Thursday, March 6, 2025

हवस के शिकारी

चित्र-1 : महाराष्ट्र की उपराजधानी, संतरा नगरी के रंग बहुत तेजी से बदल रहे हैं। मायानगरी मुंबई की तर्ज पर यहां पर भी पब-लाउंज तथा विभिन्न होटलों, फार्म हाउस में रात को शुरू होने वाली भरपूर मस्ती की पार्टियां तड़के तक चलती रहती हैं। नशे के इन कुख्यात ठिकानों पर युवकों के साथ-साथ महिलाओं तथा युवतियों की बेखौफ भीड़ एक बारगी तो दंग ही कर देती है। नव धनाढ्य रईसों के बिगड़े लड़के-लड़कियों के इस मदमस्त जमावड़े को एमडी-गांजा तथा अन्य नशे के सामान मुहैया कराने के लिए ड्रग तस्कर वहीं के वहीं तंबू गाड़कर सेवा के लिए तत्पर रहते हैं। दो-तीन पब-लाउंज तो ऐसे हैं जिनके मालिक दमदार नेता हैं, या उनके बेटे-बेटी की भागीदारी है, जिन्हें आगे जाकर राजनीति करनी है और प्रदेश और देश की बागडोर संभाल कर अपने भ्रष्टाचारी बाप की तरह चांदी काटनी है। इन ऊंचे चेहरों के नशीले धंधों-फंदों पर पुलिस कार्रवाई करने से घबराती-कतराती है। दूसरे पब-लाउंज, फार्म हाऊस, हुक्का पालॅर शराबखाने आदि में खाकी वर्दी वाले कभी-कभी धड़धड़ाते हुए पहुंच कर कानूनी डंडा चलाने का दावा करते हैं, लेकिन नेताओं के अड्डों के दरवाजे के इर्द-गिर्द मंडरा कर लौट जाते हैं। महाराष्ट्र व विदर्भ के कई नेता एक साथ स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, बीयर बार, शराब दुकानें तथा पब-लाउंज चलाने की महारत रखते हैं। धन के लिए लोगों को बीमार भी करते हैं और दवा-दारू का इंतजाम भी बड़ी शान के साथ करते हुए समाजसेवा का डंका पीटते नज़र आते हैं। देश को खोखला करने में अग्रणी ये समाजसेवक अपराधियों से भी करीबी रखने में सिद्धहस्त हैं। 

संतरों के शहर में पड़ोसी शहरों के लड़के-लड़कियां काफी बड़ी संख्या में पढ़ने तथा नौकरी के लिए आते हैं। स्थानीय के साथ-साथ उन बाहरी कॉलेज छात्र-छात्राओं पर ड्रग तस्करों की नजरें सतत टिकी रहती हैं जिन्हें उनकी कमजोरियों के कारण अपने चंगुल में फंसाने में उन्हें आसानी होती है। युवाओं तथा नाबालिगों (हां, यह सच है) को पक्का नशेड़ी बनाने के लिए शुरू-शुरू में तो मुफ्त में गांजा और चरस, एमडी जैसे नशे थमाये जाते है। कुछ दिनों, हफ्तों के बाद इनकी लत लगने पर कीमत वसूली जाती है। जो घर-परिवार से संपन्न है। वे तो नशों का भुगतान कर देते हैं, लेकिन जिनकी हैसियत नहीं, लेकिन नशे के बिना रह नहीं पाते उन्हें मौत के सामानों को बेचने के लिए नये-नये ग्राहक तलाशने के काम पर लगा दिया जाता है। 

शहर की कई युवतियां ड्रग्स की डिलीवरी के काम में लगी हुई हैं। धनाढ्य घरानों की महिलाएं और युवतियां इनकी नियमित ग्राहक हैं। शहर की पॉश पार्टियों में भी ड्रग्स की डिलीवरी करने वाली नशेडी लड़कियों का हश्र भी किसी से छिपा नहीं। नशे ने इन्हें देह के धंधे में धकेल दिया है। खुद के ऊपर कालगर्ल का ठपा लगवा कर यह अपने वर्तमान से तो खुश हैं, लेकिन इनके डरावने कल का ऊपर वाला ही मालिक है।

चित्र-2 : पुणे शहर को महाराष्ट्र का सांस्कृतिक शहर भी कहा जाता है। यहां पर देश के विभिन्न प्रदेशों से लड़के-लड़कियां विभिन्न डिग्रियां लेने के लिए आते हैं। पुणे, लाखों युवाओं को नौकरियां देने में भी भेदभाव नहीं करता। सभी को खुशी-खुशी अपने में समाहित कर प्रसन्न कर देता है। इसी सांस्कृतिक शहर के बसस्टैंड पर खड़ी एक बस में 20 वर्षीय युवती नशेड़ी युवक की हवस का शिकार होकर अखबारों तथा न्यूज चैनलों की गर्मागर्म खबर बन गई। वासना के दलदल में डूबे शैतान ने अपनी मीठी-मीठी बातों के जाल में फंसाकर आधे घंटे से ज्यादा समय तक युवती को अपने कब्जे में रखते हुए दो बार बलात्कार का शिकार बनाया। युवती चीखती-चिल्लाती रही, लेकिन उसकी फरियाद वहीं सिमट कर दम तोड़ती रही। बस स्टैंड के बाहर पुलिस की तैनाती थी, लेकिन अंदर सन्नाटा था। बलात्कारी को पकड़ने के लिए पुलिस को 72 घंटे तक मशक्कत करनी पड़ी। वह पुणे के निकट स्थित एक गांव में जाकर छिप गया था। वहां के गन्ने के खेतों में वह दो दिनों तक छिपा-दुबका रहा। जब भूख और प्यास ने उसे परेशान किया तो वह अंधेरी रात में लस्त-पस्त हालत में अपने रिश्तेदारों के यहां भोजन-पानी के लिए जा पहुंचा। उसने उन्हें अपने गुनाह के बारे में भी बताया और यह भी कहा कि वह पुलिस से बचने के लिए भागता फिर रहा है। अब वह आत्म समर्पण कर आराम करना चाहता है। पानी की बोतल लेकर वह वापस गन्ने के खेत में जाकर सो गया। ग्रामीणों की सतर्कता और मदद से अंतत: उसे दबोच लिया गया। 

चित्र-3 : एक बीस वर्षीय युवती जो कि कॉलेज की छात्रा है उसे उसी की सहेली के रिश्तेदार युवक ने ढाबे पर पार्टी में शामिल होने के लिए बड़ी आसानी से मना लिया। दोनों ने ढाबे पर शराब और बीयर गटकी। युवती ने पहली बार नशा किया था। युवक उसे दुपहिया वाहन पर बैठाकर करीब के एक होटल में ले गया। उसने पहले से ही कमरा बुक करवा रखा था। कमरे में दाखिल होते ही वह छात्रा को जिस्मानी संबंध बनाने के लिए उकसाने लगा। छात्रा का माथा ठनका। युवक की वासना का शिकार होने से बचने के लिए वह उसे थोड़ा सब्र करने का लालीपॉप देकर बॉथरूम में चली गई। वहां से उसने बड़े धैर्य के साथ अपने किसी रिश्तेदार को घटना की संपूर्ण जानकारी देते हुए लोकेशन भी भेज दिया। उसका सजग रिश्तेदार कुछ ही मिनटों में वहां पहुंच गया और अनहोनी टल गई। युवक को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया है।

चित्र-4 : मंदिरों में लोग पूजा-पाठ के लिए जाते हैं। ईश्वर के प्रति अटूट आस्था उन्हें देवालयों में खींच कर ले जाती है। हर आस्थावान की यही सोच होती है कि जहां प्रभु बसते हैं, वहां उनकी सुरक्षा पर कभी कोई आंच नहीं आ सकती। उत्तरप्रदेश के शहर बदायूं में तीन बच्चों की मां रोजाना की तरह मंदिर में पूजा करने गई थी। उसे अकेले देख मंदिर के पुजारी की नीयत डोल गई। पुजारी के साथ-साथ उसके चेले और ड्राइवर ने पचास वर्षीय असहाय महिला की अस्मत लूटने के बाद उसके प्राइवेट पार्ट में रॉड डालकर तड़पा-तड़पा कर मार डाला। नृशंस बलात्कार और हत्या करने के पश्चात हवस के पुजारी ने अपने चेले और ड्राइवर की मदद से खून से लथपथ शव को जीप में डाला और उसके घर के बाहर फेंक कर फरार हो गया...।

