Saturday, August 17, 2024

तख्तापलट

    बांग्लादेश में वर्षों से चली आ रही विवादास्पद आरक्षण प्रणाली को समाप्त करने की छात्रों की मांग ने अंततः इतना उग्र और विस्फोटक रूप धारण कर लिया कि वहां की प्रधानमंत्री को देश से भागना पड़ा। गौरतलब है की 1971 में बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम  में हिस्सा लेने वाले लड़ाकों के रिश्तेदारों को सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान था। 2024 के जुलाई  महीने में हुई हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए थे। जिनमें से कई लोगों की मौत पुलिस  की गोलीबारी से हुई। इससे लोग बेहद क्रोधित थे। 5 अगस्त को मूवमेंट के तहत सुबह  दस बजे से ही बांग्लादेश की राजधानी ढाका में सेंट्रल शहीद मीनार के पास लगभग चार लाख उग्र छात्रों की जो भीड़ एकत्रित हुई, पुलिस के लिए उसे संभालना और नियंत्रण में लेना अत्यंत मुश्किल होता चला गया। स्थिति, परिस्थिति और हिंसक हालात को बेकाबू देख प्रधान मंत्री शेख हसीना कुछ ही घंटों के भीतर डरी-सहमी, सुरक्षित भारत पहुंच गईं। इस दौरान उपद्रवी बेखौफ होकर संसद भवन की छत, प्रधान मंत्री के आवास में घुसकर कीमती सामान पर हाथ फेरने और तोड़फोड़ करने लगे। विरोध प्रदर्शन के नाम पर अराजकता, अभद्रता और गुंडागर्दी की जाने लगी। सोशल मीडिया पर अल्पसंख्यक हिंदू तथा सिखों के घरों पर हमलों के साथ-साथ महिलाओं के साथ अभद्रता के वीडियो वायरल होने लगे। बांग्लादेश की बुनियाद रखने वाले राष्ट्रपिता के रूप में प्रतिष्ठित शेख मुजीब उर रहमान की मूर्ति को उसी हिंसक, अराजक, कट्टरपंथी सोच ने हथौड़े पर हथौड़े बरसा कर ढहा दिया, जिसने कभी उनकी क्रूरता से नृशंस हत्या की थी। उनके स्टैच्यू पर बुलडोजर  चलाए गए। आजादी के प्रतीक को भी धराशायी करने की शर्मनाक दुष्टता  की गई। शेख हसीना ने 15 वर्ष पूर्व जब सत्ता संभाली थी तब बांग्लादेश के अत्यंत चिंताजनक हालात थे। हसीना ने खस्ताहाल देश को विकास का जामा पहनाकर काफी हद तक खुशहाल बनाया, लेकिन यह भी सच है कि 17 करोड़ की आबादी वाले देश में तीन करोड़ युवा बेरोजगार हैं। कोई भी शासक सभी का प्रिय नहीं हो सकता। कमजोरी और कमियां ढूंढने वाले अपने मकसद में कामयाब हो ही जाते हैं। हसीना का भारत  से मधुर और दृढ संबंध बनाए रखना अंतरराष्ट्रीय ताकतों को रास नहीं आ रहा था। भारत के जगजाहिर शत्रु चीन और पाकिस्तान की साजिशों ने भी शेख हसीना का तख्तापलट करवाने में खासी भूमिका निभाई और आरक्षण विरोधी आंदोलन के बहाने एक प्रगति करते देश में कोहराम मचवा दिया।

    बांग्लादेश  में नई  सरकार का गठन भी हो गया है, लेकिन यह सवाल हमेशा सुलगता रहेगा कि लोगों का गुस्सा तो सरकार पर था, लेकिन अल्पसंख्यकों पर कहर क्यों बरपाया गया? तख्तापलट के बाद वर्षों से वहां रह रहे हिंदुओं को चुन-चुन  कर मौत के घाट उतारा गया। उनकी दुकानें, घर बार फूंक डाले गए। मंदिरों को आग लगाई गई। उन्हें रातों-रात बांग्लादेश छोड़ने को विवश कर दिया गया। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हिंदू गायक राहुल आनन्द के घर को राख करने से पहले उपद्रवियों की भीड़ ने जमकर लूट-पाट की। उनके तीन हजार से ज्यादा हैंडमेड म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट् के कलेक्शन के साथ-साथ सभी कीमती सामान समेट कर ले भागे।

    अभिनेता शांतो तथा उसके पिता की भीड़ ने पीट-पीटकर  हत्या कर दी। एक होटल में आग लगा दी, जहां आसाम के रहने वाले दो युवक ठहरे थे। जान बचाने के लिए वे चौथे माले से कूदे और चल बसे। इसी तरह से एक अन्य होटल में आग के हवाले किया गया, जिसमें 25 हिंदू राख हो गये। खौफ के अंधरे में जीते अनेकों हिदुओं को भूखे-प्यासे चार-पांच दिन तक अपने घरों में कैद रहना पड़ा। हिंसक भीड़ का आतंक थमने का नाम नहीं ले रहा था। कई स्थानों पर लूटमारी करती भीड़ धमकियां देती नजर आई, हिंदुओं अपने घर बार छोड़कर भाग जाओ, नहीं तो मार काट कर फेंक दिया जाएगा। इस भयावह मंजर में कुछ मुस्लिम परिवारों ने हिंदुओं की सुरक्षा के लिए खुद को भी खतरे में डालने की हिम्मत दिखायी। 

    एक तरफ मारकाट, लूट-पाट, बलात्कार हो रहे थे, वहां की पुलिस और सेना हाथ पर हाथ धरे अराजक  तत्वों को मूकदर्शक बन देखने को विवश नज़र आ रही थी। इस उपद्रवी आंदोलन में पांच सौ से अधिक लोगों की जानें चली गईं। सरकारी इमारतें और पुलिस थाने फूंक दिए गए। देश के नेतृत्वहीन होने का फायदा इस्लामी कट्टरपंथियों नें भी खूब उठाया। एयर इंडिया और इंडिगो की विशेष उड़ानों से सैकड़ों भारतीयों को भारत लाया गया। बीते वर्ष पड़ोसी देश श्रीलंका में भी ऐसा ही तख्तापलट का नजारा हम सबने देखा था। सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों ने कोलंबो में स्थित राष्ट्रपति भवन पर एक तरह से कब्जा ही कर लिया था। उनके स्विमिंग पुल में नहाने, रसोई घर में खाना बना कर खाने और आलीशान कमरों के बिस्तर  पर धमा चौकड़ी मचाने के वीडियो धड़ल्ले से वायरल होते रहे थे। वहां की बेबस सरकार ने हाथ खड़े करते हुए ऐलान किया था कि वह दिवालिया हो चुकी है... बांग्लादेश में हुए तख्तापलट ने हिंदुस्तान  के कुछ धूर्त  नेताओं, संपादकों, पत्रकारों एवं तथाकथित सेकुलर बुद्धिमानों को उमंगों और उम्मीदों के मायावी झूले पर झुलाना  प्रारम्भ कर दिया। सजग वोटरों ने तो सता से वंचित रखा, लेकिन पड़ोसी देश में हुए तख्तापलट की वजह से मुंगेरी लालों ने दिलकश उम्मीदें पालते हुए कहना शुरू कर दिया कि जो बांग्लादेश में हो रहा है, वह भारत में भी हो सकता है, लेकिन जब सजग देशवासियों ने उन्हें दुत्कारा, फटकारा और थू...थू की तो वे इधर-उधर मुंह छिपाने लगे...।

Thursday, July 18, 2024

बोझ...?

