Friday, September 6, 2024

खबरदार करती खबरें

     प्रतिदिन की तरह पति-पत्नी  सुबह  की सैर पर निकले। रास्ते में पड़ने वाली गहरी नदी में दोनों ने एक साथ छलांग लगा दी। किसी राह चलते साहसी व्यक्ति ने नदी में डुबकी  लगाकर महिला को तो बचा लिया, लेकिन पुरुष पानी के बहाव के साथ बह गया। यह खबर जिसने पड़ी वह हतप्रभ रह गया। दोनों को मार्निंग वॉक का शौक था। अपने स्वस्थ के प्रति सतर्क थे। लंबा जीवन जीने की तमन्ना भी रही होगी, तो फिर ऐसे में दोनों ने यह हैरतअंगेज कदम क्यों उठाया? कई खबरें अपने साथ प्रश्न भी जोड़े रहती हैं। सभी के जवाब नहीं मिल पाते। संतान सुख से वंचित शंकालू पति ने पीट-पीट कर पत्नी की हत्या कर दी। हत्या के बाद वह उस के शव के पास घंटों गुमसुम बैठा रहा। मृतका के सिर के पास नारियल भी रखा था। ...कोलकाता में मेडिकल कॉलेज में हुए बलात्कार-हत्या के संगीन मामले को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी  मुर्मू ने कहा, देश में गुस्से का माहौल है। मैं स्वयं निराश और भयभीत  हूं। महिलाओं  के खिलाफ  होने वाले अपराधों के लिए कुछ लोगों द्वारा महिलाओं को वस्तु के रूप में देखने की मानसिकता जिम्मेदार  है। अपनी बेटियों के प्रति यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनके भय से मुक्ति पाने के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करें। अब समय आ गया है कि न केवल इतिहास का सीधे सामना किया जाए बल्कि अपनी आत्मा के भीतर झांका जाए और महिलाओं के खिलाफ अपराध की इस बीमारी की जड़ तक पहुंचा जाए।

    महाराष्ट्र के छत्रपति संभाली  नगर में महिला डॉक्टर ने अपने पति के आतंक और जुल्म की इंतिहा से उकता और घबरा कर खुदकुशी कर ली। उसने अपने सुसाइड नोट  में लिखा कि मेरी हार्दिक इच्छा है की मेरे पति मुझे चिता पर रखने से पहले कसकर गले लगाएं। जिस शैतान पति ने कभी चैन से जीने नहीं दिया। अच्छे-खासे जीवन को नर्क बना कर रख दिया उससे यह कैसी मांग? दुर्जन पति के प्रति मरते दम तक सहानुभूति रखने वाली यह नारी मेडिकल अधिकारी थी यानी आर्थिक रूप में सक्षम थी। दिन-रात गाली-गलौच और शंका करने वाले पति को उसके हाल पर छोड़कर नयी स्वतंत्र राह भी तो पकड़ी जा सकती थी। फांसी के फंदे पर झूल कर इसी पढ़ी-लिखी भारतीय नारी ने खुद को किसी सहानुभूति के लायक भी नहीं छोड़ा। 

    ‘‘महाराष्ट्र में  चौथी क्लास  की छात्रा से शिक्षक ने, तो सगी  बेटी से बाप ने किया बलात्कार।’’ कल्याण  तहसील  में स्थित  एक गांव  में पुलिस ने 37 वर्षीय दरिंदे को दो साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म के संगीन आरोप में गिरफ्तार किया है। मासूम का अस्पताल में इलाज चल रहा है। बच्ची के माता-पिता तीन माह पूर्व मेहनत-मजदूरी करने आए थे। बच्ची घर के पास की दुकान से चाकलेट खरीदने गई थी। शैतान उसे उठाकर ले गया और निर्जन स्थान पर बलात्कार की कोशिश की। पीड़ा से कराहती बच्ची रोते हुए घर पहुंची तो नराधम की हैवानियत का पता चला।

    ‘‘यूपी में छात्रा से बलात्कार के आरोपियों के जेल से बाहर आने पर फूल, गुलदस्ते और हार पहनाकर किया गया स्वागत’’... जी हां, एकदम सही पढ़ा आपने। उत्तरप्रदेश के आईआईटी बीएचयू में बीटेक छात्रा की लगभग आठ माह पूर्व दो बदमाशों ने अस्मत पर डाका डाला था। इन दरिंदों के खिलाफ हजारों लोग सड़कों पर उतरे थे। अभी हाल में अदालत ने दोनों को सशर्त जमानत दे दी। साथ में यह भी कहा कि इन पेशेवर अपराधियों को जनता के बीच जाने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन जनता तो जनता है, सब कुछ जानती, समझती है, फिर भी अंधी-बहरी बनी रहना चाहती है। जिन्हें  अपना मानती है, उनके सौ खून माफ करने की हिमायती होने में नहीं सकुचाती। यह हमारे समाज की बेहद  शर्मनाक  हकीकत है।

    कई हृदयहीन भारतीय दूसरों की बहन, बेटियों का आदर करना नहीं जानते। उनका संरक्षण करना तो बहुत दूर की बात  है। पिछले कुछ सालों में हमारे भारत को बलात्कारियों का देश भी कहा जाने लगा है। कोई भी दिन ऐसा नहीं गुजरता जब देश के किसी हिस्से में बहन-बेटी की आबरू लूटने का खबर पढ़ने-सुनने में न आती हो। घर की सुरक्षित चार दिवारी में भी बेटियां, बहुएं और मासूम बच्चियां रौंद दी जाती हैं। उनके विरोध के स्वर और चीखों को बड़ी चालाकी से दबा-छिपा दिया जाता है। शर्मनाक तथ्य यह भी है कि संपूर्ण भारत में व्याभिचार और बलात्कार को लेकर अत्यंत शर्मनाक राजनीति होती देखी जाती है। पीड़िताओं के साथ बड़ी निर्लज्जता से भेदभाव कर आहत करने वाली बयानबाजी रूकने का नाम नहीं लेती। समाज को विषैला और असंवेदनशील बनाने में उन राजनेताओं की बहुत बड़ी भूमिका  है, जो इस मामले में घोर पक्षपाती हैं। जिन प्रदेशों में उनकी सरकार है वहां पर महिलाओं के साथ बर्बरता होने पर खामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं और जहां पर उनकी सत्ता नहीं वहां कुत्तों की तरह भौंकने में कोई कमी नहीं करते। देश की बेटियों पर हो रहे दुराचारों के मामले में भेदभाव करने वाले नेताओं की वजह से ही राक्षसी कृत्य करने वाले चुन-चुन कर नारियों की इज्जत पर डाका डालते हैं और बाद में अपने आकाओं की गोद में जाकर बैठ जाते हैं। उनके आका उन्हें बचाने के लिए ओछी से ओछी चालें चलने लगते हैं। देश का कानून भी इनके कुचक्र का शिकार हो जाता है। सबूतों के अभाव में भरे चौराहे पर बलात्कार करने वाले दुराचारी  बाइज्जत बरी हो जाते हैं। उनको अपना आदर्श मानने वाले उनका आन-बान और शान के साथ गुलदस्तों तथा फूलों के हारों से अभिनंदन-स्वागत कर पीड़िता और उनके माता-पिता के सीने में खंजर घोंपकर बार-बार लहुलूहान और करते रहते हैं।

Thursday, August 29, 2024

इन मासूमों का क्या दोष?