Tuesday, March 4, 2025

अपमान की हथकड़ी

    वे गये थे खुशी-खुशी अपार धन कमाने। उनके मां-बाप को भी अत्यंत भरोसा था तभी तो उन्होंने अपनी जमीनें, घर, खेत और गहनेे बेचकर या गिरवी रख उन्हें अमेरिका जाने की इजाजत दी थी। लेकिन जब उनके बच्चे आतंकियों की तरह हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़कर वापस भारत की धरा पर लाये गए तो उनके होश फाख्ता हो गये। पैरों तले की जमीन ही जैसे गायब हो गई। उन्होंने घबराकर माथा ही पीट लिया। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के दोबारा राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के तुरंत बाद जब 104 अवैध अप्रवासियों को लेकर अमेरिकी सेना का विशेष विमान अमृतसर हवाई अड्डे पर उतरा तो पूरे देश में खलबली मच गई। भारतीयों को अमेरिका से ऐसे शर्मनाक बर्ताव की उम्मीद नहीं थी। यह तो शुरुआत थी। अमेरिका में अवैध तरीके से पहुंचे भारतीयों की जो तीसरी खेप अमृतसर पहुंची, उसमें 112 लोग शामिल थे। अवैध तरीके से अमेरिका गये भारतीयों का समर्थन यह कलम कतई नहीं करती, लेकिन हथकड़ियों, बेड़ियों में जकड़ने और सिखों की पगड़ी उतरवा कर उनका घोर अपमान करने के क्या मायने हैं? अमेरिका से भारत भेजे गए लोगों की दास्तानें जहां दिल को दहला कर रख देती हैं... वहीं, बार-बार चिंतन-मनन करने को उकसाती हैं कि अनेकों भारतीयों पर अवैध तरीके से विदेश जाने की यह कैसी सनक सवार है? 

    पंजाब के शहर लुधियाना में रहने वाले दलेर सिंह की किसी दिन इमिग्रेशन एजेंट सतनाम से मुलाकात हो गई। उसने दलेर को बताया कि अमेरिका में नोटों की बरसात हो रही है। उसे भी वह  अपनी जान-पहचान की ट्रांसपोर्ट कंपनी में काफी मोटी पगार वाली नौकरी दिलवा सकता है। सतनाम के फेंके जाल में फंसते ही दलेर सिंह ने अपना प्लॉट, घरवाली के जेवर और अन्य कीमती सामान 70 लाख रुपये में गिरवी रखे और उमंगों-तरंगों के साथ सारी रकम एजेंट को सौंप दी। 15 अगस्त, 2024 को अमेरिका जाने के लिए घर से निकले दलेर सिंह  को पहले दुबई और फिर ब्राजील में दो महीने तक यह भरोसा देकर रोके रखा गया कि, अमेरिका में अभी चुनावों का समय है। जिस वजह से वीजा रुका हुआ है। चुनाव निपटते ही उसका मनचाहा सपना पूरा होगा और वह मालामाल हो जाएगा। लेकिन जब दो महीने बीतने के बाद भी दलेर को गाड़ी आगे खिसकती नजर नहीं आयी तो उसने लगातार होती देरी को लेकर गुस्सा दिखाना प्रारंभ कर दिया तो एजेंट ने बड़ी मुश्किल से अमेरिका भेजने की तैयारी दिखाते हुए उसे एक गु्रप में शामिल कर दिया, जो पनामा के जंगलों के रास्ते से अमेरिका जा रहा था। पनामा के बीस किलोमीटर घने जंगल को चार दिनों तक पार करते-करते दलेर का दिल घबराने लगा और सिर चकराने लगा। रास्ते में जगह-जगह पर उन लोगों की लाशें और कंकाल बिखरे पड़े थे, जो अमेरिका जाने के लिए इन्हीं रास्तों से गुजरते-गुजरते जंगली जानवरों के शिकार हो गये थे या फिर बीमारी से थकहार कर मौत के मुंह में समा गए थे। किसी तरह से पनामा के जंगल पार करने के बाद वे सभी मैक्सिको पहुंचे और जब अमेरिका के तेजवाना बार्डर की ओर बढ़ ही रहे थे, तब सुबह-सुबह पेट्रोलिंग पुलिस के हत्थे चढ़ने पर ऐसी गिरफ्तारी हुई कि कई दिनों तक जेल की सलाखों के पीछे मर-मर कर दिन काटने पड़े।

    डंकी रूट यानी अवैध रास्ते से अमेरिका पहुंचे मनदीप की आपबीती भी दिल को दहलाकर रख देती है। हवाई जहाज से भारत लाते समय कई बार उनकी कनपटी पर बंदूक सटाकर गोली मारने की धमकी दी गई। मनदीप ने कई दिनों तक कमोड का पानी पीकर दिन गुजारे। उसके कपड़े, मोबाइल, कानों की बाली और सोने की चेन छीन ली गई। साठ लाख रुपये खर्च कर डंकी रूट के जरिये अमेरिका पहुंचे हरप्रीत को भी अमेरिका की पुलिस ने अपनी हिरासत में लेकर कू्ररतम यातनाएं देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जब अमेरिकी सैन्य कर्मियों ने जहाज पर चढ़ाया तो उसे पता नहीं था कि, उसे कहां ले जाया जा रहा है। उस जहाज पर 19 और लोग भी सवार थे, जिनमें महिलाएं समेत तीन बच्चे भी थे। पैरों में बेड़ियां व हाथों में हथकड़ियां और उस पर चालीस घंटे के बेहद थकाऊ सफर ने जिस नर्क से मिलवाया, उससे उसे अपनी गलती पर कहीं न कहीं बहुत गुस्सा भी आया और यह विचार भी जागा कि अच्छी-खासी खेतीबाड़ी और रोटी तो अपने देश में भी थी तो फिर ज्यादा धन कमाने के लालच में खुद को जानवरों की तरह क्यों भटकाया? अमेरिका से भारत लाये गये सिख युवाओं की विमान में चढ़ने से पहले पगड़ी उतरवाई गई। इससे भी सजग देशवासियों की भावनाएं अत्यंत आहत हुईं। अमेरिका जाने के चक्कर में अपना सबकुुछ लुटा चुके लोगों को अब अपना भविष्य अंधकारमय लग रहा है। अधिकांश ने अपनी जमीनें, जेवर आदि बेच डाले हैं या गिरवी रख दिए हैं। यानी अब वे खाली हाथ हैं। कोई भी कामधंधा करने के लिए पैसों की जरूरत होती है। अब यदि कुछ करेंगे नहीं तो लाखों रुपये का कर्जा कैसे चुकायेंगे? अपने बेहतर भविष्य के लिए यदि वे वैध तरीके से अमेरिका जाते तो उनकी ऐसी शर्मनाक दुर्गति नहीं होती। वैसे तो अपने देश के सभी प्रदेशों के लोगों पर विदेश में जाकर बसने और धन कमाने की धुन सवार है, लेकिन पंजाब के लोग इसमें सबसे आगे हैं। वहां तो अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा जैसे देशों में जाने की लहर सी चल पड़ी है। डॉलर की चमक ने उनकी आंखों को चुंधिया दिया है। उन्हें रुपयों के नहीं डॉलर के सपने आते हैं, इसलिए यदि उन्हें वीजा नहीं मिलता तो डंकी रूट से विदेश में घुसने का अपराध करने से नहीं कतराते तथा अवैध तरीके से विदेश भेजने वाले एजेंटों की साजिश का शिकार होने का बार-बार जोखिम उठाकर अपनी तथा देश की बेकद्री करने से भी बाज नहीं आते...। शातिर एजेंटो को 25 लाख रुपये से लेकर एक-एक करोड़ देने वाले अक्ल के कई अंधे बड़ी आसानी से मिल जाते हैं। ठगी करना तो उनका जन्मजात पेशा है। उन्हें दोष देना व्यर्थ है। सोचना तो उन लोगों को चाहिए जो अपने देश में मेहनत करके धन कमाने की बजाय विदेशों में जाकर बेइज्जत होने को तत्पर रहते हैं। अधिक से अधिक धन बटोरने के लालच में अपनी संस्कृति और विरासत को भूल गये हैं। गलत काम के अच्छे परिणाम तो आने से रहे। जिन्दगी कोई जुआ तो नहीं कि कहीं भी दांव लगाया और खुद की तथा मां-बाप की जीवन भर की खून-पसीने की कमाई लुटा दी...और बाद में बुरी तरह से अपमानित हो माथा पकड़ कर बैठ गए...।