    कुछ खबरें अंदर  तक  उतर  कर मंथती चली जाती हैं। सोचने-विचारने का सिलसिला लंबा खिंचता चला जाता है। सभी को खबर है कि जिन्दगी दोबारा नहीं मिलती, लेकिन कुछ लोग  जिन्दगी को बहुत हल्के में लेते हैं। अपनी तो अपनी दूसरों की जान लेने  के लिए  हर हद को पार करने से नहीं सकुचाते। अपनों से बड़ों का सम्मान करना लोग भूलने लगे हैं। गुस्सा  तो हरदम नाक पर रहता है। कम आयु के बच्चे तनाव की गिरफ्त मे आ रहे हैं। उनकी खुदकुशी की खबरें झकझोर कर रख देती हैं। जिन्होंने अभी दुनिया के पूरे रंग-ढंग नहीं देखे उनका आत्महत्या कर गुजरना हृदय को दहला कर रख देता है। कहीं न  कहीं कोई गड़बड़ तो है। माता-पिता, रिश्तेदारों, अपनों तथा बेगानों के साथ-साथ समाज की धड़कनें बढ़ाने वाली खुदकुशी की खबरों  को महज पढ़- सुनकर नजरअंदाज तो नहीं किया जा सकता। संतरा नगरी नागपुर में माणिक राव नामक उम्रदराज पिता ने अपने 40 वर्षीय पुत्र  पर गोली दाग दी। माणिक राव  केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल से सेवानिवृत्त हैं। उनके पास बारह बोर की लाइसेंसी बंदूक भी है। फिलहाल किसी संस्थान में सुरक्षाकर्मी हैं। मेहनतकश माणिक  राव  बेटे और बहू की बदसलूकी से बहुत आहत और परेशान थे। बेटा हमेशा बदतमीजी से पेश आता था। उसका चपरासी -चपरासी कहकर बार-बार तंज कसना उन्हें बहुत आहत कर जाता था। जब देखो तब बेटा-बहू दोनों अपने मासूम बेटे यानी उनके पोते को बिना वजह उन्हीं के सामने बेरहमी से  मारने-पीटने लगते थे। अपने दुलारे पोते को रोता-बिलखता देख जब वे उन्हें फटकारते तो दोनों उनको खरी-खोटी सुनाने लगते। बेटे-बहू को पिता की दखलअंदाजी कतई पसंद नहीं थी। उन्हें बार-बार  अहसास कराया जाता था कि वे बच्चे के मां बाप हैं। उसकी पिटाई  करने का उन्हें  पूरा-पूरा हक है। किसी दूसरे को उन्हें रोकने -टोकने का दूर-दूर तक कोई अधिकार  नहीं। बीते सप्ताह माणिक राव रात को भोजन  करने के उपरांत बाहर से वॉकिंग करके घर लौटे तब बेटे ने अपने पुराने अंदाज में व्यंग्य  बाण चलाने प्रारम्भ कर दिए। नालायक, बदजुबान बेटे की करतूत से बुरी तरह से आहत और क्रोधित पिता ने उस पर बंदूक तान दी। पत्नी ने रोकने की बहुतेरी कोशिश की, लेकिन उन्होंने गोली दाग कर ही दम लिया। गोली लगने से उसकी मौत तो नहीं हुई, लेकिन वह बुरी तरह से लहूलुहान हो गया। घर के आसपास तमाशबीनों की भीड़ जमा होकर तरह-तरह  की बातें  करने लगी। थोड़ी देर  बाद  खाकी वर्दी वाले भी पहुंच  गए। घायल  बेटे को तुरंत  अस्पताल ले जाया गया। गोलीबाज गुस्सैल बाप की गिरफ्तारी भी हो गई.....

    पुणे निवासी प्रतीक्षा ने नागपुर  में फांसी लगाकर  आत्महत्या कर ली।  26  वर्षीय  प्रतीक्षा  का सिपाही के तौर पर मुंबई पुलिस में चयन  हुआ  था। नागपुर  में स्थित पुलिस  प्रशिक्षण  स्कूल  में उसे प्रशिक्षण के लिए  भेजा गया था। चार साल पूर्व  उसकी शादी हुई थी। जिसमें बहुत  जल्दी खटास आ जाने के कारण  तलाक की नौबत  आ गई। उसके पश्चात वह मुंबई  पुलिस की भर्ती के दौरान एक  युवक से दिल लगा बैठी। उसने उससे ब्याह रचाने का पक्का  मन बना लिया था, लेकिन  उसने घर वालों के दबाव में आकर किसी अन्य युवती संग सात फेरे ले लिए। वह इस  झटके से आहत  हो परेशान रहने लगी। कुछेक दिन बाद सुबह-सुबह उसने खुदकुशी कर ली। उसके बिस्तर  पर मिले सुसाइड नोट  पर लिखा था, ‘‘मेरी मौत  के बारे में मां-पिता को नहीं बताना और सुसाइड नोट को स्टेटस  पर भी नहीं रखना।’’ वह  तो सदा-सदा के लिए  दुनिया छोड़कर  चल दी,सबको  अखबारों के माध्यम  से पता भी चल गया। ऐसी कायराना बेवकूफी में  की गई  किसी भी खुदकुशी को सहानुभूति नहीं मिलती। तरह-तरह  की बातें होती ही हैं। लिखाई -पढ़ाई  तथा माता पिता की परवरिश  को भी कटघरे में खड़ा  किया जाता है।

    महाराष्ट्र  की संस्कार  नगरी अमरावती के एक स्कूल की दो लड़कियां आत्महत्या के इरादे से  इमारत की चौथी मंजिल पर जा पहुंचीं। दोनों के अचानक गायब होने से स्कूल  प्रशासन में हड़कंप  मच गया। उनके अपहरण की शंकाएं भी व्यक्त की जाने लगीं। दोनों को ढाई घंटे के बाद स्कूल से कुछ दूरी पर स्थित इमारत की  छत पर पकड़ा गया। दोनों ने खुद को बंद कर रखा था। दमकल विभाग की सहायता से बड़ी मुश्किल से दरवाजा तोड़कर उन्हें बाहर  निकाला गया। दोनों बहुत डरी-सहमी थीं। उनके स्कूल  बैग से मिले सुसाइड नोट  पर लिखा मिला,‘‘अब मैं कभी घर नहीं आऊंगी...मैं  अब बोझ बन गई  हूं...’’ आठवीं कक्षा में पढ़ रही यह दोनों लड़कियां पक्की सहेलियां हैं। एक ही कक्षा में एक ही बेंच पर साथ बैठती हैं। इनकी इस करतूत ने उनके माता-पिता को डरा दिया है। वैसे भी आजकल अधिकांश मां-बाप अपनी संतान से भयभीत रहते हैं। जैसे-जैसे बच्चे बढ़े  होते चले जाते हैं उनका भय बढ़ता चला जाता है। वे उनसे दबे-दबे रहते हैं.....

