मज़ाक-मज़ाक में शुरू किये गए छात्रों के हितकारी संगठन ने सरकार को नानी याद दिला दी। सुप्रीम कोर्ट की एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी से आहत होकर सात समंदर पार अमेरिका में बैठे अभिजीत दीपके नामक पढ़े-लिखे युवक ने सोशल मीडिया पर लिखा कि क्या होगा अगर सारे कॉकरोच एक साथ आ जाएं। अभिजीत के उपरोक्त चंद शब्द कुछ ही दिनों में उन करोड़ों युवाओं तक पहुंच गए, जो देश की लुंजपुंज शिक्षा व्यवस्था से खार खाये बैठे थे। न कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा, न ही कोई आलीशान दफ्तर बस सोशल मीडिया के मंच पर ही कॉकरोच पार्टी का विचार जन्मा और कुछ ही दिनों के बाद देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार और शिक्षा मंत्री के तुरंत इस्तीफे की मांग को लेकर उनका धरना प्रदर्शन प्रारंभ हो गया। शुरू-शुरू में तो छात्रों के आंदोलन को खास अहमियत नहीं दी गई। सभी को लगा कि यह नये-नवाड़े किस दम पर उस सरकार को अपना दम दिखा पायेंगे, जो अपनी ही मस्ती में चूर है। जैसे-जैसे दिन बीतते गये छात्रों की ज़िद और जुनून की हकीकत सोये हुए लोगों को जगाने लगी। उन भारतीयों ने भी अपने भ्रम के दायरे से बाहर निकलना प्रारंभ कर दिया, जिन्हें इस अनोखी पहल के शीघ्र ही पंगु हो जाने की उम्मीद थी। आंदोलन को प्रभावी बनाने और सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए देश के कोने-कोने से छात्रों के साथ अन्य लोग भी पहुंचने लगे। नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के मां-बाप तथा उनके परिजन भी उनके साथ आ खड़े हुए। लगभग बाइस छात्र-छात्राओं की आत्महत्या कोई छोटी-मोटी घटना तो नहीं थी। दिल्ली से प्रारंभ हुए छात्र आंदोलन की प्रभावी लहर को देश के अन्य शहरों और महानगरों तक पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा। महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर के संविधान चौक पर हजारों की तादाद में युवक-युवतियां शामिल हुए। इस प्रदर्शन में मध्यप्रदेश के मऊगंज जिले के मगनिया गांव की एक गमगीन मां नीलम चतुर्वेदी की उपस्थिति ने सभी को अत्यंत भावुक कर दिया। उनकी बेटी आकांक्षा चतुर्वेदी ने नीट पेपर लीक विवाद और री-एग्जाम की खबर के बाद अत्याधिक तनाव में होने के चलते आत्महत्या कर ली। नीलम चतुर्वेदी बताते-बताते फूट-फूटकर रोती रहीं।
इसी तरह से महाराष्ट्र के अहिल्यानगर की उन्नीस साल की छात्रा ने नीट री-एग्जाम में उम्मीद से कम अंक मिलने पर मौत को गले लगा लिया। दोबारा हुए पेपर में मात्र 11 नंबर से चूकने पर आहत हुई छात्रा ने अपने सुसाइड नोट में लिखा, ‘‘मेरा डॉक्टर बनने का सपना अधूरा रह गया। मेरे माता-पिता को दोष न दें।’’ इस छात्रा ने पूर्व में जो नीट परीक्षा का एग्जाम दिया था उसमें उसके पेपर बहुत अच्छे गये थे, लेकिन पेपर लीक होने की वजह से दोबारा पेपर तो दिया लेकिन कम अंक आने से डॉक्टर बनने का सपना धरा रह गया। गरीब माता-पिता को तो बच्चों को सफल होते देखने के लिए गहने तक बेचने पड़ते हैं। खेती-बाड़ी और घर तक खोना पड़ता है। जंतर-मंतर तथा विभिन्न शहरों मेें हुए छात्रों के आंदोलन में और भी कई माता-पिता शामिल हुए। उनका कहना था कि हमारा बेटा-बेटी तो अब नहीं रहे लेकिन हम नहीं चाहते कि भविष्य में किसी और की संतान को खुदकुशी करनी पड़े। सच तो यह है कि हमारे देश में लाखों विद्यार्थियों और उनके परिवारों के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं अग्नि परीक्षा