भ्रम और अंध विश्वास

    वर्तमान में जहां विज्ञान ने अंध विश्वास, अंधश्रद्धा के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी। वहां भूत-प्रेत आत्मा, जादू-टोने और बेहूदा सपनों को गंभीरता से लेने वालों की जमात के बारे में क्या कहा जाए? समाज में व्याप्त अंधविश्वास को समाप्त करने की कोशिशों को पूरी तरह से कामयाबी क्यों नहीं मिल पा रही है? उत्तरप्रदेश के शहर जौनपुर में रहने वाला चिंताहरण नामक उम्रदराज शख्स बीते छत्तीस वर्षों से औरत बनकर रह रहा है। चिंताहरण प्रतिदिन दुल्हन की तरह श्रृंगार कर घर से निकलता है। पहले लोग उस पर हंसा करते थे, व्यंग्यबाण भी छोड़ा करते थे, लेकिन अब जौनपुर और आसपास के स्त्री, पुरुष, बच्चों और वृद्धों को उम्रदराज चिंताहरण को लाल साड़ी, बड़ी-सी नथ और झुमके पहने देख कतई भी अटपटा नहीं लगता। चिंताहरण मानता है कि यह अनोखा स्त्री-भेष उसका सुरक्षा कवच है, जिससे उसे तथा उसके परिवार को हिफाजत मिली हुई है। उसके किसी भी करीबी का बाल भी बांका नहीं हो सकता। उसका कहना है कि बीते छत्तीस सालों में मेरे परिवार के 14 सदस्य एक-एक कर इस दुनिया से विदा हो गये। ऐसे में मुझे बाकी बचे अपने बच्चों, अपने परिजनों और खुद के खत्म होने का भय सताने लगा था। मेरी रातों की नींद ही उड़ गई थी। कभी-कभार जब नाममात्र की नींद आती भी थी, तो सपने में दूसरी पत्नी रोती-बिलखती दिखायी देती, जिससे मैंने बेवफाई की थी। इस गम ने ही उसे आत्महत्या करने को विवश कर दिया था। एक दिन सपने में मैंने पत्नी से माफी मांगी और मेरे परिवार को बख्श देने का निवेदन किया। तब उसने मुझसे यह भेष धारण कर बाकी की जिन्दगी गुजारने को कहा तो मैंने प्रतिदिन दुल्हन की तरह सजना-संवरना प्रारंभ कर दिया। पहले लोग मुझ पर हंसा करते थे, लेकिन जब उन्हें मेरी विवशता का भान हुआ तो हमदर्दी जताने लगे। अब मेरी तथा बच्चों की जिन्दगी बड़े मजे से कट रही है। 

    सब्जी का कारोबार करने वाली दो सगी बहनें रांची के निकट स्थित एक गांव में लगने वाले साप्ताहिक बाजार में सब्जी खरीदने के लिए गईं थीं। शाम को जब वे लौट रही थीं तो रास्ते में इनका ऑटो खराब हो गया। जहां ऑटो बिगड़ा था वहां से कुछ ही दूरी पर उनके परिचित रहते थे। रात दोनों वहीं रुक गईं। सुबह-सुबह हाथ में सब्जी के थैले पकड़े शहर की तरफ बढ़ रही थीं तभी किसी ने अफवाह उड़ायी कि जादू-टोना और बच्चे चोरी करने वाली दो अनजान महिलाएं गांव में घूम रही हैं। बस फिर क्या था। कुछ ही मिनटों में दर्जनों ग्रामीण उन्हें घेर कर अंधाधुंध मारने लगे। इतने में भी उनका मन नहीं भरा। दोनों को पेड़ से बांधकर तब तक पिटायी की गई जब तक वे अधमरी नहीं हो गईं। भीड़ में शामिल कुछ लोगों ने मौका पाते ही दोनों के बाल भी काट दिए। यह अच्छा हुआ कि सूचना पाते ही पुलिस मौके पर पहुंच गई। वर्ना भीड़ तो दोनों को खत्म कर देने पर उतारू थी। देश में जहां-तहां जनता का ये आतंकी चेहरा डराने लगा है। उन्मादी भीड़ किसी पर भी हमला कर देती है। पुलिस की भी नहीं सुनी जाती। उलटा उसे भी मारा पीटा जाता है। मुजफ्फरपुर के माड़ीपुर चित्रगुप्त नगर में बच्चा चोरी के शक में भीड़ ने दो महिलाओं को पकड़ा और जमकर पीटा। पुलिस के पहुंचने से पहले दोनों बुरी तरह से जख्मी हो चुकी थीं। सड़क भी खून से लाल हो गई थी। इस घटना से दो दिन पूर्व भी कुछ लोगों ने एक विक्षिप्त उम्रदराज महिला को बच्चा चोरी के आरोप में सड़क पर डंडों और लातों से पीटकर अपंग बना दिया। 

    ओडिशा में गंजाब के जिलाधिकारी विजय अमृत कुलंगे ने जादू-टोना और अंधविश्वास से जुड़ी प्रथाओं से उबारने और लोगों को जागरूक करने के लिए यह ऐलान करना पड़ा कि जो व्यक्ति जादू-टोना भूतों के अस्तित्व को साबित कर देगा उसे बड़े आदर-सम्मान के साथ 50 हजार रुपये का इनाम दिया जायेगा। जिलाधिकारी को गंजाब जिले में जादू-टोने के नाम पर हुई हिंसा के बाद यह कदम उठाया। कुछ सप्ताह पूर्व ग्रामीणों ने जादू-टोने के शक में छह लोगों के दांत तोड़ दिए थे। उन्हें जबरदस्ती अपशिष्ट पदार्थ खिलाया गया था। डंडे, लाठियों और हाकियों से तब तक पीटा गया था, जब तक वे बेहोश नहीं हो गये थे। पीटने वाले ग्रामीण बस एक ही रट लगाये थे कि उनके द्वारा किये जाने वाले जादू-टोना के कारण ही उनके रिश्तेदार बीमार होते रहते हैं। यह भी काबिलेगौर है कि यह पिटायीबाज जादू-टोने से बीमार होने वाले अपने प्रियजनों को इलाज के लिए तंत्र-मंत्र और झाड़फूंक करने वाले बाबाओं के पास ले जाते हैं। उन्हें डॉक्टरों पर भरोसा नहीं है। जिलाधिकारी कुलंगे को हर सप्ताह आयोजित होने वाली जनसुनवाई में अंधविश्वास के जाल में फंसे लोगों की दलीलें और जादू-टोना संबंधी शिकायतों ने स्तब्ध कर दिया था। उन्होंने अंधविश्वासियों को बार-बार समझाया कि यह उनका भ्रम है कि जादू-टोना करने से कोई बीमार होता है। दरअसल, जादू-टोना और भूतों का कोई अस्तित्व ही नहीं होता। आज के वैज्ञानिक युग में इनकी कल्पना करना भी बेवकूफी है। लेकिन फिर भी जब अंधविश्वासी नहीं माने तो उन्होंने यह घोषणा कर दी, ‘‘भूत को ढूंढ़कर लाओ, 50 हजार इनाम पाओ।’’ अधिकारी इंतजार करते रह गए लेकिन कोई भी ऐसा इंसान सामने नहीं आया जो भूत को पकड़ कर लाता और इनाम पाता... फिर भी तंत्र-मंत्र और जादू-टोने को मानने वालों का कहीं कम, कहीं ज्यादा शर्मनाक अस्तित्व बरकरार तो है ही...!