Thursday, July 11, 2024

अब तो पीछा छोड़ो बाबा...

    उत्तर प्रदेश  के हाथरस में एक  सत्संग  के दौरान  मची तूफानी भगदड़ ने 123 भक्तों को मौत की दर्दनाक नींद में सुला दिया। इस हादसे ने यह भी बता दिया कि हम नहीं चेतने और सुधरने वाले। अतीत से सबक नहीं लेने की हमने कसम खा रखी है। भले ही हमारी जान चली जाए, लेकिन  हम  स्वयंभू  साधू -संतों, प्रवचनकारों के दरबारों में जाना नहीं छोड़ सकते। हमें डॉक्टरों पर  कम, तंत्र, मंत्र  और  पाखंड  पर ज्यादा भरोसा है। हम मेहनत  की बजाय  चमत्कार  पर  यकीन रखते हैं। अखबारों, न्यूज चैनलों और यहां वहां बार-बार  पढ़ने- सुनने के बाद कि अपने देश में एक-दूसरे की देखा-देखी कुछ धूर्त चेहरे संत और  प्रवचनकार बन जाते हैं, लेकिन हम सावधान नहीं होते। जब तक उनका पर्दाफाश होता है, तब तक असंख्य लोग लुट-पुट  कर तबाह  हो चुके होते हैं। हाथरस में जिस तथाकथित बाबा के तथाकथित सत्संग  में हत्यारी भगदड़ मची, उसका नाम है, सूरजपोल उर्फ भोले बाबा। सूरज पाल की पूरी कुंडली भी देश तब जान पाया जब उसके श्रद्धालू मौत का निवाला बनने के बाद अखबारों और न्यूज चैनलों की ऐसी खबर  बने जिसे पढ़ सुन कर बहुत जल्दी बिसरा दिया जाता है। सिर्फ परिवार वाले ही कभी भूल नहीं पाते। उनके जख्मों की कीमत लगाने वाले भी उन तक पहुंच जाते हैं। सूरज पाल की बाबा बनने की कहानी कुछ यूं है...पहले वह अपने गांव  में खेती किसानी किया करता धा। बाद में उसे पुलिस में सिपाही की नौकरी बजाने का मौका मिल गया। इसी दौरान  यौन  शोषण  के आरोप  में उसे जेल जाना पड़ा।

    इसी जेल यात्रा के दौरान उसके मन में बाबा बनने का  विचार  बलवती हुआ। 17 साल तक खाकी वर्दी में रहकर सूरज पाल ने नेताओं तथा प्रवचनकारों के ठाठ-बाट करीब से देखे थे। नकली बाबा किस तरह से लोगों का अपना अंध भक्त  बनाने के लिए षड्यंत्र रचते हैं। खासतौर पर गरीब, कम पढ़ी-लिखी, विभिन्न तकलीफों से जूझती महिलाओं पर कौन सा जाल फेंकते हैं, इसका नज़ारा उसने बहुत करीब से देखा-जाना था। जेल  से बाहर आते ही वह धुंआधार प्रचार करने लगा कि सपने में उसकी हर रात ईश्वर से मेल-मुलाकात होती है, उनका आदेश है कि मैं लोगों के दुःख दर्द दूर करने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दूं। चालबाज सूरज पाल ने पांच-सात लोगों को भी अपने पक्ष में प्रचार करने के काम पर लगा दिया। धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाने लगी। पहले आसपास फिर दूर-दराज तक के लोग माथा टेकने के लिए सूरज पाल जाटव उर्फ भोले बाबा के दरबार में आने लगे। उसने भगवा की बजाय सफेद सूट, काला चश्मा, काले जूते और किस्म-किस्म की टाई धारण कर अपनी अलग छवि बनायी। सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखने वाले भोले बाबा ने हमेशा चंदा नहीं लेने की बात कही, लेकिन चंद वर्ष में 100 करोड़  रुपए  की सम्पति  खड़ी कर ली!

    वर्तमान  में विभिन्न  स्थानों पर इसके 24 लक्जरी आश्रम  हैं। वह किसी पर भरोसा नहीं करता। जब उसने सत्संग की दुकानदारी प्रारम्भ  की थी, तब भीड़ के बीच अपने लोगों को बैठाता था। वे लोग अपनी-अपनी समस्या बताते और बाबा तुरंत उसका निदान बता देता। इससे भीड़ को भी यकीन होता चला गया कि ये बाबा तो बहुत चमत्कारी है। धीरे-धीरे यह भी प्रचारित कर दिया गया की धरती के इस भगवान के चरणों की  धूल  तथा आश्रम के बाहर  लगे  हैंडपंप के पानी में गंभीर से गंभीर रोगों  को खत्म करने की करिश्माई शक्ति है।

    कुछ ही वर्षों में इसके सत्संग में उस गरीब तबके के लोगों  की बेतहाशा भीड़ आने लगी, जो दो वक्त की रोटी के लिए सतत जूझती रहती हैं। जब उसने देखा कि भीड़ को संभालना मुश्किल हो रहा है तो उसने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम जुटाने में देरी नहीं की। दुनियाभर की तामझाम और ठाठ-बाट  भरा जीवन  जीते इस आधुनिक असंत ने 5000 से ज्यादा पिंक वर्दी वाले जवानों के साथ-साथ 100 ब्लैक कैट कमांडो की नियुक्ति की।  उसकी इस आर्मी में उसकेकट्टर अनुयायियों को ही रखा गया है। घाट-घाट का पानी पी चुके हुए इस चालबाज ने अपनी सेना में महिलाओं को भी शामिल  करवाया। दलितों, पिछड़ों में जबरदस्त पैठ होने के चलते विभिन्न राजनीतिक  दलों के नेता  इसके दर्शन कर खुद को सौभाग्यशाली मानने लगे। दो जुलाई, मंगलवार  को सत्संग  में  दो लाख से ज्यादा का जमावड़ा  था। आयोजक गदगद थे। भीड़ भी उत्साहित थी। पुरुषों से कहीं बहुत ज्यादा औरतें हैं। पंप का चमत्कारिक पानी तथा अपने भगवान  के चरणों की धूल  का प्रसाद  पाने के लिए  दूर-दूर  से आईं थीं। जैसे ही कार्यक्रम  समाप्त  हुआ   भगवान  अपनी चमचमाती कार में सवार हो चल पड़ा।  तेजी से दौड़ती कार के पहियों से उड़ती धूल को अपने माथे पर लगाने के  लिए असंख्य महिलाओं, पुरुषों तथा बच्चों की भीड़ कार के पीछे दौड़ पड़ी। इसी अंधाधुंध भागमभाग से मची भगदड़  में गिरने, दबने, कुचले और मसले जाने से भक्त  दम तोड़ने लगे। देखते ही देखते 121 इंसानों की सांसों  की डोर  टूट गई। अपनी जिन्दगी को खुशहाल बनाने की तमन्ना के साथ सत्संग में पहुंचे अनुयायियों को मरता देखने के बावजूद भोले बाबा ने सरपट भागने में ही अपनी भलाई समझी। इस भगदड़ में 108 महिलाओं के साथ आठ मासूम बच्चों को भी अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। किसी के सिर में गंभीर चोट लगी, किसी का लीवर-फेफड़ा फटा, किसी ने दम घुटने तो किसी ने ब्रेन हेमरेज हो जाने की वजह से हमेशा-हमेशा के लिए इस दुनिया से विदायी ले ली। अत्यंत दुःखद  तथ्य यह  भी है कि शातिर आयोजकों के द्वारा उनका पीड़ितों के जूते, कपड़े और  अन्य  सामानों  को खेत में फेंकने की शर्मनाक हरकत भी की गई। उनका इरादा था कि किसी भी तरह से भगदड़  होने के सच को दुनिया से छिपाया जाए। यह स्वयंभू भगवान यदि हादसे के स्थल से कायर बन नहीं भागता तो वह खलनायक नहीं नायक कहलाता...लेकिन सच तो अंततः  सामने आ ही जाता है....