    कुछ दिन पूर्व दो ऐसी महिलाओं से मुलाकात हुई, जिनकी प्रतिभाशाली बेटियों की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। अपनी लाड़ली पुत्रियों को सदा-सदा के लिए खो चुकी इन माताओं के साथ हमारा समाज कैसी बेअदबी और निष्ठुरता के साथ पेश आता है, इस सच को जान कर बहुत पीड़ा हुई। उनकी आपबीती सुनकर जब सुनने और जानने वालों का मन आहत हो जाता है तो सोचें, कि इन मांओं पर क्या बीती होगी। होना तो यह चाहिए था कि इनके प्रति आदर और सहानुभूति दर्शायी जाती। इनके धैर्य और हौसले को सराहा जाता। आप ही बतायें कि इन्हें कसूरवार ठहराना कहां तक जायज है? शहर के नामी स्कूल की सम्मानित शिक्षिका रहीं रजनी वर्मा की इक्कीस वर्षीय पुत्री एक रात अपने मित्र के साथ थियेटर में पिक्चर देख कर लौट रही थी। दोनों किसी मॉल में काम करते थे। उस दिन छुट्टी के बाद उनका बहुत दिनों के बाद फिल्म देखने का मन हुआ था। रजनी वर्मा की बेटी अलका अत्यंत ही खुले विचारों की होने के बावजूद अनुशासन और मर्यादा के साथ जीने में यकीन रखती थी। वह जहां भी जाती, मां को खबर करना नहीं भूलती। उस रात भी उसने मां को बता दिया था कि घर आने में देरी हो सकती है। चिन्ता मत करना। रात को रजनी वर्मा की कब आंख लगी, पता ही नहीं चला। सुबह तक रजनी की पूरी दुनिया लुट चुकी थी। तीन-चार नकाबपोशों ने अलका का रेप करने के पश्चात उसे रेल की पटरियों पर मरने के लिए फेंक दिया था। उनका दोस्त किसी तरह से बच-बचाकर पुलिस तक पहुंचा था। पुलिस ने तुरंत अलका को अस्पताल पहुंचाया था, लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद वह बच नहीं पाई थी। बेटी की क्षत-विक्षत लाश रजनी ने कैसे देखी और उन पर क्या गुजरी इस बारे में उन्होंने कभी किसी को कुछ नहीं बताया। आंखों में आंसू अटके के अटके रह गये। पति के गुजर जाने के बाद इकलौती बेटी की परवरिश में कोई कमी नहीं करने वाली रजनी के जीवन में आया भूचाल अभी तक नहीं थमा है। कोर्ट-कचहरी और वकीलों की फीस ने अधमरा कर दिया है। पुश्तैनी घर तक बेचना पड़ा। चारों बलात्कारी कॉलेज के छात्र थे। रजनी उन्हें पहचानती थी। बदमाशों को अलका की दिनचर्या का पूरा पता था। उन्हीं में से एक बदमाश अलका पर शादी का दबाव बनाता चला आ रहा था। बारह साल तक कोर्ट में मामला चलता रहा। आखिरकार पुख्ता सबूतों के अभाव में सभी बदमाश बरी हो गये। लस्त-पस्त हो चुकी रजनी बताती हैं कि तब उनकी आंखों से चिंगारियां निकलने लगती थीं जब कोर्टरूम के आसपास कुछ लोग उनका मज़ाक उड़ाते हुए ताने कसा करते थे कि ये बुढ़िया भी अपनी बेटी की तरह अपने कर्मों की सज़ा भुगत रही है। यदि इसने अपनी आवारा बेटी पर अंकुश लगाया होता तो आज दोनों शान से जी रही होतीं। आधी-आधी रात को अपनी बेटी को उसके यार के साथ घूमने की  छूट देने वाली मां को तो चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। 

    ऐसी ही जली-कटी अर्चना खुराना को सुनना पड़ी थीं, जिनकी प्रतिभाशाली अभिनेत्री बेटी की चलती ट्रेन में अस्मत लूट ली गई थी। अर्चना की बिटिया रानी मुंबई में अभिनय एवं मॉडलिंग के क्षेत्र में सक्रिय थी। कुछ टीवी सीरीयल में उसके काम को काफी सराहा गया था। नागपुर से मुंबई जाते समय रात के समय रेलगाड़ी में दो शराबी मुस्तंडे उस पर टूट पड़े थे। यात्रियों के सामने युवा अभिनेत्री को निर्वस्त्र कर अपनी अंधी वासना को शिकार बनाने वाले गुंडे बड़े आराम से चलती रेलगाड़ी का चेन खींचकर चलते बने थे। रानी ने फांसी के फंदे पर झूल कर खुदकुशी कर ली थी। इस सदमें ने अर्चना को निचोड़ कर रख दिया था, लेकिन तब तो वह पूरी तरह से खत्म ही हो गई थीं जब उन पर तैजाबी तंज कसे गये कि उनकी बेटी अपने खुले विचारों और अंग प्रदर्शन करने वाले परिधानों के कारण बलात्कार का शिकार हुई। अनजान पुरुषों से हंस-हंसकर बोलना बतियाना उसी को भारी पड़ गया। सफर के दौरान यदि वह अपने में सिमट कर रही होती तो गुंडे बदमाशों की नज़र उस पर नहीं जाती। टीवी सीरियल में भी उसने जिन किरदारों को जीवंत किया वे कामुकता और शारीरिक आकर्षण में रचे बसे थे। अपने देश में पीड़िता को दोषी ठहराने के बहाने और तर्क गढ़ने का जो सिलसिला चलाया जाता है उसकी कोई सीमा नहीं होती। अभी हाल ही में महाराष्ट्र के शहर बदलापुर में नर्सरी में पढ़ रही चार साल की दो मासूम बच्चियों से 24 वर्षीय सफाई कर्मी ने दुष्कर्म और यौन शोषण किया। अस्पताल में इसकी पुष्टि भी हो गई। पुलिस वाले रिपोर्ट लिखने में आनाकानी करते रहे। लोगों का विरोध और दबाव बढ़ने के पश्चात प्राथमिक रिपोर्ट लिखी गई। यह हमारे देश की अधिकांश खाकी की शर्मनाक सच्चाई है, जिसकी वजह से अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं। बदलापुर के आदर्श स्कूल में जहां मासूम बेटियों का यौन शोषण होता रहा, वहां के सीसीटीवी काम नहीं कर रहे थे। ऐसा कहा और माना जाता है कि यदि बच्चे घर से बाहर कहीं सुरक्षित हो सकते हैं तो वह जगह है स्कूल, लेकिन महाराष्ट्र, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, दिल्ली...कहीं भी बच्चे आज सुरक्षित नहीं। बहन-बेटियों की अस्मत के लुटेरे शिक्षा के मंदिरों में भी अपना तांडव मचाए हैं। हैरतअंगेज सच तो यह है कि जब तक जनता सड़कों पर नहीं उतरती तब तक शासन और प्रशासन की नींद ही नहीं टूटती। बदलापुर के बाद महाराष्ट्र के अकोला में स्थित जिला परिषद स्कूल के शिक्षक को पुलिस ने गिरफ्तार किया। यह नराधम आठवीं कक्षा की छह छात्राओं को अश्लील वीडियो दिखाकर उनके साथ घोर अश्लील हरकतें करता चला आ रहा था। अब सवाल उन ज्ञानी लोगों से जो युवतियों के पहनावे और खुलेपन को बलात्कार का कारण मानते हैं। मासूम बच्चियों ने तो अपने स्कूल की ड्रेस पहन रखी थी। उन्हें तो दुनियादारी की कोई समझ ही नहीं थी। अपने काम से काम रखती थीं। आपस में ही खुश रहती थी। उनकी भोली-भाली सूरत में दरिंदों को क्या नजर नजर आया जिसने उन्हें हैवान बना दिया।