Thursday, February 13, 2025

बदलाव के नायक

     अपने देश के आमजनों की दरियादिली बेमिसाल है। वे दूसरों की सहायता करने को हमेशा तत्पर रहते हैं। उनका मकसद ही खुशियां बिखेरना है। जिन कतव्यों और कार्यों को सत्ताधीश विस्मृत कर देते हैं उन्हें यह जागृत भारतवासी बड़ी दरियादिली और हिम्मत के साथ साकार कर दिखाते हैं। इन्हें न तो किसी प्रचार की भूख है और ना ही पुरुस्कार की तमन्ना। दरअसल, यही आम लोग भारत का असली चेहरा हैं, जिनमें हमदर्दी कूट-कूट कर भरी है और स्वार्थ से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। अभी तक आपने शहीद सैनिकों के परिवारों को पेट्रोल पम्प और जमीनें देने के आश्वासन के बाद उन्हें घनचक्कर बनाने की कई खबरें पढ़ी-सुनी होंगी। सरहद पर जंग लड़कर अपंग हो जाने वाले सैनिक के साथ धोखाधड़ी की खबरें भी पढ़ी होंगी और यह भी पढ़ा-सुना होगा कि सरहद पर लड़ाई लड़ने के बाद अपंग हुए कई पूर्व सैनिक रिक्शा चला रहे हैं, चाय-पान के ठेले लगा कर अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। सत्ताधीशों ने उनसे जो सहायता देने के वादे किये थे, उन्हें पूरा ही नहीं किया गया है। भूला दिया गया यह खबर...यह हकीकत यकीनन देश के झूठे, लफ्फाज और मक्कार राजनेताओं और सत्ताधीशों के मुंह पर झन्नाटेदार तमाचा ही है : 

    ‘‘मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के बेटमा गांव में रहने वाले मोहन सिंह सुनेर वर्ष 1992 में त्रिपुरा में उग्रवादियों से लड़ते हुए शहीद हो गये थे। उनके दो बच्चे थे। शहीद की पत्नी राजूबाई ने एक छोटी-सी झोपड़ी में रहकर मेहनत मजदूरी करते हुए अपने दो बच्चों का लालन-पालन किया। जब मोहनलाल शहीद हुए थे तब देश भर के अखबारों में उनके साहस और त्याग की कई कहानियां प्रकाशित की गयी थीं। सरकार ने भी उनके परिवार को हर तरह की सहायता देने का आश्वासन भी दिया था, लेकिन बाद में सरकार ने उनकी पत्नी और बच्चों की कोई सुध लेना जरूरी नहीं समझा। शहीद के गांव के सतर्क युवाओं को सरकार का यह शर्मनाक रवैया बहुत कचोटता रहा। ऐसे में उन्होंने अपने दम पर शहीद की पत्नी की सहायता करने की ठानी। टूटी-फूटी झोपड़ी में रह रहे शहीद परिवार को पक्का मकान उपहार में देने के लिए उन्होंने विभिन्न शहरों, गांव के लोगों से आनन-फानन में चंदे के जरिए 11 लाख रुपये जुटाये और स्वतंत्रता दिवस के दिन शहीद परिवार को दस लाख रुपये का सर्वसुविधा युक्त एक मकान भेंट किया। बाकी के बचे एक लाख रुपये शहीद की पत्नी को दे दिए। इन सच्चे देशप्रेमी युवाओं ने शहीद की उम्रदराज पत्नी से राखी बंधवाई और उसके बाद अपनी हथेलियां जमीन पर रखकर उनके ऊपर से गृह प्रवेश करवाया। 

    हमारे देश में ज्यादातर खाकी वर्दी धारियों को लेकर लोगों की राय अच्छी नहीं है। उनके कटु व्यवहार और असहयोग तथा संवेदनशीलता की कमी की वजह से यह धारणा बनी है।  अरुप मुखर्जी पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के मूल निवासी हैं। पुलिस विभाग में कार्यरत हैं। आदिवासियों के बच्चे उन्हें बड़े आदर के साथ ‘पुलिस वाला बाबा’ कहकर बुलाते हैं। इस पुलिसवाला बाबा ने सबर आदिवासियों के जीवन में परिवर्तन लाने का अभियान चला रखा है। ध्यान रहे कि सबर दलित जनजाति है, जिन्हें आपराधिक जनजाति अधिनियम 1971 के तहत अंग्रेजों ने आपराधिक जनजाति घोषित कर दिया था। देश के प्रदेश छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में यह सबर आदिवासी रहते हैं। अरुप मुखर्जी को बचपन में सबर आदिवासियों के बारे में अक्सर सुनने को मिलता था कि यह लोग चोरी-डकैती कर अपना घर-परिवार चलाते हैं। कई लोग तो नक्सली आंदोलन से भी जुड़े हैं। उनके अपराध में लिप्त रहने की प्रमुख वजह रही अशिक्षा और गरीबी। तब अरुप की दादी अक्सर रात को छुपते-छुपाते सबर समुदाय के लोगों के घरों में जाकर उन्हें खाने-पीने का सामान पहुंचाया करती थीं। अरुप के मन में तब विचार आता था कि अगर यह लोग पढ़ लिख जाएं तो इनमें काफी बदलाव और सुधार आ सकता है। गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी ही इन्हें चोर, डाकू बनने को मजबूर करती है। बच्चों को भी बड़ों का अनुसरण करने को विवश होना पड़ता है। अरुप ने पढ़ाई के दौरान आदिवासियों के बच्चों को शिक्षित कर उनके भविष्य को संवारने का जो सपना देखा था, पुलिस की नौकरी लगते ही उसे साकार करने में जरा भी देरी नहीं लगायी। उन्होंने जब कुछ लोगों के समक्ष सबर दलित जनजाति के बच्चों के लिए स्कूल खोलने का अपना इरादा व्यक्त किया तो उनकी हंसी उड़ायी गयी। यह संकीर्ण मनोवृत्ति के लोग कतई नहीं चाहते थे कि आदिवासी बच्चे शिक्षित होकर अपना भविष्य उज्ज्वल कर पाएं , लेकिन पूंचा गांव के एक उदार शख्स, जिनका नाम खिरोदासी मुखर्जी है, ने खुशी-खुशी स्कूल बनाने के लिए मुफ्त में अपनी जमीन दे दी। स्कूल का उद्घाटन एक सबर बच्चे से करवाया गया। प्रारभ काल में स्कूल में मात्र एक बरामदा और दो कमरे थे, जहां बीस छात्र-छात्राएं बैठ पाते थे, लेकिन अब काफी विस्तार हो चुका है। स्कूल में नौ कमरे हैं। सीसीटीवी कैमरे लगा दिये गये हैं। स्कूल में बच्चों के रहने-खाने-पीने की निशुल्क व्यवस्था है। भोजन, कपड़े और शिक्षण सामग्री के लिए भी एक पैसा नहीं लिया जाता। कालांतर में कुछ जागरूक लोगों ने हर महीने मदद करनी प्रारंभ कर दी। स्वयं अरुप भी अपनी तनख्वाह का अधिकांश हिस्सा स्कूल के लिए खर्च कर देते हैं। बीते वर्ष एक लड़की ने बहुत अच्छे नंबरों के साथ मेट्रिक की परीक्षा पास की तो उनसे दूरी बनाने वाले भी चकित रह गये। सर्वत्र खुशी का माहौल था। जो माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजने से कतराते थे उन्होंने भी खुशी-खुशी अपने बच्चों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजना प्रारंभ कर दिया है। आदिवासी बच्चों को अपराध के रास्ते पर जाने से रोकते हुए उनके हाथों में किताबें थमाने वाले इस खाकी वर्दीधारी का कहना है कि मुझे इस समुदाय के बच्चों को शिक्षा दिलाने के लिए ही ईश्वर ने इस धरती पर भेजा है। मैं इन्हें भूख से मरने नहीं देना चाहता और न ही अपराध के मार्ग पर चलते देखना चाहता हूं। 