Friday, July 5, 2024

दिल वालों की दिल्ली

    देश की राजधानी दिल्ली। तपते जून का आखिरी हफ्ता। रात को जल्दी सोने के कारण सुबह छह बजे का अलार्म बजते ही उठ खड़ा हुआ। दो गिलास पानी पीने के बाद मार्निंग वॉक के लिए निकल पड़ा। रानी बाग में स्थित जाने-पहचाने बाग तक पहुंचने में करीब दस मिनट लगे। बीस साल पूर्व की हरियाली छिन चुकी थी। बाग उदास...उदास लग रहा था। एक्सरसाइज के नये -नये यंत्र जरूर सज चुके थे। पुरुष, महिलाएं और लड़के लड़कियां वॉक के साथ साथ आधुनिक साधनों से कसरत कर पसीना पसीना हो रहे थे। पुरुष एक दूसरे का राम...राम,जय श्रीराम से अभिवादन कर रहे थे। नमस्कार, गुड मार्निंग का चलन लगभग नदारद था। मैंने लगभग एक घंटे तक सैर करने के बाद बाहर की राह पकड़ी। आठ बजने जा रहे थे। विभिन्न फलों के जूस, नारियल पानी तथा सब्जी के ठेलों पर ग्राहक खड़े नज़र आ रहे थे मैंने चाय की बजाय नारियल के पानी का आनन्द लेना बेहतर समझा।

    नारियल पानी पीते-पीते सामने लगे, आम आदमी...मोहल्ला क्लीनिक के विशाल बोर्ड पर नज़र जा अटकी। वहां पर खड़े पढ़े -लिखे दिखते एक शख्स से क्लीनिक के खुलने खुलाने तथा प्रदत की जाने वाली सुविधाओं के बारे में पूछा तो उस ने पहले तो छूटते ही केजरीवाल को पंजाबी में गाली दी फिर कहा इस से झूठा फरेबी नेता दिल्ली वालों नें पहले तो कभी नहीं देखा। इस चालबाज ने जगह-जगह क्लीनिक तो खुलवा दिए, लेकिन वहां न दवाइयां हैं और न ही ढंग के डॉक्टर। शुरू-शुरू में कुछ दिनों तक मरीजों को संतुष्ट किया गया। फिर देखते ही देखते बदहाली नज़र आने लगी। नब्बे प्रतिशत मोहल्ला क्लीनिक महज दिखावा बन कर रह गए हैं। तभी वहीं पर खड़े एक उम्रदराज सरदार जी बोल पड़े, आम आदमी पार्टी की सरकार से दिल्ली वालों को बहुत उम्मीदें थीं।अपने पहले कार्यकाल में केजरी सरकार ने आम आदमी का दिल जीता। सरकार ने यदि बेहतर काम नहीं किया होता तो दिल्ली की जागरूक जनता दोबारा उसे सत्ता का ताज क्यों पहनाती, लेकिन यहीं भारी गड़बड़ी हुई। आम आदमी पार्टी के सर्वोच्च नेता सत्ता के नशे में मदहोश होते चले गए। भ्रष्टाचार और अखंड भ्रष्टाचारियों के खिलाफ बिगुल फूंकने वालों ने ऐसे लूट-पाट करनी प्रारम्भ कर दी जैसे हाथ में आया यह अवसर कहीं छिन न जाए। इसी चक्कर में जेल के मेहमान बनते चले गए।

    यदि वाकई ये निरपराध होते तो कोई भी ताकत इनका बाल भी बांका नहीं कर पाती। अपने देश का कानून सभी के लिए एक समान है। अदालतें सबूत चाहती हैं। नाटक नौटंकी, आरोप-प्रत्यारोप पर दिमाग नहीं खपातीं। ऐसा देश में और कहीं नहीं हुआ जैसा दिल्ली में दिख रहा है। मुख्यमंत्री और मंत्रियों को जेल में सड़ना और जमानत के लिए मर...मर कर तरसना पड़ा हो...। 

    मैंने वहां से खिसक लेने में अपनी भलाई समझी। पूरा दिन कुछ सरकारी-अखबारी काम में बीत गया। रात का भोजन करने तथा भांजे धीरज से इधर-उधर की बातें करने के बाद बिस्तर की शरण ले ली। अच्छी गहरी नींद में था। तभी चीचने-चिल्लाने की आवाजों ने नींद में खलल डाल दी। धीरज जल्दी बाहर आओ, सामने की बिल्डिंग में आग लगी है। कोई जोर-जोर से दरवाजा खटखटा रहा था। धीरज और मैं हड़बड़ा कर बाहर निकले। सामने की चार मंजिला बिल्डिंग से गहरा काला धुंआ बड़ी तेजी से बाहर फैल रहा था। नीचे से लेकर ऊपर तक के सभी कमरों में भयंकर आग लगी थी। चीख़-पुकार की आवाजें दिल दहला रहीं थीं। आग लगते ही बिल्डिंग के अधिकांश निवासी बाहर आ चुके थे, लेकिन कुछ उम्रदराज स्त्री पुरुष अंदर फंसे थे। आग बुझाने के साथ -साथ उन्हें किसी भी तरह बचाने की जद्दोजहद जारी थी। सभी को फायरब्रिगेड का इंतजार था, जो अंतत: तब पहुंचा जब तक बहुत कुछ जल कर राख हो गया। सुखद यह रहा कि तीसरी मंजिल में जहरीली धुंधलाहट में छटपटाते उम्रदराज दम्पति को फायर ब्रिगेड की सीढ़ी से उतार लिया गया। दमे के पुराने रोगी होने की वजह उनकी जान पर बन आयी थी। एसी के फटने की वजह से अचानक लगी भयंकर आग को पूरी तरह से बुझाने में लगभग चार घंटे लगे। दिल्ली में एसी का चलन बहुत बढ़ गया है। घर-घर में एसी लगे हैं। लोगों ने अवैध कनेक्शन भी रखे हैं। 

    इमारत तक पहुंचने का रास्ता यदि बेहद संकरा नहीं होता तो फायरब्रिगेड की गाड़ी जल्दी पहुंच जाती, जिससे नुकसान कम होता। देश की राजधानी में अनेकों बस्तियां ऐसी हैं, जिनमें प्रवेश करने के रास्ते अत्यंत संकरे हैं, उनमें कार बहुत मुश्किल से जा पाती है। स्कूटर, मोटरसाइकिल चालकों के घबराहट के मारे पसीने छूट जाते हैं। फिर भी कुछ युवा तो तीन-तीन साथियों को पीछे बिठा कर ऐसे स्कूटर, मोटर साइकिल दौड़ाते नज़र आते हैं जैसे वे वर्षों सर्कस में अपने रोमांचक खेल, तमाशे दिखा चुके हों।

