Thursday, August 6, 2026

आने और जाने के बीच

 आपके मन में भी विचार तो जरूर आता होगा कि ऐसी खबरों का सिलसिला आखिर कब टूटेगा?...

गुजरात के जामनगर में एक महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी। जिसके साथ उसने सात फेरे लेते हुए जन्म-जन्मांतर तक साथ निभाने का वादा किया था, उसी को शराब में साइनाइड मिलाकर मौत की नींद सुला देने के बाद पंद्रह फीट गहरे गड्ढे में गाड़ दिया। इस हत्याकांड का महीनों बाद तब खुलासा हुआ, जब मृतक के भाई ने पुलिस में उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई। हत्यारी पत्नी तो अपने पति के ऑस्ट्रेलिया में होने का झूठ फैलाकर अपने प्रेमी के साथ अय्याशी में लीन हो चुकी थी। हमारे देश में लगभग हर घर में दिन की शुरुआत चाय से होती है। मां, बहन, पत्नी के हाथों की बनी चाय आपसी रिश्तों में अपनत्व की मिठास और जुड़ाव की खुशबू भी घोलती है। उत्तरप्रदेश के कानपुर के अंतर्गत आनेवाले रावतपुर के गणेशनगर में रहने वाले एक धनवान परिवार के सदस्यों को चाय के स्वाद में आए बदलाव ने चिंतित कर दिया। अच्छे-खासे सेहतमंद स्त्री-पुरुष बीमार पड़ने लगे। डॉक्टरों की शरण ली गई तो उन्होंने खाने-पीने की चीज़ों में किसी हानिकारक पदार्थ के मिलाये जाने की आशंका जताई। परिवार के युवा हिमांशु की शादी हुए अभी कुछ ही महीने हुए थे। किसी पर एकाएक शक नहीं किया जा सकता था। इसलिए रसोईघर से लेकर घर के सभी कमरों में सीसीटीवी लगवाये गये। कैमरों में हिमांशु की पत्नी बार-बार चाय में काले रंग का पदार्थ मिलाती दिखी। इतना ही नहीं रूम फ्रेशनर में भी कोई संदिग्ध तरल पदार्थ मिलाती नज़र आई। घर में तनाव का वातावरण बन गया। अंतत: जो सच्चाई सामने आई उसने तो भरे पूरे परिवार के होश ही उड़ा दिए। हिमांशु की पत्नी चाय तथा रूम फ्रेशनर में अत्यंत विषैला रसायन मिलाकर पूरे परिवार के सदस्यों का खात्मा कर पूरी संपत्ति पर कब्जा करने की साजिश रच चुकी थी। यदि घर में कैमरे नहीं लगवाये जाते तो सच सामने आ ही नहीं पाता। 

वक्त ऐसे भी करवट लेगा किसको पता था? औरतें हत्याएं करने के मामले में पेशेवर अपराधी पुरुषों को मात देने पर उतर आएंगी और ऐसे-ऐसे तरीके अपनाएंगी कि पति नाम का जीव एकदम बेबस और बेचारा बन कर रह जाएगा! सात साल पहले जिस अतुल नामक युवक ने घरवालों का कहना न मानते हुए विद्रोह कर दामिनी नामक युवती से शादी की थी, उसी ने बीस लाख के बीमा की रकम के लिए अपने प्रेमी के साथ मिलकर उसे मौत की नींद सुला दिया। इसके लिए उसने कोई पारंपरिक औजार, हथियार चुनने की बजाय विषैले सांप का सहारा लिया। मेरठ शहर की इस दामिनी ने पहले तो पति को दूध में नींद की गोलियां मिलाकर दीं...और गहरी नींद सो जाने के बाद उसके बिस्तर में एक ज़हरीला सांप छोड़ दिया। सांप के डसने से नींद में ही अतुल चल बसा। हत्यारिन दामिनी का पति अतुल स्कूल संचालक था और उसका प्रेमी उसी स्कूल की बस का मामूली सा ड्राइवर! दामिनी भी स्कूल संचालन में सहायता करती थी। इसी दौरान पता नहीं कब और कैसे खूबसूरत दामिनी ड्राइवर पर मर मिटी और उसको हमेशा-हमेशा के लिए पाने के लिए अपने पति को मिटा दिया।

 शार्टकट से धन कमाने के लिए ठगी करतीं और बड़ी आसानी से ठग-लुटेरों की साथी बनतीं कुछ नारियां रही सही कसर को भी पूरा करने पर उतारू हैं। शादी का झांसा देकर भोले-भाले युवकों से नकदी और गहने ऐंठ लेने की खबरें कुछ वर्ष पहले तक तो राजस्थान, हरियाणा और पंजाब से सुनने-सुनाने में आती थीं, लेकिन अब तो जहां-तहां लुटेरी दुल्हनों की फसल बड़ी तेजी से पैदा हो रही है। अभी...अभी शहर के दैनिकों में अपने शहर में ‘लुटेरी दुल्हन’ गिरोह के पर्दाफाश होने की खबर पढ़ी, ‘‘गुजरात के एक युवक को शादी के लिए अच्छी लड़की की तलाश थी। उसने संतरानगरी में रहनेवाले अपने मित्र को अपनी परेशानी बताई तो उसने नागपुर में उसके लायक लड़की होने का आश्वासन देकर शीघ्र आने को कहा। नागपुर पहुंचने के कुछ घंटों के बाद खूबसूरत लड़की उसके सामने पेश कर दी गई। युवक को लड़की तुरंत जंच गई। लड़की वालों को भी शादी करने की जल्दी थी। उन्होंने दुल्हन के श्रृंगार के नाम पर गहनों तथा अन्य खर्चों के लिए लाखों रुपए पहले ही रखवा लिए। फिर शहर के एक मंदिर में संपूर्ण रीति-रिवाज के साथ विवाह भी संपन्न हो गया। युवक खुशी से फूला नहीं समा रहा था। वह जल्द से जल्द अपनी दुल्हन को राजस्थान ले जाने के मंसूबे बना ही रहा था कि, इस बीच एक युवक वहां आ धमका। वह अकेला नहीं था। वह शादी के जोड़े में सजी-धजी दुल्हन को अपनी पत्नी बताते हुए हंगामा करने लगा। शादी के सूट-बूट में ‘हीरो’ बना युवक हक्का-बक्का रह गया। उसकी बहसबाजी कोई काम नहीं आयी। ड्रामे की मास्टरमाइंड नायिका और उसके साथी बड़ी ठसन से उसकी नज़रों के सामने से चलते बने और वह असहाय...अवाक रह गया।

कुछ दिन पहले रायपुर की एंटी क्राइम एंड साइबर यूनिट और पुलिस ने संयुक्त अभियान चलाकर एक ऐसे शातिर ठग को पकड़ा, जिसने शहर के विख्यात लग्जरी होटल हयात में दो दिनों तक ठहरकर लजीज खाना खाया, महंगी शराब पीते हुए खूब मौज की और लगभग पैंसठ हजार का बिल चुकाए बिना फुर्र हो गया। तमिलनाडु निवासी विंग्सन जॉन नामक यह ठग अलग-अलग नाम से देशभर के विभिन्न नगरों, महानगरों के आलीशान होटलों में ठहरता था और फिर चकमा देकर भाग खड़ा होता था। अभी तक वह लगभग तीन सौ लग्जरी होटलों में मुफ्त ठहरने और खाने-पीने का आनंद लूट चुका है। साल 2022 में भी उसे एक फाइव स्टार होटल की शिकायत पर गिरफ्तार किया गया था। वहां भी उसने बिना बिल चुकाए होटल छोड़ा और वहां का लैपटॉप भी लेकर खिसक गया। पुलिसिया जांच में पता चला कि, जॉन की पहली गिरफ्तारी 1996 में दिल्ली में हुई थी। तब उसे तिहाड़ जेल भेज दिया गया था। वहां से छूटने के बाद वह नहीं सुधरा। उसने केरलम, तमिलनाडु, गोवा, आंधप्रदेश और महाराष्ट्र के विभिन्न होटलों में मुफ्त में मज़ा लूटा। जेलें ही उसके लिए घर थीं। वहां उसे नये-नये लोग मिलते थे। उसे दोस्ती गांठने में महारत हासिल थी। पंद्रह साल उसने जेलों में ही बिताये। हर बार अपनी पहचान बदलने में माहिर जॉन कभी खुद को अंग्रेजी का शिक्षक तो कभी धनाढ्य टूरिस्ट अथवा योगा प्रशिक्षक बताकर होटल में महंगे से महंगा कमरा लेता था। उसके हाथों में दो बैग होते थे। एक में उसके कपड़े तो दूसरे बैग में अखबार और तकिए होते थे। अपना सामान वह होटल कर्मचारियों को कभी छूने नहीं देता था। होटल छोड़ते वक्त वह अखबार और तकिए वाला बैग अपने कमरे में ही रहने देता था, ताकि होटल के स्टॉफ को लगे कि वह कहीं आसपास जा रहा है। अपना काम निपटाकर शीघ्र लौट आएगा। जाते-जाते होटल का कीमती सामान चुराना उसकी आदत में शुमार था। पुलिस को उसने बड़े फख्र के साथ बताया कि, पूरे विश्व में अपनी कुख्याति का डंका बजाने वाला खूबसूूरत औरतों का रसिया और हत्यारा...शातिर ठग चार्ल्स शोभराज उसके लिए ‘महानायक’ है। वह उसे अपना एकमात्र आदर्श मार्गदर्शक मानता रहा है। उस जैसा चतुर व्यक्ति उसने और कोई नहीं देखा। फर्जी पहचान और छल कपट के तरीके अपनाने की तमाम कलाएं उसने अपने ‘गुरु’ चार्ल्स से ही सीखीं और सफल रहा। दिल्ली की तिहाड़ जेल में दोनों एकसाथ थे। चार्ल्स शोभराज ने अय्याशी के लिए कौन से नये-नये रास्ते चुने और कई खूबसूरत औरतों को भोगने के बाद कैसे मौत के घाट उतारा आदि...आदि सब कुछ जॉन को बताकर बेखौफ होकर हिंसा और छलकपट करने की सीख दी। महाठग शोभराज ने भी अपने जीवन का अधिकांश समय जेलों में ही बिताया। भले ही मौज मस्ती और ऐश के बहुतेरे दिन उसके हिस्से में आये हों लेकिन फिर भी वह कभी चैन से सो नहीं पाया। जॉन ने काफी हद तक शोभराज के पदचिन्हों को अपनाया, लेकिन जॉन ने आखिर क्या पाया? वास्तव में उसने गंवाया ही गंवाया। कुछ भी नहीं पाया। भौतिक सुखों के चक्कर में परिवार से नाता टूटा। मां-बाप ने नालायक बेटे से रिश्ता तोड़ लिया। पत्नी और बच्चों का भी कोई अता-पता नहीं। ऐसे नकली सुख किस काम के? इस दुनिया में आने और जाने के बीच मेहनत कर लोग क्या कुछ नहीं पा लेते। इस धरती के अधिकांश लोग बेइमानों, चरित्रहीनों और मुफ्तखोरों का कभी सम्मान नहीं करते। भले ही वे कितने ही साधन संपन्न हो जाएं। यह दुनिया परिश्रमी और चरित्रवानों को सलाम करती है। कई संगीन अपराधी देखने में आये, जिन्हें अपने जीवन के अंतिम काल में बस यही अफसोस था कि काश...गलत साथ और संगत में नहीं पड़ते तो पश्चाताप की आग में न जलना पड़ता। अपनी उम्र का अधिकतर समय पुलिस और अदालतों से बचने के लिए छिप-छिपाकर तो नहीं गंवाना पड़ता है। कानून के डर से भाग-भागकर जीना भी कोई जीना है! अपने पति की हत्या और उसके शव के टुकड़े कर नीले ड्रम में दफनाने वाली मुस्कान कई माह से जेल में बंद है। उसके घर वालों ने उससे नाता तोड़ लिया है। पति को सांप से डसवाकर मारने वाली दामिनी बार-बार अपने 6 वर्षीय बेटे को याद कर रोती रहती है। अपने सैनिक पति की हत्यारिन कोमल जेल में बंद दूसरी महिलाओं से बस यही कहती रहती है कि प्यार में अंधी होकर मैंने अपना घर बर्बाद कर दिया। अपने ही हाथों अपना सुहाग उजाड़ने वाली जितनी भी महिलाएं जेल में बंद हैं, दिन-रात पश्चाताप की आग में जल रही हैं। अपने घर-परिवार में इज्जत और शान से रहती थीं, लेकिन अब जेल में कैदियों के लिए खाना बनाने, झाड़ू लगाने तथा घास छीलते हुए घुट-घुटकर दिन काट रही हैं। कब मौत हो जाएगी किसी को पता ही नहीं चलेगा।

Thursday, July 30, 2026

सोशल मीडिया से जन्मा एक आंदोलन

 मज़ाक-मज़ाक में शुरू किये गए छात्रों के हितकारी संगठन ने सरकार को नानी याद दिला दी। सुप्रीम कोर्ट की एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी से आहत होकर सात समंदर पार अमेरिका में बैठे अभिजीत दीपके नामक पढ़े-लिखे युवक ने सोशल मीडिया पर लिखा कि क्या होगा अगर सारे कॉकरोच एक साथ आ जाएं। अभिजीत के उपरोक्त चंद शब्द कुछ ही दिनों में उन करोड़ों युवाओं तक पहुंच गए, जो देश की लुंजपुंज शिक्षा व्यवस्था से खार खाये बैठे थे। न कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा, न ही कोई आलीशान दफ्तर बस सोशल मीडिया के मंच पर ही कॉकरोच पार्टी का विचार जन्मा और कुछ ही दिनों के बाद देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार और शिक्षा मंत्री के तुरंत इस्तीफे की मांग को लेकर उनका धरना प्रदर्शन प्रारंभ हो गया। शुरू-शुरू में तो छात्रों के आंदोलन को खास अहमियत नहीं दी गई। सभी को लगा कि यह नये-नवाड़े किस दम पर उस सरकार को अपना दम दिखा पायेंगे, जो अपनी ही मस्ती में चूर है। जैसे-जैसे दिन बीतते गये छात्रों की ज़िद और जुनून की हकीकत सोये हुए लोगों को जगाने लगी। उन भारतीयों ने भी अपने भ्रम के दायरे से बाहर निकलना प्रारंभ कर दिया, जिन्हें इस अनोखी पहल के शीघ्र ही पंगु हो जाने की उम्मीद थी। आंदोलन को प्रभावी बनाने और सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए देश के कोने-कोने से छात्रों के साथ अन्य लोग भी पहुंचने लगे। नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के मां-बाप तथा उनके परिजन भी उनके साथ आ खड़े हुए। लगभग बाइस छात्र-छात्राओं की आत्महत्या कोई छोटी-मोटी घटना तो नहीं थी। दिल्ली से प्रारंभ हुए छात्र आंदोलन की प्रभावी लहर को देश के अन्य शहरों और महानगरों तक पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा। महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर के संविधान चौक पर हजारों की तादाद में युवक-युवतियां शामिल हुए। इस प्रदर्शन में मध्यप्रदेश के मऊगंज जिले के मगनिया गांव की एक गमगीन मां नीलम चतुर्वेदी की उपस्थिति ने सभी को अत्यंत भावुक कर दिया। उनकी बेटी आकांक्षा चतुर्वेदी ने नीट पेपर लीक विवाद और री-एग्जाम की खबर के बाद अत्याधिक तनाव में होने के चलते आत्महत्या कर ली। नीलम चतुर्वेदी बताते-बताते फूट-फूटकर रोती रहीं। 

इसी तरह से महाराष्ट्र के अहिल्यानगर की उन्नीस साल की छात्रा ने नीट री-एग्जाम में उम्मीद से कम अंक मिलने पर मौत को गले लगा लिया। दोबारा हुए पेपर में मात्र 11 नंबर से चूकने पर आहत हुई छात्रा ने अपने सुसाइड नोट में लिखा, ‘‘मेरा डॉक्टर बनने का सपना अधूरा रह गया। मेरे माता-पिता को दोष न दें।’’ इस छात्रा ने पूर्व में जो नीट परीक्षा का एग्जाम दिया था उसमें उसके पेपर बहुत अच्छे गये थे, लेकिन पेपर लीक होने की वजह से दोबारा पेपर तो दिया लेकिन कम अंक आने से डॉक्टर बनने का सपना धरा रह गया। गरीब माता-पिता को तो बच्चों को सफल होते देखने के लिए गहने तक बेचने पड़ते हैं। खेती-बाड़ी और घर तक खोना पड़ता है। जंतर-मंतर तथा विभिन्न शहरों मेें हुए छात्रों के आंदोलन में और भी कई माता-पिता शामिल हुए। उनका कहना था कि हमारा बेटा-बेटी तो अब नहीं रहे लेकिन हम नहीं चाहते कि भविष्य में किसी और की संतान को खुदकुशी करनी पड़े। सच तो यह है कि हमारे देश में लाखों विद्यार्थियों और उनके परिवारों के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं अग्नि परीक्षा जैसी होती हैं। परीक्षा मेंसफल होने के लिए छात्र भी जी-जान लगा देते हैं, लेकिन जब पेपर लीक हो जाता है या कोई और व्यवधान आ जाता है तो उनके अरमानों पर चोट पहुंचती ही है, तो कुछ छात्र खुदकुशी कर गुजरते हैं। परीक्षाओं में पेपर लीक होने, बेखौफ नकल चलने तथा अन्य अनियमितताओं के होने की जगजाहिर जानकारी से सभी सजग भारतीय वाकिफ हैं। लेकिन देश के स्थापित नेताओं और दलों ने इस समस्या के समाधान के लिए धरना आंदोलन की नहीं सोची! कॉकरोच जनता पार्टी ने हिम्मत और अभूतपूर्व पहल की और विख्यात गज़लकार दुष्यंत कुमार की चर्चित गज़ल की इन पंक्तियों को सार्थक कर दिखाया।

‘‘कौन कहता है, आसमां में सुराग नहीं हो सकता,

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो’’

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और अन्य मांगे स्वीकार कर लिये जाने के बाद प्रदर्शन-आंदोलन समाप्त हो गया। इन पत्थरों के चलने-चलाने के बीच कुछ सत्तालोलुप शातिर नेताओं ने गर्म तवे पर अपने स्वार्थ की रोटियां पकाने की जो कोशिश की, उस पर भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है। लेकिन घिसे-पिटे खोटे सिक्कों पर कलम चलाकर अपना समय जाया करने का हमारा बिल्कुल मन नहीं है। लेकिन हां, पूरे देश में सूखी घास में लगी आग की तरह फैले कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को यकीनन हमेशा याद रखा जाएगा। सत्ताधीशों को किंचित भी अनुमान नहीं था कि भारतीय छात्रों का आंदोलन पूरे देश में फैलकर उनकी नींद हराम कर देगा। किशोरों और युवाओं के प्रतिनिधियों को आदर-सम्मान के साथ निमंत्रित कर बातचीत करनी पड़ेगी। 

छात्रों के आंदोलन स्थल जंतर-मंतर तथा संसद मार्च में रिपोर्टिंग के लिए पहुंचे पत्रकारों, एंकरों को जिस तरह से विरोध झेलना पड़ा। मारपीट का शिकार होना पड़ा। उसके लिए इस आंदोलन को याद रखा जाएगा। दरअसल, पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में यह स्पष्ट दिखाई देने लगा है कि अधिकांश न्यूज चैनल सरकार परस्त हो चुके हैं। ऐसा भी नहीं कि मीडिया की चाटूकार होने की यह शर्मनाक छवि एकाएक बनी है। दरअसल, जब से उद्योगपतियों, नेताओं और माफिया किस्म के घोर मतलबपरस्त ताकतवरों ने न्यूज चैनलों को शुरू किया या कब्जाया तब से स्थिति बिगड़ते-बिगड़ते एकदम बेकाबू हो गई। अब तो लगभग हर न्यूज चैनल पर किसी खास दल पार्टी, नेता, मंत्री और दमदार हस्ती का ठपा लगा नजर आता है। अधिकांश अखबार यानी प्रिंट मीडिया भी धनवान घरानों की गिरफ्त में छटपटा रहे है। ऐसे में यह तो तय है कि मालिक जो चाहेंगे वही होगा। वही ही तो हो रहा है। यह भी कहीं न कहीं सच है कि प्रिंट मीडिया की साख पर अभी तक उतना बट्टा नहीं लगा, जितना कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया लोगों की नज़रों से गिरा है। बुरी तरह बदनाम हो चुके चैनलों के मालिक तो जमीनी पत्रकारिता करने से रहे। उन्हें तो अपने वातानुकूलित कार्यालयों के आलीशान कमरों में बैठकर अपने अन्य धंधों से माया बटोरने से ही फुर्सत नहीं मिलती। उन्होंने मीडिया के क्षेत्र में पर्दापण ही इसलिए किया है, ताकि उनके काले-पीले अथाह कमाई वाले कारोबार बिना किसी रुकावट के चलते रहें। मीडिया उनके लिए सुरक्षा कवच है। जंतर-मंतर और संसद मार्ग में भी मालिकों की नौकरी बजाने वाले एंकर और संवाददाता ही लहूलुहान हुए। जाने-अनजाने हुड़दंगियों ने जीभर कर उन्हीं का जिस तरह से मज़ाक उड़ाया उससे उनके होश उड़ गए। बुरी तरह से निशाने पर आए उन चुनिंदा न्यूज चैनलों के मालिकों की समझ में भी आ गया कि अब उन्हें सरकार की जी हजूरी तथा सिर्फ और सिर्फ तारीफों की झड़ी लगाने की अपनी दाग़दार आदत से बाहर निकलना ही होगा।