    एक काबिलेगौर सच यह भी...। आप और हम अक्सर अखबारों में पढ़ते रहते हैं कि कहीं चोरी-डकैती, हत्या या और कोई जघन्य अपराध होने के बाद शहरों और ग्रामों की पुलिस सबसे पहले उन गुंडे बदमाशों पर ध्यान केंद्रित करती है, जो घोषित कुख्यात अपराधी होते हैं। कभी-कभी तो कुछ अभ्यस्त अपराधियों को शंका के आधार पर गिरफ्तार भी कर लिया जाता है। कुछ वर्ष पूर्व बहुत जोर-शोर से ऐसा ही होता था सबर आदिवासियों के साथ। जब गांव में इनके बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए स्कूल नहीं खुला था तब जिले में कहीं भी चोरी, लूट या डकैती होती तो सबर समुदाय के लोगों की धड़ल्ले से पकड़ा-धकड़ी शुरू हो जाती थी। कई बार निरपराध होने के बावजूद भी उन्हें पुलिसिया डंडों का शिकार होना पड़ता था, लेकिन अब जबसे उनके बच्चे बड़े उत्साह के साथ स्कूल जाने लगे हैं तो उनके पालकों में भी सुधार आया है। उनकी सोच भी बदली है। वे अपराध करने की बजाय मेहनत-मजदूरी करने लगे हैं। पुलिस के साथ-साथ लोगों की सोच में भी इन आदिवासियों के प्रति काफी बदलाव आया है।

Thursday, February 6, 2025

अच्छा-बुरा

    मौनी अमावस्या पर प्रयागराज में अमृत स्नान के लिए उमड़ी भारी भीड़ के अनियंत्रित होने से मची भगदड़ में तीस से ज्यादा श्रद्धालुओं की मौत हो गई। यह सरकारी आंकड़ा है। इस पर लोगों को यकीन कम और अविश्वास ज्यादा है। सरकारें अक्सर इस तरह का झूठ बोलने, प्रचारित करने का करतब दिखाती रही हैं। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि, महाकुंभ में मौत के तांडव ने 100 से अधिक लोगों की जिन्दगी छीनी है और अनेकों को बुरी तरह से घायल कर अस्पताल पहुंचाया है। दुनिया के सबसे बड़े आस्था के मेले के अवसर पर भारी भीड़ का उमड़ना कोई नई बात नहीं है। कुंभ मेलों का पूर्व का इतिहास भी भगदड़ के कारण मरने वाले श्रद्धालुओं के सच्चे, झूठे आंकड़ों को अपने में समेटे है। देश की आजादी के बाद 1954 में आयोजित हुए कुंभ मेला में 800 श्रद्धालु मौत के मुंह में समा गए थे। यह सरकारी आंकड़ा था, जबकि कम-अज़-कम 1000 लोगों की मौत होने के दावे किये गये थे। तब मेले में भगदड़ की वजह थी, एक खबर जिसमें कहा और प्रचारित किया गया था कि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू आ रहे हैं। बस फिर क्या था। उन्हें देखने के लिए भीड़ टूट पड़ी। अपार भीड़ को अपनी तरफ आता देखकर नागा संन्यासी इस भ्रम के शिकार हो गये कि लोग उन्हें मारने के लिए भागे चले आ रहे हैं इसलिए वे त्रिशूल-तलवारों के साथ उन पर टूट पड़े। लोग डर के मारे इधर-उधर भागने लगे। देखते ही देखते भगदड़ ने विराट रूप ले लिया। लोग मरते-कटते और एक-दूसरे पर गिरते-पड़ते चले गए। कई श्रद्धालु तो जान बचाने के लिए बिजली के खंभों से चढ़कर तारों पर जा लटके और अपने प्राण गंवा बैठे।  

    भारत के चार पवित्र स्थानों, प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में हर बारह साल के अंतराल में होनेवाले महाकुंभ में करोड़ों भारतीयों के साथ-साथ विदेशी भी शामिल होते हैं। दरअसल, महाकुंभ न केवल धार्मिक पर्व है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिकता और एकता का प्रतीक भी है। ...यह मान्यता भी है कि महाकुंभ के दौरान संगम में स्नान करने से पापों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति होती है। अचानक मची भगदड़ में जिन लोगों ने अपनों को खो दिया, उनकी पीड़ा और वेदना अनंत है। यह दर्द ताउम्र उनके साथ रहने वाला है। सबसे बुरा हाल महिलाओं तथा बच्चों का हुआ, जो गिरकर दोबारा उठ नहीं सके। करोड़ों की भीड़ को संभालने के लिए पुलिस भी कम पड़ गई। भीड़ में बिछड़ चुके अपनों को खोजना आसान नहीं था। कभी इस अस्पताल तो कभी उस अस्पताल तथा खोया-पाया केंद्रों में पूछताछ करते-करते उन्हें कई तरह के ख्याल आते रहे। ग्वालियर से पंद्रह लोगों के साथ महाकुंभ मेला में आई शकुंतला देवी को उसके परिजन तलाशते-तलाशते थक गए। देवरिया से मौनी अमावस्या पर स्नान करने आई माया सिंह भीड़ में एकाएक ऐसी गुम हो गईं कि खोजना मुश्किल हो गया। उनके पति जनार्दन का रो-रोकर बुरा हाल था। महाकुंभ से स्नान कर लौटे हमारे एक करीबी रिश्तेदार ने बताया कि, दो-दिन पहले से ही कई श्रद्धालु स्नान के लिए संगम स्थल पर डेरा डालकर बैठे थे। उन्हें यकीन था कि उन्हें सबसे पहले स्नान करने का सौभाग्य मिलेगा, लेकिन जैसे ही मौनी अमावस्या के स्नान की घोषणा हुई, तो देश के कोने-कोने से आए अन्य श्रद्धालुओं की बेताब भीड़ बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ने लगी, जिससे पहले बैठे श्रद्धालु कुछ समझ ही नहीं पाए। इस चक्कर में जो भगदड़ मची, उसी से हालात बिगड़ गये। पुलिस और सुरक्षा बल भीड़ को नियंत्रित करने में पूरी तरह से असफल रहे। गौरतलब है कि, स्नान के लिए 24 घाटों के होने के बावजूद संगमघाट पर ही स्नान करने की जिद बहुत भारी पड़ी। इस घटना केे बाद सभी रास्ते बंद कर दिये गए। इससे कई लोगों को दो दिन तक एक ही जगह पर अटके रहना पड़ा। कई आस्थावानों की वापसी की रिजर्वेशन थी, लेकिन वे नहीं जा पाए। इतनी मौतों के बाद कुछ बदमाश किस्म के लोग मौके का फायदा उठाने से नहीं चूके। कुछ मृतकों और घायलों के सामान गायब कर दिये गए। पांच-दस रुपये कीमत वाले खाद्य पदार्थों के लिए पचास-साठ रुपये चुकाने को विवश होना पड़ा। कई मोटर साइकिल वालों ने श्रद्धालुओं को संगम घाट पहुंचाने के लिए दो से तीन हजार रुपए वसूल कर अपनी निर्दयता और घोर मौका परस्ती का उदाहरण पेश किया। एक तरफ भगदड़ मची थी, दूसरे तरफ कुछ अराजक तत्व लूटमार में लगे थे। दुकानों से सामानों को लूटने की नीचता करने वालों के लिए मेला अपना घर भरने का ऐसा सुनहरा मौका था, जो बार-बार नहीं आता। लोगों को आतंकित करने के लिए हथियार लहराने के साथ-साथ तोड़फोड़ भी की गई। भगदड़ में अपने पति को खो चुकी एक महिला को सड़क पर छाती पीटकर रोते-बिलखते देखा गया। किसी ने उसके पैसे और कीमती सामान पर हाथ साफ कर दिया था। मृत पति के शव को बिहार ले जाने के लिए एंबुलेंस वाले उससे 20 हजार रुपये मांग रहे थे, लेकिन उसके पास देने के लिए एक धेला भी नहीं था। निर्दयी, शैतान लोगों की बेरहमी से आहत महिला गुस्से में कहती नज़र आईं ‘क्या देह बेचकर पैसा दूं? कुंभ मेले में चोर-चकारी, ठगी और लूटमारी करने वालों की खबरों के बीच इस खबर ने बहुत राहत और तसल्ली बख्शी, ‘‘एक मेहनतकश युवक ने अपनी प्रेमिका की सलाह पर महाकुंभ मेले में दातून बेचने का अपना छोटा-सा व्यवसाय शुरू किया और सिर्फ पांच दिनों में 40,000 रुपये कमा लिए। जब उससे पूछा गया कि, उसे यह बिजनेस करने का विचार कहां से आया, तो उसने मुस्कुराते हुए गर्व से जवाब दिया कि, उसकी गर्लफ्रेंड ने उसे आइडिया दिया कि, दातून बेचने में कोई पूंजी नहीं लगती और वह इसे मुफ्त में लाकर बेच सकता है। उसी की प्रेरणा से वह अब अच्छी कमाई कर रहा है और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन गया है। यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है और लोग युवक की ईमानदारी और सच्चे प्रेम को सराह रहे हैं। एक यूजर ने लिखा-कभी भी ऐसी अद्भुत प्रेमिका को धोखा मत देना। दूसरे ने कहा-सच्चा आदमी, जिसने अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपनी गर्लफ्रेंड को दिया।’’