    अधिकांश रिहाइशी इलाकों में लोग अपने वाहन खड़े कर बेफिक्र हो जाते हैं। जगह-जगह बिजली के खम्भों की लटकती तारें भयग्रस्त कर देती हैं, लेकिन यह भी सच है कि एक ही कतार में एक दूसरे से चिपके इन घरों में रहने वाले लोग-बाग का दिल बहुत विशाल है। किसी भी आपदा और संकट के समय एक दूसरे के साथ खड़े होने में देरी नहीं लगाते। अपना तन, मन, धन लगा देते हैं। यही तो हिन्दुस्तान की वास्तविक तस्वीर है।

    दिल्लीवासी गजब के धर्म प्रेमी होने के साथ साथ परोपकारी भी हैं। कोरोना-काल में ग़रीबों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए यहां के अनेक युवा बढ़-चढ़कर सामने आए। उन्होंने लोगों के सहयोग से मिले धन तथा अपनी जेब की रकम से अनाज, कपड़े तथा अन्य समान खरीद कर जरूरतमंदों तक पहुंचाने में अपने सुख चैन की बेहिचक कुर्बानी देते हुए बिना किसी भेदभाव के इंसानियत के धर्म का पालन किया। कोरोना-काल की विदाई के बाद भी कुछ स्थानों पर अभी भी ‘भोजन सेवा’ पर विराम नहीं लगाया गया है। उन्हीं में शामिल है, रानीबाग, जहां पर प्रतिदिन ‘सेवा रसोई’ के माध्यम से मात्र पांच रुपए में जरूरतमंदों को भरपेट खाना खिलाया जाता है। हां, जो पांच रुपए का भुगतान नहीं कर पाते उन्हें भी मान सम्मान के साथ संतुष्ट किया जाता है। रसगुल्ला, गुलाबजामुन, कलाकंद या अन्य कोई मिठाई भी सभी को भोजन के साथ जरूर परोसी जाती है। पहले की तुलना में अब काफी लोग सेवा रसोई से जुड़ चुके हैं। हार्दिक सेवा भावना और ईमानदारी का ही प्रतिफल है कि, दूर-दूर के अनजाने दानवीर भी बड़ी खामोशी और बिना किसी प्रचार के लाखों रुपए पहुंचा देते हैं।



Thursday, June 27, 2024

अक्षम्य अपराध

   मायानगर मुंबई में एक महिला का खाना खाने के बाद ठंडी-ठंडी आइसक्रीम का मज़ा लेने का मन हुआ। तपती गर्मी में बाहर कौन निकले यह सोचकर उन्होंने तुरंत तीन आइसक्रीम का ऑनलाइन आर्डर दे दिया। थोड़ी ही देर के बाद उनकी मनपसंद यम्मो ब्रांड की आइसक्रीम हाजिर हो गई। बड़े मज़े से लजीज आइसक्रीम का स्वाद लेते-लेते महिला को मुंह में किसी ठोस चीज़ के होने का अहसास हुआ। पहले तो उन्हें लगा कि अखरोट या चाकलेट होगी, लेकिन उसकी गंध और कड़ेपन से उन्हें चिंता में डाल दिया। तब तक वह आधी आइसक्रीम खा चुकी थीं। उन्होंने जैसे ही कोन को चेक किया तो उसमें से इंसानी अंग निकला। 

    दरअसल यह किसी इंसान की उंगली का कटा हुआ हिस्सा था। इसकी लंबाई थी लगभग दो सेंटीमीटर। इसे देखते ही महिला का सिर चकराने लगा। उसे धड़ाधड़ उल्टियां होने लगीं।  चीखने-चिल्लाने की आवाज को सुनकर घर के अन्य सदस्य दौड़े-दौड़े चले आए। बात पुलिस तक पहुंची। उसने महिला के घर पहुंच कर कटे अंग को अपने कब्जे में लेने के बाद फॉरेंसिक क जांच के लिए प्रयोगशाला में भेज दिया। जांच के दौरान पुलिस को जो अहम सुराग हाथ  लगा, उसमें पता चला कि पुणे की आइसक्रीम फैक्टरी में काम करने वाले शख्स की मिडल फिंगर कटकर आइसक्रीम में जा गिरी थी। इस दुर्घटना के तुरंत बाद वह तुरंत डॉक्टर के यहां इलाज के लिए भाग खड़ा हुआ। उंगली वहीं की वहीं रह गई, लेकिन सवाल यह है कि प्रबंधन क्या कर रहा था? 

    अभी यह खबर ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि नोएडा में ऑनलाइन शापिंग प्लेटफार्म पर आर्डर कर एक और महिला ने ब्रांडेड आइसक्रीम मंगायी। डिब्बा खोलते ही उसके अंदर कनखजूरा के दर्शन होने से वह हतप्रभ रह गई। महिला ने तुरंत फूड विभाग तक अपनी शिकायत पहुंचायी। ऑनलाइन शापिंग प्लेटफार्म के स्टोर पर जांच टीम ने मुआयना कर पाया कि वहां पर गंदगी ही गंदगी थी। किस्म-किस्म के विषैले कीड़े-मकोड़ों ने वहां पर अपना डेरा जमा रखा था। 

    भारतीय रेलों की दुर्दशा से सभी वाकिफ हैं। यात्रा के दौरान यात्रियों को कैसी-कैसी असुविधाएं झेलनी पड़ती हैं, यह भुक्तभोगी अच्छी तरह से जानते हैं। अधिकांश ट्रेनों में यात्रियों को ताजा भोजन के नाम पर बासी, अधपका भोजन और नाश्ता परोसा जाता है। अधिकांश यात्री शिकायत करने के पचड़े में नहीं पड़ते। सरकार ने बीते वर्ष जब वंदेभारत एक्सप्रेस ट्रेन की सेवा प्रारंभ की थी तब यात्रियों को बेहतरीन भोजन, चाय-नाश्ता उपलब्ध करवाने का आश्वासन दिया था। शुरू-शुरू में तो यात्रियों को अच्छा व टेस्टी खाना मिला, लेकिन फिर धीरे-धीरे गुणवता में कमी आने लगी। तेजी से दौड़ने वाली इस ट्रेन में घटिया भोजन और नाश्ते की शिकायतों का अंबार लगने लगा। अभी हाल ही में वंदेभारत एक्सप्रेस में भोपाल से आगरा जा रहे दंपत्ति को भोजन के दौरान कॉकरोच दिखा तो उनकी समझ में आ गया कि यात्रियों को स्वच्छ और पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने की सरकारी घोषणाएं कितनी झूठी और खोखली हैं। संबंधित विक्रेता फर्म पर जब कार्रवाई का डंडा चलाया गया तो उसने अपनी गलती की माफी मांग ली। पच्चीस-पचास हजार का जुर्माना भी भर दिया। इतना भर कर देने से सुधार और बदलाव होना होता तो कब का हो चुका होता। भारतीय रेलवे की सतत दुदर्शा नहीं बनी रहती। 