Thursday, August 22, 2024

‘बेटी बचाओ’ क्या महज सरकारी नारा है?

    बहन, बेटियों की प्रगति, सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार और बराबरी के तमाम दावे और नारे तब एकदम खोखले, निरर्थक लगते हैं, जब बार-बार उन पर घोर अत्याचार की खबरें दिल चीर जाती हैं। स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, सड़क, चौक-चौराहे, अस्पताल में बलात्कार। भरे पूरे परिवारों में भी बहन-बेटियों का निर्लज्ज चीर-हरण उस देश के माथे का कलंक और असहनीय जख्म है, जहां सदियों से नारी-पूजन होता चला आ रहा है। अब तो लेखक बेहिचक कहने तथा लिखने को स्वतंत्र है कि यह सब नाटक-नौटंकी, निर्लज्जता और अखंड पाखंड है। कभी भी माफ नहीं किये जाने वाला पाप और अपराध है। अपने देश भारत में अब जब भी कहीं बलात्कार-हत्याकांड होता है, तब दिल्ली में वर्षों पूर्व हुए निर्भया रेप हत्याकांड की याद ताजा की जाने लगती है। सारे अखबार और न्यूज चैनल धड़ाधड़ बताने लगते हैं कि तब किस तरह से पूरे देश का खून खौल उठा था। बलात्कारियों को भरे चौराहे पर नंगा कर फांसी के फंदे पर लटकाने, गोलियों से भूनने की मांग लिए जगह-जगह स्त्री, पुरुष, बच्चों का हुजूम सड़कों पर उतर आया था। कुछ भारतीयों ने हर बलात्कारी के गुप्तांग को काट देने की मांग भी की थी। सरकार ने बलात्कारियों को सबक सिखाने के लिए कठोरतम दंड का प्रावधान भी किया था, लेकिन नतीजा सबके सामने है। दुराचारियों को नया कानून भी डरा नहीं पाया। बेटियों की आबरू तार-तार करने के सिलसिले में कोई कमी नहीं आई।

    अभी हाल ही में कोलकता के अरजी कर मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में 31 साल की ट्रेनी डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या की बेहद चौंकाने और दिल दहलाने वाली घटना ने फिर से लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए विवश कर दिया। फिर से पुलिस की नालायकी, घोर लापरवाही और असंवेदनशीलता ने जन-जन को गुस्सा दिलाया। लेडी डॉक्टर के मृतक शरीर को देखने से ही उसके साथ हुई बर्बरता का पता चल रहा था, लेकिन पुलिस आत्महत्या घोषित कर मामले को रफा-दफा करने की चालें चलती रही। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि पीड़िता के शरीर में करीब 151 ग्राम सीमन यानि लिक्विड मिला, उससे इस शंका को बल मिलता है कि उससे एक से ज्यादा दरिंदों ने रेप किया है। लिक्विड की इतनी ज्यादा मात्रा किसी एक दरिंदे की नहीं हो सकती।

    मृतका के माता-पिता को भी अस्पताल प्रबंधन द्वारा यही बताया गया था कि उनकी लड़की ने खुदकुशी कर ली है। अस्पताल पहुंचने पर उनकी धड़कनें बेकाबू होती चली गईं। वे बार-बार हाथ जोड़कर बच्ची को तुरंत दिखाने की विनती करते रहे, लेकिन उन्हें तीन घंटे तक इंतजार करवाया गया। अपनी लाड़ली की दुर्दशा देख मां तो चक्कर खाकर गिर पड़ी। बेटी की आंखों, मुंह और गुप्तांग में खून ही खून तथा शरीर  पर कोई कपड़ा नहीं था। दोनों पैर राइट एंगल में थे। एक पांव बेड के एक तरफ और दूसरा पांव बेड के दूसरी तरफ था। चश्मे को बड़ी निर्दयता के साथ कूचे जाने के कारण आँखों में रक्त जमा था। हर तरह की जंगली बर्बरता से रेप और उसके बाद गला घोंट असहाय बेटी की हत्या की गईं थी। अस्पताल प्रशासन की लीपापोती धरी की धरी रह गई। अस्पताल के सीसीटीवी कैमरे के आधार पर गिरफ्तार किए गए अय्याश संशय राय ने पुलिस की पूछताछ में अपना अपराध स्वीकार करने में देरी नहीं की। उसे इस दरिंदगी को लेकर कोई पछतावा नहीं था। उसने सीना तानते हुए कहा कि, अगर चाहो तो मुझे फांसी पर लटका दो। उसका मोबाइल फोन भी अश्लील सामग्री से भरा मिला। पीड़िता के शव के पास उसका ब्लूटूथ हैंडसेट भी बरामद किया गया, जो उसके मोबाइल से जुड़ा हुआ था। 

