकतंत्र का सम्मान करना ही नहीं सीखा। शासन और प्रशासन मतदाताओं को जागृत करने के लिए सतत अभियान चलाता रहता है, लेकिन उस पर कम ही लोग ध्यान देते हैं। यह भी कम हैरानी की बात नहीं कि इस बार प्रशासन की लापरवाही की वजह से भी हजारों-हजारों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में से गायब हो गये। नागपुर शहर के रविंद्र व मीनाक्षी बड़े जोशो-खरोश के साथ मतदान केंद्र पहुंचे तो उनका नाम ही नदारद था। दोनों के नाम ही बदल गये थे। पति रविंद्र का नाम अयूब खान तो पत्नी मीनाक्षी का नाम रजिया बेगम मिर्जा कर दिया गया था। दोनों ने पहचान पत्र व इपिक नंबर के आधार पर वोट डालने की बार-बार विनती की, लेकिन उन्हें निराश लौटना पड़ा। ऐसी पता नहीं कितनी भूलें और धांधलियां हुई होंगी। सभी घापे-घपले उजागर कहां हो पाते हैं। कम वोटिंग होने से उन प्रत्याशियों के चेहरों के रंग उड़ गये हैं, जिन्होंने चुनाव प्रचार में दिन-रात पसीना बहाया है। नोटों की थैलियां कुर्बान की हैं। पता नहीं कहां-कहां माथा टेका और नाक रगड़ी है। सत्ताधीशों के प्रति घोर अविश्वास तथा निराशा भी कम मतदान की वजह बनी। महिलाएं भी 2014 और 2019 की तरह मतदान करने नहीं पहुंचीं। उम्मीद से कम मतदान होने की और भी कई वजह बतायी-गिनायी जा रही हैं। अनेकों भारतीयों ने मान लिया है कि अपने देश के हालात जस-के-तस रहने वाले हैं। ज्यादा बदलाव की उम्मीद व्यर्थ है। बेरोजगारी के मारे करोड़ों युवा भी उम्मीद छोड़ चुके हैं। उन्हें बेहतरीन पुल, पुलिया, सड़कों, मेट्रो तथा वंदेभारत ट्रेनों की सौगात लुभा नहीं पायी। सच भी है... पहले रोजी-रोटी, घर-बार, स्वास्थ्य, शिक्षा और उसके बाद बुलेट ट्रेन और हवाई जहाज। बेरोजगारी और महंगाई ने करोड़ों देशवासियों की कमर तोड़ दी है, लेकिन कृपया यह भी याद रखें कि मतदान नहीं करने से आप वहीं के वहीं रह जाने वाले हैं। जिनसे आपको बदलाव की उम्मीद है उन्हें वोट जरूर करें। घूमने-फिरने, आराम करने के मौके तो रोज आएंगे, परंतु वोट देने और अपनी मनपसंद सरकार बनाने का अवसर तो पांच साल में सिर्फ एक ही बार मिलता-मिलाता है। गलती तो उन कुछ नेताओं की भी है, जो विषैले, बदजुबान और जबरदस्त अहंकारी हो गये हैं। जनता ने आंखें खोल रखी हैं। वह बहरी भी नहीं। सबकी सुनती है। सभी को तौलती है। बार-बार जांचती-परखती है। इसलिए राजनेताओं तथा शासकों को हिंदू-मुसलमान का राग गाने-बजाने से अब तो बाज आना ही चाहिए। उनकी सार्थक उपलब्धियां ही उन्हें वोट उपलब्ध करा सकती हैं। मतदाताओं को भटकाने और बरगलाने से तो वे खुद तमाशा बनकर रह जाने वाले हैं। यदि कोई मंत्री पुत्र किसी विशेष धर्म के चुनिंदा चेहरों के लिए आयोजित चुनावी सभा में यह कहने को मजबूर होता है कि आपसी सद्भाव के दुश्मनों को नहीं मेरे पिता के जनहित के विकास कार्यों के इतिहास को देखकर वोट दें, तो इसमें गलत क्या है?