    गुजरात के महानगर अहमदाबाद में स्थित ‘देवी डोसा पैलेस’ में बड़े चाव से डोसा खाने गये दंपत्ति का भी तब सिर चकरा गया, जब उन्होंने सांभर में चूहे के मरे हुए बच्चे देखे। अहमदाबाद नगर निगम ने शिकायत मिलने पर रेस्टारेंट को सील कर दिया। खाने-पीने के शौकीनों की यही चाहत होती है कि उन्हें बेहतर खाना मिले। उनके स्वास्थ्य पर कहीं भी आंच न आए, लेकिन आजकल देखा यह जा रहा है कि कीमत तो पूरी वसूल की जाती है, लेकिन ग्राहकों को हलके और नकली खाद्य पदार्थ खिलाकर उनकी सेहत की ऐसी-तैसी की जा रही है। पिछले कुछ वर्षां से पनीर का चलन काफी बढ़ा है। अपने यहां जिस चीज़ की मांग बढ़ती है उसमें धोखाधड़ी भी शुरू हो जाती है। मिलावट खोर तेजी से सक्रिय हो जाते हैं। पनीर के साथ भी ऐसा हो रहा है। शहरों तथा ग्रामों में एनलॉग पनीर को धड़ल्ले से खपाया जाने लगा है। पाम तेल, दूध पाउडर तथा एसिड से बनने वाले यह हानिकारक पनीर मिलावटखोरों की मोटी कमायी का जरिया बन गया है। दूध से बने पनीर की कीमत जहां 400 रपये किलो है, वहीं एनालॉग पनीर 200 रुपये किलो में मिल जाता है। कई होटल, रेस्टारेंट वाले एनालॉग पनीर की सब्जी, पकौड़े आदि खिलाकर मनमानी कीमत वसूलने के साथ-साथ उनकी सेहत के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। इस पनीर के सेवन से जी मचलाना, चक्कर आना तथा कई बार फूड पॉइजनिंग का होना आम बात है...।

    देश के प्रदेश तमिलनाडु के शहर कल्लाकुरिची में जहरीली शराब पीने की वजह से लगभग 55 लोग चल बसे और 140 से ज्यादा लोगों को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। विषैली शराब के शिकार होने वालों में अधिकतर दिहाड़ी मजदूर थे। शराब पीने के कुछ घण्टों के बाद ही उन्हें दस्त, उल्टी, पेट दर्द  और आंखों में जलन होने लगी। मृतकों में तीन महिलाएं और एक ट्रांसजेडर भी शामिल है। पिछले दिनों देश के विभिन्न होटलों, रेस्टारेंट और रेलगाड़ियों में लगातार ऐसी जो भी घटनाएं सामने आईं उनमें संचालकों की लापरवाही देखी गयी। जब ग्राहक सामान की पूरी कीमत चुकाते हैं तो उनसे धोखाधड़ी कहां तक जायज है? मेरे कुछ पाठक मित्र सोच रहे होंगे कि मैं जीवन के लिए अति उपयोगी खाद्य पदार्थों पर बात करते-करते उस शराब को बीच में क्यों ले आया जो सेहत के लिए हानिकारक है। शराब, वैध हो या अवैध, लेकिनतो देनी ही पड़ती है। तो फिर उन्हें जहरीली शराब थमा कर उनकी जान लेने और सेहत से खिलवाड़ करने के गुनाह क्यों? 

    ड्राइ डे या अन्य कारणों से  ही पीने वाले अकसर अवैध यानी कच्ची शराब के विक्रेताओं की शरण में जाने को मजबूर होते हैं, लेकिन उनसे भरपूर कीमत वसूलने के बाद उनसे धोखाधड़ी होती है। अधिक से अधिक ग्राहकों को अपने ठिकानों तक लाने के अवैध शराब माफिया जो खेल खेलता चला आ रहा है उसकी पूरी खबर प्रशासन को भी रहती है। शराब को ज्यादा से ज्यादा नशीली बनाने के लिए नौसादर और यूरिया मिलाने वाले अपनी कमायी में कमी नहीं आने देना चाहते। भले ही लोगों की जानें जाती रहें।

Thursday, June 20, 2024

कसूर-दस्तूर

    गर्मी के मौसम में धूप की तपन अच्छे-भले इंसान को हिला कर रख देती है। बदन पसीने से तर बतर हो जाता है। ठंडा वातावरण सभी को राहत देता है। सक्षम लोग तो गर्मी में घर से बाहर निकलते ही नहीं। कूलर, पंखे और एसी की हवा सभी को नसीब नहीं। अधिकांश कर्मचारियों, श्रमिकों को गर्मी में भी खून-पसीना बहाना पड़ता है। कुदरत की गर्मी और बेतहाशा तपन को बर्दाश्त करने की मेहनतकशों को आदत हो जाती है, लेकिन वो आग जो लोहे को भी गला देती है, जब इंसानों को अपनी चपेट में ले लेती है तो उन पर क्या बीतती है, इसकी कल्पना हर कोई नहीं कर सकता। जिन पर बीतती है, वहीं जान-समझ सकते हैं। नागपुर जिले के बाजारगांव में स्थित एक बारूद फैक्ट्री में 16 दिसंबर, 2023 को हुए तूफानी विस्फोट के बाद लगी आग ने 9 लोगों की जान ले ली थी। मृतकों के शरीर के परखच्चे उड़ गये थे। अंग-प्रत्यंग गायब हो गये थे। कुछ ही के जले-कटे शरीर के हिस्सों को बड़ी मुश्किल से बरामद किया जा सका था। सोलार एक्सप्लोसीव नामक इस बारूद फैक्टरी में पहले भी कई बार हुए विस्फोटों में अनेकों कर्मचारी मौत के हवाले होते रहे हैं, लेकिन मालिकों ने इसे आम घटना मानते हुए भुला दिया। देश की यह विख्यात बारूद फैक्टरी रक्षा क्षेत्र में उपयोग में आने वाले गोला-बारूद का वर्षों से निर्माण करती चली आ रही है। इसके सर्वेसर्वा की बहुत ऊपर तक पहुंच है। पिछले वर्ष विश्व विख्यात पत्रिका ‘टाइम’ में देश के जिन शीर्ष के उद्योगपतियों की सूची छपी थी उनमें उनका भी नाम था। लगभग दस हजार करोड़ की पूंजी के मालिक की संघर्ष गाथा का भी विवरण दिया गया था। हर पार्टी में पैठ रखने वाले यह महाशय चंदा देने में कोई कंजूसी नहीं करते। 6 जून, 2024 की दोपहर सोलार की ही तूफानी तर्ज पर नागपुर में ही स्थित चामुंडी एक्सप्लोसीव में विस्फोट से लगी आग से छह हंसती-खेलती जिन्दगियां तुरंत सदा-सदा के लिए चल बसीं। उसके बाद एक-एक कर तीन और श्रमिकों की दर्दनाक मौत होने की खबर आयी। इंसानियत को शर्मसार करने वाला यह सच भी सामने आया...। 