जैसी होती हैं। परीक्षा मेंसफल होने के लिए छात्र भी जी-जान लगा देते हैं, लेकिन जब पेपर लीक हो जाता है या कोई और व्यवधान आ जाता है तो उनके अरमानों पर चोट पहुंचती ही है, तो कुछ छात्र खुदकुशी कर गुजरते हैं। परीक्षाओं में पेपर लीक होने, बेखौफ नकल चलने तथा अन्य अनियमितताओं के होने की जगजाहिर जानकारी से सभी सजग भारतीय वाकिफ हैं। लेकिन देश के स्थापित नेताओं और दलों ने इस समस्या के समाधान के लिए धरना आंदोलन की नहीं सोची! कॉकरोच जनता पार्टी ने हिम्मत और अभूतपूर्व पहल की और विख्यात गज़लकार दुष्यंत कुमार की चर्चित गज़ल की इन पंक्तियों को सार्थक कर दिखाया।
‘‘कौन कहता है, आसमां में सुराग नहीं हो सकता,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो’’
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और अन्य मांगे स्वीकार कर लिये जाने के बाद प्रदर्शन-आंदोलन समाप्त हो गया। इन पत्थरों के चलने-चलाने के बीच कुछ सत्तालोलुप शातिर नेताओं ने गर्म तवे पर अपने स्वार्थ की रोटियां पकाने की जो कोशिश की, उस पर भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है। लेकिन घिसे-पिटे खोटे सिक्कों पर कलम चलाकर अपना समय जाया करने का हमारा बिल्कुल मन नहीं है। लेकिन हां, पूरे देश में सूखी घास में लगी आग की तरह फैले कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को यकीनन हमेशा याद रखा जाएगा। सत्ताधीशों को किंचित भी अनुमान नहीं था कि भारतीय छात्रों का आंदोलन पूरे देश में फैलकर उनकी नींद हराम कर देगा। किशोरों और युवाओं के प्रतिनिधियों को आदर-सम्मान के साथ निमंत्रित कर बातचीत करनी पड़ेगी।
छात्रों के आंदोलन स्थल जंतर-मंतर तथा संसद मार्च में रिपोर्टिंग के लिए पहुंचे पत्रकारों, एंकरों को जिस तरह से विरोध झेलना पड़ा। मारपीट का शिकार होना पड़ा। उसके लिए इस आंदोलन को याद रखा जाएगा। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में यह स्पष्ट दिखाई देने लगा है कि अधिकांश न्यूज चैनल सरकार परस्त हो चुके हैं। ऐसा भी नहीं कि मीडिया की चाटूकार होने की यह शर्मनाक छवि एकाएक बनी है। दरअसल, जब से उद्योगपतियों, नेताओं और माफिया किस्म के घोर मतलबपरस्त ताकतवरों ने न्यूज चैनलों को शुरू किया या कब्जाया तब से स्थिति बिगड़ते-बिगड़ते एकदम बेकाबू हो गई। अब तो लगभग हर न्यूज चैनल पर किसी खास दल पार्टी, नेता, मंत्री और दमदार हस्ती का ठपा लगा नजर आता है। अधिकांश अखबार यानी प्रिंट मीडिया भी धनवान घरानों की गिरफ्त में छटपटा रहे है। ऐसे में यह तो तय है कि मालिक जो चाहेंगे वही होगा। वही ही तो हो रहा है। यह भी कहीं न कहीं सच है कि प्रिंट मीडिया की साख पर अभी तक उतना बट्टा नहीं लगा, जितना कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया लोगों की नज़रों से गिरा है। बुरी तरह बदनाम हो चुके चैनलों के मालिक तो जमीनी पत्रकारिता करने से रहे। उन्हें तो अपने वातानुकूलित कार्यालयों के आलीशान कमरों में बैठकर अपने अन्य धंधों से माया बटोरने से ही फुर्सत नहीं मिलती। उन्होंने मीडिया के क्षेत्र में पर्दापण ही इसलिए किया है, ताकि उनके काले-पीले अथाह कमाई वाले कारोबार बिना किसी रुकावट के चलते रहें। मीडिया उनके लिए सुरक्षा कवच है। जंतर-मंतर और संसद मार्ग में भी मालिकों की नौकरी बजाने वाले एंकर और संवाददाता ही लहूलुहान हुए। जाने-अनजाने हुड़दंगियों ने जीभर कर उन्हीं का जिस तरह से मज़ाक उड़ाया उससे उनके होश उड़ गए। बुरी तरह से निशाने पर आए उन चुनिंदा न्यूज चैनलों के मालिकों की समझ में भी आ गया कि अब उन्हें सरकार की जी हजूरी तथा सिर्फ और सिर्फ तारीफों की झड़ी लगाने की अपनी दाग़दार आदत से बाहर निकलना ही होगा।