एक जमाना था जब आम जनता मीडिया के चाल-चलन पर ज्यादा ध्यान नहीं देती थी। लेकिन अब वह अत्यंत सतर्क हो गई है। उसे अच्छी तरह से पता होता है कि कौन किसके इशारे पर जबरन सरकार का विरोध करने में लगा है और किसने मलाई खाने के लिए चम्मचागिरी का झंडा उठा रखा है। भारत तो बहुत बड़ा लोकतांत्रिक देश है। छोटे-छोटे देशों में भी जागृति आ चुकी है। बीते वर्ष पड़ोसी देश नेपाल में जेन जी के उग्र विरोध प्रदर्शन के दौरान सरकार के तलवे चाटने वाले वहां के प्रमुख नेपाली भाषा के एक अखबार के कार्यालय को आग से फूंक दिया गया था। आज के युवा शिगूफेबाजी और लफ्फाजी करने वालों की नस-नस से वाकिफ हो गये हैं। खासतौर पर भारत में तो हिंदू-मुस्लिम और मंदिर-मस्जिद के आधार पर विभाजन करने की राजनीति से तंग आ चुके हैं। उन्हें भेदभाव से चिढ़ है। वे बेरोजगारी से मुक्ति चाहते हैं। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में असमानता होने के कारण गरीबों की संतानें अशिक्षित रहने को विवश हैं। अधिकतर संपन्न परिवारों के बच्चों को डॉक्टर, कलेक्टर, इंजीनियर एवं अन्य उच्च पदों पर विराजमान होने के अवसर मिल रहे हैं। जबकि बिना किसी भेदभाव के सभी देशवासियों को उनकी मनपसंद शिक्षा को उपलब्ध कराना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। 

लाठीचार्ज और आंसू गैस को झेलते हुए भी जेन जी के मीम, रील्स और तरह-तरह के व्यंग्यात्मक वीडियो बनाने के बेफिक्री भरे अंदाज ने लोगों को आकर्षित किया। वहीं नई पीढ़ी की अलग सोच भी सामने आयी। अपवाद तो हर कहीं देखने में मिलते हैं, लेकिन अनुशासन, आपसी सहयोग, डिजिटल नेटवर्क व महिला सुरक्षा जैसे पहलुओं ने इसे पारंपरिक आंदोलनों से अलग बनाया। इस आंदोलन में एक नई पहल और भी देखी गई। देश-विदेश से समर्थकों ने स्विगी और जोमेटो जैसे प्लेटफार्म के जरिए भूखे-प्यासे छात्रों तथा उनके साथियों को भरपूर खाने-पीने का सामान, दवाइयां तथा अन्य जरूरत की चीजे सीधे प्रदर्शन स्थल पर भेजकर कहीं न कहीं उन शंकाओं और सवालों का निराकरण कर दिया कि घर-बार छोड़कर आये हजारों कॉकरोचों के पीछे कौन हैं। कुछ लोगों के अलग विचार हैं। उन्हें लगता है कि यह भारत सरकार को अस्थिर करने का सपना देखती ताकतों का सोचा-समझा षडयंत्र था। इस आंदोलन में बड़ी संख्या में युवतियों का मौजूद रहना उनकी जागृति और सार्थक सोच का परिचायक बना। लगभग सभी छात्राएं युवकों की भीड़ होने के बावजूद खुद को सुरक्षित पा खुश और संतुष्ट थीं। इसी एकता और मर्यादा का पालन करने के चलते अंत तक आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत डिजिटल माध्यम बना रहा। देश तथा विदेशों तक मीम्स, रील्स, लाइव स्ट्रीम, एक्स पोस्ट व इंस्टा अपडेटस के जरिए पल-पल की खबर पहुंचती रही। सामाजिक कार्यकर्ता, सच्चे गांधीवादी सोनम वांगचुक ने छात्रों के समर्थन में जंतर-मंतर पर 26 दिन तक अनशन का आंदोलन की गरिमा बढ़ाई। यह कहना गलत नहीं कि यदि 59 वर्षीय सोनम वांगचुक भूख हड़ताल नहीं करते तो जेन जी का यह आंदोलन विशाल और प्रभावी स्वरूप अख्तियार नहीं कर पाता। लेकिन फिर भी उनके महान योगदान पर सवाल उठाये गये। यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा तो अक्सर होता आया है.....

Thursday, July 23, 2026

आप भी सोचिए...

 देश की राजधानी दिल्ली में स्थित आदर्शनगर मजलिस पार्क मेट्रो स्टेशन के पास एक तेज रफ्तार स्कूल बस ने स्कूली बच्चों से भरे ई-रिक्शा को जोरदार टक्कर मार दी। इस भीषण हादसे में ई-रिक्शा में सवार बारह वर्षीय छात्रा प्रियांशी औंधे मुंह सड़क पर गिर गई और बस के पहिए की चपेट में आने से लहुलूहान हो गई। मासूम बच्ची सड़क पर खून से लथपथ तड़प रही थी, तब कुछ लोग उसकी जान बचाने की बजाय अपने मोबाइल से वीडियो बना रहे थे। वहीं अधिकांश लोगों को उसकी तरफ देखने की फुर्सत ही नहीं थी। उन्हें तो अपने घर, ऑफिस, दुकान जाकर काम में लग जाने की जल्दी थी। महानगरों के लोग दुर्घटनाएं देखने के अभ्यरत हो चुके हैं। उनकी मानवीय भावना-संवेदना गायब हो चुकी है। ई-रिक्शा में सवार बच्चों की प्रियांशी को अस्पताल ले जाने और किसी तरह से बचाने की मिन्नतें उनके लिए अर्थहीन थीं। दस-पंद्रह मिनट ऐसे ही गुजर जाने के बाद जिम में काम करने वाले गोविंदा नामक युवक की घायल बच्ची पर नज़र पड़ी तो उसने उसे तुरंत अपनी गोद में उठाया और भागते-भागते बाबू जगजीवनराम अस्पताल पहुंचा। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। डॉक्टर ने देखते ही उसे मृत घोषित कर दिया।

बच्ची तो चल बसी। उसकी मौत के बाद उसके परिवार में जो कोहराम मचा उसे भी आसपास के लोगों ने देखा। उन्होंने शोकाकुल माता-पिता को सांत्वना भी दी लेकिन उनका क्या, जिन्होंने हादसे के बाद घटनास्थल पर मौजूद रहने के बावजूद अपने अंदर के जिन्दा इंसान को दफना दिया, बस तमाशबीन और पत्थर दिल बने रहे। यही संवेदनहीनता समाज को कटघरे में खड़ा कर अपराधी साबित करती है। खून से लथपथ पड़े इंसान को बचाने की पहल करने की बजाय धड़ाधड़ वीडियो बनाने वाले निर्मोही और निर्लज्ज कहते हैं कि क्यों पुलिस की पूछा-पूछी और अस्पताल के चक्कर में अपना वक्त गवाएं। हमें और भी बहुतेरे काम है। हमने समाजसेवा का ठेका थोड़े ही ले रखा है।

जौनपुर में एक डॉक्टर हैं जो पिछले छह दशकों से मरीजों का मुफ्त इलाज करते चले आ रहे हैं। बीमार, लाचार और बेबसों की सुबह से ही उनके दरवाजे के बाहर लंबी कतार लग जाती है। महंगाई के इस काल में हलका सा पेट दर्द और अन्य छोटी-मोटी शारीरिक तकलीफ होने पर जहां डॉक्टर विभिन्न अंदरूनी जांच के लिए पर्चे पर पर्चे लिख कर मरीज के हजारों रुपए खर्च करवा देते हैं, वहीं 92 वर्षीय डॉ.द्विवेदी की अनुभवी, जादुई उंगलियां कलाई छूकर बीमारी का एकदम सटीक पता लगा लेती हैं। मरीज के ब्लड प्रेशर, यूरीन टेस्ट और खान-पान के इतिहास की जानकारी के आधार पर अत्यंत प्रभावी दवाएं देने वाले गरीबों के यह मसीहा केवल दवाओं की वास्तविक लागत लेने के स्वर्निर्मित कड़े नियम से बंधे हैं। 1960 के दशक में जब हमारे देश भारत में काबिल डॉक्टरों की अत्यंत कमी थी तब शिवसूरत द्विवेदी ने उत्तरप्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ से एमबीबीएस की डिग्री हासिल की। डिग्री मिलते ही उन्हें पहले वाराणसी और उसके बाद चुनार में सरकारी डॉक्टर के पद पर नियुक्ति मिल गई। चुनार तब पिछड़ा इलाका था, जहां न बिजली थी और न ही अन्य मूलभूत सुविधाओं का अता-पता था। स्थानीय डॉक्टर बिना मोटी फीस के मरीज को देखने से मना कर देते थे। सरकारी नौकरी करते-करते डॉ.द्विवेदी को किसी सगे-संबंधी से जानकारी मिली कि जौनपुर, जहां उनका जन्म हुआ, वहां पर भी गरीब लोग समुचित इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। वे शानदार सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर जौनपुर चले गए। परिवारजन तथा रिश्तेदार हतप्रभ सोचते रह गये। कैसा आदमी है जो बेहतरीन सरकारी नौकरी को लात मारकर ऐसी जगह आ गया है, जहां कोई कमाई-धमाई नहीं होने वाली है! लेकिन डॉ.द्विवेदी पर तो अपनी माटी का कर्ज चुकाने का जुनून सवार था। 

लोगों को आज भी अस्सी के दशक की वो घटना अच्छी तरह से याद है। जौनपुर के निकट स्थित गांव के एक अत्यंत गरीब मरीज को जब लोग इलाज के लिए उनके पास लाए, तो उसकी नब्ज डूब रही थी और सांसें थमने की कगार पर थीं। पूरे गांव ने उसकी मृत्यु को निश्चित मान लिया था। लेकिन डॉ.द्विवेदी ने हार नहीं मानी और उन्होंने रातभर बिना पलक झपकाए उसकी देखरेख और सेवा करते हुए पुरानी चिकित्सा पद्धतियों और अपने जादुई तजुर्बे से ऐसा इलाज किया कि सुबह होते-होते वह मरणासन्न मरीज अपने पैरों पर उठ खड़ा हो गया। पूरे इलाके में इसे किसी चमत्कार की तरह देखा गया। इस घटना के बाद उनके पास मरीजों की बाढ़ आ गई, जिसे संभालने के लिए उन्होंने अपने ही घर के कमरों को ‘नि:शुल्क अस्पताल वार्ड’ में तब्दील कर दिया। उनके मरीजों के प्रति जुड़ाव ने उन्हें देवता का दर्जा दिला दिया है। सभी बस यही चाहते हैं कि वे हमसे कभी दूर न हों। ईश्वर हमेशा उन पर मेहरबान रहें।

देश में कुछ ऐसे सरकारी अधिकारी हैं, जो अपनी ड्यूटी इस कदर ईमानदारी से निभाते हैं कि उनके समक्ष बार-बार नतमस्तक होने को जी चाहता है। महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन आयुक्त तुकाराम मुंढे भी उन्हीं फरिश्तों में शामिल हैं। किसी फिल्मी नायक की तरह अत्यंत लोकप्रिय तुकाराम मुंढे का नाम सुनते ही भ्रष्टाचारियों का पसीना छूटने लगता है। उन्हें जिस विभाग में नियुक्त किया जाता है, आंधी-तूफान की तरह वहां की गंदगी की सफाई में लग जाते हैं। उनका मानना है कि वे वातानुकूलित कमरे में कुर्सी पर बैठकर महज आर्डर देने के लिए उच्च अधिकारी नहीं बनेे हैं। महाराष्ट्र कैडर के 2005 बैच के इस आईएएस ने कभी यह नहीं देखा कि सामने वाले का कैसा रूतबा पहुंच और मान-सम्मान है। उनकी पैनी नज़र उसके नाम पर नहीं, अपराध कर्म पर रहती है, जिसका पर्दाफाश करना वे अपना एकमात्र कर्तव्य मानते हैं। बिना किसी भेदभाव के नियमों का सख्ती से पालन करवाने को कटिबद्ध तुकाराम को जहां आमजान सिंघम और रियल लाइफ का हीरो मानते हैं, वहीं नेताओं को उनकी समझौता नहीं करने की जिद हमेशा परेशान किये रहती है। बिना किसी पूर्व सूचना के कारखानों, दफ्तरों और अस्पतालों का निरीक्षण करने के लिए पहुंच जानेवाले इस कर्मवीर को मिलावटखोर और मुनाफाखोर अपना शत्रु मानते हैं। उनकी निर्भीक कार्यशैली ने उन्हें ईनाम कम और तबादले ज्यादा दिलवाये हैं। 21 साल के करियर में लगभग 25 स्थानांतरण ईनाम के तौर पर उनके हिस्से में आ चुके हैं। 2026 के मई महीने में मुंढे को महाराष्ट्र के अन्न और औषधि प्रशासन का जैसे ही कमिश्नर नियुक्त किया गया, उन्होंने मिलावटखोरों की नींद हराम कर दी। अवैध खाद्य और औषधि निर्माताओं और विभिन्न माफियाओं के यहां छापामारी के साथ-साथ वर्षों से स्थापित मिठाई बनाने वाली फैक्ट्रियों, रेस्तरां आदि का एकाएक निरीक्षण और पर्दाफाश कर लोगों की आंखें खोल दीं कि किस तरह से उनके जीवन के साथ धनपशु खिलवाड़ कर रहे हैं। उन्हें सिंथेटिक दूध, नकली पनीर, गुटखा-तंबाखू और नकली दवाइयों के जरिए खोखला और बीमार बनाया जा रहा है। ध्यान रहे कि नकली दवाएं बनाने, खाद्य पदार्थों में मिलावट करने, प्रतिबंधित गुटखा-तंबाखू बनाने और बेचने-बिकवाने वाले एक ही दिन में आसानी से पैदा नहीं होते। उन्हें भ्रष्ट अफसरों का भी साथ और सहयोग मिलता है, तभी उनकी जड़ें मजबूत होती चली जाती हैं और फिर देखते ही देखते चोर-चोर मौसेरे भाई बन जाते हैं। मुंढे जैसे उसूलों के पक्के ईमानदार अधिकारी के छापों से अवैध धंधेबाजों, मिलावट माफियाओं आदि की कमाई पर तो चोट पड़ती ही है, वहीं रिश्वतखोर अधिकारियों और कर्मचारियों की आवक पर भी लगाम लग जाती है। यही कारण है कि तुकाराम मुंढे जहां भी जाते हैं, वहां उनके नीचे कार्यरत अधिकांश अधिकारी उनसे नाखुश रहते हैं और ईश्वर से उनके स्थानांतरण की प्रार्थना के साथ-साथ अपने खास नेताओं, विधायकों, मंत्रियों के दरबार में थैलियां लेकर इस फरियाद के साथ पहुंच जाते हैं कि कृपया, इनसे शीघ्र मुक्ति दिलाओ। यह जब तक डटे रहेंगे तब तक हमारी ऊपरी कमाई बंद रहेगी तो ऐसे में हम आपकी सेवा कैसे कर पायेंगे! यह हकीकत भी काबिलेगौर है कि जैसे ही तेज तर्रार, कड़क छवि वाले तुकाराम मुंढे ने अन्न व औषधि प्रशासन की कमान संभाली है तो उनके नीचे कार्यरत कुछ पुराने बदनाम ‘वसूली’ करने वाले अधिकारी साहब के नाम के डंडे का खौफ दिखाते हुए पहले से भी अधिक ‘मोटी वसूली’ करने लगे हैं। यह भी सच है कि सत्ताधीशों के साथ और सहयोग के बिना ‘वसूली सिंडिकेट’ इतनी हिम्मत नहीं कर सकता। इस कर्तव्यपरायण आदर्श अधिकारी का जब-जब कहीं से तबादला होता है तब-तबवहां की आम जनता उनके तबादले के विरोध में सड़कों पर उतर आती है। मजबूरन नम आंखों से विदा करती तो है लेकिन दिल और दिमाग में बड़े आदर के साथ हमेशा बसाये रखती है।

Thursday, July 16, 2026

महामंत्र

 हजारों साल बीत गये। कई हस्तियां जन्मीं और चल बसीं। बहुत को विस्मृत कर दिया गया। नाममात्र के नाम लोगों को याद रहे। श्रीकृष्ण और श्रीराम की हस्ती सदियां-सदियां गुजर जाने के बाद भी जस की तस बनी हुई है। सच तो यह है कि समय गुजरने के साथ-साथ उनकी आराधना करने वालों की तादाद में इजाफा ही हो रहा है। दोनों ने मनुष्य को ईमानदारी से कर्तव्य पथ पर चलने की सीख दी। परिश्रम के मार्ग में आनेवाले व्यवधानों से भी कभी भी न घबराने का पाठ पढ़ाया। उन्हीं के सुझाये रास्तों का अनुसरण कर न जाने कितने-कितने इंसानों का उद्धार हो गया। श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘‘सब कुछ संभव है अगर तुम्हें खुद पर पूर्ण विश्वास है। मन ही हमारा मित्र है और मन ही शत्रु। यहां मन का मतलब है विचारों का निरंतर प्रवाह। आत्म सुधार के लिए अत्यंत आवश्यक है कि हम अपने मन और उसमें उठने वाले विचारों को शुद्ध बनाए रखें। आध्यात्मिक जीवनचर्या अपनाने से मन को विषय भोगों से दूर रखने में सहायता मिलती है। दरअसल, मन और इंद्रियों की प्रवृत्ति ऐसी होती है कि अगर हम उन्हें एक इंच भी ढील देते हैं तो वे एक मील तक फैल जाती हैं। लेकिन यदि हम दृढ़ निश्चय के साथ उन्हें काबू में लाने का अभ्यास करें तो वे शांत हो जाती हैं और हम आसानी से बेहतर इंसान बन सकते हैं।’’ जिस महान धरा पर श्रीकृष्ण और श्रीराम अवतरित हुए वहीं आप और हम जन्मे हैं, इससे बड़े भाग्य और खुशनसीबी की और क्या उपलब्धि हो सकती है। इन दोनों आराध्यों का संपूर्ण जीवन अपने आप में जीवन प्रबंधन की सार्थक और सशक्त किताब है। इस किताब के पन्ने-पन्ने में लिखा है, चुनौतियों का डट कर सामना करें। अन्यायी से बिलकुल न डरें। अनुशासन और परिश्रम से कभी भी मुंह न मोड़ें। रिश्तों के मान-सम्मान में कभी कोई कमी न आने दें। यह किताब यह भी बताती है कि गुरु, साधु, धर्मगुरु, नेता और राजा का आचरण कैसा होना चाहिए। जिस प्रकार संतान को सुधारने की जिम्मेदारी माता-पिता पर होती है, औलाद के पथभ्रष्ट होेने पर अभिभावकों को भी कोसा जाता है। उसी प्रकार प्रजा की भलाई, बुराई का सारा भार राजा के ऊपर होता है। इसलिए कहा गया है, ‘‘यथा राजा तथा प्रजा’’ यदि देश का राजा, सदाचारी, न्यायप्रिय और धर्म कर्म वाला होता है तो प्रजा में सारे गुण क्रमश: उतर आते हैं। इसके विपरीत यदि राजा दुराचारी है, अन्यायी और प्रजा के साथ भेदभाव करने वाला होता है तो प्रजा में भी उच्छृंखलता, अनाचार पापाचार एवं प्रतिहिंसा के भाव फैलने में देरी नहीं लगती। ऐसे में राजा और प्रजा दोनों ही अधोगति को प्राप्त होते हैं। आनंदमूर्ति गुरु मां कहती हैं कि कृष्ण के नाम का अर्थ है-चैतन्य। कृष्ण का अर्थ है चुम्बकीय शक्ति रखने वाला। श्रीकृष्ण का आकर्षण बीते आने वाले कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा। कुरुक्षेत्र में दो सेनाओं के बीच खड़े होकर भारी तनाव के समय श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया, वो दुनिया का सर्वोत्तम ज्ञान है। महाभारत के युद्ध के आरंभ में जब अर्जुन अपने परिजनों के मोह में पड़कर लड़ने में आनाकानी कर रहे थे तब श्रीकृष्ण ने उन्हें श्रीमद्भागवत कथा का उपदेश दिया। उन्होंने अर्जुन को आत्मा की अमरता (अर्थात शरीर नश्वर है, आत्मा नहीं) और क्षत्रिय धर्म का बिना फल की चिंता किए पालने की शिक्षा दी। उन्होंने यह भी समझाया कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके परिणाम (फल) पर नहीं। 