    यह कितनी स्तब्ध करने वाली बात है कि इतने बड़े अस्पताल में जब प्रशिक्षु डॉक्टर पर बलात्कार हो रहा था तब वहां पर और कोई नहीं था, जो उसकी चीख-पुकार सुन कर दौड़ा चला आता? भारत में डॉक्टर्स के असुरक्षित होने की खबर विदेशों तक भी जा पहुंची। न्यूयार्क के टाइम्स स्कवायर पर धरना प्रदर्शन कर भारतीय छात्रों और डॉक्टर्स के प्रति अपना समर्थन प्रदर्शित किया गया। प्रदर्शनकारियों ने एक महिला डॉक्टर की मेडिकल कॉलेज में ड्यूटी के दौरान दुष्कर्म और हत्या को सिस्टम की असफलता करार दिया और सख्त कार्रवाई की मांग की। जर्मनी, लंदन और कनाडा में भी लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। डॉक्टर बेटी से दरिंदगी के विरोध में रक्षाबंधन पर पूरे हिंदुस्तान की बेटियों ने सड़कों पर उतर कर नारियों की सुरक्षा की गुहार लगाई और सरकारी नारे ‘बेटी बचाओ’ को कटघरे में खड़ा किया। यह कैसी विडंबना है कि एक महिला मुख्यमंत्री के राज में ही महिलाएं असुरक्षित हैं। यह भी सच है की सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही दुराचारियों के हौसले बुलंद नहीं हैं, अन्य प्रदेशों में भी बलात्कारी कानून से खौफ नहीं खाते। कोलकता में हुए इस नृशंस बलात्कार, हत्या के तीन दिन बाद बिहार के शहर मुजफ्फरपुर में एक महादलित परिवार की 14 वर्षीय छात्रा की सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या कर दी गई। मुख्य आरोपी छात्रा पर शादी का दबाव बना रहा था। जब वह नहीं मानी तो वह चार साथियों के साथ रात को उसके घर जा पहुंचा। मां-बाप के सामने हथियारों का भय दिखाकर लड़की को बाहर खींच कर ले गया। अगले दिन झील में छात्रा का हाथ-पैर बंधा शव मिला। इतना बड़ा कांड हो गया लेकिन कहीं कोई आवाज और शोर शराबा नहीं हुआ। अखबार और न्यूज चैनल भी खामोश रहे। एक तरफ पूरे देश में डॉक्टर और सजग जन सड़कों पर उतर कर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर मृतक लेडी डॉक्टर के क्षत-विक्षत शरीर की तस्वीरों के साथ उसके नाम को धड़ाधड़ उजागर करने का गंदा और शर्मनाक खेल चल रहा था। अपनी जान से प्यारी प्रतिभावान पुत्री को हमेशा के लिए खो चुके दुःखी मां-बाप को बार-बार अपील और विनती करनी पड़ी कि, प्लीज  हमारी बेटी की तस्वीरें और नाम  शेयर मत करें। गौरतलब है कि, पीड़ित की तस्वीर और नाम को गोपनीय रखने का नियम बना हुआ है, लेकिन सोशल मीडिया के इस अजीबोगरीब दौर में कुछ लोग अति उत्साह में किसी कानून-कायदे का पालन करना जरूरी नहीं समझते। अपने नाम का परचम लहराने के साथ-साथ अपना तथाकथित गुस्सा व्यक्त करने के लिए सोशल मीडिया को हथियार बना चुके फुर्सतियों की अपने यहां अच्छी-खासी तादाद है। साफ सुथरे लोगों पर कीचड़ उछालने की शर्मनाक कला में यह चेहरे बहुत माहिर हैं...।

Saturday, August 17, 2024

तख्तापलट

    बांग्लादेश में वर्षों से चली आ रही विवादास्पद आरक्षण प्रणाली को समाप्त करने की छात्रों की मांग ने अंततः इतना उग्र और विस्फोटक रूप धारण कर लिया कि वहां की प्रधानमंत्री को देश से भागना पड़ा। गौरतलब है की 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम  में हिस्सा लेने वाले लड़ाकों के रिश्तेदारों को सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान था। 2024 के जुलाई  महीने में हुई हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए थे। जिनमें से कई लोगों की मौत पुलिस  की गोलीबारी से हुई। इससे लोग बेहद क्रोधित थे। 5 अगस्त को मूवमेंट के तहत सुबह  दस बजे से ही बांग्लादेश की राजधानी ढाका में सेंट्रल शहीद मीनार के पास लगभग चार लाख उग्र छात्रों की जो भीड़ एकत्रित हुई, पुलिस के लिए उसे संभालना और नियंत्रण में लेना अत्यंत मुश्किल होता चला गया। स्थिति, परिस्थिति और हिंसक हालात को बेकाबू देख प्रधान मंत्री शेख हसीना कुछ ही घंटों के भीतर डरी-सहमी, सुरक्षित भारत पहुंच गईं। इस दौरान उपद्रवी बेखौफ होकर संसद भवन की छत, प्रधान मंत्री के आवास में घुसकर कीमती सामान पर हाथ फेरने और तोड़फोड़ करने लगे। विरोध प्रदर्शन के नाम पर अराजकता, अभद्रता और गुंडागर्दी की जाने लगी। सोशल मीडिया पर अल्पसंख्यक हिंदू तथा सिखों के घरों पर हमलों के साथ-साथ महिलाओं के साथ अभद्रता के वीडियो वायरल होने लगे। बांग्लादेश की बुनियाद रखने वाले राष्ट्रपिता के रूप में प्रतिष्ठित शेख मुजीब उर रहमान की मूर्ति को उसी हिंसक, अराजक, कट्टरपंथी सोच ने हथौड़े पर हथौड़े बरसा कर ढहा दिया, जिसने कभी उनकी क्रूरता से नृशंस हत्या की थी। उनके स्टैच्यू पर बुलडोजर  चलाए गए। आजादी के प्रतीक को भी धराशायी करने की शर्मनाक दुष्टता  की गई। शेख हसीना ने 15 वर्ष पूर्व जब सत्ता संभाली थी तब बांग्लादेश के अत्यंत चिंताजनक हालात थे। हसीना ने खस्ताहाल देश को विकास का जामा पहनाकर काफी हद तक खुशहाल बनाया, लेकिन यह भी सच है कि 17 करोड़ की आबादी वाले देश में तीन करोड़ युवा बेरोजगार हैं। कोई भी शासक सभी का प्रिय नहीं हो सकता। कमजोरी और कमियां ढूंढने वाले अपने मकसद में कामयाब हो ही जाते हैं। हसीना का भारत  से मधुर और दृढ संबंध बनाए रखना अंतरराष्ट्रीय ताकतों को रास नहीं आ रहा था। भारत के जगजाहिर शत्रु चीन और पाकिस्तान की साजिशों ने भी शेख हसीना का तख्तापलट करवाने में खासी भूमिका निभाई और आरक्षण विरोधी आंदोलन के बहाने एक प्रगति करते देश में कोहराम मचवा दिया।

    बांग्लादेश  में नई  सरकार का गठन भी हो गया है, लेकिन यह सवाल हमेशा सुलगता रहेगा कि लोगों का गुस्सा तो सरकार पर था, लेकिन अल्पसंख्यकों पर कहर क्यों बरपाया गया? तख्तापलट के बाद वर्षों से वहां रह रहे हिंदुओं को चुन-चुन  कर मौत के घाट उतारा गया। उनकी दुकानें, घर बार फूंक डाले गए। मंदिरों को आग लगाई गई। उन्हें रातों-रात बांग्लादेश छोड़ने को विवश कर दिया गया। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हिंदू गायक राहुल आनन्द के घर को राख करने से पहले उपद्रवियों की भीड़ ने जमकर लूट-पाट की। उनके तीन हजार से ज्यादा हैंडमेड म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट् के कलेक्शन के साथ-साथ सभी कीमती सामान समेट कर ले भागे।