Thursday, January 30, 2025

प्रतिशोध

    कुछ लोग अपने अहंकार के कवच को उतार फेंकने में बहुत देरी लगा रहे हैं। उन्हें गरीब, असहाय, पिछड़े भारतीय कीड़े-मकोड़े से लगते हैं। वे इन्हें कुचल देना चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह याद दिलाना भी जरूरी है कि, वक्त बदल रहा है। दलितों, शोषितों और असहायों पर अत्याचार करना बहुत महंगा पड़ सकता है। महात्मा गांधी छुआछूत के खात्मे के लिए जीवनभर लड़ते रहे। आजादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी शोषक प्रवृत्ति के लोग दंभ और घटिया सोच का दामन कसकर थामे हुए हैं। कर्नाटक का एक छोटा-सा गांव है मारकुंबी। इस गांव में ऐसे सवर्णों का वर्चस्व है, जो यह मानते हैं कि दलितों और गरीबों को इस दुनिया में सम्मान के साथ जीने का कोई हक नहीं है। कोई दलित यदि पढ़-लिखकर ऊंचे ओहदे पर पहुंच जाता है, तो इनके सीने में सांप लोट जाता है। मारकुंबी गांव में एक नाई की दुकान है, जहां बिना किसी भेदभाव के सभी की दाढ़ी और बाल काटे जाते थे, लेकिन एक दिन अचानक नाई ने दलितों के बाल काटने से मना कर दिया। दलितों के विरोध जताने पर नाई ने अपनी पीड़ा और परेशानी बतायी कि, सवर्णों की चेतावनी के समक्ष वह बेबस है। उसे चेतावनी दी गयी है कि, वह दलितों को अपनी दुकान की चौखट पर पैर भी न रखने दे। यदि उनकी बात नहीं मानी गयी तो उसकी खैर नहीं। दलितों के बढ़ते आक्रोश को देख सवर्ण तिलमिला गये। इनकी इतनी जुर्रत कि हमारे सामने सिर उठाएं। दलित और सवर्ण आमने-सामने डट गए। मारा-पीटी की नौबत आने में देरी नहीं लगी। आपसी संघर्ष में 27 लोग घायल हो गए। दलितों के तीन मकान राख कर दिये गये। दरअसल, देश के कई ग्रामीण इलाके ऐसे हैं, जहां सवर्णों, धनवानों और बाहुबलियों की तूती बोलती है। उन्हीं का शासन चलता है। उनके अहंकार की कोई सीमा नहीं है। उनके लिए यह 21वीं सदी नहीं, सोलहवीं सदी है। वे कुछ भी करने को स्वतंत्र हैं। उन्हें लगता है कि यह देश सिर्फ उन्हीं का है। सत्ता भी उनकी, शासक भी उनके। 

    कर्नाटक के बेल्लारी जिले के तलुर गांव में भी मारकुंबी की तरह सवर्णों ने तांडव मचाया। यहां भी सवर्णों की दादागिरी से खौफ खाकर नाईयों ने दलितों के बाल काटने से इंकार कर दिया। यहां भी आपस में खूब जूते और डंडे चले। जमकर हाथापाई हुई। नाईयों के द्वारा दलितों के बाल काटने में असमर्थता जताने में पंचायत के उस आतंकी फरमान का बहुत बड़ा योगदान रहा, जिसमें साफ-साफ कहा गया कि किसी भी हालत में दलितों के बाल न काटे जाएं। जिस कुर्सी पर बाल कटवाने तथा दाढ़ी बनवाने के लिए सवर्ण और धनवान बैठते हैं, उसके आसपास दलितों को न फटकने दिया जाए। जिस आईने में सवर्ण अपना चेहरा निहारते हैं, उस पर तो किसी भी हालत में दलितों की परछाई नहीं पड़नी चाहिए। इस ऐलान के विरोध में पांच दिनों तक गांव के पांचों सैलून बंद रहे। सैलून मालिक भी इस भेदभाव की नीति के खिलाफ देखे गए। धारवाड जिले के हुबली तहसील के गांव कोलीवाड के दलितों को बाल कटवाने के लिए मीलों दूर हुबली जाना पड़ता है। बुजुर्ग शांत हैं, लेकिन दलित युवकों का गुस्सा उफान पर है। पता नहीं वे क्या कर गुजरें। उनका कहना है कि, अब हम इस जुल्म को सहन नहीं कर सकते। हमें कमजोर कतई नहीं समझा जाए। हम भी इसी देश के नागरिक हैं। इस पर हमारा भी उतना हक है, जितना दूसरों का। ऐसे में भेदभाव करने वालों के दबाव में हम क्यों आएं। हम चुप नहीं रहेंगे। ईंट से ईंट बजा देंगे। उम्रदराज लोग तो गांव से दूर जाकर बाल कटवा सकते हैं, लेकिन बच्चे कहां जाएं? सदियों से सबलों की चलती आयी है। ताकतवर धनवानों ने निर्बलों-गरीबों का गला काटा है। सामंती सोच रखने वालों ने दलितों के शोषण के लिए नये-नये तरीके ईजाद कर रखे हैं। यह आज़ादी का मजाक नहीं तो क्या है? 

    मध्यप्रदेश के इंदौर शहर के निकट स्थित पीथमपुर से 15 किलोमीटर दूर बसा है सुलवाड़ गांव। इस गांव में किसी दलित की शवयात्रा सवर्णों की गली से नहीं गुजर सकती। दलितों की शवयात्रा गांव के कच्चे रास्ते से निकलती है। दलित डामर वाली सड़क से जुलूस आदि भी नहीं निकाल सकते। दलितों को 90 साल के कुवरा पूनम की मौत की अंतिम यात्रा अच्छी तरह से याद है। बेटों ने अंतिम यात्रा के लिए बैंड-बाजे बुलवाए थे। जैसे ही यात्रा गांव के भीतर पहुंची, तभी एकाएक पथराव हुआ और सवर्णों ने दलितों पर लाठियां बरसायीं और उन्हें धमकाया और डराया। दलितों को शवयात्रा को पलटा कर गांव के बाहरी गंदे रास्ते से ले जाना पड़ा। बेटों ने पुलिस, कलेक्टर और सरकार तक अपनी शिकायत पहुंचायी, लेकिन किसी ने नहीं सुनी। मदमस्त सवर्णों ने दलितों का हुक्का-पानी बंद कर दिया। 