हम बचपन से ही रामकथा और श्रीमद्भागवत कथा को सुनते आये हैं। रामकथा में प्रभु श्रीराम के आदर्श जीवन और मर्यादा का वर्णन तो श्रीमद्भागवत कथा में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं और भक्तिरस का वर्णन अलौकिक सुखदायी है। इन्हें सुनने से मन को शांति और आध्यात्मिक ज्ञान की मधुर प्राप्ति होती है। भगवान श्रीराम ने अपने श्रद्धेय पिताश्री की आज्ञा का पालन करते हुए सहर्ष 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया। उनके साथ उनकी अर्धांगिनी माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण भी महलों के सुख त्याग कर जंगल-जंगल भटके। बड़ों की आज्ञा का पालन और रिश्तों के सम्मान का इससे बड़ा उदाहरण इतिहास में और कहीं मिलना दुर्लभ है। हर तरह की मुश्किलों में धैर्य रखना, सबको साथ लेकर चलना, श्रीराम ने अपने कर्मों से पूरी सृष्टि को सिखाया। उन्होंने कहा, इस धरती पर जन्मे सभी मनुष्य एक समान है। उन्होंने खुशी-खुशी शबरी के जूठे बेर खाए और वानरों से मित्रता की। दुष्ट रावण का संहार करने वाले श्रीराम का संपूर्ण जीवन ही प्रेरणादायक है। तभी तो श्रीकृष्ण और श्रीराम के सार्थक संदेश हिंदुओं के साथ-साथ अन्य धर्मों के लोगों के लिए भी आकर्षक और मार्गदर्शक बने हुए हैं। हमारे देश में समय-समय पर रामकथा और श्रीमद्भागवत कथा कहने वाले कई सच्चे महान संत हुए हैं। ये विद्वान संत अपनी मधुर वाणी और प्रभावी कथावाचन के माध्यम से समाज में ज्ञान, भक्ति और अच्छे संस्कार का उजाला फैलाते चले आ रहे हैं। पूज्य श्री मोरारी बापू संपूर्ण देश और दुनिया में सत्य और प्रेम पर आधारित रामकथा के लिए विख्यात हैं। पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री (बागेश्वरधाम) का रामकथा और हनुमंत कथा प्रस्तुत करने का प्रभावी अंदाज युवाओं को भी आकर्षित कर रहा है। हालांकि कुछ विवाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ते। श्री रमेश भाई ओझा, रामकथा और श्रीमद्भागवत कथा वाचन कर बड़ी सहजता से लाखों श्रद्धालुओं का मन जीत लेते हैं। वृंदावन के अनोखे संत श्री अनिरुद्धाचार्य जी महाराज बहुत ही सरल और हास्य विनोद की प्रभावी शैली में जब श्रीमद्भागवत कथा का प्रस्तुतिकरण करते हैं तो युवक-युवतियों का अपार हुजूम भी मंत्रमुग्ध हो बस सुनता ही रह जाता है। श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज की भागवत और रामकथा प्रस्तुत करने की शैली भी लाजवाब है। सामाजिक समस्याओं के समाधान और सनातन धर्म की रक्षा का संदेश देने वाले इन महाराज की तरह कृष्ण भक्ति और भागवत कथा के लिए देश और दुनिया में जानी जा रहीं जयाकिशोरी, देवी चित्रलेखा, स्वामी अविचलदास, संत विजय कौशल जी आदि कुछ सात्विक हस्तियां हैं, जिन्होंने प्रवचन के माध्यम से धर्म के प्रचार की मशाल को बुलंदी के साथ थामा हुआ है। इनमें एक नाम कुमार विश्वास का भी जुड़ गया है, जो कवि के तौर पर डंका बजाने के पश्चात प्रवचन के क्षेत्र में भी छाये हुए हैं। श्रीकृष्ण और श्रीराम के प्रेरक जीवन चरित्र को भक्तों तथा श्रद्धालुओं तक पहुंचाने वाले सभी कथावाचक मालामाल हैं। कार्यक्रम के आयोजक पांच-दस लाख तो आसानी से दे देते हैं। अथाह धन के साथ-साथ कथावाचन का क्षेत्र पुरस्कारों से भी उनकी झोली भरता चला आ रहा है। अपराधियों को भी यह पवित्र क्षेत्र आकर्षित करने लगा है। चिंताजनक तथ्य यह भी है कि कुछ संगीन नकाबपोश अपराधी अपने मकसद में कामयाब भी हुए हैं।

पंडवानी की साम्राज्ञी तीजनबाई किसी परिचय की मोहताज नहीं। कुछ दिन पहले ही उनका निधन हुआ है। पंडवानी यानी पांडवों की कथा को मंच पर घूम-घूमकर सुनाती रहीं तीजनबाई जब महाभारत के विभिन्न प्रसंगों, विशेषकर भीम और अर्जुन की वीरता का बखान करती थीं तो दर्शकों में अथाह जोश भर जाता था। छत्तीसगढ़ में जन्मी तीजनबाई लोकगीत-नाटय की पहली महिला कलाकार थीं, जिन्होंने विदेशों में भी अपने नाम तथा कला की पताका फहराई। उनका विवाह मात्र 12 वर्ष की उम्र में हो गया था। पंडवानी गायन के लिए उन्होंने समाज की परंपराओं को तोड़ते हुए अपना संघर्ष जारी रखा। उनके पति को अपनी पत्नी तीजन का मंच पर जाना कतई पसंद नहीं था। घर में रोज-रोज कलह-क्लेश होने लगा। तीजनबाई को रूढ़िवादी पति के हाथों कई बार पिटना भी पड़ा और अंतत: विवाह टूट गया। परिवार तथा समाज ने भी बहिष्कृत कर दिया। दूसरी शादी भी हुई, लेकिन दूसरे पति ने भी विरोध किया कि यह तो पुरुषों वाला काम है। घर की औरतों का मंच पर नाचना-गाना शोभा नहीं देता। लोग मजाक उड़ाते हैं लेकिन तब तक तीजनबाई के अंदर का कृष्ण जाग चुका था। भीम और अर्जुन की साहस कथा में रच-बस चुकी तीजनबाई विरोधियों का डटकर सामना करना सीख चुकी थीं। उन्हें  पता चल चुका था कि कुछ भी नया करने वालों की राह में रोड़े डालने वालों को सिर्फ और सिर्फ अपने अटल जुनून और अथक परिश्रम से पटकनी दी जा सकती है। एक बार पति महोदय कुछ ज्यादा ही मर्दांनगी दिखाने के चक्कर में मंच पर चढ़कर गाली-गलौच करने लगे और पत्नी पर चुपचाप मंच से उतरने का दबाव डालने लगे। तब तीजनबाई ने आव देखा न ताव तंबूरे को लहराते हुए उसे जोर से फटकारा, जिससे उसके होश उड़ गये और वह चुपचाप चलता बना। उसके बाद की संघर्ष की यात्रा की दास्तां अनंत है। जिसने यह सिद्ध कर दिखाया कि कर्मवीर मंजिल पर पहुंचकर ही दम लेते है। उन पर किसी के विरोध का तंत्र-मंत्र नहीं चलता। बेखौफ चलते-बढ़ते जाना ही मंजिल तक पहुंचने का एकमात्र ‘महामंत्र’ है। जो बचपन में कभी स्कूल की सीढ़ी नहीं चढ़ी थी उसने साक्षरता अभियान के सहारे बमुश्किल पांचवी पास की लेकिन अपनी कला के प्रदर्शन के बलबूते पर 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्मभूषण और 2019 में देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण हासिल कर अपना लोहा मनवाते हुए दिखा दिया कि जब कुछ करने की जिद हो तो सफलता मिलती ही है। 

किसी अच्छे काम में विघ्न डालने, छलकपट करने वालों की नस्ल कभी भी नहीं मरती। श्रीराम के नाम की आड़ में लूटपाट और शैतानी करने वाले रावण के रूप और प्रतिरूप आज भी हमारे समाज में जिन्दा हैं। अयोध्या में बने भगवान श्रीराम के पवित्र मंदिर में चढ़ावे में आने वाले रुपयों की चोरी और सोने, चांदी, हीरे के दान के गबन की खबरों ने तो सभी देशवासियों को झकझोर कर रख दिया। राम भक्तों के दान और चढ़ावे में सेंध लगाने वाले चोरों और डकैतों की जालसाजी और नीचता तो देखिए कि श्रीराम की अपार आस्था से सराबोर सात्विक धन को शराबखोरी में भी उड़ाया गया। किसी ने कारें खरीदीं तो किसी ने बंगले ताने तो कोई साहूकार बनकर लूट की मोटी रकम को ब्याज पर देकर धन्ना सेठ बन गया। इन लुटेरों में ज़रा भी इंसानियत होती तो इतने अंधे नहीं बन जाते। वर्षों के संघर्ष के बाद बने दिव्य राम मंदिर में लूटपाट करने से पहले जरूर सोचते-विचारते। लेकिन उनकी आत्मा और विवेक का ही सत्यानाश हो चुका था। अब जब इन निर्लज्ज जन्मजात बेईमानों का पर्दाफाश हो चुका है तो कम अज़ कम हमें और आपको नकाबपोशों से सतर्क और सावधान हो जाना चाहिए।

Thursday, July 9, 2026

बचपन की पाठशाला

  अपने देश भारत की लगभग एक तिहाई आबादी नाबालिग है। यहां 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे करीब पच्चीस फीसदी हैं फिर भी बच्चों की पता नहीं क्यों ज्यादा चिंता-फिक्र नहीं की जाती? हां, ढोल जरूर पीटे जाते हैं कि बच्चे ही देश का भविष्य हैं। राष्ट्र निर्माण में बच्चों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। आनेवाले समाज और राष्ट्र की नींव हैं। इन्हीं को आगे जाकर नेता, वैज्ञानिक, शिक्षक, समाजसेवक, उद्योगपति आदि बनना है। बच्चों को अच्छा नागरिक बनाने की हम सबकी जिम्मेदारी है। हमारे देश में हर वर्ष 14 नवंबर को बड़े हर्षोल्लास के साथ जो बाल दिवस मनाया जाता है उसका मूल अर्थ और संदेश यही है कि भारत माता का हर बच्चा शिक्षा, सुरक्षा, सेहत, देखरेख और प्यार का अधिकारी है। कलमकार की नज़र जब गली-कूचों, चौराहों, होटलों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, मंदिरों, मदिरालयों, अस्पतालों आदि के ईद-गिर्द छोटे-छोटे बच्चों को कचरा बीनते और भीख मांगते देखती है तो यह प्रश्न तीर की तरह तन जाता है कि यह बच्चे कौन हैं? यकीनन अमीरों की संताने तो नहीं हैं। उनकी औलादे तो तरह-तरह की चॉकलेट, पिज्जा खाने और खिलौने के लिए जन्मी हैं। बदनसीब तो गरीबों के बच्चे हैं, जिन्हें जानवरों की तरह भटकना पड़ता है। स्कूल तो इनके लिए सपना है। ढंग का खाना भी इनके नसीब में नहीं लिखा है। उसे भी ये कचरे में तलाशते हैं। देश के अधिकांश शहरों में डंपिंग यार्ड बनाये गये हैं, जहां पर पूरे शहर की गंदगी जमा होती है। गरीबों के बच्चे इनके इर्द-गिर्द बनी झुग्गी-झोपड़ियों में अपने गरीब मां-बाप के साथ रहते हैं। यह भी जान लें कि कचरे के पहाड़ों के आसपास सक्षम लोग जाना ही नहीं चाहते। यहां से उठने वाली दुर्गंध की वजह से सांस ले पाना मुश्किल होता है। लेकिन फिर भी छोटे-छोटे मासूम बच्चे अपने काम का कचरा तलाशते देखे जा सकते हैं। इस कचरे में प्लास्टिक की खाली बोतलें, घरों का बेकार सामान, अस्पतालों के द्वारा फेंके गए दास्तानें, इंजेक्शन, फटे पुराने कपड़े, पेन-पेंसिल और किताब, कॉपियां, तौलिए के साथ-साथ कंडोम जैसी बेकार की बहुत सी चीजें होती हैं। गरीब बच्चों की खोजी निगाहें यहां से वो सामान तलाश ही लेती हैं, जिन्हें कबाड़ी चंद सिक्कों में खरीद लेते हैं। बरसात में तो डंपिंग यार्ड में पानी जमा हो जाता है, जिससे मच्छरों की वजह से डेंगू, मलेरिया जैसे जानलेवा बीमारियों का खतरा होता है। लेकिन गरीबों के बच्चे इसकी परवाह नहीं करते। उनके लिए घर-परिवार तथा खुद के पेट की आग को शांत करने के लिए यही आसान रास्ता है। 

विख्यात कवयित्री अनामिका की कविता की यह पंक्तियां बरबस याद हो आती है :

 ‘‘उन्हें हमेशा जल्दी रहती है,

उनके पेट में चूहे कूदते हैं

और खून में दौड़ती है गिलहरी!

बड़े-बड़े डग भरते

चलते हैं वो तो

उनका ढीला-ढाला कुर्ता 

तन जाता है फूल जाता है उनके पीछे

जैसे कि हो पाल कश्ती का!

बोरियों में टनन-टनन गाती हुई

रम की बोतलें

उनकी झुकी पीठ रीढ़ से

कभी-कभी कहती है, 

कैसी हो? कैसा है मंडी का हाल?’’

नाबालिगों को चोरी-चक्कारी, हेराफेरी के साथ-साथ और भी कई गंभीर अपराध करने के बाद पुलिस पकड़ में आते देखना तो अब आम हो गया है। हाल के वर्षों के दौरान जिस तरह से नाबालिगों ने बलात्कार और हत्या के आरोप में पकड़े जाने पर मीडिया की सुर्खियां बटोरते हुए मां-बाप को भी कलंकित किया है। उस पर जितना भी लिखा जाए, कम है। 

हिंदुस्तान का कानून दहाड़-दहाड़ कर कहता है कि बाल मजदूरी अपराध है। लेकिन कई पटाखों, बारुद की फ्रैक्ट्रियों, ईंटभट्टों, शराब कारखानों तथा मंत्रियों-संत्रियों के आलीशान घरों में छोटे-छोटे बच्चे आपको खून पसीना बहाते दिखाई दे जाएंगे। फिल्मों, टीवी तथा विज्ञापनों में बाल कलाकारों से जबरन अभिनय कराकर उनके शोषण के सच से जागरूक भारतीय खूब-खूब वाकिफ हैं। मेरे देखने में तो यह भी आया है कि महाराष्ट्र और विदर्भ के कई धनाढय परिवार खास तौर पर छत्तीसगढ़, बिहार और मध्यप्रदेश की कम उम्र की लड़कियों को मोटी पगार का प्रलोभन देकर अपने घरों पर बर्तन, झाड़ू और विभिन्न कार्यों को कराने के लिए लाते हैं और मनमाने तरीके से काम करवाते हैं। उनसे काम करवाने की कोई समय सीमा निर्धारित नहीं होती। इन्हें पढ़ा लिखाकर शिक्षित बनाने तथा बेहतरीन पगार देने का लालच देकर लाया जाता है। मां-बाप भी बहुत आसानी से झांसे में आ जाते हैं। लेकिन अधिकांश मालिक दो-चार महीने में ही गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए दुष्टता उतर आते हैं। उन्हें आराम करने का समय ही नहीं दिया जाता। बस काम ही काम। कैदी की तरह जीने को विवश कर दी गई बच्चियों पर बलात्कार किये जाने की खबरें उनकी नीचता का पर्दाफाश करती रहती हैं। बाल श्रमिकों की तस्करी की खबरें भी किसी से छिपी नहीं हैं। जिला बाल कल्याण विभाग एवं संरक्षण विभाग तथा पुलिस को समय-समय पर छापेमारी कर बाल श्रमिकों को मुक्त कराने के लिए कितने-कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं। बच्चों से बड़ी बेशर्मी के साथ मेहनत, मजदूरी कराने वाले दबंग किस्म के शहरी छाती तान कर खड़े हो जाते हैं कि यह बच्चे अपने परिवार की सहमति से काम करते हुए अपने असहाय माता-पिता की सहायता कर रहे हैं। इस पर किसी को भी आपत्ति दर्शाने का कोई अधिकार नहीं। ऐसा भी देखने में आता है कि कम उम्र के घरेलू नौकरों को अपना रिश्तेदार बताकर बाल कल्याण विभाग की आंखों में धूल भी झोंकी जाती है। असहाय, लावारिस बच्चों की देखरेख और सुरक्षा को लेकर सरकारी कोशिशें की तो जाती हैं  लेकिन हकीकत हमारे सामने है। हर बच्चे के हाथ में किताबें हों, खिलौने हों, वे स्वस्थ रहें उन्हें कोई बीमारी न घेरे, इसी सोच और संदेश को प्रचारित और बलवति करने के लिए हर वर्ष 13 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया तो जाता है, लेकिन शासकीय और प्रशासकीय आधे-अधूरे प्रयास प्रशंसा के तो कतई काबिल नहीं। उलटे हमारे समाज में ही कुछ ऐसे लोग हैं, जिनसे छोटे-छोटे बच्चों की दुर्दशा देखी नहीं जाती। उनकी पहल शासन और प्रशासन को मात देती नज़र आती है। यहां मैं 31 वर्षीय रिक्की राज का खास तौर पर उल्लेख करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूं। रिक्की अपनी परोपकारी संस्था ‘छोटू फाउंडेशन’ के माध्यम से शोषण, अनिश्चितता, गरीबी और भूख की अथाह मार झेलते बच्चों के जीवन को नई दिशा देकर सुधार रहे हैं। हवा-हवाई भाषणबाजी करने वाले नेताओं को आईना दिखाते रिक्की राज के ‘छोटू फाउंडेशन’ के द्वारा अभी तक पांच हजार से अधिक बच्चों के जीवन को संवारते हुए समाज की मुख्य धारा में लाया जा चुका है। अभावग्रस्त आधा-अधूरा बचपन जीते बच्चों के कल्याण का विचार रिक्की के मन में आखिर कैसे आया? वर्ष 2017 में वह उत्तरप्रदेश के आगरा हाईवे से गुजर रहे थे। तभी कुल्फी बेचते एक बच्चे पर उनकी नजर पड़ी। वह कुल्फी बेचने में इस कदर खोया था कि एक तेज रफ्तार बस उसे कुलचते हुए आगे निकल गई। बच्चा सड़क पर लहुलूहान होकर कराहता रहा। किसी ने उसको उठाकर अस्पताल ले जाने की पहल नहीं की। सभी एक-दूसरे का मुंह देखते रहे और बच्चा अंतत: मर गया। आंखों देखे इस दर्दनाक हादसे ने रिक्की की सोच ही बदल दी। वहीं खड़े-खड़े उन्होंने निर्णय ले लिया कि लाचार बच्चों के लिए कुछ सार्थक करना है। 2018 में छोटू फाउंडेशन की स्थापना कर रिक्की ने खुद को असहाय बच्चों के लिए पूरी तरह से समर्पित कर दिया। उन्होंने बताया कि, मैंने विभिन्न अभावग्रस्त क्षेत्रों में घूम-घूमकर सर्वे करते हुए पाया कि  कूड़ा बीनने वाले बच्चों को अमूमन नशे की लत लग जाती है। इसकी वजह से अधिकांश तीस से चालीस वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते मौत का निवाला बन जाते हैं। यह नशे की लत और गरीबी ही है, जो बच्चों को गलत राह पर ले जाकर अपराधी बना रही है। ‘छोटू की पाठशाला’ में बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के साथ-साथ सेहतमंद रखने के दायित्व को भी प्राथमिकता दी जाती है। उन्हें पौष्टिक आहार दिया जाता है। स्वास्थ्य की नियमित जांच की जाती है। उनके कौशल विकास पर भरपूर जोर दिया जाता है। उन पर हमेशा नजर रखी जाती है कि कहीं वे फिर से गलत राह के राही न बन जाएं। छोटू फाउंडेशन के कर्ताधर्ता रिक्की राज की सजगता और ईमानदारी को देखते हुए अनेकों परीचित, दोस्त और रिश्तेदार भी उनकी मदद करने के लिए आगे आने लगे हैं। इसमें अधिकतम मदद तो सोशल मीडिया के जरिए क्राउड फंडिंग से मिलती चली आ रही है। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद से शुरू हुआ ‘छोटू फाउंडेशन’ अब नोएडा, ग्रेटर नोएडा के अलावा बिहार और राजस्थान में भी जोर-शोर से सक्रिय है। हमारे देश के हुक्मरान 2047 तक पूर्णतया विकसित भारत का सपना दिखा रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि भारत विश्वगुरू बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। जहां-तहां गगनचुंबी इमारतें, मेट्रो, एक्सप्रेस-वे और अरबो-खरबों का निवेश किया जा रहा है। लेकिन इन बच्चों की किसी को कहीं कोई चिंता नहीं! किसी भी जागरूक भारतीय से यदि सार्थक विकास की परिभाषा पूछें तो वह यही कहेगा कि जब तक देश का हर छोटा-बड़ा नागरिक सुरक्षित और सम्मानित नहीं, तब तक ऐसा विकास आधा-अधूरा है। असली विकास तो तभी होगा, जब इस देश के बचपन को बदहाली से छुटाकारा मिलेगा। हर छोटे-बड़े नागरिक की सेहत और जेब मजबूत होगी। उसे किसी का मुंह नहीं ताकना पड़ेगा।