    अभिनेता शांतो तथा उसके पिता की भीड़ ने पीट-पीटकर  हत्या कर दी। एक होटल में आग लगा दी, जहां आसाम के रहने वाले दो युवक ठहरे थे। जान बचाने के लिए वे चौथे माले से कूदे और चल बसे। इसी तरह से एक अन्य होटल में आग के हवाले किया गया, जिसमें 25 हिंदू राख हो गये। खौफ के अंधरे में जीते अनेकों हिदुओं को भूखे-प्यासे चार-पांच दिन तक अपने घरों में कैद रहना पड़ा। हिंसक भीड़ का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा था। कई स्थानों पर लूटमारी करती भीड़ धमकियां देती नजर आई, हिंदुओं अपने घर बार छोड़कर भाग जाओ, नहीं तो मार काट कर फेंक दिया जाएगा। इस भयावह मंजर में कुछ मुस्लिम परिवारों ने हिंदुओं की सुरक्षा के लिए खुद को भी खतरे में डालने की हिम्मत दिखायी। 

    एक तरफ मारकाट, लूट-पाट, बलात्कार हो रहे थे, वहां की पुलिस और सेना हाथ पर हाथ धरे अराजक  तत्वों को मूकदर्शक बन देखने को विवश नज़र आ रही थी। इस उपद्रवी आंदोलन में पांच सौ से अधिक लोगों की जानें चली गईं। सरकारी इमारतें और पुलिस थाने फूंक दिए गए। देश के नेतृत्वहीन होने का फायदा इस्लामी कट्टरपंथियों नें भी खूब उठाया। एयर इंडिया और इंडिगो की विशेष उड़ानों से सैकड़ों भारतीयों को भारत लाया गया। बीते वर्ष पड़ोसी देश श्रीलंका में भी ऐसा ही तख्तापलट का नजारा हम सबने देखा था। सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों ने कोलंबो में स्थित राष्ट्रपति भवन पर एक तरह से कब्जा ही कर लिया था। उनके स्विमिंग पुल में नहाने, रसोई घर में खाना बना कर खाने और आलीशान कमरों के बिस्तर  पर धमा चौकड़ी मचाने के वीडियो धड़ल्ले से वायरल होते रहे थे। वहां की बेबस सरकार ने हाथ खड़े करते हुए ऐलान किया था कि वह दिवालिया हो चुकी है... बांग्लादेश में हुए तख्तापलट ने हिंदुस्तान  के कुछ धूर्त  नेताओं, संपादकों, पत्रकारों एवं तथाकथित सेकुलर बुद्धिमानों को उमंगों और उम्मीदों के मायावी झूले पर झुलाना  प्रारम्भ कर दिया। सजग वोटरों ने तो सता से वंचित रखा, लेकिन पड़ोसी देश में हुए तख्तापलट की वजह से मुंगेरी लालों ने दिलकश उम्मीदें पालते हुए कहना शुरू कर दिया कि जो बांग्लादेश में हो रहा है, वह भारत में भी हो सकता है, लेकिन जब सजग देशवासियों ने उन्हें दुत्कारा, फटकारा और थू...थू की तो वे इधर-उधर मुंह छिपाने लगे...।

Thursday, July 18, 2024

बोझ...?

    कुछ खबरें अंदर  तक  उतर  कर मंथती चली जाती हैं। सोचने-विचारने का सिलसिला लंबा खिंचता चला जाता है। सभी को खबर है कि जिन्दगी दोबारा नहीं मिलती, लेकिन कुछ लोग  जिन्दगी को बहुत हल्के में लेते हैं। अपनी तो अपनी दूसरों की जान लेने  के लिए  हर हद को पार करने से नहीं सकुचाते। अपनों से बड़ों का सम्मान करना लोग भूलने लगे हैं। गुस्सा  तो हरदम नाक पर रहता है। कम आयु के बच्चे तनाव की गिरफ्त मे आ रहे हैं। उनकी खुदकुशी की खबरें झकझोर कर रख देती हैं। जिन्होंने अभी दुनिया के पूरे रंग-ढंग नहीं देखे उनका आत्महत्या कर गुजरना हृदय को दहला कर रख देता है। कहीं न  कहीं कोई गड़बड़ तो है। माता-पिता, रिश्तेदारों, अपनों तथा बेगानों के साथ-साथ समाज की धड़कनें बढ़ाने वाली खुदकुशी की खबरों  को महज पढ़- सुनकर नजरअंदाज तो नहीं किया जा सकता। संतरा नगरी नागपुर में माणिक राव नामक उम्रदराज पिता ने अपने 40 वर्षीय पुत्र  पर गोली दाग दी। माणिक राव  केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल से सेवानिवृत्त हैं। उनके पास बारह बोर की लाइसेंसी बंदूक भी है। फिलहाल किसी संस्थान में सुरक्षाकर्मी हैं। मेहनतकश माणिक  राव  बेटे और बहू की बदसलूकी से बहुत आहत और परेशान थे। बेटा हमेशा बदतमीजी से पेश आता था। उसका चपरासी -चपरासी कहकर बार-बार तंज कसना उन्हें बहुत आहत कर जाता था। जब देखो तब बेटा-बहू दोनों अपने मासूम बेटे यानी उनके पोते को बिना वजह उन्हीं के सामने बेरहमी से  मारने-पीटने लगते थे। अपने दुलारे पोते को रोता-बिलखता देख जब वे उन्हें फटकारते तो दोनों उनको खरी-खोटी सुनाने लगते। बेटे-बहू को पिता की दखलअंदाजी कतई पसंद नहीं थी। उन्हें बार-बार  अहसास कराया जाता था कि वे बच्चे के मां बाप हैं। उसकी पिटाई  करने का उन्हें  पूरा-पूरा हक है। किसी दूसरे को उन्हें रोकने -टोकने का दूर-दूर तक कोई अधिकार  नहीं। बीते सप्ताह माणिक राव रात को भोजन  करने के उपरांत बाहर से वॉकिंग करके घर लौटे तब बेटे ने अपने पुराने अंदाज में व्यंग्य  बाण चलाने प्रारम्भ कर दिए। नालायक, बदजुबान बेटे की करतूत से बुरी तरह से आहत और क्रोधित पिता ने उस पर बंदूक तान दी। पत्नी ने रोकने की बहुतेरी कोशिश की, लेकिन उन्होंने गोली दाग कर ही दम लिया। गोली लगने से उसकी मौत तो नहीं हुई, लेकिन वह बुरी तरह से लहूलुहान हो गया। घर के आसपास तमाशबीनों की भीड़ जमा होकर तरह-तरह  की बातें  करने लगी। थोड़ी देर  बाद  खाकी वर्दी वाले भी पहुंच  गए। घायल  बेटे को तुरंत  अस्पताल ले जाया गया। गोलीबाज गुस्सैल बाप की गिरफ्तारी भी हो गई.....