    देश की राजधानी दिल्ली में एक युवक जबरन पीटा गया। उसका कसूर था कि, वह दलित था। वह जब घुड़ चढ़ी की रस्म निभाने के लिए बग्घी पर सवार हो रहा था, तो उसी दौरान दो दबंग युवक अपनी दादागिरी दिखाने लगे। उन्होंने दूल्हे पर अपशब्दों की तेजाबी बौछार की और घोड़े पर चढ़ने से रोका। विरोध किये जाने पर दूल्हे तथा उसके परिजनों को भी मारा-पीटा गया। दबंगों को दलित की तामझाम वाली शादी और घुड़ चढ़ायी शूल की तरह चुभ गयी। ऐसे में उन्होंने अपना आपा खोने में जरा भी देरी नहीं लगायी और अपनी औकात पर उतर आये। अभी हाल ही में एक दलित दूल्हे की बारात में बारातियों से ज्यादा पुलिस वाले के शामिल होने की खबर देशभर के अखबारों में छपी। राजस्थान में स्थित लबेरा गांव में दूल्हे के घरवालों को आशंका थी कि, दूल्हे की आन-बान और शान के साथ घोड़ी पर बारात निकलने से कुछ दबंग आपत्ति और विरोध के स्वर बुलंद करते हुए मारपीट कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने विवाह समारोह से पहले प्रशासन से सुरक्षा व्यवस्था करने की गुहार लगाई। दरअसल इस गांव में लगभग बीस वर्ष पूर्व एक दूल्हे के घोड़े पर बारात निकालने से सामंती सोच वाले कुछ लोगों ने ऐतराज जताते हुए दलित दूल्हे को घोड़ी से नीचे गिरा दिया था। इसी घटना की याद अभी भी उनके मन में बसी हुई थी, लेकिन तब और अब में काफी बदलाव आ चुका हैं, तब तो दलित शांत रह गए थे, लेकिन अब उनका विरोध भी हिंसक हो सकता था। इसलिए प्रशासन ने सतर्क होते हुए सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद कर दी। बारात में जहां बारातियों की संख्या बीस-पच्चीस, वहीं खाकी वर्दी पचास-साठ की संख्या में बारात के साथ-साथ चल रहे थे। तामिलनाडु के मदुरै के निकट स्थित एक ग्राम में सत्रह वर्षीय दलित लड़के को दबंगों ने उसकी जाति के कारण जानवरों की तरह मारा-पीटा और गंदी-गंदी गालियां दीं। इतना ही नहीं एक छह वर्ष के बच्चे की मौजूदगी में उस पर पेशाब कर अपनी गुंडागर्दी का नंगा नाच किया। अपमान और प्रतिशोध की आग में जल रहे किशोर ने पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखवाने के बाद कहा कि वक्त आने पर वह उन्हें जरूर सबक सिखायेगा और ऐसे नानी याद दिलायेगा कि वे दलितों पर जुल्म ढाने की हिम्मत नहीं कर पायेंगे। आपसी मनमुटाव, भेदभाव, ईर्ष्या और अहंकार की भावना अब तो आदिवासियों में भी सिर उठाने लगी है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में स्थित छिंदावाड़ा गांव में एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार में विघ्न डाले जाने के कारण उसका शव कई दिनों तक शवगृह में इसलिए पड़ा रहा, क्योंकि गांव के लोगों ने एक साल पहले सर्वसम्मति से फैसला किया था कि ईसाई आदिवासियों को गांव में शव को दफन करने की इजाजत नहीं दी जाएगी। ऐसे कितने ही मामले अक्सर पढ़ने और सुनने में आते हैं। यह सब कुछ उन राजनेताओं की आंखों के सामने होता चला आ रहा है, जो दलितों शोषितों के मसीहा कहलाते हैं। वे तो दलितों और शोषितों के वोटों की बदौलत कहां से कहां पहुंच गये पर ये शोषित और गरीब अपमान का घूंट पीते हुए वहीं के वहीं खड़े जद्दोजहद कर रहे हैं। आजादी का असली मज़ा तो चंद दलित नेता ले रहे हैं। एक बार सत्ता पाते ही राजा-महाराजाओं को मात देने लगते हैं। पूंजीपति राजनेताओं और धन्नासेठों के साथ उठना-बैठना शुरू हो जाता है और उनके रंग में रंगकर दलितों और गरीबों को पूरी तरह से भूल जाते हैं।

Thursday, January 23, 2025

महाकुंभ में...

    इस बार के महाकुंभ का जलवा अद्भुत और खास है। भस्म लपेटे, जटाधारी, गेरूआ वस्त्र पहने साधुओं की भीड़ में कई अचंभित करते चेहरे भी नजर आ रहे हैं। देश और विदेशों से भी कई साधु-संत और पर्यटक इस आस्था के उत्सव में शमिल होकर मीडिया की सुर्खियां पा रहे हैं। सोशल मीडिया में छाये बाबा गिरी, अभय सिंह उर्फ आईआईटीयन बाबा, तीन फीट के गंगापुरी बाबा, चायवाले बाबा, भक्तों को अपने हाथ से रबड़ी बनाकर खिलाने वाले बाबा, बीस किलो चाबियां लेकर चलने वाले बाबा, एम्बेसडर कार दौड़ाते बाबा, सात फीट के बॉडी बिल्डर बाबा के साथ-साथ और भी कई साधु-संतों के क्रियाकलापों तथा असली-नकली खूबसूरत साध्वियों के सोशल मीडिया पर वायरल होते वीडियो ने महाकुंभ को मनोरंजक भी बना दिया है। इसमें दो मत नहीं कि, भारतीय संस्कृति में संत महात्माओं की विशेष अहमियत है। सभी संत अपनी-अपनी विशेषताओं के लिए जाने जाते हैं। नागा साधु अपनी रहस्यमयी दुनिया और जीवनशैली के लिए हमेशा जिज्ञासा का विषय रहे हैं। पुरुष नागा साधु तो कभी-कभार देखने में आ जाते हैं। उनकी शाही सवारी और स्नान की भी चर्चाएं और खबरें सुनने-पढ़ने में आती रहती हैं। लेकिन महिला नागा साध्वियां ज्यादातर लोगों की नजरों से दूर ही रहती हैं। लेकिन इस बार प्रयागराज के महाकुंभ में इनकी उपस्थिति ने स्तब्ध कर दिया है। अपनी तमाम इच्छाओं और धन दौलत का त्याग करना कतई आसान नहीं होता। साधु और साध्वी बनना हर किसी के बस की बात नहीं है। यह आस्था और भक्ति का ऐसा मार्ग है, जहां खुद को पूरी तरह से बदल देना पड़ता है। गुफाओं, जंगलों-पहाड़ों के एकांत में तप और तपस्या करनी पड़ती है। कुंभ मेले में कई साधु-संत और तपस्वी अपार उत्सुकता, जिज्ञासा और आकर्षण का विषय बने हुए हैं, जिनकी तपस्या और जीवन यात्रा अद्भुत और स्तब्ध करने वाली है। उन्हीं में शामिल हैं योग साधक स्वामी शिवानंद। भारत सरकार के द्वारा पद्मश्री से सम्मानित शिवानंद महाराज की आधार कार्ड के अनुसार उम्र 128 वर्ष है। उम्र के इस पड़ाव पर होने के बावजूद पूरी तरह से सक्रिय शिवानंद बाबा हर कुंभ में शामिल होते हैं। उनका यह सिलसिला 100 साल से निरंतर बरकरार है। बाबा कभी किसी से दान-दक्षिणा नहीं लेते। उबला हुआ खाना खाते है और अभी भी कठिन से कठिन आसन बड़ी आसानी से कर लेते हैं। इनके माता-पिता अत्यंत गरीब थे। भीख मांग कर किसी तरह से दिन काट रहे थे। चार साल की उम्र में मां-बाप ने इन्हें गांव में पधारे संत ओंकारानंद गोस्वामी के हवाले कर दिया, ताकि कम अज़ कम उनके बच्चे को खाना तो मिल जाए। शिवानंद ने चार साल की उम्र तक दूध, फल, रोटी अच्छी तरह से नहीं देखी थी, कालांतर में यही इनकी जीवनशैली बन गई। अभी भी आधा पेट ही भोजन करते हैं। बाबा रात को नौ बजे सो जाते है और नियमित सुबह तीन बजे उठते हैं और शौच आदि से निवृत्त होकर योग साधना में लीन हो जाते हैं। दिन में कभी भी उन्हें सोते नहीं देखा गया। युवाओं को उनका यही संदेश है कि, प्रतिदिन सुबह जल्दी उठो। आधा घंटा हर हालत में योग करो। टहलना कभी भी न भूलो। संतुलित जीवन शैली अपनाओगे तो हमेशा स्वस्थ रहोगे।