एक जमाना था जब आम जनता मीडिया के चाल-चलन पर ज्यादा ध्यान नहीं देती थी। लेकिन अब वह अत्यंत सतर्क हो गई है। उसे अच्छी तरह से पता होता है कि कौन किसके इशारे पर जबरन सरकार का विरोध करने में लगा है और किसने मलाई खाने के लिए चम्मचागिरी का झंडा उठा रखा है। भारत तो बहुत बड़ा लोकतांत्रिक देश है। छोटे-छोटे देशों में भी जागृति आ चुकी है। बीते वर्ष पड़ोसी देश नेपाल में जेन जी के उग्र विरोध प्रदर्शन के दौरान सरकार के तलवे चाटने वाले वहां के प्रमुख नेपाली भाषा के एक अखबार के कार्यालय को आग से फूंक दिया गया था। आज के युवा शिगूफेबाजी और लफ्फाजी करने वालों की नस-नस से वाकिफ हो गये हैं। खासतौर पर भारत में तो हिंदू-मुस्लिम और मंदिर-मस्जिद के आधार पर विभाजन करने की राजनीति से तंग आ चुके हैं। उन्हें भेदभाव से चिढ़ है। वे बेरोजगारी से मुक्ति चाहते हैं। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में असमानता होने के कारण गरीबों की संतानें अशिक्षित रहने को विवश हैं। अधिकतर संपन्न परिवारों के बच्चों को डॉक्टर, कलेक्टर, इंजीनियर एवं अन्य उच्च पदों पर विराजमान होने के अवसर मिल रहे हैं। जबकि बिना किसी भेदभाव के सभी देशवासियों को उनकी मनपसंद शिक्षा को उपलब्ध कराना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
लाठीचार्ज और आंसू गैस को झेलते हुए भी जेन जी के मीम, रील्स और तरह-तरह के व्यंग्यात्मक वीडियो बनाने के बेफिक्री भरे अंदाज ने लोगों को आकर्षित किया। वहीं नई पीढ़ी की अलग सोच भी सामने आयी। अपवाद तो हर कहीं देखने में मिलते हैं, लेकिन अनुशासन, आपसी सहयोग, डिजिटल नेटवर्क व महिला सुरक्षा जैसे पहलुओं ने इसे पारंपरिक आंदोलनों से अलग बनाया। इस आंदोलन में एक नई पहल और भी देखी गई। देश-विदेश से समर्थकों ने स्विगी और जोमेटो जैसे प्लेटफार्म के जरिए भूखे-प्यासे छात्रों तथा उनके साथियों को भरपूर खाने-पीने का सामान, दवाइयां तथा अन्य जरूरत की चीजे सीधे प्रदर्शन स्थल पर भेजकर कहीं न कहीं उन शंकाओं और सवालों का निराकरण कर दिया कि घर-बार छोड़कर आये हजारों कॉकरोचों के पीछे कौन हैं। कुछ लोगों के अलग विचार हैं। उन्हें लगता है कि यह भारत सरकार को अस्थिर करने का सपना देखती ताकतों का सोचा-समझा षडयंत्र था। इस आंदोलन में बड़ी संख्या में युवतियों का मौजूद रहना उनकी जागृति और सार्थक सोच का परिचायक बना। लगभग सभी छात्राएं युवकों की भीड़ होने के बावजूद खुद को सुरक्षित पा खुश और संतुष्ट थीं। इसी एकता और मर्यादा का पालन करने के चलते अंत तक आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत डिजिटल माध्यम बना रहा। देश तथा विदेशों तक मीम्स, रील्स, लाइव स्ट्रीम, एक्स पोस्ट व इंस्टा अपडेटस के जरिए पल-पल की खबर पहुंचती रही। सामाजिक कार्यकर्ता, सच्चे गांधीवादी सोनम वांगचुक ने छात्रों के समर्थन में जंतर-मंतर पर 26 दिन तक अनशन का आंदोलन की गरिमा बढ़ाई। यह कहना गलत नहीं कि यदि 59 वर्षीय सोनम वांगचुक भूख हड़ताल नहीं करते तो जेन जी का यह आंदोलन विशाल और प्रभावी स्वरूप अख्तियार नहीं कर पाता। लेकिन फिर भी उनके महान योगदान पर सवाल उठाये गये। यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा तो अक्सर होता आया है.....

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