    पुणे निवासी प्रतीक्षा ने नागपुर  में फांसी लगाकर  आत्महत्या कर ली।  26  वर्षीय  प्रतीक्षा  का सिपाही के तौर पर मुंबई पुलिस में चयन  हुआ  था। नागपुर  में स्थित पुलिस  प्रशिक्षण  स्कूल  में उसे प्रशिक्षण के लिए  भेजा गया था। चार साल पूर्व  उसकी शादी हुई थी। जिसमें बहुत  जल्दी खटास आ जाने के कारण  तलाक की नौबत  आ गई। उसके पश्चात वह मुंबई  पुलिस की भर्ती के दौरान एक  युवक से दिल लगा बैठी। उसने उससे ब्याह रचाने का पक्का  मन बना लिया था, लेकिन  उसने घर वालों के दबाव में आकर किसी अन्य युवती संग सात फेरे ले लिए। वह इस  झटके से आहत  हो परेशान रहने लगी। कुछेक दिन बाद सुबह-सुबह उसने खुदकुशी कर ली। उसके बिस्तर  पर मिले सुसाइड नोट  पर लिखा था, ‘‘मेरी मौत  के बारे में मां-पिता को नहीं बताना और सुसाइड नोट को स्टेटस  पर भी नहीं रखना।’’ वह  तो सदा-सदा के लिए  दुनिया छोड़कर  चल दी,सबको  अखबारों के माध्यम  से पता भी चल गया। ऐसी कायराना बेवकूफी में  की गई  किसी भी खुदकुशी को सहानुभूति नहीं मिलती। तरह-तरह  की बातें होती ही हैं। लिखाई -पढ़ाई  तथा माता पिता की परवरिश  को भी कटघरे में खड़ा  किया जाता है।

    महाराष्ट्र  की संस्कार  नगरी अमरावती के एक स्कूल की दो लड़कियां आत्महत्या के इरादे से  इमारत की चौथी मंजिल पर जा पहुंचीं। दोनों के अचानक गायब होने से स्कूल  प्रशासन में हड़कंप  मच गया। उनके अपहरण की शंकाएं भी व्यक्त की जाने लगीं। दोनों को ढाई घंटे के बाद स्कूल से कुछ दूरी पर स्थित इमारत की  छत पर पकड़ा गया। दोनों ने खुद को बंद कर रखा था। दमकल विभाग की सहायता से बड़ी मुश्किल से दरवाजा तोड़कर उन्हें बाहर  निकाला गया। दोनों बहुत डरी-सहमी थीं। उनके स्कूल  बैग से मिले सुसाइड नोट  पर लिखा मिला,‘‘अब मैं कभी घर नहीं आऊंगी...मैं  अब बोझ बन गई  हूं...’’ आठवीं कक्षा में पढ़ रही यह दोनों लड़कियां पक्की सहेलियां हैं। एक ही कक्षा में एक ही बेंच पर साथ बैठती हैं। इनकी इस करतूत ने उनके माता-पिता को डरा दिया है। वैसे भी आजकल अधिकांश मां-बाप अपनी संतान से भयभीत रहते हैं। जैसे-जैसे बच्चे बढ़े  होते चले जाते हैं उनका भय बढ़ता चला जाता है। वे उनसे दबे-दबे रहते हैं.....

Thursday, July 11, 2024

अब तो पीछा छोड़ो बाबा...

    उत्तर प्रदेश  के हाथरस में एक  सत्संग  के दौरान  मची तूफानी भगदड़ ने 123 भक्तों को मौत की दर्दनाक नींद में सुला दिया। इस हादसे ने यह भी बता दिया कि हम नहीं चेतने और सुधरने वाले। अतीत से सबक नहीं लेने की हमने कसम खा रखी है। भले ही हमारी जान चली जाए, लेकिन  हम  स्वयंभू  साधू -संतों, प्रवचनकारों के दरबारों में जाना नहीं छोड़ सकते। हमें डॉक्टरों पर  कम, तंत्र, मंत्र  और  पाखंड  पर ज्यादा भरोसा है। हम मेहनत  की बजाय  चमत्कार  पर  यकीन रखते हैं। अखबारों, न्यूज चैनलों और यहां वहां बार-बार  पढ़ने- सुनने के बाद कि अपने देश में एक-दूसरे की देखा-देखी कुछ धूर्त चेहरे संत और  प्रवचनकार बन जाते हैं, लेकिन हम सावधान नहीं होते। जब तक उनका पर्दाफाश होता है, तब तक असंख्य लोग लुट-पुट  कर तबाह  हो चुके होते हैं। हाथरस में जिस तथाकथित बाबा के तथाकथित सत्संग  में हत्यारी भगदड़ मची, उसका नाम है, सूरजपोल उर्फ भोले बाबा। सूरज पाल की पूरी कुंडली भी देश तब जान पाया जब उसके श्रद्धालू मौत का निवाला बनने के बाद अखबारों और न्यूज चैनलों की ऐसी खबर  बने जिसे पढ़ सुन कर बहुत जल्दी बिसरा दिया जाता है। सिर्फ परिवार वाले ही कभी भूल नहीं पाते। उनके जख्मों की कीमत लगाने वाले भी उन तक पहुंच जाते हैं। सूरज पाल की बाबा बनने की कहानी कुछ यूं है...पहले वह अपने गांव  में खेती किसानी किया करता धा। बाद में उसे पुलिस में सिपाही की नौकरी बजाने का मौका मिल गया। इसी दौरान  यौन  शोषण  के आरोप  में उसे जेल जाना पड़ा।

    इसी जेल यात्रा के दौरान उसके मन में बाबा बनने का  विचार  बलवती हुआ। 17 साल तक खाकी वर्दी में रहकर सूरज पाल ने नेताओं तथा प्रवचनकारों के ठाठ-बाट करीब से देखे थे। नकली बाबा किस तरह से लोगों का अपना अंध भक्त  बनाने के लिए षड्यंत्र रचते हैं। खासतौर पर गरीब, कम पढ़ी-लिखी, विभिन्न तकलीफों से जूझती महिलाओं पर कौन सा जाल फेंकते हैं, इसका नज़ारा उसने बहुत करीब से देखा-जाना था। जेल  से बाहर आते ही वह धुंआधार प्रचार करने लगा कि सपने में उसकी हर रात ईश्वर से मेल-मुलाकात होती है, उनका आदेश है कि मैं लोगों के दुःख दर्द दूर करने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दूं। चालबाज सूरज पाल ने पांच-सात लोगों को भी अपने पक्ष में प्रचार करने के काम पर लगा दिया। धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाने लगी। पहले आसपास फिर दूर-दराज तक के लोग माथा टेकने के लिए सूरज पाल जाटव उर्फ भोले बाबा के दरबार में आने लगे। उसने भगवा की बजाय सफेद सूट, काला चश्मा, काले जूते और किस्म-किस्म की टाई धारण कर अपनी अलग छवि बनायी। सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखने वाले भोले बाबा ने हमेशा चंदा नहीं लेने की बात कही, लेकिन चंद वर्ष में 100 करोड़  रुपए  की सम्पति  खड़ी कर ली!