    एक तरफ धधकती आग में पुरुष और स्त्रियों के जिस्म जल कर राख हो रहे थे, वहीं प्रबंधन के जिम्मेदार चेहरे उन्हें बचाने की बजाय भागते नज़र आ रहे थे। करीब आधे घण्टे तक मौत का तांडव चलता रहा। करोड़ों रुपयों का वारा-न्यारा करने वाली कंपनी में बचाव और सुरक्षा के इंतजाम नदारद थे। मृतकों तथा घायलों को अस्पताल पहुंचाने के लिए एंबुलेस तक नहीं थी। यहां तक कि अग्निरोधक यंत्रों का भी कोई अता-पता नहीं था। कंपनी ने गांव के स्थानीय लोगों को नौकरी में प्राथमिकता दी थी। पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा कार्यरत थीं। इस हादसे में जिन छह युवतियां ने जान गंवाई, उनके कई सपने थे। अपनी-अपनी इच्छाएं थीं। आग ने सब कुछ राख कर डाला। अपने पैरों पर खड़े होते-होते चल बसने वाली शीतल विवाहित थी। पति शराबी था। अपनी छह साल की बच्ची के जीवन को संवारने के लिए वह दो वर्ष से बारूद फैक्टरी में काम कर रही थी। प्रांजली की शादी होने वाली थी। कुछ ही दिनों के बाद लड़के वाले उसे देखने के लिए आने वाले थे। मां-बाप के साथ-साथ प्रांजली भी काफी खुश थी। प्राची के मां-बाप को जब पता चला कि फैक्टरी में धमाका हुआ है तो वे ईश्वर से प्राची के सकुशल होने की कामना कर रहे थे। जैसे ही उन्हें अपनी लाड़ली के नहीं रहने की जानकारी मिली तो रो-रोकर उनका बुरा हाल हो गया। मोनाली ने काम पर जाते-जाते कहा था कि आज मैं जल्दी घर आऊंगी। दोनों बहनें और माता-पिता अभी भी इस भ्रम में हैं कि मोनाली जरूर लौटेगी...। वैशाली के पिता दिव्यांग हैं। उसका एक छोटा भाई है। बहन की मौत की खबर सुनकर वह फूट-फूटकर घण्टों रोता और कहता रहा अब मुझे राखी कौन बांधेगा। एक साथ पांच युवतियों तथा एक युवक को सदा-सदा के लिए खोने वाले गांव धामना में एक ही समय छह आर्थियां उठीं। सभी ने उन्हें नम आंखों से विदायी दी। शाम को गांव के श्मशानघाट पर जब मृतकों का अंतिम संस्कार हो रहा था, तब अचानक बादल गरजने लगे। देखते ही देखते ऐसे पानी बरसने लगा जैसे आसमान भी बिलख-बिलख कर रो रहा हो। उस दिन पूरे गांव में किसी के घर चूल्हा नहीं जला। गांव के चप्पे-चप्पे पर बस सन्नाटा ही सन्नाटा था...। रोजी-रोटी की तलाश जरूरतमंदों को शहर प्रदेश के साथ-साथ विदेशों तक खींच ले जाती है। अपने देश में नौकरी और रोजगार की कमी के चलते अनेकों भारतीयों को लगता है कि दूसरे देश उनके सपनों में रंग भर सकते हैं, लेकिन इच्छाएं और सपने हमेशा साकार नहीं होते। ऐसा ही हुआ उन भारतीयों के साथ, जो हजारों मील दूर कुवैत में धन कमाने गये थे, लेकिन नियति ने उनका जो हश्र कर डाला, उसे उनके परिजन तो इस जीवन में नहीं भूल पायेंगे। कुवैत के अल-मंगफ इलाके में प्रवासी मेहनतकशों के आवास वाली इमारत में भीषण आग लगने से 49 लोगों की जानें चली गईं। जिनमें से 45 भारतीय थे। अधिकांश लोगों की मौत झुलसने और दम घुटने से हुई। यहां भी लालच और लापरवाही का आलम यह था कि जिस कमरे में वे रहते थे वहां पर सुरक्षा का नितांत अभाव था। हर तरफ कागज और प्लास्टिक का अंबार लगा था। छोटे से कमरे में अधिक से अधिक कामगारों को रखा जा सके, इसके लिए प्लास्टिक जैसे ज्वलनशील पदार्थ से पार्टीशन किया गया था। इमारत के भूतल पर दो दर्जन से ज्यादा गैस सिलेंडर रखे हुए थे। जब शार्ट सर्किट के कारण एकाएक आग की लपटें उठने लगीं तो कर्मचारी बेबस थे। भागने का कोई रास्ता नहीं था। छत पर ताला लगा था। इस आग ने बेहतर भविष्य के लिए परदेस गये इंजीनियर, सुपरवाइजर, ड्राइवर तथा अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले परिश्रमी भारतीयों को एकाएक लील कर कई घरों में अंधेरा कर दिया। जिनके चिराग वापस नहीं लौटे उनका रो-रो कर बुरा हाल है। किसी के रिश्ते की बात चल रही थी, किसी को घर बनाना था, कोई यह ठान कर गया था कि भरपूर धन जमा कर जब लौटेगा तो बहन की धूमधाम से शादी करेगा। यह लोग जब अपने सपनों में रंग भरने के लिए देश छोड़ कुवैत जा रहे थे तब उनके परिजनों, मित्रों, शुभचिंतकों ने मिठाइयां बांटी थी। उन्हें क्या पता था कि कुछ भी नहीं बचेगा। इस अग्निकांड ने उन्हें जो दर्द और मलाल दिया है, वह तो उम्र भर साथ रहने वाला है। गुजरात के राजकोट में टीआरपी गेम्स जोन में हंसते-खेलते 12 बच्चों समेत 8 लोेग अग्निकांड का शिकार होकर मौत का निवाला बन गए। छोटे-छोटे बच्चे वीडियो गेम के साथ अन्य खेलों का आनंद ले रहे थे तभी अचानक शार्ट सर्किट से जो आग लगी वह देखते ही देखते भयंकर हो गई। आग से फाइबर का अस्थायी ढांचा गिर गया। गेमिंग जोन के अंदर बहुत सारे टायर भरे पड़े थे। बाहर निकलने का मात्र एक ही रास्ता था। भीषण आग का धुंआ कई किलोमीटर तक दिखाई दे रहा था। अपने देश में तो ऐसे अग्निकांडों को हादसा कह कर आया-गया करने की साजिशें की जाती हैं। जिन पर देख-रेख और व्यवस्था का जिम्मा है वे अंधे-बहरे बने रहते हैं। जब भी कोई मौत-कांड होता है तब उनकी दिखावे की संवेदनाएं जोर मारती हैं। मंत्री, नेता, अधिकारी मुआवजे के चेक के साथ बिलखते परिवारों को तसल्ली देते नज़र आते हैं। यह दस्तूर वर्षों से चला आ रहा है...।