Thursday, July 2, 2026

छल, कपट, बेवफाई की खाई

 झारखंड के बोकारो जिले में एक सत्रह वर्षीय लड़की फिल्मी अंदाज में 100 फुट ऊंचे मोबाइल टॉवर पर चढ़ गई। लड़की की जिद थी कि वह तब तक नीचे नहीं उतरेगी, जब तक उसके प्रेमी को जेल से रिहा नहीं किया जायेगा। लड़की का रांची के एक युवक से प्रेम प्रसंग चल रहा था। वह उसी से शादी करना चाहती थी, लेकिन उसके मां-बाप तैयार नहीं थे। उन्होंने उसके प्रेमी के खिलाफ अपहरण की झूठी शिकायत दर्ज करवा दी। कर्तव्यपरायण भारतीय पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी कर लिया। अदालत ने प्रेमी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया। प्रेमिका को यह नाइंसाफी बर्दाश्त नहीं हुई और उसने प्रेमी को छुड़वाने के लिए मोबाइल टॉवर का सहारा लिया। कई घंटों तक वह इस मांग के साथ वहीं डटी रही।  एहतियातन टॉवर के चारों ओर नेट बिछाया गया। सभी चिंतित और भयभीत थे कि वह कहीं कूदकर अपनी जान न दे दे। उसे मनाने, समझाने और नीचे लाने में पुलिस को कई घंटे लग गए। छत्तीसगढ़ के शहर जांजगीर में विवाह समारोह के दौरान दूल्हे को नशे में धुत देखकर दुल्हन ने शादी करने से सरासर इंकार कर दिया। मुस्कान नामक इस लड़की ने सगाई के समय भी लड़के को जब नशे में टुन्न देखा था तब उसका माथा घूम गया था। तब उसने उसे जीभर कर डांटा-फटकारा था। लड़के के कान पकड़ने पर ही वह शादी के लिए मानी थी। लेकिन जब उसने गौर किया विवाह की रस्मों के दौरान वह ठीक से खड़ा नहीं हो पा रहा है। नशे में बहकी-बहकी बातें कर रहा है तो उसने नशेड़ी के साथ सात फेरे लेने से स्पष्ट मना कर दिया। मुस्कान के इस साहसिक निर्णय का सभी ने स्वागत किया। जिला पुलिस अधीक्षक तथा विभिन्न समाजसेवकों की उपस्थिति में उसे पुरस्कृत और सम्मानित किया गया। वो जमाना बहुत पीछे छूट चुका, जब कोई भावुक कवि नारी को अबला बताता था तो पाठक कवि की नारी के प्रति सहानुभूति में रची-बसी सोच की सराहना करते थे। उसे नारी का हितकारी घोषित कर हार, गुलदस्तों और शालों से सम्मानित करते थे। आज नारी, पुरुषों को कड़ी टक्कर देते हुए नया इतिहास लिखने, रचने की ओर तेजी से अग्रसर है। शिक्षा, खेलकूद, ज्ञान-विज्ञान, समाज सेवा, राजनीति आदि तमाम क्षेत्रों में झंडे गाड़ती नारियों की  प्रेरक उपलब्धियों की प्रभावी खबरें हर सजग भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर देती हैं।

ऐसा कोई भी देशवासी नहीं जो नारी को शिखर पर देखना नहीं चाहता हो। लेकिन बीते कुछ वर्षों से कुछ नारियों के द्वारा संगीन अपराध करने के मामले में पुरुषों की बराबरी करने की खबरों ने चिंतकों को गहन चिंता में डाल दिया है। क्रिमिनल लड़की है या लड़का इसमें किसी का पक्ष लेने और सहानुभूति दर्शाने की कोई गुंजाइश नहीं है। बेवफाई तो अपनी जगह है लेकिन कुंआरी और शादीशुदा युवतियां जिस तरह से नृशंस हत्याएं करते हुए मीडिया में छा रही हैं, उससे यह सवाल तो सताता ही है कि क्या उन्हें कानून का भय और जानकारी नहीं? जेलों में जिस तरह से महिलाओं की संख्या बढ़ रही है उससे तो यही लगता है कि अपराध करने को आतुर नारियों ने अवैध रिश्तों तथा भोग विलास को ही अपने जीवन का असली मकसद मान लिया है। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि माता-पिता पर क्या गुजरती है और समाज कैसे-कैसे उनके छल, कपट और गिरेपन पर थूकता है। अपने करीब देखने के लायक ही नहीं समझता। एक हकीकत यह भी है कि बिगड़ी और भटकी शहजादियां इस भरोसे और भ्रम में संगीन अपराधी बन रही हैं कि उनके रईस मां-बाप किसी न किसी तरह से उन्हें बचा ही लेंगे। पैसे से तो सब कुछ खरीदा जा सकता है। यहां तक कि शासन और प्रशासन की बागड़ोर संभाले ऊंचे लोगों का ईमान धर्म भी। उनके लिए यह भी बचकानी सोच है कि सच्चा प्यार ईश्वर की पूजा है। स्वार्थ और बेवफाई का अंजाम कभी भी सुखद नहीं होता। अपने आशिक के लिए पति और मंगेतर को मौत के घाट उतार देने की क्रूर घटनाएं रिश्तों को ही कलंकित नहीं करतीं, मानवता को भी झकझोर देती हैं। 

बीते हफ्ते महाराष्ट्र के पुणे में एक लड़की ने अपने होनेवाले पति को प्रेमी के साथ मिलकर मौत के घाट उतार दिया। इतना ही नहीं उसने नृशंस हत्या को एक हादसे का रूप देने की खौफनाक साजिश रचते हुए प्यार में अंधी, बेवफा युवतियों और पत्नियों की अपराध कुख्यात चर्चित। डायरी के पन्ने खोल दिए। जिनका खबरों से अटूट नाता है, उनके लिए तो राजा रघुवंशी हत्याकांड को भूला पाना बहुत मुश्किल है। हनीमून पर ही खून की होली की कल्पना कौन कर सकता है? इंदौर की पच्चीस वर्षीय सोनम की 11 मई 2025 को राजा रघुवंशी से बड़ी धूमधाम से शादी हुई थी। शादी के एक महीने के बाद दोनों हनीमून के लिए शिलांग जा पहुंचे। सोनम ने राजा रघुवंशी से ब्याह तो कर लिया था, लेकिन उसका पूर्व प्रेमी राज कुशवाह अभी भी उसके तन-मन में बसा था। सात फेरे लेने के पश्चात भी वह रघुवंशी को अपना पति स्वीकार नहीं कर पायी थी। प्रेमी के प्यार में अंधी हुई सोनम के लिए हनीमून तो महज दिखावा था। उसने पहले से ही अपने पति को यमलोक पहुंचाने की योजना बना ली थी। इस षडयंत्र में साथी था प्रेमी राज कुशवाह। दोनों ने मिलकर योजना बनाई। तीन कॉन्ट्रेक्ट किलर को अच्छी-खासी फीस देकर शिलांग बुलवाया और हनीमून के दौरान पति राजा रघुवंशी की धारधार हथियारों से हत्या करवाने के पश्चात गहरी खाई में फेंक दिया। उसके पश्चात सोनम ने पुलिस के समक्ष लूटपाट का नाटक किया। इतना ही नहीं खुद के बेहोश होने की झूठी कहानी भी गढ़ी। राजा के शरीर पर हथियारों की मार के गहरे घाव थे, जबकि सोनम को नाममात्र की खरोंच तक नहीं आई थी। सलाखों के पीछे पहुंचने के पश्चात सोनम के पास पछतावे के सिवा और कोई चारा नहीं था।

मध्यप्रदेश के धार जिले में 2026 के अप्रैल महीने में 28 वर्षीय पुरोहित देवकृष्ण की उसके घर में ही हत्या कर दी गई। यहां भी हत्यारी थी उसकी पत्नी प्रियंका, जिसने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति को इसलिए  मार डाला, क्योंकि उसके शरीर का रंग काला था और उसके अनुसार उसके लायक भी नहीं था। हत्या के बाद प्रियंका ने पुलिस को बताया कि लुटेरों ने घर में घुसकर लूटपाट की और मेरे जीवनसाथी का खात्मा कर दिया। लेकिन सच्चाई सामने आने में ज्यादा समय नहीं लगा। रिश्तेदारों तथा जान पहचान के लोगों से पता चला कि हत्यारी अपने पति को काला-कलूटा और नाकाबिल कहकर  अपमानित करती रहती थी। वर्ष 2017 में तेलंगाना में स्वाति नामक महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पति को बेहोशी का इंजेक्शन देकर मार डाला। इतना ही नहीं उसका नामो निशान खत्म करने के लिए शव को जंगल में जला दिया। बात यहीं खत्म नहीं हुई। बिल्कुल फिल्मी तौर-तरीके के साथ उसने अपने प्रेमी के चेहरे पर एसिड डाला और ससुराल वालों को बताया कि अज्ञात लोगों ने उसके पति सुधाकर पर एसिड अटैक किया है। दरअसल, हत्यारी पत्नी अपने प्रेमी राजेश की प्लास्टिक सर्जरी करवाकर उसे हमेशा-हमेशा के लिए पति सुधाकर की पहचान देने की तैयारी में थी। लेकिन अस्पताल में जब नकली सुधाकर (राजेश) को मटन सूप परोसा गया तो उसने लेने से इसलिए मना कर दिया, क्योंकि वह शुद्ध शाकाहारी था, जबकि सुधाकर (पति) मांसाहारी था। इसी वजह से ससुरालवालों को शक हुआ और हैरतअंगेज और खौफनाक साजिश का पर्दाफाश हो गया। बिरयानी में नींद की गोलियां डालकर पति का हमेशा-हमेशा के लिए अंत, कत्ल करने के बाद नीले और पीले ड्रम में पति की लाश छिपाने दबाने की खबरों को भी भूला पाना आसान तो नहीं। यह खौफनाक हिंसक सिलसिला कब और कहां जाकर थमेगा, इसका उत्तर फिलहाल नदारद है। 

18 जून 2026 के दिन रियल एस्टेट कंपनी के मालिक केतन अग्रवाल को उसकी मंगेतर सिया गोयल ने पुणे के निकट स्थित विख्यात लोहगढ़ किले  की पहाड़ियों पर भ्रमण के बहाने से ले जाकर खाई में धकेलकर जो दर्दनाक मौत दी उससे उसने भी कुख्यात हत्यारियोेंं में अपना नाम शामिल करवा लिया। इस शातिर लड़की का अखबारों तथा सोशल मीडिया से कुछ न कुछ तो वास्ता रहा होगा, जिनमें वासना में अंधी हुई बेवफा, बेवकूफ नारियों की खबरे सुर्खियां बन सभी को सावधान करती रहती हैं। फिर भी उसने अंधापन नहीं छोड़ा! बीस वर्षीय सिया की भले ही केतन से बड़ी धूमधाम से सगाई हो चुकी थी लेकिन अभी भी उसने अपने प्रेमी चेतन चौधरी से मिलना-जुलना नहीं छोड़ा था। सिया को अपना प्रेमी, अपने मंगेतर से कहीं ज्यादा भाता था। सांवले रंग के केतन के बाल झड़ चुके थे और वह विग लगाता था। बोलते समय हकलाता भी था, जो सिया को नापसंद था। वह मंगेतर केतन से हमेशा-हमेशा के लिए छुटकारा पाना चाहती थी। इसलिए उसने अपने प्रेमी के साथ मिलकर केतन के खात्मे की साजिश रची और घूमने के बहाने लोहगढ़ किले पर ले गई। उसके पीछे-पीछे प्रेमी चेतन भी जा पहुंचा और मौका मिलते ही दोनों ने केतन को 400 फीट गहरी खाई में धक्का देकर अंधा विश्वास करने की दर्दनाक सौगात दे दी। केतन सिया से बेइंतहा प्यार करता था। इश्क के नशे में वह इतना अंधा हो चुका था कि वह उसकी साजिशों को नजरअंदाज करता गया। विवाह तो अभी होने को था, लेकिन सिया ने शॉपिंग के नाम पर उससे 1 करोड़ रुपए झटक कर अपने प्रेमी चेतन को सौंप दिए, ताकि वह अपनी हैसियत सुधार सके। दोनों ने तीन साल बाद शादी करने की योजना बना रखी थी। उससे पहले दोनों चेतन से अधिक से अधिक धन ऐंठने में लगे थे। दोनों पार्टी बाजी और नशे के शौकीन थे। पुलिस लॉकअप में भी सिया ने बीयर की मांग की। केतन अग्रवाल की मौत के बाद हत्यारी सिया के माता-पिता को भी गहरा सदमा लगा। उसके पिता को तो हार्टअटैक आ गया और अस्पताल में भर्ती किया गया। बीमार पिता ने यह भी कहा कि ‘बेटी को फांसी दे दी जाए। मुझे कोई गम नहीं होगा। अपने जवान बेटे को खोने वाले पिता को फूट-फूटकर रोते देख सभी की आंखें भर आईं। हर कोई यही कहता नजर आया कि धोखेबाज कपटी, फरेबी सिया को भरे चौराहे पर फांसी दे दी जानी चाहिए। वह अब इस दुनिया में रहने लायक नहीं हैं...

Thursday, June 25, 2026

जागो मोहन प्यारे...

 ‘‘वो 11 जून की रात थी। पति भी साथ थे। मैं शौचालय गई थी। तभी धड़धड़ाते हुए पांच गुंडे वहां आ पहुंचे। मेरे पति को बाहर से बंद कर उन्होंने मुझे कसकर दबोच लिया। मैं हतप्रभ थी। यह क्या हो रहा है? मुझे अंधेरे में खींचकर ले जाया गया। मेरी साड़ी खोली और मुंह बंद कर दिया। एक ने मेरे ब्लाउज को तार-तार कर मेरे हाथ बांध दिए। इस दौरान मैं पति को आवाज लगाती रही। आसपास का कोई तो सुन ले इसी उम्मीद में छोड़ देने की फरियाद के साथ चीखती-चिल्लाती रही। मेरा मुंह बंद करने के लिए उन बदमाशों ने शरीर पर ब्लेड से चीरफाड़ और अंधाधुंध मारपीट जारी रखी। मेरी छाती और जांघ खून से लथपथ होती रही और मैं बेहोश हो गई। पांचों ने बारी-बारी से मुझ पर बलात्कार किया और मुंह न खोलने की धमकी देकर बड़े आराम से चलते बने। दरवाजा बंद होने के कारण मेरे पति अभी तक अंदर थे। मैंने अपनी देवरानी को फोन किया तो उसके आने के बाद पति को बाहर निकाला गया। मेरी शारीरिक दुर्दशा देखकर उनकी तो जान ही निकल गई। वह दहाड़-दहाड़ कर रोते रहे। तब तक कुछ लोग भी वहां पर आ गये थे। मेरे दु:ख से अवगत होनेे से ज्यादा उन पर वीडियो बनाने की धुन सवार थी। मैं एक कदम भी चलने में असमर्थ थी। किसी तरह से मुझे सदर अस्पताल ले जाया गया। जांच के दौरान मेरे गुप्तांग से बंदूक की गोली, पत्थर, लकड़ी और कंकड़ निकाले गए जिन्हें दुष्कर्म के दौरान मेरे गुप्तांग में डाला गया था।’’ डॉक्टर और खाकी वर्दी वाले भी महिला के साथ हुई इस घोर अक्षम्य दरिंदगी को लेकर चिंतित और अत्यंत परेशान हैं। नारी पर इतना जुल्म तो अकल्पनीय है, लेकिन जो मंजर सामने हैं वो तो सोचने-समझने वाले इंसानों को चिंता और सवालों के घने जंगल में छोड़ रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के एक शहर में तुलसी के गमले के पास रील बनाने को लेकर पहले तो विवाद हुआ फिर जंग छिड़ गई। एक परिवार के बच्चे पड़ोसी के घर के बाहर रखे पवित्र तुलसी के पौधे के गमले के पास रील बना रहे थे। इसी दौरान गमले को हल्का धक्का लग गया। यह कोई बहुत बड़ी घटना नहीं थी, लेकिन कुछ लोगों ने इसे धार्मिक आस्था से जुड़ा मुद्दा बताते हुए उत्तेजक अफवाहें फैला दीं। उसके बाद देखते ही देखते आपसी विवाद कुछ ऐसा बढ़ा कि एक-दूसरे के बीच मारपीट शुरू हो गई। दो महिलाओं के सिर पर अंधाधुंध वार किये जाने से हरे-भरे गमले के आसपास की जमीन लाल हो गई और पूरी कॉलोनी में जबरदस्त तनाव का माहौल बन गया। कुछ अति उत्साही लोगों ने बीच-बचाव करने की बजाय वीडियो बनाना जरूरी समझा। उनके बनाये वीडियो के वायरल होने के पश्चात गली-मोहल्ले के विवाद ने पूरे शहर को अपने लपेटे में लेते-लेते अत्यंत उग्र रूप धारण कर लिया। पुलिस ने बेकाबू होती स्थिति को नियंत्रित कर संभाल लिया। विघ्न संतोषी तो पूरे शहर में आग लगाकर अपने हाथ सेंकने की तैयारी में थे। 

विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया पर उकसाऊ आधी-अधूरी जानकारी तेजी से फैलने के कारण लोगों में जो तनाव फैलता है वही उन्हें अराजक और हिंसक भी बनाता है। वैसे भी आज के दौर में अधिकांश लोग मानसिक अशांति की गिरफ्त में हैं। नारंगी शहर नागपुर में एक चिकित्सक अस्पताल में मृत पाये गए। कुछ दिनों से पारिवारिक कलह की वजह से मानसिक तनाव से गुजर रहे डॉक्टर साहब ने स्वयं को अत्याधिक मात्रा में एनेस्थीसिया दवा का इंजेक्शन लगा कर मौत के हवाले कर दिया। जिन पर दूसरों को बचाने की जिम्मेदारी है उनकी गैर जिम्मेदारी पर क्या कहें? राजधानी दिल्ली के पचास वर्षीय डॉक्टर मनीष गुप्ता ने अपने घर में काम करने वाली औरत को क्रिकेट बैट और चाकू से अंधाधुंध धुनाई कर मौत के घाट उतार दिया। पुलिस को जब खबर लगी तो वह फौरन उसके घर पहुंची। वह सिर पर हाथ धरे साढ़ियों पर बैठा मिला। खून से सना बैट और चाकू उसकी दरिंदगी की गवाही दे रहे थे। उसने बिना कोई विरोध किये कहा, ‘‘मुझे फांसी दे दो।’’ अपनी नौकरानी की नृशंस हत्या की उसने जो वजह बतायी वह भी बेहद चौंकाने वाली है। उसका कहना था कि,  वह जादूगर थी, काला जादू करती थी। उसके घर में पैर रखते ही नकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता था। इससे मेरे बेटे की पढ़ाई भी बाधित होती थी। 

कुछ महीने पूर्व इस अंधविश्वासी डॉक्टर ने नौकरानी को मोबाइल पर किसी से जादू टोने की बात करते सुना था। वह पंद्रह साल से डॉक्टर के यहां काम कर रही थी। डॉक्टर की मेडिकल हिस्ट्री से पता चला है कि वह तनावग्रस्त रहता था, उसे खुखरी रखने का भी शौक था। इस बात को लेकर भी वह गुस्से में रहता था कि नौकरानी उसकी पत्नी की ज्यादा सुनती थी और उसकी अवहेलना करती थी। डिप्रेशन में गुजर रहे त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉक्टर मनीष गुप्ता को यकीन हो चला था कि घर में चल रही अशांति की वजह भी यही नौकरानी ही है। मनीष की पत्नी भी डॉक्टर है। उनका इकलौता बेटा भी मानसिक रूप से कमजोर है।

छत्तीसगढ़ के सूरजपुर में स्थित थाने में एक महिला ने शिकायत दर्ज करवाई है कि उसका पति चौबीस घंटे उसके चरित्र पर शक करता है। मैं किसी से बात करूं तो पूछा-पाछी करते हुए तरह-तरह के लांछन लगाने लगता है। फल-फू्रट और सब्जी के ठेले वाले से ज्यादा देर तक बात करूं तो उसका पारा चढ़ जाता है। जान-पहचान वाले से भी यदि हंस कर बोलती हूं तो पिटायी करने पर उतर आता है। कुछ दिन पहले तो वह संदेह की आग में ऐसा झुलसा कि मेरे सिर के बाल काट कर मुंडन कर दिया। इतने में जब उसका मन नहीं माना तो मेरे पूरे जिस्म पर इंजन ऑयल और कालिख पोत दी। इससे उसे खुशी और संतुष्टि मिली लेकिन मेरा तो मानसिक संतुलन ही बिगड़ गया। मैं ही जानती हूं कि मुझे पल-पल कैसी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है। कू्ररता की तमाम हदें पार कर देने वाले इस हिंसक पति ने अपनी नीचता को प्रदर्शित करने वाला वीडियो भी बनाया, जिसे सोशल मीडिया पर वायरल कर अपनी मर्दांनगी का गुणगान किया।

हिंसा, शंका, बलात्कार, जादूटोना और खून-खराबा। यह वो शब्द हैं जो सभ्य और संस्कारी लोगों की जुबान और आचरण में शोभा नहीं देते। लेकिन जब कुछ लोगों के दिल-दिमाग में यह दाग-धब्बे गहरे तक रच-बस चुके हों तो उनका इलाज होना भी जरूरी है। इस अजब-गजब काल में खुदकुशी के वीडियो और रील्स बन रही हैं और खूब वायरल हो रही हैं। फूहड़ कॉमेडी को सराहा जा रहा है। संगीन अपराधी अपराधबोध से ग्रस्त हो शर्मिंदा होने की बजाय वीडियो और रील्स बनाकर अपने कुकर्मों के यशोगान में लगे हैं! माना कि आज लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया सरल और सहज माध्यम है। इस आधुनिक मंच पर मिलने वाले लाइक्स, व्यूज और फॉलोअर्स की मायावी भीड़ बैठे-बिठाए छाती को चौड़ा कर देती है। यह भी सच है कि सोशल मीडिया पर सार्थक जानकारियां पहुंचाने वालों को तारीफों के गुलदस्ते मिलना प्रेरणा के दीप जलाता है। लेकिन यहीं पर नकारात्मकता, बेहूदगी, अस्थिरता और क्रूरता जैसे शर्मनाक प्रवृत्तियों के ढोल पीटने वालों की पीठ भी थपथपायी जा रही है। अपने धर्म और समुदाय को महान और दूसरे को नीचा दर्शाने वाले धूर्त खलनायक खुद को ‘नायक’ मानने लगे हैं। मनोरंजन के नाम पर धार्मिक उन्माद फैलाया जा रहा है। कुछ लुच्चे- टुच्चे लस्त-पस्त भोगी पत्रकार और वरिष्ठ सफेदपोश संपादक जनाधार विहीन विपक्षी नेताओं तथा विरोधी दलों के लिफाफों पर ही जिन्दा हैं। राजनेताओं, मंत्रियों और महिलाओं पर अभद्रतम टिप्पणियां करने वाले शैतान कामेडियन और कलमकार जब भारत के निष्कलंक कर्मवीर प्रधानमंत्री के बारे में ओछी और अनर्गल बातें बोलते और लिखते है तो देशप्रेमियों का खून खौल जाता है। असहाय औरतों के बलात्कारी गैंगरेप के वीडियो सोशल मीडिया पर डालने से पहले अपनी मां, बहनों, बहू, बेटियों के बारे में विचार क्यों नहीं करते? याद रहे कि जैसे को तैसा मिलने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। चरित्र और नैतिकता विहीन लोगों की अंधी भीड़ में जब अच्छे-भले चेहरे शामिल हो जाएं तो दु:ख और शर्मिंदगी के साथ-साथ गुस्सा भी आता है। इसलिए बहुत सोच-समझकर लाइक्स और साझा करने की दौड़ में शामिल हुआ जाए...तो इसी में सभी की आन-बान और शान बनी रहने वाली है...


Thursday, June 18, 2026

नादान नहीं नारी

 अधिकांश नारियां शराब और शराबियों को नापसंद करती हैं। जिन घरों में पुरुष अत्याधिक शराब पीते हैं अनियंत्रित होकर कलह क्लेश करते हैं, बच्चों को मारते-पीटते हैं वहां के शोर-शराबे की आवाज बहुत दूर तक पहुंचती है। नशा कोई भी हो बरबादी का सबब बनता है। कई अच्छे-भले घर-परिवार इसकी वजह से टूटते देखे गये हैं। नशे के खिलाफ औरतें अपने-अपने तरीके से जंग लड़ती हैं। शहरों, गांवों में शराब आसानी से मिल जाती है। कॉलेजों, स्कूलों और धार्मिक स्थलों के आसपास शराब की दुकानें तथा बीयर बार खुल जाते हैं। शासन और प्रशासन की लापरवाही और बेवकूफी का दंड बच्चों तथा महिलाओं को भोगना पड़ता है। सोचिए, उन महिलाओं पर क्या बीतती है जिन्हें अंधेरे में रखकर शराबियों से ब्याह दिया जाता है। जिनके पति अवैध शराब के धंधे में लिप्त होते हैं। सभी पत्नियां विरोध के स्वर बुलंद नहीं करतीं। चुपचाप नर्क भोगती रहती हैं। लेकिन अब जमाना बदल गया है। नारी जानती है कि यदि वह चाहे तो कुछ भी कर सकती है। 

हरियाणा के फतेहाबाद में कुछ महिलाओं को शादी के बाद पता चला कि उनके पति और उनके संपूर्ण ससुराल वाले नशे के धंधे में लिप्त हैं। उन्होंने पहले तो उनसे सही राह अपनाने का अनुरोध किया, लेकिन जब बात नहीं बनी तो उन्होंने घर ही छोड़ दिया। महिलाओं का कहना है कि वे मेहनत-मजदूरी कर घर चलाने की पक्षधर हैं। गरीबी से मुक्ति पाने के लिए नशा बेचने के कारोबार में सहभागी बन अपराधी नहीं बनना चाहती। रजनी नामक महिला ने बताया कि शादी से पहले उसे पता नहीं था कि उसका पति अवैध शराब बेचता है। इस चक्कर में कई बार जेल भी जा चुका है। उसने अपने पति से सुधरने की विनती की, लेकिन वह तो ईमानदारी से मेहनत कर कमाने और परिवार चलाने की बजाय अपराध करने का अभ्यस्त हो चुका था। वह उलटे उसे मारने-पीटने पर उतारू हो गया तो उसने पति और ससुराल वालों से हमेशा-हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ लिया। अनामिका की शादी को करीब सात-आठ महीने ही हुए थे। उसने देखा और जाना कि, पति अखंड शराबी है। उसका किसी और औरत से याराना है और दोनों मिलकर नशे का कारोबार करते हैं तो उसे बहुत तकलीफ हुई। अपने मां-बाप पर भी गुस्सा आया, जिन्होंने रिश्ता तय करने से पहले आंखें बंद रखीं और उसका भविष्य अंधकारमय कर दिया। पति ने उस पर दबाव बनाना प्रारंभ कर दिया कि वह भी नशे के कारोबार में शामिल हो जाए। इससे इफरात कमाई होगी और जिन्दगी बड़े मज़े से कटेगी, लेकिन उसने एकदम मना कर दिया। घर भी छोड़ दिया। अब पति से अलग रहती है। तलाक का मामला कोर्ट में चल रहा है। 

विदर्भ के चंद्रपुर जिले की सजग महिलाओं के दबाव के चलते भाजपा के जुझारू नेता ने शराबबंदी के आश्वासन को पूरा करने की पहल करते हुए शराबबंदी लागू करवा दी थी। लेकिन बाद में जैसे ही कांग्रेस की सरकार बनी तो शराब की दुकानें धड़ाधड़ खुल गईं। कांग्रेस के भ्रष्टाचारी बिकाऊ मंत्री का बयान आया कि जिले के अधिकतम लोग शराबबंदी के पक्ष में नहीं हैं। शराब के शौकीन पुरुष यही तो चाहते थे। मंत्री के लिए महिलाओं की कोई अहमियत नहीं थी। दरअसल उसे साम, दाम, दंड भेद से चुनाव जीतना आता है। जनहित के उसके लिए कोई मायने नहीं। 

शराब ने न जाने कितने हंसते-खेलते परिवार तबाह किये हैं। एक आदमी की नशे की लत पूरे परिवार का सुख-चैन छीन लेती है। असंख्य महिलाओं को न चाहते हुए भी शराबी पतियों के साथ रो-रोकर जिन्दगी काटनी पड़ती है। नई दिल्ली की रहने वाली एक महिला ने शराबी पति से छुटकारा पाने के लिए जहर देकर उसे मार डाला। महिला का पति एक फाइनेंस कंपनी में मैनेजर था। वह रात को नशे में टुन्न होकर घर आता और उससे लड़ाई-झगड़ा करता। पड़ोसी भी तमाशा देखते और तरह-तरह की बातें करते थे। पति को सुधारने के लिए उसने कई उपाय किए, लेकिन बात नहीं बनी। वह पुलिस थाने भी गई, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। किसी के बताने पर एक तांत्रिक के पास गई जो नशेड़ियों का इलाज करने में सिद्धहस्त माना जाता था। तांत्रिक के तंत्र-मंत्र के बाद भी जब पति की पीने की आदत नहीं छूटी तो उसने तांत्रिक को ही कोसना शुरू कर दिया। शातिर तांत्रिक ने महिला को नशेडी पति से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ति पाने के लिए जहर पिलाकर खत्म करने की सलाह दी तो वह फौरन तैयार हो गई। तांत्रिक ने उसे जहरीला तरल पदार्थ लाकर दिया, जिसे उसने पति को पिला दिया। पति की मौत हो गयी। जब भेद खुला तो महिला और तांत्रिक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

अपने शराबी पिता के हाथों मां की पिटायी और अपशब्दों की बौछार से तंग आ गई थी एक बेटी। एक दिन की बात होती तो वह सब्र कर लेती। लेकिन पिता तो रोज शराब पीकर आता और उसकी मां और बहन के साथ अंधाधुंध मारपीट करता। सत्रह वर्षीय लड़की से मां और बहन की दुर्दशा देखी नहीं जाती थी। पिता की करतूतों की वजह से पूरे परिवार को हंसी का पात्र बनना पड़ रहा था। पढ़ी-लिखी शालिनी नामक इस लड़की ने आखिरकार पुलिस में शराबी पिता की शिकायत करने की ठानी। तीन-चार बार वह थाने गई, लेकिन खाकी वर्दी वालों ने उसकी समस्या जानने, सुलझाने के बजाय उसे चलता कर दिया। पुलिसवालों का रवैया देखकर शालिनी निराश तो हुई, लेकिन फिर भी अपना दुखड़ा सुनाने के लिए बार-बार पुलिस स्टेशन जाती रही। वहां उसे बस यही कहा जाता कि नशा करना कोई अपराध नहीं है। अधिकांश पति और पिता नशे में नियंत्रण खो देते हैं। सरकार ने ही जगह-जगह शराब की दुकानें खुलवा रखी हैं। यह सिर्फ देखने के लिए तो नहीं हैं। जिन्हें पीनी है वे पिएंगे ही। पीने के बाद मारपीट और गालीगलौज होना आम बात है। वह कैसी बेटी है, जो अपने पिता की शिकायत करने थाने आ जाती है। शहर में हजारों ऐसे शराबी हैं जो अपनी पत्नियों और बच्चों की पिटायी करते रहते हैं। तुम्हारी तरह उनकी बेटियां तो पिता के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज कराने के लिए नहीं चली आतीं!

शालिनी को तरह-तरह के उपदेश देकर पुलिसवाले विदा कर देते। शराबी पिता सुधरने का नाम ही नहीं ले रहा था। वह दिन-रात उदासी और चिंता में डूबी सोचती-विचारती रहती। एक दिन उसके मन में एक नया विचार आया। पिता को सज़ा दिलाने के लिए उसने कोर्ट में छेड़छाड़ का झूठा मुकदमा दर्ज करवा दिया। अदालत में जब मामले की सुनवाई हुई तो उसने जज को बताया कि उसने यौन उत्पीड़न का झूठा मुकदमा दर्ज कराया है। उसने पिता के खिलाफ जज को झूठा मुकदमा दर्ज कराने के पीछे की वजह बताई कि किस तरह से वह अपने शराबी पिता के आतंक से तंग आकर थाने में शिकायत दर्ज करवाने के लिए गयी, लेकिन उसकी एक भी नहीं सुनी गई। अदालत ने लड़की के साहस की प्रशंसा की और पिता को यौन उत्पीड़न के आरोप से तो बरी कर दिया, लेकिन पत्नी और बेटी पर नशे में गालीगलौज और मारपीट करने के आरोप में दोषी ठहराया। न्यायाधीश ने यह भी कहा कि, अपनी मां की दुर्दशा देखकर बेटी ने जो रास्ता अख्तियार किया वो उसकी मजबूरी थी। नशे में गर्क हो चुके पिताओं का जानवरों से भी बदतर हो जाना हर संस्कारवान बेटी-बहन-पत्नी के खून को खौलाता है। 

महानगर में एक 11 वर्षीय छठवीं में पढ़ने वाली छात्रा को उसी के नशेड़ी पिता ने अपनी अंधी वासना का लगातार शिकार बनाया। विरोध करने पर उसकी मां की हत्या करने की धमकी देता रहा। शराब और गांजे के नशे के गुलाम बाप से डरी सहमी रहने वाली बालिका ने आखिरकार अपने साथ हो रहे दुष्कर्म की जानकारी अपनी पड़ोसी महिला को दे दी। महिला बाप की हैवानियत के बारे में जानकर सन्न और स्तब्ध रह गई। ऐसी बातों को फैलने में देरी नहीं लगती। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं तक जब यह बात पहुंची तो उन्होंने दुष्कर्मी को सबक सिखाने की ठानी। बलात्कारी हैवान को इसकी भनक लग गयी। वह घर से भाग गया। फिर बात पुलिस तक भी जा पहुंची। पुलिस खोजबीन कर बस्ती में छिपे नराधम को दबोचकर थाने में ले आयी। बालिका की मां को भी अपने पति की गिरफ्तारी के बाद बेटी के साथ होते चले आ रहे घिनौने कृत्य का पता चला। उसने थाने के अंदर पति की चप्पलों से ऐसी धुनायी की, कि लोग देखते रह गये। गौरतलब है कि कुछ दिन पूर्व बेटी ने इशारों-इशारों में मां को पिता की करतूत के बारे में अवगत कराने की कोशिश की थी, लेकिन मां ने नजरअंदाज कर दिया था। दरअसल, मां ने कभी कल्पना ही नहीं की थी कि कोई बाप इस हद तक नीचे गिर सकता है। हां, उसे यह जरूर पता था कि उसका पति शराब और गांजे के नशे में मदहोश रहता है। 

अपने देश के कई परिवारों में पुरुषों की नशाखोरी और दरिंदगी को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जाता। उनकी दुराचारी प्रवृत्ति पर भी यह सोचकर परदा डाला जाता है कि भेद खुलने पर पूरे परिवार की बदनामी होगी। लोग जीना हाराम कर देंगे। कुछ दिन पूर्व सोशल मीडिया पर वायरल होते वीडियो पर निगाहें जा अटकीं। एक मासूम बेटी घर की दीवार पर लगी दिवंगत पिता की तस्वीर के सामने खड़ी होकर कहती दिखायी दी,‘‘मम्मी आपको मना करते-करते थक गई कि शराब पीना बंद करो फिर भी आप ने पीनी नहीं छोड़ी। मेरी भी चिंता नहीं की। सबको अकेला छोड़कर चल दिए। आपको क्या पता कि आपके ऐसे चल देने से मुझे कितना दु:ख होता है। सबके पापा हैं। मेरी सभी सहेलियां पापा के साथ रहती हैं उनसे ढेर सारी बातें करती हैं। लेकिन मेरी सुनने वाला कोई नहीं है...’’ इस वीडियो को जिसने भी देखा उसकी आंखें नम हो गईं। जागरुक और संवेदनशील लोगों के दिल-दिमाग पर असर करते इस वीडियो का शराब के अखंड शौकीन पिताओं पर कुछ तो असर पड़े यही हम चाहते हैं...। 

Thursday, June 11, 2026

फोटो गैलरी

 अपने नाम का डंका बजवाना किसे अच्छा नहीं लगता? यह हकीकत दीगर है कि कोई अपराध कार्य कर तो कोई सद्कार्य कर चर्चा में आता है। कुछ लोगों को कुख्याति भी सुख और संतुष्टि देती है। गुजरे जमाने को जाने देते हैं। बात आज की करते हैं। सोशल मीडिया के इस अच्छे-बुरे काल ने क्या गलत और क्या सही के निर्णय को ही असमंजस में डाल दिया है। अब जिसे देखो वही वास्तविक दुनिया में कम और आभासी दुनिया में ज्यादा खोया नज़र आता है। वर्चुअल दुनिया में मिलने वाली तारीफों के समक्ष असल दुनिया के सभी रंग फीके लगते हैं। तभी तो दूर और पास के रिश्तेदारों से तो दुरियां बढ़ ही चुकी हैं। एक ही घर में रहने के बावजूद भाई-बहन, माता-पिता, चाचा-चाची और उनके बच्चे अपने-अपने मोबाइल स्क्रीन से चिपके और उलझे दिखायी देते हैं। यहां तक कि खाने की मेज पर भी अधिकांश पारिवारिक सदस्यों की निगाहें फेसबुक, वाट्सएप, इंस्टाग्राम, रील्स और वीडियों से हटती नहीं। वो जमाना लगभग लुप्त होता जा रहा है, जब किसी मेहमान के आगमन पर घर के बड़े-बुजुर्ग का इशारा पाते ही बच्चे सादर प्रणाम और उनकी चरणवंदना करते थे। अब तो सोशल फोबिया के रोगी बच्चे तब तक अपने कमरों में कैद रहते है जब तक मेहमान रुखसत नहीं हो जाते और मां-बाप भी कुछ नहीं कर पाते। उलटे उन्हें भी पहले की तरह अब मेहमानों का घर आना कम भाता-सुहाता है!