    वर्तमान  में विभिन्न  स्थानों पर इसके 24 लक्जरी आश्रम  हैं। वह किसी पर भरोसा नहीं करता। जब उसने सत्संग की दुकानदारी प्रारम्भ  की थी, तब भीड़ के बीच अपने लोगों को बैठाता था। वे लोग अपनी-अपनी समस्या बताते और बाबा तुरंत उसका निदान बता देता। इससे भीड़ को भी यकीन होता चला गया कि ये बाबा तो बहुत चमत्कारी है। धीरे-धीरे यह भी प्रचारित कर दिया गया की धरती के इस भगवान के चरणों की  धूल  तथा आश्रम के बाहर  लगे  हैंडपंप के पानी में गंभीर से गंभीर रोगों  को खत्म करने की करिश्माई शक्ति है।

    कुछ ही वर्षों में इसके सत्संग में उस गरीब तबके के लोगों  की बेतहाशा भीड़ आने लगी, जो दो वक्त की रोटी के लिए सतत जूझती रहती हैं। जब उसने देखा कि भीड़ को संभालना मुश्किल हो रहा है तो उसने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम जुटाने में देरी नहीं की। दुनियाभर की तामझाम और ठाठ-बाट  भरा जीवन  जीते इस आधुनिक असंत ने 5000 से ज्यादा पिंक वर्दी वाले जवानों के साथ-साथ 100 ब्लैक कैट कमांडो की नियुक्ति की।  उसकी इस आर्मी में उसकेकट्टर अनुयायियों को ही रखा गया है। घाट-घाट का पानी पी चुके हुए इस चालबाज ने अपनी सेना में महिलाओं को भी शामिल  करवाया। दलितों, पिछड़ों में जबरदस्त पैठ होने के चलते विभिन्न राजनीतिक  दलों के नेता  इसके दर्शन कर खुद को सौभाग्यशाली मानने लगे। दो जुलाई, मंगलवार  को सत्संग  में  दो लाख से ज्यादा का जमावड़ा  था। आयोजक गदगद थे। भीड़ भी उत्साहित थी। पुरुषों से कहीं बहुत ज्यादा औरतें हैं। पंप का चमत्कारिक पानी तथा अपने भगवान  के चरणों की धूल  का प्रसाद  पाने के लिए  दूर-दूर  से आईं थीं। जैसे ही कार्यक्रम  समाप्त  हुआ   भगवान  अपनी चमचमाती कार में सवार हो चल पड़ा।  तेजी से दौड़ती कार के पहियों से उड़ती धूल को अपने माथे पर लगाने के  लिए असंख्य महिलाओं, पुरुषों तथा बच्चों की भीड़ कार के पीछे दौड़ पड़ी। इसी अंधाधुंध भागमभाग से मची भगदड़  में गिरने, दबने, कुचले और मसले जाने से भक्त  दम तोड़ने लगे। देखते ही देखते 121 इंसानों की सांसों  की डोर  टूट गई। अपनी जिन्दगी को खुशहाल बनाने की तमन्ना के साथ सत्संग में पहुंचे अनुयायियों को मरता देखने के बावजूद भोले बाबा ने सरपट भागने में ही अपनी भलाई समझी। इस भगदड़ में 108 महिलाओं के साथ आठ मासूम बच्चों को भी अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। किसी के सिर में गंभीर चोट लगी, किसी का लीवर-फेफड़ा फटा, किसी ने दम घुटने तो किसी ने ब्रेन हेमरेज हो जाने की वजह से हमेशा-हमेशा के लिए इस दुनिया से विदायी ले ली। अत्यंत दुःखद  तथ्य यह  भी है कि शातिर आयोजकों के द्वारा उनका पीड़ितों के जूते, कपड़े और  अन्य  सामानों  को खेत में फेंकने की शर्मनाक हरकत भी की गई। उनका इरादा था कि किसी भी तरह से भगदड़  होने के सच को दुनिया से छिपाया जाए। यह स्वयंभू भगवान यदि हादसे के स्थल से कायर बन नहीं भागता तो वह खलनायक नहीं नायक कहलाता...लेकिन सच तो अंततः  सामने आ ही जाता है....


Friday, July 5, 2024

दिल वालों की दिल्ली

    देश की राजधानी दिल्ली। तपते जून का आखिरी हफ्ता। रात को जल्दी सोने के कारण सुबह छह बजे का अलार्म बजते ही उठ खड़ा हुआ। दो गिलास पानी पीने के बाद मार्निंग वॉक के लिए निकल पड़ा। रानी बाग में स्थित जाने-पहचाने बाग तक पहुंचने में करीब दस मिनट लगे। बीस साल पूर्व की हरियाली छिन चुकी थी। बाग उदास...उदास लग रहा था। एक्सरसाइज के नये -नये यंत्र जरूर सज चुके थे। पुरुष, महिलाएं और लड़के लड़कियां वॉक के साथ साथ आधुनिक साधनों से कसरत कर पसीना पसीना हो रहे थे। पुरुष एक दूसरे का राम...राम,जय श्रीराम से अभिवादन कर रहे थे। नमस्कार, गुड मार्निंग का चलन लगभग नदारद था। मैंने लगभग एक घंटे तक सैर करने के बाद बाहर की राह पकड़ी। आठ बजने जा रहे थे। विभिन्न फलों के जूस, नारियल पानी तथा सब्जी के ठेलों पर ग्राहक खड़े नज़र आ रहे थे मैंने चाय की बजाय नारियल के पानी का आनन्द लेना बेहतर समझा।