Thursday, April 18, 2024

हर डर हो खत्म

     घी-गुड़-तिल की लाजवाब रेवड़ी की महक और मिठास में रचे-बसे मेरठ को ‘भारत के खेल शहर’ की पुख्ता पहचान मिली हुई है। वस्त्र, कागज, चीनी, रसायन, ट्रांसफार्मर के साथ-साथ विभिन्न उपयोगी दवाओं के निर्माण के लिए भी मेरठ खासा विख्यात है। दो पवित्र नदियों, गंगा और यमुना के बीचों-बीच में बसे मेरठ को तेजी से प्रगति करते शहर के रूप में भी पहचाना जाता है। जीवंत पत्रकारिता, एकता और आपसी सद्भाव भी इस शहर के आभूषण हैं। कालजयी टीवी धारावाहिक ‘रामायण’ में श्रीराम की अत्यंत प्रभावी भूमिका निभा चुके अभिनेता अरुण गोविल इसी आदर्श नगरी से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी को उनके विजयी होने का शत-प्रतिशत भरोसा है। अभिनेता भी पूर्णतया आश्वस्त हैं। भगवान श्रीराम और पीएम मोदी की छवि हर हाल में नैय्या पार करवाएगी। महिला मतदाताओं के लिए तो भाजपा प्रत्याशी अरुण गोविल सचमुच के राम हैं। माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान की मनोहरी छवि भी उनकी सुध-बुध में अंकित है। हाथ जोड़कर भीड़ का अभिवादन करते अरुण गोविल को कदम-कदम पर फूल-मालाएं पहनायी जाती हैं तो वे फूलों को महिलाओं की तरफ उछाल देते हैं। महिलाएं उन्हें माथे से लगा सहेजकर रख लेती हैं। उनके लिए यही प्रभु श्रीराम का आशीर्वाद और प्रसाद है। 