हाल ही किया गया एक गंभीर सर्वे बताता है कि शहर हों या गांव लगभग सभी जगहों पर पंद्रह से बीस प्रतिशत बच्चे सोशल मीडिया की जबरदस्त गिरफ्त में हैं। उन्हें मोबाइल रोगी भी कहा जा सकता है। अधिकांश बच्चे एकांत प्रेमी हो रहे हैं। किसी के सामने नहीं आते। अजनबियों से बात करने की बजाय नजरें चुराते हैं। बातचीत करते-करते उनके घबराने और हकलाने के लक्षण दर्शाते हैं कि वे अंदर से कितने भयभीत हैं। सच तो यह है कि अधिकांश युवा भी असंमजस की जकड़न में हैं। अनजानों से करीबी और उनके लाइक्स और कमेट्ंस पाने के चक्कर में अपने आसपास के लोगों से कटते युवा भी एक-दूसरे से घुलना-मिलना भूलते जा रहे हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने चिंता व्यक्त की है कि आज लगभग हर मोबाइल फोन एक आभासी जुए का अड्डा बन चुका है। पैसों के लिए खेले जाने वाले ऑनलाइन खेलों से तंगी, कलह और आत्महत्या जैसी गंभीर समस्याएं पैदा हो रही हैं, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन गई हैं। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर पैनी नज़र गढ़ाते-गढ़ाते मेरी आंखों के सामने उन बदनसीब पिताओं का गमगीन चेहरा घूमने लगा जिनकी औलादों ने क्रिकेट सट्टे और ऑनलाइन जुए में लाखों-करोड़ों रुपए लुटाकर उन्हें बर्बाद कर दिया है। उनकी अच्छी-खासी चलती दुकानोें, घरों तथा कारखानों पर ताले लग गए या हमेशा-हमेशा के लिए बंद करने और बेचने की नौबत आ चुकी है। अपने खून-पसीने की कमायी की जमापूंजी लुटने के बाद अब वे किसी को अपना मुंह दिखाने से कतराने लगे हैं, जैसे उन्होंने ही कोई गंभीर अपराध किया हो। ऐसी नालायक संतानों को जन्म देने का अपराध तो उनसे हुआ ही है। यह हम नहीं वो खुद माथा पीटते-पीटते बेहाल होकर कहते हैं। सड़कों, चौराहों, बाग-बगीचों और भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर आपकी भी उन युवकों और युवतियों पर नज़र तो पड़ती ही होगी और कुछ पल के लिए विचार भी आता होगा कि यह कैसा बेहुदा तमाशा है? हाथ में स्मार्ट फोन और कानों में ईयर बड्स ठूंसकर चलते लड़के-लड़की को कोई होश नहीं, खबर नहीं कि उनके आसपास क्या हो रहा है। कौन उन्हें कैसे घूर रहा है? उनकी अंगुलियां तो बस फोन स्क्रीन पर अठखेलियां कर रही हैं। भीड़ में जबरन खुद को अकेला करने और दिखाने वाली आज की इस पीढ़ी ने चिंतकों को गहन चिंता में डाल दिया है। शिकागो यूनिवर्सिटी के व्यवहार वैज्ञानिक निकोलस एप्ले और जुलियाना श्रोएडर के शोध के मुताबिक ऐसी आदतें बेहद खतरनाक साबित हो रही हैं।

 जो लोग अपनों तथा बेगानों के साथ सतत मेलजोल रखते हैं। बाग-बगीचों, बसों, रेलगाड़ियों, होटलों, कॉफी हाऊसों में अजनबियों से भी बातचीत करने की पहल करते हैं, वे खुद को उन लोगों की बनिस्पत अधिक खुश, संतुष्ट और सकारात्मक पाते हैं, जो उस ऑनलाइन दुनिया से बाहर ही नहीं आना चाहते, जहां हिंसा, ईर्ष्या, भेदभाव और गुस्सा भरा पड़ा है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब एक व्यक्ति को धार्मिक नगरी हरिद्वार में स्थित हर की पौड़ी पर अपनी जीवित पत्नी का पिंडदान करते देखा गया। अपनी पत्नी का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार करने वाले इस पति ने गंगा नदी के बीच में खड़े होकर पहले तो पत्नी की फूलों से सजी तस्वीर पर जी भरकर थूका, फिर उसे मृत घोषित कर दिया। इसके बाद पारंपरिक हिंदू रीति रिवाज के अनुसार पिंडदान किया। ध्यान रहे कि हमारे देश में मृतक की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करने की परंपरा है। जैसे ही वह पत्नी की तस्वीर को गंगा में बहाकर बाहर निकला तो उसने टकटकी लगाकर देखते स्त्री-पुरुषों को बताया कि उसकी बीवी आपत्तिजनक और भड़काऊ वीडियो बनाने से बाज नहीं आ रही है। मैंने उसे कई बार समझाया लेकिन वह नहीं मानी। इंस्टाग्राम पर उसकी बनाई रील्स देख-देखकर लोगों ने मेरा जीना ही हराम कर दिया है। अब मैं घरवाली का मुंह ही नहीं देखना चाहता। वैसे तो मेरे लिए  वह बहुत पहले मर चुकी थी लेकिन जगजाहिर करना भी तो जरूरी था...

 फेसबुक पर एक लड़की की खूबसूरत और आकर्षक फोटो देखते ही एक युवक उस पर दिलोजान से मर मिटा। दोनों ने एक दूसरे का मोबाइल नंबर ले लिया। उनमें घंटों चैटिंग होेने लगी। कुछ ही हफ्तों में युवक ने उससे मिलने की ठानी। अपने शहर से सैकड़ों किलोमीटर दूर कार चलाते हुए वह लड़की के शहर जा पहुंचा। पहले से निर्धारित कॉफी हाऊस पर दोनों आमने-सामने थे। लड़की को देखते ही युवक के तो होश ही उड़ गए। फेसबुक में देखी जिस लड़की पर पहली नज़र में वह फिदा हुआ था, उससे लड़की का लुक, रंग और हुलिया कतई मेल नहीं खा रहा था। दोनों में कोई बातचीत हो पाती इससे पहले ही युवक ने फौरन कार स्टार्ट की, घुमाई और वापस अपने शहर की ओर चल पड़ा। दरअसल, लड़की ने अपनी फेसबुक पर जो खूबसूरत तस्वीरें डाली थीं, वे जबरदस्त एडिटिंग, फिल्टर, फोटोशॉप और मेकअप के जादू का कमाल थीं। सच तो यह भी है कि सोशल मीडिया फेक प्रोफाइल, कैटफिशिंग, छल, कपट और धोखाधड़ी का मायावी मंच बन चुका है। हों न हों, लेकिन अच्छा और आकर्षक दिखने की चाह सर्वव्यापी है। कुछ लोग उम्रदराज होने के बाद भी बचपन और जवानी की अपनी खूबसूरत तस्वीरों के मोहपाश में जकड़े रहते हैं। उन्हें कहीं विस्मृत न कर दिया जाए यह चिंता भी उन्हें सतत सताती रहती है।

 क्या आपको पता है कि ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे मध्य एशिया के देशों में मृत व्यक्तियों की कब्र पर बड़ी-बड़ी प्रोफाइल फोटो लगाई जाती है, बिल्कुल वैसे ही जैसे फेसबुक या इंस्टाग्राम में प्रोफाइल पिक होती हैै। सबसे अधिक हैरत भरी सच्चाई यह भी है कि कुछ लोग अपनी मौत से पहले ही तय कर लेते हैं और रिश्तेदारों को भी निर्देशित कर देते हैं कि उनकी कौन सी मनपसंद फोटो कब्र पर लगानी है। इसके लिए वे नये-नये आकर्षक वस्त्र धारण कर एक से एक मूड...हाव-भाव में पोज देकर किसी सिद्धहस्त फोटोग्राफर से फोटो खिंचवाते हैं। अत्याधिक बीमार और मौत के कगार पर खड़े शख्स से परिवार के सदस्य ही पूछ लेते हैं कि वह अपनी कब्र पर कौन सी फोटो लगवाना पसंद करेगा? अपनी शक्ल-सूरत और नाम को लोगों के दिलों-दिमाग में बसाये रखने के प्रबल आकांक्षी लोग तो अपनी जवानी में ही कई फोटो तैयार करवाकर रख लेते हैं, जिन्हें उनकी कब्र पर लगाया जाता है। इन देशों में कब्र बनवाने पर भी काफी खर्चा किया जाता है। इस सृष्टि से रुखसत हो जाने के बाद भी आन-बान और शान के साथ मृतकों की यादों को संजोए यहां के कब्रिस्तान किसी फोटो गैलरी से कम नहीं लगते, जहां पर मृतक के धनवान परिजन चमकते पत्थर पर नाम, जन्म तथा मृत्यु के साथ फोटो फ्रेम करवाकर लगवाते हैं। कई कब्रों पर तो एलईडी लाइट्स भी लगाई गई हैं, ताकि रात में भी तस्वीर एकदम स्पष्ट दिखायी देती रहे। कुछ रईस परिवार बड़ी स्क्रीन लगवाकर अपनी खुशी दोगुनी कर लेते हैं। पर्यटकों को ये कब्रिस्तान किसी प्रदर्शनी का भी सुखद और मोहक आभास कराते है।

Thursday, June 4, 2026

आदरांजलि

हमारे देश, दुनिया और समाज में क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है और उसका लोगों पर क्या असर पड़ रहा है इसकी वास्तविक तस्वीर सिर्फ सजग पत्रकार ही नहीं प्रस्तुत करते। कवियों, शायरों, गज़लकारों को भी अन्याय, असमानता, अराजकता, बेइंसाफी और इंसानियत की हत्या, क्रोधित और आक्रोशित करती है। सच का आईना दिखाने और जागृति लाने का दायित्व जितनी शिद्दत के साथ कुछ साहित्यकार निभा रहे हैं और सतत निभाते आये हैं, इसके लिए उन्हें कई बार दंडित और अपमानित भी होना पड़ा है। कितनी अजीब और चिंतनीय हकीकत है कि आज के वक्त में अगर किसी की कीमत सबसे ज्यादा घटी है तो वह मनुष्य ही है। हर धर्म के संतों, महात्माओं, ज्ञानी-ध्यानियों को अपने-अपने धर्म के संकट में पड़ने की चिंता सता रही है। कुछ कलमकार बार-बार लिखते चले आ रहे हैं कि धर्म को विभाजन का औज़ार बनाना बंद करो। धर्म जोड़ता है, तोड़ता नहीं। इंसान पहले, बाकी सबकुछ बाद में। हमारे समय के सजग शायर राजीव रेड्डी लिखते हैं, 

‘‘गीता हूं कुरआन हूं मैं, 

मुझको पढ़ इंसान हूं मैं।

जिन्दा हूं सच बोलके भी, 

देख के खुद हैरान हूं मैं।’’


‘‘ये सारे शहर में दहशत सी क्यों है,

यकीनन कल कोई त्यौहार होगा।’’

जिस तरह से देश और दुनिया में दहशत का माहौल बन चुका है। कब कोई पीठ पर छूरा मार दे। भाई को अपने भाई पर भरोसा नहीं। राजेश रेड्डी की चिंता निरर्थक तो नहीं। रिश्ते लहुलूहान हैं, 

‘‘मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा,

 बड़ों की देखकर दुनिया बड़ा होने से डरता है।’’ 

साहित्य, कला और चिंतन से वास्ता रखने वाला शायद ही ऐसा कोई भारतवासी होगा जिसने हिंदी गज़ल को पठनीय और सारगर्भित तस्वीर के साथ पेश करने वाले गज़लकार दुष्यंत कुमार का नाम नहीं सुना होगा। गज़ल को प्यार मोहब्बत, आशिकी दिवानगी के चक्रव्यूह से बाहर निकालने वाले दुष्यंत कुमार ने वर्षों पहले जो गज़ल लिखी थी, उसी की कुछ पंक्तियां,

‘‘हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, 

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।’’

गौरतलब है कि उपरोक्त गज़ल वर्षों पहले लिखी गई थी। इसका शब्द-शब्द आम लोगों के साथ-साथ शासकों तक भी बार-बार पहुंचता रहा, लेकिन आम आदमी की समस्याओं, पीड़ाओं, दुख दर्द तथा चिंताओं का अंत नहीं हो पाया। धनवान और...और धनपति होते चले गए, गरीबों के हाथों में भीख के कटोरे देखे जाने लगे।  गरीबी, अशिक्षा, शोषण और भेदभाव का पहाड़ आकाश तक जा पहुंचा। लेकिन अधिकांश शासक अंधे और बहरे बने रहे। नेताओं की भ्रमित करने वाली नारेबाजी के स्वर और बुलंद होते चले गये। न जाने कितने शासकों, चतुर-चालाक नेताओं ने क्रांतिकारी सोच वाले दुष्यंत कुमार की पंक्तियों को बिना उनका नाम लिए दोहराया और लोगों को भरमाया।

 यह सच अपनी जगह है दुष्यंत कुमार एवं अन्य नामी गज़लकारों की कुछ गज़लों का मंत्रियों, नेताओं, पत्रकारों तथा संपादकों ने अपनी बात में वजन लाने के लिए जी भरकर इस्तेमाल किया और करते हैं। मंत्री-संत्री ही नहीं, प्रधानमंत्री तक दुष्यंत कुमार एवं अन्य कुछ शायरों के शेरों के जरिए अपनी बात कहते देखे गये हैं। दरअसल, यह सिलसिला कभी टूटने वाला नहीं है, क्योंकि जब शब्दों का अभाव होता है तब जागृति का बिगुल बजाने और क्रांति का आह्वान करने के लिए कालजयी गज़लों और कविताओं को ही अपने भाषणों में सम्मानजनक जगह देनी ही पड़ती है। 

‘‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, 

न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।’’

‘‘हम तो दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है, जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।’’

 ‘‘दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे जब हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।’’ 

ऐसे और भी अनेकों शेर हैं जो मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र की गज़लों के अनेकों गुलदस्तों में सजे हैं। डॉ. बशीर बद्र का हाल ही में 91 वर्ष की उम्र में देहावसान हो गया। देश और दुनिया को प्यार, मोहब्बत, एकता और भाईचारे का संदेश देने वाले शायर का 1987 में मेरठ में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान भरा पूरा घर आग के हवाले कर दिया गया तो उन्होंने लिखा था कि, 

‘‘लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में, 

तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में!’’

इस आगजनी में उनकी कई ऐतिहासिक अप्रकाशित रचनाएं, गज़लें और कविताएं हमेशा के लिए राख हो गईं! इस दिल दहलाने वाले अन्याय और जुल्म के बाद उन्हें मेरठ से डर लगने लगा। भोपाल में जैसे-तैसे उन्होंने नया घर बसाया। बशीर बद्र ने देश के बंटवारे को भी बहुत करीब से देखा था। उनके लिखे इस शेर

‘‘दुश्मनी जमकर करो,

लेकिन ये गुंजाइश रहे,

जब कभी हम दोस्त हो

जाएं, तो शर्मिंदा न हों।’’

को शिमला समझौते के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भुट्टो को पूरे मन से सुनाया और कहीं न कही चेताया था कि हद से ज्यादा  नीचे मत गिरो। लेकिन न उन्हें अक्ल आई और ना ही उनके बाद के पाकिस्तानी शासकों की सोच बदली। अपने देश को रसातल में ले जाने के बाद भी भारत की बरबादी के सपने देखना नहीं छोड़ते।

आधुनिक उर्दू साहित्य में अभूतपूर्व योगदान के लिए पद्मश्री और साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजे गए बशीर बद्र अपने आशियाने को राख किये जाने के दर्दनाक मंजर को कभी भी भूल नहीं पाए। फिर भी हर मंच पर वो श्रोताओं को आपसी भाईचारे के सूत्र में बंधे रहने का संदेश देते रहे। लेकिन धर्म को विभाजन का औज़ार बनाने वाले कम नहीं हुए। 

दु:खभरी हकीकत तो यह भी है कि कुछ सत्ताधीश और सरकारें भी भेदभाव के रास्ते पर चलती दिखायी देती हैं। ऐसे-वैसे अपराधियोंको सबक सिखाने के लिए उनके वर्षों पुराने वैध-अवैध घरों को धराशायी करने लगी हैं। पिछले चार-पांच वर्षों से उनमें बुलडोजर के प्रति कुछ ऐसा लगाव और विश्वास जागा है कि उन घरोंं को भी नेस्तनाबूत करने में देरी नहीं की जाती, जो अपराधी के माता-पिता के नाम पर हैं। उनके दादा-परदादा ने अपनी खून-पसीने की कमाई से बनाया था। मैं अक्सर सोचता हूं कि जो भी अवैध अतिक्रमण हैं, उन पर तब क्यों नहीं बुलडोजर चलाया जाता है, जब उन्हें खड़ा किया जा रहा होता है। उसके अवैध होने की खबर प्रशासन के चेहरों को तो होती ही है, लेकिन रिश्वत लेकर तब तो मुंह बंद कर लिया जाता है। जब कोई संगीन अपराध करता है तभी ही उसके घरों पर हथौड़े चलना शंकित करता है। भेदभाव और बेइंसाफी का भी आभास कराता है। ऐसे में क्या यह मान लिया जाए कि यदि अपने अवैध कब्जों को बचाए रखना हो तो जुर्म करने के बाद भी पकड़ में न आएं। किसी भी तरह से खुद को बचाये और छुपाये रखें। यह भी तो देखने में आता है कि बुलडोजर के तांडव के शिकार कुछ आरोपी कुछ साल तक जेल में रहने के बाद बाइज्जत बरी हो जाते हैं, लेकिन तब तक सरकारी तानाशाही उनकी दुनिया उजड़ चुकी होती है। खूंखार अपराधियों, हत्यारों, आदतन बलात्कारियों, जगजाहिर आतंकवादियों की अवैध इमारतें, कारखाने और दुकानें गिराये जाने का तो सभी समर्थन करते हैं लेकिन जिनके परिवार का बेटा, भतीजा, भाई  अराजकता करते पकड़ा जाता है, तो उनके परिवार के साथ किसी भी तरह की बेइंसाफी नहीं होनी चाहिए। उन बेकसूरों को बेघर करने के सिलसिले सजग भारतीयों को बहुत आहत करते हैं। करे कोई और भरे कोई का यह चलन कहीं न कहीं बेहद अन्यायकारी तो है ही...। 

Thursday, May 28, 2026

नज़रिया

 जैसे मैंने सुना वैसे आपने भी कभी न कभी अल्ताफ राजा का वर्षों पहले गाया हर दिल को छू लेने वाला दर्दभरा यह गीत अवश्य सुना होगा,...

‘‘तुम तो ठहरे परदेसी 

सुबह पहली गाड़ी से 

घर को लौट जाओगे!