Thursday, June 13, 2024

खरी-खरी

    इस बार के लोकसभा चुनावों के नतीजे कितना कुछ कह गये। नादान भले ही अनदेखी करें, लेकिन समझदारों की आंखे खुल गई हैं। भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव जीतने के लिए जमीन आसमान एक कर दिया था। विपक्ष ने भी जी तोड़ पसीना बहाया, लेकिन देश के सजग मतदाताओं ने उन्हें जिस परिणाम से रूबरू करवाया उसकी उम्मीद किसी को भी नहीं थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सबल साथी इस बार 400 पार के नारे को गुंजायमान करते रहे तो वहीं विपक्ष का इंडिया गठबंधन इसकी हवा निकालने के लिए कमर कसे रहा। लड़ाई वाकई बड़ी जबरदस्त थी। देश के अधिकांश मीडिया ने भी एनडीए के 400 पार और भाजपा के 370 पार के दावों को सही साबित करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। उसके ओपिनियन पोल से लेकर एक्जिट पोल तक में इंडिया गठबंधन फिसड्डी और बलहीन था, लेकिन चुनाव परिणामों ने तो जैसे खलबली मचा दी। इस चुनाव को मोदी ने अपने नाम पर लड़ा। उनकी गारंटी उतनी असरकारी नहीं रही, जितनी की उन्हें उम्मीद थी। भारतीय मतदाता के मन को थाह पाना कभी भी आसान नहीं रहा। प्रधानमंत्री अपनी ही बनारस सीट से उतने मतों से नहीं जीत पाए, जितने का धुआंधार प्रचार किया जा रहा था। बनारस में यह नारा भी बड़ी दमदारी के साथ उछाला गया कि अबकी बार दस लाख पार, लेकिन नरेंद्र मोदी इंडिया गठबंधन के प्रत्याशी से लगभग डेढ़ लाख मतों से ही विजयी हो पाए। जिस राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के मुद्दे पर भाजपा हवा में उड़ रही थी उसकी भी मतदाताओं ने हवा निकाल दी। पांच सौ साल बाद प्रभु श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। सभी भारतीयों के लिए यह गर्व की बात है, लेकिन यहीं से भाजपा का हारना पूरी दुनिया को अचंभे में डाल गया। कुछ गुस्साये लोगों ने वहां के मतदाताओं को गद्दार के साथ-साथ अहसान फरामोश करार दे दिया, जिनकी राम मंदिर तथा श्रीराम के प्रति कोई आस्था नहीं। अयोध्या वासियों पर  अपना तेजाबी क्रोध दर्शाने वालों को अब कौन बताये कि रोजी-रोटी के लिए दिन-रात संघर्ष करने वालों के लिए पूजा-पाठ ही सबकुछ नहीं। उनकी और भी कई चिंताएं और तकलीफें हैं। भारतीय वोटर को प्रजातंत्र का भरपूर मान-सम्मान करना आता है। हर पूजा स्थल पर उसका मस्तक झुक जाता है। वह वहीं से शक्ति भी पाता है। फिर राम तो जन-जन के आराध्य हैं...।

    भाजपा को अनुमान से कम वोटों का मिलना यह भी बताता है कि सजग मतदाता हिंदू-मुस्लिम विभाजन की राजनीति से तंग आ चुके हैं। उन्हें धार्मिक भावनाओं से बार-बार खिलवाड़ पसंद नहीं। डराने और चिंतित करने वाली सच्चाई तो ‘वारिस पंजाब दे’ संगठन के प्रमुख अमृत पाल सिंह की चुनावी जीत है। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत असम जेल में बंद खालिस्तान समर्थक अमृत पाल सिंह का लोकसभा चुनाव जीतना कट्टरपंथियों के उभरने और ताकतवर होने का प्रमाण है। अमृत पाल के विजयी होने के पश्चात उसकी मां ने कहा कि, लोकसभा चुनाव में मेरे बेटे की जीत मारे गये खालिस्तानियों को समर्पित है। बॉलीवुड अभिनेत्री, नवनिर्वाचित सांसद कंगना रानौत को चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर महिला सुरक्षाकर्मी कुलविंदर कौर ने थप्पड़ जड़ दिया। यह थप्पड़ बाज सिरफिरी महिला सांसद कंगना के किसान आंदोलन के समय दिये गये बयान से नाराज और असहमत थी। इस बयान में कहा गया था कि धरने पर बैठने वाली महिलाएं सौ-सौ रुपये के लालच में आंदोलन में शामिल हुई थी। कुलविंदर की मां भी तब किसान आंदोलन के धरने में शामिल होती थी। इसलिए कुलविंदर ने थप्पड़ जड़ कर अपना गुस्सा उतारा। कुछ लोगों ने एयरपोर्ट जैसे संवेदनशील स्थल पर तैनात सुरक्षा कर्मी की इस शैतानी हरकत को सही ठहराने के लिए खुद को हद से नीचे गिरा दिया। इस शर्मनाक थप्पड़ कांड पर जिन बुद्धिजीवियों ने तालियां बजायीं, उन्हीं ने कभी ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे लगाने वाले कन्हैया कुमार की भी पीठ थपथपायी थी। चुनाव दर चुनाव मात खाते आ रहे कन्हैया कुमार का हश्र आज पूरा देश देख रहा है। जिन्हें लोकतंत्र और जनप्रतिनिधियों का सम्मान करना नहीं आता वे कभी भी देश के लिए खतरा बन सकते हैं। अतिवादी सोच और आतंकवाद के बीच जो महीनतम रेखा है, उसे मिटने में ज्यादा देरी नहीं लगती। 

    नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार विशाल भारत की कमान संभाल ली है। उनका फिर से प्रधानमंत्री बनना विपक्ष को शूल की तरह चुभा है। यह भी सच है कि देश के विपक्ष में उनकी टक्कर का फिलहाल दूर-दूर तक और कोई चेहरा नहीं। मतदाताओं ने थोड़ा बहुमत से नीचे लाकर भाजपा और नरेंद्र मोदी को सावधान होने का संदेश और सबक दे दिया है। इस देश का आम से आम आदमी भी हिंदू-मुस्लिम के बीच वैमनस्य और झगड़े नहीं चाहता। वह नफरत का नहीं, आपसी भाईचारे का पक्षधर है। इस बार के लोकसभा में मतदान करते वक्त वह भूला नहीं था कि देश के जन-जन के चहुंमुखी विकास के वादे की बदौलत सत्ता पाने वाले हुक्मरान सत्ता पर काबिज होने के बाद बुनियादी मुद्दों को विस्मृत कर विभाजनकारी की राजनीति करते रहे। वोटों के लिए राम मंदिर को भुनाने वालों को बुलडोजर तो याद रहा, लेकिन गरीबों को छत और बेरोजगारों को रोजगार देना भूल गए। धन्नासेठों के तो करोड़ों-अरबों रुपये बार-बार माफ किये, लेकिन किसानों के तीस-चालीस हजार रुपये बैंक कर्जे को माफ करने में आनाकानी करते रहे। मेट्रो, पुल और सड़कों का जाल बिछाने वाले यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई पर भी ध्यान देते, रोजगार और नौकरियों के लिए कारखानों का निर्माण करते तो मतदाता उनकी झोली में वोट डालने में कंजूसी नहीं करते। तमाम अटकलों, अवरोधों के बाद अब जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में तीसरी बार एनडीए सरकार बन चुकी है। विपक्ष भले ही बेकद्री करता रहे, लेकिन नरेंद्र मोदी की लगातार तीसरी जीत ने पूरी दुनिया में उनका कद बढ़ाया है। गठबंधन सरकार के सक्षम नेता से अब सभी भारतीय वास्तविक विकास और बदलाव की उम्मीद कर रहे हैं। नए रोजगार के साथ-साथ गांव, गरीब और किसान की खुशहाली की मांग कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी के लिए यह अंतिम मौका है। इसमें उनकी संपूर्ण प्रतिष्ठा दांव पर लगी है...।