    मेरठ के लोकसभा क्षेत्र का संपूर्ण वातावरण भक्तिमय है। धूप-अगरबत्ती और फूलों की महक से महकते मेरठ में हिंदुओं के साथ-साथ मुसलमान मतदाताओं की भी अच्छी-खासी आबादी है। मेरठ की फिज़ा में सवाल गूंज रहे हैं कि क्या भाजपा के उम्मीदवार अरुण गोविल हर जाति-धर्म के मतदाता पर अपनी छाप छोड़ने में सक्षम होंगे? लोकसभा चुनाव कोई छोटा-मोटा चुनाव नहीं। दरअसल, यह तो लोकतंत्र का महापर्व है। किसी भी उत्सव की सार्थकता तभी होती है, जब उसे सभी खुले मन से मिलजुल कर मनाएं। मनमुटाव और दूरियां उत्सव को फीका कर देती हैं। अयोध्या में राम मंदिर बन चुका है। हर देशवासी की मनोकामना है कि देश में सही मायनों में राम राज्य आना चाहिए, जहां सभी धर्मों के लोग मिल जुलकर रहें। सबको समान व्यवहार और अधिकार मिलें। सभी को एक ही निगाह से देखा जाए। महिलाओं का भरपूर मान-सम्मान हो। अगर कोई देशद्रोही है तो वह सबका दुश्मन है। अरुण गोविल रामराज्य लाने का वादा कर रहे हैं। बिल्कुल वैसे ही जैसे हर प्रत्याशी चुनावों के अवसर पर करता है। पत्रकार मित्रों ने जय श्रीराम के नारे लगाते उत्साही युवकों से पूछा कि इस बार के चुनाव में मुख्य मुद्दा क्या है? तो उन्होंने तपाक से कहा कि मुद्दा तो बस एक ही है, जय श्रीराम। योगी और मोदी जिंदाबाद के नारे लगाती भीड़ की निगाह में अरुण गोविल तो जैसे साक्षात श्रीराम हैं, जिनकी मंद-मंद मुस्कुराहट उनके दिल-दिमाग में रच-बस सी गई है। अभिनेता अरुण गोविल ने कई वर्ष पूर्व एक साक्षात्कार में बताया था कि रामायण धारावाहिक के प्रसारण के पश्चात जब उन्होंने भारत से हजारों मील दूर विदेश की धरती पर कदम रखा तो वहां के स्त्री-पुरुषों ने उन्हें घेर लिया था। कोई उनके चरण छू रहा था तो कोई बुजुर्ग उनका माथा चूम रहा था। उन्हें यह समझने में किंचित भी देरी नहीं लगी कि यह तो भगवान श्रीराम के प्रति उनकी अपार आस्था है, जो इस रूप में प्रकट हो रही है। अपने उस साक्षात्कार में उन्होंने यह भी बताया था कि जब रामायण धारावाहिक का निर्माण हो रहा था तब उन्हें सिगरेट पीने की लत थी। वे छिप-छिपा कर अपनी नशे की तलब को पूरा कर लिया करते थे। कुछ वर्षों के पश्चात उन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर भी यह सोचकर सिगरेट पीनी प्रारंभ कर दी कि लोग इस सच से वाकिफ हैं कि वे सचमुच के राम नहीं हैं। अभिनेताओं का तो काम ही है कि किसी किरदार को साकार करना, जिससे लोग उनकी प्रशंसा करने को विवश हो जाएं। अभिनय अपनी जगह है और व्यक्तिगत जीवन अपनी जगह है। एक शाम किसी फाइव स्टार होटल में अरुण गोविल की सिगरेट पीने की इच्छा हुई तो उन्होंने होटल की लॉबी में तुरंत सिगरेट सुलगा ली। तभी एक बुजुर्ग महिला की उन पर नज़र पड़ गई। उसने रामायण सीरियल को कई बार देखा था। अपने भगवान श्रीराम को सिगरेट पीता देख उसे बहुत जबरदस्त धक्का लगा। उसने तुरंत उन्हें डांटना-फटकारना प्रारंभ कर दिया। ‘आपको पता भी है कि करोड़ों भारतीयों ने आपको भगवान का दर्जा दे रखा है और आप हैं कि सिगरेट पर सिगरेट फूंकते हुए उनकी आस्था से खिलवाड़ किये जा रहे हैं!’ महिला की फटकार की बुलंद आवाज की वजह से और भी कुछ लोग वहां जमा हो गये। सभी ने एकमत होकर उनकी जी भर कर थू...थू की। वो दिन था और आज का दिन है। अभिनेता ने सिगरेट को हाथ नहीं लगाया। यकीनन अच्छी छवि ही वो सीढ़ी होती है, जो शिखर तक पहुंचाती है। मान-सम्मान दिलवाती है। विद्वान व्यक्ति यदि चरित्रहीन है तो उसकी हर खूबी धरी की धरी रह जाती है। 

    राजनीति में तो स्वच्छ छवि ही अंतत: काम आती है। खोटे सिक्कों की दाल ज्यादा समय तक कहां गल पाती है...। बद और बदनाम चेहरों का काला सच उजागर हो ही जाता है। सर्वप्रिय राजनेता वही होता है, जो किसी एक का नहीं, सभी का होता है। किसी खास धर्म के मतदाताओं की बदौलत चुनाव जीतना कम-अज़-कम भारत में तो संभव नहीं। यहां मुद्दों की भरमार है। सांप्रदायिकता, भेदभाव, गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई ने करोड़ों भारतवासियों का जीना मुहाल कर रखा है। गरीब वर्षों पहले जहां खड़ा था, आज भी वहीं खड़ा है। राजनेताओं की पक्षपाती, रीति-नीतियों ने उसे मुख्यधारा में शामिल ही नहीं होने दिया है। अंतिम सच यही है कि जब तक पिटे-पिटे-लुटे-लुटे और डरे-डरे लोगों की नहीं सुनी जाती, उन्हें गले नहीं लगाया जाता, तब तक चुनावी उत्सव, उत्सव नहीं दिखावा और तमाशा है...।