जब तुम्हें अकेले में 

मेरी याद आएगी 

आंसुओं की बारिश में 

तुम भी भीग जाओगे...’’ इस सदाबहार गीत की रचना की थी गीतकार ज़हीर आलम ने जो एक भावुक और प्रचार तंत्र से दूर रहने वाले इंसान थे। गरीबी में पले-बढ़े ज़हीर आलम नागपुर में जन्मे थे। बचपन से ही गज़लें और कविताएं ज़हीर आलम को आकर्षित करने लगी थीं। पार्श्वगायक और उम्दा कव्वाल अल्ताफ राजा भी नागपुर की पैदाइश हैं। उनके पिता इब्राहिम इकबाल और मां रानीरूप लता दोनों उस दौर के मशहूर कव्वाल थे। छठवें और सातवें दशक में देश में रात-रातभर जागकर कव्वालियां खूब सुनी जाती थीं। जिस तरह से कवि सम्मेलनों में छाये रहने वाले कवियों के लोग दीवाने थे, वैसे ही कुछ कव्वाल देशवासियों के जबरदस्त चहेते थे। दुनिया की पहली महिला कव्वाल शकीला बानो भोपाली का भी तब गजब का जलवा था। तब टीवी और मोबाइल का आगमन हुआ नहीं था इसलिए लोग फिल्मों, कवि सम्मेलनों तथा कव्वाली से मनोरंजन करते थे। दरअसल वो समय दिल को छूने वाले गीतों, कविताओं और शायरी के नाम था। आज भी पुराने फिल्मी गीत जो सुख-सुकून देते हैं, नये गाने उनके करीब कही नहीं ठहरते।

‘‘तुम तो ठहरे परदेसी...’’ गीत को गाकर अल्ताफ राजा ने जहां अपार धन और नाम कमाया, वहीं ज़हीर आलम को इस कालजयी गीत को लिखने के बदले मात्र तीन हजार रुपए मिले थे। हालांकि उस समय इतने रुपये भी खासी अहमियत रखते थे। महीनेभर तक खून पसीना बहाने पर जिसे हजार-बारह सौ रुपए नसीब होते हों, उसे महज एक गीत के मेहनताने के तौर पर इतने रुपयों का मिलना अचानक लॉटरी के खुलने जैसा था। अपनी आजीविका चलाने के लिए यह कलम का जादूगर कपड़ा मिल में काम करता था। तब नागपुर में स्थित एम्प्रेस मिल और मॉडल मिल में हजारों मजदूर काम करते थे। जब कपड़ा मिलों पर ताले लग गए, तब दूसरे मजदूरों की तरह इस गीतकार को भी महीनों भूख, प्यास और आर्थिक तंगी से लड़ते हुए वर्षों झोपड़ीनुमा घर में रहना पड़ा। इसी महीने छियासी वर्ष की उम्र में नागपुर में स्थित मोमिनपुरा में उनकी मौत हो गई। जब उनकी मृत्यु की खबर सोशल मीडिया में गूंजी और अखबारों में छपी, तब अधिकांश शहरवासियों को पता चला कि जिस गीत ने असंख्य लोगों को अपना दिवाना बनाते हुए कैसेट्स कंपनियों और गायक को करोड़ों की कमाई करवाई, उसका रचयिता संतरानगरी में गुमनामी और कंगाली में दिन काटते हुए किसी तरह से भूखा-प्यासा जीता रहा। उसने अपने होने की किसी को खबर ही नहीं होने दी और न ही किसी ने उसकी खबर ली। दरअसल, ज़हीर आलम एक खुद्दार किस्म के गीतकार थे। उन्होंने कभी ढिंढ़ोरा नहीं पीटा कि कालजयी गीत ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ उनके दिल-दिमाग की देन है। इसी गाने ने गायक अल्ताफ राजा को घर-घर पहुंचाया। इसमें कोई शक नहीं कि अल्ताफ को रोमांटिक और दर्दभरे गाने गाने में महारत हासिल थी लेकिन इस गीत ने तो जैसे उन्हें जमीन से आसमान पर पहुंचा दिया। यही कारण है कि आज भी उन्हें उनकी सदाबहार एल्बम ‘तुम तो ठहरे परदेसी’ के लिए ही जाना जाता है।

‘‘कोई दीवाना कहता है,

कोई पागल समझता है,

मगर धरती की बेचैनी को

बस बादल समझता है।

मैं तुझसे दूर कैसा हूं,

तुम मुझसे दूर कैसी है,

ये तेरा दिल समझता है

या मेरा दिल समझता है।’’

बताने की जरूरत है नहीं कि यह किस हस्ती की लिखी पंक्तियां हैं। कवि सम्मेलनों के मंचों के बेताज बादशाह कुमार विश्वास सिर्फ कविताओं और गज़लों के लिए ही नहीं जाने जाते, बल्कि धार्मिक प्रवचनकर्ता के तौर पर भी उन्होंने खूब धाक जमायी थी। अपनी शाब्दिक कलाकारी से युवाओं के दिलों में जगह बनाने वाले कुमार विश्वास ने रामायण के पात्रों की गहराई में जाकर हर वर्ग के भारतीय जनमानस में जो प्रेरक रस घोला है, वह भी यकीनन अद्भुत है।

अपने प्रभावी अंदाज और सुरीली आवाज से सम्मोहित करने वाले कुमार विश्वास ही ऐसे इकलौते गीतकार, गज़लकार हैं, जिनके गीत युवाओं के साथ-साथ उम्रदराजों के मन-मस्तिष्क में भी बसे हैं। जब कुमार देशी-विदेशी मंचों पर गीत-गज़ल सुनाना प्रारंभ करते हैं तो लोग झूम-झूमकर उनके साथ सुर से सुर मिलाते हुए गाने लगते हैं। डॉ. कुमार खासतौर पर प्रेम, श्रृंगार, देशभक्ति और जीवनदर्शन पर आधारित गीत, गज़ल और कविताएं लिखते हैं। श्रोताओं को अथाह देशभक्ति के रंग में रंग देने वाला उनका गीत, ‘हाथ में तिरंगा हो’ तो बार-बार सुना और सुनाया जाता है। अपनी वाकपटुता और ज्ञान के भंडार की बदौलत एकदम अलग और खास मुकाम बनाने वाले कुमार कवि सम्मेलनों और रामकथा के लिए लाखों रुपए की फीस वसूलते हैं। वैसे यह करिश्मा किसी चमत्कार की देन नहीं, अपितु उनके अथक परिश्रम और विविध कलाओं के सार्थक प्रदर्शन का प्रतिफल है। फिल्मी कलाकार, क्रिकेटर, उद्योगपति और विभिन्न कारोबारी जब कमाते हैं तो अपनी सभी चाहतों को भी पूरा करते हैं। आम जनता और सच्चे साहित्य प्रेमियों के लाड़ले इस कवि ने कभी अपनी कमाई नहीं छिपाई। इस बहुआयामी शख्सियत ने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए दिल्ली से लगे आधुनिक नगर नोएडा में आलीशान बंगला बनवाया है। इसके दरवाजे भी सभी के लिए खुले रखे हैं। यह विशाल बंगला किसी महानगर में स्थित फाइव स्टार होटल जैसा ही है, जहां पर पांच सितारा कमरे, स्विमिंग पूल, जिम, स्टीम रूम, स्पा सेंटर, थिएटर और सजने-धजने के लिए सैलून से लेकर और भी बहुत सी ज्ञात-अज्ञात सुविधाएं हैं। खास बात यह भी है कि कवि महोदय चांदी के बर्तनों में खाना खाते हैं। महंगी से महंगी कई आधुनिकतम कारों के मालिक कुमार विश्वास के मौज़ मज़े से जीने और रहने की खबर जब पूरी तरह से बाहर आई तो सोशल मीडिया के साथ-साथ उनकी बिरादरी के लोग भी भौचक्के रह गए। उनके अनुसार, प्रेम-कविता और रामकथा कहने वाले प्रवचनकार को तो सरलता, सहजता और मिट्टी से जुड़े होने का आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए था लेकिन यह तो हर दर्जे का आराम परस्त ढोंगी और मौज़ मजे का गुलाम निकला। दूसरों को भगवान राम की तरह बनवासी और संतोषी होने का पाठ पढ़ाने वाला चार्टर प्लेन की यात्राएं और चांदी के बर्तनों में छप्पन भोग का मजा लूट रहा है! यह तो उन आस्थावानों के साथ सरासर छल, कपट और धोखा है, जो इसके प्रवचन सुनने के लिए दूर-दूर से दौड़े चले आते हैं। जिन्हें गीतकार के चांदी के बर्तनों में खाना खाने पर आपत्ति है, उन्हें पता होना चाहिए कि मुंबई के सबसे पॉश इलाके अल्टामाउंड रोड में स्थित अपने 27 मंजिला घर ‘एंटीलिया’ में रह रहे मुकेश अंबानी तो सोने के बर्तनों का इस्तेमाल करते हैं। उन पर ऐतराज की उंगलियां उठाने की किसी की हिम्मत क्यों नहीं हुई है। 

दरअसल, हमारे यहां साहित्यकार, कलाकार होने का मतलब ही है, गरीबी और बदहाली से जूझता टूटता-फूटता आंसू बहाता इंसान। यह धारणा बना ली गई है कि यदि कोई शख्स, कवि, गीतकार और पत्रकार है तो उसका धन से क्या काम? यदि कोई कलाकार धनपति है, तो कहीं न कहीं वह भ्रष्टाचारी और बेइमान ही होगा। ईमानदारी से तो दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से मिलती है। यही वजह है कि विभिन्न कलाओं के क्षेत्र में नाम कमाने वाले अधिकांश लोग गरीब की छवि के कैदी बनकर रहना पसंद करते हैं। भले ही उनकी परवरिश धन की बरसात और सुख-सुविधाओं के बीच हुई हो लेकिन वे यही प्रचारित करते नहीं थकते कि उन्होंने गरीबी, बदहाली और भुखमरी को बहुत करीब से देखा और भोगा है। उनका यह झूठ उन लोगों को बहुत राहत और संतुष्टि प्रदान करता है, जो इस क्षेत्र में खुद कुछ नहीं कर पाए। जहां से चले थे वहीं के होकर रह गए। उन्हें शून्य से उठे लोगों की तरक्की से जलन होती है। यह भी सच है कि नामचीन हस्तियों की गरीबी और बदहाली की काल्पनिक कहानियां न जाने कितनों की बर्बादी का सबब बनती चली आ रही हैं। कई ऐसे पत्रकार, साहित्यकार हैं, जो साहस और परिश्रम की सीढ़ियों पर पैर रख बहुत ऊपर तक जा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसे हवा-हवाई महानुभावों का अनुसरण करना नहीं छोड़ा जो अपने खोखले दिखावटी उसूलों का परचम लहराकर दूसरों की आंखों में धूल झोंकते रहे हैं। खुद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने वाले इन आत्ममुग्धों के बाल-बच्चे अशिक्षित, अधनंगे रहकर भूख से तड़पते-कलपते रहते हैं लेकिन यह तथाकथित सिद्धांतवादी होश में आने का नाम ही नहीं लेते।

Thursday, May 21, 2026

देश तो है मोदी के साथ

पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमतें बढ़ना कोई नई बात नहीं। समय-समय पर विभिन्न कारणों से इनकी कीमतों में इजाफा होता रहता है। दरअसल नई बात तो है कि भारत के कर्मवीर अथक योद्धा प्रधानमंत्री का अपने प्रिय देशवासियों को काफी सोच-समझकर यह अनुरोध करना कि समय की मांग को देखते हुए वे कम अज़ कम एक साल तक सोना न खरीदें। घर में रहकर काम करें, विदेशी यात्राओं में कटौती तथा पेट्रोल-डीजल बचाएं और खाद्य तेल का कम इस्तेमाल करें। प्रधानमंत्री ने जिस दिन पेट्रोल-डीजल बचाने और अधिक से अधिक पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करने की बात कही तो उसी दिन से कुछ जन्मजात विरोधी तंज मिश्रित राग अलापने लगे कि दूसरों को उपदेश देने वाले नरेंद्र मोदी पहले खुद पेट्रोल-डीजल की बचत करने का साहस दिखाएं तथा विदेश यात्राओं पर विराम लगाएं। उनकी सुरक्षा के लिए बीसियों गाड़ियों का जो काफिला आगे-पीछे चलता है, उसमें भी कमी लाएं तो मानें। चतुर, दूरदर्शी प्रधानमंत्री को ऐसी प्रतिक्रियाओं और तंजों का पूर्वानुमान था। इसलिए उन्होंने तथा उनके सहयोगी मंत्रियों ने न केवल अपने काफिले में जबरदस्त कटौती की, बल्कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट को भी खुशी-खुशी अपनाया। सरकारी खर्चों में कटौती करने के उद्देश्य से कुछ मंत्रियों की साइकिल, मेट्रो ट्रेन तथा बस यात्रा के साथ-साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का मोटर साइकिल पर मंत्रालय जाना अधिकांश लोगों को बहुत अच्छा लगा लेकिन कुछ लोगों के द्वारा यह भी कहा गया कि ऐसे नाटक-नौटंकी, ऊपरी दिखावे तो पहले भी बहुत होते रहे हैं। प्रतीकात्मक अनुशासन और हवा-हवाई नियंत्रण के स्थान पर स्थायी त्याग भावना जब तक नहीं बनेगी तब तक आम भारतीय इसे ढकोसला ही मानते रहेंगे। असंख्य सजग भारतीयों ने अपने प्रिय पीएम की अपील का आदर करते हुए पैदल तथा साइकिल पर चलने के अलावा बस, मेट्रो आदि को अपनाकर पेट्रोल बचाने के अभियान को गति दी। विख्यात फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने अपनी फ्लाइट की टिकट रद्द करवाकर वंदे भारत ट्रेन से जयपुर से दिल्ली का सफर किया। उन्होंने यह भी कहा कि, यह कोई बहुत बड़ा त्याग नहीं है, लेकिन अगर हम सब अपनी तरफ से छोटी-छोटी कोशिशें शुरू करें तो उसका यकीनन बड़ा असर हो सकता है। आज के समय में जिम्मेदार नागरिक होने का मतलब सिर्फ बातें करना नहीं, बल्कि अपनी आदतों में बदलाव लाना जरूरी है। देश सेवा केवल सरहद पर नहीं होती। कभी-कभी वह हमारे रोजमर्रा के छोटे-छोटे फैसलों में भी दिखाई देती है और दिखाई देनी भी चाहिए। 

जो लोग पीएम की विदेश यात्राओं पर उंगली उठाते हैं उन्हें खबर नहीं या फिर अंधे हैं। दरअसल, उनकी सभी विदेश यात्राएं व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय कूटनीति का हिस्सा होती हैं। अभी जिस तरह के चिंताजनक हालात हैं। अमेरिका-ईरान के बीच के युद्ध ने पूरी दुनिया का संतुलन बिगाड़ दिया है। तब ऐसे में आपसी रिश्ते मजबूत करना, तेल आपूर्ति सुनिश्चित करना और निवेश लाना भी निहायत जरूरी है। अपने देश के भले के लिए दिन-रात भागते-दौड़ते मोदी जी यदि किसी देश की प्रधानमंत्री को मिठास भरी भारतीय टॉफी उपहार में देते हैं तो विरोधियों के तन-बदन में आग लग जाती है और जबान ज़हर उगलने लगती है!

गौरतलब है कि 1965 में लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे। तब अहसान फरामोश, धोखेबाज हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान ने अचानक हिंदुस्तान पर हमला कर दिया था। युद्ध और भोजन के संकट को देखते हुए शास्त्री जी ने समस्त देशवासियों को स्वेच्छा से एक दिन का उपवास रखने की अपील की थी। सजग देशवासियों ने अपने जुझारू कर्मठ और अत्यंत भरोसेमंद प्रधानमंत्री की अपील का अनुपालन करने में किंचित भी देरी नहीं की थी और उपवास रखना प्रारंभ कर दिया था। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री को भी तमाम जागरूक भारतवासी लाल बहादुर की तरह ही दिलोजान से चाहते और मानते हैं। जिस तरह से शास्त्री जी ने कभी भी अपने परिजनों को अपने पद और प्रतिष्ठा का फायदा नहीं पहुंचाया और पूरी ईमानदारी से देश सेवा की, वैसे ही राष्ट्रसेवक नरेंद्र मोदी की शान-बान और आन है। भले ही कुछ लोग उनके हर जनहित कार्य में खोट और कमी निकालते नहीं थकते। लेकिन वे तो आम भारतीयों के मन में बसते हैं। सभी देशप्रेमी न सिर्फ उनकी पूरे मन से सुनते हैं, बल्कि उनकी कहे का अनुसरण करने में भी इसलिए देरी नहीं लगाते, क्योंकि वे निष्कलंक हैं। यह सच्चाई अपनी जगह है कि भले ही उनके मंत्रिमंडल के कुछ साथी सत्ता का लाभ उठाते हुए देखते ही देखते मालामाल हो गये हैं और उनकी औलादों ने मोटी कमाई वाली कंपनियां खड़ी कर ली हैं, लेकिन मोदी के भाई-बहन और भतीजे उसी स्थिति में है जैसे पहले थे। दरअसल देश तो केवल और केवल मोदी का ही मुरीद है। 

प्रधानमंत्री की मितव्ययिता, संसाधन-संरक्षण और आत्मनिर्भरता की अपील में अंतत: देश का ही हित समाहित है। उन्होंने काफी सोचने विचारने के पश्चात ही अपने देशवासियों को वस्तुस्थिति से अवगत कराना जरूरी समझा, क्योंकि अधिकांशसोना,पेट्रोल, डीजल हमें आयात करना पड़ता है, जिसके कारण बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। किसी देश की अर्थव्यवस्था कितनी मजबूत है, उसका एक मानक यह भी है कि उस देश के केंद्रीय बैंक के पास कितना विदेशी मुद्रा भंडार है। विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में दुनियाभर में अमेरिकी मुद्रा डॉलर, ईयू की मुद्रा यूरो और चीनी मुद्रा युआन शामिल है। दरअसल, इन मुद्राओं में ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है। यानी भारत गल्फ से तेल खरीदता है तो उसका भुगतान अपनी मुद्रा रुपये में नहीं, बल्कि डॉलर में ही करना होता है। कई देश यूरो और युआन भी स्वीकार करते हैं। भारत जब सामान खरीदता है तो डॉलर से भुगतान करता है और बेचता है तो डॉलर ही लेता है। ज्यादा बेचने पर यकीनन डॉलर हमारे पास आएंगे और खरीदने पर डॉलर ज्यादा खर्च होंगे। जो देश ज्यादा निर्यात करते हैं, तो उनका विदेशी मुद्रा भंडार भरा रहता है और जो आयात ज्यादा करते हैं, उनका विदेश मुद्रा भंडारा खाली-खाली या नाममात्र भरा रहता है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का व्यापार घाटा 333.2 अरब डॉलर का था। यानी भारत ने निर्यात की तुलना में आयात ज्यादा किया और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी की स्थिति निर्मित हुई, जो कि देश हित में नहीं। पेट्रोल, डीजल, सोना तथा विदेश यात्राओं पर खर्च कम करने से भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार को यकीनन बचा सकता है। मोदी जी की अपील के पश्चात अनेकों सजग आम जनों, व्यापारियों और अधिकारियों ने सामूहिक रूप से यह फैसला किया कि अगले एक वर्ष तक, केवल बेटी की शादी या किसी विशेष अपरिहार्य पारिवारिक अवसर जैसी परिस्थितियों को छोड़कर वे सोना नहीं खरीदेंगे। सोना-चांदी के व्यापारियों ने भी भले ही लंबे नुकसान का संदेह जताया और लाखों कारीगरों पर बेरोजगारी का खतरा मंडराने की बात कही लेकिन फिर भी उन्होंने देश हित को ही प्राथमिकता दी। धैर्य और सब्र का दामन थामे इन कारोबारियों का कहना है, ‘सोना नहीं तो चांदी बेचेंगे। किसी कर्मचारी-कारीगर की रोज़ी-रोटी नहीं छिनेगी। सालभर की तो बात है। मोदी जी हैं...सब ठीक हो जाएगा।’ तभी तो आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है और जहां चाह हो वहां राह भी निकल ही आती है की कहावत को उन्होंने बखूबी चरितार्थ करने में देरी नहीं की। संतरानगरी नागपुर के प्रमुख ज्वेलर्स ने सोने के बदले चांदी पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए सिल्वरोत्सव के जो विज्ञापन अखबारों में प्रकाशित करवाये उनमें चांदी की पायल, चेन, मूर्तियों पर विशेष छूट की पताका फहराते हुए ग्राहकों से अधिक से अधिक चांदी के जेवर, बर्तन, कंगन, धार्मिक मूर्तियां, शोपीस आदि खरीदने के लिए प्रेरित करना प्रारंभ कर दिया। वैसे भी सोना अब केवल उच्च मध्यम वर्ग और रईस ही कई ज्यादा खरीदते हैं। अमीरों के यहां तो सोने के भंडार भरे पड़े हैं। देशभर में सोने-चांदी और डायमंड के असंख्य आलीशान शोरूम हैं, जहां हजारों लोग काम करते हैं। लाखों कारीगरों की दाल-रोटी इन्हीं पर टिकी है। पहले जहां नये गहने खरीदने के विज्ञापनों की भरमार थी, अब पीएम की अपील के बाद विज्ञापन की शब्दावली कुछ यूं है, ‘‘जब अपना सोना घर में है तो आयातित सोने पर निर्भर क्यों रहें? अपने घर के सोने को नए और आधुनिक डिजाइनों में बदलें और विदेशी सोने पर निर्भरता कम करने में योगदान दें। अपने पुराने सोने को नए गहनों में एक्सचेंज करें और पाएं पहले से भी ज्यादा खास फायदे। आइए, मिलकर जगमगाते हैं अपने सोने का तेज...’’ 