    नारियल पानी पीते-पीते सामने लगे, आम आदमी...मोहल्ला क्लीनिक के विशाल बोर्ड पर नज़र जा अटकी। वहां पर खड़े पढ़े -लिखे दिखते एक शख्स से क्लीनिक के खुलने खुलाने तथा प्रदत की जाने वाली सुविधाओं के बारे में पूछा तो उस ने पहले तो छूटते ही केजरीवाल को पंजाबी में गाली दी फिर कहा इस से झूठा फरेबी नेता दिल्ली वालों नें पहले तो कभी नहीं देखा। इस चालबाज ने जगह-जगह क्लीनिक तो खुलवा दिए, लेकिन वहां न दवाइयां हैं और न ही ढंग के डॉक्टर। शुरू-शुरू में कुछ दिनों तक मरीजों को संतुष्ट किया गया। फिर देखते ही देखते बदहाली नज़र आने लगी। नब्बे प्रतिशत मोहल्ला क्लीनिक महज दिखावा बन कर रह गए हैं। तभी वहीं पर खड़े एक उम्रदराज सरदार जी बोल पड़े, आम आदमी पार्टी की सरकार से दिल्ली वालों को बहुत उम्मीदें थीं।अपने पहले कार्यकाल में केजरी सरकार ने आम आदमी का दिल जीता। सरकार ने यदि बेहतर काम नहीं किया होता तो दिल्ली की जागरूक जनता दोबारा उसे सत्ता का ताज क्यों पहनाती, लेकिन यहीं भारी गड़बड़ी हुई। आम आदमी पार्टी के सर्वोच्च नेता सत्ता के नशे में मदहोश होते चले गए। भ्रष्टाचार और अखंड भ्रष्टाचारियों के खिलाफ बिगुल फूंकने वालों ने ऐसे लूट-पाट करनी प्रारम्भ कर दी जैसे हाथ में आया यह अवसर कहीं छिन न जाए। इसी चक्कर में जेल के मेहमान बनते चले गए।

    यदि वाकई ये निरपराध होते तो कोई भी ताकत इनका बाल भी बांका नहीं कर पाती। अपने देश का कानून सभी के लिए एक समान है। अदालतें सबूत चाहती हैं। नाटक नौटंकी, आरोप-प्रत्यारोप पर दिमाग नहीं खपातीं। ऐसा देश में और कहीं नहीं हुआ जैसा दिल्ली में दिख रहा है। मुख्यमंत्री और मंत्रियों को जेल में सड़ना और जमानत के लिए मर...मर कर तरसना पड़ा हो...। 

    मैंने वहां से खिसक लेने में अपनी भलाई समझी। पूरा दिन कुछ सरकारी-अखबारी काम में बीत गया। रात का भोजन करने तथा भांजे धीरज से इधर-उधर की बातें करने के बाद बिस्तर की शरण ले ली। अच्छी गहरी नींद में था। तभी चीचने-चिल्लाने की आवाजों ने नींद में खलल डाल दी। धीरज जल्दी बाहर आओ, सामने की बिल्डिंग में आग लगी है। कोई जोर-जोर से दरवाजा खटखटा रहा था। धीरज और मैं हड़बड़ा कर बाहर निकले। सामने की चार मंजिला बिल्डिंग से गहरा काला धुंआ बड़ी तेजी से बाहर फैल रहा था। नीचे से लेकर ऊपर तक के सभी कमरों में भयंकर आग लगी थी। चीख़-पुकार की आवाजें दिल दहला रहीं थीं। आग लगते ही बिल्डिंग के अधिकांश निवासी बाहर आ चुके थे, लेकिन कुछ उम्रदराज स्त्री पुरुष अंदर फंसे थे। आग बुझाने के साथ -साथ उन्हें किसी भी तरह बचाने की जद्दोजहद जारी थी। सभी को फायरब्रिगेड का इंतजार था, जो अंतत: तब पहुंचा जब तक बहुत कुछ जल कर राख हो गया। सुखद यह रहा कि तीसरी मंजिल में जहरीली धुंधलाहट में छटपटाते उम्रदराज दम्पति को फायर ब्रिगेड की सीढ़ी से उतार लिया गया। दमे के पुराने रोगी होने की वजह उनकी जान पर बन आयी थी। एसी के फटने की वजह से अचानक लगी भयंकर आग को पूरी तरह से बुझाने में लगभग चार घंटे लगे। दिल्ली में एसी का चलन बहुत बढ़ गया है। घर-घर में एसी लगे हैं। लोगों ने अवैध कनेक्शन भी रखे हैं। 

    इमारत तक पहुंचने का रास्ता यदि बेहद संकरा नहीं होता तो फायरब्रिगेड की गाड़ी जल्दी पहुंच जाती, जिससे नुकसान कम होता। देश की राजधानी में अनेकों बस्तियां ऐसी हैं, जिनमें प्रवेश करने के रास्ते अत्यंत संकरे हैं, उनमें कार बहुत मुश्किल से जा पाती है। स्कूटर, मोटरसाइकिल चालकों के घबराहट के मारे पसीने छूट जाते हैं। फिर भी कुछ युवा तो तीन-तीन साथियों को पीछे बिठा कर ऐसे स्कूटर, मोटर साइकिल दौड़ाते नज़र आते हैं जैसे वे वर्षों सर्कस में अपने रोमांचक खेल, तमाशे दिखा चुके हों।

    अधिकांश रिहाइशी इलाकों में लोग अपने वाहन खड़े कर बेफिक्र हो जाते हैं। जगह-जगह बिजली के खम्भों की लटकती तारें भयग्रस्त कर देती हैं, लेकिन यह भी सच है कि एक ही कतार में एक दूसरे से चिपके इन घरों में रहने वाले लोग-बाग का दिल बहुत विशाल है। किसी भी आपदा और संकट के समय एक दूसरे के साथ खड़े होने में देरी नहीं लगाते। अपना तन, मन, धन लगा देते हैं। यही तो हिन्दुस्तान की वास्तविक तस्वीर है।

    दिल्लीवासी गजब के धर्म प्रेमी होने के साथ साथ परोपकारी भी हैं। कोरोना-काल में ग़रीबों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए यहां के अनेक युवा बढ़-चढ़कर सामने आए। उन्होंने लोगों के सहयोग से मिले धन तथा अपनी जेब की रकम से अनाज, कपड़े तथा अन्य समान खरीद कर जरूरतमंदों तक पहुंचाने में अपने सुख चैन की बेहिचक कुर्बानी देते हुए बिना किसी भेदभाव के इंसानियत के धर्म का पालन किया। कोरोना-काल की विदाई के बाद भी कुछ स्थानों पर अभी भी ‘भोजन सेवा’ पर विराम नहीं लगाया गया है। उन्हीं में शामिल है, रानीबाग, जहां पर प्रतिदिन ‘सेवा रसोई’ के माध्यम से मात्र पांच रुपए में जरूरतमंदों को भरपेट खाना खिलाया जाता है। हां, जो पांच रुपए का भुगतान नहीं कर पाते उन्हें भी मान सम्मान के साथ संतुष्ट किया जाता है। रसगुल्ला, गुलाबजामुन, कलाकंद या अन्य कोई मिठाई भी सभी को भोजन के साथ जरूर परोसी जाती है। पहले की तुलना में अब काफी लोग सेवा रसोई से जुड़ चुके हैं। हार्दिक सेवा भावना और ईमानदारी का ही प्रतिफल है कि, दूर-दूर के अनजाने दानवीर भी बड़ी खामोशी और बिना किसी प्रचार के लाखों रुपए पहुंचा देते हैं।