    41 साल से मौन व्रत पर हैं दिनेश स्वरूप ब्रह्मचारी। महाकुंभ में भीड़ से घिरे रहनेवाले इन बाबा को चायवाले बाबा के नाम से भी जाना जाता है। बाबा ने पिछले 41 वर्षों से अन्न, जल ग्रहण नहीं किया है। वे सिर्फ चाय पीते हैं। अपने अटूट संकल्प के बारे में किसी से कोई जानकारी साझा नहीं करते। हर बात का जवाब लिखकर देते हैं। वह बाएं हाथ से लिखते हैं। उनकी कलम जब चलती है तो बोलने की स्पीड को मात देती प्रतीत होती है। बाबा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यार्थियों को एक कुशल अध्यापक की तरह पढ़ाते हैं। वे नोट्स तैयार करके देने के साथ-साथ छात्रों की शंकाओं का समाधान मोबाइल पर टाइप करके भेजते हैं। उनके पढ़ाये 40 से ज्यादा छात्र उच्च अधिकारी बन चुके हैं। महाकुंभ में भी छात्र उन्हें घेरकर सफलता के गुरू मंत्र लेते दिखाई देेते हैं। अंग्रेजी और गणित जैसे विषयों के विशेषज्ञ हठयोगी चायवाले बाबा कहते है कि, वह तो ज्ञान की गंगा में प्रतिदिन डुबकी लगाते हैं। उनका हर दिन शाही स्नान की तरह होता है। महाकुंभ मेले में पधारे आचार्य महामंडलेश्वर अरुण गिरी अपने अनुयायियों को दो पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करते हैं। एक पेड़ अंतिम संस्कार के लिए और एक पीपल का पेड़ आक्सीजन के लिए। 2016 में वैष्णोदेवी से कन्याकुमारी तक बाबा ने 27 लाख पौधे वितरित किए। एक करोड़ से अधिक पेड़ लगाने का संकल्प ले चुके अरुण गिरी को उनके भक्त बड़े मान-सम्मान के साथ ‘पर्यावरण बाबा’ कहते हैं। 

    प्रयागराज में आयोजित महाकुंभ में अनेकों विदेशी बाबाओं की साधना और तपस्या लोगों को प्रेरित और आकर्षित कर रही है। अमेरिका में जन्मे और अमेरिकी सेना में सैनिक रहे माइकल वर्ष 2000 में अपनी पत्नी और बेटे के साथ भारत आए थे। तब वे विभिन्न धार्मिक स्थलों के भ्रमण और साधु-संतों के प्रवचनों से अत्यंत प्रभावित हुए थे। दो वर्ष के पश्चात उनके पुत्र का आकस्मिक निधन हो गया। उन्हें गम और तनाव ने बुरी तरह से घेर लिया। तब उन्हें भारत में बिताये दिन याद हो आए और एहसास हुआ कि जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है। भारत आकर उन्होंने बहुत गहराई के साथ सनातन धर्म का अध्ययन करते हुए संन्यास की राह पकड़ ली। माइकल को अब मोक्षपुरी बाबा के नाम से जाना जाता है। ध्यान ने उन्हें सभी चिंताओं से मुक्ति दिलाई है। इस बार के महाकुंभ में मोक्षपुरी सनातन धर्म के शाश्वत संदेश को फैला रहे हैं। वेदों, उपनिषदों और भगवद् गीता के ज्ञानी अमेरिकी बाबा अनेकों भारतीयों के प्रिय बन चुके हैं। प्रयागराज में जूना अखाड़े के सात फुट कद के आत्मा प्रेमगिरी बाबा के चेहरे की चमक दमक और चुस्ती-दुरुस्ती का आकर्षण लाजवाब है। जो भी एक बार देखता है उन्हें भूल नहीं पाता। विख्यात पायलट बाबा के अनुयायी रह चुके आत्मा प्रेमगिरी बाबा जब महाकुंभ में भ्रमण के लिए निकलते हैं तो भीड़ उनके पीछे-पीछे चलने लगती है। यह बाबा भी मूलत: रूस के रहने वाले हैं। पेशे से अध्यापक हैं, लेकिन सनातन धर्म के आकर्षण में इस कदर बंधे कि पिछले तीस साल से नेपाल में रहकर हिंदू धर्म का प्रचार कर रहे हैं। फौलादी शरीर की वजह से वाहवाही बटोरते इस बाबा को परशुराम का अवतार भी बताया जा रहा है। 

    अभय सिंह नाम का एक दुबला-पतला युवक मेले की शुरुआत में असंख्य लोगों के आकर्षण और जिज्ञासा का विषय बनज्ञ रहा। सोशल मीडिया ने तो उसे जमीन से आसमान तक पहुंचा दिया। एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की पृष्ठभूमि वाले आईआईटी बॉम्बे के पूर्व छात्र अभय ने अच्छी खासी मोटी तनख्वाह वाली नौकरियों को लात मारकर अध्यात्मका मार्ग चुना। अपने इस जुनून के चलते मां-बाप की नाराजगी और प्रेमिका को भी खोना पड़ा। बाबा अभय सिंह की मासूम मुस्कराहट पर उसके कटु बयान भारी पड़ गये। जूना अखाड़े के संत और संन्यासी उसे बार-बार समझाते रहे कि वह संयम का दामन न छोड़े। लेकिन वह नशे की धुन में कभी अपने माता-पिता तो कभी अपने गुरू के बारे में ऐसे-ऐसे बेहूदा और अशोभनीय बयान देने में लगा रहा, जो किसी संन्यासी बाबा को तो कतई शोभा नहीं देते। दरअसल देश के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी उसे चने के झाड़ पर चढ़ा दिया था। उसे लगने लगा था कि वह विद्वान भी है और अत्यंत महान भी। उसकी तथाकथित लोकप्रियता से कुछ लोग चिढ़ रहे हैं। ईर्ष्या कर रहे हैं। इसी अहंकार में वह ऊटपटांग बोलता चला गया। कल तक जिस अभय सिंह की कहानी सुनकर लोग उसके प्रति सहानुभूति दर्शा रहे थे, दांतो तले उंगलियां दबा रहे थे, अब उसे ढोंगी और नौटंकी बाज कहते हुए कोस रहे हैं। कुंभ की शुरुआत में ही सोशल मीडिया स्टार हर्षा रिछारिया भी अपनी विभिन्न आकर्षक मुद्राओं और बोलवचनों के कारण काफी छायी रही। सोशल मीडिया उस पर पूरी तरह से लट्टू और मेहरबान रहा। तीस वर्षीय इस खूबसूरत युवती के बारे में जानने के लिए देशभर के लोगों की उत्सुकता बढ़ती चली गई। हर्षा जब निरंजनी अखाड़े के रथ पर विराजमान हुई तो विरोध के साथ-साथ तरह-तरह की बातें होने लगीं। उस पर निशाना साधा जाने लगा कि यह सब खूबसूरती का कमाल है। उसके भगवा वस्त्र धारण करने पर भी आपत्ति के स्वर गूंजे। तब गुस्सायी हर्षा ने एक वीडियो शेयर किया, जिसमें फूट-फूट कर रोती दिखी। अंतत: कुंभ छोड़कर जाने से पहले हर्षा ने कहा, लोगों को शर्म आनी चाहिए। एक लड़की जो धर्म से जुड़ने, धर्म को जानने, सनातन संस्कृति को समझने के लिए आईं थी, लेकिन उसे इस लायक भी नहीं समझा गया कि वो कुंभ में शांति से रूक सके। मैं तो अभिनय को छोड़कर सुकून की तलाश में यहां आई थी, लेकिन कुछ लोगों को मेरा साध्वी का रूप रास नहीं आया...।