यह भी सौ फिसदी सच है कि बीते कुछ वर्षों में सोने-चांदी की कीमतों में जिस तरह से बेतहाशा इजाफा हुआ है, ठीक वैसे ही मंत्रियों, अधिकारियों, नेताओं तथा तमाम छोटे-बड़े जनप्रतिनिधियों में बेतहाशा अहंकार आया है। अधिकांश जनप्रतिनिधि आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गये हैं। जब जनता के वोटों से निर्वाचित यह धुरंधर पेट्रोल-डीजल की बचत और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के लिए नियमित बस, मेट्रो, साइकिल, मोटर साइकिल पर आना जाना करेंगे तो लोगों से भी मिलेंगे तो इन्हें पता चलेगा कि आम भारतीय कितने कष्ट में हैं। उनकी समस्याओं को कैसे अनसुना किया जा रहा है। जिन्हें गांव, शहर, प्रदेश और देश चलाने के लिए वोट दिए गये हैं वे तो वातानुकूलित कमरों, कारों का मजा लूटते हैं और उन्हें राजा बनाने वाले मेहनतकश तपती गर्मी, बरसात और सर्दी के शिकार होने को विवश हैं। अभी तक असलियत से मुंह चुराते चले आ रहे शासक, प्रशासक सच को जानें और समझें कि भारत के आम नागरिक पर क्या गुजर रही है। उसे सत्ताधीशों की ऐशपरस्ती और नालायकी का खामियाजा बार-बार मरकर भुगतना पड़ रहा है।

नम्बर

कोई जब अपने अथक परिश्रम की बदौलत सफल होता है तो उसकी तारीफ की जाती है। यही हमारे यहां का चलन और दस्तूर रहा है। लेकिन हर बात, चीज़, कर्म और कथन में मीन-मेख निकालने वालों की संख्या में जबरदस्त इजाफा देखा जा रहा है। इस चक्कर में किसी की उपलब्धियों की तारीफ करना छोड़ उसकी कमी की खोज करने वालों के बारे में क्या कहा जाए और किया जाए? उत्तरप्रदेश के सीतापुर की प्राची निगम ने दसवीं की परीक्षा में जब टॉप किया तो उसे बधाई और शुभकामनाएं देने वाले कम और तानाकशी यानी ट्रोल करने वाले बहुत ज्यादा थे। यह व्यवहार किसी को भी हैरान और आहत कर सकता है। प्राची को भी बहुत ठेस पहुंची। अकेले में बारम्बार रोती रही। उससे मिलने के लिए आनेवाले शुभचिंतकों ने उसे सोशल मीडिया पर आती भद्दी टिप्पणियों को भूलने और पूरी तरह से नजरअंदाज करने को कहा लेकिन तब भी वह ट्रोल करने वालों के दंशों से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सकी।

यूपी बोर्ड में टॉप टेन में अपनी प्रभावी जगह बनाने वाली प्राची के चेहरे पर लड़कों की तरह जो मूंछ और बाल उग आये वही उसके शत्रु बन गये और सोशल मीडिया के शैतानों को उसे चिढ़ाने और मजाक उड़ाने का मौका मिल गया। प्राची सोचती रह गई कि काश! वह टॉप में नहीं आती। अन्य लाखों छात्र-छात्राओं की तरह साधारण नंबर पाती और अपने आप में मस्त रहती। न्यूज चैनल वालों का रवैया भी उसके प्रति निराशाजनक ही रहा। वे भी उसके चेहरे के बालों पर कैमरे केंद्रित कर उसका मजाक उड़ाने से बाज नहीं आए। उनका खोद-खोदकर यह पूछना, गहरे तक आहत करता रहा  ‘‘लड़कों की तरह दाढ़ी, मूंछ में कैसा लगता है? ये कैसे और कब हुआ? मां-बाप ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया! कैसे लापरवाह अभिभावक हैं?’’ प्राची कभी जवाब देती तो कभी चुप्पी साध लेती। ऐसे ही सुलगते सवालों और भेदती निगाहों की भीड़ का सामना करते-करते उसने आगे की पढ़ाई में ध्यान देना प्रारंभ कर दिया। इस दौरान उसके माता-पिता ने लाखों रुपए खर्च कर कुशल चिकित्सकों से उसके चेहरे का कई बार इलाज करवाया। इससे उसेकाफी हद तक चेहरे के घने बालों से मुक्ति मिल गई। फिर भी पहचान बनी रही। उसने सोशल मीडिया से पूरी तरह से दूरियां बना लीं। बारहवीं की परीक्षा में प्राची 500 अंकों में 450 अंक प्राप्त कर साधारण विद्यार्थियों में शुमार हो गई। लेकिन इस बार भी ट्रोलर अपनी घटिया हरकतों से बाज नहीं आये। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर उसकी पुरानी फोटो लगाकर उसके पिछड़ने और कम नम्बर पाने का मजाक उड़ाते रहे। किसी ने लिखा, कहां गई अक्लमंदी? लगता है दसवीं की परीक्षा में नकल मारने की जो सुविधा मिली थी, इस बार नहीं मिली। किसी की कमेटंस थी, ‘तुक्का हर बार नहीं चलता।’ कोई यह कहने से नहीं चूका, ऊपरवाले से हाथ-पैर जोड़कर अच्छी शक्ल-सूरत तो मांग लेती। घूर-घूरकर फोटो देखी, लेकिन समझ में ही नहीं आया कि औरत है या आदमी? ऐसे अबूझ पहेली से राम बचाये!’’ वैसे तो बचपन से ही प्राची के चेहरे पर लड़कों जैसे कुछ-कुछ बाल दिखने लगे थे लेकिन नौंवी क्लास तक पहुंचते-पहुंचते बालों का बढ़ना उसकी परेशानी का सबब बनने लगा। मोहल्ले के लड़कों के साथ-साथ सहपाठी लड़कियों और सहेलियों की निगाहों की चुभन को प्राची तीव्रता से महसूस करने लगी थी। अब तो प्राची में इतनी हिम्मत आ गई है कि कोई भी तंज, कटाक्ष उस पर असरहीन रहता है। उसने फिजूल के सोशल मीडिया से भी हमेशा-हमेशा के लिए किनारा कर लिया है। अब तो वह अपने लक्ष्य के प्रति पूर्णतया समर्पित रहकर अपनी लाइफ इंजॉय कर रही है। 

इतिहास गवाह है कि जो लोग परिश्रम, साहस और अपने लक्ष्य से मुंह नहीं चुराते वही अंतत: इतिहास में अपना नाम दर्ज करवाते हुए अपार प्रशंसा और गड़गड़ाती तालियों का मनोहारी उपहार पाते हैं। अपने देश भारत में अनेकों महिलाएं दूसरों के घरों में झाड़ू पोछा और बर्तन मांजकर अपना घर परिवार चलाती है। अब तो कुछ प्रदेशों की सरकारें भी गरीब परिवार की महिलाओं को आर्थिक संबल प्रदान करने के लिए हर माह डेढ़-दो हजार की नगद राशि प्रदान करती हैं। लेकिन इससे इस महंगाई के दौर में यकीनन ज्यादा राहत नहीं मिलती। उनको मिलने वाली राशि को लेकर कुछ सक्षम लोग यह रोना रोते भी दिखते हैं कि सरकार ने मुफ्त में राशि देकर काम करने वाली बाइयों के भाव बढ़ा दिये हैं। एक तो ढंग से काम नहीं करती, उस पर पहले से ज्यादा मेहनताना भी मांगने लगी हैं। पश्चिम बंगाल में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में बर्तन-कपड़े धोकर लगभग चार-पांच हजार रुपए कमाने वाली कलिता मांझी विधायक बन गई हैं। भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें आसाराम सीट से चुनाव लड़वाया और वे अच्छे-खासे वोटों से जीत गईं। और भी कुछ महिलाएं विधायक बनने में सफल रहीं। लेकिन कलिता मांझी यकीनन उनसे अलग हैं। अधिकांश चुनावी योद्धाओं ने जहां चुनाव प्रचार में मतदाताओं को लुभाने के लिए लाखों-लाखों रुपए खर्च किए वहीं कलिता मांझी इस लायक थी ही नहीं कि कुछ हजार रुपये की भी व्यवस्था कर पाती। उसने बिना पैसे के चुनाव लड़ा और चुनाव जीत कर दिखाया। उसके विधानसभा के चुनाव में विजयी होने से आम देशवासियों में यह संदेश तो गया ही है कि यदि छवि निष्कलंक हो। नीयत में कोई खोट न हो तो शुभचिंतक और वोटर भी बढ़-चढ़कर तन-मन और धन से साथ और सहयोग देने में  कोई कमी नहीं छोड़ते। चुनाव जीतने वाले विधायकों ने शपथ ग्रहण के समारोह के लिए हजारों रुपये खर्च कर नये-नये परिधान बनवाये लेकिन कलिता के पास तो ढंग की एकाध साड़ी तक नहीं थी। ऐसे में जिस घर में वह काम करती थीं, उसी के मालिक ने सादगी प्रेमी ईमानदार कलिता मांझी को सुंदर साड़ी उपहार में दी, जिसे पहनकर वह कोलकाता में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुईं। यह भी काबिलेगौर है कि चुनाव जीतने के बाद भी मांझी जब अपने मालिक के यहां काम करने पहुंची तो उनके साथ-साथ पूरे मोहल्ले के लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया। विधायक बनने के बाद भी अपनी जड़ों को न भूलते हुए उसने सामान्य दिनों की तरह बर्तन और कपड़े धोए और अन्य घरेलू काम भी निपटाए। 

जहां चाह होती है वहां राह न निकले, ऐसा हो ही नहीं सकता। कुछ कर्मवीर पुरातन कहावतों को चरितार्थ करने के लिए ही इस धरा पर आते हैं। दांत के बीच कलम दबाकर लिखने वाले मोहम्मद फैजानउल्ला से आप मिलेंगे तो उसके हौसले को सलाम किये बिना नहीं रह पायेंगे। झारखंड में दसवीं की स्टेट बोर्ड परीक्षा में 93 प्रतिशत अंक हासिल करने वाले फैजानउल्ला को जन्म से सेरेब्रल पाल्सी नामक बीमारी ने अपने क्रूर शिकंजे में जकड़ लिया था, जिससे वह न तो खुद से हिल-डुल सकता था और न ही उठ-बैठ सकता था। अभी भी वही हालत हैं। उम्र बढ़ने के साथ यह अच्छा हुआ कि फैजान बोलने-बतियाने लगा। इससे उसके माता-पिता को काफी अच्छा लगा और राहत महसूस हुई कि कम अज़ कम बच्चा बोलता और समझता तो है। इस गंभीर बीमारी की वजह से फैजान का स्कूल जाना संभव नहीं हो पाया। ऐसे में जितेंद्र कुमार भगत नामक शिक्षक ने फैजान के जीवन में किसी फरिश्ते की तरह प्रवेश किया। दरअसल, जब उन्हें उसके स्कूल नहीं जाने की वजह का पता चला तो वे खुद उसके घर जा पहुंचे। दिव्यांग फैजान का मनोबल और पढ़ने की अत्याधिक इच्छा को देखकर उन्होंने उसके सपने को साकार करने की दिशा में तुरंत काम करना प्रारंभ कर दिया। फैजान लिखना चाहकर भी लिखने में असमर्थ था। शुरू-शुरू में उन्होंने कलम को धागे से बांधकर लिखवाने की कोशिश की लेकिन यह प्रयास पूर्णतया असफल रहा। झारखंड शिक्षा परियोजना के अंतर्गत प्रखंड संसाधन केंद्र गोंडा में विकलांग बच्चों को शिक्षित करने के लिए विशेष शिक्षा विशेषज्ञ के तौर पर कार्यरत जितेंद्र कुमार कुछ दिनों तक अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाते रहे। उन्होंने एक कलम फैजान के मुंह में दांतों के बीच पकड़ाकर लकीर खिंचवाने का कई बार प्रयास किए और अंतत: मेहनत रंग लायी। धीरे-धीरे फैजान लिखने में इतना अधिकसमर्थ हो गया कि दूसरे सामान्य बच्चों और उसकी लिखावट में अंतर कर पाना मुश्किल हो गया। शिक्षक जितेंद्र के कड़े परिश्रम और फैजान के सतत अभ्यास और लगन की बदौलत आठवीं की बोर्ड परीक्षा तथा नौवीं की परीक्षा में खुद लिखकर चौकाने वाली सफलता पाई। इतना ही नहीं वह दसवीं की स्टेट बोर्ड परीक्षा में 93 प्रतिशत अंकों के साथ दिव्यांग कैटेगरी में टॉपर बना है। उसने परीक्षा में राइटर की उपलब्धता के बावजूद ज्यादातर कॉपी खुद ही लिखी।

सबूत

कुछ खबरों को पढ़-सुनकर कंपन-सी होने लगती है। दिमाग के सोचने के सभी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं। मुझे नहीं मालूम कितने लोगों के साथ ऐसा होता है? मेरे साथ तो अक्सर यही होता है कि कुछ हैरतअंगेज दिल को दहलाने वाली खबरों को भ्ाुला पाना मुश्किल हो जाता है। उन्हीं के ताने-बाने में उलझ कर रह जाता हूं। अनंत सवाल और चिन्ताएं घेर लेती हैं। उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले में एक मां ने अपने ही मासूम बच्चे की हत्या कर दी। मां ऐसा कैसे कर सकती है? लेकिन यह अपराध हुआ...! तीन बच्चों की मां का आठ माह का पुत्र तीन दिन से भ्ाूखा था। लाख कोशिशों के बाद भी वह अपने लाड़ले बेटे के लिए दूध की व्यवस्था नहीं कर पाई थी। कई घण्टों से बच्चा भ्ाूख से चीख रहा था। तड़प रहा था। मां ने कई बार नादान बच्चे को पानी पिलाकर सुलाने की कोशिश की। तीन दिन से भ्ाूखे बच्चे को नींद कैसे आती? उसका खाली पेट विद्रोह करता रहा। रोना असहनीय चीखों में तब्दील होता चला गया। उस मासूम के दोनों भाई-बहन मां की विवशता को समझते थे। इसलिए भ्ाूखे होने के बावजूद चुप थे। मां ने दूध खरीदने के लिए घर का सामान भी बेच डाला था। अब तो कोई ऐसा सामान नहीं बचा था, जिसे बेचकर दूध, चावल-दाल का इंतजाम कर पाती। उसका पति मुंबई में नौकरी करता है। उसने भी कई महीनों से पैसे नहीं भेजे थे। वह अपने आठ माह के बच्चे को घर में छोड़कर काम पर भी नहीं जा सकती थी। मां के लिए अंतत: बच्चे की तड़पन को बर्दाश्त कर पाना असहनीय हो गया और उसने उसका गला घोंटकर हमेशा-हमेशा के लिए उसे खामोश कर  दिया! 

एक बेगुनाह मासूम बच्चा इस दुनिया से विदा हो गया। कटघरे में ‘मां’ है, जो अपनी औलाद को बड़े लाड़-प्यार से पालती है, कभी सपने में भी उनका बुरा नहीं सोच सकती। मां के हत्यारिन होने की खबर सूखे जंगल की आग की तरह फैल गयी। जिस घर की तरफ कोई ताकता भी नहीं था वहां समाज सेवकों और नेताओं की भीड़ लग गई। तरह-तरह की बातें की जाने लगीं। मोहल्ले वाले हैरान-परेशान थे कि यह अनहोनी कैसे हो गई! यदि वह इतनी परेशान थी तो हमें खबर कर दी होती। हम मिल-जुलकर बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान कर देते। नेता और समाज सेवक भी शासन और प्रशासन को कोसने में लग गए। पुलिस ने हत्यारी मां को हिरासत में ले लिया। हत्यारी की उम्रदराज मां ने कोतवाली में जाकर जबरदस्त हंगामा मचाया। चीख-चीख कर कहती रही कि उसकी बेटी ने मजबूरी में यह अकल्पनीय अपराध किया है...। लेकिन कानून की अपनी मर्यादा है। उसका चक्का कानून की किताबों और वकीलों के दांव-पेंच से चलता है। किसी के पास फुर्सत नहीं जो गंभीरता और गहराई से जाने और समझे। असली अपराध और अपराधी तो गरीबी है, जो गरीबों के लिए मौत का फंदा बनी हुई है। किसी अमीर परिवार के बच्चों की भ्ाूख से तड़प-तड़प कर मरने की खबर कभी भी पढ़ने-सुनने में नहीं आती। कभी भी सुनने में नहीं आया कि किसी अमीर का बच्चा सर्दी और लू लगने के कारण मर गया हो, बाढ़ ने उसके प्राण ले लिए हों, कोई गटर, गड्ढा, नदी, नाला उसकी जान का दुश्मन बन गया हो। तमाम प्राकृतिक आपदाएं और रहस्यमय बीमारियां भी गरीबों के बच्चों पर ही भारी पड़ती हैं। यहां तक कि अस्पतालों में भी दवाइयों और आक्सीजन के अभाव में गरीबों के सैकड़ों बच्चे हर वर्ष मौत के मुंह में समा जाते हैं। डॉक्टरों की घोर लापरवाही भी इन्हीं पर जुल्म ढाती है।

महाराष्ट्र के एक गांव का एक युवा किसान अपनी चिता सजाकर उस पर जिंदा जल गया। सत्तर हजार रुपये के कर्ज के तले दबे इस किसान ने चिता पर लेटने के बाद जहर पिया। यानी वह किसी भी हालत में जीना नहीं चाहता था। अगर कहीं आग से बच जाता तो विष उसके प्राण ले ही लेता। पुख्ता मौत के लिए जिंदा जल मरने की यह इकलौती घटना नहीं है। ऐसी हृदय विदारक घटनाओं के बारे में जब पढ़ने और सुनने मात्र से कंपकपी छूटने लगती है तो सोचें कि आत्महत्या करने वाले लोगों की कैसी मानसिक स्थिति रहती होगी? खुद की चिता के लिए खुद ही लकड़ियां और केरोसीन का इंतजाम करना कोई बच्चों का खेल तो नहीं। भौतिकता से सराबोर आधुनिकता के इस अजब-गजब काल में अंधविश्वास, घृणा, अराजकता और व्याभिचार की कोई सीमा नहीं रही। ढाई-तीन साल की  मासूम बेटियां दरिंदों की अंधी हवस का शिकार हो रही हैं। कोई पैंसठ साल का इंसान कैसे ऐसा पाप कर गुजरता है, लाख सोचने पर भी जवाब नहीं मिलता। 

एक रिक्शा चालक की तीन बेटियों की कई दिनों तक खाना नहीं मिलने पर मौत हो गई। वह रिक्शा वाला गरीब था, लेकिन किसी को भूखा देख अपनी दिन भर की कमाई उसकी झोली में डाल देता था, लेकिन उसकी बेटियों पर किसी को रहम नहीं आया। तड़प-तड़प कर तीनों चल बसीं। पिछले दिनों ओडिशा के एक आदिवासी की उस तस्वीर को देश और दुनिया के करोड़ों लोगों ने देखा और शासन और प्रशासन को कोसा। इस गरीब किसान को अपनी मृतक बहन के बैंक में जमा लगभग बीस हजार रुपये निकालने के लिए कई चक्कर काटने पड़े। बैंक वालों ने उसकी दुनिया छोड़ चुकी बहन के मरने का पुख्ता प्रमाण मांगा तो उसने अपने बहन की कब्र खोदी और बहन के कंकाल को कंधे पर लादकर बैंक वालों के समक्ष पहुंचकर बोला, क्या और भी कोई सबूत चाहिए? 

क्या इंसानी की संवेदनाएं लुप्त होती चली जा रही हैं? कुछ लोग कहते हैं कि इंसान जानवर बनता चला जा रहा है। क्या वाकई यह सच है? अभी हाल ही में दिल्ली के एक ही परिवार के छह सदस्यों ने अंधविश्वास के चक्कर में आत्महत्या कर ली। इस घटना ने उस परिवार के रिश्तेदारों और पड़ोसियों से ज्यादा उनके कुत्ते शामी को गहरे तक आघात पहुंचाया। घटना के बाद शामी की हालत बहुत नाजुक हो गई थी। उसने खाना-पीना छोड़ दिया था। वह गुमसुम रहने लगा था और अंतत: घर में ही मृत पाया गया।